Monday, 18 September 2017

♥♥जड़वत...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥जड़वत...♥♥♥♥♥♥♥♥
सजल नयन हैं, तुम बिन पीड़ा, जड़वत मेरी गति हो गई। 
हृदय टूटकर बिखरा पथ पर, तुम बिन गहरी क्षति हो गई। 
तन, मस्तक सब केश, कंठ भी विरह भाव से प्रभावित हैं,
तुम बिन मन को कुछ न भाये, तुमको अर्पित मति हो गई। 

खाई थी सौगंध जन्म की, किन्तु नाता तोड़ रहे हैं। 
अपने स्वजन बुरे समय में, मुझसे मुख को मोड़ रहे हैं,
मैं एकाकी शिशु की भांति, बोध नहीं है युद्ध कला का,
निर्मोही होकर के मुझको, अग्निपथ में छोड़ रहे हैं। 

मुझको एकदम किया बहिष्कृत, तृप्त जो उनकी रति हो गई। 
सजल नयन हैं, तुम बिन पीड़ा, जड़वत मेरी गति हो गई ...

होकर के निर्दोष भी मुझको, क्यों कर कारावास दिया है। 
न ही सौंपी हर्ष की धरती, न सुख का आकाश दिया है। 
तुमने अपने महल दुमहले चमकाए हैं उजले पन में,
किन्तु सक्षम होकर तुमने, न मुझको प्रकाश दिया है। 

 देखो मेरी अनुभूति की, न चाहकर भी यति हो गई।  
सजल नयन हैं, तुम बिन पीड़ा, जड़वत मेरी गति हो गई.... 

लगता है बारूद भरा है, मेरे मन की दीवारों में। 
स्याह हो गया जीवन पूरा, भय लगता है उजियारों में। 
" देव " ये कैसी परिपाटी है, कैसा मन का उत्पीड़न है,
अब सावन में पतझड़ लगता, नहीं लगन अब श्रंगारों में।  

मेरी आत्मा प्रतीक्षा के अंगारों में सती हो गई। 
सजल नयन हैं, तुम बिन पीड़ा, जड़वत मेरी गति हो गई। "


......चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक- १८.०९.२०१७ 


Wednesday, 9 August 2017

♥♥♥♥वार...♥♥♥♥♥♥

♥♥♥♥वार...♥♥♥♥♥♥
तबाह हो न सके हम, तो हमें मार दिया। 
मोहब्बत ईश्क़ का रिश्ता भी दरकिनार किया। 

जंग होती जो सामने से, हम भी लड़ लेते,
मगर उस शख़्स ने, पीछे से हमपे वार किया। 

सुनो अब टूट गयी, हर कड़ी वफाओं की,
जुर्म उसका था मगर, मुझको गुनहगार किया। 

उदास रात है, रिसते हुए खूं की टपकन, 
तीर कसकर के मेरे दिल के आरपार किया। 

' देव' उम्मीद है, शायद सुकून मिल जाए,
आग का दरिया तो हंसकर के हमने पार किया। "


.....चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक- ०९.०८.२०१७ 





Saturday, 29 July 2017

♥अश्रु जल...♥

♥♥♥♥अश्रु जल...♥♥♥♥♥♥
ह्रदयाघात, प्रताड़ित मन है ,
अब तो शूलों पे जीवन है,
कष्ट आत्मा तक आ पहुंचा,
अश्रु जल का बहिर्गमन है। 

मुख झुलसा है, पांव में छाले, धूप जलाती है भादों की। 
मौन हैं मेरी आह को सुनकर, घनी रिक्तता संवादों की,
परिलक्षित हो ही जाता है, जब मन के मंतव्य बदलते,
सच के सम्मुख चमक बढ़ रही, मिथ्या के कुछ उत्पादों की। 

आरोपित करके खुश होना,
अधिकांशत यही चलन है। 
कष्ट आत्मा तक आ पहुंचा,
अश्रु जल का बहिर्गमन है ...

