Thursday, 12 March 2015

♥♥इतिहास...♥♥



♥♥♥♥♥इतिहास...♥♥♥♥♥♥♥
प्रेम का हर इतिहास तुम्ही से। 
कायम है एहसास तुम्ही से। 
तुम वर्णित हो प्रेम कथा में,
बरसाने का रास तुम्ही से। 
तुम्हे देखकर हंस लेता हूँ,
मेरा हर उल्लास तुम्ही से। 
तुम मुझको प्रेरित करती हो,
है मेरा प्रयास तुम्ही से। 

तुम वीणा की मधुर तान में,
तुम गायन के सात स्वर में। 
खुशियां आँगन में रहती हैं,
तुमसे ही रौनक है घर में। 

तुमसे हरी भरी पृथ्वी है,
और नीला आकाश तुम्ही से। 
तुम मुझको प्रेरित करती हो,
है मेरा प्रयास तुम्ही से ...

तुम रंगोली के रंगों में,
तुमसे आलेखन बनता है। 
बिना तुम्हारे मैं अपूर्ण हूँ,
तुमसे ही जीवन बनता है। 
केश तुम्हारे इतने प्यारे,
मुझे बचाते कड़ी धूप से,
तुम घर की आधार कड़ी हो,
तुमसे ही आँगन बनता है। 

तुमसे ही कविता रचती है,
भावों का अभ्यास तुम्ही से। 
तुम मुझको प्रेरित करती हो,
है मेरा प्रयास तुम्ही से ...

तुम आकर्षक, मनोहारी हो,
और आत्मा से प्यारी हो। 
एक दूजे के एहसासों में,
जीवन की साझेदारी हो। 
"देव" तुम्हारे प्रेम को पाकर,
पतझड़ में सावन बरसा है,
तुम बगिया की हरियाली में,
तुम फूलों की फुलवारी हो। 

तुम्ही साल में, तुम जीवन भर,
दिवस, निशा, हर मास तुम्ही से। 
तुम मुझको प्रेरित करती हो,
है मेरा प्रयास तुम्ही से। "

.....चेतन रामकिशन "देव".......
दिनांक-१२.०३.२०१५

Wednesday, 11 March 2015

♥♥फसल...♥♥


♥♥♥♥♥♥फसल...♥♥♥♥♥♥♥
फसल ग़मों की बड़ी हो गयी,
करें काटने की तैयारी। 
विष पीकर के रात कटी थी,
अब आयी है दिन की बारी। 
अपने हर एहसास को मैंने,
मिट्टी में अब मिला दिया है,
क्यूंकि दुनिया में नहीं होती,
दिल से दिल की नातेदारी। 

एहसासों की कद्र नहीं है,
सभी वसीयत चाहते सुख की। 
कोई नहीं पढ़ना चाहता है,
पीड़ा यहाँ किसी के मुख की। 

कोई नहीं हमदर्द है तो फिर,
दर्द की किससे साझेदारी। 
फसल ग़मों की बड़ी हो गयी,
करें काटने की तैयारी ... 

अनुकरण के भाव नहीं हैं,
सब उपदेशक बनना चाहें। 
खुद का जीवन नहीं संभलता,
पर निर्देशक बनना चाहें। 
"देव" यहाँ पर मिन्नत कोई,
नहीं सुना करता है देखो,
लेकिन पुस्तक के पन्नों पर,
प्रेम के प्रेषक बनना चाहें।

दिवस रात बढ़ती रहती है, 
जीवन में ग़म बीमारी।  
फसल ग़मों की बड़ी हो गयी,
करें काटने की तैयारी। "

.......चेतन रामकिशन "देव"........
दिनांक-१२.०३.२०१५

♥♥नीला आसमान...♥


♥♥♥नीला आसमान...♥♥♥
तुम से है एहसास सजीला। 
ग़ुल सरसों का तुमसे पीला। 
तुम आयीं तो दमक उठा मन,
जीवन मेरा रंग रंगीला। 
सखी प्रेम की वर्षा कर दो,
हो जाये पतझड़ भी गीला। 
हम दोनों का प्यार देखकर,
आसमान भी होता नीला। 

सखी दूर जब तुम जाती हो,
तो रोने का मन होता है। 
बिना तुम्हारे नहीं रात को,
भी सोने का मन होता है। 
हाथ थामकर तेरा जग में,
अपनी सुबहो शाम करूँ मैं,
तेरे प्यार के इन्द्रधनुष में,
बस खोने का मन होता है। 

तुमसे ही खुश होता आँगन,
तुमसे कुनबा और कबीला। 
हम दोनों का प्यार देखकर,
आसमान भी होता नीला ...

