Tuesday, 25 June 2013

♥♥भीग गए अल्फाज ...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥भीग गए अल्फाज ...♥♥♥♥♥♥♥♥♥
सखी तुम्हारे एहसासों से, भीग गए अल्फाज हमारे!
बड़े भाग्य से आया हमदम, प्रेम तुम्हारा मेरे द्वारे!
मैं लफ्जों की सुन्दरता से, करता हूँ सिंगार तुम्हारा,
तेरी मांग में भरता हूँ मैं, अनुभूति के चाँद सितारे!

मन को तुमसे प्रेम बहुत है, सखी बड़ी मनभावन हो तुम!
हरियाली सी हरी भरी हो, गंगाजल सी पावन हो तुम!

सखी तुम्हारे भीतर दिखते, कुदरत के नायाब नजारे!
सखी तुम्हारे एहसासों से, भीग गए अल्फाज हमारे...

तेरे प्यार के एहसासों से, जीवन में खुशियाँ आती हैं!
तेरे प्यार से अंतर्मन पे, भावों की बदली छाती हैं!
"देव" तुम्हारे प्यार से मुझको, अपनायत का बोध हुआ है,
सखी तुम्हारे प्यार की कलियाँ, मेरे मन को महकाती हैं!

प्यार यहाँ कुदरत जैसा है, प्यार का कोई मोल नहीं है!
शब्दकोश में प्रेम से बढ़कर, देखो कोई बोल नहीं है!


सखी तुम्हारे प्रेम से मैंने, अपने मन के दोष निखारे!
सखी तुम्हारे एहसासों से, भीग गए अल्फाज हमारे!"

.............चेतन रामकिशन "देव"............
दिनांक-२५.०६.२०१३

Monday, 24 June 2013

♥♥चलें कुछ दूर...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥चलें कुछ दूर...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
चलें कुछ दूर हाथों में पकड़कर हाथ हम दोनों!
यकीं है सात जन्मों तक, रहेंगे साथ हम दोनों!

सुबह से शाम हो जाये, सवेरा या नया आये,
करेंगे एक दूजे से सदा ही, बात हम दोनों!

तुम्हारा दर्द मेरा है, मेरा हर गम तुम्हारा है,
करेंगे अपनी आँखों से, यहाँ बरसात हम दोनों!

चलेंगे साथ मिलकर के कंटीले रास्तों पर भी,
हर एक मुश्किल दे देंगे, यहाँ पर मात हम दोनों!

तुम्हारे बिन नहीं कटता है, देखो "देव" एक भी दिन,
रहेंगे चांदनी बनकर, यहाँ हर रात हम दोनों!"

...............चेतन रामकिशन "देव"................
दिनांक-२४.०६.२०१३

♥♥सच्चाई की राह...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥सच्चाई की राह...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
सच्चाई की राह पे चलकर,  मैंने बस इतना पाया है!
गैरों की तो बात छोड़िये, अपनों ने भी ठुकराया है!
जो मेरी आँखों में अक्सर, सपनों के अंकुर बोता था,
आज उसी ने देखो मेरा, एक एक सपना बिखराया है!

हाँ ये सच है सच के कारण, अपनों की दूरी सहता हूँ!
माँ ने सच का पाठ पढाया, इसीलिए पर सच कहता हूँ!

तेजाबी बारिश करता है, गगन में जो बादल छाया है!
सच्चाई की राह पे चलकर,  मैंने बस इतना पाया है..

कुछ लम्हों को लहर झूठ की, भले खुशी से भर सकती है!
लेकिन इस दुनिया से देखो, नहीं हकीक़त मर सकती हो!
"देव" दिलों में सच की ताकत, सूरज बनकर करे उजाला,
लेकिन दिल में झूठ की रौनक, नहीं उजाला कर सकती है!

कागज के सुन्दर फूलों से, जीवन नहीं खिला सकते हैं!
झूठ बोलने बाले खुद से, नजरें नहीं मिला सकते हैं!

अल्प समय के बाद ही जग में, झूठ का पौधा मुरझाया है!
सच्चाई की राह पे चलकर,  मैंने बस इतना पाया है!"

...............चेतन रामकिशन "देव".................
दिनांक-२४.०६.२०१३





Sunday, 23 June 2013

♥♥चांदनी के दीये..♥♥

♥♥♥♥♥चांदनी के दीये..♥♥♥♥♥
चांदनी के हजारों दीये जल गए!
आसमां में सितारों के गुल खिल गए!
प्यार की लहरें देखो मचलने लगीं,
एक दूजे से जब अपने दिल मिल गए!

प्यार से चांदनी भी, निखरने लगी!
हर तरफ रौशनी सी, बिखरने लगी!

लाज इतनी हुई है, लब सिल गए!
चांदनी के हजारों दिए जल गए...

चांदनी रात का ये मिलन खास है!
मैं तेरे पास हूँ, तू मेरे पास है!
तुमसे मिलकर मुझे "देव" ऐसा लगा,
मैं जमीं और तू मेरा आकाश है!

प्यार के सपने दिल में सजाते रहो!
प्यार जन्मों-जन्म तक निभाते रहो!

प्यार से अपने ख्वाबों के तन धुल गए!
चांदनी के हजारों दिए जल गए!"

......चेतन रामकिशन "देव"......
दिनांक-२३.०६.२०१३

♥♥दर्द की निशानी..♥♥

♥♥♥♥♥दर्द की निशानी..♥♥♥♥♥
जिंदगी से उलझकर ही रहने लगे!
आंख से आंसू दिन रात बहने लगे!

जो भी सपने सजाये थे मैंने कभी,
वक़्त की ठोकरों से वो ढहने लगे!

रौशनी ने पलटकर ही देखा नहीं,
हम अंधेरों को ही अपना कहने लगे!

प्यार में जो मिला वो निशानी समझ,
दर्द हंसकर के दिन रात सहने लगे!

वंदना जिसकी हम करते आये सदा,
उसकी धारा में जज्बात बहने लगे!

मेरे भीतर का कुंदन निखरने लगा,
हम गमों की तपिश जबसे सहने लगे!

"देव" अपनों ने मुड़कर नहीं देखा तो,
हम रकीबों को ही अपना कहने लगे!"

..........चेतन रामकिशन "देव"........
दिनांक-२३.०६.२०१३

Thursday, 20 June 2013

♥♥दर्द की धूप... ♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥दर्द की धूप... ♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
दर्द ने अधमरा है मुझे कर दिया, फिर से जीने का मुझको हुनर चाहिए!
दर्द की धूप में जल रहा हूँ बहुत, कोई राहत का मुझको शज़र चाहिए!
रास्ते बंद हैं सारी खुशियों के पर, फिर भी उम्मीद दिल में बची है जरा,
थोडा टुकड़ा मिले बस जमीं का मुझे, न ही चाहा के मुझको शिखर चाहिए!

रौशनी मंद है और अँधेरा घना, पर किसी से जरा भी शिकायत नहीं!
जिनको चाहा है उनको कहूँ बेवफा, मेरे दिल की मुझे ये इजाजत नहीं!

दर्द के इस सुलगते बियांबान में, एक पानी की मुझको लहर चाहिए! 
दर्द ने अधमरा है मुझे कर दिया, फिर से जीने का मुझको हुनर चाहिए...

नासमझ बनके जो मुझको समझाते हैं, वो सुनेंगे दुखन क्या मेरे दर्द की!
वो यहाँ मुझको देंगे दवा क्या भला, जिसने पाई नहीं हो तपन दर्द की!
"देव" मैं अपने अश्कों को पीता रहा, उम्र के आखिरी छोर तक भी मगर,
कोई ऐसा मुझे पर नहीं मिल सका, जिसने समझी चुभन हो मेरे दर्द की!

थोड़ी हिम्मत बची है जिये जाऊंगा, अपने हाथों से मरना गवारा नहीं!
मेरी तन्हाई हर पल मेरे साथ है, क्या हुआ जो किसी का सहारा नहीं!

दर्द से लड़ जो सकूँ निहत्थे भी में, हौंसले का मुझे वो ज़हर चाहिए!
दर्द ने अधमरा है मुझे कर दिया, फिर से जीने का मुझको हुनर चाहिए!"

................................चेतन रामकिशन "देव".....................................
दिनांक-२०.०६.२०१३

Wednesday, 19 June 2013

♥♥कुदरत का कहर.. ♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥कुदरत का कहर.. ♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
कुदरत के इस कहर के आगे, फिर इन्सां की हार हो गयी!
पल भर में ही खिलती क्यारी, उजड़ के देखो खार हो गयी!
जिस मंदिर के इर्द गिर्द अरसे से, गंगाजल बहता था,
आज उसी स्थल पे देखो, खून की गाढ़ी धार हो गयी!

पलक झपकते ही कुदरत ने, सब कुछ मटियामेट कर दिया!
जिस मानव को जनम दिया था, उसका ही आखेट कर दिया!

हँसते गाते लोगों के घर, पीड़ा की झंकार हो गयी! 
कुदरत के इस कहर के आगे, फिर इन्सां की हार हो गयी...

हाँ ये सच है इंसानों ने, इस कुदरत का दमन किया है!
लेकिन गलती हो जाने पर, कुदरत को ही नमन किया है!
"देव" यहाँ कुदरत के आगे, नहीं किसी की चल पाती है,
कुदरत ने खिलती बगिया को, देखो उजड़ा चमन किया है!

नहीं पता के इस कुदरत का, गुस्सा जाने कब कम होगा!
नहीं पता उजड़ी बगिया का, हरा भरा कब मौसम होगा!

जिस कुदरत ने जन्म दिया था, उसकी हम पर मार हो गयी!
कुदरत के इस कहर के आगे, फिर इन्सां की हार हो गयी!"

.........................चेतन रामकिशन "देव"........................
दिनांक-१९.०६.२०१३

Tuesday, 18 June 2013

♥♥भारी सांसें.. ♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥भारी सांसें.. ♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
भारी सांसें उठ नहीं पातीं, कुछ पल को आराम चाहिए!
कई दशक से चलता आया, कुछ पल को विश्राम चाहिए!
जिसके दामन में सर रखकर, मैंने दर्द बताना चाहा,
वही शख्स कहता है मुझसे, उसे दुआ का दाम चाहिए!

बिना जुर्म के ही दुनिया ने, मुझको मुजरिम बना दिया है!
मेरी पीड़ा सुने बिना ही, अपना निर्णय सुना दिया है!

बिना कत्ल के ही अब मुझको, कातिल जैसा नाम चाहिए!
भारी सांसें उठ नहीं पातीं, कुछ पल को आराम चाहिए...

