Thursday, 6 February 2014

♥♥जंग भले ही जीती मैंने...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥जंग भले ही जीती मैंने...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
जंग भले ही जीती मैंने, किसी के दिल को जीत न पाया!
वजह से मेरी लोग रो रहे, लेकिन मुझको तरस न आया!
मैं इंसां की खाल में हूँ पर, शायद मैं इंसान नही हूँ,
इसीलिए तो मुझसे मिलकर, एक चेहरा भी न मुस्काया! 

खुद को जब शीशे में देखा, नजर मिलाना भी मुश्किल था!
मौन अवस्था में पहुंचा दिल, जिसको समझाना मुश्किल था!

वक़्त का पहिया देखो यारो, ख़ुशी का कोई पल न लाया!
जंग भले ही जीती मैंने, किसी के दिल को जीत न पाया...

मजलूमों के खून से रंगकर, हाथ बड़ा ही इतराता था!
मैं लोगों की फूंक झोपड़ी, हौले हौले मुस्काता था!
चीख सुनी न कभी किसी की, आह तलक अनदेखा करके,
कदम के नीचे रौंद के सबको, अपना लोहा मनवाता था!

भले बना मैं यहाँ शहंशाह, लेकिन दिल को सुकूं न आया!
जंग भले ही जीती मैंने, किसी के दिल को जीत न पाया...

इसीलिए मैं पछतावे की, आग में हर लम्हा जलता हूँ!
वक़्त मुझे जैसा भी रखता, वक़्त के रंग में मैं ढलता हूँ!
"देव" नहीं तुम जुल्म ढहाकर, कभी विजेता बन सकते हो,
खाली हाथ यहाँ आया था, खाली हाथ वहाँ चलता हूँ!

सोच के मैं नाखुश होता हूँ, क्यूँ पहले मैं समझ न पाया!
जंग भले ही जीती मैंने, किसी के दिल को जीत न पाया!"

..................चेतन रामकिशन "देव"…..................
दिनांक-०६.०२.२०१४

Wednesday, 5 February 2014

♥♥अश्क़ों की बूंदों पे तेरा...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥अश्क़ों की बूंदों पे तेरा...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
अश्क़ों की बूंदों पे तेरा, नाम लिखा है रोते रोते!
जान भी अब तो नहीं बची है, गँवा दिया सब खोते खोते!
असर तुम्हारा है इस दिल पर और लफ्ज़ों में तुम्ही वसी हो,
दिन में नाम पुकारा तेरा, ख्वाब तुम्हारे सोते सोते!

तुम बिन दिल में बेचैनी है, हँसने का भी मन नहीं होता!
नब्ज थमी है बिना तुम्हारे, जीवित जैसे तन नहीं होता!

फसल खुशी की उगे न दिल में, उम्र बीत गयी बोते बोते!
अश्क़ों की बूंदों पे तेरा, नाम लिखा है रोते रोते....

चेहरा उतरा, आँखे सूजी, बाल भी मेरे बिखर रहे हैं!
ख़त्म हो गई बचत खुशी की, दर्द के सिक्के निखर रहे हैं!
बिना तुम्हारे नूर नहीं है, भाव पक्ष भी जड़वत सा है,
सजे थे कल तक जिस शीशे में, आज उसी को अखर रहे हैं!

नहीं सँवरता बिना तुम्हारे, तन भी अब रूठा रहता है!
मेरी अंगूठी का नग देखो, बिना तेरा टूटा रहता है!

दर्द से झुलसा मुख न निखरे, हुए हैं घंटो धोते धोते!
अश्क़ों की बूंदों पे तेरा, नाम लिखा है रोते रोते....

कभी जरा सा वक़्त मिले तो, मेरी दुनिया में भी आना!
गोद में रखना मेरे सर को, चुपके चुपके मुझे सुलाना!
"देव" भले ही तेरे कद से, मेरी हैसियत बौनी है पर,
जब तुम मेरे पास में आओ, तो मेरे रंग में रंग जाना!

