Sunday, 20 September 2015

♥♥कश...♥♥

♥♥♥♥♥♥कश...♥♥♥♥♥♥♥
सिगरेट के धुयें के कश में। 
नहीं जिंदगी मेरे वश में। 

थाने, जुर्म, कचहरी कम हों,
मसले जो सुलझें आपस में। 

मुश्किल हम पर भारी होंगी,
अगर कमी आयी साहस में। 

मर्यादा भी तार तार है,
नेता उतरे निरा बहस में। 

शबनम की एक बूंद मिली न,
गम की ज्वाला और उमस में। 

औरत भी इज़्ज़त के लायक,
गुंडे भूले यहाँ हवस में। 

"देव" ये लम्बी रात कटे न,
सांस घुटी हैं, यहाँ कफ़स में। "

........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-२०.०९.१५ 
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। " 

Monday, 14 September 2015

♥♥ सपनों के कण... ♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥ सपनों के कण... ♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
बिखरे हैं सपनों के कण कण, जिन सपनों को रात बुना था। 
चीख हुयी ज़ोरों की दिल से, मगर किसी ने नहीं सुना था। 
देह तड़पती रही सड़क पर, अरमानों का कत्ल हो गया,
मगर किसी ने दुखियारे का, एक चिथड़ा भी नहीं चुना था। 

ये पत्थर का जहाँ है शायद, पत्थर की दुनिया दारी है। 
कोई तड़पकर मर जाये पर, सबको अपनी जां प्यारी है। 
बेरहमी से लोग किसी के, जज़्बातों की हत्या करते,
निर्दोषों के पांव में बेड़ी, कातिल की खातिरदारी है। 

अनदेखा करते हैं उनको, दर्द वो जिनका कई गुना था। 
मगर किसी ने दुखियारे का, एक चिथड़ा भी नहीं चुना था …

वादा करके तोड़ दिये हैं और ऊपर से भ्रम करते हैं। 
लोग यहाँ सदमा देने का, बड़ा ही लम्बा क्रम करते हैं। 
"देव" यहाँ घड़ियाली आंसू, मगर रिक्त दिल अपनेपन से,
नहीं मिले २ वक़्त की रोटी, निर्धन कितना श्रम करते हैं। 

सींचा जिसको, छाया न दी, बीज वो शायद जला भुना था। 
मगर किसी ने दुखियारे का, एक चिथड़ा भी नहीं चुना था। "

........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-१५.०९.१५ 
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। " 

Friday, 11 September 2015

♥शब्दों का श्रृंगार...♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥शब्दों का श्रृंगार...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
शब्दों का श्रृंगार बनो तुम, मैं कविता रचना चाहता हूँ। 
बिना तुम्हारे न जाने क्यों, लिखने से बचना चाहता हूँ। 
मेरे शब्दों को अपना लो, बस मेरी इतनी सी ख्वाहिश,
न पुस्तक की मुझे तमन्ना, और नहीं छपना चाहता हूँ ,

तुम इतनी पावन प्यारी हो, शब्द समर्पित तुमको कर दूँ। 
मन करता तेरे आँचल में, भावों का जल अर्पित कर दूँ। 

तुम्हें मानकर प्रेम की देवी, नाम तेरा जपना चाहता हूँ। 
शब्दों का श्रृंगार बनो तुम, मैं कविता रचना चाहता हूँ। 

शब्द कोष के हर पन्ने में, तुम मुझको प्रेरित करती हो। 
तुम हो मेरी अनुभूति में, हर क्षण मेरा हित करती हो। 
 "देव" तुम्हारा प्रेम परिचय, कविता का आधार बन गया,
तुम शब्दों का अलंकार बन, मेरा मन मोहित करती हो। 

शायद प्रेम इसी को कहते, सब कुछ पूर्ण निहित होता है। 
जब देनी हो प्रेम परीक्षा, तब विष भी अमृत होता है। 

हम तुम दोनों साथ रहें बस, मैं ऐसा सपना चाहता हूँ। 
शब्दों का श्रृंगार बनो तुम, मैं कविता रचना चाहता हूँ। "

........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-१२.०९.१५ 
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। " 

