Saturday, 12 May 2018
♥सीलन...
Wednesday, 9 May 2018
♥♥अश्रु संचय...♥♥
♥♥अश्रु संचय...♥♥
व्यक्त करूँ क्या मन की भाषा,
क्या बतलाऊँ मौन ह्रदय का।
बड़ा संकुचित क्षेत्र हो गया,
मानवता और प्रेम विषय का।
जिसको देखो वो घृणा की,
घूम रहा चिंगारी लेकर,
और आत्मा को दुःख देता
ये अवलोकन दुरित समय का।
क्या लिखूं मैं वर्तमान को, कुछ भी शोध नहीं हो पाता।
लोगों के दोहरे चेहरों से, सच का बोध नहीं हो पाता।
जिनके मन में भरी हुयी हैं, विस्फोटक जैसी सामग्री,
मुझसे उनसे अपनापन का अब, अनुरोध नहीं हो पाता।
मानव, मानव का हत्यारा,
दृश्य बहुत ही है विस्मय का।
व्यक्त करूँ क्या मन की भाषा,
क्या बतलाऊँ मौन ह्रदय का.....
उन के मन में मेल नहीं है, ये मंतव्य समझ आया है।
मौन ही अब होकर रह लेंगे, ये गंतव्य समझ आया है।
जिनके सम्मुख प्राण तत्व भी, हमने रखकर किया निवेदन,
उनको न मेरा उद्बोधन, न वक्तव्य समझ आया है।
"
देव" सुनो ये पात्र भर गया,
मेरे तो अश्रु संचय का।
व्यक्त करूँ क्या मन की भाषा,
क्या बतलाऊँ मौन ह्रदय का। "
चेतन रामकिशन " देव"
०९.०५.२०१८
(सर्वाधिकार सुरक्षित, मेरी यह रचना मेरे ब्लॉग http://chetankavi.blogspot.com पर पूर्व प्रकाशित। )
Monday, 7 May 2018
♥♥ठोकर...♥♥
जीती बाज़ी आज गंवाई।
हमने फिर से ठोकर खाई।
झूठ की सबने धुंध चलाई।
ग़म है, बद्दुआ और तन्हाई।
जिसकी थी तस्वीर लगाई।
मुझको बात समझ में आई।
रूह तलक भी घबराई।
इसी सोच में रात बिताई।"
०८.०५.२०१८
(सर्वाधिकार सुरक्षित, मेरी यह रचना मेरे ब्लॉग http://chetankavi.blogspot.com पर पूर्व प्रकाशित। )
Sunday, 6 May 2018
♥♥अपवित्र ...♥♥
♥♥अपवित्र ...♥♥
अपवित्र हूँ।
मैं विचित्र हूँ।
कोई भयावह,
रौद्र चित्र हूँ।
मैं संभवत:
रक्तपिपासु,
मैं शत्रु का,
घना मित्र हूँ।
जब अपना कहने वालों से, ही ऐसी उपमा मिलती हैं।
तो हृदय की कंदराओं में, मानों के चिमनी जलती हैं।
आरोपित करने वाले तो, निरा रक्त को जल कह देंगे,
उनके सम्मुख किसी मनुज की, सच्ची बातें कब चलती हैं।
मैं हूँ अम्ल,
रसायन कोई,
कहाँ भला,
मैं कोई इत्र हूँ।
मैं संभवत:
रक्तपिपासु,
मैं शत्रु का,
घना मित्र हूँ।
बुरे समय में परिचय वाले, भी अपरिचित हो जाते हैं।
साथ छोड़ने के अवसर में, तत्क्षण विचलित हो जाते हैं।
ये ऐसा संसार है जिसमें, भावों का संदर्भ कुछ नहीं,
जीवित सृजन और सजीव भी, मानों कल्पित हो जाते हैं।
