Saturday, 6 February 2016

तेरी तस्वीर.

♥♥♥♥♥ तेरी तस्वीर...♥♥♥♥♥
तेरी तस्वीर वस गयी मन में। 
कोई खुश्बु सी घुल गयी तन में। 
मोर भी झूमे, गा रही कोयल,
जैसे रौनक सी आ गयी वन में। 

तेरी बोली मिठास वाली है। 
तुझसे होली मेरी दिवाली है। 
नूर मिलता है तेरे होने से,
बिन तेरे मेरी राह खाली है। 

तू ही मेरी दुआ, मेरी बरकत,
मेरी ख्वाहिश नहीं किसी धन में। 
मोर भी झूमे, गा रही कोयल,
जैसे रौनक सी आ गयी वन में...

दूर होकर भी दूर न करना। 
मेरे ख्वाबों को चूर न करना। 
बस यूँ ही रहना फूल सी बनकर,
एक पल भी गुरुर न करना। 

तुझसे रिश्ता है "देव" जन्मों का,
ख़त्म न करना इसको अनबन में। 
मोर भी झूमे, गा रही कोयल,
जैसे रौनक सी आ गयी वन में। "

........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-०६.०२.२०१६ 
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। "  

Thursday, 21 January 2016

♥ निष्कासन का दंड...♥

♥♥♥♥♥♥♥♥ निष्कासन का दंड...♥♥♥♥♥♥♥♥♥
विवश हुआ स्वयं की हत्या को, देश का जो की कर्णधार था। 
दोष रख दिया उसके सर जो, किंचित भी न दागदार था। 
जिसने अपने अधिकारों को, मित्रों के संग पाना चाहा,
दंड दिया था निष्कासन का, जबकि वो न गुनहगार था। 

हाँ सच है कि स्वयं की हत्या, कायरता कहलाती होगी। 
जिसको अनुचित दंड मिला पर, उसे नींद कब आती होगी। 
क्या उत्पीड़न इसी वजह से, दलित वर्ग में जो जन्मा था,
भेदभाव शिक्षा मंदिर में, आग धधक सी जाती होगी। 

तार हुआ उस माँ का आँचल, तीर के जैसे आरपार था। 
दंड दिया था निष्कासन का, जबकि वो न गुनहगार था....

कभी नहीं हो पुनरावृत्ति, पराकाष्ठा है ये दुःख की। 
नहीं विवश हो बिना जुर्म के, बुझे न कोई आभा मुख की। 
"देव " नहीं वो शिक्षा मंदिर, जहाँ पे ऐसा बंटवारा हो,
यदि रहा ऐसा तो रण हो, नहीं कल्पना होगी सुख की। 

लटके वो कंधे फांसी पे, जिनपे दुःख का बड़ा भार था। 
दंड दिया था निष्कासन का, जबकि वो न गुनहगार था। "


........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-२१.०१.२०१६ 
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। " 

Saturday, 16 January 2016

♥♥बलिहारी...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥बलिहारी...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तुझे नहीं अनदेखा करता, बेशक की जिम्मेदारी है। 
हाँ सच है कर्तव्य जरुरी, पर तू प्राणों से प्यारी है। 
बोध तुम्हारी बेचैनी का, नहीं बचा मेरी नज़रों से,
सच पूछों तो तुम पर मेरी, रूह तलक भी बलिहारी है। 

पर जीवन के कर्मठ पथ पर, खुद में जीना श्रेष्ठ नहीं है। 
इतना ऊँचा बन नहीं सकता, जो कोई मुझपे ज्येष्ठ नहीं है। 

सबके हित में निहित हूँ लेकिन, तू भी मुझको मनोहारी है। 
सच पूछों तो तुम पर मेरी, रूह तलक भी बलिहारी है.... 


