Friday, 23 September 2011

♥ प्रेम के टूटे तार ♥♥♥♥

"♥♥♥♥♥♥♥♥ प्रेम के टूटे तार ♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तुम बिन अब तो हुआ अधूरा मेरा घर संसार!
तोड़ दिए हैं जब से तुमने प्रेम के कोमल तार!

कहाँ गए वो स्नेह, मधुरुता, कहाँ गयीं सौगंध!
कहाँ गया वो प्रेम का दर्पण, कहाँ गया सम्बन्ध!
एक पल ही में तुमने कैसे प्रेम के सोखे प्राण,
तुमने मिश्रित की वायु में विरहा की क्यूँ गंध!

तुम बिन न ही जल भाता है न भाता आहार!
तोड़ दिए हैं जब से तुमने प्रेम के कोमल तार........

तुम बिन मन की चंचलता के सुप्त हुए हैं भाव!
प्रेम की इस पीड़ा ने मन को किये हैं प्रेषित घाव!
अब तक उत्तर खोज रहा हूँ, हूँ किन्तु अनभिज्ञ,
किस कारण से तुमने खुद में ढाले थे बदलाव!

यदि कमी थी हम में कोई, कहते तो एक बार!
तोड़ दिए हैं जब से तुमने प्रेम के कोमल तार........

देह के नाता टूट गया है, मन में किन्तु वास!
एक दिन मेरी कमी का तुमको भी होगा आभास!
प्रेम की पीड़ा की व्याकुलता पल पल देती शूल,
इस पीड़ा में जीवन धारा भी न आती रास!

विजय सिखाकर ही तुम हमको क्यूँ दे बैठे हार!
तोड़ दिए हैं जब से तुमने प्रेम के कोमल तार!"



"प्रेम, में मिलने वाली पीड़ा बहुत घातक होती है! इससे व्यक्ति के आत्मविश्वास, लक्ष्य और गतिशीलता पर भी प्रभाव पड़ता है! तो आइये प्रयास करें कि किसी को प्रेम की पीड़ा न दें!-चेतन रामकिशन "देव"
















1 comment:

अमि'अज़ीम' said...

तोड़ दिए हैं जब से तुमने प्रेम के कोमल तार!...
wah .... dil ko chune baale aalfaaz..
badhaai...