Tuesday, 18 June 2013

♥♥भारी सांसें.. ♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥भारी सांसें.. ♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
भारी सांसें उठ नहीं पातीं, कुछ पल को आराम चाहिए!
कई दशक से चलता आया, कुछ पल को विश्राम चाहिए!
जिसके दामन में सर रखकर, मैंने दर्द बताना चाहा,
वही शख्स कहता है मुझसे, उसे दुआ का दाम चाहिए!

बिना जुर्म के ही दुनिया ने, मुझको मुजरिम बना दिया है!
मेरी पीड़ा सुने बिना ही, अपना निर्णय सुना दिया है!

बिना कत्ल के ही अब मुझको, कातिल जैसा नाम चाहिए!
भारी सांसें उठ नहीं पातीं, कुछ पल को आराम चाहिए...

नहीं चुका हूँ, नहीं थका हूँ, मैं जीवन से डरा नहीं हूँ!
मिटटी को जड़वत रोके हूँ, बेशक ही मैं हरा नहीं हूँ! 
"देव" मेरे नाजुक से दिल ने, दुनिया के सदमे झेले हैं,
इसीलिए बस मुरझाया हूँ, लेकिन मन से मरा नही हूँ!

मैंने जिसकी खातिर देखो, अपना गाढ़ा खून बहाया!
उस इन्सां ने ही दुनिया में, मेरे दिल को बहुत रुलाया!

जो आँखों को सुकूं दे सके, मुझको वो गुलफ़ाम चाहिए!
भारी सांसें उठ नहीं पातीं, कुछ पल को आराम चाहिए!"

................चेतन रामकिशन "देव"..................
दिनांक-१९.०६.२०१३

Monday, 17 June 2013

♥♥प्रीत के बादल..♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्रीत के बादल..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तेरे प्यार के बादल उमड़े, बरस रहा है रिमझिम पानी!
फूलों की खुश्बू लायी है, तेरे प्यार की मधुर निशानी!
सखी जहाँ में प्रेम से बढ़कर, कोई भी सम्बन्ध नहीं है,
मरकर भी जीवित रहती है, ये रूहों की प्रेम कहानी!

मेरी किस्मत अच्छी है जो, सखी तुम्हारी प्रीत मिली है!
सखी तुम्हारी प्रीत से मुझको, हर मंजिल पे जीत मिली है!

प्रेम बिना सब कुछ सूना है, सबको है ये बात बतानी!
तेरे प्यार के बादल उमड़े, बरस रहा है रिमझिम पानी..

बिना प्रीत के कोई दौलत, किसी का आँचल भर नहीं सकती!
ये दुनिया कोशिश करके भी, जुदा रूह को कर नहीं सकती!
"देव" जहाँ में मिलना ही बस, प्यार की मौलिक शर्त नहीं है,
सखी प्रेम की नातेदारी, बिना मिले भी मर नहीं सकती!

सखी प्रेम की आंखे पाकर, जग मनभावन हो जाता है!
सखी प्रेम का धारण करके, मन भी पावन हो जाता है!

सखी हमें एक दूजे के संग, ख्वाबों की बारात सजानी!
तेरे प्यार के बादल उमड़े, बरस रहा है रिमझिम पानी!"

...................चेतन रामकिशन "देव".......................
दिनांक-१७.०६.२०१३

Friday, 14 June 2013

♥♥चाहत का किरदार ...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥चाहत का किरदार ...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मुझे तेरी चाहत का हमदम, एक ऐसा किरदार चाहिए!
जब भी मेरी आंखे तरसे, मुझे तेरा दीदार चाहिए!
हाँ सच है के इस दुनिया में, वक्त किसी के पास नहीं है,
भले ही मुझको एक पल देना, पर रूहानी प्यार चाहिए!

नाम प्यार का मैं नहीं करता, प्यार तुझे दिल से करता हूँ!
इसीलिए तो तेरे दुःख में, अपनी आंखे नम करता हूँ!

हाथ मैं तेरा पकड़ सकूँ जो, मुझको वो अधिकार चाहिए!
मुझे तेरी चाहत का हमदम, एक ऐसा किरदार चाहिए....

प्यार के ढाई अक्षर भर से, शपथ प्रेम की तय नहीं होती!
बिना समर्पण के दुनिया में, प्रेम भाव की जय नही होती!
"देव" जहाँ में प्यार करो तो, करना पूरी सच्चाई से,
वो चाहत किस काम की जिसमे, सच्चाई की लय नहीं होती!

