Friday, 8 March 2013

♥दर्द का शोर..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥दर्द का शोर..♥♥♥♥♥♥♥♥♥
शोर है दर्द का, ख़ामोशी अख्तियार करें!
आओ कुछ देर के, तन्हाई से अब प्यार करें!

वो नहीं आए तो, दिल अपना क्यूँ छोटा करना,
आओ आकाश में अब चाँद का, दीदार करें!

जिंदगी का तो नहीं होता, भरोसा कोई,
कैसे फिर बैठ के हम, कल का इंतजार करें!

खून का प्यासा यहाँ आदमी, अब होने लगा,
ऐसे हालात में अब किस पे, ऐतबार करें!

जिसके चेहरे से मुझे "देव", खुशी मिलती हो,
कैसे हम उसके बिना, गम का सफर पार करें!"

............चेतन रामकिशन "देव"................
दिनांक-०८.०३.२०१३ 

Thursday, 7 March 2013

♥नारी का अलंकरण..♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥नारी का अलंकरण..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
नारी के सम्मान का चिंतन, अपने मन में भरना होगा!
भ्रूण में पुत्री का स्वागत कर, उसका संकट हरना होगा!
केवल बातें करने भर से, नारी सम्मानित नहीं होती,
हमको नारी के जीवन का, सदा अलंकरण करना होगा!

नारी भी है पुरुषों जैसी, उसका जीवन व्यर्थ नहीं है!
हम पुरुषों के इस जीवन का, बिन नारी के अर्थ नही है!

नारी को पीड़ित करने की, सोच से हमको डरना होगा!
नारी के सम्मान का चिंतन, अपने मन में भरना होगा...

नारी मन की अभिलाषा का, दमन नहीं करना है हमको!
लोभ स्वार्थ में पड़ नारी का, दहन नहीं करना है हमको!
हमको नारी की पीड़ा की, अनुभूति करनी ही होगी,
नारी मन की पीड़ाओं को, गहन नहीं करना है हमको!

नारी प्रेम की संवाहक है, नारी का मन बड़ा दयालु!
उसका ह्रदय बहुत बड़ा है, नारी होती है कृपालु! 

हमको नारी के अश्रु के, संग संग देखो झरना होगा!
नारी के सम्मान का चिंतन, अपने मन में भरना होगा...

एक दिन की अपनायत देकर, नहीं वर्ष भर उसे रुलाना!
न उसको आरोपित करना, न ही उसका ह्रदय दुखाना!
बिन नारी के इस दुनिया में, जनम पुरुष को मिल न पाए,
इसीलिए तुम भूले से भी, नारी का मन नहीं सताना!

बिना नारी के प्रकृति भी, नहीं संतुलित हो सकती है!
बिन नारी के मनुज श्रंखला, नहीं अंकुरित हो सकती है!

"देव" हमे नारी जीवन को, सदा सुसज्जित करना होगा!
नारी के सम्मान का चिंतन, अपने मन में भरना होगा!"

"
नारी-प्रकृति की ऐसी कृति, जिसके बिन ये जग सम्पूर्ण नहीं, जो अनेकों दायित्वों का निर्वहन, पुरुष समाज के लिए, बड़े ही अपनत्व के साथ करती है, किन्तु इसके पश्चात भी, इस कोमल ह्रदयी नारी को, इसी पुरुष वर्ग के हाथों दंड मिलता है, आरोप मिलते हैं, तो आइये चिंतन करें और नारी के जीवन को, सम्मान से अलंकृत करें..."

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-०८.०३.२०१३ 

"सर्वाधिकार सुरक्षित"
"मेरी ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित."

Monday, 4 March 2013

♥परिस्थति..♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥परिस्थति..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तुम विपरीत परिस्थतियों में, अपना साहस सुप्त न करना!
बस प्रभाव जमाने भर को, मिथ्या को प्रयुक्त न करना!
इस दुनिया में हर व्यक्ति ही, मार्ग सफलता का चाहता है,
किन्तु अपनी तृष्णा में तुम, नैतिकता को लुप्त न करना! 

