Thursday, 9 May 2013

♥♥प्यार की सौंधी खुश्बू..♥♥♥


♥♥प्यार की सौंधी खुश्बू..♥♥♥
प्यार का एक समुन्दर हो तुम! 
चाँद के जैसी सुन्दर हो तुम!
एहसासों की सौंधी खुश्बू, 
और खुशी का अम्बर हो तुम!

प्यार के हर बिंदु का तुमने, 
मुझको व्यापक ज्ञान दिया है!
मुझ मामूली मनुज को तुमने, 
एक अद्भुत सम्मान दिया है!
इस दुनिया में प्यार से बढ़कर, 
कोई पूंजी हो नहीं सकती,
तुमने मुझको कदम कदम पर, 
गहरा बल प्रदान किया है!

मेरा मनवा भीग गया है, 
प्रेम से पूरित जलधर हो तुम!
एहसासों की सौंधी खुश्बू, 
और खुशी का अम्बर हो तुम...

मेरा मन का मोह तुम्हीं हो,
जीवन का आराम तुम्हीं हो!
तुम्ही सुबह का उजियारा हो,
और सुनहरी शाम तुम्ही हो!
"देव" तुम्हारे प्रेम ने मुझको,
प्रखरता से किया सुशोभित,
तुम्ही हंसी मेरे चेहरे की,
और मेरा उपनाम तुम्हीं हो!

तुम्हीं हमारी शुभ-चिन्तक हो,
और हमारी हितकर हो तुम!
एहसासों की सौंधी खुश्बू, 
और खुशी का अम्बर हो तुम!"


..चेतन रामकिशन "देव"...
दिनांक-०९.०५.२०१३
"
सर्वाधिकार सुरक्षित"







Wednesday, 8 May 2013

♥♥सस्ती मौत..♥♥


♥♥♥सस्ती मौत..♥♥♥♥
अंधकार गहराया सा है!
दुख का गहरा साया सा है!
मौत हो गई कितनी सस्ती,

खौफ जहन पर छाया सा है!


शायद हम सब खुश हैं देखो,
कंक्रीट के इस जंगल में!
लोग यहाँ पर अपनेपन को,
कुचल रहे देखो दंगल में!
नया दौर क्या इसीलिए है,
मानवता का अंत करें हम,
हम औरों को पीड़ा देकर,
सदा रहें अपने मंगल में!

मानवता के ऊपर देखो,
अब खतरा मंडराया सा है!
मौत हो गई कितनी सस्ती,
खौफ जहन पर छाया सा है...

अपनी वहशत में हम देखो,
मानवता को कुचल रहे हैं!
हाड़ मांस के दिल न पिघलें,
बेशक पत्थर पिघल रहे हैं!
"देव" आज के दौर से अच्छा,
गुजरा आलम ही बेहतर था,
आज लोग बस अपने सुख में,
लाचारों को मसल रहे हैं!

पढ़े लिखे भी होकर भी हमने,
खुद को पशु बनाया सा है!
मौत हो गई कितनी सस्ती,
खौफ जहन पर छाया सा है!"

..चेतन रामकिशन "देव"...
दिनांक-०९.०५.२०१३









Monday, 6 May 2013

♥♥प्यार की कुमकुम.♥♥



♥♥प्यार की कुमकुम.♥♥♥ 
तुम गर्मी में हिम जैसी हो!
वर्षा की रिमझिम जैसी हो!
तुम रोली हो, तुम चन्दन हो,
और तुम ही कुमकुम जैसी हो!

पावन गंगा के जल जैसी!
तुम अम्बर के बादल जैसी!
तुम हाथों के कंगन जैसी,
तुम पैरों की पायल जैसी!

तुम मलमल की अनुभूति हो,
और तुम्हीं रेशम जैसी हो!
तुम रोली हो, तुम चन्दन हो,
और तुम ही कुमकुम जैसी हो...

