Monday, 16 February 2015

♥♥दर्द की परछाईं...♥♥


♥♥♥♥♥दर्द की परछाईं...♥♥♥♥♥♥♥
ख्वाब फिर अंगड़ाई लेकर आ रहे हैं। 
दर्द की परछाईं लेकर आ रहे हैं। 

दर्द की कैसे दवा मुझको मिलेगी,
इस कदर महंगाई लेकर आ रहे हैं। 

भीड़ में भी हर घड़ी तनहा करे,
हर लम्हा तन्हाई लेकर आ रहें हैं। 

मुझको ठोकर मार जो आगे बढे,
मेरी खातिर खाई लेकर आ रहे हैं। 

लूटकर पैसा जो घर में भर रहे,
दान को एक पाई लेकर आ रहे हैं। 

क़त्ल करके उनको न कोई सजा,
पर मेरी रुसवाई लेकर आ रहे हैं। 

"देव" जिसने उम्र भर आंसू दिये,
आज वो शहनाई लेकर आ रहे हैं। "

........चेतन रामकिशन "देव"..........
दिनांक-१६.०२.२०१५

Sunday, 15 February 2015

♥♥छाँव के पेड़...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥छाँव के पेड़...♥♥♥♥♥♥♥♥♥
हम मजहबी खेमों में, जो बंटते चले गये। 
वो पेड़ जो थे छाँव के, कटते चले गये। 

झुलसा रही है धूप गम की, जिंदगी नाखुश,
बादल जो प्यार के थे, वो छंटते चले गये। 

धरती की प्यास कैसे बुझे, कौनसी अकल,
तालाब, जो पोखर, यहाँ पटते चले गये। 

मेरा बयां, मेरी तड़प, ख़ाक वो सुनते,
जुमले जो झूठ के यहाँ, रटते चले गये। 

जिससे हुआ था इश्क़, उसको कद्र ही नहीं,
पागल थे हम उस राह जो, डटते चले गये। 

चिथड़े भी देख उनको तरस, न कोई परवाह,
ज्वालामुखी के जैसे हम, फटते चले गये। 

दिल टूटने के बाद, मुझमे आया फ़र्क़ ये,
हम "देव" अपने आप से, कटते चले गये। " 

............चेतन रामकिशन "देव"..............
दिनांक-१६.०२.२०१५

Saturday, 14 February 2015

♥♥...आह ♥♥


♥♥♥♥♥...आह ♥♥♥♥♥
दिल में दर्द बहुत होता है। 
जब कोई निर्धन रोता है। 
उसकी रात कटे रो रोकर,
भूखा प्यासा दिन होता है। 

क्यों निर्धन के हक़ पे डाला,
रोज यूँ ही डाला जाता है। 
क्यों निर्धन की तारीखों को,
बस कल पे टाला जाता है। 
क्यों निर्धन को ठगने वाले,
गैर वतन को काला धन दें,
जो लूटा करते निर्धन को,
क्यों उनका पाला जाता है। 

निर्धन कृषक अन्न उगाये,
तब ये सारा जग सोता है। 
उसकी रात कटे रो रोकर,
भूखा प्यासा दिन होता है... 

नये शहर की नयी योजना,
रोज यहाँ विकसित होती है। 
पर निर्धन की ओर किसी की,
सोच नहीं दृष्टित होती है। 
"देव" अगर निर्धन को यूँ ही,
रखा हाशिये पे जायेगा। 
तो ये निर्धन भूखा, प्यासा,
ऐसे ही मारा जायेगा। 

मजदूरी भी इतनी कम है,
नहीं गुजारा तक होता है।  
उसकी रात कटे रो रोकर,
भूखा प्यासा दिन होता है। "

.......चेतन रामकिशन "देव"……  
दिनांक-१५.०२.२०१५

♥♥प्रेम ग्रन्थ...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्रेम ग्रन्थ...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
प्रेम ग्रन्थ मैं लिख नहीं सकती, जो तुम उसके पात्र नहीं हो। 
सात जन्म का रिश्ता तुमसे, इसी जन्म के मात्र नहीं हो। 
तुमने मुझको प्रेम सिखाया, प्रेम के सागर के तुम स्वामी,
तुममें क्षमता मन पढ़ने की, तुम प्रथम के छात्र नहीं हो। 

प्रेमग्रंथ का हर एक पन्ना और समूचा सार तुम्ही हो। 
कलम मेरा तुमसे प्रेरित हो, लेखन का आधार तुम्ही हो। 

तुम कर्मठ हो, ज्योतिर्मय हो, तिरस्कार के पात्र नहीं हो। 
तुममें क्षमता मन पढ़ने की, तुम प्रथम के छात्र नहीं हो... 