प्यार से बढ़कर इस दुनिया में, कोई भी सौगात नहीं है!
प्यार तो होता है रूहानी, बस अधरों की बात नहीं है!

बिन तेरे मैं गिर जाऊंगा, मुझे तेरा आधार चाहिए!
मुझे तेरी चाहत का हमदम, एक ऐसा किरदार चाहिए!"

....................चेतन रामकिशन "देव".......................
दिनांक-१४.०६.२०१३

Thursday, 13 June 2013

♥♥मेरी टहनियां...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥मेरी टहनियां...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
किसे ने मेरे पत्ते तोड़े, कोई टहनी काट ले गया!
किसी ने मेरी छाल को छीला, कोई फलों को छांट ले गया!
इस दुनिया में बेदर्दी से, सभी ने मेरे दिल को काटा,
कोई ऐसा नहीं मिला जो, थोड़ा सा गम बाँट ले गया!

यूँ तो जग में बहुत मिले हैं, मुझे चाँद से दिखने वाले!
जगह जगह देखे हैं मैंने, बड़ा बड़ा सा लिखने वाले!

मैंने माँगा जिससे रेशम, वही दुखों की टाट दे गया!
किसे ने मेरे पत्ते तोड़े, कोई टहनी काट ले गया....

कट गयीं जब से मेरी टहनियां, छाया मुझसे मुक्त हो गई!
अपनेपन की खाद मिली न, एक एक क्रिया सुप्त हो गई!
"देव" हमारी आँखों से अब, सूखे में जल बरस रहा है,
मिट गई मेरी हर एक निशानी, मेरी दुनिया लुप्त हो गई!

नहीं समझ आया पर मुझको, लोगों में बेदर्दी क्यूँ है!
जिसे चाहिए धूप खुशी की, वहां गमों की सर्दी क्यूँ है!

जो कुछ बचा खुचा था मुझमें, गम का दीमक चाट ले गया!
किसे ने मेरे पत्ते तोड़े, कोई टहनी काट ले गया!"

...................चेतन रामकिशन "देव"................
दिनांक-१४.०६.२०१३ 

Monday, 10 June 2013

♥♥बेटी(धरती की परी).♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥बेटी(धरती की परी).♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
परियों जैसी प्यारी प्यारी, मिश्री जैसी मधुर है बेटी!
एक मानव के जीवन पथ में, फूलों जैसी डगर है बेटी!
जिस आंगन में बेटी न हो वो, उस घर में रहती नीरसता,
कड़ी धूप में जलधारा की, एक मनभावन लहर है बेटी!

बेटी की तुलना बेटों से, करके उसको कम न आंको!
बेटी है बेटों से बढ़कर, कभी रूह में उसकी झांको!

वो कविता का भावपक्ष है, किसी गज़ल की बहर है बेटी!
परियों जैसी प्यारी प्यारी, मिश्री जैसी मधुर है बेटी...

जन्मकाल से ही बेटी को, कुदरत से ये गुण मिलते हैं!
बचपन से ही उसके मन में, नम्र भाव के गुल खिलते हैं!
बेटी के मन में बहता है, सहनशीलता का एक सागर,
नहीं आह तक करती है वो, भले ही उसके हक छिलते हैं!

बेटी तो है ज्योति जैसी, वो घर में उजियारा करती!
वो चिड़ियों की तरह चहककर, घर आंगन को प्यारा करती!

बेटे यहाँ बदल जायें पर, अपनी आठों पहर है बेटी!
परियों जैसी प्यारी प्यारी, मिश्री जैसी मधुर है बेटी....

आशाओं की ज्योति है वो, पूनम जैसी निशा है बेटी!
अंतर्मन को सुख देती है, कुदरत की वो दुआ है बेटी!
"देव" जहाँ में बेटी जैसा, कोई अपना हो नहीं सकता,
किसी मनुज के बिगड़े पथ की, सही सार्थक दिशा है बेटी!

बेटी है तो घर सुन्दर है, बिन बेटी के घर खाली है!
बेटी है तो खिला है उपवन, बेटी है तो हरियाली है!

हंसकर वो कुर्बानी देती, ऐसा पावन रुधिर है बेटी!
परियों जैसी प्यारी प्यारी, मिश्री जैसी मधुर है बेटी!"