बिखर रहे सब स्वप्न नयन के, जटिल अवस्था है जीवन की। 
शब्द रो रहे दशा देखकर, व्याकुलता इतनी लेखन की। 
हर्षित हैं वो मुझे रुलाकर, विस्मृत करके संबंधों को,
नहीं टीस सुनता है कोई, मन के व्याकुल उद्बोधन की। 

उमड़ रहा पीड़ा का सागर,
मानवता का बड़ा दमन है। 
कष्ट आत्मा तक आ पहुंचा,
अश्रु जल का बहिर्गमन है। "


......चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक- २९.०७.२०१७ 

Thursday, 15 June 2017

♥♥♥♥सियासी...♥♥♥♥♥♥

♥♥♥♥सियासी...♥♥♥♥♥♥
झूठे सब्जबाग दिखलाकर। 
जात धर्म का पाठ पढ़ाकर। 
आज सियासी खुश होते हैं,
औरों के घर आग लगाकर। 

मुफ़लिस की एक ईंट ईंट तक,
झोपड़ पट्टी बिक जाती है। 
बची खुची बस जान जिस्म की,
मरकर पथ में फिंक जाती है। 

घर, बस्ती और गलियारों में,
नफरत की दिवार उठाकर।
आज सियासी खुश होते हैं,
औरों के घर आग लगाकर। 

व्याकुल बेरोजगार सिसकते,
कहीं पे चूल्हे नहीं दहकते,
कहीं नहीं है छत की छाँव,
भूख से बच्चे नहीं चहकते। 

सेंक रहे मतलब की रोटी,
मज़लूमों की लाश तपाकर।
आज सियासी खुश होते हैं,
औरों के घर आग लगाकर। "


......चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक- १६-०६-२०१७   


Sunday, 7 May 2017

♥♥♥♥धुआं धुआं सा...♥♥♥♥♥♥

♥♥♥♥धुआं धुआं सा...♥♥♥♥♥♥
धुआं धुआं सा छाया क्यों है। 
हर एक शख़्श पराया क्यों है। 

भीतर से तो काला है दिल,
बाहर मगर छुपाया क्यों है। 

जिसकी एक दिन मांग भरी थी,
जिंदा उसे जलाया क्यों है। 

सात जन्म तक की कसमें थीं,
एकदम उन्हें भुलाया क्यों है। 

जो मुफ़लिस, कमजोर, बेगुनाह,
कहर उसी पे ढ़ाया क्यों है। 

रोटी का हक़ है, उसको भी,
उसका हिस्सा खाया क्यों है। 

"देव " ज़ख्म जब भर नहीं सकते,
आखिर नमक लगाया क्यों है। "


......चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक- ०८.०५.२०१७  
(मेरी यह रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित, सर्वाधिकार सुरक्षित ) 


Monday, 1 May 2017

♥क्यूंकि तुमसे प्यार किया है...♥♥

♥♥♥♥♥♥क्यूंकि तुमसे प्यार किया है...♥♥♥♥♥♥♥♥♥
चाहो तो तुम मुझे भुला दो ,
मेरे सब सन्देश जला दो। 
कर दो मेरा शीश अलग तुम,
या फिर मुझको जहर खिला दो। 

जो भी तेरा मन करता हो, सभी जतन तुम बस कर लेना। 
चाहें मुझको ग़म देकर के, खुशियों से झोली भर लेना। 

तेरी जिद, तेरे गुस्से को, हंसकर के स्वीकार किया है। 
तुमसे कोई नहीं शिकायत, क्यूंकि तुमसे प्यार किया है ...


मैंने अपने प्रेम भाव का,
बस तुमसे अनुरोध किया है। 
न ही तुम पर जोर जुल्म और,
न कोई अवरोध किया है। 
हाँ तू अच्छी लगती है तो,
तुझसे गठबंधन का मन है,
इसीलिए इस रुंधे कंठ से,
नाम तेरा उद्बोध किया है। 

तू स्वामी है, अपने मन की, जो भी हो निर्णय कर लेना। 
मन बोले तो अपना लेना, या फिर दूरी तय कर लेना।  

मैंने तो बस नाम तुम्हारे, अपना ये संसार किया है। 
तुमसे कोई नहीं शिकायत, क्यूंकि तुमसे प्यार किया है...

