Sunday, 12 April 2015

♥♥निकटता...♥♥

♥♥♥♥♥निकटता...♥♥♥♥♥♥
तुम्हें जानने का मन होता,
निकट मानने का मन होता। 
तेरे पग में शूल चुभें न,
धूल छानने का मन होता। 
तुमसे हर पल बातचीत हो,
कुछ कहना, कुछ सुनना चाहूं,
सात जनम तक मिलन करेंगे,
यही ठानने का मन होता। 

प्रेम का सावन जब भी बरसे,
तुमको मैं बाँहों में भर लूँ। 
अपने जीवन के हर क्षण में,
बस तुमको ही शामिल कर लूँ। 

रात मिलन की कभी ढ़ले न,
गति थामने का मन होता। 
सात जनम तक मिलन करेंगे,
यही ठानने का मन होता ...

काव्य हमारा करो अलंकृत,
उसको अनुभूति से भर दो। 
मेरा आँगन तुम बिन सूना,
आकर इसको तुम घर कर दो। 
"देव" जगत में तुम मनभावन,
और तुम्ही प्यारी लगती हो,
मेरे सपने पंख पसारें,
तुम उनको निश्चय से भर दो। 

तुम संग हो तो सदा प्रेम का,
राग तानने का मन होता। 
सात जनम तक मिलन करेंगे,
यही ठानने का मन होता। "

.......चेतन रामकिशन "देव"….....
दिनांक-१२.०४.२०१५ (CR सुरक्षित )

Friday, 10 April 2015

♥♥फांसी का फंदा...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥फांसी का फंदा...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
कुदरत का अभिशाप हुआ है, कृषक होना पाप हुआ है।
झूल रहा फांसी पर कृषक, चंहुओर संताप हुआ है।  
कुदरत के इस रौद्र रूप का, कोप बना है ग्राम देवता,
मन दुखता है, कृषक के घर, करुणा भरा विलाप हुआ है। 

सरकारों की क्षति-पूर्ति, उसको ज्यादा से ज्यादा हो। 
न मिथ्या का अनुकरण हो, न कोई कोरा वादा हो। 
सरकारें जब दर्द सुनेंगी, तो कृषक को सुख आयेगा। 
भूखा-प्यासा कृषक फिर से, सब्जी रोटी चख पायेगा। 

भस्म हुये हैं सारे सपने, दुख का इतना ताप हुआ है। 
मन दुखता है, कृषक के घर, करुणा भरा विलाप हुआ है ...

बेटी की शादी का सपना, बेमौसम बारिश ने लूटा। 
क्रूर बनी ओलावृष्टि से, कोमल फसलों का तन टूटा। 
"देव" वो देखो कृषक के घर, चीख हैं या फिर है सन्नाटा,
फसल महीनों पाली लेकिन, एक दो दिन में नाता टूटा। 

आशाओं के जल का संचय, क्षण भर में ही भाप हुआ है। 
मन दुखता है, कृषक के घर, करुणा भरा विलाप हुआ है। "

" कुदरत की मार सह रहे किसानों को सांत्वना, दुआ और स्नेह सहित सादर समर्पित रचना, 
(CR सुरक्षित )

.....................चेतन रामकिशन "देव"….....................
दिनांक-११.०४.२०१५

Tuesday, 7 April 2015

♥♥दस्तूर....♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥दस्तूर....♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
पास भी होकर पास नहीं वो, दूर भी होकर दूर नही है। 
पर वो मुझसे मिल न पाये, इतना भी मजबूर नहीं है। 

अपने आंसू बहा बहा कर, जीवन की खेती को सींचा,
कोई किसी को पानी देगा, अब ऐसा दस्तूर नहीं है। 

बिना जुर्म के सज़ा मुझे दी, आज है क्यूंकि वक़्त तुम्हारा,
समय मगर खुद को दोहराये, वो दिन कोसों दूर नही है। 

तुमको अपना ग़म प्यारा है, मुझको अपने दुख से मतलब,
कौन है ऐसा जिसके दिल में, पीड़ा का नासूर नहीं है। 