वो स्वयं को,
सर्वोच्च मानते।
मैं छोटा सा,
मानचित्र हूँ।
मैं संभवत:
रक्तपिपासु,
मैं शत्रु का,
घना मित्र हूँ। "
चेतन रामकिशन "देव"
०६.०५.२०१८
(सर्वाधिकार सुरक्षित, मेरी ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित। "
Wednesday, 2 May 2018
प्रेम विलीन
♥♥प्रेम विलीन ...♥♥
तुम विलीन हो जाओ मुझमें,
मिलन पूर्णता का उन्मुख हो।
गठबंधन हो आत्माओं का,
देह बिछड़ने का न दुख हो।
सत्य है एक दिन इस धरती से,
निश्चित है अवसान हमारा,
पर जब भी लूं जन्म दुबारा,
मेरा मुख तेरे सम्मुख हो।
मेरे प्रेम की अभिव्यक्ति का,
उद्बोधन और अलंकार तुम।
मेरी ऊर्जा, बल, अधिगम का,
निश्चित ही आधार सखी तुम।
मेरे जीवन के नभ तल में,
तुम सा ही तारा प्रमुख हो।
तुम विलीन हो जाओ मुझमें,
मिलन पूर्णता का उन्मुख हो।
,
मेरा पथ का उष्ण मरुस्थल,
जलधारा सा शीतल तुमसे।
मेरे जीवन का अंधियारा,
दिनकर भांति उज्ज्वल तुमसे।
प्रेम की कोमल धवल धारणा,
इंद्रधनुष की परिचायक तुम,
तुम संयोजन कोमलता का,
रेशम भी और मलमल तुमसे।
मेरे मन की तपस्याओं का,
मनचाहे वर जैसा सुख हो।
तुम विलीन हो जाओ मुझमें,
मिलन पूर्णता का उन्मुख हो।
ध्यान तुम्हारा मेरे चित्त को,
मेरी कला में रंग तुम्हारे।
प्रेम का हर क्षण उत्सव जैसा,
मैंने देखा संग तुम्हारे।
" देव" तुम्हारा स्वर सुनने से,
सरगम गूंजे कर्ण शिरा में,
बचपन से प्यारे लगते हैं,
क्रोध, नेह, स्पर्श तुम्हारे।
मेरे स्वप्नों से सच तक में,
तुम ही तुम मेरे अभिमुख हो।
तुम विलीन हो जाओ मुझमें,
मिलन पूर्णता का उन्मुख हो।"
चेतन रामकिशन 'देव'
दिनांक-०२.०५.२०१८
(सर्वाधिकार सुरक्षित,
मेरी ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित)
Wednesday, 4 April 2018
♥♥अनुराग ...♥♥
मौन पढ़ा न तुमने मेरा,
अभिव्यक्ति थी अनुराग की।
तुम पर प्राण करूं न्योछावर,
यही सोच थी मेरे त्याग की।
तेरे अश्रु पी लेने को,
हर क्षण मेरा कंठ खुला था,
शब्द भाव को युग्मित करके,
रची कविता प्रेम राग की।
ये नहीं कहता के मैं ही बस ,
श्रेष्ठ समर्पण का नायक हुं।
किन्तु इतना बोध है मुझको,
मैं सच का प्रतिपालक हुं।
प्रेम भाव के इस परिपथ में,
मिथ्या कहना मुझे न भाये,
मैंने उसको सौंप दिया मन,
वो छोड़े या साथ निभाये।
मैं शीतलता का वाहक हुं,
ज्वलनशीलता नहीं आग की।
शब्द भाव को युग्मित करके,
रची कविता प्रेम राग की....
