Friday, 13 June 2014

♥♥उम्मीदों की डाली..♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥उम्मीदों की डाली..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
आशाओं के फूल खिलेंगे, उम्मीदों की डाली होगी !
वक़्त परीक्षा लेता है फिर, आँगन में खुशहाली होगी!
हार जीत तो इस जीवन की, गतिशीलता का हिस्सा है,
कभी अँधेरा घेरेगा तो, कभी यहाँ दीवाली होगी!

मायूसी के साथ जिंदगी, जीकर के भी क्या पाओगे!
बिन हिम्मत के ठोकर खाकर, तुम राहों में गिर जाओगे!

वो सुन्दर होकर नहीं सुन्दर, जिसकी नियत काली होगी!
आशाओं के फूल खिलेंगे, उम्मीदों की डाली होगी ...

सपनों को भी पंख लगेंगे, बस थोड़ा संतोष करो तुम!
अपने हाथों गलत नहीं हो, बस इतना सा होश रखो तुम!
"देव" जहाँ में धनिकों को तो, हर कोई दिल में रखता,
लेकिन निर्धन की खातिर भी, अपने बाहुपोश रखो तुम!

प्यार, वफ़ा के दीप हमारे, दिल में जिस दिन जल जायेंगे! 
उस दिन देखो नफ़रत वाले, सारे सूरज ढल जायेंगे!

दर्द वही समझे औरों का, आँख में जिसके लाली होगी!
आशाओं के फूल खिलेंगे, उम्मीदों की डाली होगी ! "

.................चेतन रामकिशन "देव"…............
दिनांक-१४.०६.२०१४ 

♥♥धुंधली लकीरें..♥♥

♥♥♥♥♥धुंधली लकीरें..♥♥♥♥♥♥
हर ख़ुशी दूर हमसे निकली हुयी!
हाथ की हर लकीर धुंधली हुई!

गम के सूरज ने आंच दी इतनी,
दिल की धरती भी आज उबली हुयी!

खून के रिश्तों में भी प्यार नहीं,
आज देखो फ़िज़ा है बदली हुयी!

पांव दलदल में फंस गए मेरे,
बर्फ दुख की है, आज पिघली हुयी!

साथ एक ने भी न सहारा दिया,
जिंदगी जब भी मेरी फिसली हुयी!

गम की किरणों ने भेद कर ही लिया,
अब दुआओं की ढाल पतली हुयी!

"देव" दिल का इलाज़ करते पर,
आत्मा तक भी पायी कुचली हुयी!"

......चेतन रामकिशन "देव"…......
दिनांक- १३.०६.२०१४ 

Thursday, 12 June 2014

♥♥बदलते आदमी..♥♥

♥♥♥♥♥♥♥बदलते आदमी..♥♥♥♥♥♥♥
आसां नहीं है इतना, कैसे तुम्हें भुला दूँ!
कैसे मैं प्यार वाले, वो खत सभी जला दूँ!  
दिल कहता है के उसको, तुम ढूंढकर के लाओ,
पर जो बदल गया है, कैसे उसे बुला दूँ! 

जीना है अब तो तन्हा, खुद को सिखा रहा हूँ!
ग़म पी रहा हूँ खुद ही, आँसू सुखा रहा हूँ!

अरमां जो हैं मचलते, कैसे उन्हें सुला दूँ!
आसां नहीं है इतना, कैसे तुम्हें भुला दूँ...

जी लूंगा तंग होकर, सांसों की इस कमी में!
कर लूंगा कंठ गीला, एहसास की नमी में!
अब "देव" किसको अपना, समझेंगे जिंदगी में,
जब प्यार ही नहीं है, बाकि जो आदमी में!

एहसास की मोहब्बत, पल में नकार डाली!
झोली में मेरी तुमने, जीवन की हर डाली!