नहीं चुका हूँ, नहीं थका हूँ, मैं जीवन से डरा नहीं हूँ!
मिटटी को जड़वत रोके हूँ, बेशक ही मैं हरा नहीं हूँ! 
"देव" मेरे नाजुक से दिल ने, दुनिया के सदमे झेले हैं,
इसीलिए बस मुरझाया हूँ, लेकिन मन से मरा नही हूँ!

मैंने जिसकी खातिर देखो, अपना गाढ़ा खून बहाया!
उस इन्सां ने ही दुनिया में, मेरे दिल को बहुत रुलाया!

जो आँखों को सुकूं दे सके, मुझको वो गुलफ़ाम चाहिए!
भारी सांसें उठ नहीं पातीं, कुछ पल को आराम चाहिए!"

................चेतन रामकिशन "देव"..................
दिनांक-१९.०६.२०१३

Monday, 17 June 2013

♥♥प्रीत के बादल..♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्रीत के बादल..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तेरे प्यार के बादल उमड़े, बरस रहा है रिमझिम पानी!
फूलों की खुश्बू लायी है, तेरे प्यार की मधुर निशानी!
सखी जहाँ में प्रेम से बढ़कर, कोई भी सम्बन्ध नहीं है,
मरकर भी जीवित रहती है, ये रूहों की प्रेम कहानी!

मेरी किस्मत अच्छी है जो, सखी तुम्हारी प्रीत मिली है!
सखी तुम्हारी प्रीत से मुझको, हर मंजिल पे जीत मिली है!

प्रेम बिना सब कुछ सूना है, सबको है ये बात बतानी!
तेरे प्यार के बादल उमड़े, बरस रहा है रिमझिम पानी..

बिना प्रीत के कोई दौलत, किसी का आँचल भर नहीं सकती!
ये दुनिया कोशिश करके भी, जुदा रूह को कर नहीं सकती!
"देव" जहाँ में मिलना ही बस, प्यार की मौलिक शर्त नहीं है,
सखी प्रेम की नातेदारी, बिना मिले भी मर नहीं सकती!

सखी प्रेम की आंखे पाकर, जग मनभावन हो जाता है!
सखी प्रेम का धारण करके, मन भी पावन हो जाता है!

सखी हमें एक दूजे के संग, ख्वाबों की बारात सजानी!
तेरे प्यार के बादल उमड़े, बरस रहा है रिमझिम पानी!"

...................चेतन रामकिशन "देव".......................
दिनांक-१७.०६.२०१३

Friday, 14 June 2013

♥♥चाहत का किरदार ...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥चाहत का किरदार ...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मुझे तेरी चाहत का हमदम, एक ऐसा किरदार चाहिए!
जब भी मेरी आंखे तरसे, मुझे तेरा दीदार चाहिए!
हाँ सच है के इस दुनिया में, वक्त किसी के पास नहीं है,
भले ही मुझको एक पल देना, पर रूहानी प्यार चाहिए!

नाम प्यार का मैं नहीं करता, प्यार तुझे दिल से करता हूँ!
इसीलिए तो तेरे दुःख में, अपनी आंखे नम करता हूँ!

हाथ मैं तेरा पकड़ सकूँ जो, मुझको वो अधिकार चाहिए!
मुझे तेरी चाहत का हमदम, एक ऐसा किरदार चाहिए....

प्यार के ढाई अक्षर भर से, शपथ प्रेम की तय नहीं होती!
बिना समर्पण के दुनिया में, प्रेम भाव की जय नही होती!
"देव" जहाँ में प्यार करो तो, करना पूरी सच्चाई से,
वो चाहत किस काम की जिसमे, सच्चाई की लय नहीं होती!

प्यार से बढ़कर इस दुनिया में, कोई भी सौगात नहीं है!
प्यार तो होता है रूहानी, बस अधरों की बात नहीं है!

बिन तेरे मैं गिर जाऊंगा, मुझे तेरा आधार चाहिए!
मुझे तेरी चाहत का हमदम, एक ऐसा किरदार चाहिए!"

....................चेतन रामकिशन "देव".......................
दिनांक-१४.०६.२०१३

Thursday, 13 June 2013

♥♥मेरी टहनियां...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥मेरी टहनियां...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
किसे ने मेरे पत्ते तोड़े, कोई टहनी काट ले गया!
किसी ने मेरी छाल को छीला, कोई फलों को छांट ले गया!
इस दुनिया में बेदर्दी से, सभी ने मेरे दिल को काटा,
कोई ऐसा नहीं मिला जो, थोड़ा सा गम बाँट ले गया!

यूँ तो जग में बहुत मिले हैं, मुझे चाँद से दिखने वाले!
जगह जगह देखे हैं मैंने, बड़ा बड़ा सा लिखने वाले!

मैंने माँगा जिससे रेशम, वही दुखों की टाट दे गया!
किसे ने मेरे पत्ते तोड़े, कोई टहनी काट ले गया....

कट गयीं जब से मेरी टहनियां, छाया मुझसे मुक्त हो गई!
अपनेपन की खाद मिली न, एक एक क्रिया सुप्त हो गई!
"देव" हमारी आँखों से अब, सूखे में जल बरस रहा है,
मिट गई मेरी हर एक निशानी, मेरी दुनिया लुप्त हो गई!

नहीं समझ आया पर मुझको, लोगों में बेदर्दी क्यूँ है!
जिसे चाहिए धूप खुशी की, वहां गमों की सर्दी क्यूँ है!

जो कुछ बचा खुचा था मुझमें, गम का दीमक चाट ले गया!
किसे ने मेरे पत्ते तोड़े, कोई टहनी काट ले गया!"

...................चेतन रामकिशन "देव"................
दिनांक-१४.०६.२०१३ 

Monday, 10 June 2013

♥♥बेटी(धरती की परी).♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥बेटी(धरती की परी).♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
परियों जैसी प्यारी प्यारी, मिश्री जैसी मधुर है बेटी!
एक मानव के जीवन पथ में, फूलों जैसी डगर है बेटी!
जिस आंगन में बेटी न हो वो, उस घर में रहती नीरसता,
कड़ी धूप में जलधारा की, एक मनभावन लहर है बेटी!

बेटी की तुलना बेटों से, करके उसको कम न आंको!
बेटी है बेटों से बढ़कर, कभी रूह में उसकी झांको!

वो कविता का भावपक्ष है, किसी गज़ल की बहर है बेटी!
परियों जैसी प्यारी प्यारी, मिश्री जैसी मधुर है बेटी...

जन्मकाल से ही बेटी को, कुदरत से ये गुण मिलते हैं!
बचपन से ही उसके मन में, नम्र भाव के गुल खिलते हैं!
बेटी के मन में बहता है, सहनशीलता का एक सागर,
नहीं आह तक करती है वो, भले ही उसके हक छिलते हैं!

बेटी तो है ज्योति जैसी, वो घर में उजियारा करती!
वो चिड़ियों की तरह चहककर, घर आंगन को प्यारा करती!

बेटे यहाँ बदल जायें पर, अपनी आठों पहर है बेटी!
परियों जैसी प्यारी प्यारी, मिश्री जैसी मधुर है बेटी....

आशाओं की ज्योति है वो, पूनम जैसी निशा है बेटी!
अंतर्मन को सुख देती है, कुदरत की वो दुआ है बेटी!
"देव" जहाँ में बेटी जैसा, कोई अपना हो नहीं सकता,
किसी मनुज के बिगड़े पथ की, सही सार्थक दिशा है बेटी!

बेटी है तो घर सुन्दर है, बिन बेटी के घर खाली है!
बेटी है तो खिला है उपवन, बेटी है तो हरियाली है!

हंसकर वो कुर्बानी देती, ऐसा पावन रुधिर है बेटी!
परियों जैसी प्यारी प्यारी, मिश्री जैसी मधुर है बेटी!"


"
बेटी-एक ऐसा चरित्र, जिसके बिना किसी मनुज का जीवन पूर्ण नही होता, जिसकी किलकारी के बिना, जिसकी चहक के बिना, कोई घर सम्पूर्ण नहीं होता, वो ऐसा चरित्र जो अपने हर सुख का दमन करते हुए, अपने परिजनों के लिए अपने रुधिर की एक एक बूंद तक कुर्बान कर देती है, तो आइये कुदरत के ऐसा अनमोल चरित्र "बेटी" का सम्मान करें!"

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-११.०६.२०१३ 

"
सर्वाधिकार सुरक्षित"


♥♥मेरे जज्बात..♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥मेरे जज्बात..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
काश मेरे जजबातों को तुम, पढ़ लेते मन की आँखों से,
फिर न तुमको रत्ती भर भी, कभी शिकायत होती मुझसे!

तुमने कैसे सोच लिया के, अदल बदल कर मैं जीता हूँ,
मैं जैसा हूँ, मैं वैसा हूँ, नहीं बनावट होती मुझसे!

तू जितना भी दर्द मुझे दे, मैं उफ तक भी नहीं करूँगा,
क्यूंकि रूहानी रिश्तों की, नहीं बगावत होती मुझसे!

नाम प्यार का भले नहीं दो, पर तू मेरा दर्द समझना,
तेरी दुआ के बिन जीवन की, नहीं हिफाजत होती मुझसे!

जो एक पल भी मिला चैन का, उससे अपनी झोली भर ली,
मानवता के नाम पे देखो, नहीं तिजारत होती मुझसे!

जो मेरा दिल कहता है मैं, उसको ज्यों का त्यों लिखता हूँ,
किसी लफ्ज के साथ झूठ की, नहीं सजावट होती मुझसे!

तूने मुझको "देव" अगर जो, कातिल अपना मान लिया तो,
खुद को फांसी लटका दूंगा, नहीं रियायत होती मुझसे!"

................चेतन रामकिशन "देव"....................
दिनांक-१०.०६.२०१३

Sunday, 9 June 2013

♥♥दामन के घाव.♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥दामन के घाव.♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
आंसू पीना मुझे आ गया, घाव भी सिलना सीख गया हूँ!
इस दुनिया से दर्द छुपाकर, हंसकर मिलना सीख गया हूँ!
भले ही गम के तेजाबों ने, जड़ें खोखली कर दीं मेरी,
लेकिन फिर भी फूलों जैसा, जग में खिलना सीख गया हूँ!

हाँ दामन पर घाव बहुत हैं, सिलने में कुछ वक़्त लगेगा!
लगता है के मरते दम तक, गम का साया नहीं रुकेगा!

इसीलिए जल प्रपातों में, नमक सा घुलना सीख गया हूँ!
आंसू पीना मुझे आ गया, घाव भी सिलना सीख गया हूँ....

