Sunday, 21 April 2013

♥♥गम की रात..♥♥


♥♥♥♥♥गम की रात..♥♥♥♥♥
दिल का हाल सुनाया जिसको!
अपना यहाँ बताया जिसको,
वही अँधेरा सोंप गया है,
दीपक सदा दिखाया जिसको!

काश हमारी आह समझते!
ये पथरीली राह समझते!
काश समझकर मेरे आंसू,
मेरे मन की चाह समझते!

वही गिराकर चला गया है,
मैंने सदा उठाया जिसको!
वही अँधेरा सोंप गया है,
दीपक यहाँ दिखाया जिसको...

गिला नहीं है उससे कोई,
ये किस्मत की बात है शायद!
इक दिन सूरज भी निकलेगा,
"देव" ये गम की रात है शायद!

मिला वही अनजानों जैसा,
दिल में सदा वसाया जिसको!
वही अँधेरा सोंप गया है,
दीपक यहाँ दिखाया जिसको!"

...चेतन रामकिशन "देव"...
दिनांक-२१.०४.२०१३


Tuesday, 16 April 2013


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥नया उजाला..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
नया दिवस है, नया उजाला, जल की ये शीतल धारा है!
निशा तिमिर की बीत चुकी है, और सूरज का उजियारा है!
वही यहाँ पर समस्याओं से, लड़ के आगे बढ़ा है एक दिन,
जिस मानव ने साहस के संग, समस्याओं को ललकारा है!

ये जीवन है यहाँ पे निश दिन, समस्याओं के पल आते हैं!
किन्तु मन में साहस हो तो, तिमिर में दीपक जल जाते हैं!

वही शांत रहता है मन से, क्रोध को जिसने भी मारा है!
नया दिवस है, नया उजाला, जल की ये शीतल धारा है....

सही बात है किस्मत का रुख, सदा यहाँ सुखमय नहीं होता!
किन्तु किस्मत से डरकर भी, जीवन का पथ तय नहीं होता!
"देव" हमे करना होगा कुछ, किस्मत कर्म नहीं करती है,
वही विजय पाता है रण में, जिसे हार का भय नहीं होता!

बस किस्मत की राह देखकर, जीवन को बरबाद न करना!
तुम औरों को दुख देकर के, अपना घर आबाद न करना!

वो क्या जंग करे जीवन से, साहस ही जिसने हारा है!
नया दिवस है, नया उजाला, जल की ये शीतल धारा है!"


....................चेतन रामकिशन "देव"........................
दिनांक-१७.०४.२०१३
"
सर्वाधिकार सुरक्षित"
" मेरी ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित"

(पेंटिंग साभार--प्रिय मित्र कुसुम जी!)

Monday, 15 April 2013

♥गम का तहखाना.♥


♥♥गम का तहखाना.♥♥
गम के गहरे तहखाने में!
और आंसू के मयखाने में!
अब खुशियों की नहीं तमन्ना,
डर लगता है मुस्काने में!

हवा है लेकिन घुटन बहुत है!
इन आँखों में चुभन बहुत है!
सुनो जरा हौले से छूना,
मेरे दिल में दुखन बहुत है!

दुख के बादल उमड़ रहे हैं,
गम देने को, नजराने में!

अब खुशियों की नहीं तमन्ना,
डर लगता है मुस्काने में...
अपना कहकर बनें पराये!
लोगों का रुख समझ न आये!
"देव" जिसे मलमल का समझो,
वो इन्सां ही ठेस लगाये!

बिन उसके ये दिल नहीं लगता,
उमर बीत गयी समझाने में!

अब खुशियों की नहीं तमन्ना,
डर लगता है मुस्काने में!"
..चेतन रामकिशन "देव"..
दिनांक-१५.०४.२०१३

Sunday, 14 April 2013

♥♥द्वन्द..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥द्वन्द..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
द्वन्द कभी अपनों से होता, द्वन्द कभी होता है मन से!
द्वन्द कभी होता सपनों से, द्वन्द कभी होता है तन से!