प्रेम ग्रन्थ की हर पंक्ति में, महक तेरे एहसास की होगी। 
होगी सोंधी खुशबु थल की, और चमक आकाश की होगी। 
"देव" तुम्हारे अपनेपन के, भावों का विस्तार लिखूंगी,
मिलन के छायाचित्र में रंगत, परिणय की उल्लास की होगी। 

 बिना तुम्हारे संपादन के, न ही शोधन हो पायेगा। 
 बिना नाम का ग्रन्थ रहेगा, न उद्बोधन हो पायेगा। 

प्रेम ग्रन्थ के तुम प्रवर्तक, तुम कोई पाठक मात्र नहीं हो। 
प्रेम ग्रन्थ मैं लिख नहीं सकती, जो तुम उसके पात्र नहीं हो। "

......................चेतन रामकिशन "देव"…....................
दिनांक-१४.०२.२०१५

Friday, 13 February 2015

♥♥ये कैसा अमरप्रेम...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥ये कैसा अमरप्रेम...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
प्रेम को ईश्वर की संज्ञा दे, पीड़ा क्यों प्रदान कर रहे। 
एक क्षण में ही तोड़ के नाता, जीवन से प्रस्थान कर रहे। 
कहाँ गयीं वो सब सौगन्धें, जिनका बहुत मान करते थे,
क्यों मेरे जीवित होते भी, तुम मुझको अवसान कर रहे। 

क्या कलयुग में प्रेम भावना, क्षण में जर्जर हो जाती है। 
यदि अमर है प्रेम जोत तो, कैसे नश्वर हो जाती है। 

क्यों फिर सबसे रहो प्रेम के, नारे का आहवान कर रहे।  
प्रेम को ईश्वर की संज्ञा दे, पीड़ा क्यों प्रदान कर रहे... 

प्रेम दिवस पर पुष्प भेंट कर, केवल प्यार नहीं होता है। 
बिना समर्पण प्रेम भाव का, बेड़ा पार नहीं होता है। 
करो वर्ष भर तुम उत्पीड़न और एक दिन दिखलाओ उपवन,
अभिमान इस प्रेम भाव का, सुखमय सार नहीं होता है। 

प्रेम जहाँ होता है वो जन, अत्याचार नही करते हैं। 
नहीं बेचते वो भावों को, वो व्यापार नहीं करते हैं। 

तुम मिथ्या के रौब गांठकर, क्यों मेरा अपमान कर रहे। 
प्रेम को ईश्वर की संज्ञा दे, पीड़ा क्यों प्रदान कर रहे... 

तुम क्या जानो कष्ट हमारा, तुमने मेरा भाव न जाना 
तुम बस खुद के लिये जिये हो, तुमने मेरा घाव न जाना। 
"देव" न लेना नाम प्यार का, प्यार का जब सत्कार नहीं तो,
तुम निर्दयी हो तुमने मेरे, अश्रु का सैलाब न जाना। 

कोमल मन को छलनी करके, अहंकार जो दिखलाते हैं। 
वे क्या जानें सौगंधों को, जो भावों को झुठलाते हैं। 

तुम व्यापारी अपने हित में, बस मेरा नुकसान कर रहे। 
प्रेम को ईश्वर की संज्ञा दे, पीड़ा क्यों प्रदान कर रहे। "


....................चेतन रामकिशन "देव"…................
दिनांक-१४.०२.२०१५ 

Thursday, 12 February 2015

♥♥दस्तक...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥दस्तक...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
दरवाजे पे प्यार की दस्तक, आँगन में खुश्बू लाती है। 
तुम्हे देखकर मन खुश होता, छवि तेरी मुझको भाती है। 
तेरी मीठी बोली सुनकर, अधरों पे घुल जाये शहद सा,
तू हंसती है तो लगता है, सारी दुनिया मुस्काती है। 

सूरत तेरी चंदा जैसी, खिली धुप सा मन तन लगता है। 
तेरे होने से ही थल पे, फूलों का उपवन खिलता है। 

तुम जगतीं मेरे ख्वाबों में, जब ये दुनिया सो जाती है। 
दरवाजे पे प्यार की दस्तक, आँगन में खुश्बू लाती है...