भौतिक मिलन भले न हो पर, मन से मन का मिलन जरुरी!
तुम हिंसा को ठोकर मारो, मगर प्रेम का नमन जरुरी!
"देव" जहाँ में मानवता को, चलो जरुरी कर दें इतना,
जैसी दुनिया में धरती की, खातिर देखो गगन जरुरी!

सपने शीशे के होते हैं, कुछ टूटें तो गम न करना!
और अपने मन के साहस को, तुम जीते जी कम न करना!

मैं पथरीले रस्ते पर भी, खुशी पे चलना सीख गया हूँ!
आंसू पीना मुझे आ गया, घाव भी सिलना सीख गया हूँ!"

....................चेतन रामकिशन "देव".........................
दिनांक-०९.०६.२०१३

Saturday, 8 June 2013

♥♥बेदर्दी का ठोस धरातल..♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥बेदर्दी का ठोस धरातल..♥♥♥♥♥♥♥♥♥
बेदर्दी का ठोस धरातल, इन अश्कों से नहीं पिघलता!
बदकिस्मत लोगों के घर में, खुशी का सूरज नहीं निकलता!
इस दुनिया से तुम कितनी भी, मिन्नत करना अपनायत की,
लेकिन जिनका दिल पत्थर हो, उनका आंसू नहीं निकलता!

लोग सड़क पर घायल होकर, तड़प तड़प कर मर जाते हैं!
पर पत्थर के लोग दया की, कहाँ इनायत कर पाते हैं!

मजलूमों पर जुल्म देखकर, खून भी इनका नहीं उबलता!
बेदर्दी का ठोस धरातल, इन अश्कों से नहीं पिघलता...

सही आदमी के चेहरे पर, गम की काई चढ़ जाती है!
और पीड़ा की घनी लिखावट, नई कहानी गढ़ जाती है!
सुनो "देव" यूँ तो दुनिया में, हर इन्सां को दर्द है लेकिन,
बिना जुर्म के सजा मिले तो, चीख दर्द की बढ़ जाती है!

ये अँधा कानून किसी का, रोता मुखड़ा देख सके न!
कभी किसी के टूटे दिल का, जलता दुखड़ा देख सके न!

कभी कभी ये दर्द का मौसम, अंतिम पल तक नहीं बदलता!
बेदर्दी का ठोस धरातल, इन अश्कों से नहीं पिघलता!"

.....................चेतन रामकिशन "देव".....................
दिनांक-०९.०६.२०१३

Friday, 7 June 2013

♥♥♥सुलगता दिल..♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥सुलगता दिल..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
गमों से दिल सुलगता है, सुलगने दो, सुलगने दो!
मेरी आँखों से तुम अब, दर्द का सैलाब गिरने दो!
जो तपता है, जो जलता है, वही कुंदन सा बन पाए,
गमों की आग में मुझको, जरा दिन रात जलने दो!

जो डरकर हार से, आँखों के सपने तोड़ देते हैं!
कहाँ हैं वो आदमी होंगे, जो जीना छोड़ देते हैं!

नया दिन फिर से निकलेगा, जरा ये रात ढलने दो!
गमों से दिल सुलगता है, सुलगने दो, सुलगने दो...

अंधेरों से उजालों का, सफर हर रोज होता है!
कोई खुशियों का पाता है, कहीं एहसास रोता है!
सुनो हम "देव" इस दुनिया को, आखिर क्या सिखायेंगे,
वही नेकी पढाता है, यहाँ कातिल जो होता है!

अगर तुम खुद जरा संभलो, तो ये हालात बदलेंगे!
अंधेरों में भी ज्योति के यहाँ, एहसास निकलेंगे!

चलो कुछ देर को मुझको, जरा खुद से ही मिलने दो!
गमों से दिल सुलगता है, सुलगने दो, सुलगने दो!"

....................चेतन रामकिशन "देव".......................
दिनांक-०८.०६.२०१३

Thursday, 6 June 2013

♥♥दर्द के गहरे घाव ..♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥दर्द के गहरे घाव ..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तुम जो मेरी आंख से बहता, अश्कों का सैलाब समझते!
मेरे लफ्ज़ भी नहीं बिलखते, जो तुम उनका भाव समझते!
दवा से ज्यादा दुआ तुम्हारी, असर मेरे ज़ख्मों पे करती,
गर तुम मेरे दिल में शामिल, दर्द के गहरे घाव समझते!

बिन महसूस किये तुम मेरा, दर्द भला क्या सुन सकते हो! 
तुम मेरे जीवन के पथ से, कांटे कैसे चुन सकते हो!

नहीं काटते मेरी जड़ को, जो मेरा फैलाव समझते!
तुम जो मेरी आंख से बहता, अश्कों का सैलाब समझते...

बहुत सरल है ये कहना के, तुम खुद को समझाकर देखो!
गला दर्द से रुंधा हो लेकिन, गीत खुशी के गाकर देखो!
इस दुनिया में "देव" किसी की, चोट तभी तुम समझ सकोगे,
जब तुम जलती धूप में तपकर, दर्द को खुद अपनाकर देखो!

ये दिल के एहसास ही तो हैं, जो दूरी को कम करते हैं!
जो गैरों की चोट देखकर, अपनी आँखों नम करते हैं!

तुम भी रोते तन्हाई में, गर अपना बरताव समझते!
तुम जो मेरी आंख से बहता, अश्कों का सैलाब समझते!"

.................चेतन रामकिशन "देव".................
दिनांक-०६.०६.२०१३

Tuesday, 4 June 2013

♥♥दिल के टुकड़े..♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥दिल के टुकड़े..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥ 
सांसें भी भारी भारी हैं, अधर धूप से चटक रहे हैं!
और हमारे दिल के देखो, टुकड़े होकर छिटक रहे हैं!
कभी किसी से अपनेपन में, हमने सच को सच बोला तो,
वो कहते हैं मेरे सच को, हम रस्ते से भटक रहे हैं!

लगता है के हमदर्दी की, आस लगाकर भूल हो गयी!
जीवन में जो हरियाली थी, वो इक पल में शूल हो गयी!

गैरों की तो बात छोड़िये, अपनों को हम खटक रहे हैं!
सांसें भी भारी भारी हैं, अधर धूप से चटक रहे हैं.....

बड़ा बड़ा क्या लिखना जब तक, सीने में दिल बड़ा नहीं हो!
वो आंखे किस काम जिसमे, प्रेम का मोती जड़ा नहीं हो!
"देव" यहाँ पर उस मानव को, किन शब्दों से अपना लिखूं,
जो जीवन के बुरे वक़्त में, साथ हमारे खड़ा नहीं हो!

दुनिया का ये हाल रहा तो, प्यार जहाँ से मिट जायेगा!
और जहाँ से अपनेपन का, एक एक पौधा कट जायेगा!

वो क्या देंगे मुझे सहारा, हाथ जो मेरा झटक रहे हैं!
सांसें भी भारी भारी हैं, अधर धूप से चटक रहे हैं!"

.................चेतन रामकिशन "देव"..................
दिनांक-०५.०६.२०१३

♥♥गम की काली रात ..♥♥

♥♥गम की काली रात ..♥♥
गम की काली रात न आये!
ज़ख्मों की सौगात न आये!
यही दुआ है, मुझे रुलाने,
अश्कों की बरसात न आये!

एक अकेली जान हूँ आखिर,
इतना दर्द सहूँ मैं कब तक!
पलक मेरी भी छलनी होतीं,
आंसू बनकर बहूँ मैं कब तक!
दर्द के गहरे अँधेरे में,
आसपास का कुछ नहीं दिखता,
अँधेरे में सहम सहम कर,
इस तरह से रहूँ मैं कब तक!

खुशी का रस्ता देख रहा हूँ,
मगर खुशी भी हाथ न आये!
यही दुआ है, मुझे रुलाने,
अश्कों की बरसात न आये...

दुनिया लेकिन पत्थर दिल है,
दर्द किसी का कब सुन पाये!
जब होता है बुरा वक़्त तो,
अपना कोई पास न आये!
"देव" यहाँ पर जिसको मैंने,
अपने दिल का हाल बताया,
उस इन्सां को मेरी तड़प का,
हाल जरा भी समझ न आये!

मार नहीं सकता मैं खुद को,
पर जिन्दा भी रहा न जाये!
यही दुआ है, मुझे रुलाने,
अश्कों की बरसात न आये!"

...चेतन रामकिशन "देव"..
दिनांक-०४.०६.२०१३

Monday, 3 June 2013

♥♥♥गम की जडें..♥♥♥

♥♥♥गम की जडें..♥♥♥
दुख की भरी दुपहरी है पर,
जड़ें गमों की काट रहा हूँ!
तन्हाई में साथ रहे जो,
कुछ ऐसे पल छांट रहा हूँ!
इस दुनिया ने भले ही मुझको,
कभी प्यार से नहीं पुकारा,
मगर मैं फिर भी इस दुनिया को,
प्यार के लम्हें बाँट रहा हूँ!

नहीं पता के सच से मुझको,
आखिर क्या हासिल होता है!
वो क्या समझे किसी के आंसू,
जिसका पत्थर दिल होता है!
और ये देखो, इस दुनिया के,
लोगों का है अजब नजरिया,
उसी को अच्छा कहते हैं सब,
जो देखो कातिल होता है!

कभी कभी भलमनसाहत पर,
मैं खुद ही डांट रहा हूँ!
दुख की भरी दुपहरी है पर,
जड़ें गमों की काट रहा हूँ...

मुझको खुद से गिला नहीं है,
नजरें खुद से मिला रहा हूँ!
अपनी आँखों के अश्कों से,
बंजर में गुल खिला रहा हूँ!
"देव" यकीं है एक दिन मुझको,
पत्थर जैसे दिल पिघलेंगे,
इसीलिए मैं उम्मीदों के,
दीपक दिल में जला रहा हूँ!

बुरे वक़्त में अपने दिल को,
सूखी शबनम बाँट रहा हूँ!
दुख की भरी दुपहरी है पर,
जड़ें गमों की काट रहा हूँ!"

...चेतन रामकिशन "देव"..
दिनांक-०४.०६.२०१३

♥♥♥सूखा बादल...♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥सूखा बादल...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
दर्द बाँटने निकला हूँ मैं, मगर किसी ने लिया नहीं है!
मेरी आंख का बहता आंसू, कभी किसी ने पिया नहीं है!
यूँ तो मुझको बहुत मिले हैं, अपनायत दिखलाने वाले,
मगर किसी ने मेरे दर्द का, घाव जरा भी सिया नहीं है!

आसमान में चाँद देखकर, भले मेरे दिल मुस्काता है!
लेकिन झूठी हंसी का आलम, पलकों पे आंसू लाता है!