चंद लम्हों का साथ तुम्हारा, जीवन में खुशियां भर देगा!
हाथ तुम्हारा मुझको छूकर, मिट्टी को सोना कर देगा!

प्यार बनेगा अमर हमारा, धीरे धीरे होते होते!
अश्क़ों की बूंदों पे तेरा, नाम लिखा है रोते रोते!"

..................चेतन रामकिशन "देव"…..................
दिनांक-०५.०२.२०१४

Tuesday, 4 February 2014

♥♥जब जी चाहा...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥जब जी चाहा...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
जब जी चाहा दिल तोड़ा है, जब जी चाहा मन कुचला है!
कभी सजाया गुलदस्ते में, कभी हमारा तन कुचला है!
खुद का दामन पाक बताकर, कहते हैं नापाक मुझे वो,
कभी उजाड़ा फुलवारी को, कभी ख़ुशी का वन कुचला है!

नहीं पता इतनी बेदर्दी, कैसे दिल में भर लेते हैं!
लोग यहाँ अपने हाथों से, क़त्ल किसी का कर लेते हैं!
झूठे आंसू खूब बहाकर, दिखलायें झूठा अपनापन,
लोग यहाँ अपने मतलब में, प्यार का सौदा कर लेते हैं!

कोई सुने न चीख किसी की, कानों में शीशा पिघला है!
जब जी चाहा दिल तोड़ा है, जब जी चाहा मन कुचला है!

लोग यहाँ पत्थर बनकर के, दिल का शीशा चटकाते हैं!
अपनी राहें सही करेंगे, पर लोगों की भटकाते हैं!
"देव" न जाने क्यूँ दुनिया की, नजर में है बेजान मेरा दिल,
दुनिया वाले मेरे दिल को, ठोस सड़क पर छिटकाते हैं!

नहीं संभाला मुझे किसी ने, पैर मेरा जब भी फिसला है!
जब जी चाहा दिल तोड़ा है, जब जी चाहा मन कुचला है!"

..................चेतन रामकिशन "देव"…..................
दिनांक-०४.०२.२०१४

Monday, 3 February 2014

♥♥ये मन तो...♥♥

♥♥♥♥ये मन तो...♥♥♥♥
आँच में तपकर काजल जैसा!
कभी सौम्य गंगाजल जैसा!
कभी वो सोचे पृथ्वी तल को,
कभी खड़ा विंध्याचल जैसा!

ये मन तो ऐसा ही होता,
पल में मिट्टी, पल में सोना!
मन चाहता है कभी हँसी तो,
कभी कहे मन खुलकर रोना!

कभी पिता के साये में मन,
कभी है माँ के आँचल जैसा!
कभी वो सोचे पृथ्वी तल को,
कभी खड़ा विंध्याचल जैसा!

जीत है मन से, हार है मन से!
नफरत मन से, प्यार है मन से!
मन से हिम्मत, मन से साहस,
दृढ़ता का आधार है मन से!

कभी सख्त है वो पत्थर सा,
कभी लचीला, ढ़ुलमुल जैसा!
कभी वो सोचे पृथ्वी तल को,
कभी खड़ा विंध्याचल जैसा!

मन चंचल है, मन धावक है, 
लेकिन इसे नियंत्रित करना!
"देव" कभी तुम मन की खातिर,
द्वेष, लोभ न मिश्रित करना!

सजा दिलाकर उड़ भी जाये,
कभी ये सूखे बादल जैसा!
कभी वो सोचे पृथ्वी तल को,
कभी खड़ा विंध्याचल जैसा!"

....चेतन रामकिशन "देव"….
दिनांक-०३.०२.२०१४

Friday, 31 January 2014

♥♥हौले-हौले...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥हौले-हौले...♥♥♥♥♥♥♥♥
रात सुनसान है हौले से जरा बात करें!
चोरी चोरी चलो चुपके से मुलाकात करें!

प्यार से रंग दें जमीं और ये अम्बर हमदम,
प्यार के रंग से रोशन, ये कायनात करें!

