Saturday, 7 March 2015

♥♥मन की भाषा...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥मन की भाषा...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
पढ़े-लिखे तो बहुत थे तुम पर, मन की भाषा जान सके न। 
मेरे सीने में भी दिल था, तुम उसको पहचान सके न। 
सागर जैसे आंसू देकर, मुझसे नाता तोड़ गये हो,
नाम का था शायद अपनापन, दिल से अपना मान सके न।

बस तुमसे है यही पूछना, क्यों जीवन में तुम आये थे। 
इसी तरह ग़र तड़पाना था, क्यों फिर संग संग मुस्काये थे। 

बड़ी बड़ी कसमें खाते थे, पर तुमको उनको ठान सके न। 
पढ़े-लिखे तो बहुत थे तुम पर, मन की भाषा जान सके न... 

आज कलंकित बतलाते हो, कल लेकिन पावन कहते थे। 
आज मुझे मृत्यु का दर्जा, कल लेकिन जीवन कहते थे। 
"देव" जहाँ में रंग बदलना, कोई सीखे आखिर तुमसे,
आज मुझे पतझड़ बतलाया, कल जबकि सावन कहते थे। 

आज मेरी पीड़ा पे खुश हो, कल कैसे आंसू बहते थे। 
तोड़ रहे हो तुम उस दिल को, जिस दिल में बस तुम रहते थे। 

मूकबधिर मुझको कहते हो, आह मगर तुम जान सके न। 
पढ़े-लिखे तो बहुत थे तुम पर, मन की भाषा जान सके न। "

......................चेतन रामकिशन "देव"......................
दिनांक-०७.०३.२०१५

Friday, 6 March 2015

♥♥प्रेम का गंगा जल ...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्रेम का गंगा जल ...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
पावन हो जायेगा जीवन, प्रेम का तुम गंगा जल दे दो। 
जीवन में भी प्रगति होगी, समस्याओं का तुम हल दे दो। 
कल तुमसे था, आज तुम्ही से, साँझ सवेरा सब कुछ तुमसे,
जीवन उज्जवल हो जायेगा, शेष काल तुम कल दे दो। 

तुम नयनों की ज्योति जैसी, मन में आशा भर देती हो। 
तुम मेरे छोटे सपनों को, उड़ने हेतु पर देती हो। 

निहित तुम्हीं में प्रेम आस्था, मुझको मुंहमांगा फल दे दो। 
पावन हो जायेगा जीवन, प्रेम का तुम गंगा जल दे दो...

साथ तुम्हारे पहली होली, फागुन की उपलब्धि जैसी। 
तुमसे ही जीवन में बरकत, जीवन की समृद्धि जैसी। 
"देव" तुम्ही से चमक रहा मन, धवल चाँद की किरणों जैसा,
तुम जीवन में निश्छल मूरत, तुम जीवन की शुद्धि जैसी।

तुम्हें देखना चाहें आँखें, इंतजार करती रहती है।
तुम क्या जानो बिना तुम्हारे, कितना ये बहती रहती हैं। 

पाना चाहूँ तेरी निकटता, मुझको अपना आँचल दे दो। 
पावन हो जायेगा जीवन, प्रेम का तुम गंगा जल दे दो। "

...................चेतन रामकिशन "देव".....................
दिनांक-०६.०३.२०१५

Wednesday, 4 March 2015

♥♥रंग रुधिर का...♥♥

♥♥♥♥रंग रुधिर का...♥♥♥♥
रंग रुधिर का बहुत बहा है।
अब अपनापन कहाँ रहा है।
बंटे बंटे त्यौहार सभी के,
मानवता ने दमन सहा है।
देश के दुश्मन निर्दोषों के,
रक्त से होली खेल रहें हैं,
है निर्धन की स्याह कोठरी,
चूल्हा, छप्पर सभी ढ़हा है।

रहें वर्ष भर पीड़ा देते,
किन्तु एक दिन रंग लगायें।
मन से मन तो मिला नहीं पर,
लेकिन सीने से लग जायें।
हाँ अच्छा है दूरी मिटना,
पर न बस खानापूरी हो।
होली का त्यौहार बाद में,
पहले न दिल में दूरी हो।

पीड़ित की तो आह निकलती,
शोषक को, आनंद अहा! है।
है निर्धन की स्याह कोठरी,
चूल्हा, छप्पर सभी ढ़हा है....

