Thursday, 21 July 2011

♥मेरी प्रेरणा(पथ प्रदर्शक)♥♥

♥♥♥♥♥♥♥मेरी प्रेरणा(पथ प्रदर्शक)♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
"कोमल है वो रेशम जैसी, नदियों का बहता पानी!
हरियाली सी सुन्दर है वो, संतो की मीठी वाणी!
मेरे भावों की अनुभूति, मेरी कविता की पहचान,
रानी जैसी मर्यादित वो, किंचित भी ना अभिमानी!

मेरी प्रेरणा इतनी सुन्दर, जैसे धवल चांदनी हो!
घनी अमावस भी ढल जाये, उसकी जहाँ रौशनी हो!

वो है ज्ञान का जलता दीपक, मैं तो केवल अज्ञानी!
कोमल है वो रेशम जैसी, नदियों का बहता पानी.........................

शीतल है वो चन्दन जैसी, दयापूर्ण उसका व्यवहार!
दुःख की धूप में करती है, प्रेम रसों की मधुर फुहार!
समझाती शिक्षक बनकर, सही गलत की दे पहचान,
सत्य वचन का पाठ पढ़ाती, वो है मेरी रचनाधार!

मेरी प्रेरणा इतनी प्यारी, जैसे माँ की ममता हो!
किंचित भी वो भेद न रखे, प्रकृति सी समता हो!

मेरे शब्द भी छोटे पड़ते, है वो इतनी गुणवानी!
कोमल है वो रेशम जैसी, नदियों का बहता पानी.........................

उपलब्धि है मेरी प्रेरणा, मेरे जीवन का उपहार!
उसके बिन मैं पतझड़ हूँ,वो मेरा खिलता श्रंगार!
"देव" के मन का चिंतन है ,है भावों का दर्पण भी,
शब्दकोष में शब्द नहीं हैं,कैसे दूँ उसको आभार!

मेरी प्रेरणा इतनी अच्छी, मन में कोई विकार नहीं!
सबका हित है करना चाहती,हिंसा का उद्गार नहीं!

लाभपूर्ण है उसका दर्शन, ना मिलती किंचित हानि!
कोमल है वो रेशम जैसी, नदियों का बहता पानी!"

"मेरी प्रेरणा, ऐसी ही है! पावन, सुन्दर, सरल, मधुमयी, कोमल! चूँकि सब कुछ उसके दिशा निर्देशन से उद्धृत है! इसीलिए आज की ये रचना अपनी प्रेरणा को समर्पित कर रहा हूँ! आपको भी ऐसी ही प्रेरणा मिले, प्रकृति से यही कामना है!-चेतन रामकिशन "देव"

Sunday, 17 July 2011

♥♥प्रेम (खंडित ह्रदय)♥♥

♥♥♥♥♥♥♥प्रेम (खंडित ह्रदय)♥♥♥♥♥
"मन में अश्रुधार बह रही, ह्रदय के खंडित तार!
 जब से तूने किया है विस्मृत, मेरा सच्चा प्यार!
पथ में यूँ तो चलते फिरते, मिल जाते हैं लोग,
किन्तु तुम बिन नीरस- नीरस, हुआ मेरा संसार!

प्रेम में ह्रदय खंडना से तो, मिलता है आघात!
दिन भी पीड़ित हो जाता है, पीड़ित होती रात!

तुमने हमको दिया है साथी, पीड़ा का उपहार!
मन में अश्रुधार बह रही, ह्रदय के खंडित तार......

साथ निभाने की जीवन भर, टूट गयी सौगंध!
रक्त की धारा धीमी है , ह्रदय की कंपन मंद!
इस घातक पीड़ा का जग में, होता ना उपचार,
कितने भी प्रयास करो तुम, ना मिलता आनंद!

प्रेम के ऐसे छन करते हैं, जीवन में व्यवधान!
उत्साहों पे लगता अंकुश,धूमिल हो उत्थान!

टूट गयी मोती की माला, छूट गया श्रंगार!
मन में अश्रुधार बह रही, ह्रदय के खंडित तार......

प्रेम तो भावों का सागर है, स्वार्थ से नाता तोड़ो!
होता है अनमोल बहुत ये, इसको तुम ना छोड़ो!
जीवन में यदि प्रेम नहीं तो, "देव" भी होते पत्थर,
जीवन भर जो खंडित ना हो, ऐसा नाता जोड़ो!

प्रेम तो जीवन का निर्माता,नहीं करो अपमान!
प्रेम तो तुलसी की वाणी है, प्रेम का नाम कुरान!

प्रेम तो दीपों की माला है, नहीं कोई तलवार!
मन में अश्रुधार बह रही, ह्रदय के खंडित तार!"

"प्रेम, जीवन की आवश्यकता होती है! प्रेम, में ह्रदय खंडना से, व्यक्ति की मनोदशा प्रभावित होती है! उसके आत्म विश्वास में भी कमी आती है और वेदना से उसकी सफलता और लक्ष्य निर्धारण पर भी प्रभाव पड़ता है! तो आइये किसी को प्रेम में इस पीड़ा को देने से पहले सोचें- चेतन रामकिशन"देव"

Saturday, 16 July 2011

♥फिर दहली मुंबई ♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥फिर दहली मुंबई ♥♥♥♥♥♥♥
ये मुंबई फिर से दहली है, बही है रक्त की धारा!
हुआ स्तब्ध है मानव, हुआ नम देश ये सारा!
यहाँ तो फूटते रहते हैं, अक्सर आग के गोले,
मगर सत्ता के भक्षक राख से, बनते ना अंगारा!

