Friday, 5 January 2018

♥♥♥♥चकनाचूर ...♥♥♥♥♥



♥♥♥♥चकनाचूर ...♥♥♥♥♥
मुझको दूर किया है तुमने। 
दिल को चूर किया है तुमने। 
जीवन भर जो हँस न पाऊं,
यों मजबूर किया है तुमने। 
क्यों कर तुमने फेर लिया मुंह,
जान के मेरे जज़्बातों को,
बेदर्दी से ख्बाव मेरा हर,
चकनाचूर किया है तुमने। 

यदि प्यार के धागे सच में, इतने ही कच्चे होते हैं। 
तो फिर प्यार न करने वाले, लोग ही क्या अच्छे होते हैं। 
नातें, कसमें, सौगंधों की होली यहाँ जलाई जाये,
सच को झुठला देने वाले, लोग ही क्या सच्चे होते हैं। 

"देव " मेरे हंसमुख चेहरे को,
यों बेनूर किया है तुमने। 
बेदर्दी से ख्बाव मेरा हर,
चकनाचूर किया है तुमने। "

 चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-05.01.2018

Friday, 29 December 2017

♥♥अजीवित ...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥अजीवित ...♥♥♥♥♥♥♥♥ 
जीवित होकर भी अजीवित, मृतप्राय सा जीवन क्या है। 
जो अपनायत, प्रेम रहित हो, ऐसा फिर मानव मन क्या है। 
मानवता को शर शैय्या पर , देखके भी अनदेखा कर दे,
खुले नयन से निर्मोही बन, आखिर ये अवलोकन क्या है। 

ये पाषाण सरीखी दुनिया, कभी कभी तो दम घुटता है। 
जब चालाक मनुज के हाथों, कोमल कोमल मन लुटता है। 

चंहुओर तो शूल चुभ रहे, दिखलाओ के उपवन क्या है।  
जीवित होकर भी अजीवित, मृतप्राय सा जीवन क्या है...


क्यों शोषण होता निर्धन का, क्यों कमजोर छले जाते हैं। 
क्यों निर्धन के अधिकारों के, पत्रक यहाँ जले जाते हैं। 
कितनी निर्ममता से निशदिन, रक्त बह रहा निर्दोषों का,
बारूदों की आंच में कितने, जग से दूर चले जाते हैं। 

हे प्रकृति ! तू ही बतला, आखिर ये प्रबंधन क्या है।
जीवित होकर भी अजीवित, मृतप्राय सा जीवन क्या है...

बस मेरी इतनी आशा है, जिसका हो, अधिकार मिल सके। 
मानवता को मनुज के हाथों, आदर और सत्कार मिल सके। 
" देव " सभी सहृदयी होकर, माला गूंथे प्रेम पुष्प की,
बने सुगन्धित वायु मंडल, रिक्त मनों को प्यार मिल सके। 

तब जाकर के समझ सकेंगे, स्वागत और अभिनन्दन क्या है। 
जीवित होकर भी अजीवित, मृतप्राय सा जीवन क्या है। "

 चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-२९.१२ .२०१७ 

(मेरी यह रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित, सर्वाधिकार सुरक्षित )


Sunday, 29 October 2017

♥♥तुम ही तुम ...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥तुम ही तुम ...♥♥♥♥♥♥♥♥ 


तुम परिचायक मेरी प्रीत की। 
धुरी तुम्ही हो मेरी जीत की। 
तुम शीतलता गरम धूप में,
तुम ऊष्मा हो जटिल शीत की। 

तुम उत्कृष्ट मेरे जीवन में, नेह, बोध, ममता तुममें है। 
तुम कर दोगी तिमिर को उजला, ये पावन क्षमता तुममें है। 
तुम्ही वंदना, तुम्ही प्रार्थना, तुम्ही हमारी मनोकामना। 
तुम्ही निवेदन, अधिकार तुम, तुम्ही हमारी क्षमा याचना। 

तुम भावुकता हो शब्दों की,
तुम ही लय हो मेरे गीत की। 
तुम शीतलता ग्रीष्म काल में,
तुम ऊष्मा हो जटिल शीत की...


