Monday, 11 August 2014

♥तुम्हारी याद का लम्हा...♥

♥♥♥♥♥♥तुम्हारी याद का लम्हा...♥♥♥♥♥♥♥
मैं ज़ख्मों पे नमक फिर से, लगाकर देख लेता हूँ!
तुम्हारी याद का लम्हा, उठाकर देख लेता हूँ!

मेरी किस्मत, मेरी तक़दीर ने तो कुछ नहीं बख्शा,
लकीरें हाथ की अब आजमाकर, देख लेता हूँ!

सिसकते दर्द के कांटे, बदन पे जब भी चुभते हैं,
ग़मों की चांदनी मैं तब, बिछाकर देख लेता हूँ!

यहाँ इंसान बहरे हैं, गुहारें सुन नहीं पाते,
बुतों को दर्द अब अपना, सुनाकर देख लेता हूँ!

सुकूं जब रूह को न हो, हो ठहरी बेबसी दिल में,
ग़ज़ल मैं फिर तेरी एक, गुनगुनाकर देख लेता हूँ!

मिलन की चाह हो लेकिन, तेरे बदलाव का आलम,
तेरा रस्ता, तेरा कूचा, भुलाकर देख लेता हूँ!

कहीं पायल की रुनझुन हो, तेरे आने की उम्मीदें,
मैं एक अरसे से सूना घर, सजाकर देख लेता हूँ!

लगे तू चाँद सा मुखड़ा, अमावस चीर आएगा,
मैं अपनी रात फिर, बाहर बिताकर देख लेता हूँ!

तुम्हें सब कुछ बताया है, नहीं तुम "देव" झुठलाओ,
मैं बिखरे लफ्ज़ के टुकड़े, मिलाकर देख लेता हूँ! "

 .................चेतन रामकिशन "देव"….........
दिनांक-१२ .०८. २०१४ 

Saturday, 9 August 2014

♥♥मोहब्बत की सादगी..♥♥

♥♥♥♥मोहब्बत की सादगी..♥♥♥♥♥
प्यार में सादगी तुम्ही से है!
फूल में ताजगी तुम्ही से है!

आशिकी तुम हो, जुस्तजु मेरी,
मेरी दीवानगी तुम्ही से है!

राह देखी क्यों तुम नहीं आईं,
दिल को नाराजगी तुम्ही से है!

देख कर तुमने जो चुराई नज़र,
तब से हैरानगी तुम्ही से है!

मैं बहकता हूँ सिर्फ तेरे लिए,
मेरी आवारगी तुम्ही से है!

बिन तेरे नींद भी नहीं आती,
आँख मेरी जगी तुम्ही से है!

"देव" दुनिया तो मतलबी है बस,
रूह मेरी सगी तुम्ही से है!"

......चेतन रामकिशन "देव"…...
दिनांक-०९ .०८. २०१४

♥♥दर्द का काल..♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥दर्द का काल..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
भूतकाल भी दर्द भरा था, वर्तमान में आँखे नम हैं!
एक अरसे तक नहीं बदलते, पीड़ा के ऐसे मौसम हैं!
जिसकी मर्जी वही दर्द दे, आह कोई न सुनता मेरी,
लगता है सबकी नजरों में, पत्थर के बुत जैसे हम हैं!

पत्थर का दर्जा देकर के, तुमको क्या कुछ मिल पायेगा!
एक दिन देखो झूठ का पर्दा, इन आँखों से हट जायेगा!

सुन लेता हूँ हौले हौले, दर्द भरे सारे आलम हैं!
भूतकाल भी दर्द भरा था, वर्तमान में आँखे नम हैं...

क्यों लोगों को अपने दुख के, सिवा कुछ नहीं दिख पाता है!
क्यों शायर का कलम आजकल, नहीं हक़ीक़त लिख पाता है!
"देव" आईने में वो अपनी, शिक़न देखकर घबरा जाते,
मगर मेरे दिल के टुकड़ों का, ढ़ेर उन्हें न दिख पाता है!

बुरा वक़्त है इसीलिए तो, मेरी कुछ सुनवाई नहीं है!
इसीलिए तो हवा आजतक, ख़ुशी का झोंका लाई नहीं है!