हिम्मत है तोड़ डाली, कैसे कदम चला दूँ!
आसां नहीं है इतना, कैसे तुम्हें भुला दूँ! "

...........चेतन रामकिशन "देव"….......
दिनांक- १२.०६.२०१४

Wednesday, 11 June 2014

♥जिंदगानी को...♥

♥♥♥♥जिंदगानी को...♥♥♥♥♥
जिंदगानी को जब निभायेंगे!
थोड़ा खोयेंगे, थोड़ा पायेंगे!

कुछ तो हिस्से में अपने आयेगा,
जब भी किस्मत को आजमायेंगे!

आज मायूस हैं तो कैसा गिला,
एक दिन हम भी खिलखिलायेंगे !

हाँ यक़ीनन सज़ा मिलेगी बहुत,
दिल किसी का जो हम दुखायेंगे!

होगा खुश हमसे वो खुदा देखो,
किसी रोते को जो हँसायेंगे! 

जिसने ठुकराके दिल मेरा तोड़ा,
एक दिन उनको याद आयेंगे! 

"देव" रूहानी अपना नाता हो,
जिस्म की चाह को भुलायेंगे! "

.......चेतन रामकिशन "देव"…...
दिनांक- १२.०६.२०१४

♥♥तुमको देखा तो..♥♥

♥♥♥♥♥तुमको देखा तो..♥♥♥♥♥
मेरे सीने में दिल धड़कने लगा!
तुमको देखा तो प्यार जगने लगा!

तेरी जुल्फों की ये नमी छुकर,
धूप में भी गगन बरसने लगा!

तेरी खुश्बू हवा के साथ घुली, 
बागवां, मेरा घर महकने लगा!

तेरे लफ़्जों की बांसुरी सुनकर,
मेरा सूना सा घर चहकने लगा!

तूने हाथों से जो छुआ मुझको,
मेरा रंग रूप भी निखरने लगा!

तुझमें ज्योति है देखकर तुझको,
ये अँधेरा भी रुख बदलने लगा!

"देव" नफ़रत की आग कैसे रहे,
प्यार बारिश में जब बिखरने लगा! "

.......चेतन रामकिशन "देव"….…
दिनांक- ११.०६.२०१४

Tuesday, 10 June 2014

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
नदी हमारे मन में बहती, और धारा थल पे दिखती है!
प्रेम भरे जल के अणुओं से, गतिशील जीवन लिखती है!

जल जीवन है, और बिन जल के जीवन ये मुश्किल होता!
और जहाँ प्रेम के हाथों, हर नफ़रत का हल होता है!

जल धारा की नमी धरा पर, हरियाली का सुख लिखती है!
नदी हमारे मन में बहती, और धारा थल पे दिखती है! "

...................चेतन रामकिशन "देव"….….................
दिनांक- १०.०६.२०१४
♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥

Sunday, 8 June 2014

♥♥♥♥प्रेम संगति..♥♥♥♥

♥♥♥♥प्रेम संगति..♥♥♥♥
प्रेम के ज्ञान से रहित हूँ मैं!
हाँ मगर तुममें ही निहित हूँ मैं!
मुझको सिखलाना प्रेम के आख़र,
नया अंकुर हूँ, नव उदित हूँ मैं!

भूल हो जाये तो क्षमा करना!
तुम गलत बात को मना करना!
रूठकर मुझसे दूर न जाना,
मेरे सपनों को तुम बुना करना!

तेरे हित को मैं वंदना करता,
न ही घृणित, हूँ न अहित हूँ मैं!

प्रेम के ज्ञान से रहित हूँ मैं!
हाँ मगर तुममें ही निहित हूँ मैं....

प्रेम का तुमसे ज्ञान पाने को!
तेरे वंदन में सर झुकाने को!
कितना उत्सुक हूँ क्या बताऊँ तुम्हे,
तेरे संग संग कदम बढ़ाने को!

दोष हो सकते हैं बहुत मुझमे,
नव रचित काव्य सा सृजित हूँ मैं!

प्रेम के ज्ञान से रहित हूँ मैं!
हाँ मगर तुममें ही निहित हूँ मैं...

