Thursday, 1 December 2011

♥♥तुम्हारी छवि ♥♥♥

"♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥तुम्हारी छवि ♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
छवि तुम्हारी है इतनी सुन्दर, के जैसे खिलता सुमन हो कोई!
तुम्हारा मन है विशाल इतना, के जैसे अम्बर-गगन हो कोई!
नयन तुम्हारे हैं इतने प्यारे, के उनकी उपमा क्या कर सकूँ मैं,
तुम्हारी बोली है इतनी प्यारी, के कोकिला को जलन हो कोई!"

..................चेतन रामकिशन "देव"..............................


Wednesday, 30 November 2011

♥♥कलम हुआ खामोश♥♥


"♥♥♥♥♥♥♥♥कलम हुआ खामोश♥♥♥♥♥♥♥
काल ने तोड़ी साँस की डोरी, कलम हुआ खामोश!
ये सुनकर के सजल हुआ है , शब्द का हर एक कोष!

ज्ञानपीठ की रहीं विजेता, इंदिरा जिनका नाम!
सदा ही प्रेषित किया उन्होंने, मानवता का ज्ञान!
अपने ओजस्वी लेखन से, दर्पण हमे दिखाया,
देह से जीवित भले न हों वो, रहेगा जीवित नाम!

इतनी जल्दी चली गईं वो, होता है अफ़सोस!
काल ने तोड़ी साँस की डोरी, कलम हुआ खामोश"

"डॉ. इंदिरा गोस्वामी जी ( ज्ञानपीठ पुरुस्कार विजेता) का आज देहांत हो गया! शब्दों का एक बहुत बड़ा प्रेमी हमसे,  देह रूप से बहुत दूर चला गया! उनके शब्द इस संसार में स्वर्ण की तरह जगमग होते रहेंगे! क्यूंकि अनमोल शक्तियाँ कभी मृत नहीं होती हैं!===उन्हें नमन- चेतन रामकिशन "देव"

"साभार- जनाब खुर्शीद हयात जी!

♥♥मगर गरीबी सहन हो कब तक.

"♥♥♥♥♥♥♥♥♥मगर गरीबी सहन हो कब तक... ♥♥♥♥♥♥
तरस रहा है गरीबी में वो, है भूख से उसका पेट खाली!
हमारे नेता घरों में अपने, मना रहे हैं मगर दिवाली!
हजार खूनों के दोषियों को, यहाँ पे फांसी नहीं मिली है
महज तमाचा ही जड़ने वाला, बना दिया है बड़ा मवाली!

सही है ये था गलत तरीका, मगर गरीबी सहन हो कब तक!
अमीर नेता बिछायें मखमल, मगर गरीबी दहन हो कब तक!

हमारे नेता नहीं समझते, गरीब लोगों की तंगहाली!
तरस रहा है गरीबी में वो, है भूख से उसका पेट खाली........

नहीं सुनेंगे यदि जो नेता, तो जनता कब तक शिथिल रहेगी!
कभी तो उसके लहू की धारा, रगों में तपकर उबल पड़ेगी!
चलो हमारे वतन को छोड़ा, किया है अरसे से राज तुमने,
सियासियों को पकड़ पकड़ के, करोरों जनता यही कहेगी!

सही है ये था गलत तरीका, मगर ये पीड़ा सहन हो कब तक!
महज ही ३२ रूपये में आखिर, ये जिंदगानी वहन हो कब तक!

सफेदपोशों के दिन हैं उजले, है रात उनकी बड़ी निराली!
तरस रहा है गरीबी में वो, है भूख से उसका पेट खाली......

अभी समय है बदल लो अपनी, ये राजनीति गलत दिशा की!
ये झोलियाँ बस भरो न अपनी, कभी तो देखो दुखी दशा भी!
नहीं जो बदले अभी भी जो तुम, ये "देव" जीवन नहीं चलेगा,
नहीं दिवस हों तुम्हारे उजले, तिमिर में डूबेगी ये निशा भी!

सही है ये था गलत तरीका, मगर ये जिन्दा जलन हो कब तक!
ये आंख कब तक गिरायें आंसू, दिलों में ऐसी दुखन हो कब तक!

सफेदपोशों के दिन हैं उजले, है रात उनकी बड़ी निराली!
तरस रहा है गरीबी में वो, है भूख से उसका पेट खाली!"


"राज्य के सञ्चालन की नीति राजनीति को, सत्ता को जब जब अपने कुल/ अपनी बपौती समझा जाता है तो जनता की रगों का खून भी गरम होने लगता है! राजनेतिक लोगों को चिंतन करना चाहिए देश हित में! आखिर जनता क्या चाहती है? सरकारी धन को लूटना, खाना, और ऐश करना राजनीति नहीं!----

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक---३०.११.२०११

Tuesday, 29 November 2011

♥♥अंतिम विरह की पीड़ा ♥♥♥♥♥

"♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥अंतिम विरह की पीड़ा ♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
विरह के बेला नहीं है कटती, मिलन के सपने बड़े सताते!
हमारे आंसू बिलख बिलख कर, तुम्हें बुलाते, तुम्हें बुलाते!
हमारी आँखों के नीचे देखो, पड़े हैं गहरे निशान काले,
बिना तुम्हारे हमें सनम अब, ख़ुशी के पल भी नहीं सुहाते!