अपनी चाहत न जले, आग में जुदाई की,
साथ मिलकर के जुदाई की चलो मात करें!

अपने दिल की ये जमीं, प्यार बिना सूखे नहीं,
रात दिन प्यार की मीठी, चलो बरसात करें!

आँख से आँख मिलें और रहें लब चुप चुप,
होके खामोश भी आपस में सवालात करें!

चाहतें देख के सीखे ये जमाना उल्फत,
प्यार से पैदा चलो अपने वो हालात करें!

"देव" ये प्यार हमें देगा, रूह की खुशियां,
आज काँटों पे भले, प्यार की शुरुआत करें!"

...........चेतन रामकिशन "देव"….........
दिनांक-३१.०१.२०१४

Tuesday, 28 January 2014

♥♥तुम पिता हो मेरे..♥♥

♥♥♥♥♥♥♥तुम पिता हो मेरे..♥♥♥♥♥♥♥♥
तुम पिता हो मेरे, रब जैसी शान धरती पर!
आपके नाम से पहचान मेरी धरती पर!
खून से अपने पसीने से मुझे सींचा है,
तुमसे हर राह है आसान मेरी धरती पर!

कभी गलती पे पिता, तुमने हमें डाँटा है!
प्यार हर हाल में पर, तुमने यहाँ बाँटा है!
तुमने हर पल ही मेरे पथ में फूल बरसाये,
चुन लिया राह से मेरी, जो अगर काँटा है!

तुमसे होठों पे है, मुस्कान मेरी धरती पर!
तुम पिता हो मेरे, रब जैसी शान धरती पर!

माँ तो माँ है के पिता भी, नहीं कम होता है!
देखके बच्चों का दुख, उसको भी गम होता है!
"देव" बच्चों को कोई, न तड़प मिले उसके,
बस यही सोच यही, उसका करम होता है!

तुमसे खुशियों की पिता खान, यहाँ धरती पर!
तुम पिता हो मेरे, रब जैसी शान धरती पर!"

...........चेतन रामकिशन "देव".............
दिनांक-२८.०१.२०१४ 

"
मेरे स्वर्गीय पिता स्व. रामकिशन जी को समर्पित शब्द भाव, धरती पर रब जैसा होता है पिता, पिता को नमन "

♥♥प्यार की निशानी..♥♥

♥♥♥♥♥♥♥प्यार की निशानी..♥♥♥♥♥♥♥♥
मेरी बेचैन निगाहों को तुम सताती हो !
सामने आऊँ तो पलकों को तुम झुकाती हो!

जब नहीं मिलता मैं तुमसे तो बेक़रारी में,
मेरी तस्वीर को सीने से तुम लगाती हो!

प्यार है मुझसे तुम्हें, कहने मैं ये डर कैसा, 
नाम सुनकर के मेरा, तुम क्यूँ चौंक जाती हो!

बात मैं तेरी सहेली से, कभी करता जो,
बड़ी मायूसी में गुस्से से, मुँह बनाती हो!

कहना चाहती हो मगर लफ्ज़ नहीं फूटें तो,
अपनी ख़ामोशी से हर बात कहे जाती हो!

मुझको देने के लिए प्यार की निशानी में,
एक रुमाल पे तुम फूल को सजाती हो!

"देव" तुम दिन में मेरे घर में उजाला लाओ,
रात में चांदनी बनकर के, उतर जाती हो!"

...........चेतन रामकिशन "देव"….......
दिनांक-२८.०१.२०१४

Monday, 27 January 2014

♥♥♥तंज...♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥तंज...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तोड़के दिल मेरा अब लोग हँसा करते हैं!
मेरे अपने ही मुझे तंज कसा करते हैं!

उनकी आँखों में चुभें झोपड़ी गरीबों में,
लोग दौलत का यहाँ इतना नशा करते हैं!

आज उस मुल्क की दीवार पे खूँ के छींटे,
जहाँ पत्थर में भी भगवान वसा करते हैं!

