Friday, 12 December 2014

♥♥♥डाका...♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥डाका...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मुफ़लिस के हक़ पे अब पड़ता डाका है। 
चूल्हा ठंडा, उसके घर में फाका है।  

अपनी छत उधड़ी, पर क़र्ज़ परायों को,
कहो तरक्की का ये कैसा खाका है। 

दफ्तर में बेख़ौफ़ लुटेरे लूट रहे,
मानो अफसर हर मुफ़लिस का आका है। 

सूखे बच्चे रोग कुपोषण का फैला,
पुष्टाहार भले घर घर में आँका है। 

काला धन आखिर कैसे परदेश गया,
मुल्क में यूँ तो कदम कदम पर नाका है। 

अरबों, खरबों हड़प के भी आज़ाद फिरें,
कानूनों से बाल से इनका बांका है। 

"देव " नज़र ये रस्ता तकते लाल हुईं,
पर किसने मुफ़लिस के घर में झाँका है।  "

...........चेतन रामकिशन "देव"……......
दिनांक--१३.१२.२०१४



Thursday, 11 December 2014

♥♥लफ़्ज़ों की स्याही...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥लफ़्ज़ों की स्याही...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तेरा खत जब भी देखा है, तेरा एहसास पाया है। 
तेरा चेहरा, तेरे लफ़्ज़ों की स्याही में समाया है। 

भले मैं बेवफा था या वफ़ा तुम कर नहीं पायीं,
तेरे सजदे में मेरा सर, जो तेरा दिल दुखाया है। 

भले रिश्ता नहीं बाकी जो तुमसे बात भी कर लूँ,
मगर तेरे तरन्नुम ने, मेरी ग़ज़लों को गाया है।  

बिछड़ना था अगर किस्मत, तो क्यों मिलने के पल बख्शे,
खुदा तेरी खुदाई ने भी, क्या आलम दिखाया है। 

मोहब्बत मेरी नज़रों में, नहीं हसरत नुमाईश की,
तभी टूटे हुये दिल को, यहाँ मैंने छुपाया है। 

तड़प, या दर्द या आंसू, या खुशियों के कोई तोहफे,
मुझे तुमने दिया जो भी, वो माथे से लगाया है। 

सफर तन्हा है लेकिन "देव", फिर भी काट लेता हूँ,
हुनर तुमने ही तो गिरकर के, उठने का सिखाया है। "


.................चेतन रामकिशन "देव"……...........
दिनांक--१२.१२.२०१४

Tuesday, 9 December 2014

♥♥♥सफर...♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥सफर...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
सफर धीमा सही, लेकिन चलो शुरुआत करते हैं। 
नज़र खुद पे टिकाकर, आज खुद से बात करते हैं। 

नहीं आया कोई मरहम लगाने ज़ख्म पे तो क्या,
खुले घावों पे आओ, ओस की बरसात करते हैं। 

मेरे अपनों ने ही मुझको ज़हर की सुईयां घोंपी,
नहीं दुश्मन कभी छुपकर के, मुझ पे घात करते हैं। 

चलो सबको दुआ बख्शो, नहीं रखो गिले शिकवे,
नहीं इंसानियत की, नफरतों से मात करते हैं। 

उजाला बेचने वालों कभी देखो भी उस तरफ़ा,
अँधेरे में गुजारा जो यहाँ, हर रात करते हैं। 

मेरा दामन, तेरे एहसास के, रंगों से रंग जाये,
तभी हम तेरी यादों से, हमेशा बात करते हैं। 

सुनो अब "देव" तुम होना, किसे के बाद में लेकिन,
चलो पहले खुदी से प्यार के, हालात करते हैं। "

..............चेतन रामकिशन "देव"…….......
दिनांक--१०.१२.२०१४

♥♥रिक्तता...♥♥


♥♥♥♥♥रिक्तता...♥♥♥♥♥♥♥
रिक्तता बिन तेरे बहुत होती। 
आँख भी बिन तेरे नहीं सोती। 
रात की लम्बी सी सुरंगों में,
भोर भी पास में नहीं होती। 