उम्मीदों का महल बनाकर, साथ ग़मों के रहना सोना,
तन्हाई से बढ़कर अब तो, मुझको कोई हूर नहीं है।

आज मिली जो दौलत अपने, बीते दिन को भूल गया वो,
किन होठों से कह दूँ बोलों, देखो वो मगरूर नहीं है। 

"देव" घुला है दर्द ज़हर का, गला है नीला, आँख में लाली,
लोग भला कैसे न समझें, वो दारु में चूर नहीं है। "

.....................चेतन रामकिशन "देव"….....................
दिनांक-०८.०४.२०१५

Sunday, 5 April 2015

♥♥ डर...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥ डर...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
निकट रहो तुम, दूर न जाओ, रात में तुम बिन डर लगता है। 
तुम बिन आँगन तन्हा तन्हा, सूना सूना घर लगता है।  
बिना तुम्हारे नींद न आये, बेचैनी के भाव पनपते,
बिना तुम्हारी गोद को पाये, व्याकुल मेरा सर लगता है। 

तुमसे मन का गहरा नाता, दूर नहीं तुम जाया कीजे। 
अनजाने में भी विरह का, कहर न मुझपे ढ़ाया कीजे। 

तुम बिन नयन मेरे गीले हों, अश्रु का सागर लगता है। 
निकट रहो तुम, दूर न जाओ, रात में तुम बिन डर लगता है... 

तुम रहती हो साथ अगर तो, सारा आलम खुश रहता है। 
न विरह के भाव पनपते, अपना गम भी चुप रहता है। 
"देव" तुम्हारी बातें होतीं, चित्त को हर्षित करने वाली,
और पाकर के तेरी निकटता, भावों का साग़र बहता है। 

प्रेम का तुमसे उद्बोधन है, वाणी नहीं दबाया कीजे। 
मैं जब बोलूं, मिलन करेंगे, तो एक दम आ जाया कीजे ।

तुम बिन देखो हवा का झोंका, मानो के नश्तर लगता है। 
निकट रहो तुम, दूर न जाओ, रात में तुम बिन डर लगता है। "

.......................चेतन रामकिशन "देव"…........................
दिनांक-०५.०४.२०१५

Friday, 3 April 2015

♥प्रेम-सार...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्रेम-सार...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तुम्हें भुला दूँ आखिर कैसे, तुमसे मन का तार जुड़ा है। 
तुम्हें देखकर दुनिया देखूं, तुमसे ही संसार जुड़ा है। 
रोज तुम्हारे एहसासों को, मैं चुपके से छू लेता हूँ,
तुम लगती हो सबसे प्यारी, क्यूंकि तुमसे प्यार जुड़ा है। 

उजली धूप सुबह की तुमसे, ख्वाब रात के तुम लाती हो। 
तारे भी पुलकित होते हैं, सखी अगर तुम मुस्काती हो। 

मेरे घर की तुम संरचना, तुमसे ही आधार जुड़ा है। 
तुम्हें भुला दूँ आखिर कैसे, तुमसे मन का तार जुड़ा है...

तुम आलोचक हो शब्दों की, मगर विमोचन तुमसे ही है। 
गंगाजल सी पावन हो तुम, मन का शोधन तुमसे ही है। 
"देव" तुम्हारा साथ मिला तो, गति बढ़ी मेरे चलने की,
कुशल समीक्षक, सही गलत का, अवलोकन भी तुमसे ही है। 

तुम जीवन को सम्पादित कर, पीड़ा को विस्मृत करती हो। 
तुम ऊर्जा के सबल भाव से, नया पाठ उद्धृत करती हो। 

तुम बिन मेरा जीवन रीता, तुमसे मेरा सार जुड़ा है।  
तुम्हें भुला दूँ आखिर कैसे, तुमसे मन का तार जुड़ा है। "

...................चेतन रामकिशन "देव"…..................
दिनांक-०३.०४.२०१५

Thursday, 2 April 2015

♥♥♥धूम्रदण्डिका...♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥धूम्रदण्डिका...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
धूम्रदण्डिका के धुयें में, निहित तुम्हारी आकृति है। 
मदिरा के प्यालों से फूटे, अब तेरी ही आवृति है। 
एक दिन था जब नशा सोचकर, मुझको घबराहट होती थी,
पर इतना बदलाव हुआ अब, नशा ही मेरी प्रवृति है। 

