Thursday, 12 November 2015

♥♥प्रेम के फूल...♥♥

♥♥♥♥♥प्रेम के फूल...♥♥♥♥♥
प्रेम के फूल खिल गये होते। 
हम जो आपस में मिल गये होते। 
आँख पढ़ लेती आँख की भाषा,
होठ बेशक ही सिल गये होते। 

तेरे आने की राह मन में है। 
तुझको पाने की चाह मन में है। 
तुम दवा प्यार की मुझे दे दो,
बिन मिले तुमसे आह मन में है। 

तुम जो मिलते तो आह भी मिटती,
गम के पर्वत भी हिल गये होते। 

प्रेम के फूल खिल गये होते। 
हम जो आपस में मिल गये होते....

मेरे ख़्वाबों की तुम पनाह करो। 
प्यार वाली जरा निगाह करो।  
साथ रहने की आरज़ू दिल में,
प्यार का प्यार से निकाह करो। 

तुम जो छू लो अगर मेरा दामन, 
मेरे सब दाग धुल गए होते। 

प्रेम के फूल खिल गये होते। 
हम जो आपस में मिल गये होते....

तुम से बस इतनी सी गुजारिश है। 
साथ दो आपका, ये ख्वाहिश है। 
"देव " तुम आओगे तो झूमे घटा,
प्यार तेरा ख़ुशी की बारिश है। 

देखकर अपना ये मिलन सब खुश,
बागवां सारे खिल गये होते। 

प्रेम के फूल खिल गये होते। 
हम जो आपस में मिल गये होते। "

........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-१२.११.२०१५ 
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। " 

Tuesday, 10 November 2015

♥झालर ...♥

♥♥♥♥♥झालर ...♥♥♥♥♥♥
हर आँगन में खुशहाली हो। 
ऐसी सबकी दीवाली हो। 
रंग बिरंगी झालर दमकें,
रात नहीं ग़म से काली हो। 

नफरत के शोले बुझ जायें,
चिंगारी तक शेष रहे न। 
मानवता से प्यार करें सब,
किंचित भी आवेश रहे न। 
दीप जलें बस अपनेपन के,
न रंजिश हो, नहीं लड़ाई,
घुल मिल जायें हम आपस में,
बैर तनिक भी, द्वेष रहे न। 

बच्चों की हों नयी शरारत,
गोद किसी की न खाली है। 

रंग बिरंगी झालर दमकें,
रात नहीं ग़म से काली हो। "

........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-१०.११.२०१५  
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। " 

Saturday, 3 October 2015

♥याद तुम्हारी...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥याद तुम्हारी...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
याद तुम्हारी आयेगी तो, चाँद का मैं दीदार करूँगा।
पास रहो या दूर रहो तुम, मैं तो तुमसे प्यार करूँगा।

भाती हो तुम मेरी रूह को, सौंप दिया है तुमको तन, मन,
मुझको तुम खुशियां या गम दो, मैं हंसकर स्वीकार करूँगा।

मुझे बताना मेरा मिलना, यदि जो तुमको नहीं सुहाये,
तो मैं तेरे घर आँगन की, देहरी को न पार करूँगा।

मेरी माँ ने मुझे सिखाया, अतिथियों का स्वागत करना,
तुम भी तो दिल की मेहमां हो, मैं तेरा सत्कार करूँगा।

तुम बोलो के या न बोलो, या फिर मुझसे नज़र चुराओ,
लेकिन मैं तेरे रस्ते पे, न कोई दीवार करूँगा।

तेरे दिल की कोमल परतें, कभी न दुःख की धूप में झुलसें,
मैं अपनी चाहत की शबनम से, हर पल बौछार करूँगा।

"देव" तुम्हारी सूरत दिल की, दीवारों पर छपी हुयी है,
तुम्हे भूलकर जीवन नौका, बोलो कैसे पार करूँगा। "
........चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक-०३.१०.२०१५
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। "

Wednesday, 30 September 2015

♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मुझे आंसू भी दे डाले, मेरा दिल भी दुखाया है। 
किसी ने रात मेरे घर का दीपक, फिर बुझाया है। 
मेरी गलती महज इतनी, मैं सच का साथ दे बैठा,
ये दुनिया झूठ की थी पर, समझ में मुझको आया है। 

मगर मैं झूठ के लफ़्ज़ों को, कैसे मुंह बयानी दूँ। 
बहुत सोचा के झूठे पेड़ को, कैसे मैं पानी दूँ। 
बताओ "देव" कैसे बोल दूँ तेज़ाब को अमृत,
सिखाओ मैं अंधेरों को, भला क्यों जिंदगानी दूँ। 