Sunday, 6 September 2015

♥♥विवशता...♥♥

♥♥♥♥♥विवशता...♥♥♥♥♥
दो पल सुकूं नहीं जीने को।
नहीं प्यास में जल पीने को।
नहीं दवाई बीमारी में,
न कपड़ा लत्ता सीने को।

बुझती आँखों पे न चश्मा,
न सोने को दरी, खाट है।
तरस तरस के मिलती रोटी,
न जीवन में ठाठ बाट है।
झूठी जनसेवा के नाटक,
करने से न थमे गरीबी,
धनिक कुचलते बेरहमी से,
निर्धन के संग मार काट है।

लोग मजाकों में लेते हैं,
पीड़ा का जीवन जीने को।
नहीं दवाई बीमारी में,
न कपड़ा लत्ता सीने को...

बेटी बिन ब्याही घर में है,
देने को कुछ माल नहीं है।
फसलों को कुदरत ने रौंदा,
हंसी ख़ुशी का हाल नहीं है।
"देव " नहीं पैरों में चप्पल,
और पांवों में फटी बिबाई,
नहीं भुजाओं में दम बाकी,
और क़दमों में चाल नहीं है।

काश हो निर्धन की सुनवाई,
विवश न हो अश्रु पीने को।
नहीं दवाई बीमारी में,
न कपड़ा लत्ता सीने को। "

........चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक-०७.०९.१५
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Saturday, 15 August 2015

♥♥वर्षा का जल...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥वर्षा का जल...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
सावन तुम बिन शुष्क शुष्क है, तुम वर्षा का जल बन जाओ। 
बिना तुम्हारे पथ दुर्गम है, साथ चलो तुम बल बन जाओ। 
सखी ये मेरी प्रेम तपस्या, उसी दिवस तो सफल बनेगी,
आज, अभी के साथ साथ तुम, अगर हमारा कल बन जाओ। 

दीर्घकाल तक, जनम जनम तक, साथ तेरा पाना चाहता हूँ। 
इस सृष्टि के हर युग में मैं, साथ तेरे आना चाहता हूँ। 
तुम शब्दों की संवाहक बन, कविता की रचना कर देना,
और मैं बनकर कंठ सुरीला, भाव तेरे गाना चाहता हूँ। 

दिवस, रात तुम साँझ, सवेरे, तुम्ही पहर, तुम पल बन जाओ। 
सावन तुम बिन शुष्क शुष्क है, तुम वर्षा का जल बन जाओ ... 

निशा में तुम हो धवल चन्द्रमा, और दिवस में तुम दिनकर हो। 
तुम धरती की हरियाली में, इन्द्रधनुष का तुम अम्बर हो। 
"देव" तुम्हारे कदम पड़े तो, आँगन में खुशियां आयीं हैं,
तुम फूलों की खुशबु में हो, तुम मीठी हो, तुम मधुकर हो। 

जिसकी छाँव में सपने देखूं, तुम ऐसा आँचल बन जाओ। 
सावन तुम बिन शुष्क शुष्क है, तुम वर्षा का जल बन जाओ। "

........चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक-१५.०८.२०१५ 
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♥कैसी आज़ादी...♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥कैसी आज़ादी...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
बेटी जब महफूज नहीं तो आखिर कैसी आज़ादी है। 
नाम पे मजहब के दंगे हैं, जगह जगह पे बर्बादी है। 
चंद अरबपतियों का होना, नहीं देश के सुख का सूचक,
आँख से परदे हटें तो देखो, भूखी कितनी आबादी है। 

बेटी जब अँधेरे में भी, सही सलामत घर आयेगी। 
उस दिन ही सच्चे अर्थों में, ये आजादी मिल पायेगी। 

सज़ा मिले क्यों बेगुनाह को, दूर पकड़ से उन्मादी है। 
आँख से परदे हटें तो देखो, भूखी कितनी आबादी है....

