Saturday, 24 January 2015

♥♥पीले फूल...♥♥


♥♥♥♥पीले फूल...♥♥♥♥
पीले फूल खिले हैं मन में। 
रंग आ गया है यौवन में। 
भाव नये कुछ शब्द मिले हैं,
जगी कविता अंतर्मन में। 

रूप बसंती प्यारा लगता,
धरा सुगन्धित हो जाती है। 
पुलकित होते नयन देखकर,
माला सुरभित हो जाती है। 

थकन मिटी, उल्लास मिला है,
ऊर्जा आयी है जीवन में। 
भाव नये कुछ शब्द मिले हैं,
जगी कविता अंतर्मन में... 

खेतों में नवजीवन आया। 
सरसों ने मन को महकाया। 
चहक रहीं हैं प्यारी चिड़ियाँ,
उनका कलरव मन को भाया। 

कई माह के सूनेपन के,
बाद ख़ुशी आयी आँगन में। 
भाव नये कुछ शब्द मिले हैं,
जगी कविता अंतर्मन में... 

आओ बसंती पर्व मनायें। 
गीत प्रेम के मन से गायें। 
हिंसा, घृणा विस्मृत करके,
"देव" प्रेम का जल बरसायें। 

मेलजोल में ही मधुकर है,
नहीं रखा कुछ भी अनबन में। 
भाव नये कुछ शब्द मिले हैं,
जगी कविता अंतर्मन में। "

....चेतन रामकिशन "देव"…..
दिनांक--२४.०१.१५

Friday, 23 January 2015

♥♥याद...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥याद...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
याद आँगन में दबे, पांव तेरी आती है। 
ख्वाब आँखों में नये, प्यार के सजाती है। 

देखना चाहूँ अगर, खोल के पलक अपनी,
अपने आँचल से मेरी आँख, वो छुपाती है।  

मुझसे हौले से मेरे दिल का हाल पूछे पर,
मैं जो पूछूं तो वो शरमा के, सर झुकाती है। 

सोचकर उसको मेरी धड़कनें हुईं भारी,
उसको छू लूँ तो, बिजली सी कौंध जाती है। 

मेरा हर लफ्ज़ नया, और ताजगी से भरा,
याद उसकी जो मेरे दिल से, गीत गाती है। 

धूप में जब भी तेरी, याद से करूँ बातें,
तेरी आदत, वो शरारत, मुझे बताती है। 

"देव" ये याद तेरी, तुझसे भी लगे प्यारी,
एक पल को भी नहीं दूर, मुझसे जाती है। "

............चेतन रामकिशन "देव"…........
दिनांक--२३ .०१.१५
· 

Thursday, 22 January 2015

♥♥अधूरापन...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥अधूरापन...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
ग़मों की आग में ये दिल, मेरा जलने लगा है। 
अधूरापन तुम्हारे बिन, बहुत खलने लगा है। 

वो जिसको गोटियां रखने का, हुनर बख़्शा था,
वही अब चाल मेरे साथ में, चलने लगा है। 

सहारे मुफ़लिसों के जिसने पायी थी हुकूमत,
गरीबों के हक़ों को, आज वो छलने लगा है। 

अहम इंसान का शीशे की, माफ़िक टूट जाये,
जो आई रात तो, सूरज भी ये ढ़लने लगा है। 

यहाँ सच्चाई से जिस रोज पाला पड़ गया तो,
वो झूठा बादशाह भी, आँख को मलने लगा है। 

बिना तुमसे मिले, पाये, मुझे हो चैन कैसे,
तुम्हारा ख्वाब जबसे आँख में, पलने लगा है। 

सुनो तुम "देव" बनकर मोम, वो जलने लगे तो,
मेरा किरदार भी फिर, बर्फ सा गलने लगा है। "

................चेतन रामकिशन "देव"…............
दिनांक--२२.०१.१५

Wednesday, 21 January 2015

♥♥♥जंग...♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥जंग...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
न भाई की यहाँ पर भाई से, अब जंग हो कोई। 
तमंचा, तोप न तलवार, अपने संग हो कोई। 

यहाँ रंग जाये हर चेहरा, मोहब्बत के गुलालों से,
नहीं सड़कों पे बिखरा, खून का अब रंग हो कोई। 