कभी किसी ने मेरे दुःख को, यहाँ भरोसा दिया नहीं है!
दर्द बाँटने निकला हूँ मैं, मगर किसी ने लिया नहीं है...

उसने ही मुंह मोड़ लिया है, जिससे मैंने आस रखी है!
वो निकला बस सूखा बादल, जिससे मैंने प्यास रखी है!
"देव" जहाँ में जिसको मैंने, हरियाली का वन समझा था,
उस इन्सां ने मेरे पथ में, गम की सूखी घास रखी है!

दर्द भरी इस तन्हाई का, वक़्त न जाने कब तय होगा!
नहीं पता के इस जीवन से, दुख का जाने कब क्षय होगा!

कभी किसी ने घने तिमिर में, यहाँ उजाला किया नही है!
दर्द बाँटने निकला हूँ मैं, मगर किसी ने लिया नहीं है!"

...................चेतन रामकिशन "देव".....................
दिनांक-०३.०६.२०१३

Sunday, 2 June 2013

♥♥शब्दों की मधुरम वाणी...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥शब्दों की मधुरम वाणी...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
शब्दों की मधुरम वाणी का, एक उज्जवल प्रकाश तुम्हीं हो!
मेरे प्रेम के पंछी मन का, सखी सुनो आवास तुम्हीं हो!

मेरे मन के भावों का भी, अलंकरण तुमसे होता है,
इस जीवन में हंसी खुशी का, सखी सुनो आभास तुम्हीं हो!

ये सच है के इस जग में, अब प्रेम का वो स्थान नहीं है!
किन्तु फिर भी बिना प्रेम के, मानव का कल्याण नहीं है!

तुम्ही मिलन की अनुभूति हो, और विरह वनवास तुम्हीं हो!
शब्दों की मधुरम वाणी का, एक उज्जवल प्रकाश तुम्हीं हो....

सखी लाज तेरा गहना है, छुईमुई जैसी लगती हो!
सखी हमारी प्रतीक्षा में, रात रात भर तुम जगती हो!
सखी तुम्हारे प्रेम ने मेरे, सूने मन में रंग भरे हैं,
अपने कोमल हाथों पर तुम, प्रेम भरी मेहँदी रचती हो!

तुमको जबसे प्रेम किया है, मानवता मन में आई है!
सखी तुम्हारे प्रेम ने देखो, मेरी दुनिया महकाई है!

सखी तुम्हीं सावन की बारिश, सतरंगी आकाश तुम्हीं हो!
शब्दों की मधुरम वाणी का, एक उज्जवल प्रकाश तुम्हीं हो...

सखी तुम्हारे प्रेम में देखो, किंचित भी अभिमान नहीं है!
बिना प्रेम के इस जीवन में, मानव का सम्मान नहीं है!
"देव" जहाँ में प्रेम की युक्ति, करती है मिट्टी को सोना, 
इस दुनिया में प्रेम से बढ़कर, कोई मीठा गान नहीं है!

सखी तुम्हारी प्रीत ने मुझको, जिस दिन से भी गले लगाया!
तब से मेरे जीवन पथ में, खुशी का हर पल झोंका आया! 

सखी तुम्हीं शीतल जलधारा और हरियाली घास तुम्हीं हो!
शब्दों की मधुरम वाणी का, एक उज्जवल प्रकाश तुम्हीं हो!"


"
प्रेम-जिससे भी होता है, वो मानव, प्रेम करने वाले व्यक्तित्व में सब कुछ निहित कर देता है, वो कभी उसे प्रकृति की शीतल जल-धारा से जोड़ता है तो कभी हरियाली से, कभी चद्रमा के मुख से तो कभी कोयल की बोली से! सचमुच, प्रेम एक ऐसा विषय है, जिसके लिए सभी की अपनी अपनी परिभाषा हैं, मगर हर परिभाषा का उद्देश्य कथन प्रेम ही है, तो आइये प्रेम का अंगीकार करें!"
  

.............चेतन रामकिशन "देव"..............
दिनांक-०३.०६.२०१३
"सर्वाधिकार सुरक्षित"
"मेरी ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित."

Saturday, 1 June 2013

♥♥धुआं धुआं सा..♥♥

♥♥♥धुआं धुआं सा..♥♥♥♥
धुआं धुआं सा छंट जाने दो!
गम की खाई पट जाने दो!
फिर से नया सवेरा होगा ,
अंधकार को हट जाने दो!

भले फिसल कर गिर जाओ तुम,
लेकिन अपने कदम बढ़ाओ!
जीवन की अंतिम साँसों तक,
अपना साहस नहीं मिटाओ!
कभी हार है, कभी जीत है,
जीवनपथ का यही नियम है,
तुम मन में आशायें लेकर,
सही दिशा में बढ़ते जाओ!

तुम नफरत की शिरा को देखो,
अपने मन से कट जाने दो!
फिर से नया सवेरा होगा ,
अंधकार को हट जाने दो...

उम्मीदों की धवल चांदनी,
नीरसता को दूर करेगी!
और हमारी हिम्मत देखो,
हर मुश्किल को चूर करेगी!
इस दुनिया में "देव" जो हमने,
खुद को इन्सां बना लिया तो,
फिर औरों की खुशी भी देखो,
अपने मन में नूर करेगी!

अपने मन को मानवता को,
पूरी पोथी रट जाने दो!
फिर से नया सवेरा होगा ,
अंधकार को हट जाने दो!"

...चेतन रामकिशन "देव"...
दिनांक-०२.०६.२०१३

Friday, 31 May 2013

♥♥एहसासों का सागर.♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥एहसासों का सागर.♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
बूंद बूंद भर एहसासों का, एक सागर मैं बना रहा हूँ!
अपनी आँखों को सपनों की, एक एक सीढ़ी गिना रहा हूँ!
इस दुनिया के लोग तो देखो, मूक-बधिर जैसे बन बैठे,
इसीलिए अपनी पीड़ा को, मैं खुद को ही सुना रहा हूँ!

कुछ सपने बेशक टूटे हैं, लेकिन हार नहीं मानी है!
मैंने अपने प्रयासों में, शामिल कमियां पहचानी हैं!

न मैं अवसरवादी बनकर, कोई अवसर भुना रहा हूँ!
बूंद बूंद भर एहसासों का, एक सागर मैं बना रहा हूँ...

गम की भारी वर्षा में भी, सुख की आस नहीं खोते हैं!
जो मंजिल की चाह में देखो, मन की नींद नहीं सोते है!
"देव" वही इंसान जहाँ में, इतिहासों की रचना करते,
जो बे-संसाधन होकर भी, पथ से दूर नहीं होते हैं!

हाँ सच है के ये जीवनपथ, हर पल ही आसान नहीं है!
बिना त्याग के पर जीवन की, किंचित भी पहचान नहीं है!

अपने अधरों से कानों को, गीत विजय का सुना रहा हूँ!
बूंद बूंद भर एहसासों का, एक सागर मैं बना रहा हूँ!"

..................चेतन रामकिशन "देव"..................
दिनांक-०१.०६.२०१३






  

Thursday, 30 May 2013

♥♥♥झील सी तेरी आँखे..♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥झील सी तेरी आँखे..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तेरी गहरी झील सी आँखों में, खोना अच्छा लगता है !
मुझे तेरे कंधे पर सर रखकर, सोना अच्छा लगता है!
तुमको छूकर, तुम्हें देखकर, मन को गहरी राहत मिलती,
सखी तुम्हारे साथ में सपनों को, बोना अच्छा लगता है!

तू सुन्दर है तन से हमदम, और मन से भी निखरी है तू!
इन फूलों पर, हरियाली पर, शबनम बनकर बिखरी है तू!

इस दुनिया में बस मुझको, तेरा होना अच्छा लगता है!
तुमको बाहों में भरकर के, हमदम सोना अच्छा लगता.."

अंगारों जैसी दुनिया में, तुम फूलों जैसी कोमल हो!
रेगिस्तानी धूप में हमदम, तुम गंगा का शीतल जल हो!
"देव" तुम्हारी प्रीत ने मुझको, मानवता के भाव दिए हैं,
तुम उर्जा हो, तुम्ही प्रेरणा, तुम्हीं हमारे मन का बल हो!

अंतर्मन में किया उजाला, ऐसी सुन्दर ज्योति हो तुम!
और सीपी की गहराई से, मिलने वाला मोती हो तुम!

तेरी पायल की रुनझुन में, गुम होना अच्छा लगता है!
तेरी गहरी झील सी आँखों में, खोना अच्छा लगता है !"

..................चेतन रामकिशन "देव"...................
दिनांक-३१.०५.२०१३

Tuesday, 28 May 2013

♥♥गगन का सूर्य .♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥गगन का सूर्य .♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
गगन का सूर्य बन जाओ, उजाला हर तरफ कर दो!
मोहब्बत का दीया बनकर, जहाँ में प्यार तुम भर दो!
बनो ऐसे के दुनिया में, खुशी दे पाओ लोगों को,
जो मरकर याद आओ तुम, यहाँ खुद को अजर कर दो!

गमों की आंच में तपकर, हमें हिम्मत बढ़ानी है!
कभी हँसना है जोरों से, कभी आँखों में पानी है!

जो तुम छा जाओ दुनिया पर, चलो ऐसा हुनर कर दो!
गगन के सूर्य बन जाओ, उजाला हर तरफ कर दो...

बनाकर दिल को पत्थर सा, नहीं इंसान बन सकते!
किसी मुफलिस के चेहरे की, नहीं मुस्कान बन सकते!
जरा तुम "देव" खुद को आईने में, झांककर देखो,
सफर काँटों के मेहनत बिन, नहीं आसान बन सकते!

कभी तुम हार के डर से, इरादे तोड़ न देना!
कभी हाथों से मेहनत के हुनर को, छोड़ न देना!

निशां बन जायें कदमों के, चलो इतना असर कर दो!
गगन के सूर्य बन जाओ, उजाला हर तरफ कर दो!"

....................चेतन रामकिशन "देव"....................
दिनांक-२९.०५.२०१३

Sunday, 26 May 2013

♥♥प्रेम-गीत..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्रेम-गीत..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
गीत गुनगुनाना चाहता हूँ, यदि हमारा गीत बनो तुम!
तुम बनकर एहसास हमारे, सखी हमारी मीत बनो तुम!
बिना तुम्हारे धूप की गर्मी, मेरे तन को जला रही है,
तुम ही छाया बनो वृक्ष की, तुम ही वर्षा, शीत बनो तुम!

इस जीवन के पथ पर देखो, जिस दिन हम तुम मिल जायेंगे!
उस दिन देखो जीवन पथ में, फूल खुशी के खिल जायेंगे!