झूठ का चेहरा उजला उजला, सच के मानों बुरे करम हैं!
भूतकाल भी दर्द भरा था, वर्तमान में आँखे नम हैं! "

.................चेतन रामकिशन "देव"….............
दिनांक-०९ .०८. २०१४

Thursday, 7 August 2014

♥♥खून पसीना..♥♥

♥♥♥♥♥खून पसीना..♥♥♥♥♥
खून पसीना बहुत बहाया!
तब जाकर के जीना आया!
बुरे वक़्त में सब बदले थे,
किसी ने मरहम नहीं लगाया!

सब उपहास उड़ाने वाले,
नहीं दर्द की बातें जानें!
भूख प्यास से व्याकुल दिन और,
नहीं किसी की रातें जानें!

ठोकर खाकर गिरा कभी जब,
किसी ने मुझको नहीं उठाया!
बुरे वक़्त में सब बदले थे,
किसी ने मरहम नहीं लगाया...

साथ किसे के न देने से,
हाँ तन्हाई तड़पाती है!
मगर आंसुओं की ये धारा,
हमको जीना सिखलाती है!

देख हमारे इस साहस को,
ढ़लता उपवन भी मुस्काया!
बुरे वक़्त में सब बदले थे,
किसी ने मरहम नहीं लगाया...

अपने गम से मिला तजुर्बा ,
और पीड़ा ने सोच सुधारी !
"देव" होंसला जगा लिया तो,
नहीं सांस लगती है भारी!

सीख गया काँटों पे चलना,
नहीं आग से मैं घबराया!
बुरे वक़्त में सब बदले थे,
किसी ने मरहम नहीं लगाया! "

......चेतन रामकिशन "देव"…..
दिनांक-०८ .०८. २०१४

Monday, 4 August 2014

♥♥मुफ़लिसी♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥मुफ़लिसी♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
खून बहा जाये ज़ख्मों से, दवा कोई करने नहीं आता !
मुफ़लिस के भूखे बच्चे को, कोई रोटी नहीं खिलाता !
आँख से आंसू बहते रहते, चीख चीख कर दिल रोता है,
करते हैं दुत्कार उसे सब, गले से नहीं कोई लगाता!

मुफ़लिस के नन्हे बच्चों को, बाल श्रम करना पड़ता है!
भूख प्यास में आंसू पीकर, पेट यहाँ भरना पड़ता है!

घोर उदासी है सूरत पर, न वो हँसता, न मुस्काता!
खून बहा जाये ज़ख्मों से, दवा कोई करने नहीं आता !

बिना दवा के मर जाता है, दवा बहुत महंगी मिलती है!
घोर वेदना सहता है वो, नहीं ख़ुशी कोई मिलती है!
"देव" वतन में मुफ़लिस को, एक घर तक नहीं मयस्सर होता,
नहीं अँधेरा छंट पाता है, नहीं कोई ज्योति खिलती है!

क़र्ज़ में डूबे मुफ़लिस की बस, अंतिम आस यही होती है!
किसी पेड़ पे या खम्बे पे, उसकी लाश रही होती है!

मुफ़लिस के पथरीले पथ पर, कोई रेशम नहीं बिछाता!
खून बहा जाये ज़ख्मों से, दवा कोई करने नहीं आता ! "

....................चेतन रामकिशन "देव"….................
दिनांक-०५ .०८. २०१४


हम तुम जब एक

♥♥हम तुम जब एक♥♥♥
हम तुम जब एक हो जायेंगे!
जगमग तारे हो जायेंगे!
सखी डूब जाना तुम मुझमें,
हम भी तुझमें खो जायेंगे!
धवल चांदनी का वो पर्दा,
आसमान में लहराएगा,
एक दूजे की नजदीकी में,
हम चुपके से सो जायेंगे!

प्यार के मीठे सपने होंगे,
शोर शराबा थम जायेगा!
हम दोनों के प्यार के देखो,
हसीं सिलसिला बन जायेगा!

हम सपनों में मिलन भाव के,
नव अंकुर को बो जायेंगे!
हम तुम जब एक हो जायेंगे!
जगमग तारे हो जायेंगे। ...