जीवन के हर पथ पर देखो, द्वन्द हमेशा होता रहता!
लाख हँसे बाहर से कोई , पर भीतर से रोता रहता!
कभी कोई अपनों से छलकर, पत्थर जैसा हो जाता है,
और कोई पत्थर होकर भी, मोम की फसलें बोता रहता!

द्वन्द कभी हो निर्धनता से, द्वन्द कभी होता धन से!
द्वन्द कभी होता सपनों से, द्वन्द कभी होता है तन से...

लेकिन द्वन्द भले हो कितना, धीरज नहीं हमें खोना है!
हमे निराशा के अंकुर को, कभी नहीं मन में बोना है!
"देव" कभी तुम द्वन्द के कारण, नहीं भटक जाना राहों से,
हमे द्वन्द से भय खाकर के, नहीं यहाँ हरगिज रोना है!

द्वन्द कभी पीछा ना छोड़े, द्वन्द सदा होता जीवन से!
द्वन्द कभी होता सपनों से, द्वन्द कभी होता है तन से!"

..................चेतन रामकिशन "देव".....................
दिनांक-१५.०४.२०१३

♥♥प्रतीक्षा की घड़ी.♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्रतीक्षा की घड़ी.♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
प्रतीक्षा की कठिन घड़ी ये, काटे से भी कट नहीं पाती!
बिना तुम्हारे रात चांदनी, सखी मुझे अब नहीं सुहाती!
तारे गिनकर बिता रहा हूँ, कठिन रात के कठिन पहर को,
सखी मेरी आँखों को देखो, बिना तुम्हारे नींद न आती!

सखी मेरी तू आ जाया कर, बिना तुम्हारे कुछ न भाये!
नहीं सहन होती ये पीड़ा, जहर विरह का पिया न जाये!

बिना तुम्हारे ख़ामोशी है, कोयल कलरव नहीं सुनाती!
प्रतीक्षा की कठिन घड़ी ये, काटे से भी कट नहीं पाती...

मैं मज़बूरी समझ भी जाऊं, लेकिन दिल किसकी सुनता है!
रात को चाहें या दिन निकले, बस तेरे सपने बुनता है!
"देव" मेरा दिल कहता है के, एक दिन तुम आओगी मिलने,
इसी आस में सखी मेरा दिल, फूल तेरी खातिर चुनता है!

बिना तुम्हारे जान नहीं है, मेरा तन बेजान हुआ है!
सखी मेरी व्याकुल आँखों को, हर पल तेरा ध्यान हुआ है!

सखी तुम्हारे बिन आँखों की, प्यास जरा भी बुझ नहीं पाती!
प्रतीक्षा की कठिन घड़ी ये, काटे से भी कट नहीं पाती!"

...................चेतन रामकिशन "देव"......................
दिनांक-१४.०४.२०१३



Saturday, 13 April 2013

♥♥भीम को नमन..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥भीम को नमन..♥♥♥♥♥♥♥♥♥
जो शोषक वर्ग से, संघर्ष का आहवान करते हैं!
जो अपने कर्म से, मानव हितों का मान करते हैं!
जो हमको दे गए, शिक्षा यहाँ, संघर्ष की बातें,
हम ऐसे भीम का, मन से सदा सम्मान करते हैं!

अभावों में भी रहकर, ज्ञान का दीपक जलाया है!
दबे, कुचले हुए मानव को, सीने से लगाया है!

जो औरों के लिए अपनी खुशी, प्रदान करते हैं!
हम ऐसे भीम का, मन से सदा सम्मान करते हैं..

महापुरुष लोग जाति की, परिधि में नहीं होते!
महापुरुष लोग हिंसा के, कभी अंकुर नहीं बोते!
महापुरुष लोग देखो "देव" हैं, वंदन के अधिकारी,
महापुरुष लोग सच्चाई के रस्ते को, नहीं खोते!

नहीं जाति में आंकों तुम, वो सबके काम आते हैं!
हम अपने शीश को बाबा तेरे, सम्मुख झुकाते हैं!

जो खुद जलकर भी, औरों का सफर आसान करते हैं!
हम ऐसे भीम का, मन से सदा सम्मान करते हैं!"