तुम गंगा जल, तुम ही बल हो, तुम शक्ति हो, तुम ज्योति हो। 
किरन हर्ष की फूटें मन में, निकट मेरे जब तुम होती हो। 
तुम हरियाली हो उपवन की, तुम्ही फूल हो, तुम्ही रंग हो। 
मेरा जीवन बने सुगन्धित, सखी यदि तुम मेरे संग हो। 

तुम जाग्रति मानवता की,
तुम रूपक हो सबल रीत की।  
तुम शीतलता गरम धूप में,
तुम ऊष्मा हो जटिल शीत की...

तुम्ही प्रेयसी, तुम्ही नायिका, तुम्ही धरोहर, तुम सहजन हो। 
तुम्ही "देव" सी कलाकृति हो, तुम नैसर्गिक आलेखन हो। 
तुम अभिनन्दन, तुम आकर्षण, तुम संग्रह हो, तुम्ही कोष हो। 
तुम पर्याय प्रेम ऋतुओं का, तुम्ही लेखनी, काव्य कोश हो। 

तुम सतरंगी इंद्रधनुष की,
तुम यौवनता मेरे मीत की।  
 तुम शीतलता गरम धूप में,
तुम ऊष्मा हो जटिल शीत की। "

"
कोई ऐसा मनुज जिसका होना हमारे जीवन में, हमारी आत्मा को पूर्ण करता है, तब निश्चित प्रेम की कलियाँ पुष्प बनकर समूचे जग को मानवीयता से सुगन्धित करती हैं, तो आइये ऐसे श्रेष्ठ जान का वंदन करें। ....."

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-२९.१०.२०१७ 

(मेरी यह रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित, सर्वाधिकार सुरक्षित )


  



Tuesday, 10 October 2017

♥♥♥♥♥♥प्यार की बयार...♥♥♥♥♥♥♥

♥♥♥♥♥♥प्यार की बयार...♥♥♥♥♥♥♥
प्यार की जब बयार होने लगी।
जिंदगी खुशगवार होने लगी।

चांद बनकर के तुम मिले जो मुझे,
चांदनी बेशुमार होने लगी।

तेरी पाकीज़गी भरी सीरत,
हर तपिश दरकिनार होने लगी।

तेरी छुअन से मिट गया पतझड़,
हर तरफ ही बहार होने लगी।

रात का ख्वाब, तू सुनहरी किरन,
रौशनी रूह के पार होने लगी।

दिल तो पागल है तेरी चाहत में,
जान तक भी निसार होने लगी। 

" देव " तुझसे ही मेरा अर्थ यहाँ,
तू ही जीवन का सार होने लगी। "  

......चेतन रामकिशन "देव"……

Friday, 22 September 2017

♥♥घातक...♥♥♥




♥♥♥♥♥♥♥घातक...♥♥♥♥♥♥♥♥
विस्फोटक की संज्ञा देकर, मुझको घातक सिद्ध कर दिया। 
मुझको खलनायक सा आखिर क्यों करके प्रसिद्द कर दिया। 
क्या अपने अधिकार के स्वर को, गुंजित करना यहाँ गलत है,
दीवारों पे अपराधी लिख, क्यों मुझको संलिब्ध कर दिया। 

ये तो घोर दमन के क्षण हैं, अभिव्यक्ति मारी जाती है। 
नायक की युद्धक क्षमता भी, देखो बेकारी जाती है। 
शत्रु, भ्रष्टाचारी, लोभी को मिलता सम्मान यहाँ पर,
हत्यारे तो विजयी हो रहे, मानवता हारी जाती है। 

निर्दोषी जीवन गतियों को, जबरन क्यों अवरुद्ध कर दिया।  
विस्फोटक की संज्ञा देकर, मुझको घातक सिद्ध कर दिया। 

क्यों आखिर दुष चलन हो रहा, क्या सज्जनता अभिशापी है। 
क्या मिथ्या है पुण्य का बिंदु, क्या पूजन हेतु पापी है।
खंडित किया जा रहे सपने, ताकत का प्रभाव बनाकर,
जाति, हिंसा, लूट मार की, चंहुओर आपाधापी है। 

गंगा सा पावन होकर भी, रेखांकन संदिग्ध कर दिया। 
विस्फोटक की संज्ञा देकर, मुझको घातक सिद्ध कर दिया।