तुम कोमल हो, दयावान हो!
तुम वीणा की मधुर तान हो!
"देव" तुम्हीं नीलम रत्नों में,
तुम सपनों का आसमान हो!

नयी नवेली सुबह में तुम,
और निशा पूनम जैसी हो!
तुम रोली हो, तुम चन्दन हो,
और तुम ही कुमकुम जैसी हो!"

..चेतन रामकिशन "देव"...
दिनांक-०६.०५.२०१३

"
सर्वाधिकार सुरक्षित"

Sunday, 5 May 2013

♥हक की आवाज..♥



♥♥♥हक की आवाज..♥♥♥ 
रुधिर शीत जब हो जाता है!
मन का साहस खो जाता है!
नाम मौत का सुनकर देखो, 
जिनका चेहरा रो जाता है!
ऐसे कहाँ लोग दुनिया में,
अपने हक की जंग लड़ेंगे,
लड़ने से पहले ही जिनके,
मन का संबल सो जाता है!

ये कमजोरी रहेगी जब तक,
हम उद्घोष नहीं कर सकते!
सरकारों के दमन के आगे,
किंचित रोष नहीं कर सकते!
कभी यहाँ निर्धन का शोषण,
कभी किसानों की शामत हो,
पर हम गहरी नींद त्यागकर,
खुद का होश नहीं कर सकते!

वो क्या जंग लड़ेगा डरकर,
जो भूमिगत हो जाता है!
लड़ने से पहले ही जिनके,
मन का संबल सो जाता है...

कमजोरों की सुनवाई को,
आलम बेशक कम होता है!
कोई न समझे उनके दुख को,
भले ही कितना गम होता है!
"देव" मगर हथियार से ज्यादा,
हमें जरुरत है साहस की,
क्यूंकि वो ही लड़ सकता है,
जिसके दिल में दम होता है!

वो ही दुश्मन का घर फूंके,
जो लावे सा हो जाता है!
लड़ने से पहले ही जिनके,
मन का संबल सो जाता है!"

..चेतन रामकिशन "देव"...
दिनांक-०६.०५.२०१३




Saturday, 4 May 2013

♥♥मन की दुल्हन...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥मन की दुल्हन...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तुमसे हर एहसास जुड़ा है, तुम अनुभूति हो जीवन की!
भले ही फेरे नहीं हुए पर, तुम दुल्हन हो अंतर्मन की!
तुम्हें देखना अच्छा लगता, तुम्हें सोचना दिल को भाए,
तुम सीपी हो, तुम मोती हो, तुम ज्योति हो मेरे मन की!

तुम दुल्हन के परिधानों में, जब भी सपनों में आती हो!
मेरे तन को, मेरे मन को, तुम खुश्बू से महकाती हो!

तुम स्वागत की अधिकारिणी, तुम माला हो अभिनन्दन की!
तुमसे हर एहसास जुड़ा है, तुम अनुभूति हो जीवन की..

नया सफर है हम दोनों का, प्रीत परस्पर सिखलानी है!
मन से मन विवाह हो गया, ये गठबंधन रूहानी है!
तुम दुल्हन के रूप में देखो, किसी परी जैसी लगती हो,
सखी तुम्हारी आंखें सुन्दर, और चेहरा भी नूरानी है!

सखी चाँद सी है सुन्दर है तू, तेरा यौवन मनोहारी है!
सखी तुम्हारे ऊपर मेरा, सारा जीवन बलिहारी है!

मुझमें छाया वसी तुम्हारी, तुम सूरत मेरे दर्पण की!
तुमसे हर एहसास जुड़ा है, तुम अनुभूति हो जीवन की..

मैं अपने हाथों से तेरा, सखी मेरी सिंगार करूँगा!
एहसासों में तुम्हें वसाकर, हर पल तुमसे प्यार करूँगा!
"देव" तुम्हारे हाथों पर मैं, प्यार भरी मेहँदी 
रचकर के,




एहसासों के सिंदूरी रंगों से, तेरी मांग भरूँगा!