"
बेटी-एक ऐसा चरित्र, जिसके बिना किसी मनुज का जीवन पूर्ण नही होता, जिसकी किलकारी के बिना, जिसकी चहक के बिना, कोई घर सम्पूर्ण नहीं होता, वो ऐसा चरित्र जो अपने हर सुख का दमन करते हुए, अपने परिजनों के लिए अपने रुधिर की एक एक बूंद तक कुर्बान कर देती है, तो आइये कुदरत के ऐसा अनमोल चरित्र "बेटी" का सम्मान करें!"

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-११.०६.२०१३ 

"
सर्वाधिकार सुरक्षित"


♥♥मेरे जज्बात..♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥मेरे जज्बात..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
काश मेरे जजबातों को तुम, पढ़ लेते मन की आँखों से,
फिर न तुमको रत्ती भर भी, कभी शिकायत होती मुझसे!

तुमने कैसे सोच लिया के, अदल बदल कर मैं जीता हूँ,
मैं जैसा हूँ, मैं वैसा हूँ, नहीं बनावट होती मुझसे!

तू जितना भी दर्द मुझे दे, मैं उफ तक भी नहीं करूँगा,
क्यूंकि रूहानी रिश्तों की, नहीं बगावत होती मुझसे!

नाम प्यार का भले नहीं दो, पर तू मेरा दर्द समझना,
तेरी दुआ के बिन जीवन की, नहीं हिफाजत होती मुझसे!

जो एक पल भी मिला चैन का, उससे अपनी झोली भर ली,
मानवता के नाम पे देखो, नहीं तिजारत होती मुझसे!

जो मेरा दिल कहता है मैं, उसको ज्यों का त्यों लिखता हूँ,
किसी लफ्ज के साथ झूठ की, नहीं सजावट होती मुझसे!

तूने मुझको "देव" अगर जो, कातिल अपना मान लिया तो,
खुद को फांसी लटका दूंगा, नहीं रियायत होती मुझसे!"

................चेतन रामकिशन "देव"....................
दिनांक-१०.०६.२०१३

Sunday, 9 June 2013

♥♥दामन के घाव.♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥दामन के घाव.♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
आंसू पीना मुझे आ गया, घाव भी सिलना सीख गया हूँ!
इस दुनिया से दर्द छुपाकर, हंसकर मिलना सीख गया हूँ!
भले ही गम के तेजाबों ने, जड़ें खोखली कर दीं मेरी,
लेकिन फिर भी फूलों जैसा, जग में खिलना सीख गया हूँ!

हाँ दामन पर घाव बहुत हैं, सिलने में कुछ वक़्त लगेगा!
लगता है के मरते दम तक, गम का साया नहीं रुकेगा!

इसीलिए जल प्रपातों में, नमक सा घुलना सीख गया हूँ!
आंसू पीना मुझे आ गया, घाव भी सिलना सीख गया हूँ....

भौतिक मिलन भले न हो पर, मन से मन का मिलन जरुरी!
तुम हिंसा को ठोकर मारो, मगर प्रेम का नमन जरुरी!
"देव" जहाँ में मानवता को, चलो जरुरी कर दें इतना,
जैसी दुनिया में धरती की, खातिर देखो गगन जरुरी!

सपने शीशे के होते हैं, कुछ टूटें तो गम न करना!
और अपने मन के साहस को, तुम जीते जी कम न करना!

मैं पथरीले रस्ते पर भी, खुशी पे चलना सीख गया हूँ!
आंसू पीना मुझे आ गया, घाव भी सिलना सीख गया हूँ!"

....................चेतन रामकिशन "देव".........................
दिनांक-०९.०६.२०१३

Saturday, 8 June 2013

♥♥बेदर्दी का ठोस धरातल..♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥बेदर्दी का ठोस धरातल..♥♥♥♥♥♥♥♥♥
बेदर्दी का ठोस धरातल, इन अश्कों से नहीं पिघलता!
बदकिस्मत लोगों के घर में, खुशी का सूरज नहीं निकलता!
इस दुनिया से तुम कितनी भी, मिन्नत करना अपनायत की,
लेकिन जिनका दिल पत्थर हो, उनका आंसू नहीं निकलता!

लोग सड़क पर घायल होकर, तड़प तड़प कर मर जाते हैं!
पर पत्थर के लोग दया की, कहाँ इनायत कर पाते हैं!

मजलूमों पर जुल्म देखकर, खून भी इनका नहीं उबलता!
बेदर्दी का ठोस धरातल, इन अश्कों से नहीं पिघलता...

