Monday, 10 October 2011
♥♥महर्षि बाल्मीकि ♥♥♥
"♥♥♥♥♥♥♥♥महर्षि बाल्मीकि ♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
आदि कवि के रूप में उनकी सदा रही पहचान!
उनके कलम से हुआ है, प्रकट रामायण का ज्ञान!
ओजस्वी और तेजस्वी जन, नहीं जात में बंधते,
सभी को समरसता देते हैं, उनके कर्म महान!
आओ महर्षि के चरणों में, नमन करें हम लोग!
उनसे सीखें ज्ञान, अहिंसा, सच्चाई का योग!
स्वर्ण रंगों से अंकित होता उनका उज्जवल नाम!
आदि कवि के रूप में उनकी सदा रही पहचान!"
"महर्षि बाल्मीकि जी के प्रकट दिवस पर, उन्हें नमन करें!
उनके जीवन दर्शन से सत्य, अहिंसा, साहित्य, सद्भाव को
ग्रहण करें!-----------चेतन रामकिशन "देव"
आदि कवि के रूप में उनकी सदा रही पहचान!
उनके कलम से हुआ है, प्रकट रामायण का ज्ञान!
ओजस्वी और तेजस्वी जन, नहीं जात में बंधते,
सभी को समरसता देते हैं, उनके कर्म महान!
आओ महर्षि के चरणों में, नमन करें हम लोग!
उनसे सीखें ज्ञान, अहिंसा, सच्चाई का योग!
स्वर्ण रंगों से अंकित होता उनका उज्जवल नाम!
आदि कवि के रूप में उनकी सदा रही पहचान!"
"महर्षि बाल्मीकि जी के प्रकट दिवस पर, उन्हें नमन करें!
उनके जीवन दर्शन से सत्य, अहिंसा, साहित्य, सद्भाव को
ग्रहण करें!-----------चेतन रामकिशन "देव"
Wednesday, 5 October 2011
♥♥ पुतला दहन दशानन ♥ ♥
"♥ ♥ ♥ ♥ ♥♥ पुतला दहन दशानन ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥
दुरित सोच का अंत नहीं है, नहीं सत्य का पालन!
ऐसे में बस लगे निरर्थक, पुतला दहन दशानन!
आज भी सीता को हरते हैं, देश में ढेरों रावण!
अपने झूठ के सम्मुख लगता, उनको सच साधारण!
गली गली हर चौराहे पर रावण हैं उजले से,
मन से अपने भुला रहे हैं, राम के शुद्ध उदाहरण!
श्री राम की मर्यादा का नहीं हो रहा पालन!
ऐसे में बस लगे निरर्थक, पुतला दहन दशानन............
अपने मन के चिंतन में हम नहीं घोलते शुद्धि!
झूठ बोलकर बनना ऊँचा, लगता है उपलब्धि!
मानवता का नाम न जिसमें ऐसा जीवन व्यर्थ,
औरों का सुख लूटके करते, जीवन में सम्रद्धि!
अपने हित के लिए हो रहा मिथ्या का सञ्चालन!
ऐसे में बस लगे निरर्थक, पुतला दहन दशानन............
आओ विजय के पर्व से सीखें, सत्यव्रत का ज्ञान!
अपने मन में लायें नम्रता, त्याग चलें अभिमान!
यदि सोच को हमने अपनी नहीं बनाया बेहतर,
कहाँ मनों से हो पायेगा, रावण का अवसान!
आओ सत्य के पदचिन्हों को, करें मनों में धारण!
तभी सार्थक हो पायेगा, पुतला दहन दशानन!"
"तो आइये चिंतन करें, मनन करें! त्योहारों से प्रेरणा लें, अपने मन से रावण का अंत करना होगा, तभी दशानन का पुतला दहन करने में सार्थकता आएगी!-चेतन रामकिशन "देव"
Monday, 26 September 2011
♥♥♥♥♥...नहीं देश से प्यार ♥
"♥♥♥♥♥♥♥♥...नहीं देश से प्यार ♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
हमको अपने हित से मतलब, नहीं देश से प्यार |
हमको मतलब नहीं देश की कैसी हो सरकार |
हमको क्या ये देश बिके या हो जाये ये राख,
इसी सोच से इस भारत के टुकड़े हुए हजार |
देश प्रेम का समझ न पाए हम जीवन में अर्थ |
ऐसा जीवन तो निष्फल है और साँस भी व्यर्थ |
माँ जननी के करुण रुदन की हम न सुने पुकार |
हमको अपने हित से मतलब, नहीं देश से प्यार.....
जात धर्म के नाम पे करते हम अपना मतदान |
खुद की झोली भरे भले ही देश का हो नुकसान |
अपनेपन की सोच नहीं है समरसता बेजान,
हम अब खुद ही बेच रहे हैं अपना हिंदुस्तान |
माँ जननी का ह्रदय दुखाकर हम गाते हैं गीत |
अब तो मन में नहीं रही है माँ जननी से प्रीत |
देश का नक्शा नहीं नयन में, याद नहीं आकार |
हमको अपने हित से मतलब, नहीं देश से प्यार...
प्रेम जगाओ माँ जननी से, नहीं करो अपमान |
देश की इज्जत होती ऐसी, जैसे माँ का मान |
"देव" यदि न बदलोगे तुम अपने मन की सोच,
मिट जायगी कुछ वर्षों में, देश की हर पहचान |
देश को सबसे ऊपर रखकर, लो मन में संकल्प |
माँ जननी सा नहीं दूसरा, न ही कोई विकल्प |
देश प्रेम के मधुर भाव की, हरदम करें फुहार |
हमको अपने हित से मतलब, नहीं देश से प्यार |"
"सोचिये हम कहाँ हैं? क्या देश के प्रति हमारा कोई उत्तरदायित्व नहीं है? क्या हम केवल अपने हित साधने के लिए इस पवित्र भूमि पर जन्मे हैं | चिंतन तो करना होगा, वरना ये देश आने वाले कुछ समय में फिर से देशी और विदेशी ताक़तों का गुलाम होगा |- चेतन रामकिशन "देव"
हमको अपने हित से मतलब, नहीं देश से प्यार |
हमको मतलब नहीं देश की कैसी हो सरकार |
हमको क्या ये देश बिके या हो जाये ये राख,
इसी सोच से इस भारत के टुकड़े हुए हजार |
देश प्रेम का समझ न पाए हम जीवन में अर्थ |
ऐसा जीवन तो निष्फल है और साँस भी व्यर्थ |
माँ जननी के करुण रुदन की हम न सुने पुकार |
हमको अपने हित से मतलब, नहीं देश से प्यार.....
जात धर्म के नाम पे करते हम अपना मतदान |
खुद की झोली भरे भले ही देश का हो नुकसान |
अपनेपन की सोच नहीं है समरसता बेजान,
हम अब खुद ही बेच रहे हैं अपना हिंदुस्तान |
माँ जननी का ह्रदय दुखाकर हम गाते हैं गीत |
अब तो मन में नहीं रही है माँ जननी से प्रीत |
देश का नक्शा नहीं नयन में, याद नहीं आकार |
हमको अपने हित से मतलब, नहीं देश से प्यार...
प्रेम जगाओ माँ जननी से, नहीं करो अपमान |
देश की इज्जत होती ऐसी, जैसे माँ का मान |
"देव" यदि न बदलोगे तुम अपने मन की सोच,
मिट जायगी कुछ वर्षों में, देश की हर पहचान |
देश को सबसे ऊपर रखकर, लो मन में संकल्प |
माँ जननी सा नहीं दूसरा, न ही कोई विकल्प |
देश प्रेम के मधुर भाव की, हरदम करें फुहार |
हमको अपने हित से मतलब, नहीं देश से प्यार |"
"सोचिये हम कहाँ हैं? क्या देश के प्रति हमारा कोई उत्तरदायित्व नहीं है? क्या हम केवल अपने हित साधने के लिए इस पवित्र भूमि पर जन्मे हैं | चिंतन तो करना होगा, वरना ये देश आने वाले कुछ समय में फिर से देशी और विदेशी ताक़तों का गुलाम होगा |- चेतन रामकिशन "देव"
Friday, 23 September 2011
♥ प्रेम के टूटे तार ♥♥♥♥
"♥♥♥♥♥♥♥♥ प्रेम के टूटे तार ♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तुम बिन अब तो हुआ अधूरा मेरा घर संसार!
तोड़ दिए हैं जब से तुमने प्रेम के कोमल तार!
कहाँ गए वो स्नेह, मधुरुता, कहाँ गयीं सौगंध!
कहाँ गया वो प्रेम का दर्पण, कहाँ गया सम्बन्ध!
एक पल ही में तुमने कैसे प्रेम के सोखे प्राण,
तुमने मिश्रित की वायु में विरहा की क्यूँ गंध!
तुम बिन न ही जल भाता है न भाता आहार!
तोड़ दिए हैं जब से तुमने प्रेम के कोमल तार........
तुम बिन मन की चंचलता के सुप्त हुए हैं भाव!
प्रेम की इस पीड़ा ने मन को किये हैं प्रेषित घाव!
अब तक उत्तर खोज रहा हूँ, हूँ किन्तु अनभिज्ञ,
किस कारण से तुमने खुद में ढाले थे बदलाव!
यदि कमी थी हम में कोई, कहते तो एक बार!
तोड़ दिए हैं जब से तुमने प्रेम के कोमल तार........
देह के नाता टूट गया है, मन में किन्तु वास!
एक दिन मेरी कमी का तुमको भी होगा आभास!
प्रेम की पीड़ा की व्याकुलता पल पल देती शूल,
इस पीड़ा में जीवन धारा भी न आती रास!
विजय सिखाकर ही तुम हमको क्यूँ दे बैठे हार!
तोड़ दिए हैं जब से तुमने प्रेम के कोमल तार!"
"प्रेम, में मिलने वाली पीड़ा बहुत घातक होती है! इससे व्यक्ति के आत्मविश्वास, लक्ष्य और गतिशीलता पर भी प्रभाव पड़ता है! तो आइये प्रयास करें कि किसी को प्रेम की पीड़ा न दें!-चेतन रामकिशन "देव"
तुम बिन अब तो हुआ अधूरा मेरा घर संसार!
तोड़ दिए हैं जब से तुमने प्रेम के कोमल तार!
कहाँ गए वो स्नेह, मधुरुता, कहाँ गयीं सौगंध!
कहाँ गया वो प्रेम का दर्पण, कहाँ गया सम्बन्ध!
एक पल ही में तुमने कैसे प्रेम के सोखे प्राण,
तुमने मिश्रित की वायु में विरहा की क्यूँ गंध!
तुम बिन न ही जल भाता है न भाता आहार!
तोड़ दिए हैं जब से तुमने प्रेम के कोमल तार........
तुम बिन मन की चंचलता के सुप्त हुए हैं भाव!
प्रेम की इस पीड़ा ने मन को किये हैं प्रेषित घाव!
अब तक उत्तर खोज रहा हूँ, हूँ किन्तु अनभिज्ञ,
किस कारण से तुमने खुद में ढाले थे बदलाव!
यदि कमी थी हम में कोई, कहते तो एक बार!
तोड़ दिए हैं जब से तुमने प्रेम के कोमल तार........
देह के नाता टूट गया है, मन में किन्तु वास!
एक दिन मेरी कमी का तुमको भी होगा आभास!
प्रेम की पीड़ा की व्याकुलता पल पल देती शूल,
इस पीड़ा में जीवन धारा भी न आती रास!
विजय सिखाकर ही तुम हमको क्यूँ दे बैठे हार!
तोड़ दिए हैं जब से तुमने प्रेम के कोमल तार!"
"प्रेम, में मिलने वाली पीड़ा बहुत घातक होती है! इससे व्यक्ति के आत्मविश्वास, लक्ष्य और गतिशीलता पर भी प्रभाव पड़ता है! तो आइये प्रयास करें कि किसी को प्रेम की पीड़ा न दें!-चेतन रामकिशन "देव"
Sunday, 11 September 2011
♥ पश्चिम का तूफान ♥♥ ♥ ♥ ♥
" ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ पश्चिम का तूफान ♥♥ ♥ ♥ ♥ ♥
देश की लाज को मिटा रहा है, पश्चिम का तूफान!
लड़की सर पे आंचल रखना, समझ रही अपमान!
लड़कों ने भी नैतिकता का बंद किया अध्याय,
हवा में उड़ना चाहते जबकि आती नहीं उड़ान!
पश्चिम से हम महज सीखते नंगेपन की सोच!
उनके ज्ञान को अपनाने में करते पर संकोच!
उनको बस भाती है "ब्रिटनी", भूल "मदर" का नाम!
देश की लाज को मिटा रहा है, पश्चिम का तूफान......