तेरे आने की राह नजरों में। 
तेरे दर्शन की चाह नज़रों में। 
तेरी धुंधली सी भी झलक न दिखे,
तो उमड़ती है दाह नजरों में। 

चाहकर भी ये अब जटिल पीड़ा,
देखो अवकाश में नहीं होती। 
रात की लम्बी सी सुरंगों में,
भोर भी पास में नहीं होती …

प्राण के बिन मेरा ये तन रहता। 
मौन हूँ अब मैं कुछ नहीं कहता। 
" देव " पाषाण तुमने समझा तो,
बनके जलधार मैं नहीं बहता। 

ढ़लना चाहूँ मैं तेरी प्रतिमा में,
और कोई आस अब नहीं होती। 
रात की लम्बी सी सुरंगों में,
भोर भी पास में नहीं होती। "

......चेतन रामकिशन "देव"….
दिनांक--०९.१२.२०१४

Monday, 8 December 2014

♥♥♥प्रदीप्ति...♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्रदीप्ति...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
घना कोहरा, बड़ा गहरा, नहीं कुछ भी दिखाई दे। 
धधकते सूर्य के ऊपर भी, जब पहरा दिखाई दे। 
तुम्हें उम्मीद के दीयों से, उसको फिर जगाना है,
कोई ज्योति अगर तुमको, कभी बुझती दिखाई दे। 

अँधेरा देखकर, डरकर, सफर तय नहीं हो सकता। 
जिसे हो जीतना उसको कोई भय हो नहीं सकता! 
किसी का साथ मिल जाये तो बेहतर है सफर लेकिन,
कोई जो साथ छोड़े तो प्रलय भी हो नहीं सकता। 

भुजाओं में जो रखते बल, अकेले होके भी भारी। 
वही मौका गंवाता है, वो जिसकी सोच है हारी। 

सुनो संगीत तुम दिल का, जो दुनिया चुप दिखाई दे। 
घना कोहरा, बड़ा गहरा, नहीं कुछ भी दिखाई दे। "

..............चेतन रामकिशन "देव"…….......... 
दिनांक--०९.१२.२०१४

♥♥♥कविता...♥♥♥


♥♥♥♥♥♥कविता...♥♥♥♥♥♥
सखी को सौंपे प्यार कविता। 
दुश्मन को अंगार कविता। 
निर्धन के अधिकार की वाणी,
सच्ची और खुद्दार कविता। 

कविता मन में और चेतन में। 
कविता फूलों के आँगन में। 
कविता तो है भाव मखमली,
कभी जवानी और बचपन में। 

दूर दराजे फौजी को है,
माँ ममता का तार कविता ।
निर्धन के अधिकार की वाणी,
सच्ची और खुद्दार कविता....

कविता ज्योति, कविता मोती। 
कविता  मन में खुशियां बोती। 
"देव" कविता है उजियारा,
धवल चाँद सी उज्जवल होती। 

एक दूजे को प्यार बाँचती,
चंदा में दीदार कविता। 
निर्धन के अधिकार की वाणी,
सच्ची और खुद्दार कविता। "


........चेतन रामकिशन "देव"…….....
दिनांक--08.12.2014



Sunday, 7 December 2014

♥♥♥इक्कीसवीं सदी...♥♥♥



♥♥♥♥♥♥♥♥♥इक्कीसवीं सदी...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
इस इक्कीसवीं सदी का मानव बदल गया है। 
कहने को वो चाँद से आगे निकल गया है। 
हौड़ मची है दमके, नाम, अहम उसका, 
इसीलिए इन्सां का खूं भी, निगल गया है। 

छाती चौड़ी, शब्द बड़े हैं, लेकिन छोटा दिल रखता है। 
आज आदमी अपने दिल में, नफरत की महफ़िल रखता है। 
किसी के हक़ पे डाका डाले, किसी के घर की लूटे अस्मत,
पढ़ा लिखा होकर भी मानव, अब खुद को जाहिल रखता है। 

हर दिल में तेज़ाब यहाँ पर उबल गया है। 
इस इक्कीसवीं सदी का मानव बदल गया है...