सही आदमी के चेहरे पर, गम की काई चढ़ जाती है!
और पीड़ा की घनी लिखावट, नई कहानी गढ़ जाती है!
सुनो "देव" यूँ तो दुनिया में, हर इन्सां को दर्द है लेकिन,
बिना जुर्म के सजा मिले तो, चीख दर्द की बढ़ जाती है!

ये अँधा कानून किसी का, रोता मुखड़ा देख सके न!
कभी किसी के टूटे दिल का, जलता दुखड़ा देख सके न!

कभी कभी ये दर्द का मौसम, अंतिम पल तक नहीं बदलता!
बेदर्दी का ठोस धरातल, इन अश्कों से नहीं पिघलता!"

.....................चेतन रामकिशन "देव".....................
दिनांक-०९.०६.२०१३

Friday, 7 June 2013

♥♥♥सुलगता दिल..♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥सुलगता दिल..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
गमों से दिल सुलगता है, सुलगने दो, सुलगने दो!
मेरी आँखों से तुम अब, दर्द का सैलाब गिरने दो!
जो तपता है, जो जलता है, वही कुंदन सा बन पाए,
गमों की आग में मुझको, जरा दिन रात जलने दो!

जो डरकर हार से, आँखों के सपने तोड़ देते हैं!
कहाँ हैं वो आदमी होंगे, जो जीना छोड़ देते हैं!

नया दिन फिर से निकलेगा, जरा ये रात ढलने दो!
गमों से दिल सुलगता है, सुलगने दो, सुलगने दो...

अंधेरों से उजालों का, सफर हर रोज होता है!
कोई खुशियों का पाता है, कहीं एहसास रोता है!
सुनो हम "देव" इस दुनिया को, आखिर क्या सिखायेंगे,
वही नेकी पढाता है, यहाँ कातिल जो होता है!

अगर तुम खुद जरा संभलो, तो ये हालात बदलेंगे!
अंधेरों में भी ज्योति के यहाँ, एहसास निकलेंगे!

चलो कुछ देर को मुझको, जरा खुद से ही मिलने दो!
गमों से दिल सुलगता है, सुलगने दो, सुलगने दो!"

....................चेतन रामकिशन "देव".......................
दिनांक-०८.०६.२०१३

Thursday, 6 June 2013

♥♥दर्द के गहरे घाव ..♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥दर्द के गहरे घाव ..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तुम जो मेरी आंख से बहता, अश्कों का सैलाब समझते!
मेरे लफ्ज़ भी नहीं बिलखते, जो तुम उनका भाव समझते!
दवा से ज्यादा दुआ तुम्हारी, असर मेरे ज़ख्मों पे करती,
गर तुम मेरे दिल में शामिल, दर्द के गहरे घाव समझते!

बिन महसूस किये तुम मेरा, दर्द भला क्या सुन सकते हो! 
तुम मेरे जीवन के पथ से, कांटे कैसे चुन सकते हो!

नहीं काटते मेरी जड़ को, जो मेरा फैलाव समझते!
तुम जो मेरी आंख से बहता, अश्कों का सैलाब समझते...

बहुत सरल है ये कहना के, तुम खुद को समझाकर देखो!
गला दर्द से रुंधा हो लेकिन, गीत खुशी के गाकर देखो!
इस दुनिया में "देव" किसी की, चोट तभी तुम समझ सकोगे,
जब तुम जलती धूप में तपकर, दर्द को खुद अपनाकर देखो!

ये दिल के एहसास ही तो हैं, जो दूरी को कम करते हैं!
जो गैरों की चोट देखकर, अपनी आँखों नम करते हैं!

तुम भी रोते तन्हाई में, गर अपना बरताव समझते!
तुम जो मेरी आंख से बहता, अश्कों का सैलाब समझते!"

.................चेतन रामकिशन "देव".................
दिनांक-०६.०६.२०१३

Tuesday, 4 June 2013

♥♥दिल के टुकड़े..♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥दिल के टुकड़े..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥ 
सांसें भी भारी भारी हैं, अधर धूप से चटक रहे हैं!
और हमारे दिल के देखो, टुकड़े होकर छिटक रहे हैं!
कभी किसी से अपनेपन में, हमने सच को सच बोला तो,
वो कहते हैं मेरे सच को, हम रस्ते से भटक रहे हैं!

लगता है के हमदर्दी की, आस लगाकर भूल हो गयी!
जीवन में जो हरियाली थी, वो इक पल में शूल हो गयी!