नहीं उपेक्षित किया है तुमको, इच्छा रखी सदा मिलन की। 
कभी पढ़ो अपनी नज़रों से, प्रेम सुधा मेरे जीवन की। 
"देव" अपेक्षा यही रखी है, तुम भी समझो ध्येय को मेरे,
बीज कुचलने से न पनपे, बेल कोई भी अपनेपन की। 

नतमस्तक हूँ सम्मुख तेरे, तू स्वागत की अधिकारी है। 
सच पूछों तो तुम पर मेरी, रूह तलक भी बलिहारी है। "

........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-१६.०१.२०१६ 
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। "  

Sunday, 10 January 2016

♥अक्सर दूर...♥

♥♥♥♥♥♥♥अक्सर दूर...♥♥♥♥♥♥♥
अक्सर दूर बिछड़ने का डर । 
तन्हाई से लड़ने का डर । 
बिना तुम्हारे सूने घर को,
हर दिन यहाँ उजड़ने का डर। 

दूर रूह से हो नहीं सकते, हाँ ये सच है दूरी तन की। 
लेकिन तुमको बिन देखे ही, राह कठिन लगती जीवन की। 
लेकिन फिर भी यही निवेदन, तुम मेरी शक्ति बन जाना,
तुम बिन कोई पढ़ नहीं सकता, उलझन मेरे अंतर्मन की। 

तुम बिन चला नहीं जाता है,
पांव में छाले पड़ने का डर। 
बिना तुम्हारे सूने घर को,
हर दिन यहाँ उजड़ने का डर..... 

हाँ मालूम है नहीं निभा है, मुझसे साथ तुम्हारे जैसा। 
मुझे पता है इस दुनिया में, कोई नहीं होता तुम जैसा। 
हाँ पर दिल को कदर तुम्हारी, "देव" तुम्हारा अभिवादन है,
मैं तो चाहूँ प्यार तुम्हारा, न धन दौलत न ही पैसा। 

तुम बिन हूँ बेजान सरीखा,
इस मिटटी में गड़ने का डर। 
बिना तुम्हारे सूने घर को,
हर दिन यहाँ उजड़ने का डर। "

........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-१०.०१.२०१६ 
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। " 


Wednesday, 6 January 2016

♥♥जिद...♥♥

♥♥♥♥जिद...♥♥♥♥
अंगारों पे चलने की जिद। 
ये हालात बदलने की जिद। 
काले गहरे अँधेरे में,
दीपक बनके जलने की जिद। 

कुछ बेहतर करने की आशा,
जो जीवन में रख लेते हैं। 
वो पीड़ा का विष भी देखो,
जग में हंसकर चख लेते हैं। 
जो आँखों में ख्वाब सजाकर,
उनको दिन में पूरा करते। 
वही लोग इतिहास की देखो,
इस दुनिया में रचना करते। 

पतझड़ में भी खिलने की जिद। 
दिल से दिल के मिलने की जिद। 
काले गहरे अँधेरे में,
दीपक बनके जलने की जिद...

ऊष्मा को प्रवाहित करना। 
ऊर्जा नयी समाहित करना। 
नहीं सिमटकर होना स्वयंभू,
न केवल अपना हित करना। 

पथ में दूर निकलने की जिद। 
समय के संग में ढलने की जिद। 
काले गहरे अँधेरे में,
दीपक बनके जलने की जिद। "

........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-०६.०१.२०१६ 
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। "  

Tuesday, 5 January 2016

♥♥♥तुम्हारी पहचान...♥♥♥

♥♥♥तुम्हारी पहचान...♥♥♥
हर मुश्किल आसान हो गयी। 
तुमसे जो पहचान हो गयी। 
उपवन में भी फूल खिले हैं,
अधरों पर मुस्कान हो गयी। 

धूप गुनगुनी अच्छी लगती,
जब हम दोनों साथ चले हैं। 
छंटा रात का भी अँधेरा,
हर रस्ते पे दीप जले हैं। 
साथ तुम्हारा पाकर मेरे,
व्याकुल मन को चैन आ गया,
सूनी सूनी अँखियों में भी,
कितने प्यारे ख्वाब खिले हैं। 

तू ही मन में स्थापित है,
तू ही तन की जान हो गयी। 
उपवन में भी फूल खिले हैं,
अधरों पर मुस्कान हो गयी....

