Thursday, 17 March 2011

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥बेबस लड़की की मोहब्बत ♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥बेबस लड़की की मोहब्बत ♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
"जिस दिन मैंने इस दुनिया में अपना पहला कदम रखा था!
माँ ने दूध दिया था मुझको, और पिता ने गोद भरा था!
घर में सब कहते फिरते थे, लक्ष्मी मेरे रूप में आई,
मेरे नाम पे ही बाबा ने, अपने घर का नाम रखा था!

आज मगर जब बड़ी हुई तो प्रेम के अंकुर फूट गए!
ये सुनते ही सारे रिश्ते, एक पल में ही टूट गए!
मेरी माँ कहती है के, बदनामी ना कर देना तुम!
लाखों का ये महल बना है है, नीलामी ना कर देना तुम!

प्यार खुदा है ये सब कहते, प्यार की पर औकात नहीं है!
अपने रहबर बनके लूटें, गैरों की कोई बात नहीं है……..♥ ♥ ♥ ♥ ♥

ये सच है के माँ ने पाला, जीने के अंदाज सिखाए!
और पिता ने गले लगाकर, सुख के संसाधन दिलवाए!
इनकी इज्ज़त करती हूँ मैं, वंदन के हूँ भाव जगाती,
पर उसको मैं कैसे भूलूं, प्यार के जिसने ख्बाव सजाए!

आज मैं उसके साथ खड़ी तो, सारे अपने रूठ गए!
आज मगर जब बड़ी हुई तो प्रेम के अंकुर फूट गए!

मेरी माँ भी कहती है के, बदनामी ना कर देना तुम!
तेरे पिता का नाम है ऊँचा, गुमनामी ना कर देना तुम!

प्यार खुदा है ये सब कहते, प्यार की पर औकात नहीं है!
दिन कटते हैं अश्कों के संग, हर्ष भरी अब रात नहीं है…..♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥

मैंने उनसे मिन्नत की है, अपने दिल का हाल बताया!
उसके बिन जीना है मुश्किल, ये उनको दर्पण दिखलाया!
वो कहते हैं एक नहीं है उसकी और ये जात हमारी,
मानवता जाति से नीची, सबने मुझको पाठ पढाया!

जातिवाद के इस बंधन से, प्रेम के धागे टूट गए!
आज मगर जब बड़ी हुई तो प्रेम के अंकुर फूट गए!

"देव" से मिलने की कोशिश और नादानी ना कर देना तुम!
कर देंगे हम हत्या तेरी, बदनामी ना कर देना तुम!

प्यार खुदा है ये सब कहते, प्यार की पर औकात नहीं है!
झूठी इज्ज़त पे मरते सब, सुनता दिल की बात नहीं है!

प्यार खुदा है ये सब कहते, प्यार की पर औकात नहीं है!
अपने रहबर बनके लूटें, गैरों की कोई बात नहीं है!”

" आप ही बताओ, कि क्या करे ये हमारी" बेबस लड़की"- चेतन रामकिशन (देव)"

***********************mera mehboob******************************


‎"बहुत हसीन सा एहसास, नज़र आता है मुझे! 
मेरा महबूब जब थोड़ा सा तड़पाता है मुझे!
एहसास-ए-इश्क का मंज़र तो देखिये,
खुद भी रोता है,थोड़ा सा रुलाता है मुझे!
जानता है मेरी मुस्कान की जरुरत को,
नम हो आँख पर, मुस्कान दिखाता है मुझे!
नींद में आँखें झुकती रहेंगी उसकी मगर,
गोद में रखके सर, वो रोज सुलाता है मुझे!
वो नहीं तो क्या, वो बे-असर नहीं होता "देव",
उसका एहसास अब भी,रातो को जगाता है मुझे!

****************************humsaya************************************


"वो मेरे साथ है, मुझे तन्हा नहीं रहने देगा!
पी लेगा मेरे अश्क, मेरी आँखें नहीं बहने देगा!


    मुझे यकीन है वो है मेरा हमदर्द बहुत,
    खुद सह लेगा,मुझे दर्द नहीं सहने देगा!


ए खुदा लग जाये "देव" उसको मेरी ये सारी उम्र,
खुद कह लेगा ,मुझे ये शब्द नहीं कहने देगा!


