Saturday, 12 May 2018
♥सीलन...
Wednesday, 9 May 2018
♥♥अश्रु संचय...♥♥
♥♥अश्रु संचय...♥♥
व्यक्त करूँ क्या मन की भाषा,
क्या बतलाऊँ मौन ह्रदय का।
बड़ा संकुचित क्षेत्र हो गया,
मानवता और प्रेम विषय का।
जिसको देखो वो घृणा की,
घूम रहा चिंगारी लेकर,
और आत्मा को दुःख देता
ये अवलोकन दुरित समय का।
क्या लिखूं मैं वर्तमान को, कुछ भी शोध नहीं हो पाता।
लोगों के दोहरे चेहरों से, सच का बोध नहीं हो पाता।
जिनके मन में भरी हुयी हैं, विस्फोटक जैसी सामग्री,
मुझसे उनसे अपनापन का अब, अनुरोध नहीं हो पाता।
मानव, मानव का हत्यारा,
दृश्य बहुत ही है विस्मय का।
व्यक्त करूँ क्या मन की भाषा,
क्या बतलाऊँ मौन ह्रदय का.....
उन के मन में मेल नहीं है, ये मंतव्य समझ आया है।
मौन ही अब होकर रह लेंगे, ये गंतव्य समझ आया है।
जिनके सम्मुख प्राण तत्व भी, हमने रखकर किया निवेदन,
उनको न मेरा उद्बोधन, न वक्तव्य समझ आया है।
"
देव" सुनो ये पात्र भर गया,
मेरे तो अश्रु संचय का।
व्यक्त करूँ क्या मन की भाषा,
क्या बतलाऊँ मौन ह्रदय का। "
चेतन रामकिशन " देव"
०९.०५.२०१८
(सर्वाधिकार सुरक्षित, मेरी यह रचना मेरे ब्लॉग http://chetankavi.blogspot.com पर पूर्व प्रकाशित। )
Monday, 7 May 2018
♥♥ठोकर...♥♥
जीती बाज़ी आज गंवाई।
हमने फिर से ठोकर खाई।
झूठ की सबने धुंध चलाई।
ग़म है, बद्दुआ और तन्हाई।
जिसकी थी तस्वीर लगाई।
मुझको बात समझ में आई।
रूह तलक भी घबराई।
इसी सोच में रात बिताई।"
०८.०५.२०१८
(सर्वाधिकार सुरक्षित, मेरी यह रचना मेरे ब्लॉग http://chetankavi.blogspot.com पर पूर्व प्रकाशित। )
Sunday, 6 May 2018
♥♥अपवित्र ...♥♥
♥♥अपवित्र ...♥♥
अपवित्र हूँ।
मैं विचित्र हूँ।
कोई भयावह,
रौद्र चित्र हूँ।
मैं संभवत:
रक्तपिपासु,
मैं शत्रु का,
घना मित्र हूँ।
जब अपना कहने वालों से, ही ऐसी उपमा मिलती हैं।
तो हृदय की कंदराओं में, मानों के चिमनी जलती हैं।
आरोपित करने वाले तो, निरा रक्त को जल कह देंगे,
उनके सम्मुख किसी मनुज की, सच्ची बातें कब चलती हैं।
मैं हूँ अम्ल,
रसायन कोई,
कहाँ भला,
मैं कोई इत्र हूँ।
मैं संभवत:
रक्तपिपासु,
मैं शत्रु का,
घना मित्र हूँ।
बुरे समय में परिचय वाले, भी अपरिचित हो जाते हैं।
साथ छोड़ने के अवसर में, तत्क्षण विचलित हो जाते हैं।
ये ऐसा संसार है जिसमें, भावों का संदर्भ कुछ नहीं,
जीवित सृजन और सजीव भी, मानों कल्पित हो जाते हैं।
वो स्वयं को,
सर्वोच्च मानते।
मैं छोटा सा,
मानचित्र हूँ।
मैं संभवत:
रक्तपिपासु,
मैं शत्रु का,
घना मित्र हूँ। "
चेतन रामकिशन "देव"
०६.०५.२०१८
(सर्वाधिकार सुरक्षित, मेरी ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित। "
Wednesday, 2 May 2018
प्रेम विलीन
♥♥प्रेम विलीन ...♥♥
तुम विलीन हो जाओ मुझमें,
मिलन पूर्णता का उन्मुख हो।
गठबंधन हो आत्माओं का,
देह बिछड़ने का न दुख हो।
सत्य है एक दिन इस धरती से,
निश्चित है अवसान हमारा,
पर जब भी लूं जन्म दुबारा,
मेरा मुख तेरे सम्मुख हो।
मेरे प्रेम की अभिव्यक्ति का,
उद्बोधन और अलंकार तुम।
मेरी ऊर्जा, बल, अधिगम का,