मस्तक मेरा उठ जायेगा, यदि हमारी जीत बनो तुम!
गीत गुनगुनाना चाहता हूँ, यदि हमारा गीत बनो तुम...

तुम संग नया सवेरा, साँझ खुशी से भर जाएगी!
सखी तुम्हारे रूप में देखो, कुदरत मेरे घर आएगी!
तुम जब साथ रहोगी तो फिर, मुश्किल से घबराना कैसा,
देख तुम्हारे दिव्य रूप को, मुश्किल देखो डर जाएगी!

अनुभूति के सागर तट पर, हम लहरों से मिलन करेंगे!
हम दोनों एक दूजे का दुःख, सहज भाव से सहन करेंगे!

गीत मेरा दिल को छू लेगा, यदि मेरा संगीत बनो तुम!
गीत गुनगुनाना चाहता हूँ, यदि हमारा गीत बनो तुम...

प्रेम का अर्थ नहीं के इसमें, मीत का ही भूषण होता है!
प्रेम तो जग में हर मानव के, मन का आभूषण होता है!
"देव" प्रेम की खुश्बू से तुम, अपने मन को भरकर देखो,
प्रेम की युक्ति से मानव की, खुशियों का पोषण होता है!

मानवता से प्रेम का जिस दिन, देखो दीपक जल जाता है!
उस दिन हिंसा, छुआछुत का, जलता सूरज ढल जाता है!

घृणा सारी मिट जाएगी, प्रेम की व्यापक रीत बनो तुम!
गीत गुनगुनाना चाहता हूँ, यदि हमारा गीत बनो तुम!"

"
प्रेम-जहाँ परस्पर प्रेम होता है, वो प्रेम चाहें, प्रेमी-प्रेमिका के मध्य हो, या मानव और मानव के मध्य, वहां हिंसा, घृणा, छुआछुत का कोई स्थान नहीं होता! प्रेम, जहाँ परस्पर समर्पण भाव से होता है, वहां लोग अभावों में भी अपने जीवन को हंसकर जीते हैं! तो आइये अपने मन को प्रेम से भूषित करें!"

..चेतन रामकिशन "देव"..
दिनांक-२७.०५.२०१३

"सर्वाधिकार सुरक्षित"

Friday, 24 May 2013

♥♥पत्थर की दुनिया..♥
नेक रास्ते तंग हो रहे!
प्रेम के फीके रंग हो रहे!
आज आदमी के दुनिया में,
पत्थर जैसे ढंग हो रहे!

दिल संवेदनहीन हो गया, 
प्रेम का धागा क्षीण हो गया!
आज आदमी इस तरह से,
अपने सुख में लीन हो गया!
लोग तड़पती देह का चेहरा,
देख के पीछे हट जाते हैं,
लगता है अब मानवता का,
स्तर बिलकुल दीन हो गया!

अपने हमको मिटा रहे हैं,
दुश्मन बेशक संग हो रहे!
आज आदमी के दुनिया में,
पत्थर जैसे ढंग हो रहे...

बड़ी बड़ी बातें लिखते हैं,
बड़े बड़े दावे करते हैं!
लेकिन वक़्त जरुरत पर वो,
अपना दिल छोटा करते हैं!
"देव" नहीं मालूम दुनिया का,
ऐसा आलम रहेगा कब तक,
इस दुनिया में कातिल खुश हैं,
और यहाँ पीड़ित मरते हैं!

गम के रेतीले मंजर में,
हम जलकर बदरंग हो रहे!
आज आदमी के दुनिया में,
पत्थर जैसे ढंग हो रहे!"

..चेतन रामकिशन "देव"..
दिनांक-२५.०५.२०१३

"सर्वाधिकार सुरक्षित"

Thursday, 23 May 2013

♥♥प्रेम की छुअन..♥♥


♥♥♥प्रेम की छुअन..♥♥♥
प्रेम रोग का नाम नहीं है!
द्वेष भरा कोई काम नहीं है!
प्रेम जहाँ में बिक नहीं सकता,
प्रेम का कोई दाम नहीं है!

प्रेम सरस है, प्रेम सुधी है!
प्रेम बड़ी अनमोल निधि है!
घृणा की काई धोने को,
प्रेम बड़ी आसान विधि है!

प्रेम बिना प्रभात अकेली,
हर्ष की सुखमय शाम नहीं है!
प्रेम जहाँ में बिक नहीं सकता,
प्रेम का कोई दाम नहीं है...

छुअन प्रेम की पहुंचे मन तक,
बेशक रस्ता तन का ही हो!
प्रेम सदा रहता यादों में,
भले प्रेम क्षण भर का ही हो!
"देव" हमारे मन में तो बस,
छवि तुम्हारी वसी हुई है,
सात जनम के सपने होते,
भले प्रेम एक जन्म का ही हो!

जब से तुमको मीत चुना है,
ये जीवन नाकाम नहीं है!
प्रेम जहाँ में बिक नहीं सकता,
प्रेम का कोई दाम नहीं है!"

....चेतन रामकिशन "देव"...
दिनांक-२४.०५.२०१३

♥♥प्रेम की अवधारणा..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्रेम की अवधारणा..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मेरी चाहत, मेरे प्यार का, हमदम तुम विश्वास करो जो!
तुम उल्फत के फूल बिछाकर, मेरा जीवन खास करो जो!
दूर हूँ तुमसे लेकिन फिर भी, तेरे प्यार की नजदीकी है,
मैं भी पास लगूंगा तुमको, गर मेरा एहसास करो जो!

प्रेम के अक्षर लिखने भर से, प्रेम का मानक पूर्ण नहीं है!
बिना प्रेम के कोई भी शै, दुनिया में सम्पूर्ण नहीं है!

मेरे दर्द लगेगा अपना, तुम इसका आभास करो जो!
मेरी चाहत, मेरे प्यार का, हमदम तुम विश्वास करो जो...

तुम चाहत की अनुभूति से, मेरे घर को रौशन कर दो!
गम की सारी तपिश मिटाकर, शीतल मेरा जीवन कर दो!
"देव" जहाँ में बिना प्यार के, खाई कोई मिट नहीं सकती,
तुम अपने हाथों से छूकर, उज्जवल मेरा ये मन कर दो!

मेरी आंख के आंसू में भी, तेरी प्रीत का नमक घुला है!
तेरे हाथ फिराने भर से, मेरे दर्द को सुकूं मिला है!

नया उजाला खिल जाएगा, प्रेम का तुम प्रकाश करो जो!
मेरी चाहत, मेरे प्यार का, हमदम तुम विश्वास करो जो!"

..................चेतन रामकिशन "देव"...................
दिनांक-२३.०५.२०१३



Wednesday, 22 May 2013

♥♥जीवन की क्षमता ..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥जीवन की क्षमता ..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
जीवन की कर्मठ क्षमता को, जो बलशाली कर जाते हैं!
जो बंजर में भी मेहनत से, इक हरियाली कर जाते हैं!
इस दुनिया में मरकर के भी, याद वही आते हैं देखो,
जो व्यक्ति अपने कर्मों से, जग खुशहाली कर जाते हैं!

जो मानवता की पीड़ा पर, दो आंसू भी नहीं बहाते!
जो गिरते इंसान को देखो, हाथ पकड़ कर नहीं उठाते!
जो बस मूक बधिर होकर के, कभी किसी का दर्द सुनें न,
जो करते हैं प्यार के दावे, प्यार को लेकिन नहीं निभाते!

ऐसे जन ही मानवता का, नाम कलंकित कर जाते हैं!
जो जीवित होते हैं लेकिन, मानवता से मर जाते हैं!
ऐसे लोगों को दुनिया में, दिल से इज्ज़त कभी मिले न,
जो बस अपने निजी स्वार्थ में, सच्चाई से डर जाते हैं!

लेकिन "देव" जमाने भर में, वही लोग अच्छे होते हैं!
जो औरों के दर्द में देखो, अपनेपन के संग रोते हैं!
जो दुनिया में अपनेपन के, भाव जगाते हैं बोली से,
जो नफरत के पेड़ काटकर, प्रेम भरे अंकुर बोते हैं!

देश की खातिर रगों में अपनी, गर्म लहू जो भर जाते हैं!
जीवन की कर्मठ क्षमता को, जो बलशाली कर जाते हैं!"

.....................चेतन रामकिशन "देव"..................
दिनांक-२३.०५.२०१३

Tuesday, 21 May 2013

♥♥बेचैनी..♥♥



♥♥♥♥♥बेचैनी..♥♥♥♥♥♥
तुम बिन गहरी बेचैनी है,
सूना सूना घर लगता है!
बिना तुम्हारे मेरे हमदम,
मुझे तिमिर से डर लगता है!
मेरी सखी तू पल भर को भी,
खुद को मुझको दूर न करना,
बिना तुम्हारे इस जीवन पर,
गुमनामी का कर लगता है!

बिना तुम्हारे जीवन पथ का,
नहीं गुजारा होता हमदम!
बिना तुम्हारे इस दुनिया का,
नहीं सहारा होता हमदम!
बस तुझको ही सोच सोच कर,
विरह की बेला कटती हैं,
बिना तुम्हारे चाँद न मेरा,
नहीं सितारा होता हमदम!

बिना तुम्हारे बादल प्यासा,
थका थका अम्बर लगता है!
बिना तुम्हारे इस जीवन पर,
गुमनामी का कर लगता है!"

.....चेतन रामकिशन "देव"......
दिनांक-२१.०५.२०१३

Saturday, 18 May 2013

♥♥बदलते कलमकार...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥बदलते कलमकार...♥♥♥♥♥♥♥♥♥
कलमकार के शब्दों में अब, आम आदमी नहीं रहा है!
या लगता है कलमकार ने, दर्द भूख का नहीं सहा है!
इस दुनिया में देखो वो कब, दर्द किसी का लिख पाएंगे,
जिन लोगों का लाचारी में, कोई आंसू नहीं बहा है!

प्रेम की विरह घातक है पर, मुफलिस की पीड़ा से कम है!
वो क्या सच को लिख पाएगा, जिसकी हिम्मत ही बेदम है!
उनसे आखिर रणभूमि में, लड़ने की उम्मीद क्या रखें,
नाम मौत का सुन लेने से, जिस इन्सां के घर मातम है!

वो क्या जानेंगे सपनों को, जिनका सपना ढहा नहीं है!
कलमकार के शब्दों में अब, आम आदमी नहीं रहा है...