मेरी दुल्हन अनुपम हो तुम, मेरे तन की जान तुम्हीं हो!
तुम्हीं मेरी कार्य कुशलता, जीवन का सम्मान तुम्हीं हो!

सोने, चाँदी से भी बढ़कर, तुम पूंजी मेरे जीवन की!
तुमसे हर एहसास जुड़ा है, तुम अनुभूति हो जीवन की!"

"
प्रेम-जिससे होता है, वो एहसासों के संसार में, कभी दुल्हन बनकर संगिनी जैसी लगती है तो कभी शिक्षक बनकर, मार्ग दर्शक! कभी मित्र बनकर सहयोगी तो कभी प्राकृतिक नजारों जैसी लगती है! सचमुच जहाँ प्रेम होता है वहां, हर एहसास, सम्बंधित पक्ष के लिए उमड़ता है!"

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-०५.०५.२०१३

"
सर्वाधिकार सुरक्षित"
"मेरी ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित"

♥♥मंजिल की हसरत...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥मंजिल की हसरत...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
कुछ करने की हसरत जब तक, अपने मन में नहीं जगेगी!
तब तक हमको जीवन पथ में, मंजिल कोई नहीं मिलेगी!
बस किस्मत की ओर देखकर, अपनी क्षमता नष्ट न करना,
इस भूमि में बिन मेहनत के, फसल कोई भी नहीं खिलेगी!

जो जीवन में लक्ष्य बनाकर, सही दिशा में बढ़ जाते हैं! 
वही लोग मंजिल की सीढ़ी, इक दिन देखो चढ़ जाते हैं!

बिना जलाये दीप की माला, घने तिमिर में नहीं जलेगी!
कुछ करने की हसरत जब तक, अपने मन में नहीं जगेगी..

जज्बातों पर काबू रखकर, कुछ अरमान जगाने होंगे!
हमको अपनी इन पलकों पर, सपने नए सजाने होंगे!
"देव" जहाँ में बिन शिक्षा के, नहीं रौशनी मिल सकती है,
अपने मन को अधिगम देकर, अक्षर नए सिखाने होंगे!          

सपनों को पूरा करने की, जो अभिलाषा तय करते हैं!
वही लोग अपनी उर्जा से, इन सपनों पर जय करते हैं!

बिना पसीने की बूंदों से, अपनी सूरत नहीं धुलेगी!
कुछ करने की हसरत जब तक, अपने मन में नहीं जगेगी!"

...................चेतन रामकिशन "देव"......................
दिनांक-०५.०५.२०१३

Wednesday, 1 May 2013

♥♥पीड़ा का भूचाल..♥♥

♥♥♥पीड़ा का भूचाल..♥♥♥
मेहनतकश का हाल वही है!
पीड़ा का भूचाल वही है!
उसकी आँखे पथराई हैं,
उसके तन की खाल वही है!

मजदूरों का हाल वही है,
लेकिन साल बदल जाता है!
भूख जलाती है भीतर से,
धूप से चेहरा जल जाता है!
ये कुदरत भी मजदूरों का,
साथ कहाँ देती है देखो,
बारिश में उसका घर टपके,
वही शीत में गल जाता है!

वही यहाँ पीड़ा में रहता,
और यहाँ कंगाल वही है!
उसकी आँखे पथराई हैं,
उसके तन की खाल वही है....

देश के सारे खद्दरधारी,
अपनी मस्ती में रहते हैं!
और मजदूरों की आँखों से,
हर पल ही आंसू बहते हैं!
"देव" यहाँ पर मजदूरों की,
आह नहीं सुनता है कोई,
भले रुदन में, चीख चीख कर,
वो अपनी पीड़ा कहते हैं!

वही यहाँ पर गुमसुम रहता,
और यहाँ बेहाल वही है!
उसकी आँखे पथराई हैं,
उसके तन की खाल वही है!"