द्वेष की गंध दूर कर देना!
प्रेम की तुम सुगंध भर देना!
"देव" हाथों से मुझको छूकर के,
मुझमें चंदन का तुम असर देना!

मन से चाहा है सत्यता में तुम्हें,
न ही मिथ्या हूँ, न कथित हूँ मैं!

प्रेम के ज्ञान से रहित हूँ मैं!
हाँ मगर तुममें ही निहित हूँ मैं! "


"
कोई-कहता है प्रेम स्वत: आ जाता है, कोई कहता है प्रेम स्वयं हो जाता है, सही बात है, प्रेम हो जाता है, आ जाता है, पर प्रेम का एक पक्ष ऐसा भी है जिसमें प्रेम पुलकित तो हो जाता है, पर कोमल मन को प्रेम का गहरा अर्थ पता नहीं होता, वो उड़ना चाहता है मगर ज्ञान नहीं होता, ऐसे में उसे मिलने वाली प्रेम संगति-प्रेम पूर्ण बना देती है,  और प्रेम के पुष्प सुगंध बिखेरने लगते हैं, तो आइये प्रेम करें! "

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-09.06.2014 

"सर्वाधिकार सुरक्षित, मेरी ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित "

(चित्र साभार-गूगल)

Wednesday, 4 June 2014

♥♥पीड़ा की चादरपोशी..♥♥

♥♥♥♥♥♥♥पीड़ा की चादरपोशी..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
खून नसों में जमा जमा है, आँखों में भी ख़ामोशी है!
जीवन के सब लम्हातों पर, पीड़ा की चादरपोशी है!
किसकी खता बताऊँ अब मैं, मुझको कुछ भी समझ न आये,
गलती मेरी, या कुदरत की, या मेरी किस्मत दोषी है!

ज़ख्म हो गया इतना गहरा, खुद हाथों से सिया गया न!
बिना जुर्म के सजा मिली है, पक्ष हमारा सुना गया न!

आह किसी की कोई सुने न, जाने कैसी बेहोशी है!
खून नसों में जमा जमा है, आँखों में भी ख़ामोशी है!

अपनी आँखों में अश्क़ों की, नमी उन्हें दिखलाई मैंने!
अपनी पीड़ा और बेचैनी रो रोकर बतलाई मैंने!
"देव" मगर जब किसी ने मेरे, दर्द को नहीं सहारा बख्शा,
तब खुद को तन्हा रहने की, ये आदत सिखलाई मैंने!

उनके बिन जीना मुश्किल था, उनको कितना बतलाया था!
उनके बिन मेरे जीवन में, फूल ख़ुशी का मुरझाया था!

लगता है मेरी किस्मत भी, दुख ने ही पाली पोसी है!
खून नसों में जमा जमा है, आँखों में भी ख़ामोशी है!"

..................चेतन रामकिशन "देव"….…….........
दिनांक- ०५.०६.२०१४  

Tuesday, 3 June 2014

♥कैसी मोहब्बत?..♥

♥♥♥♥♥♥♥कैसी मोहब्बत?..♥♥♥♥♥♥♥♥♥
जाने अब कैसी मोहब्बत वो, निभाने आया!
तोड़कर दिल मेरा वो अपना बताने आया!

मैंने पाला था जिसे खून और पसीने से,
वो सज़ा मौत की मुझको ही सुनाने आया!

अपनी मिन्नत, न तड़प, खुद का दर्द याद नहीं,
मेरे सीने से कभी दिल जो चुराने आया!

जो हक़ीक़त के लिए जान पे खेला कल तक,
आज दौलत के लिए, सर वो झुकाने आया!

मेरे जीते जी नहीं, जिसने की कदर मेरी,
मेरे मरने पे वो काँधे को लगाने आया!

दिन में देता रहा इज़्ज़त का भरोसा लेकिन,
रात में वो ही मुझे, नोंच के खाने अाया! 