हाँ सच है के नशा है घातक, मुझे रोग से भर देता है। 
लेकिन ये भी सच है तेरी, याद को कमतर कर देता है। 
मैंने तो अच्छाई के संग, बहुत आगमन माँगा तुमसे,
किन्तु हर क्षण अनदेखा भी, अमृत को विष कर देता है। 

क्षुब्ध हूँ लेकिन ये धुआं ही, मेरी सारी प्रकृति है। 
धूम्रदण्डिका के धुयें में, निहित तुम्हारी आकृति है... 

दोष नहीं है तुम पर लेकिन, एकाकीपन सौंपा तुमने। 
अनदेखी से मेरे मन में, बीज शूल का रोंपा तुमने। 
"देव" मुझे भी आदर्शों पर, चलना मनमोहक लगता था,
किन्तु मेरे कोमल मन पर, तीर जहर का घोंपा तुमने। 

दंड के क्षण मैं भूल सकूँ न, बड़ी तीव्र ये स्मृति है। 
धूम्रदण्डिका के धुयें में, निहित तुम्हारी आकृति है। "


नोट-मेरी ये रचना किसी को नशे के लिये आमंत्रित नहीं करती है, रचनाकार का भाव मन व्यापक होता है और वह समाज के जिस पहलु को छूता है, उस पर शब्द जोड़ता है। 

..................चेतन रामकिशन "देव"…................
दिनांक-०३.०४.२०१५

Tuesday, 31 March 2015

♥बंदनवार...♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥बंदनवार...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
बंदनवार सजाया मैंने, घी का दीप जलाया मैंने।
नहीं लौटकर पर तुम आये, कितना तुम्हें बुलाया मैंने। 
तुमको अपनी व्याकुलता के, कितने पत्र लिखे प्रतिदिन,
तुम बिन ये नीरस जीवन है, हर क्षण ये बतलाया मैंने। 

किन्तु तुमने मेरे मन की, आशाओं को तोड़ दिया क्यों। 
एकाकी जीवन के पथ पर, मुझको जीवित छोड़ दिया क्यों।  
तुमसे बस थोड़ी अनुभूति, थोड़ा सा अपनत्व ही चाहा,
किन्तु तुमने इसके बदले, दुख से नाता जोड़ दिया क्यों। 

तुम नहीं समझे मेरी वेदना, कितना तो समझाया मैंने। 
तुम बिन ये नीरस जीवन है, हर क्षण ये बतलाया मैंने ... 

रिक्त है तुम बिन जीवन का वृत, त्रिज्या दुख की बड़ी हुयी है। 
शब्दों से विस्तार करूँ क्या, तुम बिन मुश्किल खड़ी हुयी है। 
"देव" तुम्हारी प्रतीक्षा में, दिवस रात पथरायीं ऑंखें,
लगता है कि भाग्य में तुम बिन, घनी वेदना जड़ी हुयी है ... 

अब तुम समझो या न समझो, रिक्त हृदय दिखलाया मैंने। 
तुम बिन ये नीरस जीवन है, हर क्षण ये बतलाया मैंने। "

.....................चेतन रामकिशन "देव"….................
दिनांक-३१.०३.२०१५ 

Wednesday, 25 March 2015

♥♥धूप....♥♥



♥♥♥♥♥♥धूप....♥♥♥♥♥♥♥♥
मेरे चित्र सजा दो फिर से। 
खोयी रौनक ला दो फिर से।  
अँधेरे को काबू में कर,
धूप नयी फैला दो फिर से। 

तुमसे ही उम्मीद है बाकि,
इसीलिए तुमसे कहता हूँ। 
तुम बिन चित्त नहीं हर्षाता,
मुरझाया सा मैं रहता हूँ। 

कंठ तुम्हारे बिन चुप चुप है,
प्रेम की सरगम ला दो फिर से। 
अँधेरे को काबू में कर,
धूप नयी फैला दो फिर से.... 