सही है झूठ तो पुस्तक में, फिर क्यों सच पढ़ाया है।   
ये दुनिया झूठ की थी पर, समझ में मुझको आया है। "

........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-०१.१०.२०१५  
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। " 

Wednesday, 23 September 2015

♥ इंतजार की आंच...♥

♥♥♥♥♥♥♥♥ इंतजार की आंच...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मुझ बिन तरस रहा होगा वो, रोकर बरस रहा होगा वो।
इंतजार की आंच में देखो, कैसे झुलस रहा होगा वो।
मुझको तो एक लम्हे को भी, खाली आँगन नहीं सुहाता,
नहीं पता कि तनहा कैसे, सालों-बरस रहा होगा वो।

पेड़ से कोई पत्ता टूटे, देखके डाली भी रोती है।
यदि कोई अपना बिछड़े तो, आँख भले ये कब सोती है।
कांटो के बिस्तर सी यादें, उसको पल पल चुभती होंगी,
मिलना चाहा, नहीं मिल सके, शायद ये किस्मत होती है।

नशा न उतरा आज भी उसका, शायद चरस रहा होगा वो।
नहीं पता कि तनहा कैसे, सालों-बरस रहा होगा वो ....

होती है तकलीफ बहुत ही, जुदा यदि चाहत होती है।
नहीं चैन मिल पाता दिल को, और नहीं राहत होती है।
"देव " मुझे मालूम है लेकिन, मेरे हाथ में वक़्त नहीं है,
वक़्त यदि जो रुख बदले तो, रूह यहाँ आहत होती है।

बारिश के बिन कड़ी धूप में, व्याकुल, उमस रहा होगा वो।
नहीं पता कि तनहा कैसे, सालों-बरस रहा होगा वो। "

........चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक-२३.०९.१५
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। "

Sunday, 20 September 2015

♥♥कश...♥♥

♥♥♥♥♥♥कश...♥♥♥♥♥♥♥
सिगरेट के धुयें के कश में। 
नहीं जिंदगी मेरे वश में। 

थाने, जुर्म, कचहरी कम हों,
मसले जो सुलझें आपस में। 

मुश्किल हम पर भारी होंगी,
अगर कमी आयी साहस में। 

मर्यादा भी तार तार है,
नेता उतरे निरा बहस में। 

शबनम की एक बूंद मिली न,
गम की ज्वाला और उमस में। 

औरत भी इज़्ज़त के लायक,
गुंडे भूले यहाँ हवस में। 

"देव" ये लम्बी रात कटे न,
सांस घुटी हैं, यहाँ कफ़स में। "

........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-२०.०९.१५ 
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। " 

Monday, 14 September 2015

♥♥ सपनों के कण... ♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥ सपनों के कण... ♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
बिखरे हैं सपनों के कण कण, जिन सपनों को रात बुना था। 
चीख हुयी ज़ोरों की दिल से, मगर किसी ने नहीं सुना था। 
देह तड़पती रही सड़क पर, अरमानों का कत्ल हो गया,
मगर किसी ने दुखियारे का, एक चिथड़ा भी नहीं चुना था। 

ये पत्थर का जहाँ है शायद, पत्थर की दुनिया दारी है। 
कोई तड़पकर मर जाये पर, सबको अपनी जां प्यारी है। 
बेरहमी से लोग किसी के, जज़्बातों की हत्या करते,
निर्दोषों के पांव में बेड़ी, कातिल की खातिरदारी है। 

अनदेखा करते हैं उनको, दर्द वो जिनका कई गुना था। 
मगर किसी ने दुखियारे का, एक चिथड़ा भी नहीं चुना था …

वादा करके तोड़ दिये हैं और ऊपर से भ्रम करते हैं। 
लोग यहाँ सदमा देने का, बड़ा ही लम्बा क्रम करते हैं। 
"देव" यहाँ घड़ियाली आंसू, मगर रिक्त दिल अपनेपन से,
नहीं मिले २ वक़्त की रोटी, निर्धन कितना श्रम करते हैं। 

सींचा जिसको, छाया न दी, बीज वो शायद जला भुना था। 
मगर किसी ने दुखियारे का, एक चिथड़ा भी नहीं चुना था। "

........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-१५.०९.१५ 
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। " 