आज़ादी का मतलब देखो एक सूत्र में बंध जाना है।  
आज़ादी का मतलब घर घर दीपक जल जाना है। 
"देव" वतन में सबको रोटी, कपड़ा, घर भी है आज़ादी,
आज़ादी का मतलब देखो, भ्रष्ट तंत्र का मिट जाना है। 

रोजगार के बिन युवकों की, जीवन धारा अवसादी है। 
बेटी जब महफूज नहीं तो आखिर कैसी आज़ादी है। "

........चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक-१५.०८.२०१५ 
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Tuesday, 11 August 2015

♥♥प्रश्न...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्रश्न...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
नहीं आग्रह, नहीं निवेदन, न प्रस्ताव, नहीं वाचन है।
प्रेम पथिक हूँ, भाव मार्ग पर, सदा तुम्हारा अभिवादन है।
स्मृति और छवि तुम्हारी, रहे मेरे व्याकुल नयनों में,
तुम बिन जीवन सूखा पौधा, और तुम बिन एकाकीपन है।
हाँ अयोग्य-सापेक्ष तुम्हारे, पर तुम जैसे बन नहीं सकता ।
मैं काजल सा, श्वेत वर्ण बन, अम्बर से भी छन नही सकता।
किन्तु फिर भी प्रीत का अंकुर उदय हुआ मेरे मन में।
जरा बताओ प्रश्न हमारा, प्रेम है क्या वर्जित जीवन में....
तुमने मेरा पक्ष सुना न, मनोदशा को जान सके न। 
मैं भी तुम जैसा मानव हूँ, बात कभी तुम मान सके न। 
मेरे पांवों में भी कांटे, चुभकर देखो रक्त निकलता,
एकपक्षीय ऐनक से तुम, मेरा दुख पहचान सके न।
द्वार पे तुमने ताले जड़कर, प्रतिबन्ध किये दर्शन में। 
जरा बताओ प्रश्न हमारा, प्रेम है क्या वर्जित जीवन में...
ज्यादा कुछ भी नहीं कहूँगा, केवल मैं इतना कहता हूँ। 
जरा सोचना उस बिंदु को, जिस स्थल पे मैं रहता हूँ। 
"देव" यदि तुम मेरी विरह के, भावों को अनुभूत करोगे,
तो तुम भी आश्चर्य करोगे, कैसे मैं जीवित रहता हूँ।
तुम बिन जग ऐसा लगता है, जैसे मैं हूँ निर्जन वन में। 
जरा बताओ प्रश्न हमारा, प्रेम है क्या वर्जित जीवन में। "
..................चेतन रामकिशन "देव"…….................
दिनांक-११.०८.२०१५ 
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Monday, 10 August 2015

♥♥बदनसीब...♥♥

♥♥♥♥♥बदनसीब...♥♥♥♥♥♥
कोई जब बदनसीब होता है। 
दर्द कितना करीब होता है। 

बस्तियां ढहतीं वो इशारों में,
जिनमें घर घर गरीब होता है। 

एक अरबों में, एक पाई में,
क्या सभी कुछ नसीब होता है। 

बेटा हो कोख में, तो खुशियां मनें,
बेटी पे दिल अजीब होता है। 

"देव" ये दर्द, कई गुना बढ़ता,
वक़्त जब भी रक़ीब होता है। "


.....चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक-१०.०८.२०१५   
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Saturday, 8 August 2015

♥♥वजह ...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥वजह ...♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मुझसे मिलने की क्या वजह होगी। 
उसके दिल में क्या कुछ जगह होगी। 

क्या मिलेंगे मुझे मिलन के पल,
या बताओ के फिर विरह होगी। 

दर्द की रात कितनी लम्बी है,
क्या कभी इसकी भी सुबह होगी। 

रंजिशें रखता है जो मुझसे बहुत,
कैसे उस शख्स से सुलह होगी। 

वो न समझेंगे तो दुखेगा दिल,
उनसे तक़रार बेवजह होगी। 

कितना उड़ जाये पर नही वो गिरे,
सच की क़दमों में गर सतह होगी। 

"देव" जो होगा, देखा जायेगा,
या मिलन होगा के, कलह होगी। "

........चेतन रामकिशन "देव"…….
दिनांक-०८.०८.२०१५ 
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♥♥पासा...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥पासा...♥♥♥♥♥♥♥♥♥
न ही मरहम है, न दिलासा है। 
ढोंग है, झूठ है, तमाशा है। 