सखी परस्पर एहसासों में,
जब हम दोनों मिल जाते हैं। 
मन से ग़म का पतझड़ मिटता,
फूल ख़ुशी के खिल जाते हैं। 
"देव" तुम्हारा कुछ लम्हों का,
साथ मुझे देता है ऊर्जा,
तुमसे मिलकर खुशहाली के,
द्वार अनेकों खुल जाते हैं। 

तेरी प्रेम की ऊर्जा पाकर,
गिर जाता है ग़म का टीला। 
हम दोनों का प्यार देखकर,
आसमान भी होता नीला। "

........चेतन रामकिशन "देव".........
दिनांक-११.०३.२०१५

Tuesday, 10 March 2015

♥♥♥गुलदस्ते...♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥गुलदस्ते...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
सोचा था कुछ फूल खिलेंगे, यही सोच गुलदस्ते लाया।
अरसा बीता किसी डाल पर, फूल कोई लेकिन न आया।
यूँ तो मैंने हर दम उसको, अपने अश्कों से सींचा था,
रही कौनसी कमी आज तक, नहीं किसी ने भी समझाया।

नागफनी जैसी रातें हों और कंटीला दिन होता है।
ऑंखें रोकर लाल हो गयीं हैं, और हमारा मन रोता है।
मंचों पर जाकर पढ़ते वो, प्रेम भाव की बड़ी कविता,
पर सीने में झांकके देखो, उनका छोटा दिल होता है।

किस्मत को मंजूर न शायद, हसीं बहारों का वो साया।
सोचा था कुछ फूल खिलेंगे, यही सोच गुलदस्ते लाया...

चलो मुझे पतझड़ प्यारा है, और बिना गुल की डाली भी।
जो दे दो मंजूर  है मुझको, तड़प, वेदना, तंगहाली भी।
"देव" यदि तुम खुश होते हो, मेरे घर को फूंक फूंककर,
तो आ जाओ, नहीं रोकता, चलो मना लो दिवाली भी।

मेरी तो आदत है यारों, दुश्मन को भी गले लगाया।
सोचा था कुछ फूल खिलेंगे, यही सोच गुलदस्ते लाया। "

 ...................चेतन रामकिशन "देव"..................
दिनांक-१०.०३.२०१५







 

Monday, 9 March 2015

♥♥मेरे मन की...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥मेरे मन की...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मेरे मन की भी सुनते तुम, बस अपना निर्णय देते हो। 
मेरा जीवन शांत नदी सा, लेकिन तुम प्रलय देते हो। 
तुम अपनी खातिर खुशियों का, ताना बाना बुनना चाहो,
लेकिन मेरी हंसी ख़ुशी में, तुम क्यों आखिर क्षय देते हो। 

इस एकतरफा सोच को देखो, नहीं प्रीत बोला जाता है। 
प्रीत के रिश्ते को दुनिया में, न धन से तौला जाता है। 

मुझे गिराकर क्यों तुम आखिर, सोच को अपनी जय देते हो। 
मेरे मन की भी सुनते तुम, बस अपना निर्णय देते हो...