निश्चित ही आधार सखी तुम।
मेरे जीवन के नभ तल में,
तुम सा ही तारा प्रमुख हो।
तुम विलीन हो जाओ मुझमें,
मिलन पूर्णता का उन्मुख हो।
,
मेरा पथ का उष्ण मरुस्थल,
जलधारा सा शीतल तुमसे।
मेरे जीवन का अंधियारा,
दिनकर भांति उज्ज्वल तुमसे।
प्रेम की कोमल धवल धारणा,
इंद्रधनुष की परिचायक तुम,
तुम संयोजन कोमलता का,
रेशम भी और मलमल तुमसे।
मेरे मन की तपस्याओं का,
मनचाहे वर जैसा सुख हो।
तुम विलीन हो जाओ मुझमें,
मिलन पूर्णता का उन्मुख हो।
ध्यान तुम्हारा मेरे चित्त को,
मेरी कला में रंग तुम्हारे।
प्रेम का हर क्षण उत्सव जैसा,
मैंने देखा संग तुम्हारे।
" देव" तुम्हारा स्वर सुनने से,
सरगम गूंजे कर्ण शिरा में,
बचपन से प्यारे लगते हैं,
क्रोध, नेह, स्पर्श तुम्हारे।
मेरे स्वप्नों से सच तक में,
तुम ही तुम मेरे अभिमुख हो।
तुम विलीन हो जाओ मुझमें,
मिलन पूर्णता का उन्मुख हो।"
चेतन रामकिशन 'देव'
दिनांक-०२.०५.२०१८
(सर्वाधिकार सुरक्षित,
मेरी ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित)
Wednesday, 4 April 2018
♥♥अनुराग ...♥♥
मौन पढ़ा न तुमने मेरा,
अभिव्यक्ति थी अनुराग की।
तुम पर प्राण करूं न्योछावर,
यही सोच थी मेरे त्याग की।
तेरे अश्रु पी लेने को,
हर क्षण मेरा कंठ खुला था,
शब्द भाव को युग्मित करके,
रची कविता प्रेम राग की।
ये नहीं कहता के मैं ही बस ,
श्रेष्ठ समर्पण का नायक हुं।
किन्तु इतना बोध है मुझको,
मैं सच का प्रतिपालक हुं।
प्रेम भाव के इस परिपथ में,
मिथ्या कहना मुझे न भाये,
मैंने उसको सौंप दिया मन,
वो छोड़े या साथ निभाये।
मैं शीतलता का वाहक हुं,
ज्वलनशीलता नहीं आग की।
शब्द भाव को युग्मित करके,
रची कविता प्रेम राग की....
कितने स्वप्न हुए रेखांकित,
अति निकटता का अवसर था।
सागर का खारा पानी भी,
लगता था कितना मधुकर था।
अनुभूति के दीप जले थे,
रोम रोम मन का उज्जवल था।
किन्तु सच का बोध हुआ तो,
सिद्ध हुआ वो केवल छल था।
मैंने माना प्रेम को श्रद्धा,
उसने युक्ति गुना भाग की।
शब्द भाव को युग्मित करके,
रची कविता प्रेम राग की।
चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक- ०४.०४.२०१८
(सर्वाधिकार सुरक्षित, मेरी ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित)
Tuesday, 9 January 2018
♥♥सर्दी वाली परी ...♥♥
सर्दी वाली परी मौन है।
धूप का भी न पता कौन है।
कंटक मेरे जीवन पथ पर,
खिले फूल और लता कौन है।
विस्मय बोध हुआ है मन को,
देखके उनके परिवर्तन को,
क्षण भंगुर सा टूट गया मैं,
चोट लगी है अंतर्मन को।
पीड़ा कम हो जो विरह की,
लेप, छाल वो बता कौन है।
कंटक मेरे जीवन पथ पर,
खिले फूल और लता कौन है...
नीले फूल, कली गुमसुम है।
बहुत विवशता का मौसम है।
नयनों में लाली के मेघा ,
पलकों का आंचल भी नम है।
तुमको प्रेम किया यदि मैंने,
तो बोलो के खता कौन है।
कंटक मेरे जीवन पथ पर,
खिले फूल और लता कौन है।"
चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-09.01.2018
(मेरी यह रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित, सर्वाधिकार सुरक्षित )
