Sunday, 20 July 2014

♥♥सच की तपस्या..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥सच की तपस्या..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
घोर तपस्या सच की करना, काम कोई आसान नहीं है!
उनको हिंसा ही भाती है, जिन्हें प्रेम का ज्ञान नहीं है!
जो अपने उद्देश्य लोभ में, छल करता है मानवता से,
वो सब कुछ हो जाये बेशक, लेकिन वो इंसान नहीं है!

मानवता के चिन्हों पर चल, जो सबका हित कर जाते हैं !
वही लोग देखो दुनिया में, मरकर भी न मर पाते हैं! 

खुद की खातिर जी लेना ही, नेकी की पहचान नहीं है!
घोर तपस्या सच की करना, काम कोई आसान नहीं है...

फूलों की ख़्वाहिश है सबको, काँटों पे चलना न चाहें!
चाहत रखें उजालों की पर, दीपक बन जलना न चाहें!
बिना कर्म के ही मिल जाये, दुनिया की सारी धन दौलत,
नहीं धूप में बहे पसीना, नहीं शीत में गलना चाहें!

लेकिन सिर्फ ख्यालों में ही, महल देखने से नहीं मिलते!
बिन मेहनत के इस दुनिया में, ख्वाबों के गुलशन नहीं खिलते!

बाहर ढोंग करेंगे घर में, परिजन का सम्मान नहीं हैं!
घोर तपस्या सच की करना, काम कोई आसान नहीं है....

जो नफरत की आग में जलकर, विष के गोले बरसाते हैं!
ऐसे दुर्जन जन लोगों के, नहीं दिलों में वस पाते हैं!
"देव" जहाँ में लाख, करोड़ों यहाँ आदमी फिरते हैं पर,
बिना दया और प्रेम भाव के, नहीं वो इन्सां बन पाते हैं!

केवल अख़बारों में छपकर, हमदर्दी का नाम करेंगे!
और हक़ीक़त में वो देखो, जग में काला काम करेंगे!

बस थोथी बातें कर देना, पीड़ा का अवसान नहीं है!
घोर तपस्या सच की करना, काम कोई आसान नहीं है!"

.....................चेतन रामकिशन "देव".........................
दिनांक-२१.०७ २०१४ 

♥♥दरिंदगी..♥♥



♥♥♥♥♥♥♥♥दरिंदगी..♥♥♥♥♥♥♥♥♥
रूह बेचैन बहुत दिल को तड़प होती है!
देख के ऐसे नज़ारे, ये नज़र रोती है!

वो दरिंदे यहाँ औरत को लूट कर मारें,
और खाकी यहाँ गूंगों की तरह सोती है!

अपने मतलब के लिए खून तक बहा दे जो,
आदमी की यहाँ फितरत ही बुरी होती है!

कोई कानून नहीं देता दरिंदों को सजा,
कब्र में भी वो यही सोच कर के रोती है!

लाश नंगी थी यहाँ, उसका बन गया धंधा,
आज दीवार पे हर, वो ही टंगी होती है!

जानवर सा है आदमी, है दरिंदा, बहशी,
उसकी सूरत भले मासूम, भली होती है!

"देव" ये दर्द है इतना के, क्या बताऊँ मैं,
मेरे शब्दों को भी मुझ संग, ये दुखन होती है! "

.............चेतन रामकिशन "देव"..............
दिनांक-२०.०७ २०१४



Saturday, 19 July 2014

♥♥♥जरा आ जाओ...♥♥♥



♥♥♥♥♥♥♥♥जरा आ जाओ...♥♥♥♥♥♥♥♥
चाँद आकाश में गुमसुम है, जरा आ जाओ!
बुझते दीपों में जरा रोशनी जगा जाओ!

बिन तेरे एक भी लम्हा नहीं कटता मेरा,
मैं जिधर देखूं, मुझे तुम ही तुम नज़र आओ!

मैं भी चाहता हूँ कलम, पाये तवज्जो मेरी,
मेरे लफ्जों में ग़ज़ल बनके, तुम समां जाओ!

देखकर हमको कसे तंज, जमाना न कोई,
मुझको तुम ऐसे जहाँ में, जरा लेकर जाओ!

तेरी चूड़ी की खनक, आज तलक याद मुझे,
अपनी चूड़ी को निशानी में मुझे दे जाओ!