नहीं रहें हैं याद "डार्विन" न ही "जेम्स" की याद!
भूल गए हैं "रदरफोर्ड" को, याद नहीं संवाद!
इन लोगों से न हम पाते ज्ञान की निर्मल धार,
क्यूँ फिर देश की संस्कृति को हम करते बर्बाद!
दोहरेपन की सोच बनी है, मन में पलें विकार!
नंगेपन को अपनाते हैं, ज्ञान का कार दुत्कार!
इन लोगों के भूल गए हैं हम तो कर्म महान!
देश की लाज को मिटा रहा है, पश्चिम का तूफान.....
हाँ ये सच है नहीं है सारा इन लोगों को दोष!
मात पिता भी कर्तव्यों का नहीं रख रहे होश!
बैठके अपने लाल के आगे पिता करे मधपान,
बेटी नैतिकता त्यागे पर नहीं है माँ को रोष!
बेटे को "न्यूटन" बनने का नहीं कराते बोध!
"मैडम क्यूरी" बने जो बेटी नहीं हैं वो उद्बोध!
मात पिता की सीख सिखाती इनको झूठी शान!
देश की लाज को मिटा रहा है, पश्चिम का तूफान!"
"दोहरी सोच क्यूँ? बस अपसंस्कृति ही ग्रहण की जाती है! पर वहां के महान शिक्षा विदों से कोई ज्ञान नहीं! आखिर क्यूँ, कम वस्त्र पहनने या व्यसन करने या झूठी शान से,
सम्रद्ध इतिहास का निर्माण तो नहीं हो सकता, हाँ ये हो सकता है कि," आपका नाम काजल से जरुर लिखा जा सकता है! आइये चिंतन करें- चेतन रामकिशन "देव"
Wednesday, 7 September 2011
♥ ..टूट रहे सम्बन्ध ♥ ♥
""♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ..टूट रहे सम्बन्ध ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥
अपने भी अब बदल रहें हैं टूट रहे सम्बन्ध!
अब अपनों के खून से आती बारूदों की गंध!
कोई सताता अपनी माँ को, भाई कहीं दुश्मन,
एक ही पल में टूट रहें हैं जन्मों के अनुबंध!
कोई पति अपनी पत्नी पर करता अत्याचार!
कहीं कोई पत्नी भी करती पत्थर सा व्यवहार!
एक पल में ही जला रहे वो सात वचन गठबन्ध!
अपने भी अब बदल रहें हैं टूट रहे सम्बन्ध.......
हुए संकुचित घर भी अपने, और अपने परिवार!
भाई ने भाई के बीच लगाई, नफरत की दीवार!
अब बच्चे भी त्याग रहें हैं मात पिता का प्यार,
अब खाली खंडहर दिखते हैं, नहीं रहे घर-द्वार!
जगह जगह हम करते हैं अब अपनों का अपमान!
ना ही सेवा मात पिता की , ना उनका सम्मान!
उनकी भूख मिटाने का भी भूल गए प्रबंध!
अपने भी अब बदल रहें हैं टूट रहे सम्बन्ध.......
अपनों का सम्मान करो तुम, देकर उनको प्यार!
अपनों के दिल में ना घोंपो, ना खंजर तलवार!
अपनों की पीड़ा बांटो तुम बनकर के हमदर्द,
जो बंटवारा करे दिलों का, गिरा दो वो दीवार!
अपनेपन की महक से महके अपना ये घरवार!
कभी ना खंडित करना लोगों तुम अपनों का प्यार!
स्वार्थ से अपनी आँखों को तुम, करो ना ऐसे अंध!
अपने भी अब बदल रहें हैं टूट रहे सम्बन्ध"
"आइये संबंधो को जोड़ने का, कायम रखने का प्रयास करैं, जब आपस में प्रेम होगा तभी हम समाज से, देश से प्रेम कर सकेंगे! इसके लिए समर्पण और नम्रता अपनानी होगी! आइये चिंतन करें, इन टूटते संबंधों पर, क्या पता अगला टूटता सम्बन्ध हम सब में से ही हो-चेतन रामकिशन "देव"
अपने भी अब बदल रहें हैं टूट रहे सम्बन्ध!
अब अपनों के खून से आती बारूदों की गंध!
कोई सताता अपनी माँ को, भाई कहीं दुश्मन,
एक ही पल में टूट रहें हैं जन्मों के अनुबंध!
कोई पति अपनी पत्नी पर करता अत्याचार!
कहीं कोई पत्नी भी करती पत्थर सा व्यवहार!
एक पल में ही जला रहे वो सात वचन गठबन्ध!
अपने भी अब बदल रहें हैं टूट रहे सम्बन्ध.......
हुए संकुचित घर भी अपने, और अपने परिवार!
भाई ने भाई के बीच लगाई, नफरत की दीवार!
अब बच्चे भी त्याग रहें हैं मात पिता का प्यार,
अब खाली खंडहर दिखते हैं, नहीं रहे घर-द्वार!
जगह जगह हम करते हैं अब अपनों का अपमान!
ना ही सेवा मात पिता की , ना उनका सम्मान!
उनकी भूख मिटाने का भी भूल गए प्रबंध!
अपने भी अब बदल रहें हैं टूट रहे सम्बन्ध.......
अपनों का सम्मान करो तुम, देकर उनको प्यार!
अपनों के दिल में ना घोंपो, ना खंजर तलवार!
अपनों की पीड़ा बांटो तुम बनकर के हमदर्द,
जो बंटवारा करे दिलों का, गिरा दो वो दीवार!
अपनेपन की महक से महके अपना ये घरवार!
कभी ना खंडित करना लोगों तुम अपनों का प्यार!
स्वार्थ से अपनी आँखों को तुम, करो ना ऐसे अंध!
अपने भी अब बदल रहें हैं टूट रहे सम्बन्ध"
"आइये संबंधो को जोड़ने का, कायम रखने का प्रयास करैं, जब आपस में प्रेम होगा तभी हम समाज से, देश से प्रेम कर सकेंगे! इसके लिए समर्पण और नम्रता अपनानी होगी! आइये चिंतन करें, इन टूटते संबंधों पर, क्या पता अगला टूटता सम्बन्ध हम सब में से ही हो-चेतन रामकिशन "देव"
Tuesday, 6 September 2011
♥ तेरा प्यार ♥
"♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ तेरा प्यार ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥
ख़ुशी बहुत होती है हमदम पाकर तेरा प्यार!
नील गगन में उड़ता हूँ मैं अब तो पंख पसार!
धूप हो कितनी तेज मगर अब जलन नहीं होती,
प्रेम तेरा गिरता है मुझपर बनकर मधुर फुहार!
जब से तूने मुझे लगाया प्यार का सुन्दर रंग!
जीवन में आयीं हैं खुशियाँ पाकर तेरा संग!
तूने मेरे गिरते पग को दिया है एक आधार!
ख़ुशी बहुत होती है हमदम पाकर तेरा प्यार....
हमदम तेरे प्रेम से सीखा सच्चाई का ज्ञान!
तेरे प्रेम में भूल गया हूँ क्या होता अभिमान!
तुमने उर्जा दी है मन को, होठों पे मुस्कान,
प्रेम बिना मानव सूना है, आज लिया ये जान!
तेरा प्यार है गंगाजल सा, पावन और पुनीत!
साथ हमेशा रहना साथी बनकर मेरे मीत!
भूख से व्याकुल होता हूँ तो देती तू आहार!
ख़ुशी बहुत होती है हमदम पाकर तेरा प्यार....
प्रेम जगाये मन मंदिर में मानवता के भाव!
प्रेम दवा से पहले भरता, हर एक गहरा घाव!
प्रेम तुम्हारा पाकर के है "देव" बड़ा हर्षित,
तुमने मुझको सरल बनाया देकर के सदभाव!
तेरे प्यार की बजती मेरे मन में मधुर तरंग!
तेरे प्यार में भूल गया हूँ नीरसता के ढंग!
महक रहा तेरी खुश्बू से, मेरा ये घरवार!
ख़ुशी बहुत होती है हमदम पाकर तेरा प्यार!"
"जहाँ शुद्ध प्रेम होता है, वहां अपनत्व होता है! उर्जा होती है, साहस होता है, उड़ने को होंसला होता है, स्वाभिमान, कोमलता, सदभाव होता है! तो आइये इन सब को अपनाने के लिए शुद्ध प्रेम करैं- चेतन रामकिशन "देव"
ख़ुशी बहुत होती है हमदम पाकर तेरा प्यार!
नील गगन में उड़ता हूँ मैं अब तो पंख पसार!
धूप हो कितनी तेज मगर अब जलन नहीं होती,
प्रेम तेरा गिरता है मुझपर बनकर मधुर फुहार!
जब से तूने मुझे लगाया प्यार का सुन्दर रंग!
जीवन में आयीं हैं खुशियाँ पाकर तेरा संग!
तूने मेरे गिरते पग को दिया है एक आधार!
ख़ुशी बहुत होती है हमदम पाकर तेरा प्यार....
हमदम तेरे प्रेम से सीखा सच्चाई का ज्ञान!
तेरे प्रेम में भूल गया हूँ क्या होता अभिमान!
तुमने उर्जा दी है मन को, होठों पे मुस्कान,
प्रेम बिना मानव सूना है, आज लिया ये जान!
तेरा प्यार है गंगाजल सा, पावन और पुनीत!
साथ हमेशा रहना साथी बनकर मेरे मीत!
भूख से व्याकुल होता हूँ तो देती तू आहार!
ख़ुशी बहुत होती है हमदम पाकर तेरा प्यार....
प्रेम जगाये मन मंदिर में मानवता के भाव!
प्रेम दवा से पहले भरता, हर एक गहरा घाव!
प्रेम तुम्हारा पाकर के है "देव" बड़ा हर्षित,
तुमने मुझको सरल बनाया देकर के सदभाव!
तेरे प्यार की बजती मेरे मन में मधुर तरंग!
तेरे प्यार में भूल गया हूँ नीरसता के ढंग!
महक रहा तेरी खुश्बू से, मेरा ये घरवार!
ख़ुशी बहुत होती है हमदम पाकर तेरा प्यार!"
"जहाँ शुद्ध प्रेम होता है, वहां अपनत्व होता है! उर्जा होती है, साहस होता है, उड़ने को होंसला होता है, स्वाभिमान, कोमलता, सदभाव होता है! तो आइये इन सब को अपनाने के लिए शुद्ध प्रेम करैं- चेतन रामकिशन "देव"
Friday, 26 August 2011
सोच का परिवर्तन
"♥♥♥♥♥♥सोच का परिवर्तन ♥♥♥♥♥♥
मन में अपने प्रेम रखो तुम, होठों पे मुस्कान!
आगे बढ़ने से पहले पर, त्याग चलो अभिमान!
साहस को जीवन में भरके, सच्चाई के साथ,
मजहब से ऊपर उठकर के, बनो जरा इंसान!
नैतिकता और मर्यादा का कभी न करना ह्रास!
ना कमजोरी लाना मन में, ना टूटे विश्वास!
सबको अपने गले लगाओ, सबको दो सम्मान!
मन में अपने प्रेम रखो तुम, होठों पे मुस्कान...............
जीवन में मुश्किल से डरकर, ना होना भयभीत!
कदम बढ़ाना सही दिशा में, मिलेगी तुमको जीत!
किसी के घावों पर मरहम का तुम कर देना लेप,
पत्थर में भी जग जाएगी, मानव जैसे प्रीत!
कभी उड़ाना ना निर्धन का, तुम मित्रों उपहास!
नहीं कोई ऊँचा नीचा है, सब अपने हैं खास!
मानवता का कभी ना करना तुम कोई अपमान!
मन में अपने प्रेम रखो तुम, होठों पे मुस्कान............
मृत्य का भय करना छोड़ो, ना मानो तुम हार!
खुद तुममें ईश्वर रहता है, तुम हो रचनाधार!
"देव" जगाओ अपने मन में तुम चिंतन की सोच,
ऐसा एक इतिहास बनाओ, याद करे संसार!
सच्चाई के दम के आगे तो झुकता आकाश!
आओ करें हम इस जीवन में एक ऐसा प्रकाश!
इन शब्दों से आप सभी का करता हूँ आह्वान!
मन में अपने प्रेम रखो तुम, होठों पे मुस्कान!"
"जीवन, महज जीने का नाम नहीं है! बल्कि कुछ कर दिखाने का, इतिहास बनाने का नाम है! एक दूजे से प्रेम करने का नाम है! तो आइये सोच का परिवर्तन करें!-चेतन रामकिशन "देव"
मन में अपने प्रेम रखो तुम, होठों पे मुस्कान!
आगे बढ़ने से पहले पर, त्याग चलो अभिमान!