रेखाचित्र तुम्हे सौंपा है,
अपना इसको तुम रंग देना। 
खुशियों में तो साथ सभी दें,
दुख में भी अपना संग देना। 

"देव" प्रेम के ढ़ाई अक्षर,
कानों में बतला दो फिर से। 
अँधेरे को काबू में कर,
धूप नयी फैला दो फिर से। "

......चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-२६.०३.२०१५


Monday, 23 March 2015

♥♥शब्दाक्षर...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥शब्दाक्षर...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
सृजक हूँ, सृजन चाहता हूँ, भावों का जीवन चाहता हूँ। 
मेरे मन को भी पढ़ ले जो, ऐसा कोई मन चाहता हूँ। 
अक्षर से अक्षर का नाता, जोड़ सकूँ बस ये ख्वाहिश है,
न सोने के मुकुट की इच्छा, न चांदी का तन चाहता हूँ। 

नहीं पता क्यों प्यार है मुझको, अपने शब्दों से, अक्षर से। 
नहीं पता क्यों प्यार है मुझको, भावों के बहते सागर से। 
नहीं पता मैं क्यों शब्दों को, अपना हर एक राज बताता,
नहीं पता क्यों प्यार है मुझको, शब्दों के नीले अम्बर से। 

शब्दों को जो ममता दे वो, एक ऐसा आँगन चाहता हूँ। 
न सोने के मुकुट की इच्छा, न चांदी का तन चाहता हूँ....

प्रेम कठिन है, पीड़ा पायी, दवा नही कुछ दुआ चाहिये। 
खुलकर के जो सांस ले सकूँ, ऐसी मुझको हवा चाहिये।  
"देव" मेरे दहके मन को जो, अपने आँचल की छाया दे,
जीवन के इस पथ पर मुझको, बस इतनी सी वफ़ा चाहिये।  

व्याकुल मन को शांत कर सके, एक लुम्बिनी वन चाहता हूँ। 
न सोने के मुकुट की इच्छा, न चांदी का तन चाहता हूँ। "

......................चेतन रामकिशन "देव"........................
दिनांक-२४.०३.२०१५

Wednesday, 18 March 2015

♥♥♥सिंदूरी...♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥सिंदूरी...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
काव्य कोष में बड़ी रिक्तता, तुम आ जाओ तो पूरी हो। 
तुम्हें देखकर नयना हर्षित, मांग हमारी सिंदूरी हो। 
भाषा शैली भव्य तुम्हारी, रात दिवस तुमसे बतिआऊं,
बहुत सुगन्धित प्रेम तुम्हारा, जैसे कोई कस्तूरी हो। 

है मेरे में बहुत बचपना, मुझसे क्रोधित हुआ करो न। 
मेरा मन स्पर्श को तरसे, तुम आकर के छूआ करो न। 

साथ रहो तुम मेरे हर क्षण, नहीं तनिक सी भी दूरी हो। 
काव्य कोष में बड़ी रिक्तता, तुम आ जाओ तो पूरी हो ....

स्वप्नों का हम गठन करेंगे, साथ साथ प्रयास करेंगे। 
दुःख आएगा तो झेलेंगे, हंसने का अभ्यास करेंगे। 
"देव" परस्पर मन की उलझन, सुलझांयेंगे हम मिल जुल कर,
एक दूजे के जीवन पथ पर, आपस में विश्वास करेंगे। 

दीपक जैसे राह दिखाना, यदि तिमिर में घिर जाऊं मैं। 
मेरा प्रेम नहीं स्वयंभू,  जो कसमों से फिर जाऊं मैं। 

टूट गयी हूँ बिना तुम्हारे, नहीं कभी फिर से दूरी हो। 
काव्य कोष में बड़ी रिक्तता, तुम आ जाओ तो पूरी हो। "

.................चेतन रामकिशन "देव"......................
दिनांक-१८.०३.२०१५

Sunday, 15 March 2015

♥♥विध्वंस...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥विध्वंस...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मृत्यु चारों ओर मचलती, अब जीवन का अंश नहीं है। 
कौन सा ऐसा क्षण है जिसमें, मानो के विध्वंस नही है। 
संबंधों की हत्या करना, यहाँ प्रचलन हुआ रोज का,
शेष नही वो रक्त कोशिका, जिसमे दुख का दंश नहीं है। 