कितने स्वप्न हुए रेखांकित,
अति निकटता का अवसर था।
सागर का खारा पानी भी,
लगता था कितना मधुकर था।
अनुभूति के दीप जले थे,
रोम रोम मन का उज्जवल था।
किन्तु सच का बोध हुआ तो,
सिद्ध हुआ वो केवल छल था।
मैंने माना प्रेम को श्रद्धा,
उसने युक्ति गुना भाग की।
शब्द भाव को युग्मित करके,
रची कविता प्रेम राग की।
चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक- ०४.०४.२०१८
(सर्वाधिकार सुरक्षित, मेरी ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित)
Tuesday, 9 January 2018
♥♥सर्दी वाली परी ...♥♥
सर्दी वाली परी मौन है।
धूप का भी न पता कौन है।
कंटक मेरे जीवन पथ पर,
खिले फूल और लता कौन है।
विस्मय बोध हुआ है मन को,
देखके उनके परिवर्तन को,
क्षण भंगुर सा टूट गया मैं,
चोट लगी है अंतर्मन को।
पीड़ा कम हो जो विरह की,
लेप, छाल वो बता कौन है।
कंटक मेरे जीवन पथ पर,
खिले फूल और लता कौन है...
नीले फूल, कली गुमसुम है।
बहुत विवशता का मौसम है।
नयनों में लाली के मेघा ,
पलकों का आंचल भी नम है।
तुमको प्रेम किया यदि मैंने,
तो बोलो के खता कौन है।
कंटक मेरे जीवन पथ पर,
खिले फूल और लता कौन है।"
चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-09.01.2018
(मेरी यह रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित, सर्वाधिकार सुरक्षित )
Friday, 5 January 2018
♥♥♥♥चकनाचूर ...♥♥♥♥♥
♥♥♥♥चकनाचूर ...♥♥♥♥♥
मुझको दूर किया है तुमने।
दिल को चूर किया है तुमने।
जीवन भर जो हँस न पाऊं,
यों मजबूर किया है तुमने।
क्यों कर तुमने फेर लिया मुंह,
जान के मेरे जज़्बातों को,
बेदर्दी से ख्बाव मेरा हर,
चकनाचूर किया है तुमने।
यदि प्यार के धागे सच में, इतने ही कच्चे होते हैं।
तो फिर प्यार न करने वाले, लोग ही क्या अच्छे होते हैं।
नातें, कसमें, सौगंधों की होली यहाँ जलाई जाये,
सच को झुठला देने वाले, लोग ही क्या सच्चे होते हैं।
"देव " मेरे हंसमुख चेहरे को,
यों बेनूर किया है तुमने।
बेदर्दी से ख्बाव मेरा हर,
चकनाचूर किया है तुमने। "
चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-05.01.2018
Friday, 29 December 2017
♥♥अजीवित ...♥♥
जीवित होकर भी अजीवित, मृतप्राय सा जीवन क्या है।
जो अपनायत, प्रेम रहित हो, ऐसा फिर मानव मन क्या है।
मानवता को शर शैय्या पर , देखके भी अनदेखा कर दे,
खुले नयन से निर्मोही बन, आखिर ये अवलोकन क्या है।
ये पाषाण सरीखी दुनिया, कभी कभी तो दम घुटता है।
जब चालाक मनुज के हाथों, कोमल कोमल मन लुटता है।
चंहुओर तो शूल चुभ रहे, दिखलाओ के उपवन क्या है।
जीवित होकर भी अजीवित, मृतप्राय सा जीवन क्या है...
क्यों शोषण होता निर्धन का, क्यों कमजोर छले जाते हैं।
क्यों निर्धन के अधिकारों के, पत्रक यहाँ जले जाते हैं।
कितनी निर्ममता से निशदिन, रक्त बह रहा निर्दोषों का,
बारूदों की आंच में कितने, जग से दूर चले जाते हैं।
हे प्रकृति ! तू ही बतला, आखिर ये प्रबंधन क्या है।
जीवित होकर भी अजीवित, मृतप्राय सा जीवन क्या है...