साहस को जीवन में भरके, सच्चाई के साथ,
मजहब से ऊपर उठकर के, बनो जरा इंसान!
नैतिकता और मर्यादा का कभी न करना ह्रास!
ना कमजोरी लाना मन में, ना टूटे विश्वास!
सबको अपने गले लगाओ, सबको दो सम्मान!
मन में अपने प्रेम रखो तुम, होठों पे मुस्कान...............
जीवन में मुश्किल से डरकर, ना होना भयभीत!
कदम बढ़ाना सही दिशा में, मिलेगी तुमको जीत!
किसी के घावों पर मरहम का तुम कर देना लेप,
पत्थर में भी जग जाएगी, मानव जैसे प्रीत!
कभी उड़ाना ना निर्धन का, तुम मित्रों उपहास!
नहीं कोई ऊँचा नीचा है, सब अपने हैं खास!
मानवता का कभी ना करना तुम कोई अपमान!
मन में अपने प्रेम रखो तुम, होठों पे मुस्कान............
मृत्य का भय करना छोड़ो, ना मानो तुम हार!
खुद तुममें ईश्वर रहता है, तुम हो रचनाधार!
"देव" जगाओ अपने मन में तुम चिंतन की सोच,
ऐसा एक इतिहास बनाओ, याद करे संसार!
सच्चाई के दम के आगे तो झुकता आकाश!
आओ करें हम इस जीवन में एक ऐसा प्रकाश!
इन शब्दों से आप सभी का करता हूँ आह्वान!
मन में अपने प्रेम रखो तुम, होठों पे मुस्कान!"
"जीवन, महज जीने का नाम नहीं है! बल्कि कुछ कर दिखाने का, इतिहास बनाने का नाम है! एक दूजे से प्रेम करने का नाम है! तो आइये सोच का परिवर्तन करें!-चेतन रामकिशन "देव"
Thursday, 25 August 2011
♥बिकता बदन...♥♥♥
♥♥♥♥♥♥♥बिकता बदन...♥♥♥♥♥♥♥♥♥
"बदन बिक रहा ऐसे तेरा जैसे हो सामान!
उस कोठे की दीवारों में, हुयी है तू गुमनाम!
सब चाहते हैं तेरे तन को, न वो मन की पीर,
तुझको कहाँ समझते हैं वो खुद जैसा इंसान!
झूठ मूठ का तेरा सजना, धूमिल है श्रृंगार!
इन लोगों ने बना दिया है, नारी को व्यापार!
खून के आंसू रोती है तू, सपने भी बेजान!
बदन बिक रहा ऐसे तेरा जैसे हो सामान......
इस पिंजरे में रहती है तू, बनकर के लाचार!
यदि कभी कुछ कहना चाहे, तो होते प्रहार!
तुझे दे दिया जाता पल में बाजारू का नाम,
तुझे परोसा जाता ऐसे जैसे हो उपहार!
तेरी दशा है कितनी पीड़ित, क्या होगा अंदाज!
तेरे करुण रुदन से बजता, तेरे मन का साज!
बाहर से तू रोशन रहती, भीतर से वीरान!
बदन बिक रहा ऐसे तेरा जैसे हो सामान......
कौन सुनेगा इनकी पीड़ा, बने कौन हमदर्द!
नहीं मदद करता है कोई, सब देते हैं दर्द!
"देव" न जाने कब तक होगा नारी का व्यापार,
तू बिकती है हर मौसम में, गर्मी हो या सर्द!
तेरी वेदना इतनी व्यापक, लघु मेरे उदगार!
"देव" तेरे तो दर्द का केवल, छोटा हिस्सेदार!
इस पिंजरे में ही कट जाती, तेरी उम्र तमाम!
बदन बिक रहा ऐसे तेरा जैसे हो सामान!"
" सच में जाने कितनी अनगिनत ये महिलायें/ लड़कियां, बिक रही हैं! बिकना इनका लक्ष्य नहीं था, किन्तु इसी समाज के लोगों ने उसे इस दशा पर पहुँचाया है! क्या कभी इनका उत्थान हो सकेगा! या बस ये सिसक सिसक कर दम तोड़ती रहेंगी! =चेतन रामकिशन "देव"
"बदन बिक रहा ऐसे तेरा जैसे हो सामान!
उस कोठे की दीवारों में, हुयी है तू गुमनाम!
सब चाहते हैं तेरे तन को, न वो मन की पीर,
तुझको कहाँ समझते हैं वो खुद जैसा इंसान!
झूठ मूठ का तेरा सजना, धूमिल है श्रृंगार!
इन लोगों ने बना दिया है, नारी को व्यापार!
खून के आंसू रोती है तू, सपने भी बेजान!
बदन बिक रहा ऐसे तेरा जैसे हो सामान......
इस पिंजरे में रहती है तू, बनकर के लाचार!
यदि कभी कुछ कहना चाहे, तो होते प्रहार!
तुझे दे दिया जाता पल में बाजारू का नाम,
तुझे परोसा जाता ऐसे जैसे हो उपहार!
तेरी दशा है कितनी पीड़ित, क्या होगा अंदाज!
तेरे करुण रुदन से बजता, तेरे मन का साज!
बाहर से तू रोशन रहती, भीतर से वीरान!
बदन बिक रहा ऐसे तेरा जैसे हो सामान......
कौन सुनेगा इनकी पीड़ा, बने कौन हमदर्द!
नहीं मदद करता है कोई, सब देते हैं दर्द!
"देव" न जाने कब तक होगा नारी का व्यापार,
तू बिकती है हर मौसम में, गर्मी हो या सर्द!
तेरी वेदना इतनी व्यापक, लघु मेरे उदगार!
"देव" तेरे तो दर्द का केवल, छोटा हिस्सेदार!
इस पिंजरे में ही कट जाती, तेरी उम्र तमाम!
बदन बिक रहा ऐसे तेरा जैसे हो सामान!"
" सच में जाने कितनी अनगिनत ये महिलायें/ लड़कियां, बिक रही हैं! बिकना इनका लक्ष्य नहीं था, किन्तु इसी समाज के लोगों ने उसे इस दशा पर पहुँचाया है! क्या कभी इनका उत्थान हो सकेगा! या बस ये सिसक सिसक कर दम तोड़ती रहेंगी! =चेतन रामकिशन "देव"
Tuesday, 23 August 2011
♥कलम कैसे उठाये वो ...♥♥
♥♥♥♥♥♥♥कलम कैसे उठाये वो ...♥♥♥♥♥♥♥♥♥
"कलम कैसे उठाये वो, गरीबी का जो मारा है!
वो अपने घर के चूल्हे का, सुलगता सा अंगारा है!
वो बेबस है, बड़ा मजबूर, लेकिन कह नहीं सकता,
वो कैसे चाँद को छूले , जो खुद टूटा सितारा है!
बिना उसकी कमाई से, तो घर में भूख रहती है!
नहीं मिलती दवा माँ को, बहन खामोश रहती है!
वो कैसे काम को त्यागे, वही घर का सहारा है!
कलम कैसे उठाये वो, गरीबी का जो मारा है.....
कभी धोता है वो बर्तन, कभी रिक्शा चलाता है!
कभी अख़बार भी बेचे, कभी ठेला लगाता है!
कभी उसकी नजर पड़ती है, जब स्कूली बच्चों पर,
वो जाकर एक कोने में, बहुत आंसू बहाता है!
वो अपने दिल की आवाजों को लेकिन सुन नहीं सकता!
गरीबी में वो महंगे स्वप्न अपने बुन नहीं सकता!
बड़ी मुश्किल से कर पाता, वो तो सबका गुजारा है!
कलम कैसे उठाये वो, गरीबी का जो मारा है.....
वतन की कोई भी सरकार उनका दर्द ना जाने!
मिटे इनकी गरीबी जो, नहीं वो बात है ठाने!
बहुत देते हैं मंचो से तो भाषण देश के नेता,
हकीक़त में मगर कोई, गरीबों की नहीं माने!
सिसकता है, बिलखता है, कोई उसकी नहीं सुनता!
कोई उसके पथों के शूल भी आकर नहीं चुनता!
हर एक सरकार उद्घोषित करे बस झूठा नारा है!
कलम कैसे उठाये वो, गरीबी का जो मारा है!"
"बाल श्रम, सरकार केवल इसे रोकने के लिए एक कानून बना चुकी है, कानून से आप एक बालक को काम करने से वंचित कर देते हो, किन्तु क्या कभी उसके और उसके परिवार के सदस्यों की भूख मिटाने के लिए भी सरकार कुछ करती हैं, कुछ भी नहीं-चेतन रामकिशन "देव"
"कलम कैसे उठाये वो, गरीबी का जो मारा है!
वो अपने घर के चूल्हे का, सुलगता सा अंगारा है!
वो बेबस है, बड़ा मजबूर, लेकिन कह नहीं सकता,
वो कैसे चाँद को छूले , जो खुद टूटा सितारा है!
बिना उसकी कमाई से, तो घर में भूख रहती है!
नहीं मिलती दवा माँ को, बहन खामोश रहती है!
वो कैसे काम को त्यागे, वही घर का सहारा है!
कलम कैसे उठाये वो, गरीबी का जो मारा है.....
कभी धोता है वो बर्तन, कभी रिक्शा चलाता है!
कभी अख़बार भी बेचे, कभी ठेला लगाता है!
कभी उसकी नजर पड़ती है, जब स्कूली बच्चों पर,
वो जाकर एक कोने में, बहुत आंसू बहाता है!
वो अपने दिल की आवाजों को लेकिन सुन नहीं सकता!
गरीबी में वो महंगे स्वप्न अपने बुन नहीं सकता!
बड़ी मुश्किल से कर पाता, वो तो सबका गुजारा है!
कलम कैसे उठाये वो, गरीबी का जो मारा है.....
वतन की कोई भी सरकार उनका दर्द ना जाने!
मिटे इनकी गरीबी जो, नहीं वो बात है ठाने!
बहुत देते हैं मंचो से तो भाषण देश के नेता,
हकीक़त में मगर कोई, गरीबों की नहीं माने!
सिसकता है, बिलखता है, कोई उसकी नहीं सुनता!
कोई उसके पथों के शूल भी आकर नहीं चुनता!
हर एक सरकार उद्घोषित करे बस झूठा नारा है!
कलम कैसे उठाये वो, गरीबी का जो मारा है!"
"बाल श्रम, सरकार केवल इसे रोकने के लिए एक कानून बना चुकी है, कानून से आप एक बालक को काम करने से वंचित कर देते हो, किन्तु क्या कभी उसके और उसके परिवार के सदस्यों की भूख मिटाने के लिए भी सरकार कुछ करती हैं, कुछ भी नहीं-चेतन रामकिशन "देव"
Monday, 22 August 2011
♥है तुम्हारी कमी...♥♥♥
♥♥♥♥♥♥♥है तुम्हारी कमी...♥♥♥♥♥♥♥♥♥
"धड़कने मंद हैं, आँखों में है नमी!
बुझ रहे हैं दिए , मिट रही रौशनी!
लौटकर फिर से आकाश आओ तुम,
जिंदगी कह रही, है तुम्हारी कमी!
घर में तुलसी का पौधा भी खामोश है!
थक गए हैं सुमन, अब नहीं जोश है!
अपने खेतों की भूमि भी बंजर भी बनी!
धड़कने मंद हैं, आँखों में है नमी.......
दूधवाला भी अब बोलता ही नहीं!
घर का माली भी, मुंह खोलता ही नहीं!
मौन हैं सब, तेरे बिन शरारत नहीं,
कांच खिड़की का, कोई तोड़ता नहीं!
मुन्ना भी भूख से, अब तो रोता नहीं!
तेरी तस्वीर के बिन, वो सोता नहीं!
तेरी तस्वीर उसकी जरुरत बनी!
धड़कने मंद हैं, आँखों में है नमी.......
अब खुदा से शिकायत भी कैसे करें!
अब किसी से मोहब्बत भी कैसे करें!
तेरी यादों ने ही साथ, हर पल दिया,
तेरी यादों से नफरत भी कैसे करें!
काश तू इतनी अच्छी न होती यदि!
न बुलाते खुदा, भूलकर भी कभी!
अच्छे लोगों की उसके यहाँ भी कमी!
धड़कने मंद हैं, आँखों में है नमी!"
"आज पीड़ा की इस दशा पर लिखना का मन हुआ! कोई घर की महिला जब असमय चली जाती है तो, बहुत ही ख़ामोशी पसर जाती है! बस यही चित्र खींचने की कोशिश की है!-चेतन रामकिशन "देव"
"धड़कने मंद हैं, आँखों में है नमी!
बुझ रहे हैं दिए , मिट रही रौशनी!