तुम चंदन सी पावन चिंतक, मेरी कविता बन जाती हो। 
यदि शरारत करता हूँ तो, लाज हया से सकुचाती हो। 
"देव" तुम्हारा संग संग चलना, मेरा रस्ता आसां करता,
मुझसे कोई गलती हो तो, भोलेपन से समझाती हो। 

नाम तुम्हारा सुनता हूँ तो, मेरा चेहरा खिल जाता है। 
सखी तुम्हारे रूप में मुझको, स्वर्ग धरा पे मिल जाता है। 

नहीं तनिक भी अच्छा लगता, दूर जो मुझसे तू जाती है।  
दरवाजे पे प्यार की दस्तक, आँगन में खुश्बू लाती है। "


......................चेतन रामकिशन "देव"….................
दिनांक-१२.०२.२०१४

Wednesday, 11 February 2015

♥♥वनवास...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥वनवास...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
नैन मेरे व्याकुल हैं तुम बिन, और मन में वनवास हुआ है। 
गगन से चंदा लुप्त हो गया, तिमिर भरा आकाश हुआ है। 
मेरी वेदना और दशा को, समझ के पग ले आओ वापस,
भूख प्यास सब भूल गया हूँ, विरह में उपवास हुआ है। 

प्रेम सरल है किन्तु तुमने, क्रोध से इसको कठिन बनाया। 
नहीं सुना मेरे पक्षों को, न ही अपना पक्ष सुनाया। 

हठधर्मी हम हुये थे दोनों, अब जाकर आभास हुआ है। 
नैन मेरे व्याकुल हैं तुम बिन, और मन में वनवास हुआ है... 

बिना तुम्हारे शिला के जैसा, न ही जीवन गतिमान है। 
तुम बिन कितनी वीरानी है, क्या ये तुमको अनुमान है। 
परित्याग करते हैं जैसे, वैसे मुझको छोड़ गयी हो,
तुम बिन जाने कैसा जग है, न ही भू, न आसमान है। 

इतना क्रोध नहीं हितकारी, स्वास्थ्य तुम्हारा गिर जायेगा। 
समय गया तो चला ही जाये, नहीं लौटकर फिर आयेगा। 

जरा बता दो क्या मेरे बिन, रहने का अभ्यास हुआ है। 
नैन मेरे व्याकुल हैं तुम बिन, और मन में वनवास हुआ है...

देखो घर का द्वार न बोले, कोई भी दीवार न बोले। 
अपना क़स्बा भी चुप चुप है, तुम बिन ये संसार न बोले। 
"देव" नहीं कुछ मन को भाये, घुटा घुटा सा दम रहता है,
सूख गया तुलसी का पौधा, पेड़ों का सिंगार न बोले। 

प्राण गये क्या तब आओगी, फिर आकर के क्या पाओगी। 
मुझे पता है, मुझे इस तरह, देख के तुम भी मर जाओगी। 

नहीं बची भावों की क्षमता, अंतिम ये प्रयास हुआ है। 
नैन मेरे व्याकुल हैं तुम बिन, और मन में वनवास हुआ है।"


.....................चेतन रामकिशन "देव"….................
दिनांक-११.०२.२०१५ 

Tuesday, 10 February 2015

♥♥जिंदगी...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥जिंदगी...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
कुछ दुआओं के सहारे, चल रही है जिंदगी। 
दर्द के सागर किनारे, चल रही है जिंदगी। 

वो नहीं आयेगा इसका, मेरे दिल को भी पता है,
क्यों उसे फिर भी पुकारे, चल रही है जिंदगी। 

खत हुये हैं राख लेकिन, याद शायद मिट न पायी,
त्यों ही लफ़्ज़ों को उभारे, चल रही है जिंदगी।  

टूटती बैसाखियां दें, दूर सब अपने हुये पर,
साथ क्यों फिर भी हमारे, चल रही है जिंदगी। 

फासलों की खाई चौड़ी, नाम के रिश्ते बचे हैं, 
झूठ के संग में गुजारे, चल रही है जिंदगी। 

आंसुओं का ब्याज देकर, क़र्ज़ गम का चुक रहा है,
बोझ को सर से उतारे, चल रही है जिंदगी। 