नीली स्याही लाल हो गयी, अब रंगत बदहाल हो गयी। 
बस पैसों की खातिर सबकी, बदली बदली चाल हो गयी। 
कोई किसी के दुःख में आकर, नहीं बांटता जरा दिलासा,
कोष में लाख-करोड़ों लेकिन, मानवता कंगाल हो गयी। 

पल भर में अरमान यहाँ कोई कुचल गया है। 
इस इक्कीसवीं सदी का मानव बदल गया है... 

नहीं पता है आगे का, क्या आलम होगा।  
"देव" न जाने जुर्म, कभी ये कम होगा। 
घर घर में पिस्तौल की खेती होगी तब,
हर बच्चे के हाथ में, शायद बम होगा।  

आज आदमी सच्चाई से फिसल गया है। 
इस इक्कीसवीं सदी का मानव बदल गया है। "

...............चेतन रामकिशन "देव"……............
दिनांक--08.12.2014

Wednesday, 3 December 2014

♥♥♥घायल... ♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥घायल... ♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
दिल पे पत्थर मार मार के, मुझको घायल कर देते हैं। 
ये अपने हैं या फिर दुश्मन, दुख से आँचल भर देते हैं। 
जो अक्सर दावा करते हैं, मैं उनको हूँ खून से बढ़कर,
वही लोग क्यों मेरी रूह से, इस तरह छल कर देते हैं। 

प्रेम नाम की माला जपकर जो दुनिया को दिखलाते हैं। 
वही लोग क्यों निर्ममता से, प्रेम की हत्या कर जाते हैं। 
फूलों जैसे स्वप्न दिखाकर, शहद सी बातें करने वाले,
एक पल भर में ही प्यार वफ़ा के, संबंधों को झुठलाते हैं। 

एक क्षण में ही शांत नदी में, वो कोलाहल कर देते हैं। 
दिल पे पत्थर मार मार के, मुझको घायल कर देते हैं। 

मेरी आह का, मेरी चीख का, उनको असर नहीं होता है। 
क्या मालूम हमारे तन में, उनसा रुधिर नहीं होता है। 
"देव " हमारी हथेलियों में, क्या कोई ऐसी शेष है रेखा,
जिसके पथ पर पीड़ा, दुश्मन, दुख और ज़हर नहीं होता है।  

वो मिथ्या से सुरा तलक को भी, गंगाजल कर देते हैं। 
दिल पे पत्थर मार मार के, मुझको घायल कर देते हैं। "

....................चेतन रामकिशन "देव"……............. 
दिनांक--०४.१२.२०१४ 

Monday, 1 December 2014

♥♥फूल ...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥फूल...♥♥♥♥♥♥♥♥
फूल काँटों में जब खिले होंगे। 
देखकर कितने दिल जले होंगे। 

बाद अरसे के मिलने पे हो पता,
हमसे कितने उन्हें गिले होंगे। 

वो तो मुफ़लिस है और दवा महंगी,
घाव हाथों से ही सिले होंगे।  

प्यार में दिन का हर पहर उनका,
रात को ख्वाब में मिले होंगे। 

वो यकीं चाहकर भी कर न सके,
जिनके अरमान बस छले होंगे। 

उनको मालूम क्या मोहब्बत है,
जिस्म से खून जो मले होंगे। 

"देव " अपने हैं सिर्फ वो देखो,
दर्द में साथ जो चले होंगे। "