समरसता से रहना सीखो, मधुर सुरीला गान बनो तुम!
जिसे देखकर मन पुलकित हो, इक ऐसे इंसान बनो तुम!

कभी सफलता की इच्छा में, अपना मन अभियुक्त न करना!
तुम विपरीत परिस्थतियों में, अपना साहस सुप्त न करना...

न तन से सम्बन्ध रखो तुम, मन से मन का नाता जोड़ो!
नहीं समझता जो मानवता, उस व्यक्ति से मिलना छोड़ो!
इस जीवन का अर्थ सार्थक, उसी दशा में संभव होगा,
तुम औरों को सीख से पहले, अपने जीवन का रुख मोड़ो!

कभी किसी को पीड़ा देकर, तुम सुख के अवसर न पाना!
बड़ी खुशी पायेगा मनवा, किसी के दुख में साथ निभाना!

इस आधुनिक परिवेश में, मर्यादा उन्मुक्त न करना!
तुम विपरीत परिस्थतियों में, अपना साहस सुप्त न करना...

अपने पढ़े-लिखे मन से तुम, काम कोई छोटा न मानो!
बिन मेहनत के कुछ नहीं मिलता, इस युक्ति की कीमत जानो!
"देव" निराशा में रहने से, बस जीवन कुंठित होता है,
तुम मन में आशायें भर कर, अपनी मंजिल को पहचानो!

एक दिन में ही कुछ नहीं मिलता, इसीलिए संतोष करो तुम!
नहीं डिगो तुम लक्ष्य से अपने, न ही मन में रोष करो तुम!

भूले से भी इस युक्ति को, तुम मन से आमुक्त न करना!
तुम विपरीत परिस्थतियों में, अपना साहस सुप्त न करना!"

"
जीवन-कभी दुख, कभी पीड़ा, कभी विरह तो कभी दंड, किन्तु जीवन की इन दशाओं में, साहस, मेहनत और आत्मविश्वास की युक्ति से जीवन को गतिशीलता मिलती है, तो आइये जीवन को गतिशील बनायें.."

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-०५.०३.२०१३

"सर्वाधिकार सुरक्षित"
मेरी ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित"

Sunday, 3 March 2013

♥♥मेरी तस्वीर.♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥मेरी तस्वीर.♥♥♥♥♥♥♥♥
तस्वीर मेरी दिल में, वसाकर तो देखिये!
तुम प्यार का एक दीप, जलाकर तो देखिये!

जलती हुए आँखों को भी, मिल जाएगी ठंडक,
तुम गीत के यहाँ, प्यार के गाकर तो देखिये!

हिन्दू नहीं, मुस्लिम, तुम्हें इन्सान मिलेगा,
नफरत की ये दीवार, गिराकर तो देखिये!

दिल भी करार पायेगा और रूह भी सुकूं,
रोटी किसी भूखे को, खिलाकर तो देखिये!

न "देव" घुटन दिल में, कोई अपने रहेगी,
तुम सच को यहाँ, सच ही बताकर तो देखिये!"
...........चेतन रामकिशन "देव"............
दिनांक-०३.०३.२०१३

Friday, 1 March 2013

♥रूह के आंसू..♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥रूह के आंसू..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
आँखों में नमी, दिल में दुखन होने लगी है!
गम इतना है के, रूह मेरी रोने लगी है!

मरते हुए इन्सां को, बचाता नहीं कोई, 
इंसानियत भी लगता है, के सोने लगी है!

बारूद से धरती की कोख, भरने लगे सब,
मिट्टी भी अपनी गंध को, अब खोने लगी है!

आँखों में अँधेरा है, हाथ कांपने लगे,
लगता है उम्र मेरी, खत्म होने लगी है!

एक कौम को गद्दार यहाँ, "देव" क्यूँ कहो,
हर कौम ही अब खून से, मुंह धोने लगी है!"