खुदा भी जाने क्यूँ ले गए हैं, हमारे घर से तुम्हें बुलाकर!
खुदा से पूछो जियूं मैं कैसे, तुम्हें भुलाकर, तुम्हें भुलाकर!

तुम्हारे बिन तो ये आईने भी, ख़ुशी की सूरत नहीं दिखाते!
विरह के बेला नहीं है कटती, मिलन के सपने बड़े सताते......

क्यूँ इतना कम था तुम्हारा जीवन, हमे अधूरा क्यूँ कर गए हो!
हमारे जीवन के पहलुओं पर, क्यूँ याद बनके बिखर गए हो!
कोई भी रस्ता नहीं है दिखता, जो पीछे पीछे मैं तेरे आऊ,
न लौटकर आओगे कभी तुम, क्यूँ इतने लम्बे सफ़र गए हो!

खुदा भी जाने क्यूँ ले गए हैं, हमारे घर से तुम्हें बुलाकर!
हमारी आँखों को नीर देकर, हमे रुलाकर, हमे रुलाकर!

तुम्हारे बिन तो हँसी ठहाके, हमारे मन को नहीं हँसाते!
विरह के बेला नहीं है कटती, मिलन के सपने बड़े सताते......

खुदा हमारी सुनो जरो तुम, सफ़र में तन्हा किया करो ना!
नहीं है कटती उम्र ये तन्हा, किसी को विरहा दिया करो ना!
ये "देव" कितना हुआ है तन्हा, जरो तो सोचो तड़प हमारी,
जुदाई के पल नहीं सुहाते, जुदा किसी को किया करो ना!

खुदा भी जाने क्यूँ ले गए हैं, हमारे घर से तुम्हें बुलाकर!
खुदा से पूछो जियूं मैं कैसे, तुम्हें भुलाकर, तुम्हें भुलाकर!

तुम्हारे बिन तो पड़ोसियों के, वो नन्हें बच्चे नहीं चिढाते!
विरह के बेला नहीं है कटती, मिलन के सपने बड़े सताते!"

" किसी के जीवन से किसी से चले जाने से जीवन का पक्ष निश्चित रूप से प्रभावित
होता है! किसी के असमय चले जाने से होने वाली पीड़ा बड़ा सताती है! उसी पीड़ा को अपने शब्दों में उकेरने का छोटा सा प्रयास किया है! www.chetankavi.blogspot.com

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-- २९.११.२०११

Monday, 28 November 2011

♥आंसुओं की फुहार कर के♥♥


"♥♥♥♥♥♥♥♥आंसुओं की फुहार कर के♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
किया है तन्हा हमें उन्होंने, हमारी उल्फत को मार कर के!
हमे रुलाके चले गए वो, भुला दिया हमको प्यार कर के!
कहाँ गईं वो कसम वफ़ा की, मिलन के वादे कहाँ गए हैं,
चले गए हैं यहाँ से हंसकर, वो आंसुओं की फुहार कर के!"
                                                                        ..........चेतन रामकिशन "देव"....

♥♥दुःख( सुख की बेला) ♥♥

"♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥दुःख( सुख की बेला) ♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
ह्रदय की पीड़ा सहन करो तुम, कोई तुम्हारी नहीं सुनेगा!
कोई तुम्हारे पथों से कंटक, नहीं चुनेगा, नहीं चुनेगा!
न टूटना तुम दुखों से अपने, कभी तो सुख का सवेरा होगा,
कोई तुम्हारे नयन के सपने, नहीं बुनेगा, नहीं बुनेगा!

ये जिंदगी है ही नाम इसका, दुखों की बेला, सुखों का सावन!
दुखों से डरकर नहीं रहो तुम, कभी तो सुख का मिलेगा यौवन!

वही संभल कर है आगे बढ़ता, जो खाके ठोकर कभी गिरेगा!
ह्रदय की पीड़ा सहन करो तुम, कोई तुम्हारी नहीं सुनेगा......

कभी है बेकारी की तड़प तो, कभी मोहब्बत हमे रुलाती!
कभी पराजय सताए हमको, कभी गरीबी हमे सताती!
कभी गगन में भी उड़ता जीवन, कभी जमीं की है धूल मिलती,
ये जिंदगी है ही नाम इसका, कभी गिराती, कभी उठाती!

तपन में दुःख की नहीं जलो तुम, ख़ुशी भी तुमको करार देगी!
तुम्हारे चेहरे के कालेपन को, ये जिंदगी ही निखार देगी!

उसी का जीवन बढेगा आगे, जो जिंदगी से नहीं डरेगा!
ह्रदय की पीड़ा सहन करो तुम, कोई तुम्हारी नहीं सुनेगा......