नहीं नाम को रंग लगाओ,
नहीं किसी को गले लगाओ।
नहीं मोहब्बत है जो दिल में,
साथ झूठ को, नहीं निभाओ।
"देव" किसी की लाश के ऊपर,
ताजमहल बनवाने से तो,
बेहतर है भूखे प्यासे को,
तीन वक़्त का अन्न खिलाओ।

हो सबको त्यौहार मुबारक,
हमने रब से यही कहा है। 
है निर्धन की स्याह कोठरी,
चूल्हा, छप्पर सभी ढ़हा है। "

....चेतन रामकिशन "देव".....
दिनांक-०५.०३.२०१५


Tuesday, 3 March 2015

♥♥पुनर्गठन...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥पुनर्गठन...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
अपने खंडित मन का फिर से, पुनर्गठन करना चाहता हूँ। 
मैं पीड़ा के विस्थापन को, घोर जतन करना चाहता हूँ। 
नया नवेला दुःख न कोई, मेरे जीवन को मुरझाये,
इसीलिए मैं अपने भीतर, आज अगन भरना चाहता हूँ। 

हाँ मैंने जाना जीवन में, लोग अधिकतर छल करते हैं। 
नहीं सूखता कभी सरोवर, नयन में इतना जल भरते हैं। 
करुण निवेदन की अनदेखी, और केवल हठधर्मी होना,
मेरी कोई कठिनाई का, नहीं जरा भी हल करते हैं। 

तभी मैं खुद ही कठिनाई का, बहिर्गमन करना चाहता हूँ। 
अपने खंडित मन का फिर से, पुनर्गठन करना चाहता हूँ... 

हूँ अपराधी नहीं मुझे पर, दंड बहुत सहना पड़ता हूँ। 
एकाकीपन की धरती पर, बिन इच्छा रहना पड़ता है। 
"देव" हूँ मानव मैं भी तुमसा, क्यों मुझको पाषाण समझते,
सोच सोच कर यही सभी कुछ, आँखों को बहना पड़ता है। 

इस पीड़ा की जिजिभिषा का, प्रबंधन करना चाहता हूँ। 
अपने खंडित मन का फिर से, पुनर्गठन करना चाहता हूँ। "

.....................चेतन रामकिशन "देव".....................
दिनांक-०३.०३.२०१५

Monday, 2 March 2015

♥♥♥अंगारे...♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥अंगारे...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
आग लगाकर खुश होते हैं, जहर पिलाकर खुश होते हैं। 
लोग यहाँ पत्थर दिल वाले, खून बहाकर खुश होते हैं। 

क्या दुनिया है समझ न पाया, इसीलिए मैं मौन हुआ हूँ। 
कल तक जिनका हमसाया था, आज मैं उनको कौन हुआ हूँ। 
गुमसुम होकर, आँख मूंदकर, दर्द हर एक मैं सह लेता हूँ। 
मेरे संग, मेरी तन्हाई,  उससे दिल की कह लेता हूँ। 

जो देता है यहाँ सहारा, उसे गिराकर खुश होते हैं। 
लोग यहाँ पत्थर दिल वाले, खून बहाकर खुश होते हैं.... 

बिना जुर्म के सज़ा मिली तो, विस्फोटक तो बनना ही था। 
आस छोड़कर सबकी खुद का, संकटमोचक बनना ही था। 
"देव" किसी मासूम पे जग में, जब कौड़े हंटर चलते हैं। 
तब ही उसके कोमल दिल में, अंगारे हर दिन जलते हैं।

नन्हीं मुन्ही हरियाली को, ख़ार बनाकर खुश होते हैं। 
लोग यहाँ पत्थर दिल वाले, खून बहाकर खुश होते हैं। "

...................चेतन रामकिशन "देव"...................
दिनांक-०३.०३.२०१५





♥♥♥कैसी होली..♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥कैसी होली..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
विरह में डूबी रात कठिन है, तिमिर बहुत गहरा छाया है। 
दिन भी बीता सुबक सुबक कर, चैन नहीं पल को आया है। 
आँखों में लाली छाई है और चेहरे पे बड़ी उदासी,
बिना तुम्हारे रंग हैं फीके, होली पे दिल भर आया है। 

तुमने दिल की सुनी नहीं क्यों, क्यों मुझसे नाता तोड़ा है। 
नहीं ख़ुदकुशी मुझे गवारा, पर जीवन भी कब छोड़ा है। 

तुम बिन हंसी, ख़ुशी सब भूला, कदम कदम पे ग़म पाया है। 
विरह में डूबी रात कठिन है, तिमिर बहुत गहरा छाया है.... 