............चेतन रामकिशन "देव".............
दिनांक-०१.०३.२०१३



Thursday, 28 February 2013

♥♥तौर-तरीका.♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥तौर-तरीका.♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मैं अपने हाथों से अपने, ख्वाब नहीं तोड़ा करता हूँ!
भले दर्द है पर खुशियों की, आस नहीं छोड़ा करता हूँ!
इस दुनिया में तनहा रहना, बेहतर है झूठी चाहत से,
इसीलिए झूठे लोगों से, साथ नहीं जोड़ा करता हूँ!

यही हमारा तौर-तरीका, इसी तरह मैं जी पाता हूँ!
सीने में गम रखकर भी मैं, साँझ सवेरे मुस्काता हूँ!

जो न समझे मानवता को, उससे मुंह मोड़ा करता हूँ!
मैं अपने हाथों से अपने, ख्वाब नहीं तोड़ा करता हूँ....

जिनको अपने सुख की इच्छा, जिनको अपनी खुशियाँ प्यारी!
उनसे तो दूरी अच्छी है, नहीं चाहिए उनकी यारी!
इस दुनिया की भीड़ में देखो, "देव" उसी का नाम हुआ है,
जिसने अपने लक्ष्य की खातिर, गलत काम की इच्छा मारी!

मैं विरह में रहता हूँ पर, मिलन की आशा नहीं त्यागता!
साथ हमेशा चलूँ वक्त के, आगे-पीछे नहीं भागता!

कभी किसी प्यासे के घर का, घड़ा नहीं फोड़ा करता हूँ!
मैं अपने हाथों से अपने, ख्वाब नहीं तोड़ा करता हूँ!"

.................चेतन रामकिशन "देव"...................
दिनांक-२८.०२.२०१३


Wednesday, 27 February 2013

♥ए प्यारे आजाद..♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥ए प्यारे आजाद..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
आँखों में फिर आंसू आए, पढ़ कर तेरी को कुर्बानी को!
ए प्यारे आजाद है तुम पे, नाज हर एक हिंदुस्तानी को!

आजादी की खातिर तुमने, अंग्रेजों को सबक सिखाया!
दमन हजारों भी सहकर के, अपना मस्तक नहीं झुकाया!
"देव" नहीं जन्मा है कोई, फिर आजाद के जैसा इन्सां,
जिसने अपनी मौत को चुनकर, भारत माँ का मान बढाया!

एक पल को भी सहा न तुमने, अंग्रेजों की बेमानी को!
आँखों में फिर आंसू आए, पढ़ कर तेरी को कुर्बानी को!"

.................चेतन रामकिशन "देव"...................
दिनांक-२७.०२.२०१३

(सजल नयनों के साथ, चंद्रशेखर आजाद को नमन, अनवरत...)

Tuesday, 26 February 2013

♥♥माँ(प्यार का सागर)♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥माँ(प्यार का सागर)♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
इस दुनिया के संबंधो में, माँ से बढ़कर कोई नहीं है!
माँ अपने बच्चों से पहले, एक पल को भी सोई नहीं है!
माँ के दिल जैसा दुनिया में, नहीं दयालु है कोई दिल,
माँ बच्चों का दर्द देखकर, अपनी धुन में खोई नहीं है!

बिन माँ के बच्चों से पूछो, माँ की कीमत क्या होती है!
इस धरती पर, इस दुनिया में, ईश्वर जैसी माँ होती है!

वो बच्चों के दुख को समझे, अपने दुख में रोई नहीं है!
इस दुनिया के संबंधो में, माँ से बढ़कर कोई नहीं है...

माँ की लोरी सा दुनिया में, कोई मीठा गान नहीं है!
बड़ी सरल है माँ की ममता, बिंदु भर अभिमान नहीं है!
"देव" कभी तुम भूले से भी, माँ के आंसू नहीं बहाना,
जिसको माँ का अदब नहीं हो, वो कोई इन्सान नहीं है!

माँ बच्चों की खातिर जलती, जैसे अंधियारे में ज्योति!
माँ की ममता उपवन जैसी, माँ की ममता सच्चा मोती!