देखकर बर्बादियों को मेरी, वो खुश हो रहे हैं,
"देव" लेकर के अंगारे, जल रही है जिंदगी। "

.................चेतन रामकिशन "देव"…..............
दिनांक-११ .१०.२०१४


Monday, 9 February 2015

♥♥पक्षपात...♥♥


♥♥♥♥♥पक्षपात...♥♥♥♥♥♥
पक्षपात, आघात हमे क्यूँ। 
विरह में व्याकुल रात हमे क्यूँ। 
अपनी विजय श्री लिखने को,
आखिर बोलो मात हमे क्यूँ। 

हम भी मानव हैं तुम जैसे,
फिर क्यों खुद को श्रेष्ठ समझना। 
कुदरत ने जब फ़र्क़ किया न,
तो क्यों खुद को ज्येष्ठ समझना। 
जीवन में इस प्रेम के पथ पर,
मैं से जो हम हो जाते हैं। 
उनमें अंतर नहीं रहे फिर,
वे मानव सम हो जाते हैं। 

स्वर्ण पत्र सबको देते हो,
बोलो सूखे पात हमे क्यों। 
अपनी विजय श्री लिखने को,
आखिर बोलो मात हमे क्यूँ...

गठबंधन या नातेदारी,
चाहें फूलों की फुलवारी। 
बिना समर्पण के नहीं होती,
रिश्तों की दुनिया उजियारी। 
"देव" जहाँ में समरसता से,
जो रिश्तों को अपनाते हैं। 
वही लोग एक एक में जुड़कर,
देखो ग्यारह बन जाते हैं। 

सबसे हंसकर बोल रहे पर,
नाम की ऐसे बात हमे क्यूँ। 
अपनी विजय श्री लिखने को,
आखिर बोलो मात हमे क्यूँ। "

......चेतन रामकिशन "देव"…...
दिनांक- ०९.०२.२०१५ 

Sunday, 8 February 2015

♥♥दंड...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥दंड...♥♥♥♥♥♥♥♥♥
विष पीने को बाध्य कर दिया। 
पूरा अपना साध्य कर दिया। 
मुझे दंड से नतमस्तक कर,
वो समझे आराध्य कर दिया। 

मुझे नहीं आता दुख देकर,
अपनापन रेखांकित करना। 
मन की कोमल वसुंधरा पर,
कंटक दुख के टंकित करना। 
उनको है अभ्यास तभी तो,
दुख का वितरण कर देते हैं,
मृत्य तट तक सूख सके न,
इतने अश्रु भर देते हैं। 

नहीं औषधि पारंगत है,
रोग बड़ा आसाध्य कर दिया। 
मुझे दंड से नतमस्तक कर,
वो समझे आराध्य कर दिया...

अश्रु धार बहे नयनों से, 
दुरित प्रकरण घटित हुआ है। 
शब्द मौन हैं, कुछ न बोलें,
मन विचलित और व्यथित हुआ है। 
"देव" जगत की नयी नीतियां,
मुझको समझ नहीं आती हैं,
आज यहाँ सम्बन्ध हर कोई,
नाम मात्र में निहित हुआ है। 

मेरे मन का चीर हरण कर,
घायल मेरा काव्य कर दिया। 
मुझे दंड से नतमस्तक कर,
वो समझे आराध्य कर दिया।"

......चेतन रामकिशन "देव"…..
दिनांक--०८.०२ .१५



Monday, 2 February 2015

♥♥तरक्की...♥♥


♥♥♥♥♥♥तरक्की...♥♥♥♥♥♥♥
वो जो धरती में सोना भर रहा है। 
सफर दुश्वारियों का कर रहा है। 

करोड़ों पेट हर दिन भरने वाला,
उधारी की वजह से मर रहा है। 

परोसा जा रहा नीला नशा और,
कहें भारत तरक्की कर रहा है।

नहीं है नौकरी तो नौजवां भी, 
तड़पती जिंदगी से डर रहा है। 

जिधर देखो गरीबी का अँधेरा,
कहाँ सूरज उजाला कर रहा है। 

सियासत में नहीं मुद्दे भले के,
हर एक नेता ही टुकड़े कर रहा है। 

कहें क्या "देव", है कानून अँधा,
सज़ा बिन जुर्म के ही, कर रहा है। "