ये जिंदगी है ही नाम इसका, हमेशा इसमें ख़ुशी नहीं है!
मगर ये मानव की जिंदगानी, यूँ ही किसी को मिली नहीं है!
दुखों के डर से नहीं कहो तुम, है "देव" हमको दिला दे मुक्ति,
किसी के मुक्ति भी मांगने से, किसी को मुक्ति मिली नहीं है!

तो जिंदगी जब है काटनी तो, चलो के हिम्मत से हम जियेंगे!
नहीं दुखों से डरेंगे हम तो, हम अपने आंसू स्वयं पियेंगे!

वही रहेगा हमेशा जिन्दा, जो अपने मन से नहीं मरेगा!
ह्रदय की पीड़ा सहन करो तुम, कोई तुम्हारी नहीं सुनेगा!"

" पीड़ा, से मन को वेदना अपर मिलती है किन्तु ये जीवन अनवरत चलने का नाम है! हमे पीड़ा से उर्जा प्राप्त करनी होगी! हमे खुद को सहनशील बनाना होगा! तभी हम जीवन को संघर्ष के साथ जी सकेंगे! तो आइये पीड़ा को सहन करने के लिए सहनशीलता को उन्नत करें! 
चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक- २८.११.२०११ 

Wednesday, 23 November 2011

♥निराशा( असफलता की जननी)♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥निराशा( असफलता की जननी)♥♥♥♥♥♥♥♥♥
निराश होकर के जिंदगी में, नहीं मिलेगी कभी सफलता!
ये जिंदगी है ही नाम इसका, कभी विषमता, कभी सरलता! 
ना दोष दो तुम खुदा को अपने, करो तो मेहनत सही दिशा में,
बिना कर्म के चरागे-किस्मत, उम्र में पूरी कभी ना जलता!

निराश रहने से तो हमेशा, विचार मैले ही बन सकेंगे!
सदा डिगेंगे पथों से अपने, नहीं निशाने पे ठन सकेंगे!

निराश भावों से जिंदगी के ग़मों का मौसम नहीं बदलता!
निराश होकर के जिंदगी में, नहीं मिलेगी कभी सफलता.......

निराश होना नहीं सुहाता, ख़ुशी के पल भी नहीं दमकते!
निराश भावों के इस तिमिर में, हँसी के तारे नहीं चमकते!
निराश होके तो जिंदगी में, सदा ही कांटे मिलेंगे तुमको,
निराश भावों के बागवां में, ख़ुशी के गुलशन नहीं महकते!

निराश रहने से तो हमेशा, विचार मैले ही बन सकेंगे!
रहेंगे हाथों पे हाथ रखकर, नहीं हमारे कदम बढ़ेंगे!

निराश शब्दों से जिंदगी में, नहीं मिलेगी कभी सबलता!
निराश होकर के जिंदगी में, नहीं मिलेगी कभी सफलता.......

चलो के बदलें मनन का अपने, मनों में आशाओं को वसायें!
हमे मिलेगी सफलता सच में, सही दिशा में कदम बढायें!
निराशा भावों से "देव" जीवन सदा ही लगता है बोझ जैसा,
मनों में साहस भरें चलो हम, विपत्ति में भी हम मुस्कुरायें!

निराशा भावों से तो हमेशा, विचार मैले ही बन सकेंगे!
रहेगी भूमि सदा ही बंजर, जमीं में अंकुर नहीं उगेंगे!

निराश चिंतन से जिंदगी में, ख़ुशी का सूरज नहीं निकलता!
निराश होकर के जिंदगी में, नहीं मिलेगी कभी सफलता!"


"दुःख और सुख जिंदगी के हिस्से हैं! निराशा के साथ जिंदगी जीना,
जीवन की निर्णायक सोच को प्रभावित करता है! निराशा व्यक्ति के जिंदगी से
उसके साहस का अंत करती है और वो व्यक्ति सबल होते हुए भी
अपनी हिम्मत/ मेहनत का अंत कर देता है! तो आइये आशावान बनें!

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक- २४.११.२०११









 

Saturday, 19 November 2011

♥दहेज़ की अगन♥


"♥♥♥♥♥♥♥♥दहेज़ की अगन♥♥♥♥♥♥♥♥♥
बड़े अरमान लेकर के पति के घर वो आई थी!
नए माहौल में उसने नई दुनिया वसाई थी!
वो जिसको मांग में सिंदूर भरकर पूजती रहती,
उसी लोभी ने उसकी देह की होली जलाई थी!

उन्हें करके भी ऐसे पाप, न अवसाद होता है!
तमाशा देखते हैं वो, कोई बरबाद होता है!

पड़ी है राख- चिंगारी जहाँ मखमल बिछाई थी!
बड़े अरमान लेकर के पति के घर वो आई थी......

पिता ने कर्ज लेकर के ब्याह उसका रचाया था!
उधर से मांग जो आई वही सामान लाया था!
बड़ी आशाओं से उसने दिया था हाथ बेटी का,
नयन में नीर भरके बेटी को डोली बिठाया था!

कभी सोचा भी ना था बेटी का ये हाल कर देंगे!
वो उसकी चांदनी को इस तरह से लाल कर देंगे!