माँ ने देखो अपने मन में, फसल लोभ की बोई नहीं है!
इस दुनिया के संबंधो में, माँ से बढ़कर कोई नहीं है...

माँ को सब बच्चे प्यारे हैं, माँ के मन में द्वेष नहीं है!
माँ के मन न भेद-भाव हैं, उसके मन आवेश नहीं है!
माँ शक्ति है, माँ भक्ति है, माँ पूजा के फूलों जैसी,
मेरे मन में माँ से बढ़कर, कोई इच्छा शेष नहीं है!

माँ के बिन है दुनिया सूनी, माँ जीवन की संवाहक है!
माँ बच्चों की सहयोगी है, माँ बच्चों की निर्वाहक है!

माँ ने बच्चों के आंसू से, अपनी सूरत धोई नहीं है!
इस दुनिया के संबंधो में, माँ से बढ़कर कोई नहीं है!"

"
माँ-एक ऐसा शब्द जो मात्र दो अक्षरों का युग्म है, किन्तु उसका अर्थ महाकाव्यों में भी समाहित नहीं हो सकता! इतना प्रेम, की वो सागर की तरह अमापनीय हो! जगत के संबंधों में, सर्वोत्तम माँ, तो आइये माँ को नमन करें..!"

................चेतन रामकिशन "देव"...................
दिनांक-२७.०२.२०१३

(ये रचना मेरी माँ कमला देवी एवं माँ प्रेमलता जी को समर्पित)


Sunday, 24 February 2013

♥शब्द(मेरी आवाज)♥


♥♥♥♥♥शब्द(मेरी आवाज)♥♥♥♥♥♥♥
ये शब्द मेरे दर्द की, आवाज बन गए!
ये शब्द मोहब्बत का, नया साज बन गए!
इन शब्दों की दौलत से, मुझे प्यार बहुत है,
ये शब्द ही कल में थी, यही आज बन गए!

देते हैं खुशी तो ये, कभी आंख को पानी!
बिन इनके अधूरी है ये, जीवन की कहानी!

ये शब्द मेरी जिंदगी का, नाज़ का बन गए!
ये शब्द मेरे दर्द की, आवाज बन गए...

ये शब्द हैं गीतों में, सजे हैं ये गज़ल में!
ये शब्द निराशा में, कभी होते हैं बल में!
इन शब्दों से वाचन है "देव", इनसे ही लेखन,
ये शब्द ही सच में तो, यही होते हैं छल में!

शब्दों ने यहाँ प्यार का, एहसास लिखा है!
शब्दों ने ही देखो यहाँ, इतिहास लिखा है!

ये शब्द चांदनी का, नया ताज बन गए!
ये शब्द मेरे दर्द की, आवाज बन गए!"

........चेतन रामकिशन "देव".........
दिनांक-२४.०२.२०१३

Friday, 22 February 2013

♥लफ्जों का बदन..♥


♥♥♥♥♥♥♥लफ्जों का बदन..♥♥♥♥♥♥♥♥
बारूद से लफ्जों का बदन, जलने लगा है!
लगता है रवि प्रेम का, अब ढ़लने लगा है!
एक पल में ही लग जाती हैं, लाशों की कतारें,
फिर रंज का एहसास यहाँ, पलने लगा है!

लगता है बड़ा गहरा है, ये दहशत का दौर है!
जिस ओर भी देखो वहीँ, नफरत का शोर है!

इन्सान ही इन्सान को अब, छलने लगा है!
बारूद से लफ्जों का बदन, जलने लगा है!"

खूंखार जानवर है वो, इन्सान नहीं है!
इंसानियत का जिसको, कोई धयान नहीं है!
दहशत के दीवानों, जरा एक बात तो सुनो,
तुम जिसको मारते हो वो, बेजान नहीं है!

ए "देव" तरस इनको, कभी आता नहीं है!
लगता है इन्हें चैन, अमन, भाता नहीं है!

अब कैसा चलन, मौत का ये चलने लगा है!
बारूद से लफ्जों का बदन, जलने लगा है!"