......चेतन रामकिशन "देव"…...
दिनांक--०३.०२ .१५

Sunday, 1 February 2015

♥♥सिसकते लफ्ज़...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥सिसकते लफ्ज़...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
सिसकते लफ्ज़ हैं, इनको जरा आराम करने दूँ। 
ख़ुशी झूठी सही पर आज, इनके नाम करने दूँ। 

इन्हें भी हक़ है हंसने का, मैं इनकी खोलकर बेड़ी,
उभरकर खिलखिलाने का, जरा सा काम करने दूँ। 

पसीना इनके माथे पर, छलक आया था मेरे संग,
भरे जो अश्क़ हैं इनमें, उन्हें नीलाम करने दूँ। 

गगन में दूर तक उड़ना, है इनके दिल की ख्वाहिश में,
उजाला धूप से लेकर, मचलती शाम करने दूँ। 

न सोचा "देव" इनका हक़, नहीं जानी कोई हसरत,
इन्हें भी प्यार में खुद को, जरा गुलफाम करने दूँ।  "

................चेतन रामकिशन "देव"….............
दिनांक--२८.०१.१५

♥♥दोषारोपण...♥♥


♥♥♥♥♥दोषारोपण...♥♥♥♥♥♥
दोषारोपण भला किसलिये। 
ये आरोपण भला किसलिये। 
प्रेम किया, अपराध नहीं फिर,
मेरा शोषण भला किसलिये। 

क्यों पीड़ा का अम्ल डालकर,
मेरा मन घायल करते हो। 
क्यों मेरे कोमल भावों के,
साथ में ऐसा छल करते हो। 
मैं भी मानव हूँ तुम जैसा,
शिलाखंड, पाषाण नहीं हूँ,
क्यों मेरे नयनों में निशदिन,
अश्रु का ये जल भरते हो। 

सच्चाई के साथ रहो तुम,
मिथ्या पोषण भला किसलिये। 
प्रेम किया, अपराध नहीं फिर,
मेरा शोषण भला किसलिये... 

जीवन भर की सौगंधे थीं,
तुम क्षण भर में बदल गये हो। 
मुझको एकाकीपन देकर,
दूर बहुत तुम निकल गये हो। 
"देव" कहाँ है वो अपनापन,
बात बात पे जो कहते थे,
आज परायापन दिखलाकर,
मेरे मन को कुचल गये हो। 

तीर चुभाकर मेरे रक्त का,
ये अवशोषण भला किसलिये। 
प्रेम किया, अपराध नहीं फिर,
मेरा शोषण भला किसलिये। "

......चेतन रामकिशन "देव"…..
दिनांक--०१.०२ .१५

Saturday, 31 January 2015

♥♥पत्रक...♥♥


♥♥♥♥♥♥पत्रक...♥♥♥♥♥♥♥
रिश्तों का संसार लिखा था। 
भावों का विस्तार लिखा था। 
जला दिया उसने वो पत्रक,
जिसपर मैंने प्यार लिखा था। 

जिसकी खातिर अपनापन हो,
वही ग़मों से भर देता है। 
शीशे जैसे नाजुक दिल को,
टुकड़े टुकड़े कर देता है। 

लूटा उसने बेरहमी से,
वो जिसको हक़दार लिखा था। 
जला दिया उसने वो पत्रक,
जिसपर मैंने प्यार लिखा था...

मन के उपवन की भूमि पर,
खून की बारिश कर देते हैं। 
अपने मंसूबों की धुन में,
किसी को तन्हा कर देते हैं। 

पतझड़ उसने दिया है मुझको,
वो जिसको सिंगार लिखा था। 
जला दिया उसने वो पत्रक,
जिसपर मैंने प्यार लिखा था...

अपने होते नहीं नाम के,
दुख का बोध किया करते हैं। 
नहीं दंड दें बिना जुर्म के,
न अवरोध किया करते हैं। 

"देव" कर रहा वो अपमानित,
वो जिसको सत्कार लिखा था। 
जला दिया उसने वो पत्रक,
जिसपर मैंने प्यार लिखा था। "

.......चेतन रामकिशन "देव"……।
दिनांक--३१.०१.१५

Thursday, 29 January 2015

♥♥माँ(एक अनुपम छवि )♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥माँ(एक अनुपम छवि )♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥

दुआ माँ की यहाँ, हर एक सफर आसान करती है। 
हवाले हमको माँ खुशियों की, देखो खान करती है। 
वो अपने दूध से सींचे, नये अंकुर से बच्चे को,
हजारो ग़म सहे फिर भी, ख़ुशी का दान करती है। 

छवि माँ की अनुपम है, हसीं किरदार माँ का है। 
समूचे विश्व से ऊपर, धरा पे प्यार माँ का है। 

बड़ा ही मखमली दिल है, नहीं अभिमान करती है। 
दुआ माँ की यहाँ, हर एक सफर आसान करती है...