    वो है आधार मेरा,और उसकी एक ईमारत मैं,
    लाख तूफ़ान हों, वो मुझको नहीं ढहने देगा!


सफ़र जिस्मों का  हो जाये ख़त्म लेकिन मगर,
याद के साये से ,मुझे ये धूप नहीं सहने देगा!"

*****************************premika*********************************


‎"आँखों का नूर है वो, सांसो की ताजगी सी!


रोशन सा एक दिया है, है पाक बंदिगी सी!





इतनी हसीं है वो, कि चाँद भी शर्माए,


है चांदनी से ऊपर, उसकी वो सादगी सी!





कैसे मैं रोकूँ खुद को, नजदीकियों से उसकी,


मेरा दिल हुआ दीवाना, नियत रही ठगी सी!





कहने को कोई उससे, रिश्ता नहीं हमारा, 


सबसे मधुर है लेकिन, लगती है वो सगी सी! 





कहती हैं याद उनको "देव," आती नहीं तुम्हारी,


आंखें बता रहीं हैं, थी वो रात भर जगी सी!"





"प्रेम में विश्वास रखें, क्यूंकि जहाँ विश्वास नहीं होता है, वहां प्रेम भी नहीं होता है!"

********************prem****************************************************


 "मेरे शब्दों की शक्ति है, भाषा की जान है वो!
  मेरे अतीत का हिस्सा है,मेरा आत्मज्ञान है वो!

अँधेरी राह पर चलती है, मेरे संग लेकर दिए,
 चांदनी सी है उज्जवल, प्रकाशवान है वो!   


हिंदी सी शुद्ध है वो, नित इतिहास की निर्माता]
सुन्दर सी कविता है, बेहतर कलाम है वो!


मुझको कभी सताए, कभी मुस्कराहट बख्शे,
मेरे मन की व्याकुलता है, मेरा इत्मिनान है वो!


हर एक मुश्किल में निभाती है वो साथ मेरा ,
है पवित्र मित्रता सी ,"देव" का  प्रेमज्ञान है वो!"


( आप किसी से जैसी भी आस्था रखें, मगर उसमे प्रेम, विश्वास, समर्पण, ईमानदारी और सत्यता होनी चाहिए!")

********************prem****************************************************


रातों का ख्वाब है वो, दिन का उत्साह है वो!
मेरी रग रग में प्रेम बनके, धारा प्रवाह है वो!

अब अँधेरे रास्तों से डर,मुझको नहीं लगता,
मुझे राह दिखाता है, मेरी निगाह है वो!

दुनिया के इल्ज़ामों से, मैं भयभीत नहीं होता,
झूठा नहीं हूँ मैं, मेरे सच का गवाह है वो! 

भूले से कोई गलती, कर बैठता हूँ लेकिन,
जाता हूँ पास उसके, मेरी पनाह है वो! 

वो कितना है हमदर्द, "देव" अंदाजा लगा ले,
पीड़ा मुझे होती है, मेरे ज़ख्मों की आह है वो!"


("प्रेम बड़ा अनमोल होता है, इस दुनिया में कोई होता है, जो हमारा दर्द समझता है! तो आइये, प्रेम के इस पवित्र जल को ग्रहण करें!")

-----------------------------------------"दिल"----------------------------------


-----------------------------------------"दिल"----------------------------------
--
"ये दिल ऐसा होता है जी!
किसी का चेहरा होता है जी!
फिर भी तोड़ा जाता है दिल,
क्यूँ य दिल दर्पण होता है जी!

किसी का जीवन होता है जी!
किसी का आँगन होता है जी!
फिर भी छोड़ा जाता है दिल,
क्यूँ ये मुमकिन होता है जी!

एक गुलशन होता है जी!
एक उपवन होता है जी!
सूख गया तो फ़ेंक दिया,
क्यूँ ये मुमकिन होता है जी!

एक दीया होता है जी!
फिर रोशन होता है जी!
मन भरने पर बुझा दिया,
क्यूँ ये मुमकिन होता है जी!

मेरा दिल भी अब टूटा जी!
उसका अपना रूठा जी!
"देव" को तन्हा बना दिया,
क्यूँ ये मुमकिन होता है जी!"