नहीं हो घाव अब गहरा, शिफ़ा मुफ़लिस को मिल जाये, 
दवा के बिन अपाहिज न किसी का, अंग हो कोई।  

मोहब्बत है खुदा बचपन से, मैं ये सीखता आया,
तपस्या प्यार की पल भर को भी न, भंग हो कोई। 

इमां कायम रहे, बाकि सलीका जिंदगी में हो,
तरक्की, नाम को, इंसां नहीं, बेढंग हो कोई। 

किसी का दिल नहीं टूटे, बदौलत मेरी न आंसू,
उजाला हाथ से मेरे, नही बेरंग हो कोई। 

सुनो तुम "देव" ये दुनिया, बनेगी खूबसूरत तब,
अगर इंसानियत का हर तरफ, सतरंग हो कोई। "

................चेतन रामकिशन "देव"…............
दिनांक--२१.०१.१५


Wednesday, 14 January 2015

♥वज्रपात...♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥वज्रपात...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
वज्रपात भी मौसम अब तो, निर्धन पे करने निकला है। 
गिरता पारा उघड़े तन के, जीवन को हरने निकला है। 
रह सहकर जिनके सर छप्पर, वो भी पहुंचे बदहाली में,
सर्दी में बारिश का पानी, उनका घर भरने निकला है। 

रेन वसेरा हुआ नाम का और अलावों में घोटाला। 
चंहुओर लगता है देखो, निर्धन की किस्मत पे ताला। 

शीतकाल भी दानव बनकर, निर्धन को चरने निकला है। 
वज्रपात भी मौसम अब तो, निर्धन पे करने निकला है। "

....................चेतन रामकिशन "देव"…..................
दिनांक--१४.०१.१५

Monday, 12 January 2015

♥♥♥♥क्यों...♥♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥क्यों...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
गिराना ही अगर था तो, मुझे परवाज़ क्यों दी थी। 
बिछड़ कर दूर होना था, तो फिर आवाज़ क्यों दी थी। 

बिना एहसास के पत्थर का ही, बुत बनके मैं खुश था,
मुझे इन्सां बनाने की तलब, आगाज़ क्यों की थी। 

मेरे लफ़्ज़ों के टुकड़े हो गये हैं, चोट से गम की,
अगर था हश्र ये करना, तो उनको साज़ क्यों दी थी। 

नहीं मरहम, दुआ कोई, दवा न कोई अपनापन,
तसल्ली झूठ की तुमने मेरे, हमसाज़ क्यों की थी। 

कहें क्या "देव " अब तुमसे, शिकायत में भी क्या रखा,
गिला कुदरत से है किस्मत को, इतनी नाज़ क्यों दी थी। "

....................चेतन रामकिशन "देव"….................
दिनांक--१३.०१.१५

♥♥किरदार...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥किरदार...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मेरे डूबे हुए किरदार को, पहचान दे जाओ। 
चुराकर आँख से आंसू, मुझे मुस्कान दे जाओ। 

तुम्हारे बिन महज मिटटी सरीखा है बदन मेरा,
मुझे छूकर मेरे मुर्दा जिस्म में, जान दे जाओ। 

यहाँ सिक्कों में बिकते देखता हूँ, आदमी को मैं,
जो बोलूं, सच को जो मैं सच, वही ईमान दे जाओ। 

नहीं नफरत का दामन थामने की, कोई नौबत हो,
मेरे लफ़्ज़ों को तुम अब, प्यार का उन्वान दे जाओ। 

सुनो अब "देव" तुम बिन है, अधूरी जिंदगी मेरी,
मेरे जीवन में रच वसकर, ख़ुशी की खान दे जाओ। "

..................चेतन रामकिशन "देव"…...........
दिनांक--१२.०१.१५

Wednesday, 7 January 2015

♥♥सात जनम...♥♥


♥♥♥♥♥सात जनम...♥♥♥♥♥♥
बिछड़ न जायें संभल के रहना। 
सदा मेरे आँचल में रहना। 
एक जनम तो नाकाफी है,
सात जनम तक दिल में रहना। 

अभी अभी तो शुरू किया है,
हम दोनों ने सफर प्यार का। 
अभी तो हल भी ढूंढ सके न,
हम अपने दिल बेकरार का। 
धीरे धीरे, बारीकी से, 
प्यार का हर पहलु जानेंगे,
अभी सहन करना सीखेंगे,
सखी दर्द हम इंतजार का। 

कल तुमसे था, आज में तुम हो,
साथ साथ तुम कल में रहना। 
एक जनम तो नाकाफी है,
सात जनम तक दिल में रहना... 