Friday, 11 September 2015

♥शब्दों का श्रृंगार...♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥शब्दों का श्रृंगार...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
शब्दों का श्रृंगार बनो तुम, मैं कविता रचना चाहता हूँ। 
बिना तुम्हारे न जाने क्यों, लिखने से बचना चाहता हूँ। 
मेरे शब्दों को अपना लो, बस मेरी इतनी सी ख्वाहिश,
न पुस्तक की मुझे तमन्ना, और नहीं छपना चाहता हूँ ,

तुम इतनी पावन प्यारी हो, शब्द समर्पित तुमको कर दूँ। 
मन करता तेरे आँचल में, भावों का जल अर्पित कर दूँ। 

तुम्हें मानकर प्रेम की देवी, नाम तेरा जपना चाहता हूँ। 
शब्दों का श्रृंगार बनो तुम, मैं कविता रचना चाहता हूँ। 

शब्द कोष के हर पन्ने में, तुम मुझको प्रेरित करती हो। 
तुम हो मेरी अनुभूति में, हर क्षण मेरा हित करती हो। 
 "देव" तुम्हारा प्रेम परिचय, कविता का आधार बन गया,
तुम शब्दों का अलंकार बन, मेरा मन मोहित करती हो। 

शायद प्रेम इसी को कहते, सब कुछ पूर्ण निहित होता है। 
जब देनी हो प्रेम परीक्षा, तब विष भी अमृत होता है। 

हम तुम दोनों साथ रहें बस, मैं ऐसा सपना चाहता हूँ। 
शब्दों का श्रृंगार बनो तुम, मैं कविता रचना चाहता हूँ। "

........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-१२.०९.१५ 
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Sunday, 6 September 2015

♥♥विवशता...♥♥

♥♥♥♥♥विवशता...♥♥♥♥♥
दो पल सुकूं नहीं जीने को।
नहीं प्यास में जल पीने को।
नहीं दवाई बीमारी में,
न कपड़ा लत्ता सीने को।

बुझती आँखों पे न चश्मा,
न सोने को दरी, खाट है।
तरस तरस के मिलती रोटी,
न जीवन में ठाठ बाट है।
झूठी जनसेवा के नाटक,
करने से न थमे गरीबी,
धनिक कुचलते बेरहमी से,
निर्धन के संग मार काट है।

लोग मजाकों में लेते हैं,
पीड़ा का जीवन जीने को।
नहीं दवाई बीमारी में,
न कपड़ा लत्ता सीने को...

बेटी बिन ब्याही घर में है,
देने को कुछ माल नहीं है।
फसलों को कुदरत ने रौंदा,
हंसी ख़ुशी का हाल नहीं है।
"देव " नहीं पैरों में चप्पल,
और पांवों में फटी बिबाई,
नहीं भुजाओं में दम बाकी,
और क़दमों में चाल नहीं है।

काश हो निर्धन की सुनवाई,
विवश न हो अश्रु पीने को।
नहीं दवाई बीमारी में,
न कपड़ा लत्ता सीने को। "

........चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक-०७.०९.१५
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Saturday, 15 August 2015

♥♥वर्षा का जल...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥वर्षा का जल...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
सावन तुम बिन शुष्क शुष्क है, तुम वर्षा का जल बन जाओ। 
बिना तुम्हारे पथ दुर्गम है, साथ चलो तुम बल बन जाओ। 
सखी ये मेरी प्रेम तपस्या, उसी दिवस तो सफल बनेगी,
आज, अभी के साथ साथ तुम, अगर हमारा कल बन जाओ। 

दीर्घकाल तक, जनम जनम तक, साथ तेरा पाना चाहता हूँ। 
इस सृष्टि के हर युग में मैं, साथ तेरे आना चाहता हूँ। 
तुम शब्दों की संवाहक बन, कविता की रचना कर देना,
और मैं बनकर कंठ सुरीला, भाव तेरे गाना चाहता हूँ। 

दिवस, रात तुम साँझ, सवेरे, तुम्ही पहर, तुम पल बन जाओ। 
सावन तुम बिन शुष्क शुष्क है, तुम वर्षा का जल बन जाओ ... 