("तो आइये किसी का दिल तोड़ने से पहले सोचें,क्यूंकि बहुत तकलीफ होती है जी!-चेतन रामकिशन ") 


-----------------------------------------मेरी प्रियतमा------------------------------


-----------------------------------------मेरी प्रियतमा------------------------------





" वो प्रेम की सागर है, सदभाव की सरिता!


शब्दों की आत्मा है, प्रभाव की रचयिता !


मेरी प्रेरणा की गाथा, प्रकाश पुंज है वो!


गज़लों की जान है वो, सोम्य सी कविता!"





मेरा हाथ पकड़ कर, प्रेम का निबंध लिखा उसने!


सहयोग और समर्पण से ,सम्बंध लिखा उसने!





मेरे चेहरे की रंगत है, होठों की नम्रता!


वो प्रेम की सागर है, सदभाव की सरिता!








मेरे सुख से और दुःख से, गठबन्ध लिखा उसने!


मेरे जीवन की सजावट का, प्रबंध लिखा उसने!





पुष्प सी कोमल है, सच्चाई सी जटिलता!


वो प्रेम की सागर है, सदभाव की सरिता!








'असमंजस में हूँ, नाम नहीं बता सकता!


वो शर्मा जाएगी, घूँघट नहीं हटा सकता!





'देव' के सत्य की परिचायक, प्रकृति सी सरलता!


वो प्रेम की सागर है, सदभाव की सरिता!"








("सच में, शुद्ध प्रेम का एहसास आपके जीवन को ठीक उसी तरह से पवित्र कर सकता है, जैसे गंगाजल आपके पापों को! तो आइये शुद्ध प्रेम करें............................................चेतन रामकिशन ")





------------------------------------प्रेम ( एक जरुरत )----------------------------------------


------------------------------------प्रेम ( एक जरुरत )----------------------------------------
" प्रेम बिना सब दिन सूने हैं, सूनी हैं सब रातें!
   प्रेम बिना धरती सूनी है,  सूनी सब बरसातें!

प्रेम बिना तो ताजमहल भी , प्रभावहीन सा लगता है!
प्रेम बिना तो पुष्प कमल भी, रंगहीन सा लगता है!
प्रेम बिना चोपालें सूनी, सूनी हैं सब बातें!
प्रेम बिना धरती सूनी है,  सूनी सब बरसातें.................

  प्रेम बिना तो अमृत रस भी, स्वादहीन सा लगता है!
  प्रेम बिना तो मानव जीवन, पाषाण कुलीन सा लगता है!
  प्रेम बिना नदियाँ सूनी हैं, सूनी हैं सब घातें!
  प्रेम बिना धरती सूनी है,  सूनी सब बरसातें...................

प्रेम बिना तो घुंघरू भी, ध्वनि हीन  सा लगता है!
प्रेम बिना तो मधु सा मीठा , व्यंजन नीम सा लगता है!
प्रेम बिना मंडप सूना है, , सूनी हैं सब बारातें  !
प्रेम बिना धरती सूनी है,  सूनी सब बरसातें................... 


प्रेम बिना तो कलम "देव' का, भावहीन सा लगता है!
प्रेम बिना तो जन्म "देव" का, शुन्यलीन  सा लगता है!
प्रेम बिना मस्तक सूना है, सूनी हैं सभी ललाटे!
प्रेम बिना धरती सूनी है,  सूनी सब बरसातें................... 

" प्रेम जीवन में ठीक उसी तरह जरुरी है, जैसे जिन्दा रहने के लिए सांसो की जरुरत होती है!- चेतन रामकिशन( देव))"


Wednesday, 16 March 2011

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥बेबस लड़की की मोहब्बत ♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥बेबस लड़की की मोहब्बत ♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
"जिस दिन मैंने इस दुनिया में अपना पहला कदम रखा था!
माँ ने दूध दिया था मुझको, और पिता ने गोद भरा था!
घर में सब कहते फिरते थे, लक्ष्मी मेरे रूप में आई,
मेरे नाम पे ही बाबा ने, अपने घर का नाम रखा था!

आज मगर जब बड़ी हुई तो प्रेम के अंकुर फूट गए!
ये सुनते ही सारे रिश्ते, एक पल में ही टूट गए!
मेरी माँ कहती है के, बदनामी ना कर देना तुम!
लाखों का ये महल बना है है, नीलामी ना कर देना तुम!