तुमसे सब कुछ सत्य कहा है, 
झूठ बोलना मुझे न आता। 
हाँ ये सच है बिना तुम्हारे,
मेरे दिल को कुछ न भाता। 
"देव " तुम्हारे अपनेपन की,
लगती मुझको बहुत जरुरत,
तेरे बिन ये रात हैं सूनी,
धवल चाँद भी नहीं लुभाता। 

यदि प्रेम के योग्य लगूं तो, तुम मेरी दुनिया बन जाओ। 
सुबह, शाम, दिन, रात, हमेशा, मेरे जीवन को महकाओ। 

बस तेरी उम्मीद में मैंने, सात समुन्दर पार किया है। 
तुमसे कोई नहीं शिकायत, क्यूंकि तुमसे प्यार किया है। " 


......चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक- ०१.०५ .२०१७  
(मेरी यह रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित, सर्वाधिकार सुरक्षित ) 

Sunday, 30 April 2017

♥दर्द और तकलीफ...♥

♥♥♥♥♥♥दर्द और तकलीफ...♥♥♥♥♥♥♥♥♥
दर्द और तकलीफ से दो चार होना पड़ रहा है।  
वो गुनाह करके भी खुश हैं, मुझको रोना पड़ रहा है। 

है बुरा जो वक़्त मेरा, सब सहारा खींच बैठे,
आज खुद बैसाखियों पर, खुद को ढ़ोना पड़ रहा है। 

इस क़दर तकदीर भी, मुझसे निभाए दुश्मनी,
दर्द के काँटों पे मुझको, दोस्त सोना पड़ रहा है। 

दूर तक ग़म का मरुस्थल, कौन है जो बूंद देगा,
अपना चेहरा, अपने ही अश्क़ों से धोना पड़ रहा है। 

आज छोटी पड़ रही, शर्मो हया की चादरें,
खुद-ब-खुद इंसानियत का, कद भी बौना पड़ रहा है। 

फेर लीं उसने निगाहें, रौंदकर तस्वीर मेरी,
देखकर उसको किनारे खुद ही होना पड़ रहा है। 

" देव " मुमकिन है जमाना, नाम अपना याद रखे,
बस तभी तो बाजुओं में, जोर बोना पड़ रहा है। " 


......चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक- ३०.०४.२०१७  
(मेरी यह रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित, सर्वाधिकार सुरक्षित ) 


Saturday, 7 January 2017

♥तुम्हारी सूरत...♥

♥♥♥♥♥♥तुम्हारी सूरत...♥♥♥♥♥♥♥♥♥
शायरी करने लगा दिल तुम्हारी सूरत पर,
खुदा ने बख़्शा है, जो हुस्न बेहिसाब तुम्हे। 

सोचता हूँ तुम्हे कह दूँ कोई परी हमदम,
ये भी हसरत है के, लिखूं मैं माहताब तुम्हे। 

जिंदगी जब भी तेरी दर्द में, ख़लिश में हो,
सोंप दूँ आके सनम, अपने सभी ख़्वाब तुम्हे। 

क्या है ज़ुर्रत जो अँधेरे की चाल कोई चले,
कुदरती नूर कहूँ और मैं आफ़ताब तुम्हे। 

चाहता हूँ तुम्हे मिलना, के न जुदाई हो,  
इसी उम्मीद में भेजूं, खिला गुलाब तुम्हे। 

ख्वाहिशें हैं तेरे होठों की दुआ बन जाऊं,
ऐसा कुछ भी न करूँ, जो लगे ख़राब तुम्हे। 

मेरे लफ़्ज़ों के तस्सुवर में "देव" तू ही तू,
देखना चाहूं सनम खुश, मैं कामयाब तुम्हें। "

दिनांक- ०७.०१.२०१७  

(मेरी यह रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित, सर्वाधिकार सुरक्षित ) 






Tuesday, 27 December 2016

♥शोर, शराबा....♥

♥♥♥♥शोर, शराबा....♥♥♥♥
ग़म की आग, जला ये दिल है। 
जीने में तो कुछ तो मुश्किल है। 

चीख निकलकर भी दब जाये,
शोर, शराबा और कातिल है। 

खून चूसकर भी खुशहाली,
नहीं पता कैसे हासिल है। 

झूठ यहाँ सर चढ़कर बोले,
सच देखो कितना बोझिल है। 

मुझको ऊँचा देख गिराया,
यार नहीं है, वो संगदिल है।  

अनपढ़ होकर भी अपनापन,
पढ़ा लिखा है, पर जाहिल है। 

"देव " ईमां जिसने बेचा हो,
ख़ाक भला वो जिंदादिल है। "