बेटा जन्मा तो लोग जश्न मनाने निकले,
और बेटी के गले फंदा कसा करते हैं!

वक़्त जब आये बुरा, तो नहीं चलती खुद की,
जाल में बाज के जैसे भी फँसा करते हैं!

उसको मिट्टी की शरारत का तजुर्बा होता,
पांव जिसके यहाँ दलदल में धँसा करते हैं!

"देव" मुझको न गिला तुमसे कोई शिक़वा है,
लोग पहले यहाँ अपनों को डसा करते हैं! "

...........चेतन रामकिशन "देव"….......
दिनांक-२७.०१.२०१४

Sunday, 26 January 2014

♥♥दो घड़ी को ही...♥♥

♥♥♥♥♥♥दो घड़ी को ही...♥♥♥♥♥♥♥♥
दो घड़ी को ही सही, वक़्त निकाला होता!  
मेरे गिरते हुए क़दमों को संभाला होता!

तेरे एहसास से ही, मुझको ख़ुशी मिल जाती,
मेरे जज़्बात को गर, तुमने जो पाला होता!

उम्र भर तेरे हुस्न की, मैं कदर करता पर,
कोयले जैसा तेरा दिल, नहीं काला होता!

नाम बेटों से भी ऊँचा वो जहाँ में करती,
तुमने बेटी को अगर शौक से पाला होता!

जिनको एहसास नहीं वो क्या समझते दुख को, 
उनके क़दमों में अगर दिल को भी डाला होता!

कमी औरों से भी ज्यादा तुम्हे लगती खुद की,
अपने दिल को जो कभी तुमने खंगाला होता!

"देव" तुम जानते क्या होती तड़प चाहत की,
तेरे दिल में भी अगर दर्द का छाला होता!"

...........चेतन रामकिशन "देव"….........
दिनांक-२6.०१.२०१४

Friday, 24 January 2014

♥♥बीते हुए लम्हे..♥♥

♥♥♥♥♥♥♥बीते हुए लम्हे♥♥♥♥♥♥♥♥
जब भी बीते हुए लम्हों पे नजर जाती है!
ख्वाब की दुनिया पुरानी सी नजर आती है!

बड़ी मेहनत से उजालों को पनाह दी मैंने,
और हवा पल में चरागों की लौ बुझाती है!

कौन समझेगा यहाँ नाते, वफ़ा, अपनापन,
अब तो दौलत की धुंध रिश्तों पे छा जाती है!

दिन तो कट जाता है रोटी की जुगत में लेकिन,
हाँ मगर रात ये पीड़ा की ग़ज़ल गाती है!

तोड़कर दिल मेरा न उनको कोई दुख पहुंचे,
मेरे होठों से मगर आह निकल जाती है!

कैसे जीते हैं वो मुफ़लिस जरा पूछो उनसे,
जिनके आंगन में दीया और नहीं बाती है!

"देव" मैं अपनी उम्र, जिनकी याद में जीता,
क्या खबर उनको मेरी याद, कभी आती है!"

..........चेतन रामकिशन "देव"…........
दिनांक-२४.०१.२०१४

Tuesday, 21 January 2014

♥♥♥ज़ख्मों की दवा...♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥ज़ख्मों की दवा...♥♥♥♥♥♥♥♥
हम तो तेज़ाब से ज़ख्मों की दवा करते हैं!
तू नही तो तेरी यादों से वफ़ा करते हैं!

रात दिन तूने हमें दर्द, बद्दुआ बख्शी,
हम तेरी वास्ते लेकिन के, दुआ करते हैं!

अपनी तन्हाई में हम तेरे ख्यालों को बुला,
तेरी तस्वीर को हौले से छुआ करते हैं!

जिंदा इंसान की न हमको कदर है लेकिन,
पूजके हम भले पत्थर को खुदा करते हैं! 

किसी इंसान के ज़ज्बात को कुचलकर के,
जिस्म को लोग यहाँ जां से जुदा करते हैं!