बीच रात में आँख खुले तो,
गीत प्यार का तुम दोहराना!
नाम मेरा लेकर हौले से,
सखी नींद से मुझे जगाना!
हम दोनों फिर प्यार वफ़ा की,
बातों का एहसास करेंगे,
मैं भी साथ रहूँगा तेरे,
तुम भी मेरा साथ निभाना!

खूब पड़ेगी प्यार की बारिश,
बादल सुरमई हो जायेंगे!
हम तुम जब एक हो जायेंगे!
जगमग तारे हो जायेंगे! "


......चेतन रामकिशन "देव"…....
दिनांक-०४ .०८. २०१४


Sunday, 3 August 2014

♥प्रेम भावना..♥

♥♥♥
♥♥♥♥प्रेम भावना..♥♥♥♥
प्रेम भावना मेरे मन की!
तुम अनुभूति हो जीवन की!
मेरे नयनों की ज्योति हो,
तुम ऊर्जा हो मेरे तन की!

स्वप्नों में तुम ही आती हो!
गीत प्रेम का तुम गाती हो!
फूलों सी देह तुम्हारी,
घर आँगन को महकाती हो!

बस तुमको ही छूना चाहूँ,
तुम भावुकता आलिंगन की!
प्रेम भावना मेरे मन की!
तुम अनुभूति हो जीवन की ...

प्रेम मुक्त है हर सीमा से,
सागर के जैसा गहरा है!
सब जिज्ञासा शांत हो गयीं,
मन जब से तुमपे ठहरा है!

तुम पावन हो गंगाजल सी,
न नीति हो प्रलोभन की!
प्रेम भावना मेरे मन की!
तुम अनुभूति हो जीवन की ...

विरह भाव का विष पीकर भी,
मैंने तुमको याद किया है!
यदि नहीं प्रत्यक्ष रहे तुम,
सपनों में संवाद किया है!

तेज मेरे चेहरे का तुमसे,
तुम्ही चपलता अंतर्मन की!
प्रेम भावना मेरे मन की!
तुम अनुभूति हो जीवन की ...

फिर से मेरे पथ आओगे,
यही सोच प्रतीक्षा करता!
"देव" मिलन की व्याकुलता में,
अश्रु से आँचल को भरता!

न कोई समकक्ष तुम्हारे,
यथा योग्य तुम अभिनन्दन की!
तुम अनुभूति हो जीवन की!
प्रेम भावना मेरे मन की! "

प्रेम-जिसके प्रति होता है, अनेकों, असीम, अपार अनुभूतियाँ उसके लिए हृदय में उत्पन्न होती हैं,
प्रेम की लहरों को, किसी सीमा में बांधा नहीं जा सकता, प्रेम की भावनायें कभी मंद नदी सी स्थिर तो कभी सुनामी जैसी गतिमान होती हैं, तो आइये प्रेम की इस जल धारा का पान करें "

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-०४.०८.२०१४







Saturday, 2 August 2014

♥कहाँ हैं दोस्त वो..♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥कहाँ हैं दोस्त वो..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
नज़र आते नहीं अब तो, मुझे अब दोस्त वो अपने,
जो मेरी आह सुनकर के, बहुत बेचैन होते थे!

हजारों दोस्त दिखते हैं, मगर हैं नाम के केवल,
कहाँ हैं दोस्त वो, जो दुःख मैं मेरे साथ रोते थे!

नहीं कोई कपट मन में, नहीं छल, न ही लालच था,
मोहब्बत के नए पौधे, सभी जो साथ बोते थे !

चलो एक रस्म का दिन है, निभाकर देख लेते हैं,
कहीं गुम हो गए, जो उम्र भर को साथ होते थे!

नहीं होली, न दिवाली, नहीं वो ईद, न लोहड़ी,
चुके वो दौर जो त्यौहार में, संग साथ होते थे!

कसम टूटी, वफ़ा झूठी, यहां कुछ दिन का किस्सा है,
नहीं वो दोस्त जो, जो वादे वफ़ा संग में पिरोते थे!