ये सत्ताधारी इन हमलो की, पीड़ा भूल जाते हैं!
कभी हमलो पे अंकुश को, नहीं बीड़ा उठाते हैं!

हुयी आतंक की जय है, अहिंसा गान है हारा!
ये मुंबई फिर से दहली है, बही है रक्त की धारा.....

यहाँ हमलों के दोषी भी, सुखद मेहमान से रहते!
नहीं हो सकता है उनका कुछ, इसी अभिमान में रहते!
अनेको बार इस भारत ने, ऐसे द्रश्य देखे हैं,
मगर सत्ता के भक्षक, जानकर अंजान हैं रहते!

इसी कमजोरी से आतंक, की हरियाली खिलती है!
कभी मुंबई, कभी दिल्ली,इसी अग्नि में जलती है!

मगर घटनाओं से नेता, सबक ना लेते दोबारा!
ये मुंबई फिर से दहली है, बही है रक्त की धारा.....

मधुर और प्रेम की भाषा, रटाना छोड़ना होगा!
हमे साहस से इनके व्यूह को अब तोड़ना होगा!
नहीं जागे यदि तुम "देव", तो दोहराव आएगा,
हमे इनकी तरफ शस्त्रों का, रुख अब मोड़ना होगा!

इन हमलों की वंशज, देश की कमजोर नीति है!
नहीं है देश की चिंता, वो दलगत राजनीती है!

चलो अब आग में तपकर के, हम बन जायें अंगारा!
ये मुंबई फिर से दहली है, बही है रक्त की धारा!"

"मुंबई में आतंकी हमले में मारे गए लोगों की, आत्मा की शांति की कामना करते हुए,
ऐसे नेताओं को धक्का दें, जो सियासत के लिए इस खून को भी नहीं देखते हैं!-चेतन रामकिशन "देव"

♥♥सावन (हरियाली और मिलन )♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥सावन (हरियाली और मिलन )♥♥♥♥♥♥
"है फूलों पे नया यौवन, मधु वर्षा ने बिखराया!
है वायु में भी शीतलता, सरस वातावरण छाया!
चलो स्वागत करें मिलके,सभी प्रकृति के प्रेमी,
मिलन भावों से पूरित होके, सावन मास है आया!

 मयूरा नृत्य में मगनित, भ्रमर रसपान करता है!
 मिलन संयोग देता है, विरह अवसान करता है!

नए पोधे के जीवन का, नया अंकुर भी उग आया!
मिलन भावों से पूरित होके, सावन मास है आया...........

इसी सावन में झूला, झूलने की रीत होती है!
सखी के मन में, एक दूजे से गहरी प्रीत होती है!
ना कोई दोष होता है, ना कोई वर्ग का दर्पण,
सभी की छाया एक जैसी, सरल प्रतीत होती है!

सुमन से गंध ले तितली, कोयल गान करती है!
सरिता भी उमड़ करके, इसे प्रणाम करती है!

सुखद सावन के गीतों का, नया सूरज भी उग आया!
मिलन भावों से पूरित होके, श्रावण मास है आया.......

धरा भी मुस्कुराती है, गगन भी हर्ष में होता!
ये सावन और मौसम से, सदा उत्कर्ष में होता!
मधुर सावन के आनंदों से होते"देव" भी हर्षित,
इस सावन का हर छण,प्रेम के निष्कर्ष में होता!

सरस सावन में रंगों का, धनुष उत्पन्न होता है!
नहीं होता कोई अवसाद, मन प्रसन्न होता है!

धवल सी चांदनी लेके, धवल चंदा भी जग आया!
मिलन भावों से पूरित होके, श्रावण मास है आया!"


"प्रकृति, अनमोल है! वो सुखद और सुरीले छण हमे प्रदान करती है! प्रकृति की एक कड़ी का मौसम, सावन भी है! चारों और हरियाली का सुखद द्रश्य, आकाश में बनने वाले इन्द्रधनुष, मयूरा का नृत्य, मिलन की सुखद अनुभूति, नए अंकुरों का विकास- आइये सावन का स्वागत करें!-चेतन रामकिशन"देव"

Thursday, 14 July 2011

♥तुम्हारा प्रेम..... ♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥तुम्हारा प्रेम..... ♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तुम्हारा नाम मुझको प्रेम का उपनाम लगता है!
तुम्हारी वाणी में कोयल का, मीठा गान लगता है!
सरल व्यवहार कि स्वामी, सरस अनुभूति के दर्शन,
नहीं मिलती कभी पीड़ा, सुखद अभिराम लगता है!

नहीं मिलती यदि तुम प्रेम का अनुभूत ना होता!
तेरे उद्गार सुनकर मन मेरा, अभिभूत ना होता!

तुम्हारा प्रेम साहसपूर्ण, उर्जावान लगता है!
तुम्हारा नाम मुझको प्रेम का उपनाम लगता है....

तुम्हारे प्रेम में निंदक विचारों से मिली मुक्ति!
तुम्हारा प्रेम देता है, हमे संघर्ष की युक्ति!
तुम्हारे प्रेम ने हमको सदा, सच्चाई ही दी है,
तुम्हारे प्रेम ने प्रदान की, मिथ्या से भी मुक्ति!