बस मेरी इतनी आशा है, जिसका हो, अधिकार मिल सके।
मानवता को मनुज के हाथों, आदर और सत्कार मिल सके।
" देव " सभी सहृदयी होकर, माला गूंथे प्रेम पुष्प की,
बने सुगन्धित वायु मंडल, रिक्त मनों को प्यार मिल सके।
तब जाकर के समझ सकेंगे, स्वागत और अभिनन्दन क्या है।
जीवित होकर भी अजीवित, मृतप्राय सा जीवन क्या है। "
चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-२९.१२ .२०१७
(मेरी यह रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित, सर्वाधिकार सुरक्षित )
Sunday, 29 October 2017
♥♥तुम ही तुम ...♥♥
तुम परिचायक मेरी प्रीत की।
धुरी तुम्ही हो मेरी जीत की।
तुम शीतलता गरम धूप में,
तुम ऊष्मा हो जटिल शीत की।
तुम उत्कृष्ट मेरे जीवन में, नेह, बोध, ममता तुममें है।
तुम कर दोगी तिमिर को उजला, ये पावन क्षमता तुममें है।
तुम्ही वंदना, तुम्ही प्रार्थना, तुम्ही हमारी मनोकामना।
तुम्ही निवेदन, अधिकार तुम, तुम्ही हमारी क्षमा याचना।
तुम भावुकता हो शब्दों की,
तुम ही लय हो मेरे गीत की।
तुम शीतलता ग्रीष्म काल में,
तुम ऊष्मा हो जटिल शीत की...
तुम गंगा जल, तुम ही बल हो, तुम शक्ति हो, तुम ज्योति हो।
किरन हर्ष की फूटें मन में, निकट मेरे जब तुम होती हो।
तुम हरियाली हो उपवन की, तुम्ही फूल हो, तुम्ही रंग हो।
मेरा जीवन बने सुगन्धित, सखी यदि तुम मेरे संग हो।
तुम जाग्रति मानवता की,
तुम रूपक हो सबल रीत की।
तुम शीतलता गरम धूप में,
तुम ऊष्मा हो जटिल शीत की...
तुम्ही प्रेयसी, तुम्ही नायिका, तुम्ही धरोहर, तुम सहजन हो।
तुम्ही "देव" सी कलाकृति हो, तुम नैसर्गिक आलेखन हो।
तुम अभिनन्दन, तुम आकर्षण, तुम संग्रह हो, तुम्ही कोष हो।
तुम पर्याय प्रेम ऋतुओं का, तुम्ही लेखनी, काव्य कोश हो।
तुम सतरंगी इंद्रधनुष की,
तुम यौवनता मेरे मीत की।
तुम शीतलता गरम धूप में,
तुम ऊष्मा हो जटिल शीत की। "
"
कोई ऐसा मनुज जिसका होना हमारे जीवन में, हमारी आत्मा को पूर्ण करता है, तब निश्चित प्रेम की कलियाँ पुष्प बनकर समूचे जग को मानवीयता से सुगन्धित करती हैं, तो आइये ऐसे श्रेष्ठ जान का वंदन करें। ....."
चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-२९.१०.२०१७
(मेरी यह रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित, सर्वाधिकार सुरक्षित )
Tuesday, 10 October 2017
♥♥♥♥♥♥प्यार की बयार...♥♥♥♥♥♥♥
प्यार की जब बयार होने लगी।
जिंदगी खुशगवार होने लगी।
चांद बनकर के तुम मिले जो मुझे,
चांदनी बेशुमार होने लगी।
तेरी पाकीज़गी भरी सीरत,
हर तपिश दरकिनार होने लगी।
तेरी छुअन से मिट गया पतझड़,
हर तरफ ही बहार होने लगी।
रात का ख्वाब, तू सुनहरी किरन,
रौशनी रूह के पार होने लगी।
दिल तो पागल है तेरी चाहत में,