दिनांक- २७.१२.२०१६  
(मेरी यह रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित, सर्वाधिकार सुरक्षित ) 





Thursday, 22 December 2016

♥एक तूफ़ान....♥

♥♥♥♥एक तूफ़ान....♥♥♥♥
एक तूफ़ान नज़र आया है। 
घर मिटटी का घबराया है। 

अपनों ने भी नज़रें फेरीं,
गैरों ने भी ठुकराया है। 

सफर आखिरी जोड़ घटा लूँ,
कितना खोया, क्या पाया है। 

उसी फूल को रौंदा जाता,
जिसने आंगन महकाया है। 

हमको पाला छांव में जिसने,
उसी पेड़ को कटवाया है। 

जो झूठा था उसे अशरफी,
आखिर सच को झुठलाया है। 

''देव'' ये दुनिया बड़ी बेरहम,
कब्र में जिन्दा दफ़नाया है। "


(चेतन रामकिशन "देव")

दिनांक- २२.१२.२०१६ 
(मेरी यह रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित, सर्वाधिकार सुरक्षित ) 








Tuesday, 22 November 2016

♥♥♥♥तुम नदी हो....♥♥♥♥




♥♥♥♥तुम नदी हो....♥♥♥♥
तुम नदी हो कोई मधुर जल की। 
तुम हो श्रृंगारिका सुनो थल की। 
मेरे जीवन का वर्तमान हो तुम,
तुम ही आधार हो मेरे कल की। 

मेरे जीवन का हर्ष तुमसे है। 
ये दिवस, माह, वर्ष तुमसे है। 
तुम नहीं हो तो मैं भी शेष नहीं,
मेरे नयनों का कर्ष* तुमसे है। 

तुमसे पुलकित हुआ मन मेरा,
तुम ही प्रतीक हो मेरे बल की।   

तुम नदी हो कोई मधुर जल की....

तुम से संयुक्त होके रह जाऊं। 
तेरी पीड़ा को स्वयं ही सह जाऊं। 
तेरी वाणी का शब्द बनकर के,
प्रेम के काव्य, छंद कह जाऊं। 

सर्वहित का विचार रखती हो,
तुम न दुर्भावना किसी छल की। 

तुम नदी हो कोई मधुर जल की....

मेरे साकार स्वप्न का दर्शन । 
तुम पे ये प्राण भी करूँ अर्पण।
"देव " तुम अर्थ हो समर्पण का,
तुम बिना रिक्त है मेरा जीवन। 

मेरे उल्लास का शिखर तुमसे,
और दृढ़ता हो तुम मेरे तल की। 

तुम नदी हो कोई मधुर जल की...."


(कर्ष*-आकर्षण )

"
प्रेम, एक ऐसा शब्द जिसमें समूची शान्ति, अपनत्व और कल्याण छिपा है,
प्रेम केवल युगलों का ही सूचक नहीं, अपितु समूचे जनमानस की कोमल भावना का सूचक है, तो आइये प्रेम को अपनत्व के प्रत्येक संदर्भ में स्वीकार करें........ चेतन रामकिशन "देव"

दिनांक- २३.११.२०१६
(मेरी यह रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित, सर्वाधिकार सुरक्षित ) 

Monday, 12 September 2016

♥♥♥♥प्रेम का पक्ष....♥♥♥♥

♥♥♥♥प्रेम का पक्ष....♥♥♥♥
प्रेम का पक्ष है,
मेरे समकक्ष है,
साथ तेरे रहूँ,
बस यही लक्ष है।
देखो आकाश में,
खिल गया चंद्रमा,
तेरे मेरे मिलन का,
जो उपलक्ष है।

मेरे अपनत्व में, तुम मेरे नेह में।
तुम मेरी आत्मा, तुम मेरी देह में।
तुमको देखा तो देखो खिले फूल भी,
हर्ष की पत्तियां, तुम तना, मूल भी।