मेरी खिदमत बताओ अब क्यों भला,
कौनसी चाल का ये पासा है। 

प्यार का मेरे क़त्ल कर डाला,
क्या गुनाह तुमको ये जरा सा है। 

भूखे माँ बाप तरसें रोटी को,
जिनके बेटों पे नोट ख़ासा है। 

जो गुनहगार थे वो बच निकले,
बेगुनाहों को तुमने फांसा है। 

आसमां झाँका, नींद आई नहीं,
दर्द आँखों में बेतहाशा है। 

"देव" है नौजवां की बदहाली,
हाथ खाली है, और हताशा है। " 

........चेतन रामकिशन "देव"…….
दिनांक-०८.०८.२०१५ 
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Friday, 7 August 2015

♥♥जिद...♥♥

♥♥♥♥♥♥जिद...♥♥♥♥♥♥♥♥
टूटते ख्वाब जोड़ने की जिद। 
गम की चट्टान तोड़ने की जिद। 

आ रहा है जो, दर्द का तूफां,
उसको वापस ही मोड़ने की ज़िद। 

जिसने इलज़ाम ही दिये मुझको, 
वो शहर तेरा छोड़ने का ज़िद। 

वक़्त ने मेरे पंख काटे जब,
होंसला लेके दौड़ने की जिद। 

"देव" तुम प्यार से तो ले लो जां,
आँख दुश्मन की फोड़ने की जिद। "

........चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक-०७.०८.२०१५  
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Tuesday, 4 August 2015

♥शर शैय्या...♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥शर शैय्या...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
 भीष्म पिता के जैसे मुझको, शर शैय्या पे सुला दिया है। 
रक्त वो मेरा देख के हर्षित, मेरे दुःख को भुला दिया है। 
मैंने जिनके अभियोजन में, हर क्षण ही संवाद किया था,
आज उसी ने निर्ममता से, मुझको फांसी झुला दिया है। 

अंतहीन सी मानवता है, दया किसी में शेष नहीं है। 
पत्थर जैसे हृदय हुये हैं, भावों का अवशेष नहीं है। 
धनिकों के तो जरा घाव पर, यहाँ चिकित्सक बहुत खड़े पर,
किन्तु देखो स्वास्थ्य गृहों में, निर्धन का प्रवेश नहीं है। 

कल तक जिसमें खेला था वो, उस घर को ही जला दिया है। 
भीष्म पिता के जैसे मुझको, शर शैय्या पे सुला दिया है... 

जाने कैसा काल, समय है, जाने क्या जीवन यापन है। 
यहाँ भूख से मरता कोई, और कहीं पैसों का वन है। 
"देव " किसी की आँख में आंसू, फर्क नहीं पर पड़ता कोई,
अंदर से मन में कालापन, और बाहर से उजला तन है। 

मेरे कोमल अंतर्मन को, अम्ल धार से जला दिया है। 
भीष्म पिता के जैसे मुझको, शर शैय्या पे सुला दिया है।"

..................चेतन रामकिशन "देव"………..............
दिनांक-०४.०८.२०१५
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Saturday, 11 July 2015

♥♥प्रेम घटक...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्रेम घटक...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तुम्हें लगा वो मृगतृष्णा थी, मुझे लगा वो प्रेम घटक था। 
मैं अपने मन से रत्नाकर, तुम्हे लगा के मैं पावक था। 
अपने भावों का सत्यापन, निशा दिवस तुमसे करके भी,
तुमने संज्ञा दे दी मुझको, मैं पीड़ा का संवाहक था। 

अविरल जब है प्रेम की धारा, उसे लोग बाधक करते हैं। 
नहीं सुनेगे भाव किसी के, केवल अपनी हठ करते हैं। 

श्राप दिया उसने ही मुझको, मैं तो जिसका आराधक था। 
तुम्हें लगा वो मृगतृष्णा थी, मुझे लगा वो प्रेम घटक था.... 