.................चेतन रामकिशन "देव"................
दिनांक-१४.०४.२०१३( भारत रत्न डॉ.भीम राव अम्बेडकर को उनकी जयंती पर नमन!"











Friday, 12 April 2013

♥♥सितारों की लड़ी..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥सितारों की लड़ी..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
गगन के चाँद सी सुन्दर, सितारों की लड़ी हो तुम!
तुम्ही पायल की छम छम में, अंगूठी में जड़ी हो तुम!

हो मुझसे दूर मीलों पर, हमेशा पास लगती हो!
मेरे ख्वाबों का तुम देखो, जवां एहसास लगती हो!
सुनो ए "देव" मैं तुम बिन, कभी खुश हो नहीं सकता,
तुम्हीं सारे ज़माने में, मुझे बस ख़ास लगती हो!

मेरे दुख में, मेरे गम में, मेरे संग में खड़ी हो तुम!
गगन के चाँद सी सुन्दर, सितारों की लड़ी हो तुम!"

...........चेतन रामकिशन "देव"...........
दिनांक-१२.०४.२०१३

Thursday, 11 April 2013

♥♥मेरा वजूद..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥मेरा वजूद..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मुझको बतलाओ मुझे, कैसे भुलाओगे तुम!
प्यास नजरों की भला, कैसे बुझाओगे तुम!

मेरी उल्फ़त तेरे चेहरे पे, नजर आती है,
मेरी चाहत को यहाँ, कैसे छुपाओगे तुम!

मैं अभी जिंदा हूँ तो, मान भी जाऊंगा मगर,
बाद मरने के मुझे, कैसे मनाओगे तुम!

खून से अपने जो ख़त, मैंने तुम्हे लिखे थे,
हाथ कांपेंगे उन्हें, कैसे जलाओगे तुम!

"देव" ये जिस्म है मिट्टी का, सतालो लेकिन,
रूह से अपनी, नजर कैसे मिलाओगे तुम!"

.............चेतन रामकिशन "देव"..............
दिनांक-११.०४.२०१३

Wednesday, 10 April 2013

♥♥♥व्याकुल मन...♥♥♥




♥♥♥व्याकुल मन...♥♥♥♥♥♥♥♥
कंठ भर गया रोते रोते, साथ साथ ये मन व्याकुल है!
दर्द भरा है इतना दिल में ,रोम रोम भी शोकाकुल है!
है संवेदनहीन जहाँ ये, कोई किसी का दर्द न जाने,
मेरा मनवा तड़प रहा है और मेरी आँखों में जल है!

अब कोई जज्बात न समझे, सब रहते हैं अपनी धुन में!
नहीं पिघलता पत्थर का दिल, भले निवेदन करो रुदन में!

लोग यहाँ मदिरा को देखो, कहते हैं के गंगाजल है!
कंठ भर गया रोते रोते, साथ साथ ये मन व्याकुल है....

ऐसी दौलत का क्या करना, जिसका मन सम्पन्न नहीं हो!
भूख की कीमत उससे जानो, जिसके घर में अन्न नहीं हो!
कभी जरा तुम गौर से देखो, उसकी गहरी तन्हाई को,
बिना हमारे जिस मानव का, एक पल भी प्रसन्न नहीं है!

किसे सुनायें हम हालेदिल, वक़्त किसी के पास नहीं है!
लगता है मेरी किस्मत को, ख़ुशी का लम्हा रास नहीं है!

आसमान भी आग बरसता, और यहाँ पथरीली थल है!
कंठ भर गया रोते रोते ,साथ साथ ये मन व्याकुल है....

जो पत्थर बनकर के खुश हैं, उनको मोम नहीं भाता है!
कभी किसी का दर्द देखकर, उन को तरस नहीं आता है!
"देव" यहाँ पर जिस मानव के, मन में होती है मानवता,
वो मानव ही जनमानस के दर्द का, साथी बन पाता है!

मानवता के नाते जिस दिन, तुम मानव से प्यार करोगे!
वो दिन ऐसा होगा जब तुम, खुशियों का दीदार करोगे!