गैरों की तो बात छोड़िये, अपनों को हम खटक रहे हैं!
सांसें भी भारी भारी हैं, अधर धूप से चटक रहे हैं.....

बड़ा बड़ा क्या लिखना जब तक, सीने में दिल बड़ा नहीं हो!
वो आंखे किस काम जिसमे, प्रेम का मोती जड़ा नहीं हो!
"देव" यहाँ पर उस मानव को, किन शब्दों से अपना लिखूं,
जो जीवन के बुरे वक़्त में, साथ हमारे खड़ा नहीं हो!

दुनिया का ये हाल रहा तो, प्यार जहाँ से मिट जायेगा!
और जहाँ से अपनेपन का, एक एक पौधा कट जायेगा!

वो क्या देंगे मुझे सहारा, हाथ जो मेरा झटक रहे हैं!
सांसें भी भारी भारी हैं, अधर धूप से चटक रहे हैं!"

.................चेतन रामकिशन "देव"..................
दिनांक-०५.०६.२०१३

♥♥गम की काली रात ..♥♥

♥♥गम की काली रात ..♥♥
गम की काली रात न आये!
ज़ख्मों की सौगात न आये!
यही दुआ है, मुझे रुलाने,
अश्कों की बरसात न आये!

एक अकेली जान हूँ आखिर,
इतना दर्द सहूँ मैं कब तक!
पलक मेरी भी छलनी होतीं,
आंसू बनकर बहूँ मैं कब तक!
दर्द के गहरे अँधेरे में,
आसपास का कुछ नहीं दिखता,
अँधेरे में सहम सहम कर,
इस तरह से रहूँ मैं कब तक!

खुशी का रस्ता देख रहा हूँ,
मगर खुशी भी हाथ न आये!
यही दुआ है, मुझे रुलाने,
अश्कों की बरसात न आये...

दुनिया लेकिन पत्थर दिल है,
दर्द किसी का कब सुन पाये!
जब होता है बुरा वक़्त तो,
अपना कोई पास न आये!
"देव" यहाँ पर जिसको मैंने,
अपने दिल का हाल बताया,
उस इन्सां को मेरी तड़प का,
हाल जरा भी समझ न आये!

मार नहीं सकता मैं खुद को,
पर जिन्दा भी रहा न जाये!
यही दुआ है, मुझे रुलाने,
अश्कों की बरसात न आये!"

...चेतन रामकिशन "देव"..
दिनांक-०४.०६.२०१३

Monday, 3 June 2013

♥♥♥गम की जडें..♥♥♥

♥♥♥गम की जडें..♥♥♥
दुख की भरी दुपहरी है पर,
जड़ें गमों की काट रहा हूँ!
तन्हाई में साथ रहे जो,
कुछ ऐसे पल छांट रहा हूँ!
इस दुनिया ने भले ही मुझको,
कभी प्यार से नहीं पुकारा,
मगर मैं फिर भी इस दुनिया को,
प्यार के लम्हें बाँट रहा हूँ!

नहीं पता के सच से मुझको,
आखिर क्या हासिल होता है!
वो क्या समझे किसी के आंसू,
जिसका पत्थर दिल होता है!
और ये देखो, इस दुनिया के,
लोगों का है अजब नजरिया,
उसी को अच्छा कहते हैं सब,
जो देखो कातिल होता है!

कभी कभी भलमनसाहत पर,
मैं खुद ही डांट रहा हूँ!
दुख की भरी दुपहरी है पर,
जड़ें गमों की काट रहा हूँ...

मुझको खुद से गिला नहीं है,
नजरें खुद से मिला रहा हूँ!
अपनी आँखों के अश्कों से,
बंजर में गुल खिला रहा हूँ!
"देव" यकीं है एक दिन मुझको,
पत्थर जैसे दिल पिघलेंगे,
इसीलिए मैं उम्मीदों के,
दीपक दिल में जला रहा हूँ!

बुरे वक़्त में अपने दिल को,
सूखी शबनम बाँट रहा हूँ!
दुख की भरी दुपहरी है पर,
जड़ें गमों की काट रहा हूँ!"

...चेतन रामकिशन "देव"..
दिनांक-०४.०६.२०१३

♥♥♥सूखा बादल...♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥सूखा बादल...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
दर्द बाँटने निकला हूँ मैं, मगर किसी ने लिया नहीं है!
मेरी आंख का बहता आंसू, कभी किसी ने पिया नहीं है!
यूँ तो मुझको बहुत मिले हैं, अपनायत दिखलाने वाले,
मगर किसी ने मेरे दर्द का, घाव जरा भी सिया नहीं है!