नहीं मिलती यदि तुम, प्रेम का संचार ना होता!
मेरे कंधे पे जिम्मेदारी का, अनुभार ना होता!

है तुममे रूप ईश्वर का, यही अनुमान लगता है!
तुम्हारा नाम मुझको प्रेम का उपनाम लगता है....

तुम्हारा प्रेम चिंतन में, सुखद प्रभाव रखता है!
नहीं हिंसा का दर्शन है, सदा सदभाव रखता है!
तुम्हारे प्रेम में हम "देव" के समतुल्य हो जाते,
तुम्हारा प्रेम अपनेपन का, ऐसा भाव रखता है!

नहीं मिलती यदि तुम, प्रेम का गुण गान ना होता!
मेरे जीवन से दूषित सोच का, अवसान ना होता!

तुम्हारा प्रेम आशा से भरा, आहवान लगता है!
तुम्हारा नाम मुझको प्रेम का उपनाम लगता है!"

"शुद्ध प्रेम, व्यक्ति की मनोदशा को परिवर्तित करता है! शुद्ध प्रेम, व्यक्ति के मन से, दूषित सोच और विकारों की समाप्ति करते हुए, साहस के साथ, चिंतन, मनन और संघर्ष की सोच प्रदान करता है! तो आइये इसी सोच के साथ शुद्ध प्रेम करें-चेतन रामकिशन "देव"

Sunday, 10 July 2011

♥कविता( एक शिक्षक) ♥♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥कविता( एक शिक्षक) ♥♥♥♥♥♥♥
"कभी सागर कि गहराई, कभी शीतल सी है सरिता!
कभी पीड़ा है शूलों कि, कभी अधिवास कि ललिता!
जो शब्दों से सुशोभित हो, सदा सच भाव हो जिसमे,
जो शिक्षक बन के समझाए, उसी का नाम है कविता!

मनोरंजन नहीं कविता, ना फूहड़ गीत होती है!
वो साहस कि धरोहर है, ना वो निर्भीत होती है!

कभी है चन्द्र सी कोमल, कभी अग्नि की है सविता!
जो शिक्षक बन के समझाए, उसी का नाम है कविता.....

बिना अर्थों के शब्दों का, नहीं सन्देश होती है!
सजग अनुरोध होती है, नहीं आदेश होती है!
कविता ज्ञान देती है, हमे हर स्वार्थ से उठकर,
धर्म और जात के वितरण का, ना उपदेश होती है!

नहीं अपमान है कविता, नहीं अपनाम होती है!
वो भटके को दिखाए पथ, नहीं अवसान होती है!

दृढ है सत्य वचनों सी, नहीं होती है वो पतिता!
जो शिक्षक बन के समझाए, उसी का नाम है कविता!

नहीं परतंत्र होती है, नहीं है राज दरबारी!
कविता भाव होती है, कविता मन की किलकारी!
नहीं हो भाव शब्दों में, नहीं है "देव" वो कविता,
कभी रेशम से भूमि हो, कभी होती है अभिसारी!

कविता सोच की, सदभाव की पहचान होती है!
कविता प्रेरणादायक,सदा आह्वान होती है!

कविता स्वच्छ होती है, नहीं होती है वो दुरिता!
जो शिक्षक बन के समझाए, उसी का नाम है कविता!"

"मित्रों, आज कविता पर लिखने का मन हुआ! मैंने अपने इन कुछ शब्दों में, कविता को परिभाषित किया है! -चेतन रामकिशन "देव"

Wednesday, 6 July 2011

♥माँ( अनमोल चरित्र ) ♥♥

♥♥♥♥♥♥♥माँ( अनमोल चरित्र ) ♥♥♥♥♥♥♥♥♥
"सुगंधों से सुगन्धित ये, मेरे जीवन की क्यारी है!
  हमारे साथ में चन्दन भरी, माता हमारी हैं!
ना कोई भय, ना कोई विचलनों की धारणा होती,
सुखद आशीष माता का, बने शक्ति हमारी है!

मेरी आशा, निराशा में कभी होने नहीं देती!
मुझे वो अन्न से वंचित, कभी सोने नहीं देती!

मेरे जीवन की विचलित नाव, उसने घाट तारी है!
सुगंधों से सुगन्धित ये, मेरे जीवन की क्यारी है......

हमे माँ सत्य वचनों का, सदा ही ज्ञान देती है!
कभी ना शीश हो नीचा, वो स्वाभिमान देती है!
माँ हमको लक्ष्य के पथ से, कभी डिगने नहीं देती,
हमारे मन से अल्पित सोच को, अवसान देती है!

दुखों की धूप में हमको, कभी जलने नहीं देती!
हमारी माँ कभी हमको, गलत करने नहीं देती!

मेरे मन की भी दूषित सोच की, रेखा सुधारी है!
सुगंधों से सुगन्धित ये, मेरे जीवन की क्यारी है......

नहीं वंदन की भूखी है, उसे सम्मान बस दे दो!
वो मेरी माँ है सबके सामने पहचान ये दे दो!
नहीं माता के जीवन को कभी तुम वेदना देना,
नहीं पग में रखो उनको, जरा उत्थान तुम दे दो!

वो जिनकी माँ दुखी होती हैं, उनको हर्ष ना मिलता!
नहीं चन्दन तिलक होता, नहीं प्रसून है खिलता!

बड़ी अनमोल है ममता, सभी रिश्तों पे भारी है!
सुगंधों से सुगन्धित ये, मेरे जीवन की क्यारी है!".