बड़ी बड़ी बातें करने से, पहले दिल को बड़ा बनाओ!
अपने दिल को मानवता के, जज्बातों का पाठ पढ़ाओ!
"देव" जहाँ में दौलत ही बस, नहीं शर्त अच्छा बनने की,
अच्छा इंसां बनना है तो, अच्छाई के दीये जलाओ!

वो क्या जाने ओस, धूप को, जो बिन छत के रहा नहीं है!
कलमकार के शब्दों में अब, आम आदमी नहीं रहा है!"

....................चेतन रामकिशन "देव".....................
दिनांक-१९.०५.२०१३

Wednesday, 15 May 2013

♥♥गमों की धूप...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥गमों की धूप...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
एहसासों की कोमलता को, पल में जब कुचला जाता है!
और गमों की धूप से जलकर, जब उपवन कुम्हला जाता है!
जब रो रो कर नयन के नीचे, काले घेरे पड़ जाते हैं,
जब काँटों के रस्ते पर भी, नंगे पग निकला जाता है!

अपने जब बेगाने बनकर, दुश्मन लोगों से मिल जाते!
तो जीवन में बिन पानी के, नए नवेले गम खिल जाते! 
दुख के कारण जब जीवन का, पल पल सदियों जैसा लगता,
जब जीवन की हंसी ख़ुशी में, ये खारे आंसू घुल जाते!

ऐसे दुख के हालातों में, जीवन पथ दुर्गम होता है!
झोली में भी नहीं सिमटता, इतना सारा गम होता है!
लेकिन फिर भी "देव" जहाँ में, जो गम देखो सह जाते हैं,
उन लोगों के जीवन में ही, कुछ करने का दम होता है!

तभी तजुर्बा मिलता जग में, जब गिरकर संभला जाता है!
एहसासों की कोमलता को, पल में जब कुचला जाता है!"

....................चेतन रामकिशन "देव".....................
दिनांक-१५.०५.२०१३

Monday, 13 May 2013

♥♥प्रेम का ज्योति कलश..♥


♥♥प्रेम का ज्योति कलश..♥♥♥
प्रेम का ज्योति कलश सखी तुम!
नम्र भाव और सरस सखी तुम!
तुम संवेदनशील मनुज हो,
एक मनोहारी दरस सखी तुम!

तुम फूलों की टहनी जैसी,
बड़ी ही नाजुक, बड़ी सरल हो!
तुम्ही हमारे भावों में हो,
तुम्हीं गीत और तुम्ही गज़ल हो!
तुम मेरे मन की दुल्हन हो,
तुम बिन कुछ भी नहीं सुहाता,
तुम्हीं वंदना हो जीवन की,
तुम ही उर्जा, तुम्ही विमल हो!

तुम ही मेरे दिल की धड़कन,
और जीवन का नफ़स सखी तुम!
तुम संवेदनशील मनुज हो,
एक मनोहारी दरस सखी तुम...

तुम मेरे मन की कविता हो,
शब्दकोष की चंचलता हो!
तुम पावन को ममता जैसी,
तुम गंगा सी निर्मलता हो!
"देव" तुम्हारी प्रीत ने मुझको,
हर पल गहरा सुकूं दिया है,
रेगिस्तानी धूप में भी तुम,
एहसासों की शीतलता हो!

तुम ही मेरा आसमान हो,
और हमारा फ़रश सखी तुम!
तुम संवेदनशील मनुज हो,
एक मनोहारी दरस सखी तुम!"

...चेतन रामकिशन "देव"...
दिनांक-१३.०५.२०१३

"सर्वाधिकार सुरक्षित"
"मेरी ये रचना मेरे ब्लॉग http://chetankavi.blogspot.in/ पर पूर्व प्रकाशित" 

Thursday, 9 May 2013

♥♥प्यार की सौंधी खुश्बू..♥♥♥


♥♥प्यार की सौंधी खुश्बू..♥♥♥
प्यार का एक समुन्दर हो तुम! 
चाँद के जैसी सुन्दर हो तुम!
एहसासों की सौंधी खुश्बू, 
और खुशी का अम्बर हो तुम!

प्यार के हर बिंदु का तुमने, 
मुझको व्यापक ज्ञान दिया है!
मुझ मामूली मनुज को तुमने, 
एक अद्भुत सम्मान दिया है!
इस दुनिया में प्यार से बढ़कर, 
कोई पूंजी हो नहीं सकती,
तुमने मुझको कदम कदम पर, 
गहरा बल प्रदान किया है!

मेरा मनवा भीग गया है, 
प्रेम से पूरित जलधर हो तुम!
एहसासों की सौंधी खुश्बू, 
और खुशी का अम्बर हो तुम...

मेरा मन का मोह तुम्हीं हो,
जीवन का आराम तुम्हीं हो!
तुम्ही सुबह का उजियारा हो,
और सुनहरी शाम तुम्ही हो!
"देव" तुम्हारे प्रेम ने मुझको,
प्रखरता से किया सुशोभित,
तुम्ही हंसी मेरे चेहरे की,
और मेरा उपनाम तुम्हीं हो!

तुम्हीं हमारी शुभ-चिन्तक हो,
और हमारी हितकर हो तुम!
एहसासों की सौंधी खुश्बू, 
और खुशी का अम्बर हो तुम!"


..चेतन रामकिशन "देव"...
दिनांक-०९.०५.२०१३
"
सर्वाधिकार सुरक्षित"







Wednesday, 8 May 2013

♥♥सस्ती मौत..♥♥


♥♥♥सस्ती मौत..♥♥♥♥
अंधकार गहराया सा है!
दुख का गहरा साया सा है!
मौत हो गई कितनी सस्ती,

खौफ जहन पर छाया सा है!


शायद हम सब खुश हैं देखो,
कंक्रीट के इस जंगल में!
लोग यहाँ पर अपनेपन को,
कुचल रहे देखो दंगल में!
नया दौर क्या इसीलिए है,
मानवता का अंत करें हम,
हम औरों को पीड़ा देकर,
सदा रहें अपने मंगल में!

मानवता के ऊपर देखो,
अब खतरा मंडराया सा है!
मौत हो गई कितनी सस्ती,
खौफ जहन पर छाया सा है...

अपनी वहशत में हम देखो,
मानवता को कुचल रहे हैं!
हाड़ मांस के दिल न पिघलें,
बेशक पत्थर पिघल रहे हैं!
"देव" आज के दौर से अच्छा,
गुजरा आलम ही बेहतर था,
आज लोग बस अपने सुख में,
लाचारों को मसल रहे हैं!

पढ़े लिखे भी होकर भी हमने,
खुद को पशु बनाया सा है!
मौत हो गई कितनी सस्ती,
खौफ जहन पर छाया सा है!"

..चेतन रामकिशन "देव"...
दिनांक-०९.०५.२०१३









Monday, 6 May 2013

♥♥प्यार की कुमकुम.♥♥



♥♥प्यार की कुमकुम.♥♥♥ 
तुम गर्मी में हिम जैसी हो!
वर्षा की रिमझिम जैसी हो!
तुम रोली हो, तुम चन्दन हो,
और तुम ही कुमकुम जैसी हो!

पावन गंगा के जल जैसी!
तुम अम्बर के बादल जैसी!
तुम हाथों के कंगन जैसी,
तुम पैरों की पायल जैसी!

तुम मलमल की अनुभूति हो,
और तुम्हीं रेशम जैसी हो!
तुम रोली हो, तुम चन्दन हो,
और तुम ही कुमकुम जैसी हो...

तुम कोमल हो, दयावान हो!
तुम वीणा की मधुर तान हो!
"देव" तुम्हीं नीलम रत्नों में,
तुम सपनों का आसमान हो!

नयी नवेली सुबह में तुम,
और निशा पूनम जैसी हो!
तुम रोली हो, तुम चन्दन हो,
और तुम ही कुमकुम जैसी हो!"

..चेतन रामकिशन "देव"...
दिनांक-०६.०५.२०१३

"
सर्वाधिकार सुरक्षित"

Sunday, 5 May 2013

♥हक की आवाज..♥



♥♥♥हक की आवाज..♥♥♥ 
रुधिर शीत जब हो जाता है!
मन का साहस खो जाता है!
नाम मौत का सुनकर देखो, 
जिनका चेहरा रो जाता है!
ऐसे कहाँ लोग दुनिया में,
अपने हक की जंग लड़ेंगे,
लड़ने से पहले ही जिनके,
मन का संबल सो जाता है!

ये कमजोरी रहेगी जब तक,
हम उद्घोष नहीं कर सकते!
सरकारों के दमन के आगे,
किंचित रोष नहीं कर सकते!
कभी यहाँ निर्धन का शोषण,
कभी किसानों की शामत हो,
पर हम गहरी नींद त्यागकर,
खुद का होश नहीं कर सकते!

वो क्या जंग लड़ेगा डरकर,
जो भूमिगत हो जाता है!
लड़ने से पहले ही जिनके,
मन का संबल सो जाता है...

कमजोरों की सुनवाई को,
आलम बेशक कम होता है!
कोई न समझे उनके दुख को,
भले ही कितना गम होता है!
"देव" मगर हथियार से ज्यादा,
हमें जरुरत है साहस की,
क्यूंकि वो ही लड़ सकता है,
जिसके दिल में दम होता है!

वो ही दुश्मन का घर फूंके,
जो लावे सा हो जाता है!
लड़ने से पहले ही जिनके,
मन का संबल सो जाता है!"

..चेतन रामकिशन "देव"...
दिनांक-०६.०५.२०१३




Saturday, 4 May 2013

♥♥मन की दुल्हन...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥मन की दुल्हन...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तुमसे हर एहसास जुड़ा है, तुम अनुभूति हो जीवन की!
भले ही फेरे नहीं हुए पर, तुम दुल्हन हो अंतर्मन की!
तुम्हें देखना अच्छा लगता, तुम्हें सोचना दिल को भाए,
तुम सीपी हो, तुम मोती हो, तुम ज्योति हो मेरे मन की!

तुम दुल्हन के परिधानों में, जब भी सपनों में आती हो!
मेरे तन को, मेरे मन को, तुम खुश्बू से महकाती हो!

तुम स्वागत की अधिकारिणी, तुम माला हो अभिनन्दन की!
तुमसे हर एहसास जुड़ा है, तुम अनुभूति हो जीवन की..

नया सफर है हम दोनों का, प्रीत परस्पर सिखलानी है!
मन से मन विवाह हो गया, ये गठबंधन रूहानी है!
तुम दुल्हन के रूप में देखो, किसी परी जैसी लगती हो,
सखी तुम्हारी आंखें सुन्दर, और चेहरा भी नूरानी है!

सखी चाँद सी है सुन्दर है तू, तेरा यौवन मनोहारी है!
सखी तुम्हारे ऊपर मेरा, सारा जीवन बलिहारी है!