.....चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक-०२.१२.२०१४ 

♥♥रस्म प्यार की......♥♥

♥♥♥♥रस्म प्यार की......♥♥♥♥
जान बूझकर खता कर रहे।
रस्म प्यार की अता कर रहे। 
जो कहते थे मैं दिल में हूँ,
वही हमारा पता कर रहे।

प्यार नाम का भी क्या करना,
जो सूरत भी याद रहे न। 
इतना अनदेखा भी क्यों हो,
जो कोई संवाद रहे न। 
यदि निहित तुम हो नहीं सकते,
नहीं सुहाती प्यार की भाषा,
तो क्यों ऐसा ढोंग दिखावा,
जिसमे दिल आबाद रहे न।

जो चाहते थे नाम हमारा,
वही हमें लापता कर रहे। 
जो कहते थे मैं दिल में हूँ,
वही हमारा पता कर रहे...

क्यों रिश्तों में रस्म निभानी,
क्यों चाहत की नींव गिरानी। 
क्यों देकर के झूठी खिदमत,
किसी के दिल को ठेस लगानी। 
"देव " प्यार के संग में ऐसा,
बोलो ये खिलवाड़ भला क्यों,
साथ नहीं जब दे सकते तो,
क्यों झूठी उम्मीद बंधानी।

वो क्या देंगे यहाँ सहारा,
अनुभूति जो धता कर रहे। 
जो कहते थे मैं दिल में हूँ,
वही हमारा पता कर रहे। "
........चेतन रामकिशन "देव"…….
दिनांक-३०.११.२०१४






♥♥मुफ़लिस...♥♥

♥♥♥♥♥मुफ़लिस...♥♥♥♥♥♥
खून, पसीना बह जाता है। 
मुफ़लिस बेबस रह जाता है। 
बीमारी में घर बिक जाये,
घर का चूल्हा ढह जाता है। 

इन सरकारी दवा घरों में,
दवा नाम भर को मिलती है। 
मुफ़लिस को तो कदम कदम पर,
ये सारी दुनिया छलती है। 
मजदूरी को जाने वाले कितने,
देखो मर जाते हैं,
लावारिस में दर्ज हो गिनती,
कफ़न तलक भी कब मिलती है। 

चौथा खम्बा भी खुलकर के,
कब इनका हक़ कह पाता है। 
बीमारी में घर बिक जाये,
घर का चूल्हा ढह जाता है …

सरकारों की अब मुफ़लिस के,
दर्द पे ज्यादा नज़र जरुरी। 
बिन छत के जो जले धूप में,
उसकी खातिर शज़र जरुरी। 
"देव" देश के मुफ़लिस की हो,
बात जात मजहब से हटकर,
प्यास उसे भी लगती देखो,
उसको भी तो लहर जरुरी। 

बिना सबूतों के वो बेबस,
कड़ी सजा भी सह जाता है। 
बीमारी में घर बिक जाये,
घर का चूल्हा ढह जाता है। "


........चेतन रामकिशन "देव"…….
दिनांक-३०.११.२०१४






Friday, 28 November 2014

♥♥माँ की एक छुअन...♥♥



♥♥♥♥♥♥♥♥माँ की एक छुअन...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
संतानों की देख के पीड़ा, माँ का दिल रोने लगता है। 
कष्ट में संतान हो तो माँ का, चैन सुकूं खोने लगता है। 
माँ तो माँ है संतानों की, सूरत में दुनिया को देखे,
नींद तभी आती है माँ को, जब बच्चा सोने लगता है। 

माँ की ममता इतनी व्यापक, लाखों सागर भर जाते हैं। 
माँ को खुशियां मिलती हैं जब, बच्चे अच्छा कर जाते हैं। 

माँ की एक छुअन भर से ही, दर्द दूर होने लगता है।  
संतानों की देख के पीड़ा, माँ का दिल रोने लगता है। 