कड़ी धूप में शीतल छाया,
तुमने आँगन को महकाया। 
चले थाम कर मेरी ऊँगली,
सही गलत का भेद बताया। 
"देव " हमारे अंतर्मन में,
छवि तुम्हारी वसी हुयी है,
सारी दुनिया में रौनक है,

जब से तू आँखों को भाया। 


मैं शामिल तेरी तेरी इज़्ज़त में,
तू मेरा सम्मान हो गयी। 
उपवन में भी फूल खिले हैं,
अधरों पर मुस्कान हो गयी। "


........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-०५.०१.२०१६ 
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। "





Monday, 4 January 2016

♥ लफ्ज़ ♥

♥♥♥♥♥♥♥ लफ्ज़ ♥♥♥♥♥♥♥♥
लिखे थे लफ्ज़ दिल से पर, अहम उनका नहीं पिघला। 
वो शायद चाँद और मैं एक, पत्थर भी नहीं निकला।

महीनों, साल, दिन में ही, वो भूला नाम को मेरा,
मेरा दिल कौनसी मिट्टी का, जो ये अब भी नहीं बदला।

वो दुनिया के लिये तस्वीर पर तस्वीर रखते हैं,
क्यों मेरे वास्ते खिड़की का भी, पर्दा नहीं बदला।

चुभाये ख़ार मेरे दिल को पर, दे दी उन्हें माफ़ी,
रंगे न हाथ उनके सोचकर, खूं भी नहीं निकला। "
........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-०५.०१.२०१६ 
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। "

Tuesday, 29 December 2015

♥♥चांदनी रात...♥♥

♥♥♥♥♥चांदनी रात...♥♥♥♥♥
चांदनी रात हो रही फिर से। 
ख़्वाब में बात हो रही फिर से। 

एक अरसे से इतना सूखा था,
आज बरसात हो रही फिर से। 

तेरी तस्वीर में भी आई दमक,
ये करामात हो रही फिर से। 

सारे आकाश में हैं, मैं और तुम,
यूँ मुलाकात हो रही फिर से। 

रेशमी डोर से बंधे हम तुम,
ऐसी सौगात हो रही फिर से। 

सज गयी तू दुल्हन की तरह से,
आज बारात हो रही फिर से। 

"देव " न ख्वाब तोड़कर जाना,
देखो प्रभात हो रही फिर से। "

........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-२९.१२.२०१५ 
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। "  

Monday, 28 December 2015

♥तपस्या...♥

♥♥♥♥♥तपस्या...♥♥♥♥♥♥♥
अनुभूति की हत्या कर दी। 
खंडित प्रेम तपस्या कर दी। 
जिसका पथ आसान किया था,
उसने जटिल समस्या कर दी। 

मेरे मन को भेद दिया है,
निर्ममता के प्रहारों से। 
मेरे भावों को काटा है,
विष में डूबी तलवारों से।  
मेरे नयनों को अश्रु का,
जीवन भर अभिशाप दे दिया,
मैंने दी थी कुशल कामना,
उसने मुझको श्राप दे दिया। 

जो सौगंध उम्र भर की थी,
उसने  क्षण में मिथ्या कर दी।  
जिसका पथ आसान किया था,
उसने जटिल समस्या कर दी...

सक्षम थे वो सुन सकते थे,
मुझ याचक के प्रस्तावों को। 
वो चाहते तो भर सकते थे,
छूकर के मेरे घावों को। 
पर न समझा मर्म को मेरे,
रौंद दिया है घायल मन को। 
निरपराधी होकर बोला,
दंड मेरे भावुक जीवन को। 

मेरे शत्रु के संग मिलकर,
विजय की स्वयं प्रतिज्ञा कर दी। 
जिसका पथ आसान किया था,
उसने जटिल समस्या कर दी। "

........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-२८.१२.२०१५ 
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। "  