जान तक भी निसार होने लगी।
" देव " तुझसे ही मेरा अर्थ यहाँ,
तू ही जीवन का सार होने लगी। "
......चेतन रामकिशन "देव"……
Friday, 22 September 2017
♥♥घातक...♥♥♥
♥♥♥♥♥♥♥♥घातक...♥♥♥♥♥♥♥♥
विस्फोटक की संज्ञा देकर, मुझको घातक सिद्ध कर दिया।
मुझको खलनायक सा आखिर क्यों करके प्रसिद्द कर दिया।
क्या अपने अधिकार के स्वर को, गुंजित करना यहाँ गलत है,
दीवारों पे अपराधी लिख, क्यों मुझको संलिब्ध कर दिया।
ये तो घोर दमन के क्षण हैं, अभिव्यक्ति मारी जाती है।
नायक की युद्धक क्षमता भी, देखो बेकारी जाती है।
शत्रु, भ्रष्टाचारी, लोभी को मिलता सम्मान यहाँ पर,
हत्यारे तो विजयी हो रहे, मानवता हारी जाती है।
निर्दोषी जीवन गतियों को, जबरन क्यों अवरुद्ध कर दिया।
विस्फोटक की संज्ञा देकर, मुझको घातक सिद्ध कर दिया।
क्यों आखिर दुष चलन हो रहा, क्या सज्जनता अभिशापी है।
क्या मिथ्या है पुण्य का बिंदु, क्या पूजन हेतु पापी है।
खंडित किया जा रहे सपने, ताकत का प्रभाव बनाकर,
जाति, हिंसा, लूट मार की, चंहुओर आपाधापी है।
गंगा सा पावन होकर भी, रेखांकन संदिग्ध कर दिया।
विस्फोटक की संज्ञा देकर, मुझको घातक सिद्ध कर दिया।
अब अपनायत किससे रखें, किससे मन की पीर बताएं।
लोग यहाँ पर अम्ल छिड़ककर, हँसते चेहरों को झुलसाएं।
" देव " तपस्या कितनी कर लो, कितना कर लो करुण निवेदन,
हत्यारे हैं, कमजोरों के जीवित तन में आग लगाएं।
अब चुप हूँ पर शत्रु मर्दन, करूँगा जिस दिन युद्ध कर दिया।
विस्फोटक की संज्ञा देकर, मुझको घातक सिद्ध कर दिया। "
......चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक- 22 09 2017
(मेरी यह रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित, सर्वाधिकार सुरक्षित )
Monday, 18 September 2017
♥♥जड़वत...♥♥
सजल नयन हैं, तुम बिन पीड़ा, जड़वत मेरी गति हो गई।
हृदय टूटकर बिखरा पथ पर, तुम बिन गहरी क्षति हो गई।
तन, मस्तक सब केश, कंठ भी विरह भाव से प्रभावित हैं,
तुम बिन मन को कुछ न भाये, तुमको अर्पित मति हो गई।
खाई थी सौगंध जन्म की, किन्तु नाता तोड़ रहे हैं।
अपने स्वजन बुरे समय में, मुझसे मुख को मोड़ रहे हैं,
मैं एकाकी शिशु की भांति, बोध नहीं है युद्ध कला का,
निर्मोही होकर के मुझको, अग्निपथ में छोड़ रहे हैं।
मुझको एकदम किया बहिष्कृत, तृप्त जो उनकी रति हो गई।
सजल नयन हैं, तुम बिन पीड़ा, जड़वत मेरी गति हो गई ...
होकर के निर्दोष भी मुझको, क्यों कर कारावास दिया है।
न ही सौंपी हर्ष की धरती, न सुख का आकाश दिया है।
तुमने अपने महल दुमहले चमकाए हैं उजले पन में,
किन्तु सक्षम होकर तुमने, न मुझको प्रकाश दिया है।
देखो मेरी अनुभूति की, न चाहकर भी यति हो गई।
सजल नयन हैं, तुम बिन पीड़ा, जड़वत मेरी गति हो गई....