तू मेरा केंद्र बिंदु,
तू ही अक्ष है।
तेरे मेरे मिलन का,
जो उपलक्ष है।

प्रेम का संचलन, आंकलन और मनन।
है यही प्रार्थना, तेरा हो आगमन।
"देव " तुमसे कभी भी विरक्ति न हो।
भूलकर भी विरह की विपत्ति न हो।

मेरे मन को पढ़े,
तू सबल, दक्ष है।
तेरे मेरे मिलन का,
जो उपलक्ष है।

......चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक-१२.०९ .२०१६
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। "



Thursday, 14 July 2016

♥♥तुम.....♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥तुम.....♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
धवल छवि, सौंदर्य अनुपम, केश मुग्ध करते हैं मन को। 
तुम बिन मेरे साथ तिमिर था, तुमने श्वेत किया जीवन को। 
मेरे भावों की सरिता तुम,  मेरी कविता की परिचायक,
तुम पावन हो गंगाजल सी, तुमने सिद्ध किया चन्दन को। 

प्रेम ग्रन्थ के प्रसंगों को, अभिव्यक्ति का सार दिया है। 
सखी मेरे जीवन को तुमने, मनचाहा उपहार दिया है। 

मधुर सुरीला स्वर तुमने ही, दिया है पायल की छन छन को। 
तुम पावन हो गंगाजल सी, तुमने सिद्ध किया चन्दन को....

दीप प्रेम के हुये हैं पुलकित, उत्सव का अवसर लगता है। 
तुम से ही पथ सरल हमारा, स्वर्ग सा तुमसे घर लगता है। 
तुम पर्याय सुमन, फूलों की, उपवन का उल्लास है तुमसे,
बिन तेरे जीवन का एक क्षण, सोचने से भी डर लगता है। 

तुमने ही सूनी डाली पर, हरा भरा श्रृंगार किया है। 
तुमने शब्दों की ऊर्जा बन, भावों का विस्तार किया है। 

तुम संग मन का क्रोध है कमतर, भूल रहा हूँ मैं अनबन को। 
तुम पावन हो गंगाजल सी, तुमने सिद्ध किया चन्दन को....

तुम अपने दर्शन देकर के, मेरा मन हर्षित करती हो। 
बहुत बड़ा ह्रदय तुम्हारा, प्राण तलाक अर्पित करती हो। 
"देव" तुम्हारी मृदुभषिता सुनकर, मन को अच्छा लगता,
नहीं किसी का बुरा सोचतीं, तुम दुनिया का हित करती हो। 

तुमने मेरी अनुभूति का, हर क्षण ही सत्कार किया है। 
बड़ा भाग्य है सखी हमारा, मुझको तुमने प्यार दिया है। 

मिटा अँधेरा जो तुम आईं, तारे चमके अभिनन्दन को। 
तुम पावन हो गंगाजल सी, तुमने सिद्ध किया चन्दन को। "

........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-१५.०७.२०१६ 
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। "



Friday, 8 July 2016

♥♥माँ......♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥माँ......♥♥♥♥♥♥♥♥
माँ की आँखों का प्यार प्यारा है। 
मैं हूँ साहिल तो माँ किनारा है। 
मेरे कानों में तब शहद सा घुले,
जब भी माँ ने मुझे पुकारा है। 

देखकर माँ को चैन मिलता है। 
घर में ममता का फूल खिलता है। 

माँ से रौशन ये घर हमारा है। 
माँ की आँखों का प्यार प्यारा है....

माँ सुगन्धित बहार जैसी है। 
माँ की बोली सितार जैसी है। 
माँ के स्पर्श से मिटा पीड़ा,
माँ तो शीतल फुहार जैसी है। 

माँ से ऊँचा न कोई रिश्ता है। 
माँ तो धरती पे एक फरिश्ता है। 

माँ ने ही आज कल संवारा है। 
माँ की आँखों का प्यार प्यारा है। 

माँ सुखद लोरियों की गायक है। 
माँ सुखद भावना की वाहक है। 
"देव" माँ का ये कद धरा जैसा,
माँ तपस्वी है और साधक है। 

माँ उमंगों में, माँ तरंगों में। 
माँ ही शामिल है, सात रंगों में। 

माँ तो ममता की दिव्य धारा है। 
माँ की आँखों का प्यार प्यारा है। "