लौटकर फिर से आकाश आओ तुम,
जिंदगी कह रही, है तुम्हारी कमी!
घर में तुलसी का पौधा भी खामोश है!
थक गए हैं सुमन, अब नहीं जोश है!
अपने खेतों की भूमि भी बंजर भी बनी!
धड़कने मंद हैं, आँखों में है नमी.......
दूधवाला भी अब बोलता ही नहीं!
घर का माली भी, मुंह खोलता ही नहीं!
मौन हैं सब, तेरे बिन शरारत नहीं,
कांच खिड़की का, कोई तोड़ता नहीं!
मुन्ना भी भूख से, अब तो रोता नहीं!
तेरी तस्वीर के बिन, वो सोता नहीं!
तेरी तस्वीर उसकी जरुरत बनी!
धड़कने मंद हैं, आँखों में है नमी.......
अब खुदा से शिकायत भी कैसे करें!
अब किसी से मोहब्बत भी कैसे करें!
तेरी यादों ने ही साथ, हर पल दिया,
तेरी यादों से नफरत भी कैसे करें!
काश तू इतनी अच्छी न होती यदि!
न बुलाते खुदा, भूलकर भी कभी!
अच्छे लोगों की उसके यहाँ भी कमी!
धड़कने मंद हैं, आँखों में है नमी!"
"आज पीड़ा की इस दशा पर लिखना का मन हुआ! कोई घर की महिला जब असमय चली जाती है तो, बहुत ही ख़ामोशी पसर जाती है! बस यही चित्र खींचने की कोशिश की है!-चेतन रामकिशन "देव"
Sunday, 21 August 2011
*आज के राधा कृष्ण**
************आज के राधा कृष्ण****************
"कृष्ण बनकर गोपियों की राह बस तकने लगे हैं!
दिन में फिरते मारे मारे, रात को जगने लगे हैं!
ना ही करते गाय सेवा, याद ना गीता कथन,
आजकल के नौजवां बस प्यार तक थमने लगे हैं!
न "यशोदा" याद उनको और "नंदन" नाम भी!
दे रहे माँ बाप को हैं, पीड़ा भी, इल्जाम भी!
भूलकर हर एक सखा को, राधा बस जपने लगे हैं!
कृष्ण बनकर गोपियों की राह बस तकने लगे हैं......
न "सुदामा" के लिए अब, द्वार उनके खुल रहे हैं!
न विषैली सोच के ही, दाग धब्बे धुल रहे हैं!
अपनापन भी मिट रहा है, और मानवता नहीं,
मन में ईर्ष्या, द्वेष के ही, रंग केवल घुल रहे हैं!
आज कल के कृष्ण केवल, नाम के ही रह गए हैं!
न रहा एहसास बस, पाषाण के ही रह गए हैं!
आज कल के कृष्ण तो, खुद झूठ पे चलने लगे हैं!
कृष्ण बनकर गोपियों की राह बस तकने लगे हैं.....
आजकल की राधिका भी, छोटे कपड़े तान कर!
सड़को पे चलते हुए भी, फ़ोन रखतीं कान पर!
इन ढलकते आंचलो को, कह रहीं स्वतंत्रता,
अपने आदर्शों में केवल, "मल्लिका" को मानकर!
आज कल की राधिका भी, पथ से हटती जा रही है!
हो रहा नैतिक पतन, मर्यादा घटती जा रही है!
प्रेम के सन्देश भी अब वासना बनने लगे हैं!
कृष्ण बनकर गोपियों की राह बस तकने लगे हैं!"
"मित्रों, आजकल यही हाल है, लड़के कृष्ण से बस प्रेम सीख रहे हैं और लड़कियां राधा से! न उन्हें देवकी याद है, न वासुदेव! न शत्रु का संहार! न ही प्रजा का कर्तव्य, न ही देश की भक्ति! -चेतन रामकिशन "देव"
Saturday, 20 August 2011
♥ माँ तू कहाँ है... ♥♥
♥♥♥♥♥♥♥♥♥ माँ तू कहाँ है... ♥♥♥♥♥♥♥♥
"माँ तू कहाँ है?
माँ तू कहाँ है?
आज माँ तेरी कमी का हो रहा एहसास है!
यूँ तो धन भी है बहुत और घर भी मेरे पास है!
आज पर जाना ये मैंने, माँ तेरे बिन कुछ नहीं,
उससे ज्यादा क्या अमीरी, माँ जो जिसके पास है!
उन घरों में रहती रौनक,
तेरे पग जहाँ हैं!
माँ तू कहाँ है.....माँ तू कहाँ है.....
तेरा दिल मैंने दुखाया, आज मुझको दुःख बड़ा!
तेरी आँखों को रुलाया, आज मुझको दुःख बड़ा!
माँ तेरा अपमान करके, मैं भी अब बेनूर हूँ,
माँ मुझे अपना ले फिर से, तेरा दर पर हूँ खड़ा!
तेरे कदमों में है जन्नत,
मेरे तो जहां है!
माँ तू कहाँ है.....माँ तू कहाँ है.....
मैं यहाँ हूँ लाल मेरे, आज मेरे पास तू!
न बहा आँखों से आंसू, न हो अब उदास तू!
माँ के दिल जैसा कहीं होता नहीं है दूसरा,
तोड़ना न फिर दुबारा, एक माँ की आस तू!
माँ का मन होता वहीं हैं,
लाल उसका जहाँ है!
माँ तू कहाँ है.....माँ तू कहाँ है....."
"माँ- बिना उसके कुछ भी नहीं, लाल से ये न समझना की लाली कुछ नहीं, माँ की आँखों में कोई भेद नहीं, समान ममता! आओ माँ का सम्मान करें- चेतन रामकिशन "देव"
Thursday, 18 August 2011
♥♥हवस( पीड़ा की इन्तहा)♥♥
♥♥♥♥♥♥♥♥हवस( पीड़ा की इन्तहा)♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
"डरी सहमी सी एक लड़की, खड़ी थाने के द्वारे पर!
हवस के भेड़ियों ने उसकी हालत की बड़ी बदतर!
फटे कपड़े, फटी चुनरी, हैं फूटे आंख से आंसू,
नहीं सुनता मगर कोई, भटक के थक गयी दर दर!
हवस के भेड़िये करके भी ऐसा मुस्कुराते हैं!
मगर लड़की को वो मंजर हमेशा याद आते हैं!
हवस के भेड़ियों को अब नहीं कानून का भी डर!
डरी सहमी सी एक लड़की, खड़ी थाने के द्वारे पर.....
हवस के भेड़िये तो ये कहानी रोज लिखते हैं!
यहाँ कानून के रक्षक भी उनके हाथ बिकते हैं!
बड़ी मुश्किल से होती है जमा उस लड़की की अर्जी,
सिफारिश करके नेताओं की वो आजाद फिरते हैं!
हवस के भेड़िये कानून को ठेंगा दिखाते हैं!
मगर लड़की को वो मंजर, हमेशा याद आते हैं!
नहीं भगवान भी बिजली गिराता भेड़ियों के घर!
डरी सहमी सी एक लड़की, खड़ी थाने के द्वारे पर.....
हवस के भेड़ियों मानव का चोला ओढ़कर देखो!
हर लड़की भी मानव है, जरा तुम सोचकर देखो!
किसी पे जुल्म करने का तुम्हे तब होगा अंदाजा,
किसी हवसी को अपनी माँ बहन को सोंपकर देखो!
ऐसे पल किसी लड़की को जब भी याद आते हैं!
बदन बेजान होकर के, इरादे टूट जाते हैं!
निकलकर आंख से आंसू है करते गाल उसके तर!
डरी सहमी सी एक लड़की, खड़ी थाने के द्वारे पर!"
"बलात्कार/ छेड़ छाड़ की घटना, एक लड़की के जीवन को इतना दुखी करती हैं की वो,
कितने भी प्रयास करके, उस मंजर को भुला नहीं पाती है! हवस के भेड़ियों को भी अधिकांशत कानून का रक्षक भी सराहता है!-चेतन रामकिशन "देव"
Monday, 15 August 2011
♥♥प्रेमिका( पथ प्रदर्शक)♥♥
♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्रेमिका( पथ प्रदर्शक)♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
'मैंने प्यार किया है जिससे, वो अनमोल परी है!
मेरी खुशियों की है जननी, प्रेम भरी गगरी है!
वो मेरे सपनो में वसती , मन में है इठलाती!
कौन गलत है, कौन सही है मुझको है समझाती!
दिवा स्वप्न बनकर आँखों में मकसद पूरा करती!
मेहनत से मिलती है मंजिल मुझको है बतलाती!
मिश्री सी मीठी है वो, चंदा जैसी निखरी है!
मेरी खुशियों की है जननी, प्रेम भरी गगरी है. ♥ ♥ ♥ ♥ ♥
अभिमान का शब्द नहीं है, कोमल हृदय रखती!
तेज गमों की धूप में वो, बनकर साया है ढकती!
कैसे होता है आदर, सम्मान मुझे दिखलाती!
मेरे आने की आहट में भरी दोपहरी जलती!
चन्दन सी शीतल है वो, चांदी जैसी उजरी है!
मेरी खुशियों की है जननी, प्रेम भरी गगरी है. ♥ ♥ ♥ ♥ ♥
अंधकार का नाम नहीं है, हर पल है वो ज्योति!
मेरे मन की सोच कलुषित, गंगाजल से धोती!
मेरे जीवन की पुष्पा है, "देव" की रात सुनहरी,
जुल्फें उसकी घनी मुलायम, आंखें जैसी मोती!
शबनम की बूंदों के जैसे, फूल फूल बिखरी है!
मेरी खुशियों की है जननी, प्रेम भरी गगरी है. ♥ ♥ ♥ ♥ ♥
"शुद्ध प्रेम मानव की सोच को उन्नत करते हुए, जीवन को आदर्शवादी अस्तित्व प्रदान करता है! तो,आइये तो प्रेम करें और इन पलों की अनुभूति करें!-चेतन रामकिशन(देव)"
Sunday, 14 August 2011
***हम खुद अपराधी हैं....**
**************हम खुद अपराधी हैं....**************
" परिवर्तन की बात करें हम, नहीं मगर संकल्प!
अपनी अपनी करना चाहें, यहाँ तो कायाकल्प!
जात धर्म के नाम पे देते, नेताओं का साथ,
बड़े गर्व से कहते हैं फिर, नहीं था कोई विकल्प!
पहले खुद का करो आंकलन, हम भी हैं अपराधी!
खुद देते हैं रिश्वत उनको, हम भी हैं सहभागी!
पाषाणों के नाम पे लड़ते, सोच हमारी अल्प!
परिवर्तन की बात करें हम, नहीं मगर संकल्प.....
आजादी के दिन भी घर में, करते हैं मधपान!
अपने बच्चो को सिखलाते, केवल झूठी शान!
महापुरुषों के चित्र के सम्मुख नहीं दिए में तेल,
तेल में बेशक बने पकोड़ी या कोई पकवान!
अपने मन की सोच है दूषित, करते पर प्रहार!
अपने मतलब में देते खुद, अफसर को उपहार!
परिवर्तन की बात व्यर्थ है, यदि नहीं संकल्प!
अपनी अपनी करना चाहें, यहाँ तो कायाकल्प!"
"सब कह रहे हैं कि, आजादी नहीं है, सही बात है पर क्या कभी अपना आंकलन किया? परिवर्तन की बात कथनी से नहीं करनी से होती है! यदि आजादी का स्वप्न देखना है तो "परिवर्तन का संकल्प लीजिये- चेतन रामकिशन "देव"
" परिवर्तन की बात करें हम, नहीं मगर संकल्प!
अपनी अपनी करना चाहें, यहाँ तो कायाकल्प!
जात धर्म के नाम पे देते, नेताओं का साथ,
बड़े गर्व से कहते हैं फिर, नहीं था कोई विकल्प!
पहले खुद का करो आंकलन, हम भी हैं अपराधी!
खुद देते हैं रिश्वत उनको, हम भी हैं सहभागी!
पाषाणों के नाम पे लड़ते, सोच हमारी अल्प!
परिवर्तन की बात करें हम, नहीं मगर संकल्प.....
आजादी के दिन भी घर में, करते हैं मधपान!
अपने बच्चो को सिखलाते, केवल झूठी शान!
महापुरुषों के चित्र के सम्मुख नहीं दिए में तेल,
तेल में बेशक बने पकोड़ी या कोई पकवान!
अपने मन की सोच है दूषित, करते पर प्रहार!
अपने मतलब में देते खुद, अफसर को उपहार!
परिवर्तन की बात व्यर्थ है, यदि नहीं संकल्प!
अपनी अपनी करना चाहें, यहाँ तो कायाकल्प!"