लगता है बारूद भरा है, मेरे मन की दीवारों में।
स्याह हो गया जीवन पूरा, भय लगता है उजियारों में।
" देव " ये कैसी परिपाटी है, कैसा मन का उत्पीड़न है,
अब सावन में पतझड़ लगता, नहीं लगन अब श्रंगारों में।
मेरी आत्मा प्रतीक्षा के अंगारों में सती हो गई।
सजल नयन हैं, तुम बिन पीड़ा, जड़वत मेरी गति हो गई। "
......चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक- १८.०९.२०१७
Wednesday, 9 August 2017
♥♥♥♥वार...♥♥♥♥♥♥
तबाह हो न सके हम, तो हमें मार दिया।
मोहब्बत ईश्क़ का रिश्ता भी दरकिनार किया।
जंग होती जो सामने से, हम भी लड़ लेते,
मगर उस शख़्स ने, पीछे से हमपे वार किया।
सुनो अब टूट गयी, हर कड़ी वफाओं की,
जुर्म उसका था मगर, मुझको गुनहगार किया।
उदास रात है, रिसते हुए खूं की टपकन,
तीर कसकर के मेरे दिल के आरपार किया।
' देव' उम्मीद है, शायद सुकून मिल जाए,
आग का दरिया तो हंसकर के हमने पार किया। "
.....चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक- ०९.०८.२०१७
Saturday, 29 July 2017
♥अश्रु जल...♥
ह्रदयाघात, प्रताड़ित मन है ,
अब तो शूलों पे जीवन है,
कष्ट आत्मा तक आ पहुंचा,
अश्रु जल का बहिर्गमन है।
मुख झुलसा है, पांव में छाले, धूप जलाती है भादों की।
मौन हैं मेरी आह को सुनकर, घनी रिक्तता संवादों की,
परिलक्षित हो ही जाता है, जब मन के मंतव्य बदलते,
सच के सम्मुख चमक बढ़ रही, मिथ्या के कुछ उत्पादों की।
आरोपित करके खुश होना,
अधिकांशत यही चलन है।
कष्ट आत्मा तक आ पहुंचा,
अश्रु जल का बहिर्गमन है ...
बिखर रहे सब स्वप्न नयन के, जटिल अवस्था है जीवन की।
शब्द रो रहे दशा देखकर, व्याकुलता इतनी लेखन की।
हर्षित हैं वो मुझे रुलाकर, विस्मृत करके संबंधों को,
नहीं टीस सुनता है कोई, मन के व्याकुल उद्बोधन की।
उमड़ रहा पीड़ा का सागर,
मानवता का बड़ा दमन है।
कष्ट आत्मा तक आ पहुंचा,
अश्रु जल का बहिर्गमन है। "
......चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक- २९.०७.२०१७
Thursday, 15 June 2017
♥♥♥♥सियासी...♥♥♥♥♥♥
झूठे सब्जबाग दिखलाकर।
जात धर्म का पाठ पढ़ाकर।
आज सियासी खुश होते हैं,
औरों के घर आग लगाकर।
मुफ़लिस की एक ईंट ईंट तक,
झोपड़ पट्टी बिक जाती है।
बची खुची बस जान जिस्म की,
मरकर पथ में फिंक जाती है।
घर, बस्ती और गलियारों में,
नफरत की दिवार उठाकर।
आज सियासी खुश होते हैं,
औरों के घर आग लगाकर।
व्याकुल बेरोजगार सिसकते,
कहीं पे चूल्हे नहीं दहकते,
कहीं नहीं है छत की छाँव,
भूख से बच्चे नहीं चहकते।
सेंक रहे मतलब की रोटी,
मज़लूमों की लाश तपाकर।
आज सियासी खुश होते हैं,
औरों के घर आग लगाकर। "
......चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक- १६-०६-२०१७
Sunday, 7 May 2017
♥♥♥♥धुआं धुआं सा...♥♥♥♥♥♥
धुआं धुआं सा छाया क्यों है।
हर एक शख़्श पराया क्यों है।
भीतर से तो काला है दिल,
बाहर मगर छुपाया क्यों है।
जिसकी एक दिन मांग भरी थी,
जिंदा उसे जलाया क्यों है।
सात जन्म तक की कसमें थीं,
एकदम उन्हें भुलाया क्यों है।
जो मुफ़लिस, कमजोर, बेगुनाह,
कहर उसी पे ढ़ाया क्यों है।
रोटी का हक़ है, उसको भी,
उसका हिस्सा खाया क्यों है।
"देव " ज़ख्म जब भर नहीं सकते,
आखिर नमक लगाया क्यों है। "
......चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक- ०८.०५.२०१७
(मेरी यह रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित, सर्वाधिकार सुरक्षित )
Monday, 1 May 2017
♥क्यूंकि तुमसे प्यार किया है...♥♥
चाहो तो तुम मुझे भुला दो ,
मेरे सब सन्देश जला दो।
कर दो मेरा शीश अलग तुम,
या फिर मुझको जहर खिला दो।
जो भी तेरा मन करता हो, सभी जतन तुम बस कर लेना।
चाहें मुझको ग़म देकर के, खुशियों से झोली भर लेना।
तेरी जिद, तेरे गुस्से को, हंसकर के स्वीकार किया है।
तुमसे कोई नहीं शिकायत, क्यूंकि तुमसे प्यार किया है ...