अपनी दोनों माताओं को सादर समर्पित। 


........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-०८.०७.२०१६  
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। "
मेरी ये कविता मेरी वेबसाइट http://www.kavicrkdev.com/ एवं ब्लॉग https://chetankavi.blogspot.in/ पर पूर्व प्रकाशित।

Tuesday, 5 July 2016

♥बूँद बूँद आंसू......♥

♥♥♥♥♥♥बूँद बूँद आंसू......♥♥♥♥♥♥♥♥♥
बूँद बूँद आंसू फूटे हैं, और हमारे दिल टूटे हैं। 
जो कहते थे हमको अपना, आज उन्होंने घर लूटे हैं। 
मानवता को तार तार कर, भरा खून से मेरा दामन,
अपना दर्द बताया हमने, तो कहते हैं हम झूठे हैं। 

ये कैसी दुनिया है जिसमें, नहीं दर्द की सुनवाई है। 
दिल रोता है बिलख बिलख कर, आँख हमारी भर आई है। 

पतझड़ है खुशियों पर फिर से, पीड़ा के अंकुर फूटे हैं। 
अपना दर्द बताया हमने, तो कहते हैं हम झूठे हैं....

वो सिक्कों के सौदागर, वो अपनायत क्या जानेंगे। 
जब मन होगा ठुकरा देंगे, जब मन होगा पहचानेंगे। 
हत्यारे हैं मेरे दिल के, रौंद दिया है अरमानों को,
कातिल हैं वो उन्हें पता है, लेकिन फिर भी न मानेंगे। 

दिल में कितना ज़हर भरा है, आज झलक ये दिखलाई है। 
फूल सूख कर बिखरे बिखरे, और कली भी मुरझाई है। 

लोग गिराकर आगे बढ़ते, लेकिन हम पीछे छूटे हैं। 
अपना दर्द बताया हमने, तो कहते हैं हम झूठे हैं....

नफ़रत का बारूद भरा है, पर नफरत से क्या मिलता है। 
फूल भी देखो सौंधी सौंधी सी, मिटटी में ही खिलता है। 
"देव " जहर नफरत का भरके, चैन रूह को मिल नहीं सकता,
चैन, सुकून तो इस दुनिया में, प्यार की बातों से मिलता है। 

केवल हाथ मिलाना छोड़ो, दिल में जो गहरी खाई है। 
मुझसे पूछो, मेरे लफ्ज़ से, ऐसा मंजर दुखदाई है। 

ख्वाब उसी की आँख से देखे, बदल गया, वो सब टूटे हैं। 
अपना दर्द बताया हमने, तो कहते हैं हम झूठे हैं। "

बदलाव और अभिमान का चश्मा लगाकर लोग, किसी की अन्तर्निहित भावना को, उसकी पीड़ा को, उसकी अनुभूति को ऐसे अनदेखा कर देते हैं, जैसे उनके अतिरिक्त इस संसार में किसी की भावना का कोई मूल्य न हो, पर किसी की पीड़ा, किसी की भावना को जान बूझकर हतोउत्साहित करना, सही तो नहीं ..............

........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-०६.०७.२०१६ 
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। " 

मेरी ये कविता मेरी वेबसाइट एवं ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित। 

Wednesday, 22 June 2016

♥कांच......♥

♥♥♥♥♥कांच......♥♥♥♥♥♥
सोचकर रात फिर गुजारी है। 
आँख दुखती है, सांस भारी है।

उसने बीवी का भी किया सौदा,
तौबा इतना बड़ा जुआरी है।

चंद सिक्कों में ही ईमान बिका,
कितनी पैसों की बेकरारी है।

कत्ल करता है सारे रिश्तों का,
आदमी आजकल शिकारी है।

टूटकर दिल भी कांच सा बिखरा,
"देव " अपनों ने चोट मारी है। "
........चेतन रामकिशन "देव"…… 

♥♥गीत का सार...♥♥

♥♥♥♥♥गीत का सार...♥♥♥♥♥♥
गीत का सार बन गये हो तुम। 
रूह का प्यार बन गये हो तुम। 

एक पल को भी तुमको भूला नहीं,
ऐसा किरदार बन गये हो तुम। 

जान तक तेरे नाम कर दूंगा,
मेरे हक़दार बन गये हो तुम। 

मैं महकने लगा गुलों की तरह,
फूल का हार बन गये हो तुम। 

मेरे चेहरे पे है दमक कितनी,
मेरा सिंगार बन गये हो तुम। 

राह मुझको सही दिखाने को,
एक मददगार बन गये हो तुम। 

"देव" तुमसे ही शाम, सुबह मेरी,
मेरा संसार बन गये हो तुम। "