निशा में तुम हो धवल चन्द्रमा, और दिवस में तुम दिनकर हो। 
तुम धरती की हरियाली में, इन्द्रधनुष का तुम अम्बर हो। 
"देव" तुम्हारे कदम पड़े तो, आँगन में खुशियां आयीं हैं,
तुम फूलों की खुशबु में हो, तुम मीठी हो, तुम मधुकर हो। 

जिसकी छाँव में सपने देखूं, तुम ऐसा आँचल बन जाओ। 
सावन तुम बिन शुष्क शुष्क है, तुम वर्षा का जल बन जाओ। "

........चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक-१५.०८.२०१५ 
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♥कैसी आज़ादी...♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥कैसी आज़ादी...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
बेटी जब महफूज नहीं तो आखिर कैसी आज़ादी है। 
नाम पे मजहब के दंगे हैं, जगह जगह पे बर्बादी है। 
चंद अरबपतियों का होना, नहीं देश के सुख का सूचक,
आँख से परदे हटें तो देखो, भूखी कितनी आबादी है। 

बेटी जब अँधेरे में भी, सही सलामत घर आयेगी। 
उस दिन ही सच्चे अर्थों में, ये आजादी मिल पायेगी। 

सज़ा मिले क्यों बेगुनाह को, दूर पकड़ से उन्मादी है। 
आँख से परदे हटें तो देखो, भूखी कितनी आबादी है....

आज़ादी का मतलब देखो एक सूत्र में बंध जाना है।  
आज़ादी का मतलब घर घर दीपक जल जाना है। 
"देव" वतन में सबको रोटी, कपड़ा, घर भी है आज़ादी,
आज़ादी का मतलब देखो, भ्रष्ट तंत्र का मिट जाना है। 

रोजगार के बिन युवकों की, जीवन धारा अवसादी है। 
बेटी जब महफूज नहीं तो आखिर कैसी आज़ादी है। "

........चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक-१५.०८.२०१५ 
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Tuesday, 11 August 2015

♥♥प्रश्न...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्रश्न...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
नहीं आग्रह, नहीं निवेदन, न प्रस्ताव, नहीं वाचन है।
प्रेम पथिक हूँ, भाव मार्ग पर, सदा तुम्हारा अभिवादन है।
स्मृति और छवि तुम्हारी, रहे मेरे व्याकुल नयनों में,
तुम बिन जीवन सूखा पौधा, और तुम बिन एकाकीपन है।
हाँ अयोग्य-सापेक्ष तुम्हारे, पर तुम जैसे बन नहीं सकता ।
मैं काजल सा, श्वेत वर्ण बन, अम्बर से भी छन नही सकता।
किन्तु फिर भी प्रीत का अंकुर उदय हुआ मेरे मन में।
जरा बताओ प्रश्न हमारा, प्रेम है क्या वर्जित जीवन में....
तुमने मेरा पक्ष सुना न, मनोदशा को जान सके न। 
मैं भी तुम जैसा मानव हूँ, बात कभी तुम मान सके न। 
मेरे पांवों में भी कांटे, चुभकर देखो रक्त निकलता,
एकपक्षीय ऐनक से तुम, मेरा दुख पहचान सके न।
द्वार पे तुमने ताले जड़कर, प्रतिबन्ध किये दर्शन में। 
जरा बताओ प्रश्न हमारा, प्रेम है क्या वर्जित जीवन में...
ज्यादा कुछ भी नहीं कहूँगा, केवल मैं इतना कहता हूँ। 
जरा सोचना उस बिंदु को, जिस स्थल पे मैं रहता हूँ। 
"देव" यदि तुम मेरी विरह के, भावों को अनुभूत करोगे,
तो तुम भी आश्चर्य करोगे, कैसे मैं जीवित रहता हूँ।
तुम बिन जग ऐसा लगता है, जैसे मैं हूँ निर्जन वन में। 
जरा बताओ प्रश्न हमारा, प्रेम है क्या वर्जित जीवन में। "
..................चेतन रामकिशन "देव"…….................
दिनांक-११.०८.२०१५ 
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Monday, 10 August 2015

♥♥बदनसीब...♥♥

♥♥♥♥♥बदनसीब...♥♥♥♥♥♥
कोई जब बदनसीब होता है। 
दर्द कितना करीब होता है। 

बस्तियां ढहतीं वो इशारों में,
जिनमें घर घर गरीब होता है। 

एक अरबों में, एक पाई में,
क्या सभी कुछ नसीब होता है। 

बेटा हो कोख में, तो खुशियां मनें,
बेटी पे दिल अजीब होता है। 

"देव" ये दर्द, कई गुना बढ़ता,
वक़्त जब भी रक़ीब होता है। "


.....चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक-१०.०८.२०१५   
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित।

Saturday, 8 August 2015

♥♥वजह ...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥वजह ...♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मुझसे मिलने की क्या वजह होगी। 
उसके दिल में क्या कुछ जगह होगी। 