है ममता की नदी कोई, धरा पे ईश जैसी माँ। 
हंसी देती, ख़ुशी देती, दुआ, आशीष जैसी माँ। 
उजाला दीप की तरह, भरे बच्चों के जीवन में,
बड़ी सुन्दर, मनोहारी, सुमन के शीश जैसी माँ। 

है चंदा की धवल बारिश, मधुर प्रभात जैसी है। 
सुलाये लोरियां गाकर, सुकूं की रात जैसी है। 

बड़ी होकर भी माँ बच्चों का, हर पल मान करती है। 
दुआ माँ की यहाँ, हर एक सफर आसान करती है...

बड़ा ही त्याग करती है, हर एक इच्छा को मारेगी। 
मगर संतान का अपनी, सदा जीवन संवारेगी। 
नहीं है "देव" दुनिया में, कोई समकक्ष भी माँ के,
है वो एक माँ जो बच्चों के लिये, जीवन गुजारेगी। 

मधुर है माँ शहद जैसी, वो रेशम सी मुलायम है। 
दिखे मामूली पर दुनिया, उसी के दम पे कायम है। 
  
गलत क़दमों पे वो झिड़के, सही का ज्ञान करती है। 
दुआ माँ की यहाँ, हर एक सफर आसान करती है। "

"
माँ-एक ऐसी अनुपम छवि, जिसके व्यक्तित्व एवं कृतत्वों के समकक्ष कोई दूसरा नहीं ठहरता, माँ है तो दुनिया पे जीवन है, माँ है तो आँगन में लोरियों की गूंज और स्नेह की छुअन है, तो आइये माँ को नमन करें। "

" माँ शब्द एवं रूप का सम्मान करते हुये, मेरी ये रचना मेरी जन्मदायित्री माँ कमला देवी जी एवं मानस माँ प्रेमलता जी को समर्पित। "

" सर्वाधिकार सुरक्षित, मेरी ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित। "

चेतन रामकिशन "देव" 
दिनांक-३०.०१.२०१५ 

♥♥कायनात...♥♥


♥♥♥♥♥कायनात...♥♥♥♥♥
चाँद, तारों से बात हो जाती। 
मेरी रंगीन रात हो जाती। 

तू जो मिलती तो मेरे आंचल में,
सारी ये कायनात हो जाती। 

डाल बन जाता मैं तुम्हारे लिये,
और तू मेरी पात हो जाती। 

टूट जातीं मजहब की जंजीरें,
अपनी इंसानी जात हो जाती। 

"देव" फूलों से मुस्कुराते हम,
दर्द की देखो मात हो जाती। "

.......चेतन रामकिशन "देव"…..
दिनांक-- २९ .०१.१५

Tuesday, 27 January 2015

♥♥मज़बूरी...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥मज़बूरी...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
उसे किरदार फिर कोई निभाना पड़ रहा होगा। 
बहुत मज़बूरी में मुझको भुलाना पड़ रहा होगा। 

वो मुफ़लिस बाप की बेटी, कहाँ से लायेगी गाड़ी,
सहमकर आप ही खुद को, जलाना पड़ रहा होगा। 

यहाँ न प्यार की कीमत, नहीं के मेल हो दिल का ,
फ़क़त वो नाम का रिश्ता, जताना पड़ रहा होगा। 

हसीं इस चाँद को गहरी, अमावस कर रही काला,
वो माँ को भूखा ही बच्चा, सुलाना पड़ रहा होगा। 

हुये हैं चीथड़े दिल के, जफ़ा की चोट खाकर के,
जनाजा आप ही खुद को, उठाना पड़ रहा होगा। 

उम्र भर भूख पैसों की, बनाये हैं महल ऊँचे,
जो आई मौत तो खाली ही, जाना पड़ रहा होगा। 

सुनो तुम "देव" मेरी माँ, न पढ़ले दर्द चेहरे का,
मुझे हंसकर तभी हर गम, छुपाना पड़ रहा होगा।" 