...........चेतन रामकिशन "देव"...............
दिनांक-२३.०२.२०१३

♥♥कागज की नाव..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥कागज की नाव..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
बरसात में फिर भीग के, आने का मन हुआ!
कुछ फूल नए फिर से, खिलाने का मन हुआ!
बरसात ने बचपन की मुझे, याद दिलाई,
कागज की नाव फिर से, चलाने का मन हुआ!

बारिश से मेरे मन की अगन, शीत हो गयी!
लगता है के बारिश से मुझे, प्रीत हो गयी!

नैनों में नए स्वप्न, सजाने का मन हुआ!
बरसात में फिर भीग के, आने का मन हुआ..

बरसात में बूंदों के, ये मोती बिखर गए!
बरसात में सूखे हुए, तालाब भर गए!
बरसात से आई है "देव", मन में ताजगी,
बरसात में पेड़ों के भी, चेहरे निखर गए!

हाँ सच है ये, बरसात का मौसम तो नहीं है!
पर रोक लें हम इसको, इतना दम तो नहीं है!

बरसात से फिर हाथ, मिलाने का मन हुआ!
बरसात में फिर भीग के, आने का मन हुआ!"

.........चेतन रामकिशन "देव".............
दिनांक-२३.०२.२०१३

Wednesday, 20 February 2013

♥विरह का वनवास..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥विरह का वनवास..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
बड़ा ही पीड़ित करता मन को, विरह का ये वनवास!
नहीं पता कब पूरी होगी, सखी मिलन की आस!
गिन गिन कर मैं बिता रहा हूँ, अपने दिन और रात,
नहीं पता तुम कब आओगी, सखी हमारे पास!

बिना तुम्हारे नीरसता है, मन भी हुआ अधीर!
बिना तुम्हारे इन आँखों से, झर झर बहता नीर!

नहीं पता कब उज्जवल होगा, ये मन का आकाश!
बड़ा ही पीड़ित करता मन को, विरह का ये वनवास..

मैंने देखा विरह में होती, गति समय की मंद!
न भाती है शीतल वायु, न मिलता आनंद!
बिना तुम्हारे "देव" हुए हैं, शब्द हमारे मौन,
नहीं रचित होती है कविता, न बनता है छंद!

तुम बिन उपवन मुरझाया है, सूख गए सब फूल!
बिना तुम्हारे जीवन पथ पर, मुझको चुभते शूल!

नहीं पता कब पतझड़ हरने, आएगा मधुमास!
बड़ा ही पीड़ित करता मन को, विरह का ये वनवास!"

..........चेतन रामकिशन "देव"...........
दिनांक-२०.०२.२०१३

Tuesday, 19 February 2013

♥ईमान...♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥ईमान...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
खुद से नजर मिलाना भी, आसान न रहा!
जिन लोगों का जिन्दा यहां, इमान न रहा!

मिलते हैं मुझे यूँ तो, बहुत आदमी लेकिन,
इस दुनिया में शायद कोई, इंसान न रहा!

मुजरिम को रिहाई यहां, पीड़ित को सजा है,
लगता है के भगवान भी, भगवान न रहा!

जो पालते हैं उनको ही, मिलती हैं ठोकरें,
माँ बाप का अब इतना भी, अहसान न रहा!

रोता है आज "देव", ये भारत भी देखकर,
आजाद, भगत सा कोई, कुरबान न रहा!"

...........चेतन रामकिशन "देव"..........
दिनांक-२०.०२.२०१३

Monday, 18 February 2013

♥♥♥वचन..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥वचन..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
दुख में विचलित न होने का, खुद से एक वचन करना है!
जीवन में आगे बढ़ने का, हर क्षण हमें जतन करना है!
रणभूमि में बिन साहस के, नहीं विजय के अवसर आते,
यदि विजेता बनना है तो, भय का हमें दमन करना है!

ये सच है कोई अजेय नहीं, किन्तु जीवन से क्यूँ डरना!
नित जीवन में नए द्रश्य हैं, कभी है सागर, कभी है झरना!