अब अपनायत किससे रखें, किससे मन की पीर बताएं। 
लोग यहाँ पर अम्ल छिड़ककर, हँसते चेहरों को झुलसाएं। 
" देव " तपस्या कितनी कर लो, कितना कर लो करुण निवेदन,
हत्यारे हैं, कमजोरों के जीवित तन में आग लगाएं। 

अब चुप हूँ पर शत्रु मर्दन, करूँगा जिस दिन युद्ध कर दिया।   
विस्फोटक की संज्ञा देकर, मुझको घातक सिद्ध कर दिया। "

......चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक- 22 09 2017
(मेरी यह रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित, सर्वाधिकार सुरक्षित )

Monday, 18 September 2017

♥♥जड़वत...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥जड़वत...♥♥♥♥♥♥♥♥
सजल नयन हैं, तुम बिन पीड़ा, जड़वत मेरी गति हो गई। 
हृदय टूटकर बिखरा पथ पर, तुम बिन गहरी क्षति हो गई। 
तन, मस्तक सब केश, कंठ भी विरह भाव से प्रभावित हैं,
तुम बिन मन को कुछ न भाये, तुमको अर्पित मति हो गई। 

खाई थी सौगंध जन्म की, किन्तु नाता तोड़ रहे हैं। 
अपने स्वजन बुरे समय में, मुझसे मुख को मोड़ रहे हैं,
मैं एकाकी शिशु की भांति, बोध नहीं है युद्ध कला का,
निर्मोही होकर के मुझको, अग्निपथ में छोड़ रहे हैं। 

मुझको एकदम किया बहिष्कृत, तृप्त जो उनकी रति हो गई। 
सजल नयन हैं, तुम बिन पीड़ा, जड़वत मेरी गति हो गई ...

होकर के निर्दोष भी मुझको, क्यों कर कारावास दिया है। 
न ही सौंपी हर्ष की धरती, न सुख का आकाश दिया है। 
तुमने अपने महल दुमहले चमकाए हैं उजले पन में,
किन्तु सक्षम होकर तुमने, न मुझको प्रकाश दिया है। 

 देखो मेरी अनुभूति की, न चाहकर भी यति हो गई।  
सजल नयन हैं, तुम बिन पीड़ा, जड़वत मेरी गति हो गई.... 

लगता है बारूद भरा है, मेरे मन की दीवारों में। 
स्याह हो गया जीवन पूरा, भय लगता है उजियारों में। 
" देव " ये कैसी परिपाटी है, कैसा मन का उत्पीड़न है,
अब सावन में पतझड़ लगता, नहीं लगन अब श्रंगारों में।  

मेरी आत्मा प्रतीक्षा के अंगारों में सती हो गई। 
सजल नयन हैं, तुम बिन पीड़ा, जड़वत मेरी गति हो गई। "


......चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक- १८.०९.२०१७ 


Wednesday, 9 August 2017

♥♥♥♥वार...♥♥♥♥♥♥

♥♥♥♥वार...♥♥♥♥♥♥
तबाह हो न सके हम, तो हमें मार दिया। 
मोहब्बत ईश्क़ का रिश्ता भी दरकिनार किया। 

जंग होती जो सामने से, हम भी लड़ लेते,
मगर उस शख़्स ने, पीछे से हमपे वार किया। 

सुनो अब टूट गयी, हर कड़ी वफाओं की,
जुर्म उसका था मगर, मुझको गुनहगार किया। 

उदास रात है, रिसते हुए खूं की टपकन, 
तीर कसकर के मेरे दिल के आरपार किया। 

' देव' उम्मीद है, शायद सुकून मिल जाए,
आग का दरिया तो हंसकर के हमने पार किया। "


.....चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक- ०९.०८.२०१७ 





Saturday, 29 July 2017

♥अश्रु जल...♥

♥♥♥♥अश्रु जल...♥♥♥♥♥♥
ह्रदयाघात, प्रताड़ित मन है ,
अब तो शूलों पे जीवन है,
कष्ट आत्मा तक आ पहुंचा,
अश्रु जल का बहिर्गमन है। 

मुख झुलसा है, पांव में छाले, धूप जलाती है भादों की। 
मौन हैं मेरी आह को सुनकर, घनी रिक्तता संवादों की,
परिलक्षित हो ही जाता है, जब मन के मंतव्य बदलते,
सच के सम्मुख चमक बढ़ रही, मिथ्या के कुछ उत्पादों की। 

आरोपित करके खुश होना,
अधिकांशत यही चलन है। 
कष्ट आत्मा तक आ पहुंचा,
अश्रु जल का बहिर्गमन है ...