........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-२३.०६.२०१६ 
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। " 

Thursday, 9 June 2016

♥♥अंगार...♥♥

♥♥♥♥♥अंगार...♥♥♥♥♥♥
अब अंगार सुलग जाने दो। 
कुछ सपने हैं पग जाने दो। 
बहुत रखा आँखों पर पर्दा,
अब तो मुझको जग जाने दो। 

कुछ अच्छा करने की आशा,
आगे बढ़ने की अभिलाषा,
दीपक सा जलकर तो देखूं,
मन में जागी है जिज्ञासा। 
हाँ पथ तो दुर्गम है लेकिन,
न रखी है कोई हताशा। 
नव अंकुर हूँ धीरे धीरे,
सीख रहा मेहनत की भाषा। 

करो केंद्रित नयन लक्ष्य पर,
ऊर्जा नहीं अलग जाने दो। 
बहुत रखा आँखों पर पर्दा,
अब तो मुझको जग जाने दो..

कुछ इतिहास बनाना होगा,
खुद को सबल बनाना होगा,
ये जीवन का सफर है ऐसा,
कुछ खोना, कुछ पाना होगा। 
"देव " हार से कभी न डरना,
स्वयं को यही सिखाना होगा,
निशां रहे क़दमों के बाकी,
बेशक एक दिन जाना होगा। 

सच एक दिन खुलकर रहता है,
कितना पहरा लग जाने दो। 
बहुत रखा आँखों पर पर्दा,
अब तो मुझको जग जाने दो। "

........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-०९.०६.२०१६ 
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। " 

Friday, 27 May 2016

♥ दबा दर्द...♥

♥♥♥♥♥ दबा दर्द...♥♥♥♥♥
दबा दर्द बाहर आया है। 
वक़्त ने फिर से ठुकराया है। 
हिला हवाओं से दरवाज़ा,
कौन भला मिलने आया है। 

बुरा वक़्त जब होता है तो,
कोई मरहम नहीं लगाता। 
लाख बुलाओ, करो याचना,
पास कोई हरगिज़ नहीं आता। 
दिल के रिश्ते भी टुकड़ों में,
टूट-टूट कर गिर जाते हैं,
सब ही आग लगाने वाले,
कोई लपटें नहीं बुझाता। 

कड़ी धूप है सर पर गम की,
नहीं जरा सा भी छाया है। 
हिला हवाओं से दरवाज़ा,
कौन भला मिलने आया है....

हमने बहुत किया अपनापन,
पर हमसे नफरत सी क्यों है। 
नहीं पता के इस दुनिया की,
इक तरफा फितरत सी क्यों है। 
"देव " ज़माने भर में हम ही,
बने हैं क्या आंसू पीने को,
नहीं पता के मेरी आखिर,
बिगड़ी ये किस्मत सी क्यों है। 

सबने छिड़का नमक ज़ख़्म पे,
किसने आखिर सहलाया है। 
हिला हवाओं से दरवाज़ा,
कौन भला मिलने आया है। "

........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-२७.०५.२०१६ 
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। " 

Wednesday, 11 May 2016

♥♥ पत्थर...♥♥

♥♥♥♥♥ पत्थर...♥♥♥♥♥
पत्थर को पत्थर रहने दो। 
कायम मेरा घर रहने दो। 

अब हंसने से दिल दुखता है,
आँखे मेरी तर रहने दो। 

झूठ बोलकर झूठी इज़्ज़त,
सच का ऊँचा सर रहने दो। 

जान तो एक दिन सबकी जानी,
क्यों मरने का डर रहने दो। 

बेटी तो तितली जैसी हैं,
जिन्दा इनके पर रहने दो। 

बिजली चमकी डर लगता है,
गोद में मेरा सर रहने दो। 

"देव " वसीयत लिख लो मेरी,
माँ की मूरत पर रहने दो। "

........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-११.०५.२०१६ 
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