मैं मानव था, इच्छा भीं थी, पर वो भी जगदीश नहीं थे। 
मेरा मन-तन उन जैसा था, क्या उनके तन शीश नहीं थे। 
मैं भी जन था हाड़ मांस का, रक्त मेरे घावों में भी है,
क्यों कर उनके शब्दकोष में, मेरे हित-आशीष नहीं थे। 

क्या अपराध किया जो मैंने, उनको अपना सब कुछ माना। 
जिसके अश्रु पान किये थे, उसने मेरा दुःख न जाना। 

मुझको काटा निर्ममता से, वृक्ष में जबकि फलदायक था। 
तुम्हें लगा वो मृगतृष्णा थी, मुझे लगा वो प्रेम घटक था.... 

रिक्त हो गया कोष शब्द का, न कुछ भी कहने का मन है। 
अब तो इतना मान लिया के, दंड भोगना ही जीवन है। 
"देव" प्रेम के पूर्ण भाव से, सींचके पौधे भी क्या पाया,
मेरे पांवों में कांटे और, मेरे हिस्से सूखा वन है। 

सीख लिया है अनुभूति की, गंगा नहीं बहाई जाये। 
जो नहीं सुनता भाव वंदना, उसको नहीं सुनाई जाये। 

वो सक्षम थे, सुन सकते थे, मैं उनके सम्मुख याचक था। 
तुम्हें लगा वो मृगतृष्णा थी, मुझे लगा वो प्रेम घटक था। "

.........चेतन रामकिशन "देव"………
दिनांक-१२.०७.२०१५ 
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Friday, 10 July 2015

♥♥सूखी हथेली...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥सूखी हथेली...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
रही हथेली सूखी सूखी, बारिश में फैलाई भी थी। 
न बख्शा ज़ख्मों को मरहम, चोट उन्हें दिखलाई भी थी। 
आज वो लेकर हुनर प्यार का, मुझसे दूर गया तो क्या है,
एक दिन मुझको रीत प्यार की, उसने ही सिखलाई भी थी। 

लेकिन जब जाना होता है, तो आना ये क्यों होता है। 
कोई बिछड़ कर जाता है तो, दिल आखिर ये क्यों रोता है। 
यदि कुचलना ही होता है, यौवन धारित हरे वृक्ष हो,
तो मानव फिर बीज नेह के, किसी के मन में क्यों बोता है। 

चलो जिंदगी गयी भी तो क्या, क़र्ज़ में यूँ तो पाई भी थी। 
रही हथेली सूखी सूखी, बारिश में फैलाई भी थी.... 

चलो दशा ये अपने मन की, और पीड़ा ये अंतर्मन की। 
न ख़्वाहिश हमको मलमल की, न हसरत मुझको सावन की। 
"देव" लिखा है जो कुदरत ने, शायद ये परिदृश्य वही है.
न इच्छा है पुनर्जन्म की, न चाहत है नवजीवन की। 

भूल गया सब गति शीलता, जो अधिगम से आई भी थी। 
रही हथेली सूखी सूखी, बारिश में फैलाई भी थी। "

.........चेतन रामकिशन "देव"………
दिनांक-११.०७.२०१५ 
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♥दूर जाने की...♥

♥♥♥♥♥दूर जाने की...♥♥♥♥♥♥
दूर जाने की बात करने लगे। 
तुम उदासी की रात करने लगे। 

क्या मिले या नहीं मिले कुछ भी,
बिन लड़े अपनी मात करने लगे। 

जिससे दिल छलनी हो, बहें आंसू,
तुम भी वो वाकयात करने लगे। 

था यकीं जिनपे खुद पे ज्यादा,
वो भी गैरों सा, घात करने लगे। 

हार जाऊं, मैं तेरा मंसूबा,
पीठ पीछे बिसात करने लगे।  

प्यार में छोटा, क्या बड़ा कोई,
आज मजहब, क्यों जात करने लगे। 

"देव" हम दोस्त थे, नहीं दुश्मन,
हमसे क्यों एहतियात करने लगे। "

.........चेतन रामकिशन "देव"………
दिनांक-१०.०७.२०१५  
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Monday, 6 July 2015