आसमान में चाँद देखकर, भले मेरे दिल मुस्काता है!
लेकिन झूठी हंसी का आलम, पलकों पे आंसू लाता है!

कभी किसी ने मेरे दुःख को, यहाँ भरोसा दिया नहीं है!
दर्द बाँटने निकला हूँ मैं, मगर किसी ने लिया नहीं है...

उसने ही मुंह मोड़ लिया है, जिससे मैंने आस रखी है!
वो निकला बस सूखा बादल, जिससे मैंने प्यास रखी है!
"देव" जहाँ में जिसको मैंने, हरियाली का वन समझा था,
उस इन्सां ने मेरे पथ में, गम की सूखी घास रखी है!

दर्द भरी इस तन्हाई का, वक़्त न जाने कब तय होगा!
नहीं पता के इस जीवन से, दुख का जाने कब क्षय होगा!

कभी किसी ने घने तिमिर में, यहाँ उजाला किया नही है!
दर्द बाँटने निकला हूँ मैं, मगर किसी ने लिया नहीं है!"

...................चेतन रामकिशन "देव".....................
दिनांक-०३.०६.२०१३

Sunday, 2 June 2013

♥♥शब्दों की मधुरम वाणी...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥शब्दों की मधुरम वाणी...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
शब्दों की मधुरम वाणी का, एक उज्जवल प्रकाश तुम्हीं हो!
मेरे प्रेम के पंछी मन का, सखी सुनो आवास तुम्हीं हो!

मेरे मन के भावों का भी, अलंकरण तुमसे होता है,
इस जीवन में हंसी खुशी का, सखी सुनो आभास तुम्हीं हो!

ये सच है के इस जग में, अब प्रेम का वो स्थान नहीं है!
किन्तु फिर भी बिना प्रेम के, मानव का कल्याण नहीं है!

तुम्ही मिलन की अनुभूति हो, और विरह वनवास तुम्हीं हो!
शब्दों की मधुरम वाणी का, एक उज्जवल प्रकाश तुम्हीं हो....

सखी लाज तेरा गहना है, छुईमुई जैसी लगती हो!
सखी हमारी प्रतीक्षा में, रात रात भर तुम जगती हो!
सखी तुम्हारे प्रेम ने मेरे, सूने मन में रंग भरे हैं,
अपने कोमल हाथों पर तुम, प्रेम भरी मेहँदी रचती हो!

तुमको जबसे प्रेम किया है, मानवता मन में आई है!
सखी तुम्हारे प्रेम ने देखो, मेरी दुनिया महकाई है!

सखी तुम्हीं सावन की बारिश, सतरंगी आकाश तुम्हीं हो!
शब्दों की मधुरम वाणी का, एक उज्जवल प्रकाश तुम्हीं हो...

सखी तुम्हारे प्रेम में देखो, किंचित भी अभिमान नहीं है!
बिना प्रेम के इस जीवन में, मानव का सम्मान नहीं है!
"देव" जहाँ में प्रेम की युक्ति, करती है मिट्टी को सोना, 
इस दुनिया में प्रेम से बढ़कर, कोई मीठा गान नहीं है!

सखी तुम्हारी प्रीत ने मुझको, जिस दिन से भी गले लगाया!
तब से मेरे जीवन पथ में, खुशी का हर पल झोंका आया! 

सखी तुम्हीं शीतल जलधारा और हरियाली घास तुम्हीं हो!
शब्दों की मधुरम वाणी का, एक उज्जवल प्रकाश तुम्हीं हो!"


"
प्रेम-जिससे भी होता है, वो मानव, प्रेम करने वाले व्यक्तित्व में सब कुछ निहित कर देता है, वो कभी उसे प्रकृति की शीतल जल-धारा से जोड़ता है तो कभी हरियाली से, कभी चद्रमा के मुख से तो कभी कोयल की बोली से! सचमुच, प्रेम एक ऐसा विषय है, जिसके लिए सभी की अपनी अपनी परिभाषा हैं, मगर हर परिभाषा का उद्देश्य कथन प्रेम ही है, तो आइये प्रेम का अंगीकार करें!"
  

.............चेतन रामकिशन "देव"..............
दिनांक-०३.०६.२०१३
"सर्वाधिकार सुरक्षित"
"मेरी ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित."