गीत लिखेंगे, छंद लिखेंगे। 
प्रेम का ये सम्बंध लिखेंगे। 
तुम अपना कर्तव्य उकेरो,
हम अपना प्रबंध लिखेंगे। 
तेरे शब्दों की खुशबु से,
मेरा यौवन खिल जायेगा,
साथ रहेंगे हर सुख दुख में,
मिलजुल ये सौगंध लिखेंगे। 

मैं तुमको साहस सौंपूंगा,
और तुम मेरे बल में रहना। 
एक जनम तो नाकाफी है,
सात जनम तक दिल में रहना... 

गृहकार्य में तुम पारंगत,
मैं धन अर्जित करना सीखूं। 
नींव रखो तुम हाथ से अपने,
मैं घर निर्मित करना सीखूं। 
"देव" ये सज्जा दीवारो की,
और आँगन की नाम आपके,
मैं घर के कोने कोने को,
प्यार से पुलकित करना सीखूं। 

तुमको छूकर पावन हो लूँ,
तुम गंगा के जल में रहना। 
एक जनम तो नाकाफी है,
सात जनम तक दिल में रहना। "

........चेतन रामकिशन "देव"…......
दिनांक--०७.०१.१५

Monday, 5 January 2015

♥♥दहलीज...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥दहलीज...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तेरी दहलीज पे आया नहीं था, दूर जाने को। 
हजारो लफ्ज़ जोड़े थे, तुझे दिल की सुनाने को। 

भले तू अपना पूरा दिल, न मेरे नाम कर लेकिन,
जगह दे दो मुझे थोड़ी, जरा ये सर छुपाने को। 

ये माना इस जनम में तुम, हमारी हो नहीं सकतीं,
जनम फिर लेना चाहूंगा, तुम्हारा प्यार पाने को। 

न जीते जी मुझे तुमने, पनाहें प्यार की बख्शीं,
मगर तुम कब्र पे आना मेरी, दीया जलाने को। 

हाँ माना चाँद हो तुम, और मैं रस्ते का एक पत्थर,
नहीं समझा सका दिल को, मगर तुझको भुलाने को।  

नहीं कुछ पास में मेरे, मैं खाली हाथ हूँ बेशक,
तुम्हारे नाम पर करता, दुआ के हर खजाने को। 

चलो तुम "देव" जो सोचो, निभाओ साथ या न तुम,
कसर कोई नहीं बाकी रखी, तुझको मनाने को। "

...............चेतन रामकिशन "देव"…............
दिनांक--०५.०१.१५

♥♥प्रेम की विधा...♥♥

♥♥♥♥प्रेम की विधा...♥♥♥♥
छंद, गीत, दोहा, चोपाई। 
सबमें तेरी छवि समाई। 
बड़ा भाग्य है सखी हमारा,
तेरी प्रीत जो हमने पाई। 

तेरी प्रीत सुख का उजियारा। 
तेरी प्रीत की गंगा की धारा। 
तेरी प्रीत में भाव हैं बल के,
तेरी प्रीत का हर क्षण प्यारा। 

मंत्र प्रेम के जपे जो तुमने,
विधा वही हमने दोहराई। 
बड़ा भाग्य है सखी हमारा,
तेरी प्रीत जो हमने पाई। 

धैर्यवान हो, तुम साधक हो। 
प्रेम धर्म की आराधक हो। 
सुचित पथों की प्रहरी हो तुम,
गलत मार्ग की तुम बाधक हो। 

कंठ दिया मेरे शब्दों को,
मेरी लेखनी नहीं दबाई। 
बड़ा भाग्य है सखी हमारा,
तेरी प्रीत जो हमने पाई