बिखर रहे सब स्वप्न नयन के, जटिल अवस्था है जीवन की। 
शब्द रो रहे दशा देखकर, व्याकुलता इतनी लेखन की। 
हर्षित हैं वो मुझे रुलाकर, विस्मृत करके संबंधों को,
नहीं टीस सुनता है कोई, मन के व्याकुल उद्बोधन की। 

उमड़ रहा पीड़ा का सागर,
मानवता का बड़ा दमन है। 
कष्ट आत्मा तक आ पहुंचा,
अश्रु जल का बहिर्गमन है। "


......चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक- २९.०७.२०१७ 

Thursday, 15 June 2017

♥♥♥♥सियासी...♥♥♥♥♥♥

♥♥♥♥सियासी...♥♥♥♥♥♥
झूठे सब्जबाग दिखलाकर। 
जात धर्म का पाठ पढ़ाकर। 
आज सियासी खुश होते हैं,
औरों के घर आग लगाकर। 

मुफ़लिस की एक ईंट ईंट तक,
झोपड़ पट्टी बिक जाती है। 
बची खुची बस जान जिस्म की,
मरकर पथ में फिंक जाती है। 

घर, बस्ती और गलियारों में,
नफरत की दिवार उठाकर।
आज सियासी खुश होते हैं,
औरों के घर आग लगाकर। 

व्याकुल बेरोजगार सिसकते,
कहीं पे चूल्हे नहीं दहकते,
कहीं नहीं है छत की छाँव,
भूख से बच्चे नहीं चहकते। 

सेंक रहे मतलब की रोटी,
मज़लूमों की लाश तपाकर।
आज सियासी खुश होते हैं,
औरों के घर आग लगाकर। "


......चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक- १६-०६-२०१७   


Sunday, 7 May 2017

♥♥♥♥धुआं धुआं सा...♥♥♥♥♥♥

♥♥♥♥धुआं धुआं सा...♥♥♥♥♥♥
धुआं धुआं सा छाया क्यों है। 
हर एक शख़्श पराया क्यों है। 

भीतर से तो काला है दिल,
बाहर मगर छुपाया क्यों है। 

जिसकी एक दिन मांग भरी थी,
जिंदा उसे जलाया क्यों है। 

सात जन्म तक की कसमें थीं,
एकदम उन्हें भुलाया क्यों है। 

जो मुफ़लिस, कमजोर, बेगुनाह,
कहर उसी पे ढ़ाया क्यों है। 

रोटी का हक़ है, उसको भी,
उसका हिस्सा खाया क्यों है। 

"देव " ज़ख्म जब भर नहीं सकते,
आखिर नमक लगाया क्यों है। "


......चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक- ०८.०५.२०१७  
(मेरी यह रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित, सर्वाधिकार सुरक्षित ) 


Monday, 1 May 2017

♥क्यूंकि तुमसे प्यार किया है...♥♥

♥♥♥♥♥♥क्यूंकि तुमसे प्यार किया है...♥♥♥♥♥♥♥♥♥
चाहो तो तुम मुझे भुला दो ,
मेरे सब सन्देश जला दो। 
कर दो मेरा शीश अलग तुम,
या फिर मुझको जहर खिला दो। 

जो भी तेरा मन करता हो, सभी जतन तुम बस कर लेना। 
चाहें मुझको ग़म देकर के, खुशियों से झोली भर लेना। 

तेरी जिद, तेरे गुस्से को, हंसकर के स्वीकार किया है। 
तुमसे कोई नहीं शिकायत, क्यूंकि तुमसे प्यार किया है ...