क्या मिलेंगे मुझे मिलन के पल,
या बताओ के फिर विरह होगी। 

दर्द की रात कितनी लम्बी है,
क्या कभी इसकी भी सुबह होगी। 

रंजिशें रखता है जो मुझसे बहुत,
कैसे उस शख्स से सुलह होगी। 

वो न समझेंगे तो दुखेगा दिल,
उनसे तक़रार बेवजह होगी। 

कितना उड़ जाये पर नही वो गिरे,
सच की क़दमों में गर सतह होगी। 

"देव" जो होगा, देखा जायेगा,
या मिलन होगा के, कलह होगी। "

........चेतन रामकिशन "देव"…….
दिनांक-०८.०८.२०१५ 
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♥♥पासा...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥पासा...♥♥♥♥♥♥♥♥♥
न ही मरहम है, न दिलासा है। 
ढोंग है, झूठ है, तमाशा है। 

मेरी खिदमत बताओ अब क्यों भला,
कौनसी चाल का ये पासा है। 

प्यार का मेरे क़त्ल कर डाला,
क्या गुनाह तुमको ये जरा सा है। 

भूखे माँ बाप तरसें रोटी को,
जिनके बेटों पे नोट ख़ासा है। 

जो गुनहगार थे वो बच निकले,
बेगुनाहों को तुमने फांसा है। 

आसमां झाँका, नींद आई नहीं,
दर्द आँखों में बेतहाशा है। 

"देव" है नौजवां की बदहाली,
हाथ खाली है, और हताशा है। " 

........चेतन रामकिशन "देव"…….
दिनांक-०८.०८.२०१५ 
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Friday, 7 August 2015

♥♥जिद...♥♥

♥♥♥♥♥♥जिद...♥♥♥♥♥♥♥♥
टूटते ख्वाब जोड़ने की जिद। 
गम की चट्टान तोड़ने की जिद। 

आ रहा है जो, दर्द का तूफां,
उसको वापस ही मोड़ने की ज़िद। 

जिसने इलज़ाम ही दिये मुझको, 
वो शहर तेरा छोड़ने का ज़िद। 

वक़्त ने मेरे पंख काटे जब,
होंसला लेके दौड़ने की जिद। 

"देव" तुम प्यार से तो ले लो जां,
आँख दुश्मन की फोड़ने की जिद। "

........चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक-०७.०८.२०१५  
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Tuesday, 4 August 2015

♥शर शैय्या...♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥शर शैय्या...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
 भीष्म पिता के जैसे मुझको, शर शैय्या पे सुला दिया है। 
रक्त वो मेरा देख के हर्षित, मेरे दुःख को भुला दिया है। 
मैंने जिनके अभियोजन में, हर क्षण ही संवाद किया था,
आज उसी ने निर्ममता से, मुझको फांसी झुला दिया है। 

अंतहीन सी मानवता है, दया किसी में शेष नहीं है। 
पत्थर जैसे हृदय हुये हैं, भावों का अवशेष नहीं है। 
धनिकों के तो जरा घाव पर, यहाँ चिकित्सक बहुत खड़े पर,
किन्तु देखो स्वास्थ्य गृहों में, निर्धन का प्रवेश नहीं है। 

कल तक जिसमें खेला था वो, उस घर को ही जला दिया है। 
भीष्म पिता के जैसे मुझको, शर शैय्या पे सुला दिया है... 

जाने कैसा काल, समय है, जाने क्या जीवन यापन है। 
यहाँ भूख से मरता कोई, और कहीं पैसों का वन है। 
"देव " किसी की आँख में आंसू, फर्क नहीं पर पड़ता कोई,
अंदर से मन में कालापन, और बाहर से उजला तन है। 

मेरे कोमल अंतर्मन को, अम्ल धार से जला दिया है। 
भीष्म पिता के जैसे मुझको, शर शैय्या पे सुला दिया है।"

..................चेतन रामकिशन "देव"………..............
दिनांक-०४.०८.२०१५
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Saturday, 11 July 2015

♥♥प्रेम घटक...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्रेम घटक...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तुम्हें लगा वो मृगतृष्णा थी, मुझे लगा वो प्रेम घटक था। 
मैं अपने मन से रत्नाकर, तुम्हे लगा के मैं पावक था। 
अपने भावों का सत्यापन, निशा दिवस तुमसे करके भी,
तुमने संज्ञा दे दी मुझको, मैं पीड़ा का संवाहक था। 

अविरल जब है प्रेम की धारा, उसे लोग बाधक करते हैं। 
नहीं सुनेगे भाव किसी के, केवल अपनी हठ करते हैं। 

श्राप दिया उसने ही मुझको, मैं तो जिसका आराधक था। 
तुम्हें लगा वो मृगतृष्णा थी, मुझे लगा वो प्रेम घटक था.... 