चलो अब हारकर मैं, "देव " सच ये ओढ़ लेता हूँ,
पुराना दौर था जिसमें, बड़े दिल सबके होते थे! "

..................चेतन रामकिशन "देव"….............
दिनांक-०३.०८. २०१४


♥बिन तेरे..♥

♥♥♥♥♥♥बिन तेरे..♥♥♥♥♥♥
प्यार में मेरे क्या गलत पाया!
तुमने क्यों प्यार मेरा ठुकराया!

मेरी आँखों में आ गए आंसू,
तुमने जब गैर मुझको बतलाया!

बिन तेरे अब तो बस उदासी है,
हर तरफ दर्द का धुआं छाया!

सारे एहसास हैं तुम्हारे लिए,
अपनी चाहत का रंग दिखलाया!

चिट्ठियां मैंने तो लिखीं थीं बहुत,
खत तेरा एक भी नहीं आया!

यूँ तो हर साल ही लगा मेला,
मुझको बिन तेरे कुछ नहीं भाया !

"देव" आ जाओ ग़र सुना हो तो,
प्यार का गीत मैंने दोहराया! "

.....चेतन रामकिशन "देव"….
दिनांक-०२.०८. २०१४




Sunday, 27 July 2014

♥♥प्यार की दस्तक..♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्यार की दस्तक..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मेरे दिल के दरवाजे पर, हौले से दस्तक करती हो!
मुझे जगाकर शर्माती हो, सकुचाती हो तुम डरती हो!
मैं जब तेरा हाथ थामकर, लफ्ज़ प्यार के कहता हूँ तो,
आँख मूंदकर तुम भी मुझको, अपनी बाँहों में भरती हो!

सावन की इस रात में जब भी, ख्वाब सखी तेरा आता है!
तो तेरी खुशबु से मेरा, सारा आँगन भर जाता है!

मैं भी जान लुटाऊं तुम पर, और तुम भी मुझपे मरती हो!
मेरे दिल के दरवाजे पर, हौले से दस्तक करती हो...

सखी तुम्हारे ख्वाबों में मैं, रात रात भर खोना चाहूँ !
इसीलिए सब काम छोड़कर, मैं जल्दी से सोना चाहूँ !
ख्वाबों में मिलने जुलने पर, पाबन्दी कोई नहीं होती,
इसीलिए तो प्रेम नदी में, खुद को बहुत डुबोना चाहूँ !

सखी यकीं है ख्वाब हमारा, एक दिन पूरा हो जायेगा!
प्रेम की उजली धूप खिलेगी, मिलन हमारा हो जायेगा!

दुआ साथ की मैं भी करता, दुआ मिलन की तुम करती हो!
मेरे दिल के दरवाजे पर, हौले से दस्तक करती हो! "

...................चेतन रामकिशन "देव"....................
दिनांक-२७.०७ २०१४




Friday, 25 July 2014

♥♥दर्द इतना है...♥♥



♥♥♥♥♥♥♥दर्द इतना है...♥♥♥♥♥♥♥♥
दर्द इतना है संभाले से संभलता कब है!
कोई हमदर्द मेरे साथ में चलता कब है!

तार टूटे, ये झुके खम्भे, गवाही देते,
मुफलिसों के यहाँ एक बल्ब भी जलता कब है!

कुर्सियां हैं वही, बस आदमी बदल जाते,
कोई बदलाव का सूरज ये, निकलता कब है!

जिसके सीने में है दिल की, जगह रखा पत्थर,
बाद मिन्नत के भी देखो, वो पिघलता कब है!

सब तमाशाई हैं देखे हैं, सर कटी लाशें,
खून पानी है मगर उनका, उबलता कब है!

कोई झुग्गी, न झोपड़ी, है खुला अम्बर बस,
उम्र बीती है मगर, दौर बदलता कब है!

दिन निकलते ही यहाँ "देव" दिल सुलग जाये,
दर्द जिद्दी है, दवाओं से भी ढलता कब है! "  

...........चेतन रामकिशन "देव"............
दिनांक-२६.०७ २०१४

♥♥♥प्यार का आँगन..♥♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥प्यार का आँगन..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
सवेरे जब मैं जाता हूँ, तिलक मुझको लगाती है!
मेरे घर लौट आने तक, पलक अपनी बिछाती है!
मेरे बहते पसीने को, वो पौंछे अपने आँचल से,
थकन को भूलकर अपनी, ख़ुशी से मुस्कुराती है!