"सब कह रहे हैं कि, आजादी नहीं है, सही बात है पर क्या कभी अपना आंकलन किया? परिवर्तन की बात कथनी से नहीं करनी से होती है! यदि आजादी का स्वप्न देखना है तो "परिवर्तन का संकल्प लीजिये- चेतन रामकिशन "देव"
Saturday, 13 August 2011
♥---आने वाला कुछ घंटो में♥
♥♥♥♥♥♥---आने वाला कुछ घंटो में♥♥♥♥♥♥♥♥
"आने वाला कुछ घंटो में, आजादी का पर्व!
भारत वासी होने पर हम, करेंगे खासा गर्व!
न जननी के चीरहरण से, फर्क हमे पड़ता है,
सत्ताधारी अम्बर बेचें, या बेचें भूगर्भ!
अपने मतलब सिद्ध करें हम, न माटी का मोल!
हम मानव की रूह नहीं हैं, केवल खाली खोल!
अपने मन में भरें जरा, हम जननी से अपनत्व!
आने वाला कुछ घंटो में, आजादी का पर्व.......
घरों से अपने हटा रहें हैं, महापुरुषों के चित्र!
देश प्रेम की घटी भावना, आलम बड़ा विचित्र!
नहीं बजा करते हैं अब तो, देश प्रेम के गीत,
गली गली हर चौराहे पर, चलें दुरित चलचित्र!
भुला चले मनमथ गुप्ता को, नहीं रहे आजाद!
विस्मृत हुयी शहादत उनकी, देशप्रेम बरबाद!
देश हितों की गर्मी आए, भरो लहू में तत्व!
आने वाला कुछ घंटो में, आजादी का पर्व.......
आजादी के दिन को हमने, बना दिया एक रस्म!
देशप्रेम तो हमने जाने, किया कभी का भस्म!
देश में शत्रु पनप रहे पर, "देव" है चिंता हीन,
इससे तो अच्छा हम पाते, पाषाणों का जन्म!
खद्दरधारी पहन के खद्दर, करें देश का अंत!
देख तमाशा खुश होते हम, बनकर बहरे संत!
सबक नहीं ले सकते जिनसे, बदलो वो क्रतत्व!
आने वाला कुछ घंटो में, आजादी का पर्व"
"अगली सुबह आजादी की भोर की स्मृति लेकर आएगी! किन्तु सच्चे अर्थों में देश की व्यवस्था ने देश की बहुसंख्यक आबादी को गुलाम बना दिया है! देश को फिर से महासंग्राम की जरुरत है! ये महासंग्राम हर हाल में लड़ना ही है तो फिर देर क्यूँ? - चेतन रामकिशन "देव"
"आने वाला कुछ घंटो में, आजादी का पर्व!
भारत वासी होने पर हम, करेंगे खासा गर्व!
न जननी के चीरहरण से, फर्क हमे पड़ता है,
सत्ताधारी अम्बर बेचें, या बेचें भूगर्भ!
अपने मतलब सिद्ध करें हम, न माटी का मोल!
हम मानव की रूह नहीं हैं, केवल खाली खोल!
अपने मन में भरें जरा, हम जननी से अपनत्व!
आने वाला कुछ घंटो में, आजादी का पर्व.......
घरों से अपने हटा रहें हैं, महापुरुषों के चित्र!
देश प्रेम की घटी भावना, आलम बड़ा विचित्र!
नहीं बजा करते हैं अब तो, देश प्रेम के गीत,
गली गली हर चौराहे पर, चलें दुरित चलचित्र!
भुला चले मनमथ गुप्ता को, नहीं रहे आजाद!
विस्मृत हुयी शहादत उनकी, देशप्रेम बरबाद!
देश हितों की गर्मी आए, भरो लहू में तत्व!
आने वाला कुछ घंटो में, आजादी का पर्व.......
आजादी के दिन को हमने, बना दिया एक रस्म!
देशप्रेम तो हमने जाने, किया कभी का भस्म!
देश में शत्रु पनप रहे पर, "देव" है चिंता हीन,
इससे तो अच्छा हम पाते, पाषाणों का जन्म!
खद्दरधारी पहन के खद्दर, करें देश का अंत!
देख तमाशा खुश होते हम, बनकर बहरे संत!
सबक नहीं ले सकते जिनसे, बदलो वो क्रतत्व!
आने वाला कुछ घंटो में, आजादी का पर्व"
"अगली सुबह आजादी की भोर की स्मृति लेकर आएगी! किन्तु सच्चे अर्थों में देश की व्यवस्था ने देश की बहुसंख्यक आबादी को गुलाम बना दिया है! देश को फिर से महासंग्राम की जरुरत है! ये महासंग्राम हर हाल में लड़ना ही है तो फिर देर क्यूँ? - चेतन रामकिशन "देव"
Friday, 12 August 2011
**राखी-तब बंधवाना डोर----**
*************राखी-तब बंधवाना डोर----**************
भाई बहिन तक सिमट न पाए, रक्षा का त्यौहार!
प्रेम का धागा सबको बांधो, पुरुष हो या हो नार!
अपनी बहन को बहन कहो तुम, और पे अत्याचार,
ऐसे में ये बंधन झूठा, जब हों दुरित विचार!
खून के रिश्तों से ही बनते, यदि बहिन या भाई!
व्यर्थ है देनी मानवता की, मिथ्या भरी दुहाई!
डोर तभी बंधवाना तुम जब, मन का करो निखार!
प्रेम का धागा सबको बांधो, पुरुष हो या हो नार......
सगी बहिन को देते हो तुम, रुपयों का उपहार!
वहीँ किसी अबला पे करते, हिंसा की बोछार!
कहाँ चला जाता है जब वो, नार का रक्षा बंधन,
क्यूँ उसको पाषाण समझ कर, करते हो प्रहार!
रक्षा बंधन हमे सिखाता, नारी का सम्मान!
रक्षा बंधन हमे सिखाता, समरसता का ज्ञान!
डोर तभी बंधवाना तुम जब, बदल सको व्यवहार!
प्रेम का धागा सबको बांधो, पुरुष हो या हो नार......
रक्षा बंधन पर बांधो तुम, राष्ट्र एकता डोर!
मानव को मानव से जोड़ो, मिल जायें दो छोर!
शत्रु का अब अंत करो तुम, "देव" जुटाओ जोश,
देश बचाना चाहते हो तो, भरो भुजा में जोर!
रक्षा बंधन पर देना है, राष्ट्र को जीवनदान!
एक सूत्र में बंध जाओ तुम, राम हो या रहमान!
डोर तभी बंधवाना तुम जब, सोच में करो सुधार!
प्रेम का धागा सबको बांधो, पुरुष हो या हो नार!"
"आज रक्षा बंधन के पर्व पर, हमे राष्ट्रीय एकता के सूत्र में बंधना है! मन से गंदे विचारों से मुक्ति देनी है! एक दूसरे को मानव से मानव को जोड़ने का संकल्प लेना है, तभी सही मायने में ये एक सार्थक रक्षा बंधन होगा, अन्यथा सिर्फ और सिर्फ एक रस्म!- चेतन रामकिशन "देव"
भाई बहिन तक सिमट न पाए, रक्षा का त्यौहार!
प्रेम का धागा सबको बांधो, पुरुष हो या हो नार!
अपनी बहन को बहन कहो तुम, और पे अत्याचार,
ऐसे में ये बंधन झूठा, जब हों दुरित विचार!
खून के रिश्तों से ही बनते, यदि बहिन या भाई!
व्यर्थ है देनी मानवता की, मिथ्या भरी दुहाई!
डोर तभी बंधवाना तुम जब, मन का करो निखार!
प्रेम का धागा सबको बांधो, पुरुष हो या हो नार......
सगी बहिन को देते हो तुम, रुपयों का उपहार!
वहीँ किसी अबला पे करते, हिंसा की बोछार!
कहाँ चला जाता है जब वो, नार का रक्षा बंधन,
क्यूँ उसको पाषाण समझ कर, करते हो प्रहार!
रक्षा बंधन हमे सिखाता, नारी का सम्मान!
रक्षा बंधन हमे सिखाता, समरसता का ज्ञान!
डोर तभी बंधवाना तुम जब, बदल सको व्यवहार!
प्रेम का धागा सबको बांधो, पुरुष हो या हो नार......
रक्षा बंधन पर बांधो तुम, राष्ट्र एकता डोर!
मानव को मानव से जोड़ो, मिल जायें दो छोर!
शत्रु का अब अंत करो तुम, "देव" जुटाओ जोश,
देश बचाना चाहते हो तो, भरो भुजा में जोर!
रक्षा बंधन पर देना है, राष्ट्र को जीवनदान!
एक सूत्र में बंध जाओ तुम, राम हो या रहमान!
डोर तभी बंधवाना तुम जब, सोच में करो सुधार!
प्रेम का धागा सबको बांधो, पुरुष हो या हो नार!"
"आज रक्षा बंधन के पर्व पर, हमे राष्ट्रीय एकता के सूत्र में बंधना है! मन से गंदे विचारों से मुक्ति देनी है! एक दूसरे को मानव से मानव को जोड़ने का संकल्प लेना है, तभी सही मायने में ये एक सार्थक रक्षा बंधन होगा, अन्यथा सिर्फ और सिर्फ एक रस्म!- चेतन रामकिशन "देव"
Monday, 8 August 2011
♥♥छुआछूत(दुरित सोच) ♥♥♥
♥♥♥♥♥♥♥♥छुआछूत(दुरित सोच) ♥♥♥♥♥♥♥♥♥
"आज भी देखो पनप रही है, वतन में छुआछूत!
ऐसी सोच का धारक कहता, दलित को काला भूत!
इनको मंदिर जाने पर भी कर देते पाबन्दी,
खुद को किन्तु कहते हैं वो ईश्वर का एक दूत!
पशु यदि पीता है पानी, नहीं कहीं कोई बात!
दलित यदि पीना चाहे तो, मिलते डंडे लात!
धन दौलत की ताक़त से वो, करते नष्ट सबूत!
आज भी देखो पनप रही है, वतन में छुआछूत...........
कहने को आज़ादी पाए, हुए अनेकों साल!
नहीं कटा है छुआछूत का, अब तक किन्तु जाल!
नहीं पटी है खाई अभी भी, सुलग रही चिंगारी,
नहीं एकता आ पायेगी, रहा यदि ये हाल!
ऐसी घटनाओं से अब भी, रंगता है अख़बार!
मानव होकर भी मानव से, नहीं पनपता प्यार!
भेद भाव की उड़ा रहे हैं, अब भी दुरित भभूत!
आज भी देखो पनप रही है, वतन में छुआछूत...........
एक ही जैसे मानव हैं हम, एक लहू का रंग!
एक ही जैसी आकृति है, एक ही जैसा अंग!
"देव" मिटा दो अब ये दूरी, सबको गले लगाओ,
मन में रहे विकार न कोई, प्रेम की बजे तरंग!
एक मंच पर आ जाओ तो तुम, नहीं रहेगा खेद!
मानव को मानव से जोड़ो, नहीं रखो तुम भेद!
खद्दरधारी भेद न पाए, व्यूह करो मजबूत!
एक दूजे के हो जायें हम, मिट जाये ये छूत!"
हम जात धर्म, वर्ग भेद से पहले मानव हैं! हमे अपने मन से इस दुरित सोच को मिटाना होगा, तभी राष्ट्रीय एकता बन सकती है! यदि हम लोग जात धर्म के इसी जंजाल में फंसे रहे तो देश, खंडित खंडित होकर बिखर जायेगा और इस देश का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा!- चेतन रामकिशन "देव"
♥नारी(शक्ति पुंज) ♥♥
♥♥♥♥♥♥♥♥♥नारी(शक्ति पुंज) ♥♥♥♥♥♥♥
"शक्ति का एक पुंज नारी, दीप का प्रकाश है वो!
आस्था की भावना है, फूल का अधिवास है वो!
ना चरण की धूल है वो, रेत की भूमि नहीं,
साहसी है, निष्कपट है, सत्य का आभास है वो!
नारी बनके संगिनी, प्रेम का उपहार दे!
खुद करे पीड़ा सहन, हर्ष का व्यवहार दे!
वो रचित करती सफलता, जीत का इतिहास है वो!
शक्ति का एक पुंज नारी, दीप का प्रकाश है वो....
नारी का मन गंगाजल सा, होता नहीं विकार!
माँ बनकर के नारी देती, मधु सा मीठा प्यार!
नारी हमको देती साहस, हमको दिशा दिखाए,
नारी करती है जीवन में, उर्जा का संचार!
नारी पुत्री रूप रचकर, हर्ष का श्रंगार दे!