Saturday, 1 June 2013

♥♥धुआं धुआं सा..♥♥

♥♥♥धुआं धुआं सा..♥♥♥♥
धुआं धुआं सा छंट जाने दो!
गम की खाई पट जाने दो!
फिर से नया सवेरा होगा ,
अंधकार को हट जाने दो!

भले फिसल कर गिर जाओ तुम,
लेकिन अपने कदम बढ़ाओ!
जीवन की अंतिम साँसों तक,
अपना साहस नहीं मिटाओ!
कभी हार है, कभी जीत है,
जीवनपथ का यही नियम है,
तुम मन में आशायें लेकर,
सही दिशा में बढ़ते जाओ!

तुम नफरत की शिरा को देखो,
अपने मन से कट जाने दो!
फिर से नया सवेरा होगा ,
अंधकार को हट जाने दो...

उम्मीदों की धवल चांदनी,
नीरसता को दूर करेगी!
और हमारी हिम्मत देखो,
हर मुश्किल को चूर करेगी!
इस दुनिया में "देव" जो हमने,
खुद को इन्सां बना लिया तो,
फिर औरों की खुशी भी देखो,
अपने मन में नूर करेगी!

अपने मन को मानवता को,
पूरी पोथी रट जाने दो!
फिर से नया सवेरा होगा ,
अंधकार को हट जाने दो!"

...चेतन रामकिशन "देव"...
दिनांक-०२.०६.२०१३

Friday, 31 May 2013

♥♥एहसासों का सागर.♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥एहसासों का सागर.♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
बूंद बूंद भर एहसासों का, एक सागर मैं बना रहा हूँ!
अपनी आँखों को सपनों की, एक एक सीढ़ी गिना रहा हूँ!
इस दुनिया के लोग तो देखो, मूक-बधिर जैसे बन बैठे,
इसीलिए अपनी पीड़ा को, मैं खुद को ही सुना रहा हूँ!

कुछ सपने बेशक टूटे हैं, लेकिन हार नहीं मानी है!
मैंने अपने प्रयासों में, शामिल कमियां पहचानी हैं!

न मैं अवसरवादी बनकर, कोई अवसर भुना रहा हूँ!
बूंद बूंद भर एहसासों का, एक सागर मैं बना रहा हूँ...

गम की भारी वर्षा में भी, सुख की आस नहीं खोते हैं!
जो मंजिल की चाह में देखो, मन की नींद नहीं सोते है!
"देव" वही इंसान जहाँ में, इतिहासों की रचना करते,
जो बे-संसाधन होकर भी, पथ से दूर नहीं होते हैं!

हाँ सच है के ये जीवनपथ, हर पल ही आसान नहीं है!
बिना त्याग के पर जीवन की, किंचित भी पहचान नहीं है!

अपने अधरों से कानों को, गीत विजय का सुना रहा हूँ!
बूंद बूंद भर एहसासों का, एक सागर मैं बना रहा हूँ!"

..................चेतन रामकिशन "देव"..................
दिनांक-०१.०६.२०१३






  

Thursday, 30 May 2013

♥♥♥झील सी तेरी आँखे..♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥झील सी तेरी आँखे..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तेरी गहरी झील सी आँखों में, खोना अच्छा लगता है !
मुझे तेरे कंधे पर सर रखकर, सोना अच्छा लगता है!
तुमको छूकर, तुम्हें देखकर, मन को गहरी राहत मिलती,
सखी तुम्हारे साथ में सपनों को, बोना अच्छा लगता है!

तू सुन्दर है तन से हमदम, और मन से भी निखरी है तू!
इन फूलों पर, हरियाली पर, शबनम बनकर बिखरी है तू!

इस दुनिया में बस मुझको, तेरा होना अच्छा लगता है!
तुमको बाहों में भरकर के, हमदम सोना अच्छा लगता.."

अंगारों जैसी दुनिया में, तुम फूलों जैसी कोमल हो!
रेगिस्तानी धूप में हमदम, तुम गंगा का शीतल जल हो!
"देव" तुम्हारी प्रीत ने मुझको, मानवता के भाव दिए हैं,
तुम उर्जा हो, तुम्ही प्रेरणा, तुम्हीं हमारे मन का बल हो!

अंतर्मन में किया उजाला, ऐसी सुन्दर ज्योति हो तुम!
और सीपी की गहराई से, मिलने वाला मोती हो तुम!

तेरी पायल की रुनझुन में, गुम होना अच्छा लगता है!
तेरी गहरी झील सी आँखों में, खोना अच्छा लगता है !"