न मिली दर्द की फसलों की हमें लागत भी,
लोग हर हाल में अपना ही नफ़ा करते हैं!

"देव" ये लोग शराबों पे रकम फूंके पर,
किसी भूखे को मगर घर से दफ़ा करते हैं!"

...........चेतन रामकिशन "देव"…........
दिनांक-२१.०१.२०१४

Sunday, 19 January 2014

♥♥माँ का आँचल ...♥♥

♥♥♥♥♥माँ का आँचल ...♥♥♥♥♥
अपने हाथों से मेरे केश संवारे माँ ने!
मेरे बिगड़े हुए सब काम सुधारे माँ ने!
माँ के हाथों की छुअन में तो एक जादू है,
मेरे दामन में जड़े देखो सितारे माँ ने!  

माँ के आँचल में मेरी, रात, सहर होती है!
माँ को हर लम्हा मेरी कितनी फिकर होती है!

मेरी खुशियों को किये दुख में गुजारे माँ ने!
अपने हाथों से मेरे केश संवारे माँ ने.....

माँ मुझे प्यार बहुत, मुझको दुआ देती है!
माँ घुटन में भी मुझे देखो हवा देती है!
मेरे दुख दर्द में ममता का सहारा देकर,
मेरे हर मर्ज़ में माँ मुझको दवा देती है!

दर्द के साये मेरे सर से उतारे माँ ने!
अपने हाथों से मेरे केश संवारे माँ ने....

सारी दुनिया में नहीं, माँ सा है किरदार कोई!
नहीं देता है यहाँ, माँ की तरह की प्यार कोई!
"देव" दुनिया में अपनी माँ का दिल दुखाये जो,
उससे बढ़कर नहीं होता है, गुनहगार कोई!

जीतने को मुझे हर दांव हैं हारे माँ ने! 
अपने हाथों से मेरे केश संवारे माँ ने!"

......चेतन रामकिशन "देव"…....
दिनांक-१९.०१.२०१४

(अपनी माँ कमला देवी एवं माँ प्रेमलता जी को समर्पित)

Friday, 17 January 2014

♥♥बरसात का शोर...♥♥

♥♥♥♥♥बरसात का शोर...♥♥♥♥♥♥♥
प्यार तेरा मुझे बूंदो में नजर आता है!
मुझे बरसात का ये शोर बहुत भाता है!

जब भी पलकों में अपनी बूंद छुपाई मैंने,
तेरी जुल्फ़ों का बदन देखो भीग जाता है!

तेरे एहसास में डूबी हुयी बारिश पाकर,
मेरा हर दिन यहाँ अच्छे से गुजर जाता है!

जब झरोखे से गिरी बूंद तुझे छूती हैं,
तेरे चेहरे का कमल और निखर जाता है!

मैं हथेली पे तेरी जब भी रखूं बूंदों को,
गौर से देख मेरा नाम उभर आता है!

भीगी जुल्फ़ों में मेरे घर में जो देखूं तुमको,
चाँद आंगन में मेरे घर के उतर आता है!

"देव" चेहरे पे मेरे ताजगी बिखर जाये,
जब भी बरसात का लफ्ज़ों में जिकर आता है! "

.............चेतन रामकिशन "देव"…...........
दिनांक-१७.०१.२०१४

Thursday, 16 January 2014

♥♥♥दोस्ती...♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥दोस्ती...♥♥♥♥♥♥♥♥♥
दोस्ती प्यार के रंगों की एक निशानी है! 
नही एहसान नहीं कोई बदगुमानी है!

कोई सौदा नहीं होता है दोस्ताने में,
दोस्ती में कोई धोखा न बेईमानी है!

दोस्त सच्चे बड़ी मुश्किल से मिला करते हैं,
दोस्ती दुनिया में कुदरत की मेहरबानी है!

उसको मिल जाये यहाँ धरती पे खुदा देखो, 
दोस्त की जिसने भी दुनिया में कद्र जानी है!

जान कुर्बान तलक दोस्तों पे कर दे जो,
दोस्ती में वही जज्बा है, वो रवानी है!