हुई दुनिया से वो रुखसत, करी जिसकी विदाई थी!
बड़े अरमान लेकर के पति के घर वो आई थी......

हजारों नारियों के साथ ऐसा रोज करते हैं!
कभी प्रहार करते हैं, कभी आरोप जड़ते हैं!
यहाँ लगती हैं मिथ्या "देव" नारी मुक्ति की बातें,
यहाँ नारी के रखवाले ही उनसे युद्ध लड़ते हैं!

पति की आयु-वृद्धि को, सदा मंदिर भी जाती थी!
चरण छूती थी भगवन के, वहां मस्तक झुकाती थी!

उसी ने मौत दी, जिसके लिए बाती जलाई थी!
बड़े अरमान लेकर के पति के घर वो आई थी!"


" दहेज़ के लिए नारी की देह को जलाना, उत्पीड़न करना, आज भी व्यापक स्तर पर है! नारी भी मानव है, पीड़ा की अनुभूति उसे भी होती है! आखिर हम प्रेम और अपनेपन की बजाये क्यूँ विवाह जैसे बंधन में सौदेबाजी करते हैं और मनचाहा ना मिलने पर ऐसी अमानवीय हरकत करते हैं! तो आइये इस दशा को सँभालने में अपने स्तर से सहयोग करें!-
   दिनांक--२०-११-2011                                        चेतन रामकिशन "देव"

Thursday, 17 November 2011

♥♥धुंधली चांदनी ♥♥


"♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥धुंधली चांदनी ♥♥♥♥♥♥♥♥♥
सुबह की लाल किरणें हों या रात की हो चांदनी!
बिन तेरे ए सनम मेरे, धुंधली है हर एक रोशनी!
ये जहाँ तुम बिन अधूरा लग रहा है रात-दिन,
लौट आओ फिर सनम तुम, दूर कर दो हर कमी!

घर का हर कोना है सूना, बिन तेरी आवाज के!
कल के सपने भी हैं टूटे, टूटे सपने आज के!

तेरे बिन हर एक ख़ुशी है, घर के बाहर ही थमी!
सुबह की लाल किरणें हों या रात की हो चांदनी..............

कोई धुन मन को न भाए, तेरी पायल के सिवा!
चल रहीं हैं आँधियां पर, लग रही चुप चुप हवा!
अब दवायें कम न करतीं, मेरी पीड़ा की तड़प,
तेरे हाथों के छुअन बिन, बेअसर है हर दवा!

जिंदगी लगती है सूनी, बिन तुम्हारे साथ के!
उंगलिया भी आना चाहें, पास तेरे हाथ के!

बिन तेरे ना हैं सुहाते, चाँद, तारे और जमीं!
सुबह की लाल किरणें हों या रात की हो चांदनी..............

तुम न जाने क्यूँ गए हो, तोड़के हर एक कसम!
एक पल भी क्या तुम्हें हम, याद न आए सनम!
"देव" तेरे बिन जहाँ में, बस तिमिर की छांव है,
बिन तेरे जीवन अधूरा, है अधूरा ये जनम!

तेरे बिन बेजान लगते, शब्द भी और सार भी!
मन भी मेरा रो रहा है, टूटे दिल के तार भी!

बिन तुम्हारे रहती है इन, आँखों में हर दम नमी!
सुबह की लाल किरणें हों या रात की हो चांदनी!"


"किसी अपने के जीवन से चले जाने से, जीवन का पक्ष निश्चित रूप से प्रभावित होता है! व्यक्ति, जीवित रहते हुए भी अकेला रहता है और हतौत्साहित रहता है! उसके जीवन का अकेलापन उसके साहस को कुरेदता है! तो आइये किसी के जीवन से जाने से पहले सोचें--------चेतन रामकिशन "देव"



Tuesday, 15 November 2011

माँ( ममतामयी छवि)♥

"♥♥♥♥ माँ( ममतामयी छवि)♥♥♥♥♥♥
वो प्रेम है, दुलार है, ममतामयी छवि है!
लोरी हमे सुनाती, वो स्नेह की छवि है!
दुनिया में कोई दूसरा उस जैसा नहीं है,
चंदा की चांदनी है वो, प्रकाश का रवि है!

हे माँ! तुम्हारी तुलना कोई कर नहीं सकता!
गणना तुम्हारे त्याग की कोई कर नहीं सकता!

संसार के हर रत्न से अनमोल वो निधि है!
वो प्रेम है, दुलार है, ममतामयी छवि है........

वो सत्य का दर्पण है,वो आशाओं की लड़ी!
दुर्गम कठिन पथों पे है माँ साथ में खड़ी!
मिथ्या का रंग उसपे कभी चढ़ नहीं पाया,
बातें हैं मेरी माँ की सदा सत्य से जड़ी!

हे माँ! तुम्हारी तुलना कोई कर नहीं सकता!
गणना तुम्हारे त्याग की कोई कर नहीं सकता!

करुणा के छीर जैसी माँ बहती हुई नदी है!
वो प्रेम है, दुलार है, ममतामयी छवि है........