"माँ, अनमोल तो है ही, अतुलनीय भी है! माँ का कोई विकल्प नहीं होता!
आइये माँ की ममता का सम्मान करते हुए उन्हें उत्थान दें, सम्मान दें, पहचान दें- चेतन रामकिशन "देव"




Tuesday, 5 July 2011


♥♥याचना और अधिकार ♥♥

♥♥♥♥याचना और अधिकार ♥♥♥♥♥♥
"याचना त्याग दो, प्रार्थना त्याग दो!
अब गुलामी भरी, भावना त्याग दो!
सोच संघर्ष कि मन में भरके जरा,
बैठकर पाने की, कामना त्याग दो!

याचना से अधिकार मिलते नहीं!
शासकों के ह्रदय भी पिघलते नहीं!
याचना का कहाँ, फिर रहा लाभ है,
उनके नयनों से, अश्रु निकलते नहीं!

दास बनकर नहीं कुछ मिलेगा कभी!
ना सुमन कोई पथ में, खिलेगा कभी!
याचना की यहाँ "देव" सुनता नहीं,
कोई शासक तेरा हक, ना देगा कभी!

"याचना मुक्त होने को चिंतन करो!
अपनी शक्ति के भावों का मंथन करो!"

देव साहब, क्या सही लिखा आपने! आप जो भी लिखते हो, वो सत्यता की कसौटी पर खरा होता है! धन्यवाद आपका!"




Thursday, 30 June 2011

♥♥♥देशप्रेम रहित प्रेम ♥♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥देशप्रेम रहित प्रेम ♥♥♥♥♥♥♥♥
"इश्क में डूबा युवा देश का, देश से प्रेम करेगा कौन!
 जब आती है देश की बारी, हो जाते हैं सब क्यूँ मौन!
साथी को जब चोट लगे तो, आँखों में आंसू आ जाते,
देश का रक्त बहे किन्तु पर, इसकी चिंता करता कौन!

देश है ऊपर, या हम ऊपर, इसका चिंतन करके देखो!
राष्ट्र प्रेम क्यूँ नहीं जगाया,इसका मंथन करके देखो!

राष्ट्र प्रेम यदि नहीं मनों में, ऐसे जीवन का क्या करना!
इससे तो अच्छा होता है, कायरता की मृत्यु मरना..........

सत्य वचन है, प्रेम बिना तो, सूनी जीवन की क्यारी है!
किन्तु देश को सही पथों पे, लाना भी जिम्मेदारी है!
प्रेम की मधुर लालसा में तुम, देश को अनदेखा न करना,
अंतिम छण तक मिट न पाए, देश से वो नातेदारी है!

सुप्त सोच जो ध्रुवित करती, उसका खंडन करके देखो!
राष्ट्र प्रेम क्यूँ नहीं जगाया,इसका मंथन करके देखो!

राष्ट्र प्रेम जो नहीं है मन में, ऐसे जीवन का क्या करना!
इससे तो अच्छा होता है, कायरता की मृत्यु मरना..........

साथी तो अपना है किन्तु, देश हितों के भाव जगाओ!
देश हमारा मस्तक गौरव, इसको न क़दमों में लाओ!
"देव" नहीं जागे तुम अब भी,कोई न इतिहास रहेगा,
दुनिया तुमको याद करे जो, ऐसा एक इतिहास बनाओ!

साथी की प्रसंशा के संग, देश का नंदन करके देखो!
राष्ट्र प्रेम क्यूँ नहीं जगाया,इसका मंथन करके देखो!

राष्ट्र प्रेम जो नहीं है मन में, ऐसे जीवन का क्या करना!
इससे तो अच्छा होता है, कायरता की मृत्यु मरना!"


"देश से भी प्रेम करिए! प्रेम के स्वरूपों में अधिकांशत गिना जाता है-प्रेयसी प्रेम,  पिता प्रेम, माता प्रेम, मित्र प्रेम, किन्तु देश प्रेम कोई नहीं जोड़ता! जबकि देश के बिना है क्या? यदि हमारा देश की किसी और का हो जाये तो, इन सबका औचित्य व्यर्थ हो जाता है! तो युवा शक्ति को "प्रेयसी प्रेम " के संग संग "देश का प्रेम" भी जगाना होगा! वरना परिणाम दुष्कर होंगे-चेतन रामकिशन"देव"






Wednesday, 29 June 2011

♥♥प्रेम का वातावरण ♥♥♥♥♥

♥♥♥♥♥♥प्रेम का वातावरण ♥♥♥♥♥♥♥♥
"प्रेम का जिंदगी में हुआ आगमन!
है धरा झूमती, गा रहा है गगन!
मन में चिंता नहीं, कोई पीड़ा नहीं,
हर तरफ हर्ष का छाया वातावरण!

प्रेम की दीप्ति से, मिला ज्ञान है!
प्रेम उर्जा मयी एक आह्वान है!

प्रेम के ऐसे निर्मल छनो को नमन!
प्रेम का जिंदगी में हुआ आगमन..................

प्रेम के सप्तरंगों से रंग दो जगत!
प्रेम जीवन पथों से नहीं हो विरत!
प्रेम का दीप करता तिमिर का दमन,
प्रेम तो कोयले को भी करता रजत!

प्रेम दुःख में हमे देता मुस्कान है!
प्रेम उर्जा मयी एक आह्वान है!