समर्पण भाव ये तेरा, सखी अभिभूत करता है!
मेरे दिल हर घड़ी तुझको ही, बस अनुभूत करता है!

गुजारा हंसके करती है, नहीं शिक़वा जताती है! 
सवेरे जब मैं जाता हूँ, तिलक मुझको लगाती है...

जहाँ पर प्यार होता है, वो आँगन आसमानी है!
परस्पर दर्द में बहता, जहाँ आँखों में पानी है!
सुनो तुम "देव" ऐसे आदमी का साथ न रखना,
वो जिसने सिर्फ दौलत तक ही, अपनी सोच मानी है!

जो निश्छल मन से, भावों का यहाँ सत्कार करते हैं!
यही वो लोग हैं जो, आत्मा से प्यार करते हैं!

जो बनकर प्यार की खुशबु, हवा के साथ आती है! 
सवेरे जब मैं जाता हूँ, तिलक मुझको लगाती है! "

...............चेतन रामकिशन "देव"................
दिनांक-२५.०७ २०१४


Thursday, 24 July 2014

♥संभलना आ गया ..♥


♥संभलना आ गया ..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
संभलना आ गया ठोकर, बहुत ही खाईं हैं लेकिन!
चुपा लेता हूँ दिल को, आँख पर भर आईं हैं लेकिन!
किसी से प्यार करना भी, गुनाह अब हो गया शायद ,
खुदा बोलें मोहब्बत को, बहुत रुसवाईं हैं लेकिन!

सिसकती आँख से आंसू, बहे जाते हैं गालों पर!
क्यों गुमसुम हो गए हैं, यहाँ सच के सवालों पर!

है दिल रोता ये खुशियां, झूठ की दिखलाईं हैं लेकिन!
संभलना आ गया ठोकर, बहुत ही खाईं हैं लेकिन!

गुनाह अपना मेरा सर डाल भी, शर्मिंदगी कब है!
वो बाहर से हैं सुन्दर, रूह में पाकीज़गी कब है!
सुनो हम "देव" टूटे दिल के, टुकड़ें जोड़ कर लाये,
नहीं धड़कन है पहले सी, भला वो ताज़गी कब है!

अँधेरी रात का पर्दा, वही चाहते उजालों पर!
वो जिनके होठ सिलते हैं, यहाँ सच के सवालों पर!

है जलता दिल भले आँखों में, बूंदे आईं हैं लेकिन!
संभलना आ गया ठोकर, बहुत ही खाईं हैं लेकिन!

..................चेतन रामकिशन "देव".....................
दिनांक-२४.०७ २०१४

Wednesday, 23 July 2014

♥♥♥गम के निशां..♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥गम के निशां..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
निशां पड़े आँखों के नीचे, ग़म के गहरे काले काले!
कुछ अपनों ने मेरे दिल के, टुकड़े देखो खूब उछाले!
अपने टूटे दिल की हालत, देख यकीं होता है मुझको,
प्यार उन्हीं को मिलता जग में, जो होते हैं किस्मतवाले!

आह सुने न कोई किसी की, कोई किसी का दुख न जाने!
मिन्नत कितनी भी कर लो पर, नहीं निवेदन कोई माने!

दर्द की पथरीली राहों पर, चलकर देखो पड़े हैं छाले!
निशां पड़े आँखों के नीचे, ग़म के गहरे काले काले...

जिसको अपना समझा जाये, वही मिटाने को निकला है!
मानवता और अपनेपन में, आग लगाने को निकला है!
"देव" नहीं मालूम जहाँ में, दिल की इज़्ज़त शेष रहेगी,
जिससे दिल का रिश्ता जोड़ा, वही जलाने को निकला है!

धन, दौलत के मंसूबों में, अपनेपन को मार दिया है!
कुछ लोगों ने आड़ प्यार की, लेकर के व्यापार किया है!

कल तक पावन कहता था जो, आज मुझी में दोष निकाले!
निशां पड़े आँखों के नीचे, ग़म के गहरे काले काले!"