मैं मानव था, इच्छा भीं थी, पर वो भी जगदीश नहीं थे। 
मेरा मन-तन उन जैसा था, क्या उनके तन शीश नहीं थे। 
मैं भी जन था हाड़ मांस का, रक्त मेरे घावों में भी है,
क्यों कर उनके शब्दकोष में, मेरे हित-आशीष नहीं थे। 

क्या अपराध किया जो मैंने, उनको अपना सब कुछ माना। 
जिसके अश्रु पान किये थे, उसने मेरा दुःख न जाना। 

मुझको काटा निर्ममता से, वृक्ष में जबकि फलदायक था। 
तुम्हें लगा वो मृगतृष्णा थी, मुझे लगा वो प्रेम घटक था.... 

रिक्त हो गया कोष शब्द का, न कुछ भी कहने का मन है। 
अब तो इतना मान लिया के, दंड भोगना ही जीवन है। 
"देव" प्रेम के पूर्ण भाव से, सींचके पौधे भी क्या पाया,
मेरे पांवों में कांटे और, मेरे हिस्से सूखा वन है। 

सीख लिया है अनुभूति की, गंगा नहीं बहाई जाये। 
जो नहीं सुनता भाव वंदना, उसको नहीं सुनाई जाये। 

वो सक्षम थे, सुन सकते थे, मैं उनके सम्मुख याचक था। 
तुम्हें लगा वो मृगतृष्णा थी, मुझे लगा वो प्रेम घटक था। "

.........चेतन रामकिशन "देव"………
दिनांक-१२.०७.२०१५ 
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Friday, 10 July 2015

♥♥सूखी हथेली...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥सूखी हथेली...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
रही हथेली सूखी सूखी, बारिश में फैलाई भी थी। 
न बख्शा ज़ख्मों को मरहम, चोट उन्हें दिखलाई भी थी। 
आज वो लेकर हुनर प्यार का, मुझसे दूर गया तो क्या है,
एक दिन मुझको रीत प्यार की, उसने ही सिखलाई भी थी। 

लेकिन जब जाना होता है, तो आना ये क्यों होता है। 
कोई बिछड़ कर जाता है तो, दिल आखिर ये क्यों रोता है। 
यदि कुचलना ही होता है, यौवन धारित हरे वृक्ष हो,
तो मानव फिर बीज नेह के, किसी के मन में क्यों बोता है। 

चलो जिंदगी गयी भी तो क्या, क़र्ज़ में यूँ तो पाई भी थी। 
रही हथेली सूखी सूखी, बारिश में फैलाई भी थी.... 

चलो दशा ये अपने मन की, और पीड़ा ये अंतर्मन की। 
न ख़्वाहिश हमको मलमल की, न हसरत मुझको सावन की। 
"देव" लिखा है जो कुदरत ने, शायद ये परिदृश्य वही है.
न इच्छा है पुनर्जन्म की, न चाहत है नवजीवन की। 

भूल गया सब गति शीलता, जो अधिगम से आई भी थी। 
रही हथेली सूखी सूखी, बारिश में फैलाई भी थी। "

.........चेतन रामकिशन "देव"………
दिनांक-११.०७.२०१५ 
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♥दूर जाने की...♥

♥♥♥♥♥दूर जाने की...♥♥♥♥♥♥
दूर जाने की बात करने लगे। 
तुम उदासी की रात करने लगे। 

क्या मिले या नहीं मिले कुछ भी,
बिन लड़े अपनी मात करने लगे। 

जिससे दिल छलनी हो, बहें आंसू,
तुम भी वो वाकयात करने लगे। 

था यकीं जिनपे खुद पे ज्यादा,
वो भी गैरों सा, घात करने लगे। 

हार जाऊं, मैं तेरा मंसूबा,
पीठ पीछे बिसात करने लगे।  

प्यार में छोटा, क्या बड़ा कोई,
आज मजहब, क्यों जात करने लगे। 

"देव" हम दोस्त थे, नहीं दुश्मन,
हमसे क्यों एहतियात करने लगे। "

.........चेतन रामकिशन "देव"………
दिनांक-१०.०७.२०१५  
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