प्रेम की ऐसी सुन्दर लगन को नमन!
प्रेम का जिंदगी में हुआ आगमन..................

प्रेम रुकता नहीं, प्रेम है अनवरत!
प्रेम दूषित नहीं, प्रेम सच्ची नियत!

प्रेम रुकता नहीं, प्रेम है अनवरत!
प्रेम दूषित नहीं, प्रेम सच्ची नियत!
प्रेम है "देव" जीवन की खिलती कली,
प्रेम आराधना, प्रेम मन का व्रत!

प्रेम से रिक्त मानव तो पाषाण है!
प्रेम उर्जा मयी एक आह्वान है!

प्रेम की स्तुति, आस्था को नमन!
प्रेम का जिंदगी में हुआ आगमन!"

"शुद्ध प्रेम, व्यक्ति के जीवन में प्रकाश पुंज की तरह से सहयोग देता है! प्रेम, व्यक्ति में आत्म विश्वास और शुद्धता का बोध करते हुए, आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है! तो आइये शुद्ध प्रेम करें!-चेतन रामकिशन "देव

Sunday, 26 June 2011

♥ये कैसी आराधना ♥♥


♥♥♥♥♥♥ये कैसी आराधना ♥♥♥♥♥♥♥♥
"घर में माता-पिता भूख से मर रहे!
हम मगर पत्थरों को नमन कर रहे!
उनके जीवन में देके, तपन आग की,
शांति के लिए हम हवन कर रहे!

घर में माता पिता को सताते रहे!
मंदिरों में मगर सर झुकाते रहे!

ये तो पूजा नहीं, हम तो छल कर रहे!
घर में माता-पिता भूख से मर रहे......

उनके तन पे फटे चिथरों की ढकन!
हमको किन्तु हमारे सुखों की लगन!
हमको उनके दुखों से नहीं वास्ता,
जिनकी कृपा से हमको मिला है जनम!

घर में माता पिता को रुलाते रहे!
मंदिरों में मगर सर झुकाते रहे!

हमको तो उनके शरीरों पे विष मल रहे!
घर में माता-पिता भूख से मर रहे......

ये नहीं सत्कर्म, ये निरा पाप है!
ये नहीं हर्ष है, ये तो संताप है!
"देव" जिनके मनों में न माता पिता,
ऐसी संतान तो बस अभिशाप है!

ये तो पूजा नहीं, हम अकल कर रहे!
घर में माता-पिता भूख से मर रहे!"

"स्वयं सोचिये, क्या उचित है ये आराधना, ये पूजा! यदि हमारे माता पिता, हमारे लिए कुछ नहीं तो ऐसे में क्या मंदिर, क्या मस्जिद, क्या गुरुद्वारा, क्या गिरजाघर-चेतन रामकिशन "देव"

Thursday, 23 June 2011

♥बालकाल( श्रेष्ठ काल) ♥♥♥♥

♥♥♥♥♥♥बालकाल( श्रेष्ठ काल) ♥♥♥♥♥♥♥♥
बालहठों के दिवस अनोखे, स्वप्न सजीली रातें!
विस्मृत नहीं हुई हैं मन से, सुखद सुरीली बातें!
यूँ तो जीवन दीर्घ है किन्तु, बालकाल उत्तम है,
बालकाल में नहीं उपजती, घ्रणा की आघातें!

बालकाल के मनोभाव में, किंचित भेद नहीं होता है!
घर से माखन चुरा भी लें, तो कोई खेद नहीं होता है!

बालकाल तो स्वर्णकाल है, रजत भरी सौगातें!
बालहठों के दिवस अनोखे, स्वप्न सजीली रातें.......

जात धर्म की अग्नि में, ये बालकाल ना जलता!
रामू हो या कोई हामिद, साथ साथ है फिरता!
एक दूजे के संग में खाते, बैठके रोटी चावल,
किसी सखा को चोट लगे तो, मन अश्रु से भरता!

बालकाल की वाणी में, अनवाद नहीं होता है!
मेल जोल का जीवन हो, अवसाद नहीं होता है!

बालकाल में नहीं उभरती, हिंसा की प्रभातें!
बालहठों के दिवस अनोखे, स्वप्न सजीली रातें.......

बालकाल से ग्रहण करो तुम, मानवता का ज्ञान!
मन में कोई द्वेष ना रखो, ना कोई अभिमान!
"देव" यदि बचपन से हमने, सीख लिया अपनापन,
जात धर्म के हाथ ना होगा, मानव का अपमान!

बालकाल के जीवन में, प्रहार नहीं होता है!
पुष्पों जैसा कोमल हो, वो खार नहीं होता है!

बालकाल में नहीं बरसतीं, स्वार्थमयी बरसातें!
बालहठों के दिवस अनोखे, स्वप्न सजीली रातें!"

"जात, धर्म, हिंसा, प्रहारों से ऊपर, जीवन का श्रेष्ठ काल "बालकाल" होता है! आइये, अपने बचपन के दर्पण में झांककर, वहां से प्रेम, सदाचार, सोहार्द को ग्रहण करें!-चेतन रामकिशन "देव"

Wednesday, 22 June 2011

♥अतिक्रमण अभियान( गरीबों पे मार) ♥

♥♥♥♥♥♥अतिक्रमण अभियान( गरीबों पे मार) ♥♥♥♥♥♥♥♥
"आज शहर में चला है देखो अतिक्रमण अभियान!
 खोखे, ठेले,  फड़ वाले ही लोग हुए वीरान!
 जिन लोगों ने लूट रखी है, सरकारी संपत्ति,
 उन लोगों की ईंट ना हिलती, क्यूंकि वो बलवान!