मंत्रमुग्ध करने वाली हो। 
ओस में भीगी हरियाली हो। 
"देव" हमारे जीवन में तुम,
हर्षित अमृत की प्याली हो। 

मेरे नयन पटल, अधरों पर,
प्रीत की तुमने नदी बहाई। 
बड़ा भाग्य है सखी हमारा,
तेरी प्रीत जो हमने पाई। "

.....चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक--०५.०१.१५

Sunday, 4 January 2015

♥♥बदलाव...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥बदलाव...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
बदलते दौर का रिश्ता है ये, बदलाव मांगेगा। 
कभी आंसू कभी ये खून का, सैलाब मांगेगा। 
मेरे चलने से ही सूरत पे मेरी, है चमक देखो,
अगर मैं थम गया तो, वक़्त ये ठहराव मांगेगा।

नये इस दौर में,  चाहत, वफ़ा बेमोल लगती है। 
तमाशा देखते हैं सब, जो मेरी आँख दुखती है। 
किसे से दर्द बांटो तो, मिले उपहास का तोहफा,
यहाँ सब तापते हैं, जो मेरे घर आग लगती है। 

दवा मिलती नहीं, मरहम भले हर घाव मांगेगा। 
बदलते दौर का रिश्ता है ये, बदलाव मांगेगा... 

यहाँ पैसों की बातें हों, दिलों को कौन चुनता है। 
यहाँ सब हो गए बहरे, मेरा गम कौन सुनता है। 
कहुँ क्या "देव" कुछ कहने को, वाकी है नहीं अब कुछ,
जिसे अपना कहा फांसी का फंदा, वो ही बुनता है। 

जिसे भी देखो वो खुद के लिए, रुआब मांगेगा। 
बदलते दौर का रिश्ता है ये, बदलाव मांगेगा। "

.............चेतन रामकिशन "देव"…............
दिनांक--०४.०१.१५

Saturday, 3 January 2015

♥♥दर्द की सीमा...♥♥



♥♥♥♥♥♥♥♥♥दर्द की सीमा...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
सहें हम दर्द ये कितना, कोई सीमा तो तय कर दो। 
दुआ देकर मेरा डूबा हुआ, सूरज उदय कर दो। 
मेरी चौखट पे भी दस्तक, ख़ुशी की अब जरुरी है,
बहुत कोशिश में हूँ कुदरत, चलो मेरी विजय कर दो। 

नहीं मैं पूर्ण हूँ मेरा, अधूरापन तुम्ही हर दो। 
मेरी मासूमियत से भूल हो, तो माफ़ तुम कर दो। 
मेरी किस्मत पे पाबन्दी की, बेड़ी तोड़कर के तुम,
मेरी आँखों की सूनी राह पे, अब तुम दमक कर दो। 

मुझे तुम धैर्य देकर के, मेरे मन को अभय कर दो। 
सहें हम दर्द ये कितना, कोई सीमा तो तय कर दो... 

हमारी सांस भारी है, हमारी आँख में जल है। 
मेरा आकाश काला है, मेरी सुखी हुयी थल है। 
मैं इन्सां हूँ बहुत कोशिश भी करके जीत न पाया,
सुनो कुदरत, क्या मेरी उलझनों का अब कोई हल है। 

मेरी सांसो की बिखरी पंक्तियों में अब तो लय कर दो।  
सहें हम दर्द ये कितना, कोई सीमा तो तय कर दो... 

भरोसा है तुम्ही पर, तो ही तुमसे बात करता हूँ। 
उम्मीदें लेके आये कल, इसी में रात करता हूँ। 
ए कुदरत "देव" की सुनना, सुनो हर एक परेशां की,
हवाले मैं तुम्हे दिल के, सभी जज्बात करता हूँ। 

बुरा ये वक़्त अब जाये, जरा अच्छा समय कर दो। 
सहें हम दर्द ये कितना, कोई सीमा तो तय कर दो। "

...............चेतन रामकिशन "देव"…................
दिनांक--०४.०१.१५


Friday, 2 January 2015

♥प्रेम-संवाद...♥

♥♥♥♥प्रेम-संवाद...♥♥♥♥
निकट नहीं अवसाद रहेगा। 
जब अपना संवाद रहेगा। 
जीवन हो व्यतीत हर्ष में,
न कोई परिवाद रहेगा।