मानवता दण्डित होती है, यहाँ भाव मारे जाते हैं। 
जो सबको अपनापन देते, लोग वही हारे जाते हैं। 
अनुरोध या करुण निवेदन, नहीं मान कोई करता है,
सक्षम होकर भी कोई जन, नहीं किसी का दुख हरता है। 

बाहर से उजले हैं किन्तु, मन से कोई हंस नही है। 
मृत्यु चारों ओर मचलती, अब जीवन का अंश नहीं है.... 

बुद्धि शायद मंद है मेरी, नहीं आंकलन कर पाता हूँ। 
निर्दोषों को दंड दे सकूँ, नहीं प्रचलन कर पाता हूँ। 
"देव" सिमट जाता हूँ स्वयं मैं, अपने अश्रु पी लेता हूँ,
मैं चाहकर भी पाषाणों सा, चाल चलन नही कर पाता हूँ। 

भाषा मैंने प्रेम की बोली, हिंसा का अपभ्रंश नहीं है। 
मृत्यु चारों ओर मचलती, अब जीवन का अंश नहीं है। "

................चेतन रामकिशन "देव"....................
दिनांक-१६.०३.२०१५

Saturday, 14 March 2015

♥♥अंगारों की बारिश...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥अंगारों की बारिश...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
अंगारों की बारिश देखी, अश्क़ों का सागर देखा है। 
बिना जुर्म के सजा सही है, अपना जलता घर देखा है। 
यहाँ झूठ की चले गवाही, सच की कीमत है कौड़ी में,
कातिल के क़दमों के नीचे, कानूनों का सर देखा है। 

इंसानों की बोली लगती, रिश्तों का सौदा होता है। 
यहाँ लोग मर जायें रोकर, नहीं किसी को दुख होता है। 
रौंद की सारी मानवता को, लोग करें तेजाब की बारिश,
उजड़ेगा संसार किसी का, नहीं सोच ये डर होता है। 

यहाँ भावना की अनदेखी, और साँसों पे कर देखा है। 
अंगारों की बारिश देखी, अश्क़ों का सागर देखा है....

दो रोटी से रहे मयस्सर, मुफ़लिस भूखा मर जाता है। 
जिसको समझो सुख की सरिता, वही दर्द से भर जाता है। 
"देव" यहाँ सुनने को मिलता, प्यार खुदा का नाम जहाँ में,
तो आखिर क्यों नाम प्यार का, टुकड़े टुकड़े हो जाता है। 

न सोखा एक शख़्स ने आकर, आँखों ने बहकर देखा है।  
अंगारों की बारिश देखी, अश्क़ों का सागर देखा है। "
   
................चेतन रामकिशन "देव"....................
दिनांक-१५.०३.२०१५


♥♥प्रत्यावेदन ..♥♥



♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्रत्यावेदन ..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
यदि हमारा प्रत्यावेदन प्रेम का, जो स्वीकार हो गया। 
तो समझूंगा एहसासों का, जीवन में सत्कार हो गया। 
और यदि फिर से ठुकराया, तुमने मेरा प्रेम निवेदन,
तो निश्चित ही मेरा जीवन, कंटक, झाड़ी, ख़ार हो गया। 

दिल तेरे क़दमों में रखा, इससे ज्यादा कर न पाऊं। 
प्यार बहुत गहरा है तुमसे, कमी तुम्हारी भर न पाऊं। 

बहेंगे आंसू, काले बादल, सूरत का सिंगार हो गया। 
यदि हमारा प्रत्यावेदन प्रेम का, जो स्वीकार हो गया... 