Friday, 25 December 2015

♥खुद्दारी...♥

♥♥♥♥♥♥खुद्दारी...♥♥♥♥♥♥♥
अपना दिन तो बहुत कठिन था, 
अपनी रात बहुत भारी है। 
फिर भी शिकवा नहीं किसी से,
मुझमे इतनी खुद्दारी है। 
मेरे दिल के टुकड़े करके,
वो खुशियों के दीप जलायें,
नहीं पता क्यों इस दुनिया में,
मतलब की नातेदारी है। 

कड़ी धूप में जिसकी खातिर
ठंडक को मेरे साये थे। 
खुशबु से भरने को जिसके,
घर में गुलशन महकाये थे।  
जिसके पांवों में पायल के,
जोड़े बांधे बहुत प्यार से,
छुड़ा लिया वो हाथ भी उसने,
जिसमें कंगन पहनाये थे। 

बहुत कठिन है ये सब लिखना,
साँसों तक में दुश्वारी है।   
नहीं पता क्यों इस दुनिया में,
मतलब की नातेदारी है...

चलो करें वो जो उनका मन,
मिन्नत करके हार गया हूँ। 
जब पीड़ा ही किस्मत में है,
तो ये दुःख स्वीकार गया हूँ। 
"देव " हमारे दिल के भीतर,
एक लावा भर गया दर्द का,
बन बैठा हूँ मैं विस्फोटक,
मार के दिल को, पार गया हूँ। 

अपने ग़म के साथ मैं तन्हा,
चंहुओर दुनिया सारी है। 
नहीं पता क्यों इस दुनिया में,
मतलब की नातेदारी है। "

........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-२५.१२.२०१५ 
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। " 

Thursday, 24 December 2015

♥निर्मोही...♥♥

♥♥♥♥♥निर्मोही...♥♥♥♥♥
अश्रुपूरित नयन हो गये। 
सारे सपने दहन हो गये।  
मेरे शब्द बताकर झूठे,
सच्चे उनके कहन हो गये। 
निर्मोही होकर वो मुझसे,
तोड़ गए सम्बन्ध नेह का,
नहीं पता के उनको कैसे,
क्षण विरह के सहन हो गये। 

मैं भी रूप किसी मानव का,
पत्थर सा निष्प्राण नहीं था। 
मेरा मन भी फूल सा कोमल,
विष में डूबा वाण नहीं था। 
हो करवद्ध किया था मैंने,
उनसे अपना भाव निवेदन,
तोड़ दिया मेरे हृदय को,
जबकि मुझको त्राण नहीं था। 

घाव मिले हैं, शूल भी देखो,
कुंठा के उत्पन्न हो गये। 
नहीं पता के उनको कैसे,
क्षण विरह के सहन हो गये.... 

या तो व्याकुलता न समझें,
या संवेदनहीन हो गये। 
मैं पीड़ा में खूब कराहा,
वो सुख में आसीन हो गये। 
" देव " हमारी स्मृति में,
उनकी छवि वसी गहरे से,
और वो हमको विस्मृत करके,
किसी और में लीन हो गये। 

पीड़ा के इन प्रहारों से,
हम तो मरणासन्न हो गये। 
नहीं पता के उनको कैसे,
क्षण विरह के सहन हो गये। "


........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-२४.१२.२०१५ 
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। "    




Tuesday, 22 December 2015

बुझा बुझा सा मन


♥♥♥♥बुझा बुझा सा मन...♥♥♥♥♥
तुम बिन रिक्त हुआ है आँगन,
तुम बिन बुझा बुझा सा है मन। 
तुम बिन क्षमता थमी कर्म की,
तुम बिन थका थका सा है तन। 

तुम बिन नदियों का तट सूना,
तुम बिन बगिया मुरझाई है। 
तुम बिन आँखों में लाली है,
नींद तनिक भी न आई है। 
तुम बिन पत्र लिखावट भूले,
शब्दों की आँखों में आंसू,
तुम बिन है गहरी मायूसी,
कंटक माला उग आई है। 

तुम बिन पौधे सूख गये हैं,
आग में झुलसा है सारा वन। 
तुम बिन क्षमता थमी कर्म की,
तुम बिन थका थका सा है तन... 