................चेतन रामकिशन "देव"…...........
दिनांक--२८.०१.१५


♥♥♥आँचल...♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥आँचल...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
जो मेरे हाथ से आँचल, तेरा फिसला नही होता। 
सफ़र ये जिंदगी का फिर, कभी धुंधला नहीं होता। 

जलाये हैं बहुत दीपक, मशालें भी जलाईं पर,
ये तन्हा याद का रस्ता, कभी उजला नही होता। 

हवायें प्यार से भीगीं, तपन कम कर रहीं होतीं,
तेरी दहलीज से आगे, मैं जो निकला नहीं होता। 

हँसी होती, ख़ुशी होती, झलकता नूर चेहरे पर,
अगर तेज़ाब सीने में, मेरे उबला नहीं होता। 

नदी के छोर पर बैठे, सुनाते प्यार की बातें,
अहम में रुख जो मैंने, अगर बदला नहीं होता। 

सहारा हर घड़ी मिलता, डगर आसान हो जाती,
जो लावा झूठ का दिल में, मेरे पिघला नही होता। 

मैं तुझसे "देव" माफ़ी भी, यहाँ पर मांग लेता पर, 
मेरे हाथों से तेरा दिल, अगर उछला नहीं होता। "

.................चेतन रामकिशन "देव"….............
दिनांक--२७.०१.१५





Monday, 26 January 2015

♥♥चरागों की लौ...♥♥


♥♥♥♥♥♥चरागों की लौ...♥♥♥♥♥♥♥♥
चरागों की लौ का, उजाला है तुमसे। 
मोहब्बत का हर ख्वाब, पाला है तुमसे। 
तुम्हे देखकर ही, खिले चांदनी ये,
नहीं चाँद देखो, निराला है तुमसे। 

हो तुम जो मेरे साथ, तो न अँधेरा,
तुम्हारी मोहब्बत में, कुछ ग़म नहीं है। 
तुम्हारे ही अहसास से, मिलती ताक़त,
हराये जो मुश्किल में, वो दम नहीं हो। 

तुम्हारे ही छूने से, कलियाँ उमड़तीं,
ये सुन्दर से फूलों की, माला है तुमसे 
तुम्हे देखकर ही, खिले चांदनी ये,
नहीं चाँद देखो, निराला है तुमसे.... 

सफर ये तेरे बिन, नहीं है गुजरता।
दुआ मेरी खातिर, नहीं कोई करता। 
तुम्ही "देव" देखो, वसे जिंदगी में,
यहाँ प्यार तुमसा, नहीं कोई करता। 

तुम्हारे ही संग में है, मेरी दीवाली, 
ये होली पे भी रंग, डाला है तुमसे।  
तुम्हे देखकर ही, खिले चांदनी ये,
नहीं चाँद देखो, निराला है तुमसे। "

.......चेतन रामकिशन "देव"…....
दिनांक--२६.०१.१५

Sunday, 25 January 2015

♥गणित...♥


♥♥♥♥♥गणित...♥♥♥♥♥♥
मैं शब्दों का गणित न जानूं। 
केवल खुद का हित न जानूं। 
नहीं बोल सकता जिव्हया से,
मौन प्रेम है लिखित न जानूं। 

लाज भरा स्वभाव है मेरा,
तुमसे कुछ न कह पाता हूँ। 
किन्तु सच है बिना तुम्हारे,
क्षण भर भी न रह पाता हूँ। 

बिना तुम्हारे प्राण को अपने,
किसी मनुज में निहित न मानूं। 
नहीं बोल सकता जिव्हया से,
मौन प्रेम है लिखित न जानूं... 

नहीं मौन, न चुप्पी तोड़ो,
नयनों से सम्प्रेषण होगा। 
अपनेपन के दीप जलेंगे ,
भावुकता का प्रेषण होगा। 

बिना तुम्हारे अस्त हुआ हूँ,
अनुचित और उचित न जानूं। 
नहीं बोल सकता जिव्हया से,
मौन प्रेम है लिखित न जानूं... 

मौन प्रेम की भाषा होगी।
और भेंट की आशा होगी। 
"देव" यहाँ हम मिल जायेंगे,
परिणय की जिज्ञासा होगी। 

सदा कामना अच्छे की हो,
कभी किसी का अहित न जानूं। 
नहीं बोल सकता जिव्हया से,
मौन प्रेम है लिखित न जानूं। "

....चेतन रामकिशन "देव"…..
दिनांक--२५.०१.१५