..चेतन रामकिशन "देव"..
दिनांक-०१.०५.२०१३

Tuesday, 30 April 2013

♥♥प्रेम ग्रन्थ..♥♥



♥♥♥♥♥प्रेम ग्रन्थ..♥♥♥♥♥♥
प्रेम ग्रन्थ का विषय तुम्ही हो!
तुम कोमल हो, विनय तुम्ही हो!
तुम्ही चाँद की धवल चांदनी,
और सूर्य का उदय तुम्ही हो!

तुम्ही शाम हो, तुम्हीं सवेरा,
तुम्ही दिवस के हर पल में हो!
तुम्ही हमारी पथ प्रदर्शक,
तुम्ही हमारे कौशल में हो!
तुम लेखन में, तुम चिंतन में,
तुम्ही भाव की प्रखरता में,
तुम उर्जा में, तुम शक्ति में,
तुम्ही हमारे संबल में हो!

असीमित है, प्रेम तुम्हारा,
व्यापकता का वलय तुम्ही हो!
तुम्ही चाँद की धवल चांदनी,
और सूर्य का उदय तुम्ही हो..

तुम दर्शन की इच्छाओं में,
श्रवण का संगीत तुम्ही हो!
भले ही भौतिक जीवन है ये,
किन्तु मौलिक प्रीत तुम्ही हों!
"देव" तुम्हीं मेरे जीवन के,
प्रबंधन का अनुकथन हो,
तुम प्रभावी संबोधन में,
और सुरीला गीत तुम्हीं हो!

तुम्ही विजय की गौरव गाथा,
और संघर्षी अभय तुम्हीं हो!
तुम्ही चाँद की धवल चांदनी,
और सूर्य का उदय तुम्ही हो!"

..चेतन रामकिशन "देव"..
दिनांक-३०.०४.२०१३

"सर्वाधिकार सुरक्षित"












Sunday, 28 April 2013

♥♥दिल के टुकड़े .♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥दिल के टुकड़े .♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
किसी के दिल के टुकड़े करके, जिसे कोई अफसोस नहीं है!
जिसको अपने अभिमान पर, तनिक भी कोई रोष नहीं है!
ऐसे लोग कहाँ दुनिया में, दे सकते हैं प्यार मनुज को,
जिनके मन में मानवता का, किंचित भर भी कोष नहीं है!

भले ही खुद को अच्छा समझें, पर ये लोग नहीं हितकारी!
इन लोगों के अपने हित को, जब चाही मानवता मारी!

नहीं सुरक्षा दे सकता वो, जिसको खुद का होश नहीं है!
किसी के दिल के टुकड़े करके, जिसे कोई अफसोस नहीं है..

प्यार को कदमों तले कुचलकर, प्यार भरा लेखन न करना!
इस दुनिया में बुत से ज्यादा, मानवता का पूजन करना!
"देव" जहाँ में एटम बम से, लड़कर कुछ न मिल पायेगा,
अपने हित में अंधे होकर, मानव का शोषण न करना!

जो मजहब से ऊपर उठकर, मानवता साबित करते हैं!
वही लोग देखो दुनिया में, हर मानव का हित करते हैं!

कैसे कह दूँ किस्मत है ये, उन लोगों का दोष नहीं है!
किसी के दिल के टुकड़े करके, जिसे कोई अफसोस नहीं है!"

.........................चेतन रामकिशन "देव".........................
दिनांक-२८.०४.२०१३



Saturday, 27 April 2013

♥♥हमारा मिलन..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥हमारा मिलन..♥♥♥♥♥♥♥♥
एक दूजे से जिस दिन हम मिल जायेंगे!
रंग हजारों दुनिया में खिल जायेंगे!
तिमिर दुखों का, जीवन से ढल जायेगा,
खुशी के दीपक, जीवन में जल जायेंगे!

तुम बन जाना भाव और मैं गीत बनूँ!
तुम गर्मी में बारिश और मैं शीत बनूँ!