♥♥अंगारे...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥अंगारे...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
काटी रात जहर पीकर के, अब दिन में भी अंगारे हैं। 
झूठ की हिस्सेदारी जीती, और सच के प्रहरी हारे हैं। 
अपना मुख अमृत से भरकर, मुझको सौंपे ग़म के प्याले,
मेरे घर को दिया अँधेरा, खुद के घर में उजियारे हैं। 

नहीं पता क्यों लोग जहाँ के, इतने पत्थर हो जाते हैं। 
उनपे कुछ भी नहीं बीतती, घायल मरकर सो जाते हैं। 

बड़ी कष्ट की तिमिर की बेला, घर आँगन में अंधियारे हैं। 
काटी रात जहर पीकर के, अब दिन में भी अंगारे हैं...... 

बस उपहास किया करते हैं, वो अपने झूठे तथ्यों पर। 
तेज बोलकर दिखलाते हैं, वो अपने हितकर कथ्यों पर। 
"देव" किसी की आह सुनें न, बस स्वयंभू हो जाते हैं,
उनको मतलब नहीं किसी से, दृष्टि खुद के मंतव्यों पर। 

दंड दिया है लेकिन कहते, हम तो किस्मत के मारे हैं। 
काटी रात जहर पीकर के, अब दिन में भी अंगारे हैं। "


.........चेतन रामकिशन "देव"………
दिनांक-०७.०७.२०१५ 
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Thursday, 2 July 2015

♥♥♥चाँद ...♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥चाँद ...♥♥♥♥♥♥♥♥♥
चाँद हो तुम मेरी नज़र के लिये।
तुम ही रौनक हो मेरे घर के लिये।

तुम उजाला हो, रौशनी की किरण,
तुम ही सजदा हो, मेरे सर के लिये।

तेरे होने से, मैं रचूँ कविता,
तू जरुरी है के, बहर के लिये।

जिंदगी तेरे बिन अपाहिज सी,
तुम ही ख्वाहिश हो, रहगुजर के लिये।

चंद लम्हों का साथ कम लगता,
मेरी हो जाओ, उम्र भर के लिये।

रात के ख्वाबों का मिलन तुम हो,
तुम ही सूरज हो के, सहर के लिये।

"देव" तुम बिन है रास्ता तन्हा,
साथ हो जाओ तुम, सफ़र के लिये। "

..........चेतन रामकिशन "देव"………
दिनांक-०२.०७.२०१५
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Monday, 29 June 2015

♥♥नारी(स्नेही संवाहक )...♥


♥♥♥नारी(स्नेही संवाहक )...♥♥♥
तुम उत्पत्ति हो जीवन की। 
तुम सुगंध हो चंदन वन की। 
तुम नारी की छवि को धारित,
सदा योग्य तुम अभिनन्दन की। 
चन्द्र किरण की शीतलता तुम,
तुम भानु की ऊर्जा में हो,
तुम पर्याय खिले फूलों का,
तुम ही शोभा हो उपवन की। 

सहनशीलता से पूरित हो,
मृदुभाषिता की वाहक हो। 
तुम संबंधों की गरिमा हो,
तुम स्नेही संवाहक हो। 
तुम नारी हो, दूध की गंगा,
शिशुओं को सिंचित करती हो,
तुम बिन घर में कर्म रिक्तता,
तुम कर्मठ हो, निर्वाहक हो। 

तुम्ही प्राथमिक अध्यापक हो,
तुम लोरी सबके बचपन की। 
तुम पर्याय खिले फूलों का,
तुम ही शोभा हो उपवन की। 

तुम पुत्री हो, कली की भाँती,
तुम पत्नी हो, भावनिहित हो। 
तुम माँ सबसे उच्च रूप में,
तुम ममता से पूर्ण निहित हो। 
तुम बहनों के रूप में आकर,
भाई की सहयोगी बनतीं,
हर दृष्टि में तुम मधुरम हो,
इन नयनों को सदा सुहित हो। 

तुम ही मन की प्रेम नायिका,
तुम ही वर्षा हो सावन की। 
तुम पर्याय खिले फूलों का,
तुम ही शोभा हो उपवन की। 