रंगों का त्यौहार निकट है, होली पे वापस आ जाना। 
तरस गया हूँ मैं खिलने को, मुझे प्यार का रंग लगाना। 
"देव" तुम्हारे बिन अरसे से, नींद नहीं आई आँखों को,
गोद में मेरा सर रखकर के, मुझको मीठी नींद सुलाना। 

तुम आओगी तो होली पर, रंग हजारों खिल जायेंगे। 
चाँद चांदनी बरसायेगा, जब हम दोनों मिल जायेंगे। 

दुनिया में हैं लोग करोड़ों, नहीं मगर तुमसे पाया है। 
विरह में डूबी रात कठिन है, तिमिर बहुत गहरा छाया है। "

....................चेतन रामकिशन "देव"........................
दिनांक-०२.०३.२०१५

Sunday, 1 March 2015

♥♥♥♥खत...♥♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥खत...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
किसी के वास्ते लिखा हुआ ख़त, लौट आया है। 
वो मुझको भूल बैठा या पता झूठा बताया है। 
मैं अपने खत को हाथों में, पकड़ जो देखने बैठा,
लगा के मेरे लफ़्ज़ों ने, बड़ा सागर बहाया है। 

वफ़ा के साथ में अक्सर, यही खिलवाड़ क्यों होता। 
कोई चिट्ठी न अपनाये, पता सच्चा नही होता। 

इन्हीं सब उलझनों ने आज फिर से, दिल दुखाया है। 
किसी के वास्ते लिखा हुआ ख़त, लौट आया है.... 

नहीं मालूम क्यों एहसास की, कीमत नहीं होती। 
मेरी चिट्ठी यही सब सोचकर के, ग़मज़दा होती। 
भरोसा टूटने लगता है मेरा "देव" उस लम्हा,
किसी के प्यार की क्यों कर, यहाँ इज़्ज़त नहीं होती। 

तड़पती अपनी चिट्ठी को, मैं सीने से लगाता हूँ। 
यहाँ कोई नहीं सुनता, उसे मैं चुप कराता हूँ। 

ये चिट्ठी जब भी रोती है, गले इसको लगाया है। 
किसी के वास्ते लिखा हुआ ख़त, लौट आया है। "

..............चेतन रामकिशन "देव".................
दिनांक-०२.०३.२०१५

♥♥बादल...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥बादल...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
चाँद को शायद चुप करने की ठानी है। 
इसीलिये ये बादल पानी पानी है। 

फ़र्क़ नहीं खेतों की गेंहू बिछ जाये,
बारिश की ये जिद, कैसी मनमानी है। 

टपक रहीं बूंदें, सोने को जगह नहीं,
कब इसने मजबूर की मुश्किल जानी है। 

जब जरुरत हो तब न आये बुलाने से,
ख़ाक कहाँ सूखे की इसने छानी है। 

बूंदें बेशक मोती हैं पर क्या करना,
ग्राम देवता के घर, जो वीरानी है। 

जब अम्बर से बर्फ के टुकड़े बरसेंगे,
फसलें तो हर हाल में, फिर मुरझानी है। 

"देव" न भाये बारिश ये बेमौसम की,
बतला बादल कैसी ये नादानी है। "


.........चेतन रामकिशन "देव".........
दिनांक-०१.०३.२०१५

Saturday, 28 February 2015

♥♥♥पिता...♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥पिता...♥♥♥♥♥♥♥♥
पिता जो होते, हम खुश होते,
बिना पिता के बहुत अधूरे।
सलाह पिता जी की मिलती तो,
हो जाते कुछ सपने पूरे।

थाम के ऊँगली, उनकी हम भी,
जीवन पथ पर आगे बढ़ते। 
जब उनका साहस मिलता तो,
हम भी ऊँची डाली चढ़ते। 

हमे दर्द हो तो माँ के संग,
पिता हमारे नींद से जगते। 
पिता हमारी ओर देखते,
हम उनके सीने से लगते। 

पिता जो होते तो माँ की भी,
आँख नहीं पथराई रहतीं। 
वो भी होती अगर सुहागिन,
स्याह कोई छाई न रहती। 

लालन पालन को हम सबके,
काम पे जाते रोज सवेरे। 
सलाह पिता जी की मिलती तो,
हो जाते कुछ सपने पूरे...