हम सपनों की दुनिया नयी सजायेंगे!
एक दूजे से जिस दिन हम मिल जायेंगे...

प्रीत तुम्हारी नाजुक नर्म हथेली है!
प्रीत तुम्हारी हर पल नयी नवेली है!
"देव" तुम्हारे जैसा, जग में कोई नहीं,
सखी तुम्हारी छवि, बड़ी अलबेली है!

तुम पुस्तक, मैं लिपि तुम्हारी बन जाऊं!
मैं शिक्षक बनकर के, तुमको समझाऊं!

प्रीत की सरगम, जग को सदा सुनायेंगे!
एक दूजे से जिस दिन हम मिल जायेंगे!"

...........चेतन रामकिशन "देव"...........
दिनांक-२७.०४.२०१३

Thursday, 25 April 2013

♥♥गम का विलय..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥गम का विलय..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मैं भावों का सागर हूँ, मैं अपना रस्ता तय कर लूँगा!
अपने स्वर में दर्द वसाकर, मैं गीतों में लय कर लूँगा!
मुझे अकेला देख भले ही, मेरे दुश्मन मुस्काते हों,
लेकिन मैं अपने साहस से, अपने हक की जय कर लूँगा!

ये मेरा विश्वास है खुद पर, ये कोई अभिमान नहीं है! 
यूँ ही मैं संघर्ष करूँगा, जब तक तन बेजान नहीं है!

धीरे धीरे खून में अपने, गम का यहाँ विलय कर लूँगा!
मैं भावों का सागर हूँ, मैं अपना रस्ता तय कर लूँगा.....

इस जीवन की राह पे देखो, रोजाना बदलाव हुए हैं!
कभी यहाँ पर आंसू फूटे, कभी यहाँ पर घाव हुए हैं!
"देव" यहाँ पर पत्थर बनकर, अपने दिल को कुचल रहे हैं,
दर्द के झरने उमड़ उमड़ कर, देखो तो सैलाब हुए हैं!

जब अपने ही बदल गए तो, गैरों से क्या गिला करूँगा!
हाँ लेकिन मैं अब लोगों से, सोच समझकर मिला करूँगा!

धीरे धीरे सही राह पर, चलकर यहाँ विजय कर लूँगा!
मैं भावों का सागर हूँ, मैं अपना रस्ता तय कर लूँगा!"

..................चेतन रामकिशन "देव".....................
दिनांक-२६.०४.२०१३




♥♥वक्त का सूरज,..♥♥



♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥वक्त का सूरज,..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
आज भले ही वक्त का सूरज, मुझको केवल झुलसाता है!
आज भले ही चाँद रात का, विरह भाव में तड़पाता है!
आज भले ये तारे मुझको, चिढ़ा रहे हों मेरी हार पर,
आज भले ही काला बादल, घना अँधेरा कर जाता है!

लेकिन मन में आशाओं के, दीप जलाने मैं निकला हूँ!
गम की भारी चट्टानों को, यहाँ हिलाने मैं निकला हूँ!

वही हारता है जीवन से, जो पीड़ा से डर जाता है!
आज भले ही वक़्त का सूरज, मुझको केवल झुलसाता है...

आज भले ही बुरे वक़्त में, अपनों का रुख बदल गया हो!
आज भले ही बुरे वक्त में, पैर हमारा फिसल गया हो!
"देव" मगर वो पछतायेंगे, एक दिन अपनी मनमानी पर,
आज भले उनका अपनापन, मोम की तरह पिघल गया हो!

रोज दर्द के प्याले पीकर, शक्ति का वर्धन करता हूँ!
उठने की कोशिश रहती है, भले ही मैं कितना गिरता हूँ!

आग को सहते सहते एक दिन, लोहा कुंदन बन जाता है!
आज भले ही वक़्त का सूरज, मुझको केवल झुलसाता है!"