तुमसे अपनी प्रीत के बदले, बस थोड़ा सा प्यार ही चाहा। 
नाम मुझे तुम दे दो अपना, इतना सा ही अधिकार ही चाहा। 
"देव" तुम्हे मैंने जीवन में, मान दिया है खुद से ज्यादा,
मैंने तुमसे उसके बदले, मुट्ठी भर सत्कार ही चाहा। 

काश मेरी चीखों को सुनकर, निकट हमारे तुम आ जाते। 
सच कहती हूँ मेरे मन पे, चाहत के बादल छा जाते। 

मैं चाहती हूँ मिलन प्यार का, तुम विरह का भय देते हो। 
मेरे मन की भी सुनते तुम, बस अपना निर्णय देते हो। "


....................चेतन रामकिशन "देव".....................
दिनांक-०९.०३.२०१५



Sunday, 8 March 2015

♥♥तेरे केश की बूंदें...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥तेरे केश की बूंदें...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
यदि मिलन तुमसे हो जाता, भाव विरह का कम हो जाता। 
गिरती बूंदें तेरे केश से, सूखा पथ भी नम हो जाता।
मुझमें भी आ जाती ऊर्जा, स्वप्न मेरी आँखों में सजते,
दीप हर्ष के जलने लगते, दूर ये सारा तम हो जाता। 

रात को तेरा रस्ता देखा, हर दिन तुम्हें पुकारा मैंने। 
खुद को पत्थर माना किन्तु, तुमको चाँद सितारा मैंने। 
चित्र तुम्हारा सम्मुख रखकर, किया हमेशा प्रेम निवेदन,
अनजाने में भूल हुयी पर, खेद यहाँ स्वीकारा मैंने... 

जीने को तो जी लेता हूँ, पर तुम बिन उत्साह नहीं है। 
जगत समूचा पास है किन्तु, मुझे किसी की चाह नहीं है। 
"देव" जुड़ा है मन तुमसे तो, तभी तेरी प्रतीक्षा करता,
वरना दुनिया आनी जानी, मुझे किसी की राह नहीं है... 

तुम जो देतीं साथ अगर तो, मैं भी बल विक्रम हो जाता। 
दीप हर्ष के जलने लगते, दूर ये सारा तम हो जाता। "

....................चेतन रामकिशन "देव".....................
दिनांक-०८.०३.२०१५

Saturday, 7 March 2015

♥♥एक नारी...♥♥



♥♥♥♥♥♥♥♥♥एक नारी...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
एक नारी वेदना के विष को, निश दिन पी रही है। 
एक नारी जिंदगी को, दंड जैसे जी रही है। 
हाँ सही अपवाद हैं कुछ, पर यही अधिकांशत है,
एक नारी अपने मन के टुकड़े, खुद ही सी रही है। 

उसके मन में है समर्पण, जिसकी सीमा तय नहीं है। 
क्यों मगर स्त्री की फिर भी, इस जगत में जय नहीं है। 
कौन ऐसा रास्ता है, वो जहाँ पर हो सुरक्षित,
कौन सी ऐसी जगह है, उसको जिस पर भय नहीं है। 

अपने अश्रु भोर, संध्या, रात, दिन वो पी रही है। 
एक नारी वेदना के विष को, निश दिन पी रही है... 

वो नहीं चाहती समूचे, विश्व पर हो राज उसका। 
वो तो चाहती है ख़ुशी से, पूर्ण हो कल-आज उसका। 
उसके मन की वेदना को, कोई बस पढ़ले यहाँ पर। 
तो ही स्त्री खुश रहेगी, अपनी दुनिया और जहाँ पर। 

अपने घर की पूर्णता को, रिक्त होकर जी रही है। 
एक नारी वेदना के विष को, निश दिन पी रही है...

उसका आँचल रक्त में, डूबे नहीं प्रयास दे दो। 
वो भी चाहती है दमकना, उसको तुम उल्लास दे दो। 
"देव" नारी भी पराक्रम और पूरित योग्यता से,
वो तुम्हे दे चांदनी और तुम उसे प्रकाश दे दो। 

मल दो मरहम घाव पे वो, जिसको नारी सी रही है। 
एक नारी वेदना के विष को, निश दिन पी रही है। "


" अपने त्याग, समर्पण एवं स्नेह से, आँगन में जीवन भरने वाली, महिला शक्ति नमन के योग्य है, एक ऐसा जगत बन सके जहाँ नारी और पुरुष, दो ध्रुव नहीं बल्कि एक पृथ्वी, एक आसमान, एक ब्रहमांड बन जाएँ, निहित हो जायें, मान-सम्मान और स्वाभिमान, इसी कामना में। "