अफसरशाही देश की केवल, निर्धन को ही लूटे!
उनकी झुग्गी छण में गिरती, नहीं ईमारत टूटे!

ऐसे अभियानों से होती, मिथ्या की पहचान!
आज शहर में चला है देखो अतिक्रमण अभियान.................

उनके पास नहीं धन संचय, रोज कमाना खाना!
उन लोगों का एक ही अड्डा, उनका वही ठिकाना!
किन्तु शासन प्रशासन को, कहाँ है इनकी चिंता,
ये तो केवल छीनने वाले, आता नहीं वसाना!

उनके घर में भूख पसरती, उनकी किस्मत फूटे!
उनकी झुग्गी छण में गिरती, नहीं ईमारत टूटे!

ऐसे अभियानों से होती, उनकी गति विराम!
आज शहर में चला है देखो अतिक्रमण अभियान.................

 शासन प्रशासन के लोगों, सोच को जरा निखारो!
बड़े मगर को पकड़ो पहले, फिर मछली को मारो!
"देव" यदि ये दोहरा चक्कर, नहीं अगर रोकोगे,
वो संघर्ष करेंगे तुमसे, सोच ये मन में धारो!

वो क्या समझें पीड़ा उनकी, जिनके महल ना टूटे!
उनकी झुग्गी छण में गिरती, नहीं ईमारत टूटे!

ऐसा अभियानों से होती, न्याय सोच अवसान!
आज शहर में चला है देखो अतिक्रमण अभियान!"

"सच में ऐसा ही होता है! फड़  वाले, ठेले वाले, खोखे वाले जब उजड़ते हैं तो, उनके घर में रोटी नहीं बनती! ये अभियान, तब तो सार्थक लगे जब की पहले उन लोगों को महल गिराए जायें जो बलवान कब्जाधारी हैं!-चेतन रामकिशन "देव"



Monday, 20 June 2011

♥♥मेरी मातृभूमि(मेरी माँ) ♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥ ♥♥मेरी मातृभूमि(मेरी माँ) ♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
"मेरे भारत की भूमि है, मुझे प्राणों से प्यारी है!
 यही पितृत्व सुख देती, यही जननी हमारी है!
यहाँ सत्ता के  भक्षक, देश को फिर बेचना चाहें,
इन्ही लोगों ने भारत माँ की, ये इज्जत उतारी है!

 चलो अब चुप्पियाँ तोड़ो, हमे अब युद्ध करना है!
 वतन के शत्रुओं से, देश को स्वतंत्र करना है!

माँ जननी के भी अश्रु देखकर, जो रो नहीं सकता!
निरा पाशाच है, इन्सान वो तो हो नहीं सकता....

यहाँ जो सत्य कहता है, उसे अवसान करते हैं!
यहाँ सत्ता के भक्षक, देश को नीलाम करते हैं!
यहाँ निर्धन के तन पे, एक भी कपड़ा नहीं मिलता,
वो सब कुछ जानते हैं पर, कुटिल मुस्कान भरते हैं!

चलो संकल्प लो अब, जीत का ये मंत्र पढना है!
वतन के शत्रुओं से, देश को स्वतंत्र करना है!

जो अपने मन में, संघर्षों के अंकुर बो नहीं सकता!
निरा पाशाच है, इन्सान वो तो हो नहीं सकता....

नहीं जागे यदि अब भी, कोई अस्तित्व ना होगा!
ना कोई नाम जानेगा, कोई व्यक्तित्व ना होगा!
करेंगे"देव" बनकर राज, ये सत्ता के भक्षक ही,
यहाँ निर्धन जनों का, कोई भी प्रभुत्व ना होगा!

चलो अब मांझ लो खुद को, हमे अब शस्त्र बनना है!
वतन के शत्रुओं से, देश को स्वतंत्र करना है!http://translate.google.com/#submit

जो अपने मन से दासी सोच को, भी धो नहीं सकता!
निरा पाशाच है, इन्सान वो तो हो नहीं सकता!"

"मातृभूमि के लिए सोचना, प्रेम करना, माँ पे हमारा उपकार नहीं है, वरन दायित्व है! तो आइये "माँ भूमि" से स्नेह करें, और इन  भक्षकों से देश को मुक्त करायें!-चेतन रामकिशन"देव"



Saturday, 18 June 2011

♥ ♥♥रानी लक्ष्मीबाई( महानायिका)♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥ ♥♥रानी लक्ष्मीबाई( महानायिका)♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
"अमर तुम्हारा नाम है रानी. अमर तेरी पहचान!
 स्वर्ण पदों से अंकित तेरा, इतिहासों में नाम!
तुम साहस की प्रतिमूर्ति, तुम शक्ति का दर्शन,
हम सब शीश झुकाकर करते, नमन तेरा बलिदान!

विधुत गति सी बनकर तुमने, शत्रु को संहारा!
अपनी कमर पे बांधा तुमने, अपना बालक प्यारा!

रानी के बलिदान दिवस पर, उनको शीश नवायें!
वो हैं जग की महानायिका, सबको चलो बतायें ..