वो बहन के रूप आकर, मित्रता का सार दे!
जाग्रत करती हैं चिंतन, हार का अवकाश है वो!
शक्ति का एक पुंज नारी, दीप का प्रकाश है वो....
नारी न पूजन की भूखी, वो रखती सम्मान की आशा!
नारी न वंदन की भूखी, उसको दे दो मीठी भाषा!
"देव" नहीं वो धन की भूखी, न ही उसकी सोच कलुषित,
नारी केवल ये चाहती है, भेद रहित बस हो परिभाषा!
नारी है निर्माता किन्तु, फिर भी वो आभार दे!
वो करे सम्मान सबको, वो सदा सत्कार दे!
♥प्रेम( एक निरोगी भावना)♥♥
♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्रेम( एक निरोगी भावना)♥♥♥♥♥♥♥
"प्रेम
का न प्रमाण है कोई, न कोई प्रयोग!
प्रेम,
चिकित्सा का रूपक है, है न कोई रोग!
प्रेम,
न कोई दुरित भावना, न लालच की रीत,
प्रेम,
वासना से उठकर है, न है कोई भोग!
प्रेम तिमिर को दूर भगाता, ऐसा है प्रदीप!
प्रेम भावना होती है तो घर घर जलते दीप!
प्रेम नहीं तो मानव जीवन, केवल रहे अधूरा!
प्रेम सजाता है रंगों से, नाचे मगन मयूरा!
प्रेम,
भावना सदभावों की, न हिंसा का योग!
प्रेम
का न प्रमाण है कोई, न कोई प्रयोग!"
"तो आइये प्रेम के रंगों से जीवन को सजायें, क्यूंकि अकेले प्रेम से ही जात, धर्म, हिंसा जैसे अनेको दुरित विचार समाप्त हो जाते हैं! प्रेम के साथ रहें-चेतन रामकिशन "देव"
Saturday, 6 August 2011
♥♥♥♥♥♥मित्रता ♥♥♥♥♥♥♥
♥♥♥♥♥♥♥♥♥मित्रता ♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
"मित्रता निष्कपट, छल रहित काम है!
मित्रता एक दूजे का सम्मान है!
मित्रता एक सरस, एक सुधि भावना,
मित्रता प्रेम का दूसरा नाम है!
मित्रता के बिना व्यर्थ है जिंदगी!
मित्रता वंदना, मित्रता बन्दिगी!
मित्रता जीत का एक आह्वान है!
मित्रता प्रेम का दूसरा नाम है......
मित्रता फूल है, मित्रता है कली!
काली रातों में बनके धवल है खिली!
हैं मेरे सतकर्म, या है माँ की दुआ,
मित्रता आप सबकी हमे है मिली!
मित्रता के बिना सूनी है हर ख़ुशी!
मित्रता के बिना जिंदगी है बुझी!
मित्रता क्रोध हिंसा का अवसान है!
मित्रता प्रेम का दूसरा नाम है......
मित्रता धनरहित एक सम्बन्ध है!
मित्रता अपनेपन की मधुर गंध है!
मित्रता जात धर्मो की जननी नहीं,
ये मनुज से मनुज का अनुबंध है!
मित्रता के बिना धुंधली है रौशनी!
मित्रता के बिना बेअसर चांदनी!
मित्रता है सुदामा,तो घनश्याम है!
मित्रता प्रेम का दूसरा नाम है"
"मित्रता, एक ऐसा सम्बन्ध जो, जात, धर्म, सबसे ऊपर! एक मनुज को मनुज से जोड़ता है! हिंसा का अवसान करता है! आप सभी को मित्र दिवस की शुभ कामना, और ईश से प्रार्थना की सबको आप जैसे मित्र दिलायें!- चेतन रामकिशन "देव"
Thursday, 4 August 2011
♥श्रमिक( अब जाग जाओ ) ♥
♥♥♥♥♥♥♥♥♥श्रमिक( अब जाग जाओ ) ♥♥♥♥♥♥♥
"कतरन पहने श्रमिक देश का, कैसे भारत उदय हो रहा!
भूख प्यास से पीड़ित है वो, उसका हर छण ह्रदय रो रहा!
श्रमिक अपने मनोभाव में, नहीं बुरा चाहता है किन्तु,
श्रमिक पर करके उत्पीडन, सत्ताधारी अदय हो रहा!
चलो बदलने नियति अपनी, उत्पीड़न का तोड़ो दर्पण!
उत्पीड़न के बनो विरोधी, तुम शत्रु का कर दो मर्दन!
सत्ताधारी आनंदित हैं, श्रमिक जीवन प्रलय हो रहा!
कतरन पहने श्रमिक देश का, कैसे भारत उदय हो रहा.......
अपने रक्त पसीने से, श्रमिक देश को सिंचित करते!
और देश के सत्ताधारी, उन्हें सुखों से वंचित करते!
धनिक कुबेरों के हाथों में, बिकती रहती हैं सरकारें,
निर्धन के सारे स्वपनों को, सत्ताधारी खंडित करते!
सोच गुलामी की त्यागो अब, सिंह गर्जना करना सीखो!
है लड़ने का जोश नहीं तो, ख़ामोशी से मरना सीखो!
आम आदमी कांप रहा है, सत्ताधारी अभय हो रहा!
कतरन पहने श्रमिक देश का, कैसे भारत उदय हो रहा.......
आम आदमी अब तुम जागो, अपने साहस को पहचानो!
खुद चिंतन भी करना सीखो, इनकी कथनी को न मानो!
अब सहने की आदत छोड़ो,"देव" चलो तुम रण भूमि में,
है शत्रु से मुक्ति पानी, तो लड़ने की मन में ठानो!
भय से नाता तोड़ चलो अब, शत्रु को जाकर ललकारो!
मद में चूर हुए हैं नेता, इन सबका तुम नशा उतारो!
आम आदमी दफ़न हुआ है, सत्ताधारी उदय हो रहा है!
कतरन पहने श्रमिक देश का, कैसे भारत उदय हो रहा!"
" आम आदमी को, वंचित वर्ग को, श्रमिक को और हर उस अभावों से पीड़ित वर्ग को अपने हाथों में शक्ति का संचार करना होगा! क्यूंकि ये अभाव उनके भाग्य के नहीं हैं, इस देश की वर्तमान व्यवस्था के हैं! इस व्यवस्था को बदलना होगा! नहीं तो इस वर्ग को इसी बेबसी और भूख के अलावा कुछ नहीं मिल सकता!- चेतन रामकिशन "देव"
Tuesday, 2 August 2011
♥प्रेम की पीड़ा ♥♥♥
♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्रेम की पीड़ा ♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
"एक पल में ही चले गए हैं, मेरे दिल में रहने वाले!
तस्वीरें सब जला चुके हैं, हमको अपना कहने वाले!
सारे रिश्ते तोड़ चुके हैं, तोड़ गए बंधन और नाते,
छोड़ गए सागर में तनहा, मेरे संग में बहने वाले!
आशाओं के दीप बुझाकर, शोक भरा संगीत बजाकर,
प्यार को कदमों तले दबाकर, चले गए हैं गैर बताकर!
लहू बहाके चले गए वो, संग संग पीड़ा सहने वाले!
एक पल में ही चले गए हैं, मेरे दिल में रहने वाले.....
ना सोचा था कच्ची होगी, उनके प्रेम की डोर!
पहले सुख देकर के हमको, गम देंगे घनघोर!
किन्तु हम उनकी चाहत को दफ़न नहीं कर सकते,
हमने प्रेम किया है सच्चा, मेरे मन ना चोर!
जीते जी वो लाश बनाकर, अरमानों का गला दबाकर!
प्यार के सारे गीत भुलाकर, चले गए हैं गैर बताकर!
अग्नि जैसे दहक रहे हैं, खुद को चन्दन कहने वाले!
एक पल में ही चले गए हैं, मेरे दिल में रहने वाले......
ना ही उनका बुरा सोचता, "देव" ना देता श्राप!
एक दिन होगा उनको अपने, कर्म का पश्चाताप!
उनकी दुरित भावना उनको, छोड़ नहीं पायगी,
कितनी भी वो करें इबादत, कितने करलें जाप!
मुझको वो पाषाण बताकर, मेरे ह्रदय में शूल चुभाकर!
दुश्मन जैसा मुझे सताकर, चले गए हैं गैर बताकर!
कंटक जैसे बने नुकीले, खुद को उपवन कहने वाले!
एक पल में ही चले गए हैं, मेरे दिल में रहने वाले!"
"प्रेम, की पीड़ा व्यक्ति को हतौत्साहित करती है और उसके आत्मविश्वास और कार्य शैली पर भी प्रभाव पड़ता है! व्यक्ति इस पीड़ा में न चाहते हुए भी समाज से अलग थलग हो जाता है! तो आइये किसी को इस पीड़ा को देने से पहले चिंतन करें-चेतन रामकिशन "देव"
"एक पल में ही चले गए हैं, मेरे दिल में रहने वाले!
तस्वीरें सब जला चुके हैं, हमको अपना कहने वाले!
सारे रिश्ते तोड़ चुके हैं, तोड़ गए बंधन और नाते,
छोड़ गए सागर में तनहा, मेरे संग में बहने वाले!
आशाओं के दीप बुझाकर, शोक भरा संगीत बजाकर,
प्यार को कदमों तले दबाकर, चले गए हैं गैर बताकर!
लहू बहाके चले गए वो, संग संग पीड़ा सहने वाले!
एक पल में ही चले गए हैं, मेरे दिल में रहने वाले.....
ना सोचा था कच्ची होगी, उनके प्रेम की डोर!
पहले सुख देकर के हमको, गम देंगे घनघोर!
किन्तु हम उनकी चाहत को दफ़न नहीं कर सकते,
हमने प्रेम किया है सच्चा, मेरे मन ना चोर!
जीते जी वो लाश बनाकर, अरमानों का गला दबाकर!
प्यार के सारे गीत भुलाकर, चले गए हैं गैर बताकर!
अग्नि जैसे दहक रहे हैं, खुद को चन्दन कहने वाले!
एक पल में ही चले गए हैं, मेरे दिल में रहने वाले......
ना ही उनका बुरा सोचता, "देव" ना देता श्राप!
एक दिन होगा उनको अपने, कर्म का पश्चाताप!
उनकी दुरित भावना उनको, छोड़ नहीं पायगी,
कितनी भी वो करें इबादत, कितने करलें जाप!
मुझको वो पाषाण बताकर, मेरे ह्रदय में शूल चुभाकर!
दुश्मन जैसा मुझे सताकर, चले गए हैं गैर बताकर!
कंटक जैसे बने नुकीले, खुद को उपवन कहने वाले!
एक पल में ही चले गए हैं, मेरे दिल में रहने वाले!"
"प्रेम, की पीड़ा व्यक्ति को हतौत्साहित करती है और उसके आत्मविश्वास और कार्य शैली पर भी प्रभाव पड़ता है! व्यक्ति इस पीड़ा में न चाहते हुए भी समाज से अलग थलग हो जाता है! तो आइये किसी को इस पीड़ा को देने से पहले चिंतन करें-चेतन रामकिशन "देव"
Sunday, 31 July 2011
♥♥बेटी की विदाई ♥♥♥
♥♥♥♥♥♥♥♥♥बेटी की विदाई ♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
"पिता की आंख में आंसू, है माँ की आंख भर आई!
विदा जब हो रही बेटी, तो ख़ामोशी पसर आई!
समूचे द्रश्य नयनों के पटल पे, आ गए झट से,
कभी जिद करती थी बेटी, कभी रोई थी, मुस्काई!
जहाँ बेटी विदा होती, वहां ऐसा ही होता है!
खड़ा कुछ दूर कोने में, उसी का भाई रोता है!
कलाई देखता अपनी, जहाँ राखी थी बंधवाई!
पिता की आंख में आंसू, है माँ की आंख भर आई.....
विदाई के समय बेटी का भी, ये हाल होता है!
जो पल थे साथ में काटे, उन्ही का ख्याल होता है!
माँ उसके सर पे रखकर हाथ ये समझाती है उसको,
हर एक बेटी का दूजा घर, वही ससुराल होता है!
जहाँ बेटी विदा होती, विरह का काल होता है!
धरा भी घूमना रोके ,ये नभ भी लाल होता है!
नरम हाथों से माता के, कभी चोटी थी बंधवाई!
पिता की आंख में आंसू, है माँ की आंख भर आई.....
सभी आशीष दे बेटी को, फिर डोली बिठाते हैं!
निभाना सात वचनों को, यही उसको सिखाते हैं!
किसी सम्बन्ध में बेटी कभी तू भेद ना करना,
सहज व्यवहार रखने की, उसे बातें बताते हैं!