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-०८.०३.२०१५ 

" सर्वाधिकार सुरक्षित, मेरी ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित है। "

♥♥मन की भाषा...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥मन की भाषा...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
पढ़े-लिखे तो बहुत थे तुम पर, मन की भाषा जान सके न। 
मेरे सीने में भी दिल था, तुम उसको पहचान सके न। 
सागर जैसे आंसू देकर, मुझसे नाता तोड़ गये हो,
नाम का था शायद अपनापन, दिल से अपना मान सके न।

बस तुमसे है यही पूछना, क्यों जीवन में तुम आये थे। 
इसी तरह ग़र तड़पाना था, क्यों फिर संग संग मुस्काये थे। 

बड़ी बड़ी कसमें खाते थे, पर तुमको उनको ठान सके न। 
पढ़े-लिखे तो बहुत थे तुम पर, मन की भाषा जान सके न... 

आज कलंकित बतलाते हो, कल लेकिन पावन कहते थे। 
आज मुझे मृत्यु का दर्जा, कल लेकिन जीवन कहते थे। 
"देव" जहाँ में रंग बदलना, कोई सीखे आखिर तुमसे,
आज मुझे पतझड़ बतलाया, कल जबकि सावन कहते थे। 

आज मेरी पीड़ा पे खुश हो, कल कैसे आंसू बहते थे। 
तोड़ रहे हो तुम उस दिल को, जिस दिल में बस तुम रहते थे। 

मूकबधिर मुझको कहते हो, आह मगर तुम जान सके न। 
पढ़े-लिखे तो बहुत थे तुम पर, मन की भाषा जान सके न। "

......................चेतन रामकिशन "देव"......................
दिनांक-०७.०३.२०१५

Friday, 6 March 2015

♥♥प्रेम का गंगा जल ...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्रेम का गंगा जल ...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
पावन हो जायेगा जीवन, प्रेम का तुम गंगा जल दे दो। 
जीवन में भी प्रगति होगी, समस्याओं का तुम हल दे दो। 
कल तुमसे था, आज तुम्ही से, साँझ सवेरा सब कुछ तुमसे,
जीवन उज्जवल हो जायेगा, शेष काल तुम कल दे दो। 

तुम नयनों की ज्योति जैसी, मन में आशा भर देती हो। 
तुम मेरे छोटे सपनों को, उड़ने हेतु पर देती हो। 

निहित तुम्हीं में प्रेम आस्था, मुझको मुंहमांगा फल दे दो। 
पावन हो जायेगा जीवन, प्रेम का तुम गंगा जल दे दो...

साथ तुम्हारे पहली होली, फागुन की उपलब्धि जैसी। 
तुमसे ही जीवन में बरकत, जीवन की समृद्धि जैसी। 
"देव" तुम्ही से चमक रहा मन, धवल चाँद की किरणों जैसा,
तुम जीवन में निश्छल मूरत, तुम जीवन की शुद्धि जैसी।

तुम्हें देखना चाहें आँखें, इंतजार करती रहती है।
तुम क्या जानो बिना तुम्हारे, कितना ये बहती रहती हैं। 

पाना चाहूँ तेरी निकटता, मुझको अपना आँचल दे दो। 
पावन हो जायेगा जीवन, प्रेम का तुम गंगा जल दे दो। "

...................चेतन रामकिशन "देव".....................
दिनांक-०६.०३.२०१५

Wednesday, 4 March 2015

♥♥रंग रुधिर का...♥♥

♥♥♥♥रंग रुधिर का...♥♥♥♥
रंग रुधिर का बहुत बहा है।
अब अपनापन कहाँ रहा है।
बंटे बंटे त्यौहार सभी के,
मानवता ने दमन सहा है।
देश के दुश्मन निर्दोषों के,
रक्त से होली खेल रहें हैं,
है निर्धन की स्याह कोठरी,
चूल्हा, छप्पर सभी ढ़हा है।

रहें वर्ष भर पीड़ा देते,
किन्तु एक दिन रंग लगायें।
मन से मन तो मिला नहीं पर,
लेकिन सीने से लग जायें।
हाँ अच्छा है दूरी मिटना,
पर न बस खानापूरी हो।
होली का त्यौहार बाद में,
पहले न दिल में दूरी हो।

पीड़ित की तो आह निकलती,
शोषक को, आनंद अहा! है।
है निर्धन की स्याह कोठरी,
चूल्हा, छप्पर सभी ढ़हा है....