तुम मुझको भूषित कर देना। 
तुम क्षमता प्रेषित कर देना,
समस्याओं से घिरुं यदि तो,
मुझको ऊर्जा से भर देना। 
किसी क्षेत्र में तुम आगे हो,
किसी क्षेत्र में मैं प्रथम हूँ,
दोनों का बल युग्मित करके,
तुम उसको दोहरा कर देना।

प्रेम सफल हो जायेगा फिर, 
न कोई अपवाद रहेगा। 
जीवन हो व्यतीत हर्ष में,
न कोई परिवाद रहेगा...

बिन कारण के क्रोध न करना,
तथ्यों के संग बात बताना। 
नहीं वेदना, न मनमानी,
मेरे मन को नहीं दुखाना। 
मैं भी अपने कर्तव्यों का,
पालन तेरे लिये करूँगा,
मुझसे कोई गलती हो तो,
सही बात मुझको समझाना।

कठिन क्षणों का सरल बनाना,
न भ्रमित अनुवाद रहेगा। 
जीवन हो व्यतीत हर्ष में,
न कोई परिवाद रहेगा...

सखी शब्द का परिचय बनना,
मेरे गीतों की लय बनना। 
"देव" हमारा हाथ थामकर ,
संघर्षों की तू जय बनना। 
प्रेम भाव के पावन जल से,
ये कोमल मन धुल जायेगा।
न फिर कोई अड़चन होगी,
बंद मार्ग भी खुल जायेगा।

तुम संग न आवेश कोई भी,
न मन में उन्माद रहेगा। 
जीवन हो व्यतीत हर्ष में,
न कोई परिवाद रहेगा। "
.....चेतन रामकिशन "देव"…...
दिनांक--०२.०१.१५ 

Tuesday, 30 December 2014

♥♥नये साल में...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥नये साल में...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
नये साल में कुछ आशायें, कुछ सपने बुनना चाहता हूँ। 
नये साल में अपने दिल की, बातों को सुनना चाहता हूँ। 
नये साल में हसरत है ये, नफरत मिट्टी में मिल जाये,
इसीलिए मैं मानवता के रस्ते को, चुनना चाहता हूँ। 

नहीं जानता ख्वाब हों पूरे, पर मन में विश्वास रखा है। 
अब से बेहतर कुछ करने का, साहस अपने पास रखा है। 

दुख के क्षण में भी फूलों सा, मैं जग में खिलना चाहता हूँ। 
नये साल में कुछ आशायें, कुछ सपने बुनना चाहता हूँ... 

जो गलती इस साल हुईं हैं, उनका न दोहराव हो मुझसे। 
किसी आदमी के भी दिल में, भूले से न घाव हो मुझसे। 
"देव" जिन्होंने मेरी खातिर, अपना प्यार, दुआ बख्शी है,
उनसे मिलने और जुलने में, न कोई बदलाव हो मुझसे। 

नहीं मैं सूरज हूँ दुनिया का, भले तिमिर न हर सकता हूँ। 
लेकिन फिर भी दीपक बनकर, बहुत उजाला कर सकता हूँ। 

नये साल की नयी राह पर, ऊर्जा संग चलना चाहता हूँ। 
नये साल में कुछ आशायें, कुछ सपने बुनना चाहता हूँ। "

....................चेतन रामकिशन "देव"…................
दिनांक--३०.१२.२०१४

Monday, 29 December 2014

♥♥♥वजह...♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥वजह...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
अब लोगों के दिल में, जगह नही मिलती। 
खुश होने की एक भी, वजह नहीं मिलती। 

लोग घमंडी उड़ें भले ही कितने पर,
गिर जाने पे उनको, सतह नहीं मिलती। 

साँस आखिरी जूझो मंजिल पाने को,
थक जाने से जग में, फतह नही मिलती। 

गलती अपनी हो तो माफ़ी में क्या डर,
जिद्दी बनकर देखो, सुलह नहीं मिलती। 

मुल्क लूटने को तो, सब आमादा हैं,
संसद जैसी उनमे कलह नहीं मिलती।  

वो क्या जानें तड़प, जुदाई के आंसू,
प्यार में जिनको एक पल, विरह नही मिलती। 

"देव" यहाँ कानून, अमीरों का गिरवीं,
मुफ़लिस को बिन पैसे, जिरह नही मिलती। "