....................चेतन रामकिशन "देव"....................
दिनांक-२५.०४.२०१३


♥♥पत्थर का बुत..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥पत्थर का बुत..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
रो रो कर आँखों में लाली, और मेरा मन विचलित होता!
सच की कीमत नहीं है कोई, झूठ यहाँ पर अद्भुत होता!
जिस इन्सां को आह किसी, नहीं सुनाई देती जग में,
बेशक वो दिखता हो मानव, पर वो पत्थर का बुत होता!

लोग यहाँ पर मिन्नत करके, भले तड़प कर मर भी जायें!
लेकिन पत्थर के बुत जैसे, मानव फिर भी जश्न मनायें!

बिन पानी के इस दुनिया में, कहाँ मरुस्थल सुरभित होता!
रो रो कर आँखों में लाली, और मेरा मन विचलित होता.....

इस दुनिया में मानवता का, लगभग सारा पतन हो गया!
बस अपना ही घर भरने का, हर मानव का जतन हो गया!
"देव" ये आलम देखके मेरा, दिल रोता है फूट फूट कर,
बस अपने ही सुख में शामिल, मानव का हर यतन हो गया!

दर्द किसी का समझ सके न, किसी की पीड़ा जान सके न!
वो इन्सां इंसान नहीं है, जो अपनायत मान सके न!

अभिमान ऐसे मानव का, एक दिन किन्तु है मृत होता!
रो रो कर आँखों में लाली, और मेरा मन विचलित होता!"

....................चेतन रामकिशन "देव"....................
दिनांक-२५.०४.२०१३

Wednesday, 24 April 2013

♥नरमी का एहसास.♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥नरमी का एहसास.♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तुम्हें देखकर मेरे दिल में, नरमी के एहसास जगे हैं!
तुमसा खास नहीं है कोई, यूँ तो मेरे कई सगे हैं!

सखी चांदनी रात के जैसा, सुन्दर है सिंगार तुम्हारा!
बड़े भाग्य से मैंने पाया, इस जीवन में प्यार तुम्हारा!
"देव" तुम्हारे प्रेम की चाहत, मुझको हर पल उर्जा देती,
दूर हो लेकिन फिर भी करता, मैं मन से दीदार तुम्हारा!

सखी तुम्हारे प्रेम से मेरी, आँखों में ये ख्वाब उगे हैं!
तुम्हें देखकर मेरे दिल में, नरमी के एहसास जगे हैं...

तुम नेनों के पटल पे अंकित, छवि तुम्हारे वसी है मन में!
सखी मैं तेरे संग उड़ता हूँ, पंख पसारे नील गगन में!
तुमसे ही रौनक है घर में, तुमसे बागों की हरियाली,
तुमसे ही खुशियों के दीपक, जले सखी मेरे जीवन में!

सखी तुम्हारे प्रेम से देखो, इस जीवन को पंख लगे हैं!
तुम्हें देखकर मेरे दिल में, नरमी के एहसास जगे हैं!"

....................चेतन रामकिशन "देव"......................
दिनांक-२४.०४.२०१३




Tuesday, 23 April 2013

♥♥प्रीत की खुश्बू.♥♥


♥♥प्रीत की खुश्बू.♥♥
जब से प्रीत तेरी पाई है!
तब से जीवन सुखदाई है!
उपवन खुश्बू से भर आया,
और तितली भी मुस्काई है!

प्रेम तुम्हारा बड़ा ही कोमल,
प्रेम तुम्हारा मनोहारी है!
तुम्हे देखकर खिले उजाला,
छवि तुम्हारी उजियारी है!
सखी तुम्हारे प्रेम से देखो,
लगता हर दिन त्योहारों सा,
सखी ईद सी, मीठी है तू,
तू रंगों की पिचकारी है!

सही रास्ता मुझे दिखाकर,
गलत दिशा भी समझाई है!
उपवन खुश्बू से भर आया,
और तितली भी मुस्काई है...