मुझमें छाया वसी तुम्हारी, तुम सूरत मेरे दर्पण की!
तुमसे हर एहसास जुड़ा है, तुम अनुभूति हो जीवन की..

मैं अपने हाथों से तेरा, सखी मेरी सिंगार करूँगा!
एहसासों में तुम्हें वसाकर, हर पल तुमसे प्यार करूँगा!
"देव" तुम्हारे हाथों पर मैं, प्यार भरी मेहँदी 
रचकर के,




एहसासों के सिंदूरी रंगों से, तेरी मांग भरूँगा!

मेरी दुल्हन अनुपम हो तुम, मेरे तन की जान तुम्हीं हो!
तुम्हीं मेरी कार्य कुशलता, जीवन का सम्मान तुम्हीं हो!

सोने, चाँदी से भी बढ़कर, तुम पूंजी मेरे जीवन की!
तुमसे हर एहसास जुड़ा है, तुम अनुभूति हो जीवन की!"

"
प्रेम-जिससे होता है, वो एहसासों के संसार में, कभी दुल्हन बनकर संगिनी जैसी लगती है तो कभी शिक्षक बनकर, मार्ग दर्शक! कभी मित्र बनकर सहयोगी तो कभी प्राकृतिक नजारों जैसी लगती है! सचमुच जहाँ प्रेम होता है वहां, हर एहसास, सम्बंधित पक्ष के लिए उमड़ता है!"

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-०५.०५.२०१३

"
सर्वाधिकार सुरक्षित"
"मेरी ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित"

♥♥मंजिल की हसरत...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥मंजिल की हसरत...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
कुछ करने की हसरत जब तक, अपने मन में नहीं जगेगी!
तब तक हमको जीवन पथ में, मंजिल कोई नहीं मिलेगी!
बस किस्मत की ओर देखकर, अपनी क्षमता नष्ट न करना,
इस भूमि में बिन मेहनत के, फसल कोई भी नहीं खिलेगी!

जो जीवन में लक्ष्य बनाकर, सही दिशा में बढ़ जाते हैं! 
वही लोग मंजिल की सीढ़ी, इक दिन देखो चढ़ जाते हैं!

बिना जलाये दीप की माला, घने तिमिर में नहीं जलेगी!
कुछ करने की हसरत जब तक, अपने मन में नहीं जगेगी..

जज्बातों पर काबू रखकर, कुछ अरमान जगाने होंगे!
हमको अपनी इन पलकों पर, सपने नए सजाने होंगे!
"देव" जहाँ में बिन शिक्षा के, नहीं रौशनी मिल सकती है,
अपने मन को अधिगम देकर, अक्षर नए सिखाने होंगे!          

सपनों को पूरा करने की, जो अभिलाषा तय करते हैं!
वही लोग अपनी उर्जा से, इन सपनों पर जय करते हैं!

बिना पसीने की बूंदों से, अपनी सूरत नहीं धुलेगी!
कुछ करने की हसरत जब तक, अपने मन में नहीं जगेगी!"

...................चेतन रामकिशन "देव"......................
दिनांक-०५.०५.२०१३

Wednesday, 1 May 2013

♥♥पीड़ा का भूचाल..♥♥

♥♥♥पीड़ा का भूचाल..♥♥♥
मेहनतकश का हाल वही है!
पीड़ा का भूचाल वही है!
उसकी आँखे पथराई हैं,
उसके तन की खाल वही है!

मजदूरों का हाल वही है,
लेकिन साल बदल जाता है!
भूख जलाती है भीतर से,
धूप से चेहरा जल जाता है!
ये कुदरत भी मजदूरों का,
साथ कहाँ देती है देखो,
बारिश में उसका घर टपके,
वही शीत में गल जाता है!

वही यहाँ पीड़ा में रहता,
और यहाँ कंगाल वही है!
उसकी आँखे पथराई हैं,
उसके तन की खाल वही है....

देश के सारे खद्दरधारी,
अपनी मस्ती में रहते हैं!
और मजदूरों की आँखों से,
हर पल ही आंसू बहते हैं!
"देव" यहाँ पर मजदूरों की,
आह नहीं सुनता है कोई,
भले रुदन में, चीख चीख कर,
वो अपनी पीड़ा कहते हैं!

वही यहाँ पर गुमसुम रहता,
और यहाँ बेहाल वही है!
उसकी आँखे पथराई हैं,
उसके तन की खाल वही है!"

..चेतन रामकिशन "देव"..
दिनांक-०१.०५.२०१३

Tuesday, 30 April 2013

♥♥प्रेम ग्रन्थ..♥♥



♥♥♥♥♥प्रेम ग्रन्थ..♥♥♥♥♥♥
प्रेम ग्रन्थ का विषय तुम्ही हो!
तुम कोमल हो, विनय तुम्ही हो!
तुम्ही चाँद की धवल चांदनी,
और सूर्य का उदय तुम्ही हो!

तुम्ही शाम हो, तुम्हीं सवेरा,
तुम्ही दिवस के हर पल में हो!
तुम्ही हमारी पथ प्रदर्शक,
तुम्ही हमारे कौशल में हो!
तुम लेखन में, तुम चिंतन में,
तुम्ही भाव की प्रखरता में,
तुम उर्जा में, तुम शक्ति में,
तुम्ही हमारे संबल में हो!

असीमित है, प्रेम तुम्हारा,
व्यापकता का वलय तुम्ही हो!
तुम्ही चाँद की धवल चांदनी,
और सूर्य का उदय तुम्ही हो..

तुम दर्शन की इच्छाओं में,
श्रवण का संगीत तुम्ही हो!
भले ही भौतिक जीवन है ये,
किन्तु मौलिक प्रीत तुम्ही हों!
"देव" तुम्हीं मेरे जीवन के,
प्रबंधन का अनुकथन हो,
तुम प्रभावी संबोधन में,
और सुरीला गीत तुम्हीं हो!

तुम्ही विजय की गौरव गाथा,
और संघर्षी अभय तुम्हीं हो!
तुम्ही चाँद की धवल चांदनी,
और सूर्य का उदय तुम्ही हो!"

..चेतन रामकिशन "देव"..
दिनांक-३०.०४.२०१३

"सर्वाधिकार सुरक्षित"












Sunday, 28 April 2013

♥♥दिल के टुकड़े .♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥दिल के टुकड़े .♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
किसी के दिल के टुकड़े करके, जिसे कोई अफसोस नहीं है!
जिसको अपने अभिमान पर, तनिक भी कोई रोष नहीं है!
ऐसे लोग कहाँ दुनिया में, दे सकते हैं प्यार मनुज को,
जिनके मन में मानवता का, किंचित भर भी कोष नहीं है!

भले ही खुद को अच्छा समझें, पर ये लोग नहीं हितकारी!
इन लोगों के अपने हित को, जब चाही मानवता मारी!

नहीं सुरक्षा दे सकता वो, जिसको खुद का होश नहीं है!
किसी के दिल के टुकड़े करके, जिसे कोई अफसोस नहीं है..

प्यार को कदमों तले कुचलकर, प्यार भरा लेखन न करना!
इस दुनिया में बुत से ज्यादा, मानवता का पूजन करना!
"देव" जहाँ में एटम बम से, लड़कर कुछ न मिल पायेगा,
अपने हित में अंधे होकर, मानव का शोषण न करना!

जो मजहब से ऊपर उठकर, मानवता साबित करते हैं!
वही लोग देखो दुनिया में, हर मानव का हित करते हैं!

कैसे कह दूँ किस्मत है ये, उन लोगों का दोष नहीं है!
किसी के दिल के टुकड़े करके, जिसे कोई अफसोस नहीं है!"

.........................चेतन रामकिशन "देव".........................
दिनांक-२८.०४.२०१३



Saturday, 27 April 2013

♥♥हमारा मिलन..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥हमारा मिलन..♥♥♥♥♥♥♥♥
एक दूजे से जिस दिन हम मिल जायेंगे!
रंग हजारों दुनिया में खिल जायेंगे!
तिमिर दुखों का, जीवन से ढल जायेगा,
खुशी के दीपक, जीवन में जल जायेंगे!

तुम बन जाना भाव और मैं गीत बनूँ!
तुम गर्मी में बारिश और मैं शीत बनूँ!

हम सपनों की दुनिया नयी सजायेंगे!
एक दूजे से जिस दिन हम मिल जायेंगे...

प्रीत तुम्हारी नाजुक नर्म हथेली है!
प्रीत तुम्हारी हर पल नयी नवेली है!
"देव" तुम्हारे जैसा, जग में कोई नहीं,
सखी तुम्हारी छवि, बड़ी अलबेली है!

तुम पुस्तक, मैं लिपि तुम्हारी बन जाऊं!
मैं शिक्षक बनकर के, तुमको समझाऊं!

प्रीत की सरगम, जग को सदा सुनायेंगे!
एक दूजे से जिस दिन हम मिल जायेंगे!"

...........चेतन रामकिशन "देव"...........
दिनांक-२७.०४.२०१३

Thursday, 25 April 2013

♥♥गम का विलय..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥गम का विलय..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मैं भावों का सागर हूँ, मैं अपना रस्ता तय कर लूँगा!
अपने स्वर में दर्द वसाकर, मैं गीतों में लय कर लूँगा!
मुझे अकेला देख भले ही, मेरे दुश्मन मुस्काते हों,
लेकिन मैं अपने साहस से, अपने हक की जय कर लूँगा!

ये मेरा विश्वास है खुद पर, ये कोई अभिमान नहीं है! 
यूँ ही मैं संघर्ष करूँगा, जब तक तन बेजान नहीं है!

धीरे धीरे खून में अपने, गम का यहाँ विलय कर लूँगा!
मैं भावों का सागर हूँ, मैं अपना रस्ता तय कर लूँगा.....

इस जीवन की राह पे देखो, रोजाना बदलाव हुए हैं!
कभी यहाँ पर आंसू फूटे, कभी यहाँ पर घाव हुए हैं!
"देव" यहाँ पर पत्थर बनकर, अपने दिल को कुचल रहे हैं,
दर्द के झरने उमड़ उमड़ कर, देखो तो सैलाब हुए हैं!

जब अपने ही बदल गए तो, गैरों से क्या गिला करूँगा!
हाँ लेकिन मैं अब लोगों से, सोच समझकर मिला करूँगा!

धीरे धीरे सही राह पर, चलकर यहाँ विजय कर लूँगा!
मैं भावों का सागर हूँ, मैं अपना रस्ता तय कर लूँगा!"