खुद रहके भी दुखों में हमें, हर्ष माँ देती!
उलझन को हमारी सदा निष्कर्ष माँ देती!
आओ के "देव" माँ की करें वंदना सभी,
देती है जन्म भी हमें उत्कर्ष माँ देती!

हे माँ! तुम्हारी तुलना कोई कर नहीं सकता!
गणना तुम्हारे त्याग की कोई कर नहीं सकता!

माँ के ह्रदय में कोई कपट और न बदी है!
वो प्रेम है, दुलार है, ममतामयी छवि है!"


"माँ- के बारे में लिखने के लिए संसार का हर शब्दकोष छोटा है! माँ अतुलनीय है! माँ वन्दनीय है! माँ अनमोल है! माँ संसार की सबसे अमूल्य निधि है! तो आइये माँ का सम्मान करें-------चेतन रामकिशन "देव"






Tuesday, 18 October 2011

*आई वही गुलामी***


**********आई वही गुलामी****************
"एक दिवस की आजादी थी, आई वही गुलामी!
माँ जननी की तस्वीरें फिर, लगती हमे पुरानी!
झंडे भी तह करके हमने, बक्सों में रख डाले,
सुप्त हो गया चिंतन मंथन, शीतल हुई जवानी!

जकड़ गयी माँ जननी फिर से, जागा भ्रष्टाचार!
सत्ताधारी दमन कर रहे, जनता का अधिकार!

लहू की स्याही सूख गई है, कैसे बढ़े कहानी!
एक दिवस की आजादी थी, आई पुन: गुलामी..........

इन्कलाब के नारों की भी, शांत हुई आवाज!
जंग लग गया है पंखो में, सुप्त हुई परवाज!
चोराहों पर पड़े सुनाई, फिर से फूहड़ गीत,
तहखाने में डाल दिए हैं, राष्ट्रगान के साज!

अंग्रेजो का रूप धर रही, देश की हर सरकार!
सिंहासन देने वालों पर, करती अत्याचार!

अरबों में भी नहीं है कोई , भगत सा स्वाभिमानी!
एक दिवस की आजादी थी, आई वही गुलामी!

आजादी के दिन ही बंटती, निर्धन को खैरात!
अँधेरे में फुटपाथों पर कटती उसकी रात!
चौराहे पर मिलती रहती, भूखी प्यासी लाश,
किन्तु शासन प्रशासन को आम हुई ये बात!

देश की धड़कन थमी "देव" है,  न उर्जा संचार!
सत्ताधारी दमन कर रहे, जनता का अधिकार!

नेताओं ने बदले चेहरे, नियत वही पुरानी!
एक दिवस की आजादी थी, आई वही गुलामी!"


"१५ अगस्त की आजादी हमने जी ली! जमकर नारे लगा लिए, फिर गुलामी आ गयी है, क्यूंकि हमने देश से कभी उस तरह प्रेम ही नहीं किया, जैसे माँ के साथ करते हैं! जैसे प्रेयसी के साथ करते हैं! तो चलो हम सबको फिर से गुलामी मुबारक- चेतन रामकिशन "देव"

♥सोच का परिवर्तन ♥


"♥♥♥♥♥♥सोच का परिवर्तन ♥♥♥♥♥♥
मन में अपने प्रेम रखो तुम, होठों पे मुस्कान!
आगे बढ़ने से पहले पर, त्याग चलो अभिमान!
साहस को जीवन में भरके, सच्चाई के साथ,
मजहब से ऊपर उठकर के, बनो जरा इंसान!

नैतिकता और मर्यादा का कभी न करना ह्रास!
ना कमजोरी लाना मन में, ना टूटे विश्वास!

सबको अपने गले लगाओ, सबको दो सम्मान!
मन में अपने प्रेम रखो तुम, होठों पे मुस्कान...............

जीवन में मुश्किल से डरकर, ना होना भयभीत!
कदम बढ़ाना सही दिशा में, मिलेगी तुमको जीत!
किसी के घावों पर मरहम का तुम कर देना लेप,
पत्थर में भी जग जाएगी, मानव जैसे प्रीत!

कभी उड़ाना ना निर्धन का, तुम मित्रों उपहास!
नहीं कोई ऊँचा नीचा है, सब अपने हैं खास!

मानवता का कभी ना करना तुम कोई अपमान!
मन में अपने प्रेम रखो तुम, होठों पे मुस्कान............

मृत्य का भय करना छोड़ो, ना मानो तुम हार!
खुद तुममें ईश्वर रहता है, तुम हो रचनाधार!
"देव" जगाओ अपने मन में तुम चिंतन की सोच,
ऐसा एक इतिहास बनाओ, याद करे संसार!

सच्चाई के दम के आगे तो झुकता आकाश!
आओ करें हम इस जीवन में एक ऐसा प्रकाश!

इन शब्दों से आप सभी का करता हूँ आह्वान!
मन में अपने प्रेम रखो तुम, होठों पे मुस्कान!"