तुम अनुक्रम हो, परिवार का,
तुम वाहक हो संस्कार का। 
तुम स्पर्श सुखद मलमल का,
तुम प्रेरक हो सदाचार का। 
"देव" जगत में बिन नारी के,
पुरुषों का अस्तित्व न होता, 
तुम वर्णित हो कविताओं में,
तुम सूचक हो अलंकार का। 

तुम कोमल भावों की वाणी,
तुम क्षमता हो, सम्मोहन की। 
तुम पर्याय खिले फूलों का,
तुम ही शोभा हो उपवन की। "


"
नारी-त्याग, समर्पण और विश्वास, प्रेम, सदाचार और सहयोग जैसे शब्दों का, यदि कोई पर्याय है तो वह नारी ही है, नारी है तो जीवन का अनुक्रम है, नारी है तो वसुंधरा की गोद भरी है। "

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-३०.०६.२०१५ 
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 "

Saturday, 27 June 2015

♥♥स्वर्ग...♥♥

♥♥♥♥♥♥स्वर्ग...♥♥♥♥♥♥♥♥
स्वर्ग सा सुन्दर जीवन तुमसे। 
हर्षित भावों का मन तुमसे। 
तुम लेखन के प्राण तत्व में,
और शब्दों का यौवन तुमसे। 
तुम आशाओं के दीपक की,
ज्योति हो, प्रकाशमयी हो,
तुमसे मुख मंडल पे आभा,
फूल सा सुन्दर ये तन तुमसे। 

तुम्ही नायिका अनुभूति की,
काव्यकला के कौशल में हो। 
तुम्हें देखकर बूंदें बरसें,
अमृत जैसे तुम जल में हो। 

वाणी भी है मिश्री जैसी,
चित्त हुआ है पावन तुमसे। 
तुमसे मुख मंडल पे आभा,
फूल सा सुन्दर ये तन तुमसे... 

तुम करुणा के सागर में हो,
बनके देवी इस घर में हो। 
तुमसे ऊर्जा मिलती मन को,
तुम ही उड़ने के पर में हो। 
"देव" तुम्हारी मधुर छटा को,
देख के सावन स्वागत करता,
निहित तुम्ही हो संघर्षों में,
तुम ही मेहनत के कर में हो। 

तुम ही वीणा में झंकृत हो,
और पायल की छन छन तुमसे। 
तुमसे मुख मंडल पे आभा,
फूल सा सुन्दर ये तन तुमसे। "

..........चेतन रामकिशन "देव"………
दिनांक-२७.०६.२०१५ 
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। 

Thursday, 25 June 2015

♥♥शेष अभिव्यक्ति...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥शेष अभिव्यक्ति...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
कुछ लिखने को बचा नहीं है, शेष नहीं कुछ अभिव्यक्ति को। 
जिसने मन को भेद दिया हो, कैसे भूलूँ उस व्यक्ति को। 
हर क्षण वो मेरे जीवन का, सौंप गये दुःख के चरणों में,
धुंआ, धुंआ है, चंहुओर ही, जुटा हुआ हूँ मैं मुक्ति को। 

मेरा मन नीरस नीरस है, मेरा दिल भारी भारी है। 
मेरे शब्दों को पीड़ा है, वक्तव्यों में लाचारी है। 
मेरे आँगन की तुलसी भी, झुलस गयी है बारूदों से,
लगता है मेरे जीवन की, छलनी छलनी ये क्यारी है। 

नहीं समझ आता मैं उनकी, कैसे बदलूं प्रवृत्ति को। 
कुछ लिखने को बचा नहीं है, शेष नहीं कुछ अभिव्यक्ति को... 

धवल रात होने का सपना, इन नयनों ने छोड़ दिया है। 
जो दर्पण उनको दिखलाये, उसको हमने तोड़ दिया है। 
"देव" चलो एकाकीपन की, बेला में पारंगत हो लें,
साथ भला वो क्या देंगे, जो मुझको दुख से जोड़ दिया है। 

जड़वत होकर देखा करता, मैं पीड़ा की आवृति को। 
कुछ लिखने को बचा नहीं है, शेष नहीं कुछ अभिव्यक्ति को। "


.....................चेतन रामकिशन "देव"……..................
दिनांक-२५.०६.२०१५ 
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