...............चेतन रामकिशन "देव"…...........
दिनांक--३०.१२.२०१४

♥♥दुशाला...♥♥


♥♥♥♥♥दुशाला...♥♥♥♥♥♥
खोटा सिक्का चल जाता है। 
सच का सूरज ढ़ल जाता है। 
भ्रष्टाचारी रहें ताप में,
शीत में निर्धन गल जाता है। 

नहीं पता भारत की नीति,
नहीं पता कैसा निगमन है। 
रहे उमर भर मारा मारा,
निर्धन का ऐसा जीवन है। 
उसके अधिकारों को लूटें,
लोग यहाँ कुछ मुट्ठी भर ही,
आँख पे पट्टी कानूनों की,
निर्धन का बस यहाँ मरन है। 

निर्धन का सच भी अनदेखा,
झूठ ठगों का चल जाता है। 
भ्रष्टाचारी रहें ताप में,
शीत में निर्धन गल जाता है...

काश के निर्धन के घर दीपक,
काश उजाला उसके घर हो। 
फटे हैं कपड़े, शीत में कांपे,
काश दुशाला उसके सर हो। 
व्यवस्थाओं के कान हैं बहरे,
निर्धन की आहें नहीं सुनती,
कब तक धरती बने बिछौना,
कब तक उसकी छत अम्बर हो। 

"देव" तड़प में कटता है दिन,
रोकर उसका कल आता है। 
भ्रष्टाचारी रहें ताप में,
शीत में निर्धन गल जाता है। "

.....चेतन रामकिशन "देव"….
दिनांक--२९.१२.२०१४

Sunday, 28 December 2014

♥चंद्र खिलौना...♥



♥♥♥♥चंद्र खिलौना...♥♥♥♥♥
मन में हो जब चंद्र खिलौना। 
माँ की गोदी के बिन रोना। 
दुग्ध पान को माँ से लिपटे,
वो बचपन का समय सलौना। 

केवल हठ हो कुछ नहीं सुनना। 
अपनी इच्छा से सब चुनना। 
टुकर टुकर देखे आँखों से,
बिन गिनते के तारे गिनना। 

माँ की लोरी सुनकर सीखा,
उसने गहरी नींद में सोना। 
दुग्ध पान को माँ से लिपटे,
वो बचपन का समय सलौना....

चंचल चितवन और नादानी। 
भाव नहीं होते अभिमानी।  
"देव" नहीं बचपन को आती,
सोच लोभ की, न कोई हानि। 

अपने पांव के अँगठे को,
लार में अपनी बहुत डुबोना। 
दुग्ध पान को माँ से लिपटे,
वो बचपन का समय सलौना। "

.....चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक--२८.१२.२०१४

Friday, 26 December 2014

♥फूल की देह...♥


♥♥♥♥फूल की देह...♥♥♥♥♥♥
पूर्णिमा हो के चांदनी तुम हो। 
इन चिरागों की रोशनी तुम हो। 
तुम को छुकर के मैं महकने लगूं,
फूल की देह सी बनी तुम हो। 

आँख प्यारी हैं और सूरत भी। 
तुम सवेरे सी खूबसूरत भी। 
रूह को तेरी प्यास है हरदम,
मेरी ख्वाहिश हो और जरुरत भी। 

प्यार की सम्पदा तेरे दिल में,
सोने चांदी से भी धनी तुम हो। 

पूर्णिमा हो के चांदनी तुम हो...