अपने मन की शीतलता से, दुख का ताप शमन करना है!
दुख में विचलित न होने का, खुद से एक वचन करना है...

सदाचार पर बल देना है, अनुशासन को अपनाना है!
प्रेम के सुन्दर फूल खिलाकर, सारे जग को महकाना है! 
इस जीवन को "देव" न किन्तु, निहित नहीं बस खुद में करना,
इस दुनिया को सही गलत का, अंतर हमको समझाना है!

विकसित होने की इच्छा में, नैतिकता पे मार न करना!
हिंसा में अंधे होकर के, मानवता पे वार न करना!

जात-धर्म से ऊपर उठकर, मन से यहाँ मिलन करना है!
दुख में विचलित न होने का, खुद से एक वचन करना है!"

......................चेतन रामकिशन "देव"...................
दिनांक-१९.०२.२०१३

♥जीवन के मायने..♥


♥♥♥♥♥♥♥♥जीवन के मायने..♥♥♥♥♥♥♥♥
नहीं फूलों सा है जीवन, यहाँ कांटे भी होते हैं!
कभी हँसते हैं फूलों से, कभी विरह में रोते हैं!
मगर तुम हार न जाना, कभी पीड़ा से डरकर के,
वो ठंडी छाँव पाते हैं, जो एक दिन बीज बोते हैं!

जो अपने स्वार्थ में, औरों का सुख नीलाम करते हैं!
कहाँ वो याद आते हैं, जो ऐसा काम करते हैं!

ये ऐसे लोग तो धरती पे, केवल बोझ होते हैं!
नहीं फूलों सा है जीवन, यहाँ कांटे भी होते हैं...

कभी जीवन में खुशियों की, हसीं सौगात मिलती है!
कभी जीवन में इन्सां को, ग़मों की रात मिलती है!
हमेशा "देव" ये जीवन, किसी को सुख नहीं देता,
कभी हम जीत जाते हैं, कभी पर मात मिलती है!

पराजित हो के भी मन में, जो अपने जोश भरते हैं!
वही कुछ कर दिखाते हैं, जो कुछ संकल्प करते हैं!

वहीँ इन्सां हैं जो औरों के, दुख में साथ रोते हैं!
नहीं फूलों सा है जीवन, यहाँ कांटे भी होते हैं!"

.............चेतन रामकिशन "देव".................
दिनांक-१८.०२.२०१३

Sunday, 17 February 2013

♥निर्धन की मायूसी..♥


♥♥♥♥♥♥निर्धन की मायूसी..♥♥♥♥♥♥♥
घोटालों की चीत्कार है, जनता है मायूस!
और दफ्तरों में लेते हैं, बाबु अफसर घूस!
देश के नेता लूट-लूट कर, भर रहे अपना कोष,
निर्धन जनता तड़प रही है, गर्मी हो या पूस!

मेरे देश के अब तो हुए हैं, बहुत बुरे हालात!
गम के बादल घिर आए हैं, हुई अँधेरी रात!

पता नहीं के रहेगा कब तक, हाल यूँ ही मनहूस!
घोटालों की चीत्कार है, जनता है मायूस..

निर्धन के जीवन में खिलते, बस कागज के फूल!
निर्धन के तन पे चिथड़े हैं और सूरत पे धूल!
निर्धन जन का जीवन स्तर, है इतना बदहाल,
उसके नंगे पांवों में तो, दुःख के चुभते शूल!

निर्धन जन के दर्द पे जाता, नहीं किसी का ध्यान!
देश का निर्धन ऐसे जीता, जैसे हो बेजान!

सब देते हैं दर्द उसे, कोई देता नहीं खुलूस!
घोटालों की चीत्कार है, जनता है मायूस!"

...........चेतन रामकिशन "देव"...........
दिनांक-१८.०२.२०१३


♥जीवन का जुआ..♥


♥♥♥♥♥♥♥जीवन का जुआ..♥♥♥♥♥♥♥
है हार कभी जीत, ये जीवन तो जुआ है!
हर रोज जिंदगी में, नया खेल हुआ है!