तुम बिन अन्न नहीं उगता है,
खेतों की रौनक गायब है। 
तुम बिन पंछी मौन हो गये,
अब न चिड़ियों का कलरव है। 
"देव " तुम्हारी प्रतीक्षा में,
सुबह से लेकर साँझ हो गयी,
नहीं है ध्वनि वाध यंत्र में, 
न तुम बिन कोई उत्सव है। 

तुम बिन मेरा मोल नहीं कुछ,
मिटटी सा मेरा ये कण कण। 
तुम बिन क्षमता थमी कर्म की,
तुम बिन थका थका सा है तन। "

........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-२२.१२.२०१५
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। "  

Sunday, 20 December 2015

♥कच्ची मिट्टी सा दिल...♥

♥♥♥♥♥♥♥कच्ची मिट्टी सा दिल...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
भावुकता है छिन्न भिन्न सी, घाव हुये हैं, रक्त बहा है। 
मैं ही जानूं कैसे मैंने, इतने दुःख का वार सहा है। 
मेरे मन में जिसकी छवियाँ, दीर्घकाल से स्थापित थी,
उसने मेरे सत्य प्रेम को, क्षण भर में ही झूठ कहा है। 

नहीं पता कि ऐसा करके, उनको क्या कुछ मिल पायेगा। 
या उनका चेहरा दमकेगा, या फिर आँगन खिल जायेगा। 
मेरे मन पे अंकित आखर, देख के भी अनदेखा करते,
नहीं पता था जीवन पथ पे, पीड़ा का बादल छायेगा। 

विस्मृत मेरा प्रेम किया तो, किंचित क्या फिर शेष रहा है  
भावुकता है छिन्न भिन्न सी, घाव हुये हैं, रक्त बहा है..... 

सोच रहा हूँ भावुकता को, अपनायत को बौना कर दूँ। 
प्रेम भूलकर, लूट मार कर, घर में चांदी सोना भर दूँ। 
"देव " वो सुन्दर है फूलों सा, मुझसे क्या नाता रखेगा,
तिमिर घना एकाकीपन का, मैं खुद को ही बेघर कर दूँ। 

कच्ची मिट्टी सा कोमल दिल, टुकड़े होकर शेष रहा है। 
भावुकता है छिन्न भिन्न सी, घाव हुये हैं, रक्त बहा है। "

........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-२०.१२.२०१५
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। "  

Tuesday, 8 December 2015

♥♥सितारे...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥सितारे...♥♥♥♥♥♥♥
तुम तो आकाश के सितारे हो। 
मेरे महबूब कितने प्यारे हो। 

सारी दुनिया को है तेरी ख्वाहिश,
रश्क़ है हमको, तुम हमारे हो। 

बांसुरी कानों में कोई गूंजे,
नाम जब तुम मेरा पुकारे हो। 

बिन तेरे मेरा न वजूद कोई,
तुम मेरी नाव के किनारे हो। 

लड़खड़ाने का डर नहीं है मुझे,
क्यूंकि तुम जो मेरे सहारे हो। 

मेरी आँखों में नींद न तुम बिन,
रात तुम भी तो यूँ गुजारे हो। 

" देव " किरदार ये तेरा चमके,
रंग मेरा भी तुम निखारे हो। "

........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-०८.१२.२०१५
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। " 

Monday, 7 December 2015

♥♥♥♥फ़टी चादर..♥♥♥♥♥

दर्द दिन रात ही परोसा है। 
अब किसी पे नहीं भरोसा है। 

मैंने जिसके लिये दुआयें कीं,
देखो उसने ही मुझको कोसा है। 

आई दौलत तो मुझको भूल गया,
मैंने पाला है जिसको पोसा है। 

मुफ़लिसी मेरी और फ़टी चादर,
उसपे ठंडी हवा का बोसा है। 

"देव " आँगन तो मेरा छोड़ दिया,
पर वो उस दिन से बेघरो सा है। "

........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-०७.१२.२०१५   
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। "   