मैंने अपने प्रेम भाव का,
बस तुमसे अनुरोध किया है। 
न ही तुम पर जोर जुल्म और,
न कोई अवरोध किया है। 
हाँ तू अच्छी लगती है तो,
तुझसे गठबंधन का मन है,
इसीलिए इस रुंधे कंठ से,
नाम तेरा उद्बोध किया है। 

तू स्वामी है, अपने मन की, जो भी हो निर्णय कर लेना। 
मन बोले तो अपना लेना, या फिर दूरी तय कर लेना।  

मैंने तो बस नाम तुम्हारे, अपना ये संसार किया है। 
तुमसे कोई नहीं शिकायत, क्यूंकि तुमसे प्यार किया है...

तुमसे सब कुछ सत्य कहा है, 
झूठ बोलना मुझे न आता। 
हाँ ये सच है बिना तुम्हारे,
मेरे दिल को कुछ न भाता। 
"देव " तुम्हारे अपनेपन की,
लगती मुझको बहुत जरुरत,
तेरे बिन ये रात हैं सूनी,
धवल चाँद भी नहीं लुभाता। 

यदि प्रेम के योग्य लगूं तो, तुम मेरी दुनिया बन जाओ। 
सुबह, शाम, दिन, रात, हमेशा, मेरे जीवन को महकाओ। 

बस तेरी उम्मीद में मैंने, सात समुन्दर पार किया है। 
तुमसे कोई नहीं शिकायत, क्यूंकि तुमसे प्यार किया है। " 


......चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक- ०१.०५ .२०१७  
(मेरी यह रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित, सर्वाधिकार सुरक्षित ) 

Sunday, 30 April 2017

♥दर्द और तकलीफ...♥

♥♥♥♥♥♥दर्द और तकलीफ...♥♥♥♥♥♥♥♥♥
दर्द और तकलीफ से दो चार होना पड़ रहा है।  
वो गुनाह करके भी खुश हैं, मुझको रोना पड़ रहा है। 

है बुरा जो वक़्त मेरा, सब सहारा खींच बैठे,
आज खुद बैसाखियों पर, खुद को ढ़ोना पड़ रहा है। 

इस क़दर तकदीर भी, मुझसे निभाए दुश्मनी,
दर्द के काँटों पे मुझको, दोस्त सोना पड़ रहा है। 

दूर तक ग़म का मरुस्थल, कौन है जो बूंद देगा,
अपना चेहरा, अपने ही अश्क़ों से धोना पड़ रहा है। 

आज छोटी पड़ रही, शर्मो हया की चादरें,
खुद-ब-खुद इंसानियत का, कद भी बौना पड़ रहा है। 

फेर लीं उसने निगाहें, रौंदकर तस्वीर मेरी,
देखकर उसको किनारे खुद ही होना पड़ रहा है। 

" देव " मुमकिन है जमाना, नाम अपना याद रखे,
बस तभी तो बाजुओं में, जोर बोना पड़ रहा है। " 


......चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक- ३०.०४.२०१७  
(मेरी यह रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित, सर्वाधिकार सुरक्षित ) 


Saturday, 7 January 2017

♥तुम्हारी सूरत...♥

♥♥♥♥♥♥तुम्हारी सूरत...♥♥♥♥♥♥♥♥♥
शायरी करने लगा दिल तुम्हारी सूरत पर,
खुदा ने बख़्शा है, जो हुस्न बेहिसाब तुम्हे। 

सोचता हूँ तुम्हे कह दूँ कोई परी हमदम,
ये भी हसरत है के, लिखूं मैं माहताब तुम्हे। 

जिंदगी जब भी तेरी दर्द में, ख़लिश में हो,
सोंप दूँ आके सनम, अपने सभी ख़्वाब तुम्हे। 

क्या है ज़ुर्रत जो अँधेरे की चाल कोई चले,
कुदरती नूर कहूँ और मैं आफ़ताब तुम्हे। 

चाहता हूँ तुम्हे मिलना, के न जुदाई हो,  
इसी उम्मीद में भेजूं, खिला गुलाब तुम्हे। 