पांच तत्व में मिली देह जब,
पिता की तो हम घंटो रोये। 
माँ की ऑंखें हुईं लबालब,
भाई बहन पल को न सोये। 

बरसो बीते गये पिता को,
दूर मगर वो कब होते हैं। 
माँ होती ममता की देवी,
और पिता जी रब होते हैं। 

काश वक़्त ये करे वापसी,
और पिता जी घर आ जायें। 
भैया, बहनें, माँ और हम सब,
उनके सीने से लग जायें।  

"देव" साथ में होली खिलती,
हो जाते हम पीले, भूरे। 
सलाह पिता जी की मिलती तो,
हो जाते कुछ सपने पूरे। "

.......चेतन रामकिशन "देव"........
दिनांक-०१.०३.२०१५

♥♥♥मिटटी की देह...♥♥♥



♥♥♥♥♥♥♥♥♥मिटटी की देह...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
शांत है अब देह मानो, कोई स्पंदन नहीं है। 
देह मिटटी की हुयी है, अब गति का तन नहीं है। 
एक ही क्षण में मिली, परमात्मा से आत्मा,
शव जलाने चल पड़े सब, शेष अब जीवन नहीं है। 

है नियम जाने का तो फिर, वेदना इतनी क्यों होती। 
क्यों किसी को याद करके, आँख ये दिन रात रोती। 

मैं जो पूछूं तो कहें सब, ये सही प्रश्न नहीं है। 
शांत है अब देह मानो, कोई स्पंदन नहीं है... 

कल तलक आँगन में अपने, स्वर हमारे बोलते थे। 
प्राण वायु मिल रही थी, हम जो द्वारा खोलते थे। 
"देव" पर झपकी पलक तो, थम गये हैं दृश्य सारे,
दूर होना चाहते सब, साथ में जो डोलते थे। 

खुद को अब खुद ही की बातें, क्यों पराई लग रहीं हैं।  
लौटकर आये न बेशक, आँख कितनी जग रही है। 

जिंदगी मिलती नहीं फिर, उसके ऊपर धन नही है। 
शांत है अब देह मानो, कोई स्पंदन नहीं है। "

................चेतन रामकिशन "देव"................
दिनांक-२८.०२.२०१५

Friday, 27 February 2015

♥♥♥शूल की उपमा...♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥शूल की उपमा...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
शूल की उपमा मिली तो, रक्त घावों से बहा है। 
है समय विपरीत तो सारा जहाँ ये हंस रहा है। 
क्या हमारी हस्त रेखा, टूटकर ठहरी है पथ में,
या शिखर इंसानियत का, अब जमीं में धंस रहा है। 

प्रेम के पौधे कटे हैं, पेड़ विष के उग रहे हैं। 
आज शत्रु आदमी के, आदमी ही लग रहे हैं। 
वेदना देकर भी उनको, बोझ न कोई मनों पर, 
हम भले काँटों की शैया, पे गुजारा कर रहे हैं। 

बेगुनाहों के गले पर, फंदा अब तो कस रहा है।  
शूल की उपमा मिली तो, रक्त घावों से बहा है ... 

रात जगमग उनके घर में, हम तिमिर को पी रहे हैं। 
लोग पर अपराध करके, भी अहम में जी रहे हैं। 
"देव" मन की घास रौंदी, चीख निकली भावना की,
हैं दवायें महंगी त्यों ही, घाव हम खुद सी रहे हैं। 

छटपटाया भोला पंछी, जल में जो फंस रहा है। 
शूल की उपमा मिली तो, रक्त घावों से बहा है। "

...............चेतन रामकिशन "देव"................
दिनांक-२८.०२.२०१५

Thursday, 26 February 2015

♥♥गुलकंद ...♥♥


♥♥♥♥♥गुलकंद ...♥♥♥♥♥♥
जीवन को आनंद मिल गया। 
और शब्दों को छंद मिल गया। 
तुम्हें देखकर मन हर्षित हो,
फूलों को मकरंद मिल गया।