सखी तुम्हारे दर्शन पाकर,
मेरी हर प्रभात सुखद हो!
सखी तुम्हारे प्रेम से देखो,
पूनम सी हर रात सुखद हो!
"देव" तुम्हारी प्रीत ने मुझको,
अपनेपन का दिया समुन्दर,
सखी दुआ है युगों युगों तक,
हम दोनों का साथ सुखद हो!

सखी तुम्हारा रूप देखकर,
धवल चांदनी शरमाई है!
उपवन खुश्बू से भर आया,
और तितली भी मुस्काई है!"

..चेतन रामकिशन "देव"..
दिनांक-२३.०४.२०१३

"
प्रीत-जहाँ, परस्पर प्रीत होती है, वहां जीवन, समस्याओं की कठिनता के बाद भी,
पथरीला नहीं लगता! प्रेम जहाँ होता है, वहां अभावों में जीवन पथ सरल हो जाता है!"

"
सर्वाधिकार सुरक्षित"
' मेरी ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित"

Monday, 22 April 2013

♥♥तुम्हारी समझ...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥तुम्हारी समझ...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तुम्हे समझना है जो समझो, पक्ष हमारा नहीं जरुरी!
हाँ ये सच है बिना तुम्हारे, ये जीवन की डगर अधूरी!

मैंने तुमको मानवता के नाते, अपना मान लिया था!
साथ तुम्हारे खुश रहने का, अवसर मैंने जान लिया था!
तेरे साथ चाहता था क्यूंकि, "देव" तेरा कद था नूरानी,
मैंने तेरे अपनेपन से, इतना तो पहचान लिया था!

नहीं पता के तुमने मुझसे, क्यूँ कर ली मीलों की दूरी!
तुम्हे समझना है जो समझो, पक्ष हमारा नहीं जरुरी....

शायद रिश्तों की दुनिया ही, तुमको बड़ी अनूठी लगती!
इन रिश्तों के आगे तुमको, मानवता भी झूठी लगती!
पर मेरा दिल कहता है के, मानवता सबसे ऊपर है,
लेकिन तुमको मानवता की, डोर हमेशा टूटी लगती!

बुरे वक़्त में कब होती है, किसी के दिल की हसरत पूरी!
तुम्हे समझना है जो समझो, पक्ष हमारा नहीं जरुरी!"

...................चेतन रामकिशन "देव"....................
दिनांक-२२.०४.२०१३

♥♥शब्दों की कराह.♥♥




♥♥शब्दों की कराह.♥♥♥♥
शब्दों का मन कराह रहा है,
कुछ कह पाना भी मुश्किल है!
आज का मानव हुआ है दानव,
नजर मिलाना भी मुश्किल है!
कुदरत की अनुपम कृति को,
नोंच रहें हैं, काम पिपासु,
पीड़ा की व्यापक क्षमता को,
अब बतलाना भी मुश्किल है!

सजा मौत की सही है लेकिन,
ये बहशीपन चलेगा कब तक!
यहाँ आदमी दानव बनकर,
मानवता को छलेगा कब तक!
रोज रोज हर चौराहे पर,
नारी की अस्मत लुटती है,
नहीं पता के इस नारी को,
इज्ज़त का हक, मिलेगा कब तक!

तन पे छाले पड़े हमारे,
अब दिखलाना भी मुश्किल है!
पीड़ा की व्यापक क्षमता को,
अब बतलाना भी मुश्किल है....

दंड नहीं है, श्राप नहीं है,
नारी होना पाप नहीं है!
नारी तो है खिले सुमन सी,
वो दुख का संताप नहीं है!
"देव" यहाँ पर देखो अब तुम,
नर-नारी को एक नजर से,
नारी का अस्तित्व है व्यापक,
वो कोई धुंआ, भाप नहीं है!

रोम रोम में दर्द है गहरा,
बदन हिलाना भी मुश्किल है!
पीड़ा की व्यापक क्षमता को,
अब बतलाना भी मुश्किल है!"