Saturday, 28 November 2015

♥♥देश टुकड़ों में...♥♥

♥♥♥♥♥देश टुकड़ों में...♥♥♥♥♥♥
देश टुकड़ों में बंट रहा फिर से। 
आपसी प्यार घट रहा फिर से। 

जिसकी छाँव में कोई फर्क नहीं,
पेड़ वो आज कट रहा फिर से। 

दिन दहाड़े भी अब सताये डर,
नाम इज़्ज़त का लुट रहा है फिर से। 

न बुरे वक़्त में कोई आया,
झुंड झूठों का छंट रहा फिर से। 

तोड़ना चाहें, कोई जोड़े नहीं,
हर कोई रंज रट रहा फिर से। 

लफ्ज़ जो दूरियां बढ़ाने लगें,
हर कोई उनपे डट रहा फिर से। 

"देव" इंसानियत बचेगी कहाँ,
बम ये नफरत का फट रहा फिर से। "

........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-२८.११.२०१५ 
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। " 

Friday, 27 November 2015

♥♥अमानत...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥अमानत...♥♥♥♥♥♥♥
प्यार की तेरे जो अमानत है। 
मुझपे कुदरत कि ये इनायत है। 

तुमको पाकर के मिल गया है सुकूं,
न ही शिकवा है, न शिकायत है। 

तुझको छूने की भी हुयी ख्वाहिश,
चूम लूँ तुमको क्या इजाजत है। 

तेरी ज़ुल्फ़ें छुपायें चेहरे को,
कितनी मासूम ये शरारत है। 

तुम दुआओं में, हो मेरी शामिल,
तुझको चाहना मेरी इबादत है। 

"देव" आ जाओ मुझसे मिलने को,
सिर्फ तुमसे ही दिल को राहत है। "

........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-२७.११.२०१५ 
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। "

Thursday, 26 November 2015

♥आलम...♥

♥♥♥♥♥♥आलम...♥♥♥♥♥♥♥
मुल्क का आज कैसा आलम है। 
देखो जिस ओर भी नया ग़म है। 

आदमी होके आदमी में फरक,
आज इंसानियत बड़ी कम है। 

मुफ़लिसी का मैं दर्द कैसे लिखूं,
पेट भूखा है और नही दम है। 

रात भर जागके गुजारा करूँ,
तेरे जाने से आँख ये नम है। 

मेरे अरमानों का गला घोंटा,
तू भी कातिल से अब कहाँ कम है। 

है दवा महंगी कैसे होगी शिफ़ा,
साथ बीमारियों का मौसम है। 

"देव" तकदीर है या दुश्वारी,
मुझको पानी नहीं, उन्हें रम है। "

........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-२७.११.२०१५   
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। "  

Friday, 20 November 2015

♥लिबास...♥♥


♥♥♥♥♥♥लिबास...♥♥♥♥♥♥♥
रेशमी सा लिबास हो जाओ। 
तुम मेरे पास पास हो जाओ। 

मेरी मुस्कान तुमको मिल जाये,
जब कभी तुम उदास हो जाओ। 

है दुआ मेरी उस खुदा सा ये,
एक तुम मेरे ख़ास हो जाओ। 

जीत की खुशियां हों मुबारक पर,
हार से न हताश हो जाओ। 

इस जनम "देव " तुम हो मेरे मगर,
हर जनम तुम ही काश हो जाओ। "

........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-२०.११.२०१५   
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। "

Monday, 16 November 2015

♥लौ ...♥

♥♥♥♥♥♥♥लौ ...♥♥♥♥♥♥♥♥♥
कोई लौ बनके तुम उजाला करो। 
न ही नफरत से रंग काला करो। 

सारी दुनिया को याद आओगे,
काम ऐसा जरा निराला करो। 

जी रहे जिसमें वो ही पल जीवन,
काम कल पर न कोई टाला करो। 

जिंदगी खुद की बस, नहीं होती,
फ़र्ज़ भी सबका तुम संभाला करो। 

"देव " हर धर्म से जो पावन हैं,
फूल इंसानियत के पाला करो। "

........चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-१६.११.२०१५ 
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। "