फिर से सोचो, मेरी पीड़ा, जरा समझ लो ये कहता हूँ। 
तुमको सबको कुछ बता दिया है, बिन तेरे कैसे रहता हूँ। 
"देव" हमारा उजड़ा चेहरा, देखके सब पत्थर बरसाते,
मैं छोटे से दिल का मालिक, दुनिया भर के गम सहता हूँ। 

सब कुछ कह डाला लफ़्ज़ों ने, चलो हमें चुप हो जाने दो। 
नींद नहीं आयेगी लेकिन, झूठमूठ का सो जाने दो।

लगता है भावों का याचन,  रद्दी सा, बेकार हो गया। 
यदि हमारा प्रत्यावेदन प्रेम का, जो स्वीकार हो गया। "

...................चेतन रामकिशन "देव"..................
दिनांक-१४.०३.२०१५

Friday, 13 March 2015

♥♥♥धुंध...♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥धुंध...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
नया सवेरा आया लेकिन, धुंध नही हटती है मन की। 
उम्मीदें रखता हूँ फिर भी, क्यों टूटी है लय जीवन की। 
जिसको अपना समझा वो ही, मारके पत्थर घायल करता,
नहीं पता कब अंतिम होगी, पीड़ा मेरे अंतर्मन की। 

मुख पे झूठी हंसी दिखाकर, मैंने अश्रुपान किया है।
लोग यहाँ उपहास उड़ाते, मैंने पर सम्मान किया है। 
कोशिश की सबके घावों पर, मरहम सुख का लगा सकूँ मैं,
पर लोगों ने इसके बदले, मेरा तो अपमान किया है। 

पांव फट गये धूप में तपकर, नहीं चमक बाकी है तन की। 
नया सवेरा आया लेकिन, धुंध नही हटती है मन की ...

चलो लोग जैसा भी कर लें, उनकी नीति, उनका मन है। 
मेरे दिल में नहीं है नफरत, न हिंसा का स्पंदन है। 
"देव" हमे कुदरत ने भेजा, अंतिम साँस तलक जीने को,
इसीलिए हर ग़म सहकर के, काट लिया अपना जीवन है। 

रात की रानी नहीं महकती, सूख गयी तुलसी आँगन की। 
नया सवेरा आया लेकिन, धुंध नही हटती है मन की। "

.....................चेतन रामकिशन "देव"........................
दिनांक-१४.०३.२०१५


♥♥♥तुम बिन...♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥तुम बिन...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तुम बिन क्यों धरती सूनी है, तुम बिन क्यों अम्बर खाली है। 
तुम बिन क्यों आंसू बहते हैं, तुम बिन कैसी बेहाली है। 
तुमसे शायद मेरा नाता, है खुद के जीवन से बढ़कर,
तभी नहीं तुम बिन होली है, नहीं हमारी दीवाली है। 

अब समझा मैं प्यार में कोई, यहाँ निहित जब हो जाता है। 
तो उसके जीवन का पल पल, एहसासों में खो जाता है। 
यदि मिलन के क्षण आयें तो, वो खिल जाता है फूलों सा,
मगर विरह के एहसासों में, एक दम से मुरझा जाता है। 

तभी मैं सोचूं क्यों बिन तेरे, सूख गयी हर एक डाली है, 
तुम बिन क्यों धरती सूनी है, तुम बिन क्यों अम्बर खाली है ...

नहीं पता तुम कब आओगे, हर दिन जीवन कम होता है। 
बिना तुम्हारे हंसना भूला, इतना ज्यादा ग़म होता है। 
"देव" न जाने तुम क्यों आखिर, नहीं समझते मेरी बेबसी,
मेरी पीड़ा देखके जबकि, आसमान भी नम होता है। 

बिना तुम्हारे धवल चांदनी, मेरी खातिर तो काली है। 
तुम बिन क्यों धरती सूनी है, तुम बिन क्यों अम्बर खाली है। "

......................चेतन रामकिशन "देव"........................
दिनांक-१३.०३.२०१५

Thursday, 12 March 2015

♥♥इतिहास...♥♥



♥♥♥♥♥इतिहास...♥♥♥♥♥♥♥
प्रेम का हर इतिहास तुम्ही से। 
कायम है एहसास तुम्ही से। 
तुम वर्णित हो प्रेम कथा में,
बरसाने का रास तुम्ही से। 
तुम्हे देखकर हंस लेता हूँ,
मेरा हर उल्लास तुम्ही से। 
तुम मुझको प्रेरित करती हो,
है मेरा प्रयास तुम्ही से। 

तुम वीणा की मधुर तान में,
तुम गायन के सात स्वर में। 
खुशियां आँगन में रहती हैं,
तुमसे ही रौनक है घर में। 

तुमसे हरी भरी पृथ्वी है,
और नीला आकाश तुम्ही से। 
तुम मुझको प्रेरित करती हो,
है मेरा प्रयास तुम्ही से ...