नहीं नाम को रंग लगाओ,
नहीं किसी को गले लगाओ।
नहीं मोहब्बत है जो दिल में,
साथ झूठ को, नहीं निभाओ।
"देव" किसी की लाश के ऊपर,
ताजमहल बनवाने से तो,
बेहतर है भूखे प्यासे को,
तीन वक़्त का अन्न खिलाओ।

हो सबको त्यौहार मुबारक,
हमने रब से यही कहा है। 
है निर्धन की स्याह कोठरी,
चूल्हा, छप्पर सभी ढ़हा है। "

....चेतन रामकिशन "देव".....
दिनांक-०५.०३.२०१५


Tuesday, 3 March 2015

♥♥पुनर्गठन...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥पुनर्गठन...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
अपने खंडित मन का फिर से, पुनर्गठन करना चाहता हूँ। 
मैं पीड़ा के विस्थापन को, घोर जतन करना चाहता हूँ। 
नया नवेला दुःख न कोई, मेरे जीवन को मुरझाये,
इसीलिए मैं अपने भीतर, आज अगन भरना चाहता हूँ। 

हाँ मैंने जाना जीवन में, लोग अधिकतर छल करते हैं। 
नहीं सूखता कभी सरोवर, नयन में इतना जल भरते हैं। 
करुण निवेदन की अनदेखी, और केवल हठधर्मी होना,
मेरी कोई कठिनाई का, नहीं जरा भी हल करते हैं। 

तभी मैं खुद ही कठिनाई का, बहिर्गमन करना चाहता हूँ। 
अपने खंडित मन का फिर से, पुनर्गठन करना चाहता हूँ... 

हूँ अपराधी नहीं मुझे पर, दंड बहुत सहना पड़ता हूँ। 
एकाकीपन की धरती पर, बिन इच्छा रहना पड़ता है। 
"देव" हूँ मानव मैं भी तुमसा, क्यों मुझको पाषाण समझते,
सोच सोच कर यही सभी कुछ, आँखों को बहना पड़ता है। 

इस पीड़ा की जिजिभिषा का, प्रबंधन करना चाहता हूँ। 
अपने खंडित मन का फिर से, पुनर्गठन करना चाहता हूँ। "

.....................चेतन रामकिशन "देव".....................
दिनांक-०३.०३.२०१५

Monday, 2 March 2015

♥♥♥अंगारे...♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥अंगारे...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
आग लगाकर खुश होते हैं, जहर पिलाकर खुश होते हैं। 
लोग यहाँ पत्थर दिल वाले, खून बहाकर खुश होते हैं। 

क्या दुनिया है समझ न पाया, इसीलिए मैं मौन हुआ हूँ। 
कल तक जिनका हमसाया था, आज मैं उनको कौन हुआ हूँ। 
गुमसुम होकर, आँख मूंदकर, दर्द हर एक मैं सह लेता हूँ। 
मेरे संग, मेरी तन्हाई,  उससे दिल की कह लेता हूँ। 

जो देता है यहाँ सहारा, उसे गिराकर खुश होते हैं। 
लोग यहाँ पत्थर दिल वाले, खून बहाकर खुश होते हैं.... 