जहाँ बेटी विदा होती, वहां ऐसा ही होता है!
नया एक जन्म होता है, नया संसार होता है!
हंसाने, बोलने वाली सभी सखियाँ हैं मुरझाई!
पिता की आंख में आंसू, है माँ की आंख भर आई!"
"जब बेटी की विदाई होती है, तो बड़ी पीड़ा होती है! मंडप में अश्रु बहते हैं और चरों और ख़ामोशी ! किन्तु विवाह के दायित्व का निर्वहन करना बेटी का दायित्व भी होता है! इसी विदाई के पलों को जोड़ने का प्रयास किया है!-चेतन रामकिशन "देव"
"पिता की आंख में आंसू, है माँ की आंख भर आई!
विदा जब हो रही बेटी, तो ख़ामोशी पसर आई!
समूचे द्रश्य नयनों के पटल पे, आ गए झट से,
कभी जिद करती थी बेटी, कभी रोई थी, मुस्काई!
जहाँ बेटी विदा होती, वहां ऐसा ही होता है!
खड़ा कुछ दूर कोने में, उसी का भाई रोता है!
कलाई देखता अपनी, जहाँ राखी थी बंधवाई!
पिता की आंख में आंसू, है माँ की आंख भर आई.....
विदाई के समय बेटी का भी, ये हाल होता है!
जो पल थे साथ में काटे, उन्ही का ख्याल होता है!
माँ उसके सर पे रखकर हाथ ये समझाती है उसको,
हर एक बेटी का दूजा घर, वही ससुराल होता है!
जहाँ बेटी विदा होती, विरह का काल होता है!
धरा भी घूमना रोके ,ये नभ भी लाल होता है!
नरम हाथों से माता के, कभी चोटी थी बंधवाई!
पिता की आंख में आंसू, है माँ की आंख भर आई.....
सभी आशीष दे बेटी को, फिर डोली बिठाते हैं!
निभाना सात वचनों को, यही उसको सिखाते हैं!
किसी सम्बन्ध में बेटी कभी तू भेद ना करना,
सहज व्यवहार रखने की, उसे बातें बताते हैं!
जहाँ बेटी विदा होती, वहां ऐसा ही होता है!
नया एक जन्म होता है, नया संसार होता है!
हंसाने, बोलने वाली सभी सखियाँ हैं मुरझाई!
पिता की आंख में आंसू, है माँ की आंख भर आई!"
"जब बेटी की विदाई होती है, तो बड़ी पीड़ा होती है! मंडप में अश्रु बहते हैं और चरों और ख़ामोशी ! किन्तु विवाह के दायित्व का निर्वहन करना बेटी का दायित्व भी होता है! इसी विदाई के पलों को जोड़ने का प्रयास किया है!-चेतन रामकिशन "देव"
Saturday, 23 July 2011
♥शीतल रक्त धार ♥♥
♥♥♥♥♥♥♥शीतल रक्त धार ♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
"नहीं है रक्त की बूंदों में अब तो चिपचिपाहट सी!
है प्रीति देश से लगती महज कोरी दिखावट सी!
नहीं माटी की पीड़ा से उन्हें पीड़ा की अनुभूति,
हुआ है रक्त भी शीतल, नहीं है गुनगुनाहट सी!
यहाँ "आजाद" के जैसी नहीं कोई जवानी है!
शहीदों की शहादत भी उन्हें लगती कहानी है!
नहीं संवेदना मन में, रखेंगे मुस्कराहट सी!
नहीं है रक्त की बूंदों में अब तो चिपचिपाहट सी.....
यदि जलता है भारत तो जलन इनको नहीं होती!
यदि आतंक भी फैले, तपन इनको नहीं होती!
नहीं है देशभक्ति की मनों में धारणा अब तो,
वतन को चोट लग जाये, दुखन इनको नहीं होती!
नहीं विस्मिल के जैसा साहसी, ना शौर्यवानी है!
शहीदों की शहादत भी उन्हें लगती कहानी है!
शहीदों के मरण दिन पे भी करते हैं सजावट सी!
नहीं है रक्त की बूंदों में अब तो चिपचिपाहट सी.....
यहाँ सत्ता के भक्षक भी नहीं अंग्रेज से कम हैं!
उन्ही के घर में है ज्योति, गरीबों के यहाँ तम है!
यहाँ सब "देव" का वंदन करें पाषाण मूरत में,
भरोसे भाग्य के रहते, नहीं पर हाथ में दम है!
नहीं अशफाक के जैसा कोई प्राणों का दानी है !
शहीदों की शहादत भी उन्हें लगती कहानी है!
नहीं अब रक्त में रहती है किंचित भी ललावट सी!
नहीं है रक्त की बूंदों में अब तो चिपचिपाहट सी!"
"आइये अपने रक्त में शहीदों की शहादत से उर्जा भरें, जिस माटी पे जन्म लिया यदि उसके लिए प्रेम और त्याग की भावना नहीं जगाई, तो मानव होना व्यर्थ है!-चेतन रामकिशन "देव"
"नहीं है रक्त की बूंदों में अब तो चिपचिपाहट सी!
है प्रीति देश से लगती महज कोरी दिखावट सी!
नहीं माटी की पीड़ा से उन्हें पीड़ा की अनुभूति,
हुआ है रक्त भी शीतल, नहीं है गुनगुनाहट सी!
यहाँ "आजाद" के जैसी नहीं कोई जवानी है!
शहीदों की शहादत भी उन्हें लगती कहानी है!
नहीं संवेदना मन में, रखेंगे मुस्कराहट सी!
नहीं है रक्त की बूंदों में अब तो चिपचिपाहट सी.....
यदि जलता है भारत तो जलन इनको नहीं होती!
यदि आतंक भी फैले, तपन इनको नहीं होती!
नहीं है देशभक्ति की मनों में धारणा अब तो,
वतन को चोट लग जाये, दुखन इनको नहीं होती!
नहीं विस्मिल के जैसा साहसी, ना शौर्यवानी है!
शहीदों की शहादत भी उन्हें लगती कहानी है!
शहीदों के मरण दिन पे भी करते हैं सजावट सी!
नहीं है रक्त की बूंदों में अब तो चिपचिपाहट सी.....
यहाँ सत्ता के भक्षक भी नहीं अंग्रेज से कम हैं!
उन्ही के घर में है ज्योति, गरीबों के यहाँ तम है!
यहाँ सब "देव" का वंदन करें पाषाण मूरत में,
भरोसे भाग्य के रहते, नहीं पर हाथ में दम है!
नहीं अशफाक के जैसा कोई प्राणों का दानी है !
शहीदों की शहादत भी उन्हें लगती कहानी है!
नहीं अब रक्त में रहती है किंचित भी ललावट सी!
नहीं है रक्त की बूंदों में अब तो चिपचिपाहट सी!"
"आइये अपने रक्त में शहीदों की शहादत से उर्जा भरें, जिस माटी पे जन्म लिया यदि उसके लिए प्रेम और त्याग की भावना नहीं जगाई, तो मानव होना व्यर्थ है!-चेतन रामकिशन "देव"
Thursday, 21 July 2011
♥मेरी प्रेरणा(पथ प्रदर्शक)♥♥
♥♥♥♥♥♥♥मेरी प्रेरणा(पथ प्रदर्शक)♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
"कोमल है वो रेशम जैसी, नदियों का बहता पानी!
हरियाली सी सुन्दर है वो, संतो की मीठी वाणी!
मेरे भावों की अनुभूति, मेरी कविता की पहचान,
रानी जैसी मर्यादित वो, किंचित भी ना अभिमानी!
मेरी प्रेरणा इतनी सुन्दर, जैसे धवल चांदनी हो!
घनी अमावस भी ढल जाये, उसकी जहाँ रौशनी हो!
वो है ज्ञान का जलता दीपक, मैं तो केवल अज्ञानी!
कोमल है वो रेशम जैसी, नदियों का बहता पानी.........................
शीतल है वो चन्दन जैसी, दयापूर्ण उसका व्यवहार!
दुःख की धूप में करती है, प्रेम रसों की मधुर फुहार!
समझाती शिक्षक बनकर, सही गलत की दे पहचान,
सत्य वचन का पाठ पढ़ाती, वो है मेरी रचनाधार!
मेरी प्रेरणा इतनी प्यारी, जैसे माँ की ममता हो!
किंचित भी वो भेद न रखे, प्रकृति सी समता हो!
मेरे शब्द भी छोटे पड़ते, है वो इतनी गुणवानी!
कोमल है वो रेशम जैसी, नदियों का बहता पानी.........................
उपलब्धि है मेरी प्रेरणा, मेरे जीवन का उपहार!
उसके बिन मैं पतझड़ हूँ,वो मेरा खिलता श्रंगार!
"देव" के मन का चिंतन है ,है भावों का दर्पण भी,
शब्दकोष में शब्द नहीं हैं,कैसे दूँ उसको आभार!
मेरी प्रेरणा इतनी अच्छी, मन में कोई विकार नहीं!
सबका हित है करना चाहती,हिंसा का उद्गार नहीं!
लाभपूर्ण है उसका दर्शन, ना मिलती किंचित हानि!
कोमल है वो रेशम जैसी, नदियों का बहता पानी!"
"मेरी प्रेरणा, ऐसी ही है! पावन, सुन्दर, सरल, मधुमयी, कोमल! चूँकि सब कुछ उसके दिशा निर्देशन से उद्धृत है! इसीलिए आज की ये रचना अपनी प्रेरणा को समर्पित कर रहा हूँ! आपको भी ऐसी ही प्रेरणा मिले, प्रकृति से यही कामना है!-चेतन रामकिशन "देव"
"कोमल है वो रेशम जैसी, नदियों का बहता पानी!
हरियाली सी सुन्दर है वो, संतो की मीठी वाणी!
मेरे भावों की अनुभूति, मेरी कविता की पहचान,
रानी जैसी मर्यादित वो, किंचित भी ना अभिमानी!
मेरी प्रेरणा इतनी सुन्दर, जैसे धवल चांदनी हो!
घनी अमावस भी ढल जाये, उसकी जहाँ रौशनी हो!
वो है ज्ञान का जलता दीपक, मैं तो केवल अज्ञानी!
कोमल है वो रेशम जैसी, नदियों का बहता पानी.........................
शीतल है वो चन्दन जैसी, दयापूर्ण उसका व्यवहार!
दुःख की धूप में करती है, प्रेम रसों की मधुर फुहार!
समझाती शिक्षक बनकर, सही गलत की दे पहचान,
सत्य वचन का पाठ पढ़ाती, वो है मेरी रचनाधार!
मेरी प्रेरणा इतनी प्यारी, जैसे माँ की ममता हो!
किंचित भी वो भेद न रखे, प्रकृति सी समता हो!
मेरे शब्द भी छोटे पड़ते, है वो इतनी गुणवानी!
कोमल है वो रेशम जैसी, नदियों का बहता पानी.........................
उपलब्धि है मेरी प्रेरणा, मेरे जीवन का उपहार!
उसके बिन मैं पतझड़ हूँ,वो मेरा खिलता श्रंगार!
"देव" के मन का चिंतन है ,है भावों का दर्पण भी,
शब्दकोष में शब्द नहीं हैं,कैसे दूँ उसको आभार!
मेरी प्रेरणा इतनी अच्छी, मन में कोई विकार नहीं!
सबका हित है करना चाहती,हिंसा का उद्गार नहीं!
लाभपूर्ण है उसका दर्शन, ना मिलती किंचित हानि!
कोमल है वो रेशम जैसी, नदियों का बहता पानी!"
"मेरी प्रेरणा, ऐसी ही है! पावन, सुन्दर, सरल, मधुमयी, कोमल! चूँकि सब कुछ उसके दिशा निर्देशन से उद्धृत है! इसीलिए आज की ये रचना अपनी प्रेरणा को समर्पित कर रहा हूँ! आपको भी ऐसी ही प्रेरणा मिले, प्रकृति से यही कामना है!-चेतन रामकिशन "देव"
Sunday, 17 July 2011
♥♥प्रेम (खंडित ह्रदय)♥♥
♥♥♥♥♥♥♥प्रेम (खंडित ह्रदय)♥♥♥♥♥
"मन में अश्रुधार बह रही, ह्रदय के खंडित तार!
जब से तूने किया है विस्मृत, मेरा सच्चा प्यार!
पथ में यूँ तो चलते फिरते, मिल जाते हैं लोग,
किन्तु तुम बिन नीरस- नीरस, हुआ मेरा संसार!
प्रेम में ह्रदय खंडना से तो, मिलता है आघात!
दिन भी पीड़ित हो जाता है, पीड़ित होती रात!
तुमने हमको दिया है साथी, पीड़ा का उपहार!