मातृभूमि  की आन में उसने, प्राण की दी आहुति!
उनकी स्मृति से मिलती, गौरव की अनुभूति!
राज सुखों को विस्मृत करके, रणभूमि में उतरी,
धरा की धूल मली माथे पर, जैसे कोई भभूती!

युद्ध भूमि में जाकर तुमने, शत्रु को ललकारा!
अपनी कमर पे बंधा तुमने, अपना बालक प्यारा!

रानी के बलिदान दिवस पर, उनको शीश नवायें!
वो हैं जग की महानायिका, सबको चलो बतायें ..

मातृभूमि के प्रेम बिना तो, जीवन पशु समान!
जो शत्रु को दे अपनापन, वो क्या दीन-ईमान!
चलो "देव" अब तुम भी चलकर, शत्रु को ललकारो,
बहुत सह लिया उत्पीड़न, और बहुत हुआ आराम!

रानी के बलिदान से सीखो, विजय का जीवित नारा!
अपनी कमर पे बांधा तुमने, अपना बालक प्यारा!

रानी के बलिदान दिवस पर, उनको शीश नवायें!
वो हैं जग की महानायिका, सबको चलो बतायें! "


"महानायिका रानी लक्ष्मीबाई के बलिदान दिवस पर उनको नमन,
और सभी से अपेक्षा की हम सब उनके जीवन से प्रेरणा लेते हुए, मातृभूमि से प्रेम करेंगे-चेतन रामकिशन "देव"





Thursday, 16 June 2011

♥♥पहले बता देते.....♥♥♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥ ♥♥पहले बता देते.....♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
"बता देते मुझे पहले, तुम्हें जो छोड़ना ही था!
 मैं दिल पत्थर बना लेता, अगर ये तोड़ना ही था!

तुम्हारी आस में अक्सर, मैं जागा रात रात भर,
मैं तेरा ख्वाब ना रखता, अगर ये तोड़ना ही था!

तुम्हारे प्यार में मैंने, बिताया उम्र का हिस्सा,
तेरी आदत नहीं करता, अगर मुंह मोड़ना ही था!

तुम्हारे बिन तो सांसें भी, बड़ा ही दर्द करती हैं,
मैं सांसों को जला देता, तुम्हें जो छोड़ना ही था!

शिकायत है मुझे तुमसे, के तुम भी "देव" ना समझे,
मगर वादा नहीं करते, अगर वो तोड़ना ही था!"


"प्रेम, को आज इस अंदाज में लिखने का मन हुआ! प्रेम, एक ऐसी विषय वस्तु है, जो जिस शैली में भी चाहो लिखी जा सकती है, गीत में, ग़ज़ल में, कहानी में, दोहों में आदि - आइये शुद्ध प्रेम से मन को शुद्ध करें और प्रेम में किसी को पीड़ा देने से बचें-चेतन रामकिशन "देव"




Wednesday, 15 June 2011

♥♥अली(सत्य का पर्याय) ♥

♥♥♥♥♥♥♥♥ ♥♥अली(सत्य का पर्याय) ♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
"शब्दकोष में शब्द नहीं हैं, किन नामों से उन्हें पुकारूँ!
 कहूँ "मुर्तजा" या फिर "हैदर",या मैं उनको "अली" पुकारूँ!
उनके उपकारों के सम्मुख, शब्द भी ढलते लघु रूप में,
उनको नाम दूँ महिनाथ का, या उनको महावीर पुकारूँ!

महाविज्ञ हैं, शौर्यवान हैं, "अली" का जिनको नाम मिला है!
उनके ही तो पराक्रम से, सत्य को जीवन दान मिला है!

आज के दिन वो हुए अवतरित, स्फुट हुई सूर्य की लाली!
आज सुगन्धित वायुमंडल, आज का दिन है गौरव शाली......

धेर्यवान हैं "अली" हमारे, सच्चाई के अग्र-दूत हैं!
कमजोरों को दिया सहारा, वो तो इतने फलीभूत है!
दो ऊँगली से "अली" ने खोला, था "खैबर- का  दरवाजा"
सोच वही उत्साहित करते, "अली" हमारे कंठ-रूत हैं!

शक्तिमान हैं, सत्यवान हैं, "अली" का जिनको नाम मिला है!
उनके ही तो पराक्रम से, सत्य को जीवन दान मिला है!

शत्रु भी भय खाते उनसे, उनका कण कण है बलशाली!
आज सुगन्धित वायुमंडल, आज का दिन है गौरव शाली......

"अली" के जीवन दर्शन से हम, सत्य-पथों पर चलना सीखें!
 मन से दूषित सोच मिटायें, बुरे कार्य से डरना सीखें!
"देव" हमारे कलम में देखो, आज "अली" ने दी है शक्ति,
मानवता के हर शत्रु का, अंत भी उनसे करना सीखें!

दयानिधि हैं, दयावान हैं, "अली" का जिनको नाम मिला है!
उनके ही तो पराक्रम से, सत्य को जीवन दान मिला है!

दमन-मुक्त हैं, करुण-युक्त हैं, वो सबको देते खुशहाली!
आज सुगन्धित वायुमंडल, आज का दिन है गौरव शाली!"