ये जहाँ इतना बड़ा, तुम बिना अधूरा है,
एक लम्हे को भी न छोड़कर, मुझे जाओ!

"देव" तुमसे है लगन है , दिल मेरे जज़्बातों की,
अपना एहसास मेरी सांस में पिरो जाओ! "

...............चेतन रामकिशन "देव"...........
दिनांक-१९.०७ २०१४



Friday, 18 July 2014

♥♥पीड़ा का भंडारण..♥♥


♥♥♥पीड़ा का भंडारण..♥♥♥
मन पीड़ा से भरा हुआ है!
ज़ख्म पुराना हरा हुआ है!
अपनायत से दर्द मिला और,
दिल अपनों से डरा हुआ है!

कोमल दिल को छलनी करके,
कुछ अफ़सोस नहीं होता है!
क़त्ल दिलों का करके देखो, 
उनको रोष नहीं होता है!
मानवता की हत्या करके,
हत्यारे वो बन जाते हैं,
लेकिन फिर भी कानूनों में,
उनका दोष नहीं होता है!

झूठ हो रहा सब पे हावी,
और सच मानों मरा हुआ है!
अपनायत से दर्द मिला और,
दिल अपनों से डरा हुआ है...

बीच डगर में छोड़ा करते!
लोग दिलों को तोड़ा करते!
जिनको अपना कहते उनका,
नाम ग़मों से जोड़ा करते!
बस अपने मतलब की खातिर,
करते हैं झूठी हमसफ़री,
मतलब पूरा हो जाने पर,
अपने रुख को मोड़ा करते!

"देव" इसी आलम ने देखो,
मन आवेशित करा हुआ है!
अपनायत से दर्द मिला और,
दिल अपनों से डरा हुआ है!"

.....चेतन रामकिशन "देव".....
दिनांक-१८.०७ २०१४


Monday, 14 July 2014

♥♥अपनों की वफ़ा ..♥♥


♥♥♥♥♥♥अपनों की वफ़ा ..♥♥♥♥♥♥♥♥
पत्थरों जैसा मेरे दिल को, वो बताते हैं!
मेरे अपने भी वफ़ा इस तरह निभाते हैं!

मेरी आँखों से टपकते हैं खून के आंसू,
दिल के टुकड़े हैं के, रस्ते में बिखर जाते हैं!

आईना भी मेरी सूरत को भूलना चाहे,
लोग तो लोग हैं, पल भर में बदल जाते हैं!

मुझे पे इलज़ाम लगते हैं, कोसते हैं वो,
हम मगर फिर भी चरागों की लौ जलाते हैं!

जिसको जाने की थी जिद, दूर वो गया हमसे,
ये अलग बात के हम, उसको याद आते हैं!

उनको मुश्किल में भी, होती नहीं कमी कोई,
मरते दम जो ईमां, हर घड़ी निभाते हैं!

"देव" हमसे क्या शिकायत, क्या करेंगे शिकवा,
बेवफ़ाई के जो गुल, उम्र भर खिलाते हैं! " 

..............चेतन रामकिशन "देव"..............
दिनांक-१५ .०७ २०१४

♥♥प्यार की छाँव..♥♥


♥♥♥♥♥♥प्यार की छाँव..♥♥♥♥♥
प्यार की छाँव का असर होगा!
अपने ख़्वाबों का एक घर होगा!

कोई दुख तुझको जब करे तन्हा,
मेरे कंधे पे तेरा सर होगा!

तुम जुदाई की बात मत करना,
न बिछड़ने का कोई डर होगा!

प्यार भर देंगे हम हर एक घर में,
देखो कितना हसीं शहर होगा!

ग़म के पत्थर नहीं गिराएंगे,
तू जो जीवन का हमसफ़र होगा!

कोई नफरत न जीत पायेगी,
जब तलक प्यार में बसर होगा!

"देव" चाहत के सिलसिले की तरफ,
अपना दिन रात, हर पहर होगा! "

......चेतन रामकिशन "देव".......
दिनांक-१४.०७ २०१४

Saturday, 12 July 2014

♥♥वजूद...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥वजूद...♥♥♥♥♥♥♥♥
खुद को अपना वजूद दिखलाया!
दर्द से जीतना हमें आया!