तुम रंगोली के रंगों में,
तुमसे आलेखन बनता है। 
बिना तुम्हारे मैं अपूर्ण हूँ,
तुमसे ही जीवन बनता है। 
केश तुम्हारे इतने प्यारे,
मुझे बचाते कड़ी धूप से,
तुम घर की आधार कड़ी हो,
तुमसे ही आँगन बनता है। 

तुमसे ही कविता रचती है,
भावों का अभ्यास तुम्ही से। 
तुम मुझको प्रेरित करती हो,
है मेरा प्रयास तुम्ही से ...

तुम आकर्षक, मनोहारी हो,
और आत्मा से प्यारी हो। 
एक दूजे के एहसासों में,
जीवन की साझेदारी हो। 
"देव" तुम्हारे प्रेम को पाकर,
पतझड़ में सावन बरसा है,
तुम बगिया की हरियाली में,
तुम फूलों की फुलवारी हो। 

तुम्ही साल में, तुम जीवन भर,
दिवस, निशा, हर मास तुम्ही से। 
तुम मुझको प्रेरित करती हो,
है मेरा प्रयास तुम्ही से। "

.....चेतन रामकिशन "देव".......
दिनांक-१२.०३.२०१५

Wednesday, 11 March 2015

♥♥फसल...♥♥


♥♥♥♥♥♥फसल...♥♥♥♥♥♥♥
फसल ग़मों की बड़ी हो गयी,
करें काटने की तैयारी। 
विष पीकर के रात कटी थी,
अब आयी है दिन की बारी। 
अपने हर एहसास को मैंने,
मिट्टी में अब मिला दिया है,
क्यूंकि दुनिया में नहीं होती,
दिल से दिल की नातेदारी। 

एहसासों की कद्र नहीं है,
सभी वसीयत चाहते सुख की। 
कोई नहीं पढ़ना चाहता है,
पीड़ा यहाँ किसी के मुख की। 

कोई नहीं हमदर्द है तो फिर,
दर्द की किससे साझेदारी। 
फसल ग़मों की बड़ी हो गयी,
करें काटने की तैयारी ... 

अनुकरण के भाव नहीं हैं,
सब उपदेशक बनना चाहें। 
खुद का जीवन नहीं संभलता,
पर निर्देशक बनना चाहें। 
"देव" यहाँ पर मिन्नत कोई,
नहीं सुना करता है देखो,
लेकिन पुस्तक के पन्नों पर,
प्रेम के प्रेषक बनना चाहें।

दिवस रात बढ़ती रहती है, 
जीवन में ग़म बीमारी।  
फसल ग़मों की बड़ी हो गयी,
करें काटने की तैयारी। "

.......चेतन रामकिशन "देव"........
दिनांक-१२.०३.२०१५

♥♥नीला आसमान...♥


♥♥♥नीला आसमान...♥♥♥
तुम से है एहसास सजीला। 
ग़ुल सरसों का तुमसे पीला। 
तुम आयीं तो दमक उठा मन,
जीवन मेरा रंग रंगीला। 
सखी प्रेम की वर्षा कर दो,
हो जाये पतझड़ भी गीला। 
हम दोनों का प्यार देखकर,
आसमान भी होता नीला। 

सखी दूर जब तुम जाती हो,
तो रोने का मन होता है। 
बिना तुम्हारे नहीं रात को,
भी सोने का मन होता है। 
हाथ थामकर तेरा जग में,
अपनी सुबहो शाम करूँ मैं,
तेरे प्यार के इन्द्रधनुष में,
बस खोने का मन होता है। 

तुमसे ही खुश होता आँगन,
तुमसे कुनबा और कबीला। 
हम दोनों का प्यार देखकर,
आसमान भी होता नीला ...