बिना जुर्म के सज़ा मिली तो, विस्फोटक तो बनना ही था। 
आस छोड़कर सबकी खुद का, संकटमोचक बनना ही था। 
"देव" किसी मासूम पे जग में, जब कौड़े हंटर चलते हैं। 
तब ही उसके कोमल दिल में, अंगारे हर दिन जलते हैं।

नन्हीं मुन्ही हरियाली को, ख़ार बनाकर खुश होते हैं। 
लोग यहाँ पत्थर दिल वाले, खून बहाकर खुश होते हैं। "

...................चेतन रामकिशन "देव"...................
दिनांक-०३.०३.२०१५





♥♥♥कैसी होली..♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥कैसी होली..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
विरह में डूबी रात कठिन है, तिमिर बहुत गहरा छाया है। 
दिन भी बीता सुबक सुबक कर, चैन नहीं पल को आया है। 
आँखों में लाली छाई है और चेहरे पे बड़ी उदासी,
बिना तुम्हारे रंग हैं फीके, होली पे दिल भर आया है। 

तुमने दिल की सुनी नहीं क्यों, क्यों मुझसे नाता तोड़ा है। 
नहीं ख़ुदकुशी मुझे गवारा, पर जीवन भी कब छोड़ा है। 

तुम बिन हंसी, ख़ुशी सब भूला, कदम कदम पे ग़म पाया है। 
विरह में डूबी रात कठिन है, तिमिर बहुत गहरा छाया है.... 

रंगों का त्यौहार निकट है, होली पे वापस आ जाना। 
तरस गया हूँ मैं खिलने को, मुझे प्यार का रंग लगाना। 
"देव" तुम्हारे बिन अरसे से, नींद नहीं आई आँखों को,
गोद में मेरा सर रखकर के, मुझको मीठी नींद सुलाना। 

तुम आओगी तो होली पर, रंग हजारों खिल जायेंगे। 
चाँद चांदनी बरसायेगा, जब हम दोनों मिल जायेंगे। 

दुनिया में हैं लोग करोड़ों, नहीं मगर तुमसे पाया है। 
विरह में डूबी रात कठिन है, तिमिर बहुत गहरा छाया है। "

....................चेतन रामकिशन "देव"........................
दिनांक-०२.०३.२०१५

Sunday, 1 March 2015

♥♥♥♥खत...♥♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥खत...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
किसी के वास्ते लिखा हुआ ख़त, लौट आया है। 
वो मुझको भूल बैठा या पता झूठा बताया है। 
मैं अपने खत को हाथों में, पकड़ जो देखने बैठा,
लगा के मेरे लफ़्ज़ों ने, बड़ा सागर बहाया है। 

वफ़ा के साथ में अक्सर, यही खिलवाड़ क्यों होता। 
कोई चिट्ठी न अपनाये, पता सच्चा नही होता। 

इन्हीं सब उलझनों ने आज फिर से, दिल दुखाया है। 
किसी के वास्ते लिखा हुआ ख़त, लौट आया है.... 

नहीं मालूम क्यों एहसास की, कीमत नहीं होती। 
मेरी चिट्ठी यही सब सोचकर के, ग़मज़दा होती। 
भरोसा टूटने लगता है मेरा "देव" उस लम्हा,
किसी के प्यार की क्यों कर, यहाँ इज़्ज़त नहीं होती। 

तड़पती अपनी चिट्ठी को, मैं सीने से लगाता हूँ। 
यहाँ कोई नहीं सुनता, उसे मैं चुप कराता हूँ। 

ये चिट्ठी जब भी रोती है, गले इसको लगाया है। 
किसी के वास्ते लिखा हुआ ख़त, लौट आया है। "

..............चेतन रामकिशन "देव".................
दिनांक-०२.०३.२०१५

♥♥बादल...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥बादल...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
चाँद को शायद चुप करने की ठानी है। 
इसीलिये ये बादल पानी पानी है। 

फ़र्क़ नहीं खेतों की गेंहू बिछ जाये,
बारिश की ये जिद, कैसी मनमानी है। 

टपक रहीं बूंदें, सोने को जगह नहीं,
कब इसने मजबूर की मुश्किल जानी है। 

जब जरुरत हो तब न आये बुलाने से,
ख़ाक कहाँ सूखे की इसने छानी है। 

बूंदें बेशक मोती हैं पर क्या करना,
ग्राम देवता के घर, जो वीरानी है। 

जब अम्बर से बर्फ के टुकड़े बरसेंगे,
फसलें तो हर हाल में, फिर मुरझानी है। 

"देव" न भाये बारिश ये बेमौसम की,
बतला बादल कैसी ये नादानी है। "