"जीवन, महज जीने का नाम नहीं है! बल्कि कुछ कर दिखाने का, इतिहास बनाने का नाम है! एक दूजे से प्रेम करने का नाम है! तो आइये सोच का परिवर्तन करें!-चेतन रामकिशन "देव"


♥फौजी(सच्चा पहरेदार) ♥



"♥♥♥♥♥♥फौजी(सच्चा पहरेदार) ♥♥♥♥♥♥
"देश का फौजी मेरे देश का सच्चा पहरेदार!
वो करता है शत्रु पर बिजली बनकर प्रहार!
देश की शान खातिर वो दे देता अपनी जान,
शीश झुकाकर जीने से तो, मौत उसे स्वीकार!

फौजी रातों को जगता है, तब हम लें आराम!
फौजी तुझको नमन है मेरा, है मेरा प्रणाम!

फौजी करता माँ जननी के मस्तक पर श्रंगार!
देश का फौजी मेरे देश का सच्चा पहरेदार........

लेह का दुर्गम स्थल हो या देश की सीमा रेखा!
फौजी डटकर खड़ा रहा है, अपना दुःख न देखा!
पानी के भीतर से भी करता है पहरेदारी,
और गगन में उड़कर उसने, इस भूमि को देखा!

कड़क धूप की अग्नि हो या हो फिर शीतल सर्दी!
नहीं थकी है भूख प्यास से, एक फौजी की वर्दी!

फौजी हम सब पर करता है, जीवन भर उपकार!
देश का फौजी मेरे देश का सच्चा पहरेदार........

देश का फौजी अपना गौरव, अपना स्वाभिमान!
आओ करें हम सब फौजी का प्रेम भरा सम्मान!
"देव" तुल्य होता है फौजी, रक्षित करता प्राण,
इस फौजी ने ही रखी है , माँ जननी की आन!

माँ जननी भी फौजी पर ही करती है विश्वास!
इस फौजी ने कभी न तोड़ी, माँ जननी की आस!

तिलक लगाकर हम फौजी का करें चलो सत्कार!
देश का फौजी मेरे देश का सच्चा पहरेदार!"

"फौजी- देश की धड़कन ही हैं! सीमा पर जब ये जागते हैं तब देश सोता है! सच में लाल बहादुर जी ने सच ही कहा था कि, जय जवान! जय किसान! तो आइये हम भी फौजी को सम्मान दें! -चेतन रामकिशन "देव"

Monday, 10 October 2011

**नहीं रहे जगजीत!*********

"********नहीं रहे जगजीत!**************
हर एक आंख से बहते आंसू, नहीं रहे जगजीत!
हार गया है जीवन उनका , मौत गयी है जीत!

मीठी मीठी गजलों की भी सुप्त हुई आवाज!
शब्द अकेले में रोते हैं, हुए हैं गुमसुम साज!
हवा के झोंको में भी होती अश्रु की अनुभूति,
गली गली में शहर शहर में है, खामोशी आज!

प्रेम की गजल सुनाने वाले नहीं रहे वो मीत!
हर एक आंख से बहते आंसू, नहीं रहे जगजीत!"


......................नम आँखों के साथ, स्वर्गीय जगजीत जी को नमन!
चेतन रामकिशन "देव"

♥♥महर्षि बाल्मीकि ♥♥♥

"♥♥♥♥♥♥♥♥महर्षि बाल्मीकि ♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
आदि कवि के रूप में उनकी सदा रही पहचान!
उनके कलम से हुआ है, प्रकट रामायण का ज्ञान!
ओजस्वी और तेजस्वी जन, नहीं जात में बंधते,
सभी को समरसता देते हैं, उनके कर्म महान!

आओ महर्षि के चरणों में, नमन करें हम लोग!
उनसे सीखें ज्ञान, अहिंसा, सच्चाई का योग!

स्वर्ण रंगों से अंकित होता उनका उज्जवल नाम!
आदि कवि के रूप में उनकी सदा रही पहचान!"

"महर्षि बाल्मीकि जी के प्रकट दिवस पर, उन्हें नमन करें!
उनके जीवन दर्शन से सत्य, अहिंसा, साहित्य, सद्भाव को
ग्रहण करें!-----------चेतन रामकिशन "देव"

Wednesday, 5 October 2011

♥♥ पुतला दहन दशानन ♥ ♥


"♥ ♥ ♥ ♥ ♥♥ पुतला दहन दशानन ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥

दुरित सोच का अंत नहीं है, नहीं सत्य का पालन!
ऐसे में बस लगे निरर्थक, पुतला दहन दशानन!

आज भी सीता को हरते हैं, देश में ढेरों रावण!
अपने झूठ के सम्मुख लगता, उनको सच साधारण!
गली गली हर चौराहे पर रावण हैं उजले से,
मन से अपने भुला रहे हैं, राम के शुद्ध उदाहरण!

श्री राम की मर्यादा का नहीं हो रहा पालन!
ऐसे में बस लगे निरर्थक, पुतला दहन दशानन............

अपने मन के चिंतन में हम नहीं घोलते शुद्धि!
झूठ बोलकर बनना ऊँचा, लगता है उपलब्धि!
मानवता का नाम न जिसमें ऐसा जीवन व्यर्थ,
औरों का सुख लूटके करते, जीवन में सम्रद्धि!