मैंने अपने प्रेम भाव का,
बस तुमसे अनुरोध किया है।
न ही तुम पर जोर जुल्म और,
न कोई अवरोध किया है।
हाँ तू अच्छी लगती है तो,
तुझसे गठबंधन का मन है,
इसीलिए इस रुंधे कंठ से,
नाम तेरा उद्बोध किया है।
तू स्वामी है, अपने मन की, जो भी हो निर्णय कर लेना।
मन बोले तो अपना लेना, या फिर दूरी तय कर लेना।
मैंने तो बस नाम तुम्हारे, अपना ये संसार किया है।
तुमसे कोई नहीं शिकायत, क्यूंकि तुमसे प्यार किया है...
तुमसे सब कुछ सत्य कहा है,
झूठ बोलना मुझे न आता।
हाँ ये सच है बिना तुम्हारे,
मेरे दिल को कुछ न भाता।
"देव " तुम्हारे अपनेपन की,
लगती मुझको बहुत जरुरत,
तेरे बिन ये रात हैं सूनी,
धवल चाँद भी नहीं लुभाता।
यदि प्रेम के योग्य लगूं तो, तुम मेरी दुनिया बन जाओ।
सुबह, शाम, दिन, रात, हमेशा, मेरे जीवन को महकाओ।
बस तेरी उम्मीद में मैंने, सात समुन्दर पार किया है।
तुमसे कोई नहीं शिकायत, क्यूंकि तुमसे प्यार किया है। "
......चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक- ०१.०५ .२०१७
(मेरी यह रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित, सर्वाधिकार सुरक्षित )
Sunday, 30 April 2017
♥दर्द और तकलीफ...♥
दर्द और तकलीफ से दो चार होना पड़ रहा है।
वो गुनाह करके भी खुश हैं, मुझको रोना पड़ रहा है।
है बुरा जो वक़्त मेरा, सब सहारा खींच बैठे,
आज खुद बैसाखियों पर, खुद को ढ़ोना पड़ रहा है।
इस क़दर तकदीर भी, मुझसे निभाए दुश्मनी,
दर्द के काँटों पे मुझको, दोस्त सोना पड़ रहा है।
दूर तक ग़म का मरुस्थल, कौन है जो बूंद देगा,
अपना चेहरा, अपने ही अश्क़ों से धोना पड़ रहा है।
आज छोटी पड़ रही, शर्मो हया की चादरें,
खुद-ब-खुद इंसानियत का, कद भी बौना पड़ रहा है।
फेर लीं उसने निगाहें, रौंदकर तस्वीर मेरी,
देखकर उसको किनारे खुद ही होना पड़ रहा है।
" देव " मुमकिन है जमाना, नाम अपना याद रखे,
बस तभी तो बाजुओं में, जोर बोना पड़ रहा है। "
......चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक- ३०.०४.२०१७
(मेरी यह रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित, सर्वाधिकार सुरक्षित )