.........चेतन रामकिशन "देव".........
दिनांक-०१.०३.२०१५

Saturday, 28 February 2015

♥♥♥पिता...♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥पिता...♥♥♥♥♥♥♥♥
पिता जो होते, हम खुश होते,
बिना पिता के बहुत अधूरे।
सलाह पिता जी की मिलती तो,
हो जाते कुछ सपने पूरे।

थाम के ऊँगली, उनकी हम भी,
जीवन पथ पर आगे बढ़ते। 
जब उनका साहस मिलता तो,
हम भी ऊँची डाली चढ़ते। 

हमे दर्द हो तो माँ के संग,
पिता हमारे नींद से जगते। 
पिता हमारी ओर देखते,
हम उनके सीने से लगते। 

पिता जो होते तो माँ की भी,
आँख नहीं पथराई रहतीं। 
वो भी होती अगर सुहागिन,
स्याह कोई छाई न रहती। 

लालन पालन को हम सबके,
काम पे जाते रोज सवेरे। 
सलाह पिता जी की मिलती तो,
हो जाते कुछ सपने पूरे...

पांच तत्व में मिली देह जब,
पिता की तो हम घंटो रोये। 
माँ की ऑंखें हुईं लबालब,
भाई बहन पल को न सोये। 

बरसो बीते गये पिता को,
दूर मगर वो कब होते हैं। 
माँ होती ममता की देवी,
और पिता जी रब होते हैं। 

काश वक़्त ये करे वापसी,
और पिता जी घर आ जायें। 
भैया, बहनें, माँ और हम सब,
उनके सीने से लग जायें।  

"देव" साथ में होली खिलती,
हो जाते हम पीले, भूरे। 
सलाह पिता जी की मिलती तो,
हो जाते कुछ सपने पूरे। "

.......चेतन रामकिशन "देव"........
दिनांक-०१.०३.२०१५

♥♥♥मिटटी की देह...♥♥♥



♥♥♥♥♥♥♥♥♥मिटटी की देह...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
शांत है अब देह मानो, कोई स्पंदन नहीं है। 
देह मिटटी की हुयी है, अब गति का तन नहीं है। 
एक ही क्षण में मिली, परमात्मा से आत्मा,
शव जलाने चल पड़े सब, शेष अब जीवन नहीं है। 

है नियम जाने का तो फिर, वेदना इतनी क्यों होती। 
क्यों किसी को याद करके, आँख ये दिन रात रोती। 

मैं जो पूछूं तो कहें सब, ये सही प्रश्न नहीं है। 
शांत है अब देह मानो, कोई स्पंदन नहीं है... 

कल तलक आँगन में अपने, स्वर हमारे बोलते थे। 
प्राण वायु मिल रही थी, हम जो द्वारा खोलते थे। 
"देव" पर झपकी पलक तो, थम गये हैं दृश्य सारे,
दूर होना चाहते सब, साथ में जो डोलते थे। 

खुद को अब खुद ही की बातें, क्यों पराई लग रहीं हैं।  
लौटकर आये न बेशक, आँख कितनी जग रही है। 

जिंदगी मिलती नहीं फिर, उसके ऊपर धन नही है। 
शांत है अब देह मानो, कोई स्पंदन नहीं है। "

................चेतन रामकिशन "देव"................
दिनांक-२८.०२.२०१५

Friday, 27 February 2015

♥♥♥शूल की उपमा...♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥शूल की उपमा...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
शूल की उपमा मिली तो, रक्त घावों से बहा है। 
है समय विपरीत तो सारा जहाँ ये हंस रहा है। 
क्या हमारी हस्त रेखा, टूटकर ठहरी है पथ में,
या शिखर इंसानियत का, अब जमीं में धंस रहा है। 

प्रेम के पौधे कटे हैं, पेड़ विष के उग रहे हैं। 
आज शत्रु आदमी के, आदमी ही लग रहे हैं। 
वेदना देकर भी उनको, बोझ न कोई मनों पर, 
हम भले काँटों की शैया, पे गुजारा कर रहे हैं। 

बेगुनाहों के गले पर, फंदा अब तो कस रहा है।  
शूल की उपमा मिली तो, रक्त घावों से बहा है ... 