इस दुनिया में प्रेम की दौलत, मानो रेशम और मलमल है!
कंठ भर गया रोते रोते ,साथ साथ ये मन व्याकुल है! "

"
पीड़ा- ये सच है कि पीड़ा से कोई भी अछूता नहीं, किन्तु पीड़ा के मायने तब कहीं अधिक बढ़ जाते हैं, जब सामने वाला ऐसा व्यक्ति हमे पीड़ा देता है, जिस पर हम बहुत यकीन और नेह रखते हों, तो आइये जरा चिंतन करते हुए, किसी को दर्द कम से कम देने की कोशिश करें.."

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-१०.०४.२०१३













Tuesday, 9 April 2013

♥♥काश समझते मेरे मन.♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥काश समझते मेरे मन.♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
काश समझते मेरे मन को, काश मेरे दिल को पढ़ पाते!
न ही मुझसे दूरी करते, न ही मुझसे नजर चुराते!

बिना मेरा दिल पढ़े भला तुम, कैसे मेरे भाव समझते!
अपनेपन के भावों के बिन, कैसे मेरे घाव समझते!
"देव" अगर तुम इक अक्षर भी, पढ़ लेते मेरी चाहत का,
तो तुम मेरे दर्द समझकर, आँखों का सैलाब समझते!

मुझे गिराकर तुम यूँ हमदम, अगली सीढ़ी न चढ़ जाते!
काश समझते मेरे मन को, काश मेरे दिल को पढ़ पाते!"

..................चेतन रामकिशन "देव"..................
दिनांक-०९.०४.२०१३

Monday, 8 April 2013

♥♥तन्हा रात .♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥तन्हा रात .♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
फिर से तन्हा रात आ गयी, चुपके चुपके रोना होगा!
जबरन अपनी आंख मूंदकर, हमको फिर से सोना होगा!

नहीं पता था प्यार में हमको, दर्द मिलेगा इतना सारा,
गुमसुम गुमसुम होगा ये दिल, चैन भी अपना खोना होगा!

नहीं कोई गिरते इन्सां को, यहाँ सहारा देता यारों,
अपने ही कंधे पर हम को, अपना ये तन ढ़ोना होगा!

तुमसे कोई गिला नहीं है, नहीं शिकायत मुझको कोई,
शायद मेरी किस्मत में ही, ये सब देखो होना होगा!

"देव" न कोई पढ़ ले मेरी, रोनी सूरत के लफ्जों को,
दिन निकले से पहले अपनी, सूरत को फिर धोना होगा!"

.................चेतन रामकिशन "देव"..................
दिनांक-०८.०४.२०१३




Friday, 5 April 2013

♥♥मेरी ख्वाहिश..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥मेरी ख्वाहिश..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
सारी दुनिया जीत के मैंने, नहीं सिकंदर बनना चाहा!
मजलूमों का खून बहाकर, नहीं धुरंधर बनना चाहा!
बस ऐसा बनना चाहा के, जिसे देखकर दुनिया खुश हो,
हसरत रखी सदा झील की, नहीं समुन्दर बनना चाहा!

जिस मानव के जीवनपथ में, अच्छाई की लय होती है!
उस मानव की इक दिन देखो, सारे जग में जय होती है!

न आंधी की मुझे तमन्ना, नहीं बबंडर बनना चाहा!
सारी दुनिया जीत के मैंने, नहीं सिकंदर बनना चाहा...

न दौलत की हसरत दिल में, न महलों के जैसा घर हो!
सदा रहे जीवित मानवता, गलत काम से मुझको डर हो!
"देव" मैं अपनी नजरों को बस, मिला सकूँ खुद की नजरों से,
मेरी इच्छा नहीं कभी भी, मेरे क़दमों में अम्बर हो!

सच की राह पे चलने वाले, भले ही कुछ पीड़ा पाते हैं!
लेकिन इक दिन आता है जब, सच के लम्हें मुस्काते हैं!

न चाहत है तलवारों की, न ही खंजर बनना चाहा! 
सारी दुनिया जीत के मैंने, नहीं सिकंदर बनना चाहा!"