तेरे होने से ही खिले आँगन। 
तुमको पाकर के झूमता है मन। 
"देव" ख़त तेरे प्यार के मोती,
तेरे चित्रों को चूमता है मन। 

मुश्किलों ने कभी जो घेरा तो,
ढ़ाल बन साथ में तनी तुम हो। 
पूर्णिमा हो के चांदनी तुम हो। 
इन चिरागों की रोशनी तुम हो। "

........चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक--२६.१२.२०१४

Wednesday, 24 December 2014

♥♥♥प्रेम पत्र...♥♥♥



♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्रेम पत्र...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
प्रेम पत्र जब मिला तुम्हारा, चेहरा खिलकर कमल हो गया। 
पढ़ा तरन्नुम में जब मैंने, लफ्ज़ लफ्ज़ एक ग़ज़ल हो गया। 
आँख मूंदकर जब खोली तो, पत्र में थी तस्वीर तुम्हारी,
तुम्हे देखकर दिल बोला ये, मेरा जीवन सफल हो गया। 

पत्र तुम्हारा फूलों जैसा, मुझे सुगंधित कर देता है। 
मेरी आँखों में चाहत के, लाखों सपने भर देता है। 

तेरे लफ़्ज़ों के छूने से, मुरझाया मन नवल हो गया। 
प्रेम पत्र जब मिला तुम्हारा, चेहरा खिलकर कमल हो गया.... 

प्रेम पत्र जब चूमा मैंने, लगा के मेरे पास में तुम हो। 
तुम लफ़्ज़ों के अपनेपन में, और मेरे विश्वास में तुम हो। 
पत्र में तुमने प्रेम विजय के, भावों का जो अक्स उभेरा ,
पढ़कर ऐसा लगा हमारे, जीवन के उल्लास में तुम हो।  

पत्र की स्याही में जो तुमने, प्रेम भाव का रस घोला है। 
पत्र नही वो मानो तुम हो, जिसने खुद सब कुछ बोला है। 

प्रेम पत्र से प्रेम की किरणें, पाकर के मन धवल हो गया। 
प्रेम पत्र जब मिला तुम्हारा, चेहरा खिलकर कमल हो गया... 

मन कहता है रोज तुम्हारा, प्रेम पत्र जब मिल जायेगा। 
आज की तरह मेरा चेहरा, खिले कमल सा खिल जायेगा। 
"देव" तुम्हारे लफ्ज़ हमारे, जीवन को रौशन कर देंगे,
हम दोनों की ताक़त होगी, ग़म का पर्वत हिल जायेगा। 

पत्र थामकर श्वेत कबूतर, जब मेरे आँगन में होगा। 
पत्र रूप में प्यार तुम्हारा, जीवन के हर कण में होगा। 

प्यार वफ़ा के फूल खिले तो, छोटा आँगन महल हो गया। 
प्रेम पत्र जब मिला तुम्हारा, चेहरा खिलकर कमल हो गया। "

........................चेतन रामकिशन "देव"……..............
दिनांक--२४.१२.२०१४

Tuesday, 23 December 2014

♥♥♥योद्धा...♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥योद्धा...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मिटकर नहीं सफर तय होता, डटकर सफर किया जाता है। 
मुश्किल तो आयेंगी बिल्कुल, जीवन अगर जिया जाता है। 
बिना लड़े ही रणभूमि में, जीत नहीं मिल सकती कतिपय,
यदि जीतना चाहते हो तो, खुद को सबल किया जाता है।  

जो जीवन की रणभूमि में, दुख से हंसकर टकराते हैं। 
वही लोग इतिहास की रचना, इस दुनिया में कर पाते हैं। 

योद्धा वो है जो मरकर भी, जग में याद किया जाता है।  
मिटकर नहीं सफर तय होता, डटकर सफर किया जाता है। 

दुनिया में कुछ करने वाले, नहीं हारकर चुप होते हैं। 
वो जीवन के कदम कदम पर, ऊर्जा के अंकुर बोते हैं। 
"देव" जहाँ में सबको कुदरत, नहीं रेशमी कम्बल देती,
योद्धा वो हैं जो भीतर का, ताप जगाकर दृढ होते हैं। 

जो बंजर को खोद खोद कर, कृषि भूमि कर जाते हैं। 
वही लोग तो इतिहासों में, नाम का अंकन कर पाते हैं। 

वीर वही वो जिसके द्वारा, मन को अभय किया जाता है। 
मिटकर नहीं सफर तय होता, डटकर सफर किया जाता है। "

.....................चेतन रामकिशन "देव"……..............
दिनांक--२४.१२.२०१४