माँ कविता जैसी कोमल है, माँ गीतों जैसी प्यारी है। 
माँ लेखन की खुशबू में है, माँ उपवन है, फुलवारी है। 
माँ गौरी हो, या काली हो, फ़र्क़ नहीं पड़ता है इससे,
माँ की ममता धवल चांदनी, माँ की ममता मनोहारी है। 

माँ अपनी संतान के आंसू, बिना झिझक के पीना चाहे। 
माँ बच्चों की खुशियों में ही, अपना जीवन जीना चाहे। 

माँ खुश होती है जब बच्चा, ख्वाबों का बोने लगता है। 
संतानों की देख के पीड़ा, माँ का दिल रोने लगता है। 

माँ मिथ्या के अनुसरण का, ज्ञान नहीं बच्चों को देती। 
माँ ईर्ष्या का, द्वेष का किंचित, दान नहीं बच्चों को देती। 
"देव " जहाँ में माँ से सुन्दर, कोई छवि नहीं हो सकती,
माँ भूले दुख का विष का, पान नहीं बच्चों को देती। 

माँ की आँखों में बच्चों की, सूरत हर पल ही रहती है। 
माँ को हो सम्मान सदा ही, सारी कुदरत ये कहती है। 

माँ की ऐसी ममता से तो, ज़हर-मधु होने लगता है। 
संतानों की देख के पीड़ा, माँ का दिल रोने लगता है। "


"
माँ- शब्दकोष के सभी शब्द जो प्रसंशा के लिए, सम्मान के लिए, अपनत्व के प्रयुक्त होते हों, वे समूचे शब्द माँ की ममता में निहित होते हैं, माँ के ऐसे व्यापक स्वरूप को नमन। "

" मेरी ये रचना मेरी दोनों माताओं कमला देवी जी एवं प्रेमलता जी को सादर समर्पित। "

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक- २९.११.२०१४ 

" "




Wednesday, 26 November 2014

♥♥♥मोम...♥♥♥♥



♥♥♥♥♥♥♥♥मोम...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
जब पत्थर को मोम बनाया जाता है। 
नफ़रत का हर राग भुलाया जाता है। 

हर ख़्वाहिश पूरी न होती दुनिया में,
कभी कभी खुद को समझाया जाता है। 

ऊंच नीच, दौलत की बातें दूर रहें,
दिल से दिल का मेल कराया जाता है। 

अपनी कमियां भी आँखों में आ जायें,
जब दर्पण खुद को दिखलाया जाता है। 

खुशियां आतीं घर की चोखट पे खुलकर,
जब बिटिया को भी मुस्काया जाता है। 

एक दिन देखो नज़र जहां की पड़ जाये,
प्यार को बेशक लाख छुपाया जाता है। 

"देव" उन्हें भी कद्र दोस्ती की होगी,
आज भले दुश्मन बतलाया जाता है। "

........चेतन रामकिशन "देव"…….
दिनांक-२६.११.२०१४

Tuesday, 25 November 2014

♥♥मेरा मुझमें क्या...♥♥

♥♥♥♥मेरा मुझमें क्या...♥♥♥♥
तुमसे मिलने जुलने का मन। 
साथ तुम्हारे चलने का मन। 
तेरे उजाले की खातिर अब, 
दीपक बनकर जलने का मन। 

जब से तुमसे प्रेम हुआ है,
मेरा मुझमें शेष नहीं कुछ। 
तुमने कोमलता सिखलाई,
अब मन में आवेश नहीं कुछ। 

जो तेरे माकूल हो वैसे,
तेरी ख़ातिर ढ़लने का मन। 
तेरे उजाले की खातिर अब, 
दीपक बनकर जलने का मन। 

जब से तुम भावों में आये,
कविताओं के फूल खिले हैं। 
शब्द भी रहते "देव" कलम में,
एहसासों को रंग मिले हैं। 

तेरे अधरों की नरमी को,
हिम से जल में घुलने का मन। 
तेरे उजाले की खातिर अब, 
दीपक बनकर जलने का मन। "