...................चेतन रामकिशन "देव"........................
दिनांक-२३.०७ २०१४

Tuesday, 22 July 2014

♥♥टूटे पत्ते ♥♥


♥♥♥♥टूटे पत्ते ♥♥♥♥
टूटे पत्ते, सूखी डाली!
कदम कदम पर है बदहाली!
चलने को मैं चलता हूँ पर,
पथ सूना है, मंजिल खाली!

उम्मीदों का दर्पण टूटा,
आशाओं की कड़ियाँ टूटीं!
अब जीवन है तनहा तनहा,
प्यार वफ़ा की लड़ियाँ टूटीं!

ढली चांदनी हंसी ख़ुशी की,
ग़म की छाई अमावस काली!
चलने को मैं चलता हूँ पर,
पथ सूना है, मंजिल खाली!

मेरे मन के हर कोने में,
दर्द बहुत होता रोने में!
"देव" डरातीं बिछड़ी यादें,
डर लगता है अब सोने में! 

रिक्त हुयी हाथों की रेखा,
लगे दूर से भले निराली! 
चलने को मैं चलता हूँ पर,
पथ सूना है, मंजिल खाली!"

...चेतन रामकिशन "देव"...
दिनांक-२२.०७ २०१४

Monday, 21 July 2014

♥♥सखी तुम्हारा प्यार..♥♥


♥♥सखी तुम्हारा प्यार..♥♥

हर लम्हा दीदार जरुरी!
सखी तुम्हारा प्यार जरुरी!
जीवन में हर्षित रहने को,
संग तेरे घर द्वार जरुरी!

तेरे साथ ही कदम बढ़ाना,
तेरे साथ हंसना मुस्काना,
मेरी गलती को तू आंके,
सही गलत का पाठ पढ़ाना!

जीवन पथ में सही दिशा को,
तेरी सीख के तार जरुरी!
जीवन में हर्षित रहने को,
संग तेरे घर द्वार जरुरी !

कभी तू जीते, कभी मैं हारूं,
तेरे साथ में, पंख पसारुं!
"देव" तुम्हारा हाथ पकड़ कर,
अपना लेखन यहाँ सुधारूं!

प्यार शब्द में रब दिखता है,
है इसका सत्कार जरुरी!
जीवन में हर्षित रहने को,
संग तेरे घर द्वार जरुरी!"

...चेतन रामकिशन "देव"...
दिनांक-२१.०७ २०१४

Sunday, 20 July 2014

♥♥सच की तपस्या..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥सच की तपस्या..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
घोर तपस्या सच की करना, काम कोई आसान नहीं है!
उनको हिंसा ही भाती है, जिन्हें प्रेम का ज्ञान नहीं है!
जो अपने उद्देश्य लोभ में, छल करता है मानवता से,
वो सब कुछ हो जाये बेशक, लेकिन वो इंसान नहीं है!

मानवता के चिन्हों पर चल, जो सबका हित कर जाते हैं !
वही लोग देखो दुनिया में, मरकर भी न मर पाते हैं! 

खुद की खातिर जी लेना ही, नेकी की पहचान नहीं है!
घोर तपस्या सच की करना, काम कोई आसान नहीं है...

फूलों की ख़्वाहिश है सबको, काँटों पे चलना न चाहें!
चाहत रखें उजालों की पर, दीपक बन जलना न चाहें!
बिना कर्म के ही मिल जाये, दुनिया की सारी धन दौलत,
नहीं धूप में बहे पसीना, नहीं शीत में गलना चाहें!

लेकिन सिर्फ ख्यालों में ही, महल देखने से नहीं मिलते!
बिन मेहनत के इस दुनिया में, ख्वाबों के गुलशन नहीं खिलते!

बाहर ढोंग करेंगे घर में, परिजन का सम्मान नहीं हैं!
घोर तपस्या सच की करना, काम कोई आसान नहीं है....

जो नफरत की आग में जलकर, विष के गोले बरसाते हैं!
ऐसे दुर्जन जन लोगों के, नहीं दिलों में वस पाते हैं!
"देव" जहाँ में लाख, करोड़ों यहाँ आदमी फिरते हैं पर,
बिना दया और प्रेम भाव के, नहीं वो इन्सां बन पाते हैं!

केवल अख़बारों में छपकर, हमदर्दी का नाम करेंगे!
और हक़ीक़त में वो देखो, जग में काला काम करेंगे!