सखी ये अम्बर इंद्रधनुषी,
और भूतल रंगीन हो गया। 
साँझ सवेरे तेरे ध्यान में,
मन मेरा तल्लीन हो गया। 
तुमसे है सम्बन्ध आत्मिक,
किन्तु फिर भी नयन हों प्यासे,
एक क्षण को जो दूर हुईं तुम,
मैं पानी बिन मीन हो गया। 

मधु दिया जो प्रेम का तुमने,
जीवन को गुलकंद मिल गया। 
तुम्हें देखकर मन हर्षित हो,
फूलों को मकरंद मिल गया...

मन से मन का तार मिल गया ,
कविता को आधार मिल गया । 
तुमने घर में कदम रखा जो,
खुशियों का संसार मिल गया । 
"देव" तुम्हारा मुख प्यारा है,
और व्यवहार बहुत मनोहारी,
तुमने जब सम्मान दिया तो,
दुनिया में सत्कार मिल गया । 

तुमने जब स्पर्श किया तो,
सपनों को स्पंद मिल गया। 
तुम्हें देखकर मन हर्षित हो,
फूलों को मकरंद मिल गया। "

......चेतन रामकिशन "देव".......
दिनांक-२६.०२.२०१५

Wednesday, 25 February 2015

♥♥♥मैं पुरुष हूँ...♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥मैं पुरुष हूँ...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
शांत जल के भाव लेकर, मौन हूँ तट के किनारे।
कौन है जो खो गया है, किसको मेरा मन पुकारे।

मैं पुरुष हूँ इसीलिये क्या, भाव मेरे अनुसने हैं।
झूठ क्यों लगते हैं तुमको, स्वप्न जो मैंने बुनें हैं।
क्या जगत में स्त्री होना, प्रेम का सूचक है केवल,
क्यों मुझे उपहास मिलता, भाव जो मन के सुने हैं।

है पुरुष होना गलत तो, कौन है जो ये सुधारे।
कौन है जो खो गया है, किसको मेरा मन पुकारे...

क्यों तुम्हें लगता है केवल, प्रेम की तुम ही निधि हो। 
तुम क्यों सोचो प्रेम पथ पर, एक ही बस तुम सधी हो। 
जो पुरुष हूँ तो क्या मेरा, भावना से रिक्त है मन,
मैं भी कोई विष नहीं हूँ, तुम जो कोई औषधी हो। 

आपकी तरह ही बहता, प्रेम जीवन में हमारे। 
कौन है जो खो गया है, किसको मेरा मन पुकारे....

न पुरुष हर कोई अच्छा, न ही स्त्री हर सही है। 
और न वर्गीकरण से, प्रेम की धारा बही है। 
"देव" वो रिश्ता चलेगा, जिसमें दर्पण हों परस्पर,
बस स्वयंभू बनके जग में, प्रीत कब जीवित रही है। 

जीतकर भी क्या वो जीते, दंड पाकर हम जो हारे।  
कौन है जो खो गया है, किसको मेरा मन पुकारे। "

................चेतन रामकिशन "देव"................
दिनांक-२५.०२.२०१५

Tuesday, 24 February 2015

♥♥गीत तुम्हारे...♥♥


♥♥♥♥गीत तुम्हारे...♥♥♥♥
कुछ रिश्ता है या नाता है। 
चैन नहीं तुम बिन आता है। 
तेरे प्यार से रंगत मिलती,
गीत तुम्हारे दिल गाता है। 

दिल कहता है हर लम्हे में,
बस तेरा दीदार हो मुझको। 
सात जन्म तक इस दुनिया में,
बस तुमसे ही प्यार हो मुझको। 
 तुम हमदम हो चाँद सरीखी,
और मैं रस्ते का पत्थर हूँ,
दुआ है मेरी लेकिन दिल से,
प्रीत मेरी स्वीकार हो तुमको।

तेरी सूरत जब भी देखूं,
दिल चुपके से मुस्काता है। 
तेरे प्यार से रंगत मिलती,
गीत तुम्हारे दिल गाता है....