......चेतन रामकिशन "देव"……...
दिनांक-२६.११.२०१४ 

♥♥♥फासले...♥♥♥


♥♥♥♥♥फासले...♥♥♥♥♥♥
फासले पास में नहीं रखना। 
दर्द, एहसास में नहीं रखना। 

मैं पुकारूँ जो और तुम न मिलो,
खुद को वनवास में नहीं रखना।  

चाँद हो तुम, मगर कभी खुद को,
दूर आकाश में नहीं रखना। 

जो मेरा दिल कहे वो दे दो तुम,
बात कोई काश में नहीं रखना। 

लिखो, चिपकाओ और मुझे भेजो,
ख़त को अवकाश में नहीं रखना। 

पत्तियां, फूल जो तरसते रहें,
सूखा मधुमास में नही रखना। 

"देव " देरी हो पर नहीं दूरी,
खुद को प्रवास में नहीं रखना। "

......चेतन रामकिशन "देव"……...
दिनांक-२५.११.२०१४

Sunday, 23 November 2014

♥♥♥हे! कुदरत...♥♥♥


♥♥♥♥♥हे! कुदरत...♥♥♥♥♥
माँ की गोद में रखा सर हो। 
भरा ख़ुशी से सबका घर हो। 
हिंसा, नफरत, शूल रहें न,
भूखा कोई, न बेघर हो। 

हे! कुदरत तुमसे विनती है,
दिल लोगों का साफ़ करो तुम। 
न्याय की खातिर भटक रहा जो,
उसके संग इन्साफ करो तुम। 
ये क्या तुम आँखों को मूंदे,
लाचारों पर जुल्म देखतीं।
जो लोगों के हक़ को लूटें,
कभी न उनको माफ़ करो तुम। 

बिन रोटी के मरे न मुफ़लिस,
और न जल में घुल जहर हो। 
हिंसा, नफरत, शूल रहें न,
भूखा कोई, न बेघर हो...

सही कार्य का अवलोकन कर,
उसको आगे करते रहना। 
हे! कुदरत तुम शक्तिशाली,
पापी जन का बोझ न सहना। 
"देव" की तरह लोग अनेकों,
विनती तुमसे ये करते हैं,
नहीं तनिक भी निर्दोषों के,
घर को बिजली बनकर ढहना। 

इस जग को तुम ऐसा कर दो,
घर घर में बहता मधुकर हो। 
हिंसा, नफरत, शूल रहें न,
भूखा कोई, न बेघर हो। "

........चेतन रामकिशन "देव"…….
दिनांक-२४ .११.२०१४


Saturday, 22 November 2014

♥♥मिथ्या सौगंध...♥♥


♥♥♥मिथ्या सौगंध...♥♥♥
फूलों में भी गंध नहीं है। 
अब सच्ची सौगंध नहीं है। 
क्षण भर में सब अलग हो रहे,
रूहानी सम्बन्ध नहीं है। 

चटक रहे दिल शीशे जैसे,
भावुकता का मान नहीं है। 
दर्द किसी को कितना होगा,
मानो उनको ज्ञान नहीं है। 
परदे पर नाटक का मंचन,
करके पात्र बदल जाते हैं,
कसमें, वादे, प्यार, वफ़ा का,
अब कोई स्थान नहीं है। 

खेल रहें हैं लोग दिलों से,
कोई प्रतिबन्ध नहीं है। 
क्षण भर में सब अलग हो रहे,
रूहानी सम्बन्ध नहीं है...