रात जगमग उनके घर में, हम तिमिर को पी रहे हैं। 
लोग पर अपराध करके, भी अहम में जी रहे हैं। 
"देव" मन की घास रौंदी, चीख निकली भावना की,
हैं दवायें महंगी त्यों ही, घाव हम खुद सी रहे हैं। 

छटपटाया भोला पंछी, जल में जो फंस रहा है। 
शूल की उपमा मिली तो, रक्त घावों से बहा है। "

...............चेतन रामकिशन "देव"................
दिनांक-२८.०२.२०१५

Thursday, 26 February 2015

♥♥गुलकंद ...♥♥


♥♥♥♥♥गुलकंद ...♥♥♥♥♥♥
जीवन को आनंद मिल गया। 
और शब्दों को छंद मिल गया। 
तुम्हें देखकर मन हर्षित हो,
फूलों को मकरंद मिल गया।

सखी ये अम्बर इंद्रधनुषी,
और भूतल रंगीन हो गया। 
साँझ सवेरे तेरे ध्यान में,
मन मेरा तल्लीन हो गया। 
तुमसे है सम्बन्ध आत्मिक,
किन्तु फिर भी नयन हों प्यासे,
एक क्षण को जो दूर हुईं तुम,
मैं पानी बिन मीन हो गया। 

मधु दिया जो प्रेम का तुमने,
जीवन को गुलकंद मिल गया। 
तुम्हें देखकर मन हर्षित हो,
फूलों को मकरंद मिल गया...

मन से मन का तार मिल गया ,
कविता को आधार मिल गया । 
तुमने घर में कदम रखा जो,
खुशियों का संसार मिल गया । 
"देव" तुम्हारा मुख प्यारा है,
और व्यवहार बहुत मनोहारी,
तुमने जब सम्मान दिया तो,
दुनिया में सत्कार मिल गया । 

तुमने जब स्पर्श किया तो,
सपनों को स्पंद मिल गया। 
तुम्हें देखकर मन हर्षित हो,
फूलों को मकरंद मिल गया। "

......चेतन रामकिशन "देव".......
दिनांक-२६.०२.२०१५

Wednesday, 25 February 2015

♥♥♥मैं पुरुष हूँ...♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥मैं पुरुष हूँ...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
शांत जल के भाव लेकर, मौन हूँ तट के किनारे।
कौन है जो खो गया है, किसको मेरा मन पुकारे।

मैं पुरुष हूँ इसीलिये क्या, भाव मेरे अनुसने हैं।
झूठ क्यों लगते हैं तुमको, स्वप्न जो मैंने बुनें हैं।
क्या जगत में स्त्री होना, प्रेम का सूचक है केवल,
क्यों मुझे उपहास मिलता, भाव जो मन के सुने हैं।

है पुरुष होना गलत तो, कौन है जो ये सुधारे।
कौन है जो खो गया है, किसको मेरा मन पुकारे...

क्यों तुम्हें लगता है केवल, प्रेम की तुम ही निधि हो। 
तुम क्यों सोचो प्रेम पथ पर, एक ही बस तुम सधी हो। 
जो पुरुष हूँ तो क्या मेरा, भावना से रिक्त है मन,
मैं भी कोई विष नहीं हूँ, तुम जो कोई औषधी हो। 

आपकी तरह ही बहता, प्रेम जीवन में हमारे। 
कौन है जो खो गया है, किसको मेरा मन पुकारे....

न पुरुष हर कोई अच्छा, न ही स्त्री हर सही है। 
और न वर्गीकरण से, प्रेम की धारा बही है। 
"देव" वो रिश्ता चलेगा, जिसमें दर्पण हों परस्पर,
बस स्वयंभू बनके जग में, प्रीत कब जीवित रही है। 

जीतकर भी क्या वो जीते, दंड पाकर हम जो हारे।  
कौन है जो खो गया है, किसको मेरा मन पुकारे। "

................चेतन रामकिशन "देव"................
दिनांक-२५.०२.२०१५