...चेतन रामकिशन "देव"...
दिनांक-२२.०४.२०१३

Sunday, 21 April 2013

♥♥गम की रात..♥♥


♥♥♥♥♥गम की रात..♥♥♥♥♥
दिल का हाल सुनाया जिसको!
अपना यहाँ बताया जिसको,
वही अँधेरा सोंप गया है,
दीपक सदा दिखाया जिसको!

काश हमारी आह समझते!
ये पथरीली राह समझते!
काश समझकर मेरे आंसू,
मेरे मन की चाह समझते!

वही गिराकर चला गया है,
मैंने सदा उठाया जिसको!
वही अँधेरा सोंप गया है,
दीपक यहाँ दिखाया जिसको...

गिला नहीं है उससे कोई,
ये किस्मत की बात है शायद!
इक दिन सूरज भी निकलेगा,
"देव" ये गम की रात है शायद!

मिला वही अनजानों जैसा,
दिल में सदा वसाया जिसको!
वही अँधेरा सोंप गया है,
दीपक यहाँ दिखाया जिसको!"

...चेतन रामकिशन "देव"...
दिनांक-२१.०४.२०१३


Tuesday, 16 April 2013


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥नया उजाला..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
नया दिवस है, नया उजाला, जल की ये शीतल धारा है!
निशा तिमिर की बीत चुकी है, और सूरज का उजियारा है!
वही यहाँ पर समस्याओं से, लड़ के आगे बढ़ा है एक दिन,
जिस मानव ने साहस के संग, समस्याओं को ललकारा है!

ये जीवन है यहाँ पे निश दिन, समस्याओं के पल आते हैं!
किन्तु मन में साहस हो तो, तिमिर में दीपक जल जाते हैं!

वही शांत रहता है मन से, क्रोध को जिसने भी मारा है!
नया दिवस है, नया उजाला, जल की ये शीतल धारा है....

सही बात है किस्मत का रुख, सदा यहाँ सुखमय नहीं होता!
किन्तु किस्मत से डरकर भी, जीवन का पथ तय नहीं होता!
"देव" हमे करना होगा कुछ, किस्मत कर्म नहीं करती है,
वही विजय पाता है रण में, जिसे हार का भय नहीं होता!

बस किस्मत की राह देखकर, जीवन को बरबाद न करना!
तुम औरों को दुख देकर के, अपना घर आबाद न करना!

वो क्या जंग करे जीवन से, साहस ही जिसने हारा है!
नया दिवस है, नया उजाला, जल की ये शीतल धारा है!"


....................चेतन रामकिशन "देव"........................
दिनांक-१७.०४.२०१३
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सर्वाधिकार सुरक्षित"
" मेरी ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित"

(पेंटिंग साभार--प्रिय मित्र कुसुम जी!)

Monday, 15 April 2013

♥गम का तहखाना.♥


♥♥गम का तहखाना.♥♥
गम के गहरे तहखाने में!
और आंसू के मयखाने में!
अब खुशियों की नहीं तमन्ना,
डर लगता है मुस्काने में!

हवा है लेकिन घुटन बहुत है!
इन आँखों में चुभन बहुत है!
सुनो जरा हौले से छूना,
मेरे दिल में दुखन बहुत है!

दुख के बादल उमड़ रहे हैं,
गम देने को, नजराने में!

अब खुशियों की नहीं तमन्ना,
डर लगता है मुस्काने में...
अपना कहकर बनें पराये!
लोगों का रुख समझ न आये!
"देव" जिसे मलमल का समझो,
वो इन्सां ही ठेस लगाये!

बिन उसके ये दिल नहीं लगता,
उमर बीत गयी समझाने में!

अब खुशियों की नहीं तमन्ना,
डर लगता है मुस्काने में!"
..चेतन रामकिशन "देव"..
दिनांक-१५.०४.२०१३