फूल सरसों के खिलें दोस्तों के चेहरे पर,
दोस्ती पाक है, अम्बर सी आसमानी है!

"देव" किस्मत ने मुझे नेक दोस्त बख्शे हैं,
दोस्ती में ही मुझे जिंदगी बितानी है!"

............चेतन रामकिशन "देव"….........
दिनांक-१७.०१.२०१४

Wednesday, 15 January 2014

♥♥♥दीदार का हक़ ♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥दीदार का हक़ ♥♥♥♥♥♥♥
दर्द मासूम है धीरे से इसे, सहला दो!
मेरे कुछ गीत सुनाकर के इसे बहला दो!

दर्द के चेहरे पे देखो है जमी धूल बहुत,
अपने एहसास की बूंदों से इसे नहला दो!

नफरतों के लिए न कोई खुले दरवाजा,
प्यार तुम चारों तरफ, इतना यहाँ फैला दो!

होने को तो यहाँ देखो हैं बहुत ही अपने,
अपने दीदार का हक़ मुझको मगर पहला दो!

जब जरुरत हो तुम्हें प्यार की हवाओं की,
अपनी दिल को मेरी बस्ती में जरा टहला दो!

ये तेरे ख्वाब मुझे रात भर हँसायेंगे,
अपना आँचल मेरी आँखों पे अगर फैला दो!

"देव" आ जायेगा पल भर में सामने तेरे,
तुम हवाओं से भी मिलने की खबर कहला दो! "

...........चेतन रामकिशन "देव"…...........
दिनांक-१५.०१.२०१४

Tuesday, 14 January 2014

♥♥...बड़ी चुप चुप ♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥...बड़ी चुप चुप ♥♥♥♥♥♥♥♥♥
दिन भी खामोश था, अब रात बड़ी चुप चुप है!
आईने से भी मुलाकात बड़ी चुप चुप है!

मेरे कानों में जो घुंघरू की तरह बजती थी,
आज वो देखिये बरसात बड़ी चुप चुप है!

आदमी माने नहीं लाख भी समझाने पर,
तब से इंसानियत की जात बड़ी चुप चुप है!

जीत जाता तो मेरा जश्न मनाती दुनिया,
हो गया तनहा मैं ये, मात बड़ी चुप चुप है!

बिन दहेजों के थमी रहती यहाँ पर डोली,
घर में मुफ़लिस के, ये बारात बड़ी चुप चुप है!

नहीं मालूम हमें लेने कब चली आये,
मौत के देखो ये, सौगात बड़ी चुप चुप है!

"देव" आँखों में मेरी देख के समझ जाना,
प्यार की राह में हर बात बड़ी चुप चुप है!"

...........चेतन रामकिशन "देव"…........
दिनांक-१४.०१.२०१४

Monday, 13 January 2014

♥♥दर्द की राह...♥♥

♥♥♥♥♥दर्द की राह...♥♥♥♥♥
दर्द की राह पे जब भी सहे छाले मैंने!
अपने आंसू बड़ी हिम्मत से संभाले मैंने!

नहीं लिख सकता ग़ज़ल, गीत न कहानी मैं,
सिर्फ स्याही से किये शब्द ये काले मैंने! 

उसने ही मेरी चाहतों को बेअसर बोला,
रूह तक जिसको यहाँ की थी हवाले मैंने,

सामने देखो नयी कोंपलें निकल आयीं,
तेरे एहसास जो ये ओस में डाले मैंने!
  
भर गया खुशबु से आंगन का हर कोई कोना,
फूल जो सूखे, किताबों से निकाले मैंने!

मेरी तन्हाई में ये मुझसे बात कर लेंगे,
इसीलिए रहने दिये घर में ये जाले मैंने!

"देव" दुश्मन ने कमी कोई भी नहीं की पर,
अपनी हिम्मत से यहाँ खतरे ये टाले मैंने!"