..................चेतन रामकिशन "देव"...................
दिनांक-३१.०५.२०१३

Tuesday, 28 May 2013

♥♥गगन का सूर्य .♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥गगन का सूर्य .♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
गगन का सूर्य बन जाओ, उजाला हर तरफ कर दो!
मोहब्बत का दीया बनकर, जहाँ में प्यार तुम भर दो!
बनो ऐसे के दुनिया में, खुशी दे पाओ लोगों को,
जो मरकर याद आओ तुम, यहाँ खुद को अजर कर दो!

गमों की आंच में तपकर, हमें हिम्मत बढ़ानी है!
कभी हँसना है जोरों से, कभी आँखों में पानी है!

जो तुम छा जाओ दुनिया पर, चलो ऐसा हुनर कर दो!
गगन के सूर्य बन जाओ, उजाला हर तरफ कर दो...

बनाकर दिल को पत्थर सा, नहीं इंसान बन सकते!
किसी मुफलिस के चेहरे की, नहीं मुस्कान बन सकते!
जरा तुम "देव" खुद को आईने में, झांककर देखो,
सफर काँटों के मेहनत बिन, नहीं आसान बन सकते!

कभी तुम हार के डर से, इरादे तोड़ न देना!
कभी हाथों से मेहनत के हुनर को, छोड़ न देना!

निशां बन जायें कदमों के, चलो इतना असर कर दो!
गगन के सूर्य बन जाओ, उजाला हर तरफ कर दो!"

....................चेतन रामकिशन "देव"....................
दिनांक-२९.०५.२०१३

Sunday, 26 May 2013

♥♥प्रेम-गीत..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्रेम-गीत..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
गीत गुनगुनाना चाहता हूँ, यदि हमारा गीत बनो तुम!
तुम बनकर एहसास हमारे, सखी हमारी मीत बनो तुम!
बिना तुम्हारे धूप की गर्मी, मेरे तन को जला रही है,
तुम ही छाया बनो वृक्ष की, तुम ही वर्षा, शीत बनो तुम!

इस जीवन के पथ पर देखो, जिस दिन हम तुम मिल जायेंगे!
उस दिन देखो जीवन पथ में, फूल खुशी के खिल जायेंगे!

मस्तक मेरा उठ जायेगा, यदि हमारी जीत बनो तुम!
गीत गुनगुनाना चाहता हूँ, यदि हमारा गीत बनो तुम...

तुम संग नया सवेरा, साँझ खुशी से भर जाएगी!
सखी तुम्हारे रूप में देखो, कुदरत मेरे घर आएगी!
तुम जब साथ रहोगी तो फिर, मुश्किल से घबराना कैसा,
देख तुम्हारे दिव्य रूप को, मुश्किल देखो डर जाएगी!

अनुभूति के सागर तट पर, हम लहरों से मिलन करेंगे!
हम दोनों एक दूजे का दुःख, सहज भाव से सहन करेंगे!

गीत मेरा दिल को छू लेगा, यदि मेरा संगीत बनो तुम!
गीत गुनगुनाना चाहता हूँ, यदि हमारा गीत बनो तुम...

प्रेम का अर्थ नहीं के इसमें, मीत का ही भूषण होता है!
प्रेम तो जग में हर मानव के, मन का आभूषण होता है!
"देव" प्रेम की खुश्बू से तुम, अपने मन को भरकर देखो,
प्रेम की युक्ति से मानव की, खुशियों का पोषण होता है!

मानवता से प्रेम का जिस दिन, देखो दीपक जल जाता है!
उस दिन हिंसा, छुआछुत का, जलता सूरज ढल जाता है!

घृणा सारी मिट जाएगी, प्रेम की व्यापक रीत बनो तुम!
गीत गुनगुनाना चाहता हूँ, यदि हमारा गीत बनो तुम!"

"
प्रेम-जहाँ परस्पर प्रेम होता है, वो प्रेम चाहें, प्रेमी-प्रेमिका के मध्य हो, या मानव और मानव के मध्य, वहां हिंसा, घृणा, छुआछुत का कोई स्थान नहीं होता! प्रेम, जहाँ परस्पर समर्पण भाव से होता है, वहां लोग अभावों में भी अपने जीवन को हंसकर जीते हैं! तो आइये अपने मन को प्रेम से भूषित करें!"

..चेतन रामकिशन "देव"..
दिनांक-२७.०५.२०१३

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