अपने हित के लिए हो रहा मिथ्या का सञ्चालन!
ऐसे में बस लगे निरर्थक, पुतला दहन दशानन............

आओ विजय के पर्व से सीखें, सत्यव्रत का ज्ञान!
अपने मन में लायें नम्रता, त्याग चलें अभिमान!
यदि सोच को हमने अपनी नहीं बनाया बेहतर,
कहाँ मनों से हो पायेगा, रावण का अवसान!

आओ सत्य के पदचिन्हों को, करें मनों में धारण!
तभी सार्थक हो पायेगा, पुतला दहन दशानन!"


"तो आइये चिंतन करें, मनन करें! त्योहारों से प्रेरणा लें, अपने मन से रावण का अंत करना होगा, तभी दशानन का पुतला दहन करने में सार्थकता आएगी!-चेतन रामकिशन "देव"




Monday, 26 September 2011

♥♥♥♥♥...नहीं देश से प्यार ♥

"♥♥♥♥♥♥♥♥...नहीं देश से प्यार ♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
हमको अपने हित से मतलब, नहीं देश से प्यार |
हमको मतलब नहीं देश की कैसी हो सरकार |
हमको क्या ये देश बिके या हो जाये ये राख,
इसी सोच से इस भारत के टुकड़े हुए हजार |

देश प्रेम का समझ न पाए हम जीवन में अर्थ |
ऐसा जीवन तो निष्फल है और साँस भी व्यर्थ |

माँ जननी के करुण रुदन की हम न सुने पुकार |
हमको अपने हित से मतलब, नहीं देश से प्यार.....

जात धर्म के नाम पे करते हम अपना मतदान |
खुद की झोली भरे भले ही देश का हो नुकसान |
अपनेपन की सोच नहीं है समरसता बेजान,
हम अब खुद ही बेच रहे हैं अपना हिंदुस्तान |

माँ जननी का ह्रदय दुखाकर हम गाते हैं गीत |
अब तो मन में नहीं रही है माँ जननी से प्रीत |

देश का नक्शा नहीं नयन में, याद नहीं आकार |
हमको अपने हित से मतलब, नहीं देश से प्यार...

प्रेम जगाओ माँ जननी से, नहीं करो अपमान |
देश की इज्जत होती ऐसी, जैसे माँ का मान |
"देव" यदि न बदलोगे तुम अपने मन की सोच,
मिट जायगी कुछ वर्षों में, देश की हर पहचान |

देश को सबसे ऊपर रखकर, लो मन में संकल्प |
माँ जननी सा नहीं दूसरा, न ही कोई विकल्प |

देश प्रेम के मधुर भाव की, हरदम करें फुहार |
हमको अपने हित से मतलब, नहीं देश से प्यार |"

"सोचिये हम कहाँ हैं? क्या देश के प्रति हमारा कोई उत्तरदायित्व नहीं है? क्या हम केवल अपने हित साधने के लिए इस पवित्र भूमि पर जन्मे हैं | चिंतन तो करना होगा, वरना ये देश आने वाले कुछ समय में फिर से देशी और विदेशी ताक़तों का गुलाम होगा |- चेतन रामकिशन "देव"

Friday, 23 September 2011

♥ प्रेम के टूटे तार ♥♥♥♥

"♥♥♥♥♥♥♥♥ प्रेम के टूटे तार ♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तुम बिन अब तो हुआ अधूरा मेरा घर संसार!
तोड़ दिए हैं जब से तुमने प्रेम के कोमल तार!

कहाँ गए वो स्नेह, मधुरुता, कहाँ गयीं सौगंध!
कहाँ गया वो प्रेम का दर्पण, कहाँ गया सम्बन्ध!
एक पल ही में तुमने कैसे प्रेम के सोखे प्राण,
तुमने मिश्रित की वायु में विरहा की क्यूँ गंध!

तुम बिन न ही जल भाता है न भाता आहार!
तोड़ दिए हैं जब से तुमने प्रेम के कोमल तार........

तुम बिन मन की चंचलता के सुप्त हुए हैं भाव!
प्रेम की इस पीड़ा ने मन को किये हैं प्रेषित घाव!
अब तक उत्तर खोज रहा हूँ, हूँ किन्तु अनभिज्ञ,
किस कारण से तुमने खुद में ढाले थे बदलाव!

यदि कमी थी हम में कोई, कहते तो एक बार!
तोड़ दिए हैं जब से तुमने प्रेम के कोमल तार........

देह के नाता टूट गया है, मन में किन्तु वास!
एक दिन मेरी कमी का तुमको भी होगा आभास!
प्रेम की पीड़ा की व्याकुलता पल पल देती शूल,
इस पीड़ा में जीवन धारा भी न आती रास!

विजय सिखाकर ही तुम हमको क्यूँ दे बैठे हार!
तोड़ दिए हैं जब से तुमने प्रेम के कोमल तार!"