********प्रिय मित्रों,
"Hazrat Ali  ( A.S ) sahab
21 Mars-599 to 9 February-६६१"
के अवतरण दिवस पर आप सभी को बधाई!
उनके अनमोल, धेर्यवान, सत्यवान, शौर्यवान, पराक्रमी जीवन दर्शन को कोटि कोटि प्रणाम! आइये उनके जीवन दर्शन से हम भी सत्य, शौर्य, पराक्रम की सोच ग्रहण करते हुए, मानवता को जीवित रखने का प्रयास करें!-चेतन रामकिशन "देव"

****मित्रों, इस कविता को लिखने में मेरी परम मित्र और ओजस्वी सोच की स्वामी "ओशिन  हुसैन जी" ने बहुमूल्य सहयोग दिया है! यदि उनका सहयोग नहीं मिलता तो मैं अज्ञानी व्यक्ति "अली साहब" की शान में दो शब्द भी नहीं जोड़ पाता, उनका ह्रदय की गहराईयों से शत शत धन्यवाद!"



Tuesday, 14 June 2011

♥♥♥ ♥♥प्रेमिका ♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥ ♥♥प्रेमिका ♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
"तू प्रेरणा है ज्ञान की, तो रौशनी का दीप है!
मोती करे प्रदान जो, तू वो सुनहरा सीप है!
मेरे प्रेम का परिचय है, मेरे प्रेम का विस्तार है,
तू चन्द्र की धवला किरण, तू सूर्य का प्रदीप है!

तू ताल है, संगीत है, तू तो हमारा गीत है!
तू प्रेम का पर्याय है, तू तो हमारा मीत है!

प्रेम की रसधार को, मिलकर बहाना है हमे!
प्रेम बिन सूना है जग, सबको सिखाना है हमे.......

जूझ रहा था समस्याओं से, तुमने मुझको दिया सहारा!
डूब रही थी नौका मन की, उत्साहों का दिया किनारा!
मेरे पांव में शूल चुभे तो, तुमने घाव पे दवा लगाई,
जिस जीवन का अंत हो रहा, तेरे प्रेम ने उसे उभारा!

तू अंत है, आरम्भ है, तू ही दिवस, तू रात है!
तू सौम्य है, सोहार्द है, तू हर्ष की प्रभात है!

प्रेम की बौछार को, मिलकर गिराना है हमे!
प्रेम बिन सूना है जग, सबको सिखाना है हमे.......

मेरे रक्त की बूंद बूंद पर, नाम लिखा है साथी तेरा!
क्रोध नहीं रहता अब मन में, जब से प्रेम का हुआ वसेरा!
"देव" तुम्हारे प्रेम में मुझको, सीख मिली है सच्चाई की,
नीरसता की निशा नहीं है, प्रेम ने ऐसा किया सवेरा!

तू रजत सी है धवल, तू स्वर्ण जैसी पीत है!
तू प्रेम का पर्याय है, तू तो हमारा मीत है!

प्रेम के इस यान को, मिलकर उड़ाना है हमे!
प्रेम बिन सूना है जग, सबको सिखाना है हमे!"


"प्रेम, अनमोल है! शुद्ध प्रेम व्यक्ति को आत्मविश्वास से भर देता है! व्यक्ति, इस प्रेम के साथ अपने लक्ष्य भी पाने के लिए जुटा रहता है! तो आइये शुद्ध प्रेम करें-चेतन रामकिशन "देव"


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥ भक्ति या अंधापन ♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
"ना करते मां-बाप की सेवा, पाषाणों का वंदन करते!
स्वयं रहेंगे छांव में लेकिन, उनके तन को नंगा रखते!
नहीं करेंगे हाथ से मेहनत, पत्थर के बुत पर सब छोडें,
मानव होकर रहें पशु से, यहाँ वहां बस चलते फिरते!

अपनी मेहनत त्याग के देखो, कर्महीन जो हो जाते हैं!
ऐसे लोग कहाँ इस जग में, कहाँ भला कुछ कर पाते हैं!

ये भक्ति है या अंधापन, मैं तो किंचित समझ ना पाया!
जिसके मन में विष होता है, उसी ने चन्दन तिलक लगाया............

गली गली हर चोराहे पर, अब धर्मों की खुली दुकानें!
जिनको ग्रन्थ का नाम ना मालूम, वही लगे उपदेश सुनाने!
खुद को पंडित कहते हैं वो हैं, जिनकी सोच है सदा कलुषित,
लोगों को वो लूट रहें हैं, उनके ही घर भरे खजाने!

मात-पिता के चरण छोड़कर, पत्थर को जो अपनाते हैं!
ऐसे लोग कहाँ इस जग में, कहाँ भला कुछ कर पाते हैं!

ये युक्ति है, या है बंधन मैं तो किंचित समझ ना पाया!
जिसके मन में विष होता है, उसी ने चन्दन तिलक लगाया............


इसी धर्म की आड़ वो लेकर, नारी अस्मत विक्रय करते!
लोगों को वो मूर्ख बनाकर, खुद को ईश्वर घोषित करते!
अब तो साधू संतो को भी, हुई जरुरत है दौलत की,
यही लोग तो इन लोगों को, अंधेपन से ग्रसित करते!


बुद्धिमत्ता "देव" छोड़के, स्वामी उनको बतलाते हैं!
ऐसे लोग कहाँ इस जग में, कहाँ भला कुछ कर पाते हैं!

ये मुक्ति है या उलझन, मैं तो किंचित समझ ना पाया!
जिसके मन में विष होता है, उसी ने चन्दन तिलक लगाया!"


"भक्ति, अंधापन नहीं है! भक्ति कर्तव्यों में भी शामिल है! तो आओ चिन्तन करें! - चेतन रामकिशन(देव)"