"देव" लूटा है मुझे, उसने तसल्ली से मगर,
आज अख़बारों में घर मेरा सजाने आया! "

..........चेतन रामकिशन "देव"….……
दिनांक- ०३.०६.२०१४

Thursday, 29 May 2014

♥♥हम जैसे लोग..♥♥

♥♥♥♥♥♥♥हम जैसे लोग..♥♥♥♥♥♥♥♥♥
रिश्ता न तोड़ देना, तुम हमसे एक पल में,
हम जैसे लोग दिल से, बरसों नहीं निकलते!

दिल में दर्द है भारी, आँखों में एक जलन है,
वरना तो सर्दियों में, आंसू नही उबलते!

मिन्नत करो उसी से, सीने में जिसके दिल है,
पत्थर से लोग देखो, बिल्कुल नहीं पिघलते!

होता न प्यार तुमसे, होती जो न मोहब्बत,
तो भूल से भी दिल के, अरमां नहीं मचलते! 

वो नाम के थे अपने, शायद वजह यही हो,
वरना वो देख मुझको, बचकर नहीं निकलते!

नियत में खोट होगा, उस आदमी की शायद,
वरना ज़मीर वाले, ऐसे नहीं फिसलते!

हमको न "देव " समझो, तुम अपने ही तरह का,
हम लोग प्यार वाले गुल को, नहीं मसलते!" 

.............चेतन रामकिशन "देव"….………
दिनांक- ३०.०५.२०१४

♥♥खुशियों की मुफ़लिसी ..♥♥

♥♥♥♥♥♥खुशियों की मुफ़लिसी ..♥♥♥♥♥♥♥♥
फुर्सत मिली कभी तो, पूछेंगे जिंदगी से!
हमने था क्या बिगाड़ा, जो दुख मिला सभी से!

सिक्के भी और सोना, चाँदी भी है बहुत पर,
कैसे करें गुजारा खुशियों की, मुफ़लिसी से!

रिश्ते भी आज झूठे, एहसास कुछ नहीं है,
हम भी नहीं करेंगे, अब प्यार ये किसी से!  

हर रोज जीते जी ही, मरना पड़ा हमे तो,
फिर खौफ कैसे खाते, हम यार ख़ुदकुशी से!

जिसको था दिल से चाहा, उसने ही दिल को तोड़ा,
अब पार कैसे पायें, हम ग़म से, बेबसी से!

सूरत को देखकर ख़ुश, आंसू ने हमको दे दें,
गुमनाम हैं तभी हम, डरते हैं हम ख़ुशी से! 

माना के "देव" मुझसे, गलती हुई थी लेकिन,
खायेंगे अब न  धोखा, जज़्बात में किसी से! "

.............चेतन रामकिशन "देव"….…......
दिनांक- २९.०५.२०१४

Wednesday, 28 May 2014

♥♥मैं हूँ पत्थर..♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥मैं हूँ पत्थर..♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मेरी हसरत, मेरे एहसास मुझमें रहने दो!
मैं हूँ पत्थर के मुझे दर्द यहाँ सहने दो!

बांध टूटेगा तो आयेगी सुनामी कोई,
इसीलिए आँखों से मेरी ये अश्क़ बहने दो!

मैं सही हूँ ये मेरा दिल भी जानता है सुनो,
सारी दुनिया को जो कहना है, उसे कहने दो!

लोग महफ़िल में बड़े ही सवाल करते हैं,
मुझे तन्हा मुझे गुमनाम जरा रहने दो!

मेरे चेहरे पे खिंची दर्द की लकीरों से,
वास्ता आखिरी पल तक हमारा रहने दो!

ये महल तुम ही रखो, तुमको ही मुबारक हों,
मुझे माँ बाप का छोटा सा घर वो रहने दो!

"देव" उम्मीद है ये तुम मुझे मिलोगे कभी,
फ़ासला अपने दरम्यान भले रहने दो! "

.........चेतन रामकिशन "देव"……..
दिनांक- २९.०५.२०१४

Tuesday, 27 May 2014

♥प्यार का दीया...♥

♥♥♥♥♥प्यार का दीया...♥♥♥♥♥
एक दीया का प्यार का जलाने दो!
सारी नफरत को भूल जाने दो!