ख्वाहिशें हैं तेरे होठों की दुआ बन जाऊं,
ऐसा कुछ भी न करूँ, जो लगे ख़राब तुम्हे। 

मेरे लफ़्ज़ों के तस्सुवर में "देव" तू ही तू,
देखना चाहूं सनम खुश, मैं कामयाब तुम्हें। "

दिनांक- ०७.०१.२०१७  

(मेरी यह रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित, सर्वाधिकार सुरक्षित ) 






Tuesday, 27 December 2016

♥शोर, शराबा....♥

♥♥♥♥शोर, शराबा....♥♥♥♥
ग़म की आग, जला ये दिल है। 
जीने में तो कुछ तो मुश्किल है। 

चीख निकलकर भी दब जाये,
शोर, शराबा और कातिल है। 

खून चूसकर भी खुशहाली,
नहीं पता कैसे हासिल है। 

झूठ यहाँ सर चढ़कर बोले,
सच देखो कितना बोझिल है। 

मुझको ऊँचा देख गिराया,
यार नहीं है, वो संगदिल है।  

अनपढ़ होकर भी अपनापन,
पढ़ा लिखा है, पर जाहिल है। 

"देव " ईमां जिसने बेचा हो,
ख़ाक भला वो जिंदादिल है। "

दिनांक- २७.१२.२०१६  
(मेरी यह रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित, सर्वाधिकार सुरक्षित ) 





Thursday, 22 December 2016

♥एक तूफ़ान....♥

♥♥♥♥एक तूफ़ान....♥♥♥♥
एक तूफ़ान नज़र आया है। 
घर मिटटी का घबराया है। 

अपनों ने भी नज़रें फेरीं,
गैरों ने भी ठुकराया है। 

सफर आखिरी जोड़ घटा लूँ,
कितना खोया, क्या पाया है। 

उसी फूल को रौंदा जाता,
जिसने आंगन महकाया है। 

हमको पाला छांव में जिसने,
उसी पेड़ को कटवाया है। 

जो झूठा था उसे अशरफी,
आखिर सच को झुठलाया है। 

''देव'' ये दुनिया बड़ी बेरहम,
कब्र में जिन्दा दफ़नाया है। "


(चेतन रामकिशन "देव")

दिनांक- २२.१२.२०१६ 
(मेरी यह रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित, सर्वाधिकार सुरक्षित ) 








Tuesday, 22 November 2016

♥♥♥♥तुम नदी हो....♥♥♥♥




♥♥♥♥तुम नदी हो....♥♥♥♥
तुम नदी हो कोई मधुर जल की। 
तुम हो श्रृंगारिका सुनो थल की। 
मेरे जीवन का वर्तमान हो तुम,
तुम ही आधार हो मेरे कल की। 

मेरे जीवन का हर्ष तुमसे है। 
ये दिवस, माह, वर्ष तुमसे है। 
तुम नहीं हो तो मैं भी शेष नहीं,
मेरे नयनों का कर्ष* तुमसे है। 

तुमसे पुलकित हुआ मन मेरा,
तुम ही प्रतीक हो मेरे बल की।   

तुम नदी हो कोई मधुर जल की....

तुम से संयुक्त होके रह जाऊं। 
तेरी पीड़ा को स्वयं ही सह जाऊं। 
तेरी वाणी का शब्द बनकर के,
प्रेम के काव्य, छंद कह जाऊं। 

सर्वहित का विचार रखती हो,
तुम न दुर्भावना किसी छल की। 

तुम नदी हो कोई मधुर जल की....

मेरे साकार स्वप्न का दर्शन । 
तुम पे ये प्राण भी करूँ अर्पण।
"देव " तुम अर्थ हो समर्पण का,
तुम बिना रिक्त है मेरा जीवन। 

मेरे उल्लास का शिखर तुमसे,
और दृढ़ता हो तुम मेरे तल की। 

तुम नदी हो कोई मधुर जल की...."