मन में अश्रुधार बह रही, ह्रदय के खंडित तार......
साथ निभाने की जीवन भर, टूट गयी सौगंध!
रक्त की धारा धीमी है , ह्रदय की कंपन मंद!
इस घातक पीड़ा का जग में, होता ना उपचार,
कितने भी प्रयास करो तुम, ना मिलता आनंद!
प्रेम के ऐसे छन करते हैं, जीवन में व्यवधान!
उत्साहों पे लगता अंकुश,धूमिल हो उत्थान!
टूट गयी मोती की माला, छूट गया श्रंगार!
मन में अश्रुधार बह रही, ह्रदय के खंडित तार......
प्रेम तो भावों का सागर है, स्वार्थ से नाता तोड़ो!
होता है अनमोल बहुत ये, इसको तुम ना छोड़ो!
जीवन में यदि प्रेम नहीं तो, "देव" भी होते पत्थर,
जीवन भर जो खंडित ना हो, ऐसा नाता जोड़ो!
प्रेम तो जीवन का निर्माता,नहीं करो अपमान!
प्रेम तो तुलसी की वाणी है, प्रेम का नाम कुरान!
प्रेम तो दीपों की माला है, नहीं कोई तलवार!
मन में अश्रुधार बह रही, ह्रदय के खंडित तार!"
"प्रेम, जीवन की आवश्यकता होती है! प्रेम, में ह्रदय खंडना से, व्यक्ति की मनोदशा प्रभावित होती है! उसके आत्म विश्वास में भी कमी आती है और वेदना से उसकी सफलता और लक्ष्य निर्धारण पर भी प्रभाव पड़ता है! तो आइये किसी को प्रेम में इस पीड़ा को देने से पहले सोचें- चेतन रामकिशन"देव"
"मन में अश्रुधार बह रही, ह्रदय के खंडित तार!
जब से तूने किया है विस्मृत, मेरा सच्चा प्यार!
पथ में यूँ तो चलते फिरते, मिल जाते हैं लोग,
किन्तु तुम बिन नीरस- नीरस, हुआ मेरा संसार!
प्रेम में ह्रदय खंडना से तो, मिलता है आघात!
दिन भी पीड़ित हो जाता है, पीड़ित होती रात!
तुमने हमको दिया है साथी, पीड़ा का उपहार!
मन में अश्रुधार बह रही, ह्रदय के खंडित तार......
साथ निभाने की जीवन भर, टूट गयी सौगंध!
रक्त की धारा धीमी है , ह्रदय की कंपन मंद!
इस घातक पीड़ा का जग में, होता ना उपचार,
कितने भी प्रयास करो तुम, ना मिलता आनंद!
प्रेम के ऐसे छन करते हैं, जीवन में व्यवधान!
उत्साहों पे लगता अंकुश,धूमिल हो उत्थान!
टूट गयी मोती की माला, छूट गया श्रंगार!
मन में अश्रुधार बह रही, ह्रदय के खंडित तार......
प्रेम तो भावों का सागर है, स्वार्थ से नाता तोड़ो!
होता है अनमोल बहुत ये, इसको तुम ना छोड़ो!
जीवन में यदि प्रेम नहीं तो, "देव" भी होते पत्थर,
जीवन भर जो खंडित ना हो, ऐसा नाता जोड़ो!
प्रेम तो जीवन का निर्माता,नहीं करो अपमान!
प्रेम तो तुलसी की वाणी है, प्रेम का नाम कुरान!
प्रेम तो दीपों की माला है, नहीं कोई तलवार!
मन में अश्रुधार बह रही, ह्रदय के खंडित तार!"
"प्रेम, जीवन की आवश्यकता होती है! प्रेम, में ह्रदय खंडना से, व्यक्ति की मनोदशा प्रभावित होती है! उसके आत्म विश्वास में भी कमी आती है और वेदना से उसकी सफलता और लक्ष्य निर्धारण पर भी प्रभाव पड़ता है! तो आइये किसी को प्रेम में इस पीड़ा को देने से पहले सोचें- चेतन रामकिशन"देव"
Saturday, 16 July 2011
♥फिर दहली मुंबई ♥♥♥
♥♥♥♥♥♥♥♥♥फिर दहली मुंबई ♥♥♥♥♥♥♥
ये मुंबई फिर से दहली है, बही है रक्त की धारा!
हुआ स्तब्ध है मानव, हुआ नम देश ये सारा!
यहाँ तो फूटते रहते हैं, अक्सर आग के गोले,
मगर सत्ता के भक्षक राख से, बनते ना अंगारा!
ये सत्ताधारी इन हमलो की, पीड़ा भूल जाते हैं!
कभी हमलो पे अंकुश को, नहीं बीड़ा उठाते हैं!
हुयी आतंक की जय है, अहिंसा गान है हारा!
ये मुंबई फिर से दहली है, बही है रक्त की धारा.....
यहाँ हमलों के दोषी भी, सुखद मेहमान से रहते!
नहीं हो सकता है उनका कुछ, इसी अभिमान में रहते!
अनेको बार इस भारत ने, ऐसे द्रश्य देखे हैं,
मगर सत्ता के भक्षक, जानकर अंजान हैं रहते!
इसी कमजोरी से आतंक, की हरियाली खिलती है!
कभी मुंबई, कभी दिल्ली,इसी अग्नि में जलती है!
मगर घटनाओं से नेता, सबक ना लेते दोबारा!
ये मुंबई फिर से दहली है, बही है रक्त की धारा.....
मधुर और प्रेम की भाषा, रटाना छोड़ना होगा!
हमे साहस से इनके व्यूह को अब तोड़ना होगा!
नहीं जागे यदि तुम "देव", तो दोहराव आएगा,
हमे इनकी तरफ शस्त्रों का, रुख अब मोड़ना होगा!
इन हमलों की वंशज, देश की कमजोर नीति है!
नहीं है देश की चिंता, वो दलगत राजनीती है!
चलो अब आग में तपकर के, हम बन जायें अंगारा!
ये मुंबई फिर से दहली है, बही है रक्त की धारा!"
"मुंबई में आतंकी हमले में मारे गए लोगों की, आत्मा की शांति की कामना करते हुए,
ऐसे नेताओं को धक्का दें, जो सियासत के लिए इस खून को भी नहीं देखते हैं!-चेतन रामकिशन "देव"
ये मुंबई फिर से दहली है, बही है रक्त की धारा!
हुआ स्तब्ध है मानव, हुआ नम देश ये सारा!
यहाँ तो फूटते रहते हैं, अक्सर आग के गोले,
मगर सत्ता के भक्षक राख से, बनते ना अंगारा!
ये सत्ताधारी इन हमलो की, पीड़ा भूल जाते हैं!
कभी हमलो पे अंकुश को, नहीं बीड़ा उठाते हैं!
हुयी आतंक की जय है, अहिंसा गान है हारा!
ये मुंबई फिर से दहली है, बही है रक्त की धारा.....
यहाँ हमलों के दोषी भी, सुखद मेहमान से रहते!
नहीं हो सकता है उनका कुछ, इसी अभिमान में रहते!
अनेको बार इस भारत ने, ऐसे द्रश्य देखे हैं,
मगर सत्ता के भक्षक, जानकर अंजान हैं रहते!
इसी कमजोरी से आतंक, की हरियाली खिलती है!
कभी मुंबई, कभी दिल्ली,इसी अग्नि में जलती है!
मगर घटनाओं से नेता, सबक ना लेते दोबारा!
ये मुंबई फिर से दहली है, बही है रक्त की धारा.....
मधुर और प्रेम की भाषा, रटाना छोड़ना होगा!
हमे साहस से इनके व्यूह को अब तोड़ना होगा!
नहीं जागे यदि तुम "देव", तो दोहराव आएगा,
हमे इनकी तरफ शस्त्रों का, रुख अब मोड़ना होगा!
इन हमलों की वंशज, देश की कमजोर नीति है!
नहीं है देश की चिंता, वो दलगत राजनीती है!
चलो अब आग में तपकर के, हम बन जायें अंगारा!
ये मुंबई फिर से दहली है, बही है रक्त की धारा!"
"मुंबई में आतंकी हमले में मारे गए लोगों की, आत्मा की शांति की कामना करते हुए,
ऐसे नेताओं को धक्का दें, जो सियासत के लिए इस खून को भी नहीं देखते हैं!-चेतन रामकिशन "देव"
♥♥सावन (हरियाली और मिलन )♥♥
♥♥♥♥♥♥♥♥♥सावन (हरियाली और मिलन )♥♥♥♥♥♥
"है फूलों पे नया यौवन, मधु वर्षा ने बिखराया!
है वायु में भी शीतलता, सरस वातावरण छाया!
चलो स्वागत करें मिलके,सभी प्रकृति के प्रेमी,
मिलन भावों से पूरित होके, सावन मास है आया!
मयूरा नृत्य में मगनित, भ्रमर रसपान करता है!
मिलन संयोग देता है, विरह अवसान करता है!
नए पोधे के जीवन का, नया अंकुर भी उग आया!
मिलन भावों से पूरित होके, सावन मास है आया...........
इसी सावन में झूला, झूलने की रीत होती है!
सखी के मन में, एक दूजे से गहरी प्रीत होती है!
ना कोई दोष होता है, ना कोई वर्ग का दर्पण,
सभी की छाया एक जैसी, सरल प्रतीत होती है!
सुमन से गंध ले तितली, कोयल गान करती है!
सरिता भी उमड़ करके, इसे प्रणाम करती है!
सुखद सावन के गीतों का, नया सूरज भी उग आया!
मिलन भावों से पूरित होके, श्रावण मास है आया.......
धरा भी मुस्कुराती है, गगन भी हर्ष में होता!
ये सावन और मौसम से, सदा उत्कर्ष में होता!
मधुर सावन के आनंदों से होते"देव" भी हर्षित,
इस सावन का हर छण,प्रेम के निष्कर्ष में होता!
सरस सावन में रंगों का, धनुष उत्पन्न होता है!
नहीं होता कोई अवसाद, मन प्रसन्न होता है!
धवल सी चांदनी लेके, धवल चंदा भी जग आया!
मिलन भावों से पूरित होके, श्रावण मास है आया!"
"प्रकृति, अनमोल है! वो सुखद और सुरीले छण हमे प्रदान करती है! प्रकृति की एक कड़ी का मौसम, सावन भी है! चारों और हरियाली का सुखद द्रश्य, आकाश में बनने वाले इन्द्रधनुष, मयूरा का नृत्य, मिलन की सुखद अनुभूति, नए अंकुरों का विकास- आइये सावन का स्वागत करें!-चेतन रामकिशन"देव"
"है फूलों पे नया यौवन, मधु वर्षा ने बिखराया!
है वायु में भी शीतलता, सरस वातावरण छाया!
चलो स्वागत करें मिलके,सभी प्रकृति के प्रेमी,
मिलन भावों से पूरित होके, सावन मास है आया!
मयूरा नृत्य में मगनित, भ्रमर रसपान करता है!
मिलन संयोग देता है, विरह अवसान करता है!
नए पोधे के जीवन का, नया अंकुर भी उग आया!
मिलन भावों से पूरित होके, सावन मास है आया...........
इसी सावन में झूला, झूलने की रीत होती है!
सखी के मन में, एक दूजे से गहरी प्रीत होती है!
ना कोई दोष होता है, ना कोई वर्ग का दर्पण,
सभी की छाया एक जैसी, सरल प्रतीत होती है!
सुमन से गंध ले तितली, कोयल गान करती है!
सरिता भी उमड़ करके, इसे प्रणाम करती है!
सुखद सावन के गीतों का, नया सूरज भी उग आया!
मिलन भावों से पूरित होके, श्रावण मास है आया.......
धरा भी मुस्कुराती है, गगन भी हर्ष में होता!
ये सावन और मौसम से, सदा उत्कर्ष में होता!
मधुर सावन के आनंदों से होते"देव" भी हर्षित,
इस सावन का हर छण,प्रेम के निष्कर्ष में होता!
सरस सावन में रंगों का, धनुष उत्पन्न होता है!
नहीं होता कोई अवसाद, मन प्रसन्न होता है!
धवल सी चांदनी लेके, धवल चंदा भी जग आया!
मिलन भावों से पूरित होके, श्रावण मास है आया!"
"प्रकृति, अनमोल है! वो सुखद और सुरीले छण हमे प्रदान करती है! प्रकृति की एक कड़ी का मौसम, सावन भी है! चारों और हरियाली का सुखद द्रश्य, आकाश में बनने वाले इन्द्रधनुष, मयूरा का नृत्य, मिलन की सुखद अनुभूति, नए अंकुरों का विकास- आइये सावन का स्वागत करें!-चेतन रामकिशन"देव"
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