हाथ से हाथ तो मिले हैं बहुत,
दोस्ती दिल से अब निभाने दो!

हार से बढ़के क्या मिलेगा सुनो,
अपनी तक़दीर आज़माने दो!

कर दें इनकार वो है उनकी रज़ा,
हाले-दिल उनको तुम बताने दो!

नींद एक पल में पास आएगी,
माँ को लोरी तो गुनगुनाने दो!

गूंजे आँगन में हर घड़ी खुशियाँ,
घर में बेटी को खिलखिलाने दो!

"देव" उनको नज़र लगे न कोई,
अपने दिल में उन्हें छुपाने दो!"

.......चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक- २८.०५.२०१४

♥♥प्रेम साधना..♥♥♥


♥♥♥♥♥प्रेम साधना..♥♥♥♥♥
न ही शत्रु हो न विनाशक हो!
भावनाओं की तुम उपासक हो!
प्रेम को सिद्ध कर दिया तुमने,
तुम तपस्वी हो, तुम ही साधक हो!

जब से तुमसे मिलन हुआ मेरा,
आत्मा तुममें लीन रहती है!
एक नदी प्रेम से भरी मेरे,
मन के आँगन में रोज बहती है!

मेरी वृद्धि के तुम हो सहयोगी,
न ही कंटक हो, न ही बाधक हो!
प्रेम को सिद्ध कर दिया तुमने,
तुम तपस्वी हो, तुम ही साधक हो!

न ही छल, न ही तुम अभिमानी,
न ही हिंसा की बात करती हो!
मेरी सुबह को तुम उजाला दे,
हर्ष भावों से रात करती हो!

तुम सिखाती हो सत्य की बातें,
न ही मिथ्या का तुम कथानक हो!
प्रेम को सिद्ध कर दिया तुमने,
तुम तपस्वी हो, तुम ही साधक हो!

तुम समर्पित हो तुम, तुम दयालु हो,
तुमसे आशाओं को गति मिलती!
"देव" मैं कुछ नहीं तुम्हारे बिना,
तुमसे मन को मेरे मति मिलती!

प्रेम से पूर्ण है तुम्हारी छवि,
न निराशा की तुम सहायक हो!
प्रेम को सिद्ध कर दिया तुमने,
तुम तपस्वी हो, तुम ही साधक हो!"

..........चेतन रामकिशन "देव"………
दिनांक- २७.०५.२०१४


"
प्रेम, केवल ढाई अक्षरों में सिमट जाने वाला तत्व नहीं, अपितु व्यापक है, प्रेम सम्बंधित पक्षों में, जब समर्पण भाव के साथ निहित होता है, तो प्रेम आत्मीय अवस्थाओं में साधना का रूप ले लेता है, परन्तु इस साधना को वही प्रेम तपस्वी पूर्ण कर पाते हैं, जो प्रेम के वास्तविक मूल्यों से परिचित होते हैं, जो  प्रेम को ढाई अक्षरों मात्र में नहीं अपितु व्यापक अर्थों में देखते हैं, तो आइये प्रेम करें "


" सर्वाधिकार सुरक्षित, मेरी ये कविता मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित "

Sunday, 25 May 2014

♥टूटे दिल के बिखरे टुकड़े ♥

♥♥♥टूटे दिल के बिखरे टुकड़े ♥♥♥
मिन्नतें उम्र भर मैं करता रहा!
ख्वाब आँखों मैं जिनके भरता रहा!
देखते वो रहे तमाशा यहाँ,
दिल मेरा टूट कर बिखरता रहा!

खून के रिश्तों का ही अपनापन,
दिल के रिश्तों का कोई नाम नहीं!

प्यार के बदले मिल रही नफरत,
अब वफ़ा का कोई ईनाम नहीं!

उनको फुर्सत नहीं दवाओं की,
दर्द मेरा यहाँ उभरता रहा!
देखते वो रहे तमाशा यहाँ,
दिल मेरा टूट कर बिखरता रहा...

मैं भी इंसान हूँ नहीं पत्थर,
दर्द मेरे भी दिल को होता है!

मेरी आँखे भी हैं अभी जिन्दा,
आंसूओं का रिसाव होता है!

 "देव" कैसे यकीन हो सच का,
अब तलक तो हर एक मुकरता रहा!
देखते वो रहे तमाशा यहाँ,
दिल मेरा टूट कर बिखरता रहा! "

.....चेतन रामकिशन "देव"…..
दिनांक- २६.०५.२०१४  

Saturday, 24 May 2014

♥अक्स तुम्हारा..♥

♥♥♥♥अक्स तुम्हारा..♥♥♥♥
तुम बिन चैन नहीं आता है!
तुमसे ये कैसा नाता है!
जिधर भी देखूं नज़र उठाकर,
अक्स तुम्हारा दिख जाता है!

तुम्हें देखकर मन खुश होता,
तुम्हे सोचकर दिल हँसता है,
देख तुम्हारी सूरत लगता,
मानों तुम में रब वसता है!

इन्द्रधनुष भी तेरे नाम को,
मेरे संग में लिख जाता है!
जिधर भी देखूं नज़र उठाकर,
अक्स तुम्हारा दिख जाता है...

तुमने नज़रें फेरीं जबसे,
गुमसुम खोया सा रहता हूँ,
बाहर से बेशक हँसता पर,
भीतर से रोया रहता हूँ!

तुम बिना दवा असर नहीं करती,
दिल गहरे से दुख जाता है!
जिधर भी देखूं नज़र उठाकर,
अक्स तुम्हारा दिख जाता है! "

.....चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक- २४.०५.२०१४

Friday, 23 May 2014

♥♥पीड़ा की ज्वाला...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥पीड़ा की ज्वाला...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मेरे जीवित तन को फूंका, कुछ अपनों ने ज्वाला बनकर!
मेरे कंठ को गला दिया है, जहर भरा एक प्याला बनकर!
नहीं पता मेरी हत्या कर, आखिर वो कैसे जीते हैं,
मेरी देह को किया है घायल, काँटों की एक माला बनकर!

है संवेदनहीन जहाँ ये, दिल को छलनी कर देता है!
अपने हित में किसी का आँचल, दर्द दुखों से भर देता है!

अंग अंग को सुन्न कर दिया, विषधर का एक छाला बनकर! 
मेरे जीवित तन को फूंका, कुछ अपनों ने ज्वाला बनकर...

अपनायत की बात करें पर, चुपके से जड़ काट रहें हैं!
प्यार भरे खिलते उपवन को, वो नफरत से पाट रहे हैं!
"देव" बड़ी आशायें लेकर, मैंने जिनको अपना माना, 
लोग वही शत्रु की तरह, नाम हमारा छांट रहे हैं! 

घाव हैं गहरे, खून रिसा है, पीड़ा का व्यापक स्तर है! 
तेज़ाबों का बादल ऊपर, नीचे शूलों का बिस्तर है!

जीवन मेरा हुआ है खंडहर, दुख लिपटा है जाला बनकर!
मेरे जीवित तन को फूंका, कुछ अपनों ने ज्वाला बनकर!"

.................चेतन रामकिशन "देव"….....................
दिनांक- २४.०५.२०१४ 

Thursday, 22 May 2014

♥♥तुम्हे देखकर...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥तुम्हे देखकर...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तुम्हे देखकर दिन निकला था, तुम्हे सोचकर रात हो गयी!
पर तुम मिलने न आयीं तो, आँखों से बरसात हो गयी!
एक एक लम्हा तुम्हे पुकारा, बेचैनी के हालातों में,
नहीं पलटकर देखा तुमने, ऐसी भी क्या बात हो गयी!

क्या रंजिश है, क्यों गुस्सा हो, मुझको समझ नहीं आता है!
बिना तुम्हारे मेरा चेहरा, सुबक सुबक कर मुरझाता है!