"प्रेम, में मिलने वाली पीड़ा बहुत घातक होती है! इससे व्यक्ति के आत्मविश्वास, लक्ष्य और गतिशीलता पर भी प्रभाव पड़ता है! तो आइये प्रयास करें कि किसी को प्रेम की पीड़ा न दें!-चेतन रामकिशन "देव"
















Sunday, 11 September 2011

♥ पश्चिम का तूफान ♥♥ ♥ ♥ ♥



" ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ पश्चिम का तूफान   ♥♥ ♥ ♥ ♥ ♥  
देश की लाज को मिटा रहा है, पश्चिम का तूफान!
लड़की सर पे आंचल रखना, समझ रही अपमान!
लड़कों ने भी नैतिकता का बंद किया अध्याय,
हवा में उड़ना चाहते जबकि आती नहीं उड़ान!

पश्चिम से हम महज सीखते नंगेपन की सोच!
उनके ज्ञान को अपनाने में करते पर संकोच!

उनको बस भाती है "ब्रिटनी", भूल "मदर" का नाम!
देश की लाज को मिटा रहा है, पश्चिम का तूफान......

नहीं रहें हैं याद "डार्विन" न ही "जेम्स" की याद!
भूल गए हैं "रदरफोर्ड" को, याद नहीं संवाद!
इन लोगों से न हम पाते ज्ञान की निर्मल धार,
क्यूँ फिर देश की संस्कृति को हम करते बर्बाद!

दोहरेपन की सोच बनी है, मन में पलें विकार!
नंगेपन को अपनाते हैं, ज्ञान का कार दुत्कार!

इन लोगों के भूल गए हैं हम तो कर्म महान!
देश की लाज को मिटा रहा है, पश्चिम का तूफान.....

हाँ ये सच है नहीं है सारा इन लोगों को दोष!
मात पिता भी कर्तव्यों का नहीं रख रहे होश!
बैठके अपने लाल के आगे पिता करे मधपान,
बेटी नैतिकता त्यागे पर नहीं है माँ को रोष!

 बेटे को "न्यूटन" बनने का नहीं कराते बोध!
"मैडम क्यूरी" बने जो बेटी नहीं हैं वो उद्बोध!

मात पिता की सीख सिखाती इनको झूठी शान!
देश की लाज को मिटा रहा है, पश्चिम का तूफान!"

"दोहरी सोच क्यूँ? बस अपसंस्कृति ही ग्रहण की जाती है! पर वहां के महान शिक्षा विदों से कोई ज्ञान नहीं! आखिर क्यूँ, कम वस्त्र पहनने या व्यसन करने या झूठी शान से,
सम्रद्ध इतिहास का निर्माण तो नहीं हो सकता, हाँ ये हो सकता है कि," आपका नाम काजल से जरुर लिखा जा सकता है! आइये चिंतन करें- चेतन रामकिशन "देव"




Wednesday, 7 September 2011

♥ ..टूट रहे सम्बन्ध ♥ ♥

""♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ..टूट रहे सम्बन्ध ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥
अपने भी अब बदल रहें हैं टूट रहे सम्बन्ध!
अब अपनों के खून से आती बारूदों की गंध!
कोई सताता अपनी माँ को, भाई कहीं दुश्मन,
एक ही पल में टूट रहें हैं जन्मों के अनुबंध!

कोई पति अपनी पत्नी पर करता अत्याचार!
कहीं कोई पत्नी भी करती पत्थर सा व्यवहार!

एक पल में ही जला रहे वो सात वचन गठबन्ध!
अपने भी अब बदल रहें हैं टूट रहे सम्बन्ध.......

हुए संकुचित घर भी अपने, और अपने परिवार!
भाई ने भाई के बीच लगाई, नफरत की दीवार!
अब बच्चे भी त्याग रहें हैं मात पिता का प्यार,
अब खाली खंडहर दिखते हैं, नहीं रहे घर-द्वार!

जगह जगह हम करते हैं अब अपनों का अपमान!
ना ही सेवा मात पिता की , ना उनका सम्मान!

उनकी भूख मिटाने का भी भूल गए प्रबंध!
अपने भी अब बदल रहें हैं टूट रहे सम्बन्ध.......

अपनों का सम्मान करो तुम, देकर उनको प्यार!
अपनों के दिल में ना घोंपो, ना खंजर तलवार!
अपनों की पीड़ा बांटो तुम बनकर के हमदर्द,
जो बंटवारा करे दिलों का, गिरा दो वो दीवार!

अपनेपन की महक से महके अपना ये घरवार!
कभी ना खंडित करना लोगों तुम अपनों का प्यार!

स्वार्थ से अपनी आँखों को तुम, करो ना ऐसे अंध!
अपने भी अब बदल रहें हैं टूट रहे सम्बन्ध"


"आइये संबंधो को जोड़ने का, कायम रखने का प्रयास करैं, जब आपस में प्रेम होगा तभी हम समाज से, देश से प्रेम कर सकेंगे! इसके लिए समर्पण और नम्रता अपनानी होगी! आइये चिंतन करें, इन टूटते संबंधों पर, क्या पता अगला टूटता सम्बन्ध हम सब में से ही हो-चेतन रामकिशन "देव"