तुमसे मिलने का मन होता,
बड़ा ही सुन्दर वो क्षण होता। 
बोझ नहीं रहता जीवन में,
बड़ा ही हल्का ये तन होता। 
"देव" तुम्हारे एहसासों में,
सारी रात गुजर जाती है,
साँझ, सवेरा भी सुखमय हो,
फूल सा महका अब दिन होता। 

सखी तुम्ही से लेकर चंदा,
धवल चांदनी बरसाता है। 
तेरे प्यार से रंगत मिलती,
गीत तुम्हारे दिल गाता है। "

......चेतन रामकिशन "देव".......
दिनांक-२४.०२.२०१५

Monday, 23 February 2015

♥♥बेवफाई...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥बेवफाई...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
ज़िक्र मेरा करते करते, आँख क्यों नम हो रही है। 
क्या तुम्हारी बेवफाई, आज बेदम हो रही है। 

लौटकर तुम तब न आये, मिन्नतें कितनी बयां कीं,
अब क्या आना, जब हमारी उम्र ये कम हो रही है। 

पत्थरों की चोट देकर, दोस्तों संग जश्न में थे,
वक़्त बदला तो उन्हीं की, राह गुमसुम हो रही है। 

अब न मेरे पास आना, आग हूँ मैं जल पड़ोगे,
है लपट ज्वालामुखी की, तेज हरदम हो रही है। 

सोचता हूँ माफ़ कर दूँ, तुमको मैं इंसानियत पर,
पर हमारी रूह ऐसा सुनके, पुरनम हो रही है।  

इश्क़ की बातें क्या करना, कद्र जब दिल की नहीं हो,
इसीलिए तो प्यार की, इज़्ज़त बहुत कम हो रही है। 

"देव" एक छोटी जगह भी, दिल की तुमको दे सकूँ न,
क्यूंकि अब तन्हाई खुद की, मेरी हमदम हो रही है।  "

.................चेतन रामकिशन "देव".................
दिनांक-२४.०२.२०१५

Sunday, 22 February 2015

♥♥केंद्र बिंदु...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥केंद्र बिंदु...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
जल गया दीपक सुबह का, कुछ अँधेरा थम रहा है। 
रात के व्याकुल क्षणों का मोम जो था जम रहा है। 
ओस का अमृत टपककर, गिर रहा मेरे अधर पर,
जोड़ता हूँ धीरे धीरे, शेष जितना दम रहा है। 

सोख ले जो वेदना वो, यंत्र बनना चाहता हूँ। 
कुछ क्षणों को ही सही, स्वतंत्र बनना चाहता हूँ। 

त्यागना चाहता हूँ सारा, आज तक जो भ्रम रहा है।      
जल गया दीपक सुबह का, कुछ अँधेरा थम रहा है।

भूलना चाहता हूँ उनको, वेदना जो सौंपते हैं। 
जो किसे के मन की भूमि पे, दुखों को रोंपते हैं। 
"देव" न कमजोर हूँ पर, सोचता हूँ इस दिशा में,
युद्ध क्या करना जो चाकू, पीठ तल में घोंपते हैं। 

केंद्र बिंदु पर पहुंचकर, शोध करना चाहता हूँ। 
अपने मन की शक्तियों का, बोध करना चाहता हूँ। 

अब नहीं अपनाउंगा वो, व्यर्थ का जो श्रम रहा है।  
जल गया दीपक सुबह का, कुछ अँधेरा थम रहा है। "

.................चेतन रामकिशन "देव"..................
दिनांक-२३.०२.२०१५

चुप चुप



<3

चुप चुप रहना भी मुश्किल है। 
और कुछ कहना भी मुश्किल है। 
मुलाकात से लाज लगे पर,
दूरी सहना भी मुश्किल है। 

जब से प्यार किया है उनसे,
हरा भरा मौसम लगता है। 
बिन उनके में अलसाई थी,
अब चलने का दम लगता है।
पल भर में ही ख्वाब हजारों,
मैं उनके संग बुन लेती हूँ ,
कुछ वो मेरी सुनते हैं और,
कुछ मैं उनकी सुन लेती हूँ। 

हम दोनों हैं नदी की धारा,
बिछड़ के बहना भी मुश्किल है। 
मुलाकात से लाज लगे पर,
दूरी सहना भी मुश्किल है। " <3