......चेतन रामकिशन "देव"…....
दिनांक-१३.०१.२०१४

Sunday, 12 January 2014

♥♥तुम पराये हो...♥♥

♥♥♥♥♥तुम पराये हो...♥♥♥♥♥
हाँ सही है के तुम पराये हो!
पर मेरे दिल में तुम समाये हो!

अब तो उस ख़त को मुझको दे भी दो,
जिसको अरसे से तुम छुपाये हो!

है वहम मेरा या हक़ीक़त है,
क्या मुझे दिल में तुम वसाये हो!

दूर करके मैं तुम्हें जी न सकूँ,
मेरे इतने करीब आये हो!

देखकर चाँद तुमको लगता ये,
जैसे अम्बर में मुंह छुपाये हो!

घर का दरवाजा बंद करके तुम,
मेरी ग़ज़लों को गुनगुनाये हो!

"देव" अनपढ़ मैं कुछ नहीं जानूं,
प्यार तुम ही मुझे सिखाये हो! "

......चेतन रामकिशन "देव"…....
दिनांक-१२.०१.२०१४

Saturday, 11 January 2014

♥♥रिश्तों की बुनियाद...♥♥

♥♥♥♥♥♥रिश्तों की बुनियाद...♥♥♥♥♥♥♥♥
रूह के नूर से रिश्तों को जो निभाता है!
वो बिछड़ के भी हमें याद बहुत आता है!

नहीं कोहरा न उसे रात ये डिगा पाये, 
जिसे अँधेरे में जलने का हुनर आता है!

हाथ पे हाथ के रखने से न मिले मंजिल,
वही जीते जो यहाँ खुद को आजमाता है!

उसको आकाश भी रखता है अपने आँचल में,
अपनी उल्फत से जो दुनिया को जगमगाता है!

जिसका दिल टूट गया हो कभी मोहब्बत में,
उसको दुनिया में नहीं कुछ भी यहाँ भाता है!

उसे मालूम है रोटी की तड़प दुनिया में,
किसी भूखे के लिए जिसको तरस आता है! 

"देव" उस शख्स को हमदर्द नहीं कहता मैं,
मेरे ज़ख्मों पे नमक, जो भी गर लगाता है!"

............चेतन रामकिशन "देव"….........
दिनांक-११.०१.२०१४

Friday, 10 January 2014

♥♥फूल बनकर तेरे...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥फूल बनकर तेरे...♥♥♥♥♥♥♥♥
फूल बनकर तेरे आंगन में खिला करता हूँ!
दीप बनकर तेरे कमरे में जला करता हूँ!
मुझको पहचान जरा हूँ मैं वही तो हमदम,
जो तुझे रात को ख्वाबों में मिला करता हूँ!

तो अगर रोये तो मैं भी उदास रहता हूँ!
तेरे साये की तरह तेरे पास रहता हूँ!
धूप में भी मैं तेरे साथ साथ तपकर के,
रात में चांदनी जैसा लिबास रहता हूँ! 

बनके पर्दा तेरी खिड़की का, हिला करता हूँ!
फूल बनकर तेरे आंगन में खिला करता हूँ....

मैं तेरे गीत के एहसास की धुनों में हूँ!
कभी खुशियां कभी थोड़ी सी अनबनों में हूँ!
बनूँ तन्हाई में तेरी मैं, घडी की टिक टिक,
कभी शामिल तेरी जुल्फों की उलझनों में हूँ!

बनके परछाईं तेरे साथ चला करता हूँ!
फूल बनकर तेरे आंगन में खिला करता हूँ....

मैं तेरे पाओं में पायल की तरह बजता हूँ!
मैं तेरे हाथ में कंगन की तरह सजता हूँ!
"देव" आँखों में तेरी बनके मैं काजल रहता,
तेरी ऊँगली में अंगूठी की तरह सजता हूँ!

अपने चेहरे से तेरी खुशबु मला करता हूँ!
फूल बनकर तेरे आंगन में खिला करता हूँ!

............चेतन रामकिशन "देव"….........
दिनांक-१०.०१.२०१४