.................चेतन रामकिशन "देव"................
दिनांक-०५.०४.२०१३

Wednesday, 3 April 2013

♥♥फुर्सत.♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥फुर्सत.♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
आज दर्द के गलियारों से, दो पल फुर्सत के लाया हूँ!
खुली हवा में सांसें ली हैं और जी भर के मुस्काया हूँ!

फुर्सत के इन दो लम्हों का, मंजर देखो बड़ा ही प्यारा!
नदियाँ मुझसे मिलने दौड़ीं, हरियाली ने मुझे दुलारा!
"देव" हमेशा इन लम्हों की, याद रहेगी मेरे दिल को,
इन छोटे से दो लम्हों ने, मन से दुख का बोझ उतारा!

आज मिली है इतनी फुर्सत, गिरकर देखो उठ पाया हूँ!
आज दर्द के गलियारों से, दो पल फुर्सत के लाया हूँ!"

...................चेतन रामकिशन "देव"..................
दिनांक-०३.०४.२०१३


Tuesday, 2 April 2013

♥♥मखमल का दिल.♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥मखमल का दिल.♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
पत्थर जैसी इस दुनिया में, मखमल का दिल ढूंढ रहा हूँ!
जिसकी ठंडक दिल को भाए, ऐसा आँचल ढूंढ रहा हूँ!

आसमान में मार धुँयें की, और रसायन पानी में है,
मैं गंगा के पानी में ही, अब गंगा जल ढूंढ रहा हूँ!

बिन पानी के जिन खेतों की, फसलें देखो झुलस रही हैं,
आज उन्ही खेतों की खातिर, गीला बादल ढूंढ रहा हूँ!

कौन कौन है ऐसा जिसने, इस जनता को नहीं छला हो,
आज सियासी भारत का मैं, इक ऐसा दल ढूंढ रहा हूँ!

"देव" नहीं सुनता है कोई, इस दुनिया में दर्द किसी का,
इसीलिए तो अपने दुख का, अब खुद ही हल ढूंढ रहा हूँ!"

...................चेतन रामकिशन "देव"..................
दिनांक-०३.०४.२०१३



♥♥कंठ की प्यास.♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥कंठ की प्यास.♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
प्यास कंठ की बुझ न पाई, बिन छाया के जला पथ में! 
लोग ठोकरें मार रहे हैं, पत्थर बनकर ढला हूँ पथ में!

जब जी चाहा मुझे रुलाया, करुण निवेदन भी ठुकराया, 
बिना तुम्हारे आंखें रोयीं, बिना तुम्हारे दिल मुरझाया!
फिर भी तुमसे गिला नहीं है, "देव" नहीं रंजिश है कोई,
किस्मत में जो लिखा होगा, वो सब मेरे हिस्से आया!

जिसको मैंने अपना माना, उसी के हाथों छला हूँ पथ में!
प्यास कंठ की बुझ न पाई, बिन छाया के जला पथ में!"

.................चेतन रामकिशन "देव"...................
दिनांक-०२.०४.२०१३

Monday, 1 April 2013

♥♥ताजमहल पर..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥ताजमहल पर..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
ताजमहल पर लिखा सबने, लेकिन मैं तुम पर लिखूंगा!
मैं मुफ़लिस का दर्द देखकर, अपनी आंखे तर लिखूंगा!

जब भी दर्द मिला है मुझको, मेरी माँ ने मुझे संभाला,
इसीलिए मैं माँ के दिल को, ममता का इक घर लिखूंगा!

जुर्म बढ़ गया इतना सारा, बेटी घर से निकल न पाए,
उस बेटी के नाजुक दिल का, सहमा सहमा डर लिखूंगा!

जिस दुनिया को देखा न हो, उस दुनिया में ले जाते हैं,
मैं अपने प्यारे ख्वाबों को, किसी परी के पर लिखूंगा!

झूठ बोलकर "देव" किसी से, अपनायत की चाह नहीं है,
सच्ची चाहत के सजदे में, बेशक अपना सर लिखूंगा!"

....................चेतन रामकिशन "देव"......................
दिनांक-०१.०४.२०१३ 

Saturday, 30 March 2013

♥तुम्हारा सम्बन्ध..♥


♥तुम्हारा सम्बन्ध..♥
ह्रदय के स्पंदन में हो!
तुम पूजा में, वंदन में हो!
तुमसे ही जीवन में उर्जा,
तुम जीवन के हर क्षण में हो!

मीत तुम्हीं हो, जीत तुम्हीं हो!
मेरे मन की प्रीत तुम्हीं हो!
हर मौसम की रंगत तुमसे,
तुम ही बारिश, शीत तुम्हीं हो!

हरियाली के हरे रंग में,
तुम फसलों में, तुम वन में हो!
तुमसे ही जीवन में उर्जा,
तुम जीवन के हर क्षण में हो...

तुम गीतों का भाव पक्ष हो,
तुम शब्दों का अलंकार हो!
तुम यमुना का शीतल पानी,
तुम गंगा की मधुर धार हो!

तुम्ही हमारी स्मरण शक्ति,
तुम्ही "देव" के यौवन में हो!
तुमसे ही जीवन में उर्जा,
तुम जीवन के हर क्षण में हो!"

....चेतन रामकिशन "देव"....
दिनांक-३१.०३.२०१३

Friday, 29 March 2013

♥♥गीतों के बोल.♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥गीतों के बोल.♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तेरी याद में मेरे हमदम, कुछ गीतों के बोल लिखूंगा!
मैं अपने लफ्जों से अपने, जीवन का भूगोल लिखूंगा!

मेरे यारों शै उल्फत की, नहीं बाजारों में बिकती है,
इसीलिए मैं इस उल्फत को, हर पल ही बेमोल लिखूंगा!

तेरे नूर की उजली किरणें, धवल चांदनी के जैसी हैं,
मैं तेरे प्यारे मुखड़े को, चाँद की तरह गोल लिखूंगा!

इस दुनिया में बिन मेहनत के, मंजिल पास नहीं आती है,
बिन हिम्मत के अपने कश्ती, हर पल डांवाडोल लिखूंगा!

"देव" यहाँ पर जिन लोगों को, भाता है बस खून खराबा,
मैं ऐसे लोगों के तन पर, जंगलीपन का खोल लिखूंगा!"

..................चेतन रामकिशन "देव"..................
दिनांक-२९.०३.२०१३


Thursday, 28 March 2013

♥♥बादल के आंसू..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥बादल के आंसू..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
विरह भाव से पीड़ित होकर, बादल के भी आंसू बरसे!
बादल के प्यासे नैना भी, सखी तेरे दर्शन को तरसे!

जिधर भी देखो उसी दिशा में, आंसू की नदियाँ बहती हैं!
सखी न जाने कब आएगी, मन ही मन अपने कहती हैं!
बादल का रंग तन्हाई में, "देव" तरसकर हुआ है काला,
कुछ कहने को शब्द नहीं हैं, ये नदियाँ चुप चुप रहती हैं!

इंतजार में सखी तुम्हारे, बीत गए हैं कितने अरसे!
विरह भाव से पीड़ित होकर, बादल के भी आंसू बरसे!"

......................चेतन रामकिशन "देव"..................
दिनांक-२८.०३.२०१३

Wednesday, 27 March 2013

♥♥ख्वाहिशों की होली♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥ख्वाहिशों की होली♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
किसी का दिल यहाँ होली के, जैसे जल रहा होगा!
कोई अपनी अमीरी में, उफन कर चल रहा होगा!
कोई भूखा है अरसे से, मगर ईमान रखता है,
कोई पर अपने मकसद में, जहाँ को छल रहा होगा!

जो मुफलिस भी पनप जाये, यहाँ ऐसा नहीं होता!
कोई खरबों में जीता है, कहीं पैसा नहीं होता!
यहाँ पर "देव" मजलूमों की, अर्जी कौन सुनता है,
यहाँ पीड़ित जो चाहता है, कभी वैसा नहीं होता!

अदालत में भी मुफ़लिस का, मुकदमा टल रहा होगा!
किसी का दिल यहाँ होली के, जैसे जल रहा होगा!"

..................चेतन रामकिशन "देव".................
दिनांक-२७.०३.२०१३