चेतन रामकिशन "देव" Chetan Ramkishan "Dev "

Thursday, 19 February 2015

♥♥♥वास्ता...♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥वास्ता...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
पांव में छाले पड़े हैं, जिस्म भी अब काँपता है। 
कौन है पर जो हमारे, दर्द को अब भाँपता है। 

एड़ियां भी फट गयीं हैं, और कांटे चुभ रहे हैं,
क्या कोई इस उम्र में भी, रास्तो को नापता है। 

रात काटी है तड़प कर, दिन में रोटी की जुगत हो,
जिंदगी का जाने कब तक, मुझ से ऐसा वास्ता है। 

फूल की राहों पे चलना, हक़ है केवल मालिकों का,
क्या किसी मुफ़लिस की खातिर, भी गुलों का रास्ता है। 

कोई कम कपड़ों में हो तो, कैमरे चलने लगेंगे,
पर किसी भूखे का नंगा, तन भी कोई छापता है। 

लफ्ज़ तो इतने बड़े के, आँख में आते नहीं हैं,
क्या मगर दिल से भी कोई, प्रेम सागर वांचता है। 

"देव" क्या कहना किसी से, कौन है हमदर्द आखिर,
मतलबों के इस जहाँ में, मतलबों का वास्ता है। "

.................चेतन रामकिशन "देव"..................
दिनांक-२०.०२.२०१५

♥♥वृतचित्र ...♥♥


♥♥♥♥वृतचित्र ...♥♥♥♥♥♥
वृतचित्र वो है जीवन का। 
प्रिय मित्र वो है जीवन का। 
मेरा हर क्षण करे सुगन्धित,
लगे इत्र वो है जीवन का। 

उसके बिन जीवन भारी है। 
दुश्वारी है, लाचारी है। 
उसे देखकर मन खुश होता,
छवि बहुत उसकी प्यारी है। 

वो आये मेरे ख्वाबों में,
लगे चित्र वो है जीवन का।  
मेरा हर क्षण करे सुगन्धित,
लगे इत्र वो है जीवन का... 

उसके साथ मेरा दिन उजला,
उससे रात धवल होती है। 
उसे देखकर ज्योति मिलती,
मानो वो कोई मोती है। 
"देव" जहाँ में उससे बढ़कर,
मेरे दिल को कोई नहीं है,
उसके बिन दिल में पीड़ा हो,
आँख मेरी हर पल रोती है। 

धूप में उसका साया सुख दे,
लगे छत्र वो है जीवन का। 
मेरा हर क्षण करे सुगन्धित,
लगे इत्र वो है जीवन का। "

......चेतन रामकिशन "देव".........
दिनांक-१९.०२.२०१५

Wednesday, 18 February 2015

♥♥उमस...♥♥


♥♥♥♥♥उमस...♥♥♥♥♥♥
मैं आँखों से बरस रहा हूँ। 
लेकिन जल को तरस रहा हूँ। 
बाहर से मैं खुश दिखता हूँ,
पर भीतर से झुलस रहा हूँ। 

अंतर्मन पे चोट लगी है,
पर उसका उपचार नहीं है। 
वही उठायें सबपे ऊँगली,
खुद जिनका आधार नहीं है।  
लोगों का दिल ज़ख़्मी करके,
देख रहेंगे हैं खूब तमाशा,
वो क्या जानें मानवता को,
जिनके दिल में प्यार नहीं है। 

दम घुटता, हवा नहीं है,
मन ही मन में, उमस रहा हूँ। 
बाहर से मैं खुश दिखता हूँ,
पर भीतर से झुलस रहा हूँ। 

पीठ में खंजर घोंपा जाये,
चीख किसी की कब सुनते हैं। 
लोग अजब हैं इस दुनिया के,
बस अपना मतलब चुनते हैं। 
"देव" किसी की आह को सुनकर,
अनदेखा करने की कोशिश,
किसी के घर को सौंप तबाही,
नफरत के जाले बुनते हैं। 

प्यार वफ़ा के ढाई अक्षर,
मैं सुनने को तरस रहा हूँ। 
बाहर से मैं खुश दिखता हूँ,
पर भीतर से झुलस रहा हूँ। "

........चेतन रामकिशन "देव"..........
दिनांक-१८.०२.२०१५