सखी परस्पर एहसासों में,
जब हम दोनों मिल जाते हैं। 
मन से ग़म का पतझड़ मिटता,
फूल ख़ुशी के खिल जाते हैं। 
"देव" तुम्हारा कुछ लम्हों का,
साथ मुझे देता है ऊर्जा,
तुमसे मिलकर खुशहाली के,
द्वार अनेकों खुल जाते हैं। 

तेरी प्रेम की ऊर्जा पाकर,
गिर जाता है ग़म का टीला। 
हम दोनों का प्यार देखकर,
आसमान भी होता नीला। "

........चेतन रामकिशन "देव".........
दिनांक-११.०३.२०१५

Tuesday, 10 March 2015

♥♥♥गुलदस्ते...♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥गुलदस्ते...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
सोचा था कुछ फूल खिलेंगे, यही सोच गुलदस्ते लाया।
अरसा बीता किसी डाल पर, फूल कोई लेकिन न आया।
यूँ तो मैंने हर दम उसको, अपने अश्कों से सींचा था,
रही कौनसी कमी आज तक, नहीं किसी ने भी समझाया।

नागफनी जैसी रातें हों और कंटीला दिन होता है।
ऑंखें रोकर लाल हो गयीं हैं, और हमारा मन रोता है।
मंचों पर जाकर पढ़ते वो, प्रेम भाव की बड़ी कविता,
पर सीने में झांकके देखो, उनका छोटा दिल होता है।

किस्मत को मंजूर न शायद, हसीं बहारों का वो साया।
सोचा था कुछ फूल खिलेंगे, यही सोच गुलदस्ते लाया...

चलो मुझे पतझड़ प्यारा है, और बिना गुल की डाली भी।
जो दे दो मंजूर  है मुझको, तड़प, वेदना, तंगहाली भी।
"देव" यदि तुम खुश होते हो, मेरे घर को फूंक फूंककर,
तो आ जाओ, नहीं रोकता, चलो मना लो दिवाली भी।

मेरी तो आदत है यारों, दुश्मन को भी गले लगाया।
सोचा था कुछ फूल खिलेंगे, यही सोच गुलदस्ते लाया। "

 ...................चेतन रामकिशन "देव"..................
दिनांक-१०.०३.२०१५







 

Monday, 9 March 2015

♥♥मेरे मन की...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥मेरे मन की...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मेरे मन की भी सुनते तुम, बस अपना निर्णय देते हो। 
मेरा जीवन शांत नदी सा, लेकिन तुम प्रलय देते हो। 
तुम अपनी खातिर खुशियों का, ताना बाना बुनना चाहो,
लेकिन मेरी हंसी ख़ुशी में, तुम क्यों आखिर क्षय देते हो। 

इस एकतरफा सोच को देखो, नहीं प्रीत बोला जाता है। 
प्रीत के रिश्ते को दुनिया में, न धन से तौला जाता है। 

मुझे गिराकर क्यों तुम आखिर, सोच को अपनी जय देते हो। 
मेरे मन की भी सुनते तुम, बस अपना निर्णय देते हो...

तुमसे अपनी प्रीत के बदले, बस थोड़ा सा प्यार ही चाहा। 
नाम मुझे तुम दे दो अपना, इतना सा ही अधिकार ही चाहा। 
"देव" तुम्हे मैंने जीवन में, मान दिया है खुद से ज्यादा,
मैंने तुमसे उसके बदले, मुट्ठी भर सत्कार ही चाहा। 

काश मेरी चीखों को सुनकर, निकट हमारे तुम आ जाते। 
सच कहती हूँ मेरे मन पे, चाहत के बादल छा जाते। 

मैं चाहती हूँ मिलन प्यार का, तुम विरह का भय देते हो। 
मेरे मन की भी सुनते तुम, बस अपना निर्णय देते हो। "


....................चेतन रामकिशन "देव".....................
दिनांक-०९.०३.२०१५