नाम की नातेदारी रखना,
अब लोगों का नया नियम है। 
तोड़ के दिल वो सोच रहे हैं,
मानो कोई सही करम है। 
"देव" न जाने क्यों लोगों के,
हाथ जरा भी नहीं कांपते,
अब अपनायत नहीं रही है,
न ही मन में बचा रहम है। 

मारके दिल लावारिस छोड़ें,
कफ़न का भी प्रबंध नहीं है। 
 क्षण भर में सब अलग हो रहे,
रूहानी सम्बन्ध नहीं है। "

........चेतन रामकिशन "देव"…….
दिनांक-२३.११.२०१४ 

Wednesday, 19 November 2014

♥♥साथ ग़र तेरा...♥♥

♥♥♥♥♥साथ ग़र तेरा...♥♥♥♥♥
साथ ग़र तेरा मिल गया होता। 
प्यार का दीप जल गया होता। 

हौंसला तेरे प्यार का पाकर,
ग़म का पर्वत भी हिल गया होता। 

तू जो हाथों से अपने देती शिफ़ा,
मेरा हर घाव सिल गया होता। 

बीज उल्फ़त के रोंप देतीं अगर,
फूल चाहत का खिल गया होता। 

प्यार का मुझको ऐसा देते शहद,
मेरे दिल में जो घुल गया होता।    

रौशनी लेके तेरी रंगत की,
ये अँधेरा भी ढल गया होता। 

प्यार तक़दीर में नहीं शायद,
"देव" होता तो मिल गया होता। "

........चेतन रामकिशन "देव"…….
दिनांक-१९.१०.२०१४

Monday, 17 November 2014

♥♥तेरी नज़दीकी...♥♥♥


♥♥♥♥♥तेरी नज़दीकी...♥♥♥♥♥♥
रात आकाश को छुपाने लगी। 
मुझको भी तेरी याद आने लगी। 

तेरी सूरत को और दमक देने,
चांदनी फिर जमीं पे आने लगी। 

तू जो आई जो मेरी देहरी पर,
दीप की लौ भी खिलखिलाने लगी। 

तेरी नज़दीकी का असर पाकर,
जिंदगी सारे ग़म भुलाने लगी। 

हर तरफ पर फूल खिल गए जबसे,
प्यार की दुनिया तू वसाने लगी। 

हर घड़ी तेरा ही तसुव्वर है,
रूह में जब से तू समाने लगी। 

"देव" सर मेरा गोद में रखकर,
प्यार से मुझको तू सुलाने लगी। "

........चेतन रामकिशन "देव"………
दिनांक-१७.१०.२०१४ 

Saturday, 15 November 2014

♥♥♥♥क्षणभंगुर...♥♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥क्षणभंगुर...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
क्षणभंगुर है जोड़ दिलों का, पल में खंडित हो जाता है। 
सही मनुज भी निर्ममता से, जग में दंडित हो जाता है। 
वो जिसको एहसास नहीं हो, यहाँ प्रेम की भावुकता का,
वही यहाँ झूठे तथ्यों से, प्रेम का पंडित हो जाता है। 

प्रेम का अंकन मुखपृष्ठों पर, अंकित करना प्रेम नहीं है। 
बस अपने को श्रेष्ठ समझकर, सुरभित करना प्रेम नहीं है। 
प्रेम तो है एक भाव समर्पण, नहीं कोई ऊँचा न नीचा,
ऊपरी मन से, प्रेम पुष्प को, पुलकित करना प्रेम नहीं है। 

प्रेम नहीं वो जिसमें धन का, वंदन मंडित हो जाता है। 
क्षणभंगुर है जोड़ दिलों का, पल में खंडित हो जाता है... 

प्रेम विषय के संदर्भों में, सबकी अपनी परिभाषा है। 
वो उतना ही प्रेम में डूबे, जिसकी जितना जिज्ञासा है। 
"देव" यहाँ पर प्रेम को कोई, महज तनों का मिलन बताये,
और किसी की विश्लेषण में, प्रेम आत्मा की भाषा है। 

वो क्या जाने प्रेम को जिसका, मूल्य घमंडित हो जाता है। 
क्षणभंगुर है जोड़ दिलों का, पल में खंडित हो जाता है।  "

...................चेतन रामकिशन "देव"…..................
दिनांक-१६.१०.२०१४