बस थोथी बातें कर देना, पीड़ा का अवसान नहीं है!
घोर तपस्या सच की करना, काम कोई आसान नहीं है!"

.....................चेतन रामकिशन "देव".........................
दिनांक-२१.०७ २०१४ 

♥♥दरिंदगी..♥♥



♥♥♥♥♥♥♥♥दरिंदगी..♥♥♥♥♥♥♥♥♥
रूह बेचैन बहुत दिल को तड़प होती है!
देख के ऐसे नज़ारे, ये नज़र रोती है!

वो दरिंदे यहाँ औरत को लूट कर मारें,
और खाकी यहाँ गूंगों की तरह सोती है!

अपने मतलब के लिए खून तक बहा दे जो,
आदमी की यहाँ फितरत ही बुरी होती है!

कोई कानून नहीं देता दरिंदों को सजा,
कब्र में भी वो यही सोच कर के रोती है!

लाश नंगी थी यहाँ, उसका बन गया धंधा,
आज दीवार पे हर, वो ही टंगी होती है!

जानवर सा है आदमी, है दरिंदा, बहशी,
उसकी सूरत भले मासूम, भली होती है!

"देव" ये दर्द है इतना के, क्या बताऊँ मैं,
मेरे शब्दों को भी मुझ संग, ये दुखन होती है! "

.............चेतन रामकिशन "देव"..............
दिनांक-२०.०७ २०१४



Saturday, 19 July 2014

♥♥♥जरा आ जाओ...♥♥♥



♥♥♥♥♥♥♥♥जरा आ जाओ...♥♥♥♥♥♥♥♥
चाँद आकाश में गुमसुम है, जरा आ जाओ!
बुझते दीपों में जरा रोशनी जगा जाओ!

बिन तेरे एक भी लम्हा नहीं कटता मेरा,
मैं जिधर देखूं, मुझे तुम ही तुम नज़र आओ!

मैं भी चाहता हूँ कलम, पाये तवज्जो मेरी,
मेरे लफ्जों में ग़ज़ल बनके, तुम समां जाओ!

देखकर हमको कसे तंज, जमाना न कोई,
मुझको तुम ऐसे जहाँ में, जरा लेकर जाओ!

तेरी चूड़ी की खनक, आज तलक याद मुझे,
अपनी चूड़ी को निशानी में मुझे दे जाओ!

ये जहाँ इतना बड़ा, तुम बिना अधूरा है,
एक लम्हे को भी न छोड़कर, मुझे जाओ!

"देव" तुमसे है लगन है , दिल मेरे जज़्बातों की,
अपना एहसास मेरी सांस में पिरो जाओ! "

...............चेतन रामकिशन "देव"...........
दिनांक-१९.०७ २०१४



Friday, 18 July 2014

♥♥पीड़ा का भंडारण..♥♥


♥♥♥पीड़ा का भंडारण..♥♥♥
मन पीड़ा से भरा हुआ है!
ज़ख्म पुराना हरा हुआ है!
अपनायत से दर्द मिला और,
दिल अपनों से डरा हुआ है!

कोमल दिल को छलनी करके,
कुछ अफ़सोस नहीं होता है!
क़त्ल दिलों का करके देखो, 
उनको रोष नहीं होता है!
मानवता की हत्या करके,
हत्यारे वो बन जाते हैं,
लेकिन फिर भी कानूनों में,
उनका दोष नहीं होता है!

झूठ हो रहा सब पे हावी,
और सच मानों मरा हुआ है!
अपनायत से दर्द मिला और,
दिल अपनों से डरा हुआ है...

बीच डगर में छोड़ा करते!
लोग दिलों को तोड़ा करते!
जिनको अपना कहते उनका,
नाम ग़मों से जोड़ा करते!
बस अपने मतलब की खातिर,
करते हैं झूठी हमसफ़री,
मतलब पूरा हो जाने पर,
अपने रुख को मोड़ा करते!

"देव" इसी आलम ने देखो,
मन आवेशित करा हुआ है!
अपनायत से दर्द मिला और,
दिल अपनों से डरा हुआ है!"

.....चेतन रामकिशन "देव".....
दिनांक-१८.०७ २०१४