(कर्ष*-आकर्षण )

"
प्रेम, एक ऐसा शब्द जिसमें समूची शान्ति, अपनत्व और कल्याण छिपा है,
प्रेम केवल युगलों का ही सूचक नहीं, अपितु समूचे जनमानस की कोमल भावना का सूचक है, तो आइये प्रेम को अपनत्व के प्रत्येक संदर्भ में स्वीकार करें........ चेतन रामकिशन "देव"

दिनांक- २३.११.२०१६
(मेरी यह रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित, सर्वाधिकार सुरक्षित ) 

Monday, 12 September 2016

♥♥♥♥प्रेम का पक्ष....♥♥♥♥

♥♥♥♥प्रेम का पक्ष....♥♥♥♥
प्रेम का पक्ष है,
मेरे समकक्ष है,
साथ तेरे रहूँ,
बस यही लक्ष है।
देखो आकाश में,
खिल गया चंद्रमा,
तेरे मेरे मिलन का,
जो उपलक्ष है।

मेरे अपनत्व में, तुम मेरे नेह में।
तुम मेरी आत्मा, तुम मेरी देह में।
तुमको देखा तो देखो खिले फूल भी,
हर्ष की पत्तियां, तुम तना, मूल भी।

तू मेरा केंद्र बिंदु,
तू ही अक्ष है।
तेरे मेरे मिलन का,
जो उपलक्ष है।

प्रेम का संचलन, आंकलन और मनन।
है यही प्रार्थना, तेरा हो आगमन।
"देव " तुमसे कभी भी विरक्ति न हो।
भूलकर भी विरह की विपत्ति न हो।

मेरे मन को पढ़े,
तू सबल, दक्ष है।
तेरे मेरे मिलन का,
जो उपलक्ष है।

......चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक-१२.०९ .२०१६
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। "



Thursday, 14 July 2016

♥♥तुम.....♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥तुम.....♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
धवल छवि, सौंदर्य अनुपम, केश मुग्ध करते हैं मन को। 
तुम बिन मेरे साथ तिमिर था, तुमने श्वेत किया जीवन को। 
मेरे भावों की सरिता तुम,  मेरी कविता की परिचायक,
तुम पावन हो गंगाजल सी, तुमने सिद्ध किया चन्दन को। 

प्रेम ग्रन्थ के प्रसंगों को, अभिव्यक्ति का सार दिया है। 
सखी मेरे जीवन को तुमने, मनचाहा उपहार दिया है। 

मधुर सुरीला स्वर तुमने ही, दिया है पायल की छन छन को। 
तुम पावन हो गंगाजल सी, तुमने सिद्ध किया चन्दन को....

दीप प्रेम के हुये हैं पुलकित, उत्सव का अवसर लगता है। 
तुम से ही पथ सरल हमारा, स्वर्ग सा तुमसे घर लगता है। 
तुम पर्याय सुमन, फूलों की, उपवन का उल्लास है तुमसे,
बिन तेरे जीवन का एक क्षण, सोचने से भी डर लगता है। 

तुमने ही सूनी डाली पर, हरा भरा श्रृंगार किया है। 
तुमने शब्दों की ऊर्जा बन, भावों का विस्तार किया है। 

तुम संग मन का क्रोध है कमतर, भूल रहा हूँ मैं अनबन को। 
तुम पावन हो गंगाजल सी, तुमने सिद्ध किया चन्दन को....

तुम अपने दर्शन देकर के, मेरा मन हर्षित करती हो। 
बहुत बड़ा ह्रदय तुम्हारा, प्राण तलाक अर्पित करती हो। 
"देव" तुम्हारी मृदुभषिता सुनकर, मन को अच्छा लगता,
नहीं किसी का बुरा सोचतीं, तुम दुनिया का हित करती हो। 

तुमने मेरी अनुभूति का, हर क्षण ही सत्कार किया है। 
बड़ा भाग्य है सखी हमारा, मुझको तुमने प्यार दिया है। 

मिटा अँधेरा जो तुम आईं, तारे चमके अभिनन्दन को। 
तुम पावन हो गंगाजल सी, तुमने सिद्ध किया चन्दन को। "

........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-१५.०७.२०१६ 
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। "



Friday, 8 July 2016

♥♥माँ......♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥माँ......♥♥♥♥♥♥♥♥
माँ की आँखों का प्यार प्यारा है। 
मैं हूँ साहिल तो माँ किनारा है। 
मेरे कानों में तब शहद सा घुले,
जब भी माँ ने मुझे पुकारा है। 

देखकर माँ को चैन मिलता है। 
घर में ममता का फूल खिलता है। 

माँ से रौशन ये घर हमारा है। 
माँ की आँखों का प्यार प्यारा है....