पर फिर भी मुझे, जिंदगी से डर नहीं लगता,
मेरे साथ में हर दम ही, मेरी माँ की दुआ है!

लोगों को अब तो भाने लगी, मेरी लिखावट,
तेरे प्यार ने जबसे मेरे, लफ्जों को छुआ है!

दिल से मेरे ज़ख्मों के, निशां जाते नहीं हैं,
हमला मेरे दिल पे यहाँ, अपनों का हुआ है!

मैं खुद से नजर, "देव" मिलाता हूँ बेहिचक,
मेहनत से अपनी मैंने, ये आकाश छुआ है!"

..चेतन रामकिशन "देव"..
दिनांक-१७.०२.२०१३

Saturday, 16 February 2013

♥शब्दों के मोती.♥


♥♥♥♥शब्दों के मोती.♥♥♥♥
आँखों में कुछ सपने बुनकर,
अपने मन की बोली सुनकर,
फिर से एक कविता लिखता हूँ,
मैं शब्दों के मोती चुनकर!

नहीं पता के इस कविता में,
कौनसा रस है, अलंकार है!
नहीं पता के इस कविता का,
जीवन कितना यादगार है!
नहीं पता के इस कविता में,
कितनी खामी और कमी है,
नहीं पता के इस कविता का,
लेखन कितना असरदार है!

किन्तु फिर भी मुझे चमकता,
शब्दों में आशा का दिनकर!
फिर से एक कविता लिखता हूँ,
मैं शब्दों के मोती चुनकर!"

...चेतन रामकिशन "देव"...
दिनांक-१६.०२.२०१३

Friday, 15 February 2013

♥प्यार का बसंत..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥प्यार का बसंत..♥♥♥♥♥♥♥♥
पीले फूलों की खुश्बू है, बरस रही बरसात!
बारिश की बूंदें लाईं हैं, खुशियों की सौगात!
चलो बसंती हो जायें हम, इन फूलों के संग,
बारिश की प्यारी बूंदों से, कहेंगे दिल की बात!

सखी मुझे हर मौसम में, भाये तेरा साथ!
मुझे कभी न तन्हा करना, नहीं छुड़ाना हाथ!

सखी तेरे ही प्रेम से हर्षित, हैं मेरे दिन रात!
पीले फूलों की खुश्बू है, बरस रही बरसात..

उपवन देखो खिले खिले हैं, धुली वनों की देह!
सखी कभी न कम करना तुम, अपना ये स्नेह!
सुख दुख के हम तुम साथी हैं, प्रेम है अपना "देव",
बड़े भाग्य से मिलता जग में, प्रेम का ये स्नेह!

बारिश में तो और भी प्यारा, लगे तुम्हारा रूप!
तुम छाया हो प्रकृति की, नैसर्गिक स्वरूप!

तेरे साथ से बन जाती है, देखो बिगड़ी बात!
पीले फूलों की खुश्बू है, बरस रही बरसात!"

...........चेतन रामकिशन "देव"............
दिनांक-१६.०२.२०१३

Thursday, 14 February 2013

♥अंतर्मन का ध्यान.♥


♥♥♥अंतर्मन का ध्यान.♥♥♥
अंतर्मन का ध्यान तुम्हीं हो!
अधरों की मुस्कान तुम्हीं हो!
जो ह्रदय को झंकृत कर दे.
ऐसा सुन्दर गान तुम्हीं हो!

तुम अम्बर के तारों जैसी!
शीतल किन्ही फुहारों जैसी!
तुम्हें देखकर कहता हूँ मैं,
तुम हो मधुर बहारों जैसी!

तुम्ही "देव" की पथ-प्रदर्शक,
सही-गलत का ज्ञान तुम्हीं हो!
जो ह्रदय को झंकृत कर दे.
ऐसा सुन्दर गान तुम्हीं हो!"

.....चेतन रामकिशन "देव".....
दिनांक-१४.०२.२०१३