पंख मेरे भले ही टूटे पर,
मैंने आकाश को न झुठलाया!

ख़्वाहिशें सब नहीं मिला करतीं,
ये सबक अपने दिल को सिखलाया!

रूह है अब भी चाँद सी सुन्दर,
ग़म ने हर रोज चाहें झुलसाया!

तेरे आने से आ गयी खुशबु,
जैसे बगिया में फूल खिल आया!

टूटे पत्तों को हाथ में लेकर,
दिल को पेड़ों का दर्द बतलाया !

"देव" चाहत में क्या कमी मेरी,
उनके हिस्से का भी ज़हर खाया! "

......चेतन रामकिशन "देव".......
दिनांक-१३.०७ २०१४

Friday, 4 July 2014

♥♥प्रेम के मोती..♥♥


♥♥♥♥प्रेम  के मोती..♥♥♥♥♥
प्रेम के मोतियों की माला है!
देखो हर ओर बस उजाला है!

सात जन्मों तलक नहीं छूटे,
मैंने चाहत का रंग डाला है!

मेरे लफ्जों में आ गयी खुशबु,
मानो खत तेरा आने वाला है!

देखकर तुझको दिल मचल जाये,
तेरा अंदाज़ ही निराला है!

तूने समझा है दर्द को मेरे,
मुझको तूफान से निकाला है!

मेरी आँखों में झांककर देखो,
प्यार अरसे से मैंने पाला है!

"देव" जुल्फों की छाँव देते तुम
धूप ने जब भी तन उबाला है! "

......चेतन रामकिशन "देव".......
दिनांक-०४.०७ २०१४

Thursday, 3 July 2014


"
ख़ून बहे न मज़लूमों का, हर कोई ख़ुशहाल रहे बस,
मंदिर, मस्जिद, गिरजा, द्वारा, हर इंसा की दुआ यही हो! "

.......................चेतन रामकिशन "देव".........................

दिनांक-०४.०७ २०१४

Tuesday, 1 July 2014

♥♥तालुकात..♥♥


♥♥♥♥♥♥तालुकात..♥♥♥♥♥
नाम के तालुकात करते हैं!
लोग मतलब की बात करते हैं!

मेरी तरफ़ा नहीं किसी की नज़र,
हम जो सड़कों पे रात करते हैं!

मेरे हिस्से का ग़म मुझे दे दो,
हम सफर साथ साथ करते हैं!

मेरे हर्फों की लाल सी सूरत,
खून से हम दवात करते हैं!

अपने अश्क़ों की गर्म नदियों से,
प्यास को अपनी मात करते हैं!

अपने दुश्मन को माफ़ करके हम,
उसके सर अपना हाथ करते हैं!

"देव" डरता है दिल मोहब्बत से,
इसीलिए एहतियात करते हैं! "

......चेतन रामकिशन "देव"......... 
दिनांक-०२.०७ २०१४


Thursday, 26 June 2014

♥♥प्रेम की धवनि..♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्रेम की धवनि..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
हर दिशा प्रकाशमय है, प्रेम की करतल ध्वनि है!
एक क्षण भी भंग न हो, प्रेम की ऐसी धुनी है!
मैंने तेरी भावना को, कर लिया खुद में निहित जब,
हर घड़ी, दिन रात मैंने, प्रेम की सरगम सुनी है!

प्रेम से पल्लव सुमन का, प्रेम से नदियों की कल कल!
आत्मा कर दे धवल जो, प्रेम है ऐसा मधुर जल!

मैं तेरी खातिर बना और तू मेरे संग को बनी है! 
हर दिशा प्रकाशमय है, प्रेम की करतल ध्वनि है...

भेंट न सम्मुख हुयी पर, मन से मन का आसरा है!
मैं तेरा आकाश हूँ और तू हमारी ये धरा है!
तेरे मन है प्रेम पूरित, तेरी बोली है सुकोमल,
तूने मेरे मन कलश में, प्रेम का सागर भरा है!

मन से मन का साथ पाना, देखो तो कितना सुखद है!
न ही सीमा, न ही बंदिश और न कोई भी हद है!

प्रेम के धागों से हमने, रेशमी आशा बुनी है!
हर दिशा प्रकाशमय है, प्रेम की करतल ध्वनि है....

प्रेम के पंखों से उड़कर, हम घड़ी हम पास होंगे!
इस हवा में और गगन में, प्रेम के एहसास होंगे!
"देव" मन में रागिनी सी, बांसुरी सी तुम ही तुम हो,
प्रेम की सरगम बजे जब, हर जगह उल्लास होंगे!

प्रेम की किरणें रजत सी, रात को शोभित करेंगी!
मन, वचन को शुद्ध करके, प्राण को मोहित करेंगी!

मैं तेरे जीवन का साथी, तू हमारी संगिनी है!
हर दिशा प्रकाशमय है, प्रेम की करतल ध्वनि है! "

...............चेतन रामकिशन "देव"......................
दिनांक-२७.०६.२०१४  

Friday, 13 June 2014

♥♥उम्मीदों की डाली..♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥उम्मीदों की डाली..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
आशाओं के फूल खिलेंगे, उम्मीदों की डाली होगी !
वक़्त परीक्षा लेता है फिर, आँगन में खुशहाली होगी!
हार जीत तो इस जीवन की, गतिशीलता का हिस्सा है,
कभी अँधेरा घेरेगा तो, कभी यहाँ दीवाली होगी!

मायूसी के साथ जिंदगी, जीकर के भी क्या पाओगे!
बिन हिम्मत के ठोकर खाकर, तुम राहों में गिर जाओगे!

वो सुन्दर होकर नहीं सुन्दर, जिसकी नियत काली होगी!
आशाओं के फूल खिलेंगे, उम्मीदों की डाली होगी ...

सपनों को भी पंख लगेंगे, बस थोड़ा संतोष करो तुम!
अपने हाथों गलत नहीं हो, बस इतना सा होश रखो तुम!
"देव" जहाँ में धनिकों को तो, हर कोई दिल में रखता,
लेकिन निर्धन की खातिर भी, अपने बाहुपोश रखो तुम!

प्यार, वफ़ा के दीप हमारे, दिल में जिस दिन जल जायेंगे! 
उस दिन देखो नफ़रत वाले, सारे सूरज ढल जायेंगे!

दर्द वही समझे औरों का, आँख में जिसके लाली होगी!
आशाओं के फूल खिलेंगे, उम्मीदों की डाली होगी ! "

.................चेतन रामकिशन "देव"…............
दिनांक-१४.०६.२०१४ 

♥♥धुंधली लकीरें..♥♥

♥♥♥♥♥धुंधली लकीरें..♥♥♥♥♥♥
हर ख़ुशी दूर हमसे निकली हुयी!
हाथ की हर लकीर धुंधली हुई!

गम के सूरज ने आंच दी इतनी,
दिल की धरती भी आज उबली हुयी!

खून के रिश्तों में भी प्यार नहीं,
आज देखो फ़िज़ा है बदली हुयी!

पांव दलदल में फंस गए मेरे,
बर्फ दुख की है, आज पिघली हुयी!

साथ एक ने भी न सहारा दिया,
जिंदगी जब भी मेरी फिसली हुयी!

गम की किरणों ने भेद कर ही लिया,
अब दुआओं की ढाल पतली हुयी!

"देव" दिल का इलाज़ करते पर,
आत्मा तक भी पायी कुचली हुयी!"

......चेतन रामकिशन "देव"…......
दिनांक- १३.०६.२०१४ 

Thursday, 12 June 2014

♥♥बदलते आदमी..♥♥

♥♥♥♥♥♥♥बदलते आदमी..♥♥♥♥♥♥♥
आसां नहीं है इतना, कैसे तुम्हें भुला दूँ!
कैसे मैं प्यार वाले, वो खत सभी जला दूँ!  
दिल कहता है के उसको, तुम ढूंढकर के लाओ,
पर जो बदल गया है, कैसे उसे बुला दूँ! 

जीना है अब तो तन्हा, खुद को सिखा रहा हूँ!
ग़म पी रहा हूँ खुद ही, आँसू सुखा रहा हूँ!

अरमां जो हैं मचलते, कैसे उन्हें सुला दूँ!
आसां नहीं है इतना, कैसे तुम्हें भुला दूँ...

जी लूंगा तंग होकर, सांसों की इस कमी में!
कर लूंगा कंठ गीला, एहसास की नमी में!
अब "देव" किसको अपना, समझेंगे जिंदगी में,
जब प्यार ही नहीं है, बाकि जो आदमी में!

एहसास की मोहब्बत, पल में नकार डाली!
झोली में मेरी तुमने, जीवन की हर डाली!

हिम्मत है तोड़ डाली, कैसे कदम चला दूँ!
आसां नहीं है इतना, कैसे तुम्हें भुला दूँ! "

...........चेतन रामकिशन "देव"….......
दिनांक- १२.०६.२०१४

Wednesday, 11 June 2014

♥जिंदगानी को...♥

♥♥♥♥जिंदगानी को...♥♥♥♥♥
जिंदगानी को जब निभायेंगे!
थोड़ा खोयेंगे, थोड़ा पायेंगे!

कुछ तो हिस्से में अपने आयेगा,
जब भी किस्मत को आजमायेंगे!

आज मायूस हैं तो कैसा गिला,
एक दिन हम भी खिलखिलायेंगे !

हाँ यक़ीनन सज़ा मिलेगी बहुत,
दिल किसी का जो हम दुखायेंगे!

होगा खुश हमसे वो खुदा देखो,
किसी रोते को जो हँसायेंगे! 

जिसने ठुकराके दिल मेरा तोड़ा,
एक दिन उनको याद आयेंगे! 

"देव" रूहानी अपना नाता हो,
जिस्म की चाह को भुलायेंगे! "

.......चेतन रामकिशन "देव"…...
दिनांक- १२.०६.२०१४

♥♥तुमको देखा तो..♥♥

♥♥♥♥♥तुमको देखा तो..♥♥♥♥♥
मेरे सीने में दिल धड़कने लगा!
तुमको देखा तो प्यार जगने लगा!

तेरी जुल्फों की ये नमी छुकर,
धूप में भी गगन बरसने लगा!

तेरी खुश्बू हवा के साथ घुली, 
बागवां, मेरा घर महकने लगा!

तेरे लफ़्जों की बांसुरी सुनकर,
मेरा सूना सा घर चहकने लगा!

तूने हाथों से जो छुआ मुझको,
मेरा रंग रूप भी निखरने लगा!

तुझमें ज्योति है देखकर तुझको,
ये अँधेरा भी रुख बदलने लगा!

"देव" नफ़रत की आग कैसे रहे,
प्यार बारिश में जब बिखरने लगा! "

.......चेतन रामकिशन "देव"….…
दिनांक- ११.०६.२०१४

Tuesday, 10 June 2014

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
नदी हमारे मन में बहती, और धारा थल पे दिखती है!
प्रेम भरे जल के अणुओं से, गतिशील जीवन लिखती है!

जल जीवन है, और बिन जल के जीवन ये मुश्किल होता!
और जहाँ प्रेम के हाथों, हर नफ़रत का हल होता है!

जल धारा की नमी धरा पर, हरियाली का सुख लिखती है!
नदी हमारे मन में बहती, और धारा थल पे दिखती है! "

...................चेतन रामकिशन "देव"….….................
दिनांक- १०.०६.२०१४
♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥

Sunday, 8 June 2014

♥♥♥♥प्रेम संगति..♥♥♥♥

♥♥♥♥प्रेम संगति..♥♥♥♥
प्रेम के ज्ञान से रहित हूँ मैं!
हाँ मगर तुममें ही निहित हूँ मैं!
मुझको सिखलाना प्रेम के आख़र,
नया अंकुर हूँ, नव उदित हूँ मैं!

भूल हो जाये तो क्षमा करना!
तुम गलत बात को मना करना!
रूठकर मुझसे दूर न जाना,
मेरे सपनों को तुम बुना करना!

तेरे हित को मैं वंदना करता,
न ही घृणित, हूँ न अहित हूँ मैं!

प्रेम के ज्ञान से रहित हूँ मैं!
हाँ मगर तुममें ही निहित हूँ मैं....

प्रेम का तुमसे ज्ञान पाने को!
तेरे वंदन में सर झुकाने को!
कितना उत्सुक हूँ क्या बताऊँ तुम्हे,
तेरे संग संग कदम बढ़ाने को!

दोष हो सकते हैं बहुत मुझमे,
नव रचित काव्य सा सृजित हूँ मैं!