माँ सुगन्धित बहार जैसी है। 
माँ की बोली सितार जैसी है। 
माँ के स्पर्श से मिटा पीड़ा,
माँ तो शीतल फुहार जैसी है। 

माँ से ऊँचा न कोई रिश्ता है। 
माँ तो धरती पे एक फरिश्ता है। 

माँ ने ही आज कल संवारा है। 
माँ की आँखों का प्यार प्यारा है। 

माँ सुखद लोरियों की गायक है। 
माँ सुखद भावना की वाहक है। 
"देव" माँ का ये कद धरा जैसा,
माँ तपस्वी है और साधक है। 

माँ उमंगों में, माँ तरंगों में। 
माँ ही शामिल है, सात रंगों में। 

माँ तो ममता की दिव्य धारा है। 
माँ की आँखों का प्यार प्यारा है। "


अपनी दोनों माताओं को सादर समर्पित। 


........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-०८.०७.२०१६  
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। "
मेरी ये कविता मेरी वेबसाइट http://www.kavicrkdev.com/ एवं ब्लॉग https://chetankavi.blogspot.in/ पर पूर्व प्रकाशित।

Tuesday, 5 July 2016

♥बूँद बूँद आंसू......♥

♥♥♥♥♥♥बूँद बूँद आंसू......♥♥♥♥♥♥♥♥♥
बूँद बूँद आंसू फूटे हैं, और हमारे दिल टूटे हैं। 
जो कहते थे हमको अपना, आज उन्होंने घर लूटे हैं। 
मानवता को तार तार कर, भरा खून से मेरा दामन,
अपना दर्द बताया हमने, तो कहते हैं हम झूठे हैं। 

ये कैसी दुनिया है जिसमें, नहीं दर्द की सुनवाई है। 
दिल रोता है बिलख बिलख कर, आँख हमारी भर आई है। 

पतझड़ है खुशियों पर फिर से, पीड़ा के अंकुर फूटे हैं। 
अपना दर्द बताया हमने, तो कहते हैं हम झूठे हैं....

वो सिक्कों के सौदागर, वो अपनायत क्या जानेंगे। 
जब मन होगा ठुकरा देंगे, जब मन होगा पहचानेंगे। 
हत्यारे हैं मेरे दिल के, रौंद दिया है अरमानों को,
कातिल हैं वो उन्हें पता है, लेकिन फिर भी न मानेंगे। 

दिल में कितना ज़हर भरा है, आज झलक ये दिखलाई है। 
फूल सूख कर बिखरे बिखरे, और कली भी मुरझाई है। 

लोग गिराकर आगे बढ़ते, लेकिन हम पीछे छूटे हैं। 
अपना दर्द बताया हमने, तो कहते हैं हम झूठे हैं....

नफ़रत का बारूद भरा है, पर नफरत से क्या मिलता है। 
फूल भी देखो सौंधी सौंधी सी, मिटटी में ही खिलता है। 
"देव " जहर नफरत का भरके, चैन रूह को मिल नहीं सकता,
चैन, सुकून तो इस दुनिया में, प्यार की बातों से मिलता है। 

केवल हाथ मिलाना छोड़ो, दिल में जो गहरी खाई है। 
मुझसे पूछो, मेरे लफ्ज़ से, ऐसा मंजर दुखदाई है। 

ख्वाब उसी की आँख से देखे, बदल गया, वो सब टूटे हैं। 
अपना दर्द बताया हमने, तो कहते हैं हम झूठे हैं। "

बदलाव और अभिमान का चश्मा लगाकर लोग, किसी की अन्तर्निहित भावना को, उसकी पीड़ा को, उसकी अनुभूति को ऐसे अनदेखा कर देते हैं, जैसे उनके अतिरिक्त इस संसार में किसी की भावना का कोई मूल्य न हो, पर किसी की पीड़ा, किसी की भावना को जान बूझकर हतोउत्साहित करना, सही तो नहीं ..............

........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-०६.०७.२०१६ 
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। " 

मेरी ये कविता मेरी वेबसाइट एवं ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित।