Wednesday, 9 October 2013

♥♥आँखों में चाँद ...♥♥

♥♥♥आँखों में चाँद ...♥♥♥♥♥♥
फिर नया ख्वाब नजर आया है!
चाँद आँखों में उतर आया है!

हर तरफ है नया उजाला सा,
नूर धरती पे बिखर आया है!

मुस्कराहट है मेरे चेहरे पर,
प्यार का जब से असर पाया है!

आंख में देखो एक नमी आई,
किसी बिछड़े ने जो घर पाया है!

जब से अश्कों की स्याही से लिखा,
तब से हर लफ्ज निखर आया है!

लोग देते हैं यहाँ दाद मुझे,
मैंने हंसने का हुनर पाया है!

"देव" बस तुझको देखता ही रहूँ,
आज ये वक़्त ठहर आया है!"

.....चेतन रामकिशन "देव".....
दिनांक-०९.१०.२०१३

♥♥खून ...♥♥

♥♥♥♥♥खून ...♥♥♥♥♥
खून रिसता है मेरे घावों से,
कोई मरहम, दवा लगाता नहीं!

सब चुभाते हैं गम के ख़ार मुझे,
कोई राहों में गुल बिछाता नहीं!

रात दिन जिसको अपना समझा है,
वही अब प्यार को निभाता नहीं!

जिसको देखो वही तमाशाई,
लुटती इज्ज़त कोई बचाता नहीं!

चोट इतनी लगी है इस दिल को,
चाहके भी मैं मुस्कुराता नहीं!

एक दिन सबकी वापसी होगी,
कोई सदियों के लिए आता नहीं!

"देव" बस दर्द का ही सूरज है,
छाँव का चाँद झिलमिलाता नहीं!"

...चेतन रामकिशन "देव"….
दिनांक-०९.१०.२०१३


Tuesday, 8 October 2013

♥♥ऐतबार ....♥♥

♥♥♥♥♥ऐतबार ....♥♥♥♥♥
बेकरारी में भी करार रखो!
होंसला अपना बरक़रार रखो!

जो सिखाया है बुजुर्गों ने हमें,
हर घड़ी उनकी यादगार रखो!

चाहें दुख हो, या गमों के आंसू,
अपने चेहरे को खुशगवार रखो!

हर एक इन्सां यहाँ पे अपना है,
न ही रंजिश, नहीं दीवार रखो!

बाद मरने के लोग याद करें,
अपने सीने में इतना प्यार रखो!

प्यास से मरते हुए मुफलिस को,
बारिशों सी हसीं फुहार रखो!

"देव" मिल जाएगी हर एक मंजिल,
हाँ मगर, खुद पे ऐतबार रखो!"

..चेतन रामकिशन "देव"..
दिनांक-०९.१०.२०१३





♥♥आफ़्ताब....♥♥

♥♥♥♥♥आफ़्ताब....♥♥♥♥♥
तुम किसी आफ़्ताब जैसे हो!   
मेरी आँखों के ख्वाब जैसे हो!

तुमको पढ़कर के मेरा दिल न भरे,
प्यार की इक किताब जैसे हो!

देखो इतने बड़े जहाँ में तुम,
कुदरती एक ख़िताब जैसे हो!

मेरे लफ्जों की जिंदगानी में,
नूर का एक बहाव जैसे हो!

न ही मुश्किल, के नहीं बोझ कोई,
उँगलियों के हिसाब जैसे हो!

देखकर तुमको मैं महक जाऊं,
एक खिलते गुलाब जैसे हो!

"देव" एहसास की मोहब्बत में,
रेशमी एक लगाव जैसे हो!"

.….चेतन रामकिशन "देव"…….
दिनांक-०८.१०.२०१३

Monday, 7 October 2013

♥♥चन्दन का अधिवास....♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥चन्दन का अधिवास....♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तुम्ही आंसू में हो, तुम्ही मेरी हंसी, तुम्ही सावन, तुम्ही तो मधुमास हो! 
तुम्ही उम्मीद में, आरजू में तुम्ही, तुम्ही इच्छाओं में, तुम्ही विश्वास हो!
चांदनी में तुम्ही, ज्योत में भी तुम्ही, तुम्ही हो लालिमा, तुम्ही प्रकाश हो!
तुमसे मीलों का है फासला ये मगर, मेरे दिल के सखी तुम सदा पास हो!

गीत की भावना में झलक है तेरी, मेरी आँखों में देखो चमक है तेरी!
मेरे लफ्जों में देखो तुम्हारी दमक, मेरे कानों में हर पल खनक है तेरी!

तुम्ही बारिश में हो, तुम्ही बादल में हो, सात रंगों का झिलमिल सा आकाश हो!
तुम्ही आंसू में हो, तुम्ही मेरी हंसी, तुम्ही सावन, तुम्ही तो मधुमास हो……

न ही सीमा कोई, न ही हैं बंदिशें, प्यार की भावना तो ये आज़ाद है!
नफरतों से यहाँ देखो गुल न खिलें, प्यार से बागवां देखो आबाद है!
"देव" रजनी तुम्ही, तुम्ही प्रभात हो, तुम्ही हो नम्रता, तुम्ही फरियाद हो!
कर्म की व्यस्तता में भी विस्मृत नहीं, हर घड़ी मेरे दिल को तुम्ही याद हो!

तुम बदलकर के पथ अपना जाओ मगर, दिल की आवाज लेकिन नहीं मारना!
तुम भले ही गगन में न उड़ना मगर, अपनी परवाज़ लेकिन नहीं मारना!

तुम्ही हो वंदना, तुम्ही आराधना, तुम्ही चन्दन का मिश्रित अधिवास हो!
तुम्ही आंसू में हो, तुम्ही मेरी हंसी, तुम्ही सावन, तुम्ही तो मधुमास हो!"

….......................चेतन रामकिशन "देव"………........................
दिनांक-०७.१०.२०१३

Saturday, 5 October 2013

♥♥♥दास्ताँ दर्द की....♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥दास्ताँ दर्द की....♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
दास्ताँ दर्द की लिखी मैंने, पास आ जाओ मैं सुना दूंगा!
मेरे दिल में हैं कितने घाव बने, आओ तुमको सभी गिना दूंगा!
बैठने को जगह नहीं तो क्या, मैं ख्यालों के घर बना दूंगा!
धीरे धीरे ही मगर सुनते रहो, पूरी ही ज़िन्दगी सुना दूंगा!

मेरे पैरों में कंकरों की चुभन, घाव रिस रिस के यहाँ बहते हैं!
कल तलक जो मेरे अपने थे यहाँ, आज गैरों की तरह रहते हैं!

प्यास की तुम न यहाँ फ़िक्र करो, आंसुओं की नदी बना दूंगा! 
दास्ताँ दर्द की लिखी मैंने, पास आ जाओ मैं सुना दूंगा!

लोग पल भर में यहाँ देखो तो, मौसमों की तरह बदल जायें!
छोड़कर राह वो हमदर्दी की, देखकर दूर से निकल जायें!
"देव" वो आग न बुझाते हैं, लोग बेशक ही यहाँ जल जायें!
कोई घावों पे न रखे मरहम , अंग बेशक ही यहाँ गल जायें!

कोई आवाज़ नहीं सुनता है, कोई न दर्द को सहारा दे!
पार कर लेते हैं नदी सब पर, कोई डूबे को न किनारा दे!

दर्द को तुम जो नहीं जानो अगर, उसकी तस्वीर मैं बना दूंगा!
दास्ताँ दर्द की लिखी मैंने, पास आ जाओ मैं सुना दूंगा!"
        
…........................चेतन रामकिशन "देव"………...............
दिनांक-०६.१०.२०१३

♥♥ये मौत भी देखो....♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥ये मौत भी देखो....♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
ये मौत भी देखो है क्रूर कितनी, नहीं चीख सुनती, नहीं दर्द जाने!
नहीं रोते मुखड़ों से इसको मोहब्बत, और ये बिछड़ने की पीड़ा न जाने!
नहीं देखो मिन्नत सुने ये किसी की, नहीं देखो कोई निवेदन भी माने!
जड़ों को यहाँ दर्द होता है कितना, ये पौधे उखड़ने की पीड़ा न जाने!

मगर मौत सच है, ये आएगी निश्चित, नहीं मौत से हम यहाँ बच सकेंगे!
जब पूरी होंगी ये सांसें हमारी, नहीं सांस हाथों से हम रच सकेंगे!

ये मौत देखो चलाती है अपनी, नहीं तंज सुनती, नहीं सुनती ताने!
ये मौत भी देखो है क्रूर कितनी, नहीं चीख सुनती, नहीं दर्द जाने!

नहीं तन पे करना अभिमान लेकिन, मगर जीते जी खुद को मुर्दा न मानो!
जियो आखिरी सांस तक तुम यहाँ पर, के तुम खुद के जीवन के मतलब जानो!
सुनो "देव" सपने नहीं तोड़ना तुम, के आँखों में सपने सजाकर के रखना!
जो मरकर भी तुमको करे याद दुनिया, मोहब्बत की दुनिया वसाकर के रखना!

नहीं मौत से डर के जीना है तुमको, यहाँ मौत सच है, यही जानना है!
के हम सब हैं मिट्टी के पुतले यहाँ पर, यही सोचना है, यही मानना है!

बनो जीते जी कुछ यहाँ जिंदगी में, जो मरकर भी दुनिया तेरा नाम जाने!
ये मौत भी देखो है क्रूर कितनी, नहीं चीख सुनती, नहीं दर्द जाने!"

….......................चेतन रामकिशन "देव"………...................
दिनांक-०५.१०.२०१३

Friday, 4 October 2013

♥♥लिख रहा हूँ ग़ज़ल....♥♥

♥♥♥♥♥लिख रहा हूँ ग़ज़ल....♥♥♥♥♥♥♥
लिख रहा हूँ ग़ज़ल, फिर तेरी नाम की मैं,
के तुझ बिन तो दिल का गुजारा नहीं है!

के होने को तो सारी, दुनिया है लेकिन,
मगर बिन तुम्हारे सहारा नहीं है!

तेरी याद में धोया, अश्कों से चेहरा,
इसे धूप मलकर निखारा नहीं है!

प्यार देखो के चखकर, शहद की तरह है,
ये देखो समुन्दर सा, खारा नहीं है!

मैं तुझसे नजर से, के चुराऊं भी कैसे,
के तू चाँद है, कोई तारा नहीं है!

बिन तेरे देखो उतरा है, ये मेरा चेहरा,
के मुझको किसी दुख ने मारा नहीं है!

"देव" आ जाओ तुम, अब सुनो दर्द मेरा,
यूँ दिल से किसी को, पुकारा नहीं है!"

….....चेतन रामकिशन "देव"….
दिनांक-०४.१०.२०१३

Thursday, 3 October 2013

♥मेरे एहसास की दुआ....♥

♥♥♥♥♥♥♥♥मेरे एहसास की दुआ....♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मेरे एहसास की दुआओं में, नाम तेरा है, सिर्फ तेरा है!
तेरा ये साथ रोशनी की तरह, बिन तेरे हर तरफ अँधेरा है!
तुमसे मिलने की हसरतों में सनम, देखो दिल बेकरार मेरा है,
देखकर तुझको ऐसा लगता है, चांदनी में भी रूप तेरा है!

तू घुटन में हवा के जैसा असर करती है!
दर्द में तू दवा के जैसा असर करती है!

तेरी यादों से रंग ख्वाबों का, बड़ा दिलकश, बड़ा सुनहरा है!
मेरे एहसास की दुआओं में, नाम तेरा है, सिर्फ तेरा है….


तेरी चाहत, तेरी हसरत, तेरी उम्मीद रखूं!
प्यार के रंग से तेरा, मैं दिल पे नाम लिखूं!
मैं सुबह उठकर तेरी सूरत का दीदार करूँ!
मैं तुझे प्यार, बहुत प्यार, बहुत प्यार करूँ!

तेरी सीरत बड़ी उजली है, तेरी सूरत हमें लुभाती है!
बिन तेरे दिन में चैन मिलता नहीं, बिन तेरे नींद नहीं आती है!

तेरी जुल्फों में शाम है हमदम, तेरी सूरत में सवेरा है!
मेरे एहसास की दुआओं में, नाम तेरा है, सिर्फ तेरा है…….

आ चलो दूर कहीं बैठकर के बात करें!
चलो जीवन में हंसी प्यार की बरसात करें!
"देव" तुमसे ही मेरी जिंदगी में नूर खिला!
"देव" तुमसे ही अंधेरों में, नया दीप जला!

तुम मेरे हाथ में यूँ हाथ लेके चलती रहो!
मैं संभालूँगा तुम्हें, प्यार में फिसलती रहो!

शाख पे फूटने लगीं कोंपल, जब तूने किया वसेरा है!
मेरे एहसास की दुआओं में, नाम तेरा है, सिर्फ तेरा है!"

................चेतन रामकिशन "देव".........................
दिनांक-०३.१०.२०१३

Wednesday, 2 October 2013

♥झूठ का लिबास....♥

♥♥झूठ का लिबास....♥♥♥
जिंदगी से निराश न होना!
मेरे यारों उदास न होना!

साथ रहना सदा ही सच के तुम,
झूठ का तुम लिबास न होना!

जो किसी के बिना न जी पाओ,
दर्द के इतने पास न होना!

जीत जाओ तो गुरुर करो,
हार कर बदहवास न होना!

दिल के जज्बात को न समझें जो,
ऐसे लोगों के दास न होना!

आखिरी सांस तलक जंग करो,
जीते जी जिंदा लाश न होना!

"देव" मुफलिस के भी सुनो आंसू,
बस अमीरों के ख़ास न होना!"

....चेतन रामकिशन "देव"....
दिनांक-०३.१०.२०१३

Monday, 30 September 2013

♥♥♥बड़ी मुश्किल से...♥♥♥♥

♥♥♥बड़ी मुश्किल से...♥♥♥♥
बड़ी मुश्किल से सांस आती है!
जिंदगी इस कदर सताती है!

जाने सूरज को क्या शिकायत है,
रौशनी घर से लौट जाती है!

आसमां में सितारे देखूं तो,
बिछड़े लोगों की याद आती है!

तेरे खत आज तक संभाले हैं,
उनकी खुशबू हमें लुभाती है!

तेरी तस्वीर से करूँ बातें,
आज कल नींद नहीं आती है!

दर्द के गहरे इस अँधेरे में,
न ही दीया है, नहीं बाती है!

"देव" अपनों के ये बड़ी दुनिया,
देखो अपनों का घर जलाती है!"

……चेतन रामकिशन "देव"…।
दिनांक-३०.०९.२०१३

Sunday, 29 September 2013

♥प्यार का इम्तहान..

♥♥प्यार का इम्तहान...♥♥
प्यार में इम्तहान दे देंगे!
मांग लो तुमको जान दे देंगे!

तेरे आंगन की छाँव की खातिर,
प्यार का आसमान दे देंगे!

आखिरी सांस तक निभाएंगे,
हम तुझे जो जुबान दे देंगे!

पास आ हम तुझे निशानी में,
अपने दिल का जहान दे देंगे!

तुझको हम भाव में वसाकर के,
अपने लफ्जों की शान दे देंगे!

प्यार में दिल न तोड़ देना तू,
लोग संगदिल का नाम दे देंगे!

"देव" तुम हमसे दूर न जाना,
हम जुदाई में जान दे देंगे!"

..चेतन रामकिशन "देव"..
दिनांक-२९.०९.२०१३

♥♥विस्फोटक..♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥विस्फोटक..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
जब अपनों की नीति देखो, द्वेष राग पर आधारित हो!
प्रेम के बदले जीवनपथ पर, विरह भाव जब संचारित हो!
जब नयनों का नीर देखकर, अपना सम्बन्धी सो जाये,
रूपये, पैसे और दौलत से, जब अपनायत निर्धारित हो!

जब मिथ्या आरोप लगाकर, दुनिया निंदा प्रेषित करती!
जब दुनिया अपने ही सुख का, आलेखन आरेखित करती!
उस अवधि में कोमलता भी, विस्फोटक बनना चाहती है,
जब ये दुनिया निर्दोषों को, दंड भाव संप्रेषित करती!

अंतर्मन का करुण निवेदन, अपने जब जब ठुकराते हैं!
तब मानव की मनोदशा पर, कुंठित छाले खिल जाते हैं!
"देव" यहाँ पर वो अपनायत, कहाँ भला है किसी काम की,
जब अपनों के हाथों देखो, अपनों के घर जल जाते हैं!

इतनी सारी पीड़ा लेकर, लोग यहाँ पर जीते तो हैं!
वे अपनों हाथों से अपने, घाव यहाँ पर सीते तो हों!
लेकिन काश यदि वो अपने, अपनायत का सार समझते!
तो दुनिया से अपनायत के, दीपक देखो कभी न बुझते!

जो अपनों को दण्डित करके, सुखी भाव से मुस्काते हैं!
उन लोगों के जीवन में भी, दुःख के गहरे दिन आते हैं!
जब अपनों के मुख से केवल, द्वेष भावना प्रचारित हो!
जब अपनों की नीति देखो, द्वेष राग पर आधारित हो!

तब तक देखो इस दुनिया से, ये विस्फोटक  बह नहीं सकता!
जब तक मानव अपनायत के संग, दुनिया में रह नहीं सकता!"

........................चेतन रामकिशन "देव"...............................
दिनांक-२९.०९.२०१३

Friday, 27 September 2013

♥♥पुष्पों का अर्पण..♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥पुष्पों का अर्पण..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
पुष्पों का अर्पण करता हूँ, वीर भगत सिंह तेरे चित्र पर,
सही अर्थ में तुम ही देखो, इन पुष्पों के अधिकारी हो!

तुमने अपने रक्त से सींचा, इस भारत की इस धरती को,
तुम हर क्षण ही नमन योग्य हो, तुम वंदन के अधिकारी हो!

आज देश के देह जल रही, लोगों ने फिर तुझे पुकारा!
तू ही आकर बो सकता है, आज़ादी का अंकुर प्यारा!
आज देश के भीतर दुश्मन, अंग्रेजों से पनप रहे हैं,
आकर उनका वध करना है, झुलस रहा है भारत सारा!

तुमने जुल्म की बेड़ी काटी, अपना लहू बहाकर के भी!
तुमने सबको दिया उजाला, खुद को यहाँ जलाकर के भी!
"भगत" तुम्हारे कद के आगे, "देव" भला ये क्या लिख पाए,
एक आह भी नहीं निकली, तुमने प्राण लुटाकर के भी!

तुम रहते हो स्मृति में, तुम प्यारे और मनोहारी हो,
सही अर्थ में तुम ही देखो, इन पुष्पों के अधिकारी हो!"

(आजादी के महानायक वीर भगत सिंह को नमन)

...................चेतन रामकिशन "देव"...................
दिनांक-२८.०९.२०१३ —

♥♥रेशम जैसी रात..♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥रेशम जैसी रात..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
सपनों में मिलने आ जाना, प्यार की मीठी बात करेंगे!
फूलों जैसी रंग बिरंगी, रेशम जैसी रात करेंगे!
हम दोनों को साथ देखकर, चाँद भी देखो पुलकित होगा,
और गगन के तारे हमपर, खुशियों की बरसात करेंगे! 

दुनिया सारी सो जाएगी, हाल तू अपना बतला देना!
और प्यार के ढाई अक्षर, सखी मुझे तू सिखला देना!

एक दूजे का हाथ थामकर, हर मुश्किल को मात करेंगे! 
सपनों में मिलने आ जाना, प्यार की मीठी बात करेंगे…।

मुझे देखकर गजलें पढना, मुझे देखकर गीत सुनाना!
मुझे देखना जी भरकर के, नजरें अपनी नहीं चुराना!
"देव" अगर जो नींद का झोंका, आपकी आँखों से टकराए,
तो मेरे पहलु में आकर, चुपके चुपके तुम सो जाना!

सखी तुम्हारे चंहुओर हम, मखमल की सौगात करेंगे!
सपनों में मिलने आ जाना, प्यार की मीठी बात करेंगे!"

....................चेतन रामकिशन "देव"......................
दिनांक-२८.०९.२०१३ 

Thursday, 26 September 2013

♥♥भावों का जल..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥भावों का जल..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
भावों का जल सूख रहा है, अब आँखों में नमी नहीं है!
दर्द मिला है इतना सारा, अब खुशियों की कमी नहीं है!
नहीं पता के गमों का सागर, कितना गहरा, कितना व्यापक,
एक अरसे से चाल गमों की, देखो बिल्कुल थमी नहीं है!

लेकिन फिर भी आशाओं की, मिटटी से घर बना रहा हूँ!
अपने मन को अनुभूति की, कोमल सरगम सुना रहा हूँ!
कुछ सपने हाथों में लेकर, पाल रहा हूँ बड़े जतन से,
मैं दिल के टूटे हिस्सों को, फिर जुड़ने को मना रहा हूँ!

साँसों की गर्मी है किन्तु, हिम पीड़ा की जमी नहीं है!
भावों का जल सूख रहा है, अब आँखों में नमी नहीं है.....

नहीं वेदना सुनती दुनिया, लेकिन फिर भी जीना तो है!
विष की तरह अपने आंसू, हर्षित होकर पीना तो है!
"देव" हमेशा मौत से डरकर, नहीं मांद में हम छुप सकते,
हमको अपने हाथों से ही, घाव गमों का सीना तो है!

दर्द से जड़वत हुआ बदन पर, उम्मीदों की कमी नहीं है!
भावों का जल सूख रहा है, अब आँखों में नमी नहीं है!"

....................चेतन रामकिशन "देव".....................
दिनांक-२७.०९.२०१३

Wednesday, 25 September 2013

♥♥जब भी मिलने..♥♥


♥♥♥♥♥जब भी मिलने..♥♥♥♥♥♥
जब भी मिलने मेरे घर आया करो!
चांदनी बनके बिखर जाया करो!

प्यार की रात, खत्म न हो कभी,
रात का वो वजूद लाया करो!

तेरी आँखों में, डूबना भाये,
मुझसे नजरें नहीं चुराया करो!

जिस्म तो खाक में मिल जायेगा,
रूह में मेरी तुम, समाया करो!

काट लेंगे के सफर, काँटों का,
मेरे संग संग कदम, बढाया करो!

न जुदाई, न आंसुओं की तड़प,
गीत खुशियों के, सिर्फ गाया करो!

"देव" तुम बिन नहीं वजूद मेरा,
छोड़के मुझको नहीं जाया करो!"

....चेतन रामकिशन "देव".....
दिनांक-२५.०९.२०१३

Tuesday, 24 September 2013

♥♥बेघर..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥बेघर..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
करोड़ों हाथ खाली हैं, करोड़ों लोग बेघर हैं!
भला कैसे कहें हम, देश के हालात बेहतर हैं!
बड़ा मायूस है निर्धन, कोई सुनता नहीं उसकी,
यहाँ तो उसके हिस्से में, महज आंसू के जेवर हैं!

खुले आकाश में भूखे पड़े, न नींद आती है!
यहाँ नेता, नहीं अफसर कोई, निर्धन का साथी है!

यहाँ देखो सभी रहजन, नहीं दिखते के रहबर हैं!
करोड़ों हाथ खाली हैं, करोड़ों लोग बेघर हैं….

यहाँ बेकारी है इतनी, युवाओं में हताशा है!
नहीं उम्मीद बाकी है, बड़ी ही क्षीण आशा है!
यहाँ निर्धन दवाओं के बिना, मर जाते हैं पल में,
भरा निर्धन के जीवन, गमों का बस कुहासा है!

कभी रुखी, कभी सूखी ही, रोटी से गुजारा है!
बहे निर्धन की आँखों से, यहाँ आंसू की धारा है!

यहाँ निर्धन की राहों में, के कांटे हैं, के नश्तर हैं!
करोड़ों हाथ खाली हैं, करोड़ों लोग बेघर हैं...

यहाँ निर्धन के चेहरे पर, हताशा है, उदासी है!
नहीं निर्धन के जीवन में, खुशी देखो जरा सी है!
सुनो तुम "देव" क्यूँ निर्धन से, ऐसे पेश आते हो,
ये निर्धन भी तो अपना है, इसी धरती का वासी है!

नहीं मालूम के निर्धन के, ये हालात कब तक हों!
नहीं मालूम उसके दुख भरे, दिन रात कब तक हों!

यहाँ निर्धन अँधेरे में, वहां खुशियों के अवसर हैं!
करोड़ों हाथ खाली हैं, करोड़ों लोग बेघर हैं!"


"
निर्धन, इस शब्द का बोध मन को होते ही एक तस्वीर सामने आती है, जो तस्वीर फटे पुराने चिथड़ों में रुखी सूखी खाकर जीने की मार सहती है! अगर वो निर्धन है तो ये उसका अपराध नहीं है, देश के शासक वर्ग का ये दायित्व है कि, वो अपनी अच्छी नीतियों के द्वारा देशवासियों को उनकी मौलिक आवश्यकतायें दे, तो आइये चिंतन करें!"

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-२५.०९.२०१३

"
सर्वाधिकार सुरक्षित"
मेरी ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित"

Monday, 23 September 2013

♥♥कागजी फूल..♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥कागजी फूल..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
कागजी फूलों से खुश्बू की, आस क्या रखनी!
सूखती झील से पानी की, प्यास क्या रखनी!
दर्द में भी हमें रहना है, बनके जिंदादिल,
दर्द को देखके सूरत, उदास क्या रखनी!

लोग मेहनत से यहाँ जब भी काम करते हैं!
हार का देखो वो किस्सा, तमाम करते हैं!

सोच नाकामी की जीवन के, पास क्या रखनी!
कागजी फूलों से खुश्बू की, आस क्या रखनी!

लूटकर घर न किसी का, कभी दौलत जोड़ो!
भूलकर भी न कभी, सच का साथ तुम छोड़ो!
"देव" जीवन में नहीं, टूटे दिल जुड़ा करते,
अपने हाथों से कभी, तुम न कोई दिल तोड़ो!

सारी दुनिया को यहाँ, प्यार तुम सिखाते रहो!
अपने दिल से चलो, नफरत को तुम मिटाते रहो!

सोच नफरत की भला, दिल के पास क्या रखनी!
कागजी फूलों से खुश्बू की, आस क्या रखनी!"

..............चेतन रामकिशन "देव"..............
दिनांक-२३.०९.२०१३

Friday, 20 September 2013

♥ग़मों की नदी..♥

♥♥♥♥♥♥♥♥ग़मों की नदी..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
डूब गया पुल संबंधों का, नदी ग़मों की उफन गयी है!
फूलों की हसरत थी लेकिन, काँटों जैसी चुभन हुयी है!
आँखों से अश्कों की बूंदें, गिरती हैं बारिश के जैसी,
हुयी सांस भी भारी भारी, दिल में इतनी दुखन हुयी है!

झूठमूठ की हंसी को हंसकर, मैं पीड़ा को कम करता हूँ!
अपने आंसू पी पीकर ही, मैं अधरों को नम करता हूँ!

चंदन भूल गया शीतलता, अब उसमें भी अगन हुयी है!
डूब गया पुल संबंधों का, नदी ग़मों की उफन गयी है....

दिल के सब जज्बात मिट गए, सपने सारे बिखर गए हैं!
मिट गयी खुशियों की हर रेखा, दुख के बिंदु उभर गए हैं!
"देव" गिला अब किससे करना, तकदीरों की रंजिश है ये,
अश्कों से मुंह मांज मांज कर, हम भी देखो निखर गए हैं!

करो निवेदन चाहें कितना, दुनिया लेकिन मूक बधिर है!
नहीं पसीजे "देव" यहाँ वो, मेरा कितना बहा रुधिर है!

आज न जाने क्यूँ मानवता, इस तरह से दफ़न हुयी है!
डूब गया पुल संबंधों का, नदी ग़मों की उफन गयी है!"

......................चेतन रामकिशन "देव"..................
दिनांक-२०.०९.२०१३