प्रेम के ज्ञान से रहित हूँ मैं!
हाँ मगर तुममें ही निहित हूँ मैं...

द्वेष की गंध दूर कर देना!
प्रेम की तुम सुगंध भर देना!
"देव" हाथों से मुझको छूकर के,
मुझमें चंदन का तुम असर देना!

मन से चाहा है सत्यता में तुम्हें,
न ही मिथ्या हूँ, न कथित हूँ मैं!

प्रेम के ज्ञान से रहित हूँ मैं!
हाँ मगर तुममें ही निहित हूँ मैं! "


"
कोई-कहता है प्रेम स्वत: आ जाता है, कोई कहता है प्रेम स्वयं हो जाता है, सही बात है, प्रेम हो जाता है, आ जाता है, पर प्रेम का एक पक्ष ऐसा भी है जिसमें प्रेम पुलकित तो हो जाता है, पर कोमल मन को प्रेम का गहरा अर्थ पता नहीं होता, वो उड़ना चाहता है मगर ज्ञान नहीं होता, ऐसे में उसे मिलने वाली प्रेम संगति-प्रेम पूर्ण बना देती है,  और प्रेम के पुष्प सुगंध बिखेरने लगते हैं, तो आइये प्रेम करें! "

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-09.06.2014 

"सर्वाधिकार सुरक्षित, मेरी ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित "

(चित्र साभार-गूगल)

Wednesday, 4 June 2014

♥♥पीड़ा की चादरपोशी..♥♥

♥♥♥♥♥♥♥पीड़ा की चादरपोशी..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
खून नसों में जमा जमा है, आँखों में भी ख़ामोशी है!
जीवन के सब लम्हातों पर, पीड़ा की चादरपोशी है!
किसकी खता बताऊँ अब मैं, मुझको कुछ भी समझ न आये,
गलती मेरी, या कुदरत की, या मेरी किस्मत दोषी है!

ज़ख्म हो गया इतना गहरा, खुद हाथों से सिया गया न!
बिना जुर्म के सजा मिली है, पक्ष हमारा सुना गया न!

आह किसी की कोई सुने न, जाने कैसी बेहोशी है!
खून नसों में जमा जमा है, आँखों में भी ख़ामोशी है!

अपनी आँखों में अश्क़ों की, नमी उन्हें दिखलाई मैंने!
अपनी पीड़ा और बेचैनी रो रोकर बतलाई मैंने!
"देव" मगर जब किसी ने मेरे, दर्द को नहीं सहारा बख्शा,
तब खुद को तन्हा रहने की, ये आदत सिखलाई मैंने!

उनके बिन जीना मुश्किल था, उनको कितना बतलाया था!
उनके बिन मेरे जीवन में, फूल ख़ुशी का मुरझाया था!

लगता है मेरी किस्मत भी, दुख ने ही पाली पोसी है!
खून नसों में जमा जमा है, आँखों में भी ख़ामोशी है!"

..................चेतन रामकिशन "देव"….…….........
दिनांक- ०५.०६.२०१४  

Tuesday, 3 June 2014

♥कैसी मोहब्बत?..♥

♥♥♥♥♥♥♥कैसी मोहब्बत?..♥♥♥♥♥♥♥♥♥
जाने अब कैसी मोहब्बत वो, निभाने आया!
तोड़कर दिल मेरा वो अपना बताने आया!

मैंने पाला था जिसे खून और पसीने से,
वो सज़ा मौत की मुझको ही सुनाने आया!

अपनी मिन्नत, न तड़प, खुद का दर्द याद नहीं,
मेरे सीने से कभी दिल जो चुराने आया!

जो हक़ीक़त के लिए जान पे खेला कल तक,
आज दौलत के लिए, सर वो झुकाने आया!

मेरे जीते जी नहीं, जिसने की कदर मेरी,
मेरे मरने पे वो काँधे को लगाने आया!

दिन में देता रहा इज़्ज़त का भरोसा लेकिन,
रात में वो ही मुझे, नोंच के खाने अाया! 

"देव" लूटा है मुझे, उसने तसल्ली से मगर,
आज अख़बारों में घर मेरा सजाने आया! "

..........चेतन रामकिशन "देव"….……
दिनांक- ०३.०६.२०१४