खुशियों की ख्वाहिश थी लेकिन, पीड़ा की सौगात हो गयी!
तुम्हे देखकर दिन निकला था, तुम्हे सोचकर रात हो गयी...

तुम बिन धड़कन मंद हो गयी, सुनना कहना सब भूला हूँ!
बिना तुम्हारे एक पल को भी, जिन्दा रहना मैं भूला हूँ! 
"देव " तुम्हारे साथ ने मुझको, मंजिल का पथ दिखलाया था,
बिना तुम्हारे टूट गया मैं, मुश्किल को सहना भूला हूँ! 

मुझे तुम्हारे प्यार की ताक़त से, जीने का बल मिलता है!
मुझे तुम्हारे प्यार की ताक़त से, मुश्किल का हल मिलता है!

लेकिन तुमने साथ दिया न, जीती बाज़ी मात हो गयी !
तुम्हे देखकर दिन निकला था, तुम्हे सोचकर रात हो गयी! "

......................चेतन रामकिशन "देव"....................
दिनांक-२१.०५.२०१४

♥शूलों का रोपण..♥

♥♥♥♥शूलों का रोपण..♥♥♥♥
क्षण भर में आरोपित करते!
गलत तथ्य को पोषित करते!
किसी मनुज के कोमल मन पर,
शूल हजारों रोपित करते!

खुद को गंगाजल औरों को,
मदिरा से सम्बोधित करते!
किसी मनुज की कर्मठता को,
क्षण भर में अवरोधित करते!
बस अपने आदेश सुनाते,
बिना पक्ष औरों का जाने,
पीड़ा के गहरे शब्दों को,
हर क्षण वो उद्बोधित करते!

आरोपों की अग्नि से वो,
जल जीवन अवशोषित करते!
किसी मनुज के कोमल मन पर,
शूल हजारों रोपित करते....

किन्तु सबको एक रंग में ही,
रंग देना भी न्याय नहीं है!
बस अपने को गंगा कहना,
नीतिगत अध्याय नहीं है!
"देव" समय जब करवट लेता,
तो पर्वत भी गिर जाते हैं!
दिवसों, घंटों चाहने वाले,
लोग यहाँ पर फिर जाते हैं!

नहीं पता वो रक्त से कैसे,
अपने मन को शोधित करते!
किसी मनुज के कोमल मन पर,
शूल हजारों रोपित करते! "

.....चेतन रामकिशन "देव"….
दिनांक- २३.०५.२०१४

Tuesday, 20 May 2014

♥♥♥मन का अपराध..♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥मन का अपराध..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
सोच पे ताला कैसे डालूं, बंद करूँ कैसे भावों को!
बिना तुम्हारे कैसे भर लूँ, मैं विरह के इन घावों को!
तुमने बेहद आसानी से, मेरे प्यार को ठुकराया है,
तुम्ही बताओ कैसे तोडूं, अपने हाथों से ख्वाबों को!

भले प्यार के पथ पे मैंने, दर्द बहुत गहरा पाया है!
लेकिन मन ने चाहा तुमको, मेरे दिल ने अपनाया है!

झेल रहा हूँ अपने दिल पर, मैं पीड़ा के प्रभावों को!
सोच पे ताला कैसे डालूं, बंद करूँ कैसे भावों को...

किसी की चाहत में रंग जाना, क्या मन का अपराध यही है!
किसी के ख्वाबों में खो जाना, क्या मन का अपराध यही है!
"देव" अगर कांटे बनते हम, तो दुनिया को रास न आते,
फूल यहाँ बनकर खिल जाना, क्या मन का अपराध यही है!

अगर मैं हूँ अपराधी तो फिर, सज़ा मुझे तुम ऐसी देना !
इस दुनिया से प्यार वफ़ा के, नाम को भी तुम दफ़ना देना!

नहीं रोक सकता हाथों से, मैं अश्क़ों के सैलाबों को! 
सोच पे ताला कैसे डालूं, बंद करूँ कैसे भावों को! "

..............चेतन रामकिशन "देव"................
दिनांक-२१.०५.२०१४