प्यार खुदा है ये सब कहते, प्यार की पर औकात नहीं है!
अपने रहबर बनके लूटें, गैरों की कोई बात नहीं है……..♥ ♥ ♥ ♥ ♥

ये सच है के माँ ने पाला, जीने के अंदाज सिखाए!
और पिता ने गले लगाकर, सुख के संसाधन दिलवाए!
इनकी इज्ज़त करती हूँ मैं, वंदन के हूँ भाव जगाती,
पर उसको मैं कैसे भूलूं, प्यार के जिसने ख्बाव सजाए!

आज मैं उसके साथ खड़ी तो, सारे अपने रूठ गए!
आज मगर जब बड़ी हुई तो प्रेम के अंकुर फूट गए!

मेरी माँ भी कहती है के, बदनामी ना कर देना तुम!
तेरे पिता का नाम है ऊँचा, गुमनामी ना कर देना तुम!

प्यार खुदा है ये सब कहते, प्यार की पर औकात नहीं है!
दिन कटते हैं अश्कों के संग, हर्ष भरी अब रात नहीं है…..♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥

मैंने उनसे मिन्नत की है, अपने दिल का हाल बताया!
उसके बिन जीना है मुश्किल, ये उनको दर्पण दिखलाया!
वो कहते हैं एक नहीं है उसकी और ये जात हमारी,
मानवता जाति से नीची, सबने मुझको पाठ पढाया!

जातिवाद के इस बंधन से, प्रेम के धागे टूट गए!
आज मगर जब बड़ी हुई तो प्रेम के अंकुर फूट गए!

"देव" से मिलने की कोशिश और नादानी ना कर देना तुम!
कर देंगे हम हत्या तेरी, बदनामी ना कर देना तुम!

प्यार खुदा है ये सब कहते, प्यार की पर औकात नहीं है!
झूठी इज्ज़त पे मरते सब, सुनता दिल की बात नहीं है!

प्यार खुदा है ये सब कहते, प्यार की पर औकात नहीं है!
अपने रहबर बनके लूटें, गैरों की कोई बात नहीं है!”

" आप ही बताओ, कि क्या करे ये हमारी" बेबस लड़की"- चेतन रामकिशन (देव)"

-------------------------विरह की बेबसी --------------------------------------


 -------------------------विरह की बेबसी --------------------------------------
"अब आ भी जाओ,ये तन्हाई रुलाती है हमें !
विरहा में सर्द हवा और सताती है हमें !
तड़प के-डर से, तेरे खवाबों से बचना चाहा!
नींद में घेर न लें, रात भर जगना चाहा!
बंद दरवाजा, फिर खिड़की पर परदे ढक कर ,
पलक दबाने को उनपर हाथ जो रखना चाहा!
बस यही बात तो अग्नि में जलती है हमें!
हाथ की अंगूठी तेरी याद दिलाती है हमें!

अब आ भी जाओ,ये तन्हाई रुलाती है हमें.............................

तड़प के डर से ये, काम भी करना चाहा!
धोये कपड़े,तो कभी गेंहू फटकना चाहा!
काम निबटाये, पानी भरके फिर नहाकर के,
सुखाके बाल, भीगे वस्त्र बदलना चाहा!
बस यही बात तो लज्जा में डूबाती है हमें!
उनकी तस्वीर आईने में, नज़र आती है हमें!


अब आ भी जाओ,ये तन्हाई रुलाती है हमें.............................

तड़प के डर से चेहरा भी पलटना चाहा!
भागकर, दौड़कर कमरे से निकलना चाहा!
धूप की आंच में कपड़ो को सुखाने के लिए,
मैंने सीढ़ी से अपनी छत्त पर पहुंचना चाहा!

"देव" ये बात तो लज्जा में डुबाती है हमें!
उनकी चिठ्ठी लिए, मेरी सास बुलाती है हमें!


"" प्रेम के लिए किसी इंसान का प्रत्यक्ष होना जरुरी नहीं, प्रेम तो परोक्ष रूप से भी किया जाता है! तो आइये विरह के इन नाजुक लम्हों की प्राप्ति को प्रेम करैं...चेतन रामकिशन"