..................चेतन रामकिशन "देव".....................
दिनांक-२६.०४.२०१३




♥♥वक्त का सूरज,..♥♥



♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥वक्त का सूरज,..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
आज भले ही वक्त का सूरज, मुझको केवल झुलसाता है!
आज भले ही चाँद रात का, विरह भाव में तड़पाता है!
आज भले ये तारे मुझको, चिढ़ा रहे हों मेरी हार पर,
आज भले ही काला बादल, घना अँधेरा कर जाता है!

लेकिन मन में आशाओं के, दीप जलाने मैं निकला हूँ!
गम की भारी चट्टानों को, यहाँ हिलाने मैं निकला हूँ!

वही हारता है जीवन से, जो पीड़ा से डर जाता है!
आज भले ही वक़्त का सूरज, मुझको केवल झुलसाता है...

आज भले ही बुरे वक़्त में, अपनों का रुख बदल गया हो!
आज भले ही बुरे वक्त में, पैर हमारा फिसल गया हो!
"देव" मगर वो पछतायेंगे, एक दिन अपनी मनमानी पर,
आज भले उनका अपनापन, मोम की तरह पिघल गया हो!

रोज दर्द के प्याले पीकर, शक्ति का वर्धन करता हूँ!
उठने की कोशिश रहती है, भले ही मैं कितना गिरता हूँ!

आग को सहते सहते एक दिन, लोहा कुंदन बन जाता है!
आज भले ही वक़्त का सूरज, मुझको केवल झुलसाता है!"

....................चेतन रामकिशन "देव"....................
दिनांक-२५.०४.२०१३


♥♥पत्थर का बुत..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥पत्थर का बुत..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
रो रो कर आँखों में लाली, और मेरा मन विचलित होता!
सच की कीमत नहीं है कोई, झूठ यहाँ पर अद्भुत होता!
जिस इन्सां को आह किसी, नहीं सुनाई देती जग में,
बेशक वो दिखता हो मानव, पर वो पत्थर का बुत होता!

लोग यहाँ पर मिन्नत करके, भले तड़प कर मर भी जायें!
लेकिन पत्थर के बुत जैसे, मानव फिर भी जश्न मनायें!

बिन पानी के इस दुनिया में, कहाँ मरुस्थल सुरभित होता!
रो रो कर आँखों में लाली, और मेरा मन विचलित होता.....

इस दुनिया में मानवता का, लगभग सारा पतन हो गया!
बस अपना ही घर भरने का, हर मानव का जतन हो गया!
"देव" ये आलम देखके मेरा, दिल रोता है फूट फूट कर,
बस अपने ही सुख में शामिल, मानव का हर यतन हो गया!

दर्द किसी का समझ सके न, किसी की पीड़ा जान सके न!
वो इन्सां इंसान नहीं है, जो अपनायत मान सके न!

अभिमान ऐसे मानव का, एक दिन किन्तु है मृत होता!
रो रो कर आँखों में लाली, और मेरा मन विचलित होता!"

....................चेतन रामकिशन "देव"....................
दिनांक-२५.०४.२०१३

Wednesday, 24 April 2013

♥नरमी का एहसास.♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥नरमी का एहसास.♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तुम्हें देखकर मेरे दिल में, नरमी के एहसास जगे हैं!
तुमसा खास नहीं है कोई, यूँ तो मेरे कई सगे हैं!

सखी चांदनी रात के जैसा, सुन्दर है सिंगार तुम्हारा!
बड़े भाग्य से मैंने पाया, इस जीवन में प्यार तुम्हारा!
"देव" तुम्हारे प्रेम की चाहत, मुझको हर पल उर्जा देती,
दूर हो लेकिन फिर भी करता, मैं मन से दीदार तुम्हारा!

सखी तुम्हारे प्रेम से मेरी, आँखों में ये ख्वाब उगे हैं!
तुम्हें देखकर मेरे दिल में, नरमी के एहसास जगे हैं...

तुम नेनों के पटल पे अंकित, छवि तुम्हारे वसी है मन में!
सखी मैं तेरे संग उड़ता हूँ, पंख पसारे नील गगन में!
तुमसे ही रौनक है घर में, तुमसे बागों की हरियाली,
तुमसे ही खुशियों के दीपक, जले सखी मेरे जीवन में!

सखी तुम्हारे प्रेम से देखो, इस जीवन को पंख लगे हैं!
तुम्हें देखकर मेरे दिल में, नरमी के एहसास जगे हैं!"

....................चेतन रामकिशन "देव"......................
दिनांक-२४.०४.२०१३




Tuesday, 23 April 2013

♥♥प्रीत की खुश्बू.♥♥


♥♥प्रीत की खुश्बू.♥♥
जब से प्रीत तेरी पाई है!
तब से जीवन सुखदाई है!
उपवन खुश्बू से भर आया,
और तितली भी मुस्काई है!

प्रेम तुम्हारा बड़ा ही कोमल,
प्रेम तुम्हारा मनोहारी है!
तुम्हे देखकर खिले उजाला,
छवि तुम्हारी उजियारी है!
सखी तुम्हारे प्रेम से देखो,
लगता हर दिन त्योहारों सा,
सखी ईद सी, मीठी है तू,
तू रंगों की पिचकारी है!

सही रास्ता मुझे दिखाकर,
गलत दिशा भी समझाई है!
उपवन खुश्बू से भर आया,
और तितली भी मुस्काई है...

सखी तुम्हारे दर्शन पाकर,
मेरी हर प्रभात सुखद हो!
सखी तुम्हारे प्रेम से देखो,
पूनम सी हर रात सुखद हो!
"देव" तुम्हारी प्रीत ने मुझको,
अपनेपन का दिया समुन्दर,
सखी दुआ है युगों युगों तक,
हम दोनों का साथ सुखद हो!

सखी तुम्हारा रूप देखकर,
धवल चांदनी शरमाई है!
उपवन खुश्बू से भर आया,
और तितली भी मुस्काई है!"

..चेतन रामकिशन "देव"..
दिनांक-२३.०४.२०१३

"
प्रीत-जहाँ, परस्पर प्रीत होती है, वहां जीवन, समस्याओं की कठिनता के बाद भी,
पथरीला नहीं लगता! प्रेम जहाँ होता है, वहां अभावों में जीवन पथ सरल हो जाता है!"

"
सर्वाधिकार सुरक्षित"
' मेरी ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित"

Monday, 22 April 2013

♥♥तुम्हारी समझ...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥तुम्हारी समझ...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तुम्हे समझना है जो समझो, पक्ष हमारा नहीं जरुरी!
हाँ ये सच है बिना तुम्हारे, ये जीवन की डगर अधूरी!

मैंने तुमको मानवता के नाते, अपना मान लिया था!
साथ तुम्हारे खुश रहने का, अवसर मैंने जान लिया था!
तेरे साथ चाहता था क्यूंकि, "देव" तेरा कद था नूरानी,
मैंने तेरे अपनेपन से, इतना तो पहचान लिया था!

नहीं पता के तुमने मुझसे, क्यूँ कर ली मीलों की दूरी!
तुम्हे समझना है जो समझो, पक्ष हमारा नहीं जरुरी....

शायद रिश्तों की दुनिया ही, तुमको बड़ी अनूठी लगती!
इन रिश्तों के आगे तुमको, मानवता भी झूठी लगती!
पर मेरा दिल कहता है के, मानवता सबसे ऊपर है,
लेकिन तुमको मानवता की, डोर हमेशा टूटी लगती!

बुरे वक़्त में कब होती है, किसी के दिल की हसरत पूरी!
तुम्हे समझना है जो समझो, पक्ष हमारा नहीं जरुरी!"

...................चेतन रामकिशन "देव"....................
दिनांक-२२.०४.२०१३

♥♥शब्दों की कराह.♥♥




♥♥शब्दों की कराह.♥♥♥♥
शब्दों का मन कराह रहा है,
कुछ कह पाना भी मुश्किल है!
आज का मानव हुआ है दानव,
नजर मिलाना भी मुश्किल है!
कुदरत की अनुपम कृति को,
नोंच रहें हैं, काम पिपासु,
पीड़ा की व्यापक क्षमता को,
अब बतलाना भी मुश्किल है!

सजा मौत की सही है लेकिन,
ये बहशीपन चलेगा कब तक!
यहाँ आदमी दानव बनकर,
मानवता को छलेगा कब तक!
रोज रोज हर चौराहे पर,
नारी की अस्मत लुटती है,
नहीं पता के इस नारी को,
इज्ज़त का हक, मिलेगा कब तक!

तन पे छाले पड़े हमारे,
अब दिखलाना भी मुश्किल है!
पीड़ा की व्यापक क्षमता को,
अब बतलाना भी मुश्किल है....

दंड नहीं है, श्राप नहीं है,
नारी होना पाप नहीं है!
नारी तो है खिले सुमन सी,
वो दुख का संताप नहीं है!
"देव" यहाँ पर देखो अब तुम,
नर-नारी को एक नजर से,
नारी का अस्तित्व है व्यापक,
वो कोई धुंआ, भाप नहीं है!

रोम रोम में दर्द है गहरा,
बदन हिलाना भी मुश्किल है!
पीड़ा की व्यापक क्षमता को,
अब बतलाना भी मुश्किल है!"

...चेतन रामकिशन "देव"...
दिनांक-२२.०४.२०१३

Sunday, 21 April 2013

♥♥गम की रात..♥♥


♥♥♥♥♥गम की रात..♥♥♥♥♥
दिल का हाल सुनाया जिसको!
अपना यहाँ बताया जिसको,
वही अँधेरा सोंप गया है,
दीपक सदा दिखाया जिसको!

काश हमारी आह समझते!
ये पथरीली राह समझते!
काश समझकर मेरे आंसू,
मेरे मन की चाह समझते!

वही गिराकर चला गया है,
मैंने सदा उठाया जिसको!
वही अँधेरा सोंप गया है,
दीपक यहाँ दिखाया जिसको...

गिला नहीं है उससे कोई,
ये किस्मत की बात है शायद!
इक दिन सूरज भी निकलेगा,
"देव" ये गम की रात है शायद!

मिला वही अनजानों जैसा,
दिल में सदा वसाया जिसको!
वही अँधेरा सोंप गया है,
दीपक यहाँ दिखाया जिसको!"

...चेतन रामकिशन "देव"...
दिनांक-२१.०४.२०१३


Tuesday, 16 April 2013


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥नया उजाला..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
नया दिवस है, नया उजाला, जल की ये शीतल धारा है!
निशा तिमिर की बीत चुकी है, और सूरज का उजियारा है!
वही यहाँ पर समस्याओं से, लड़ के आगे बढ़ा है एक दिन,
जिस मानव ने साहस के संग, समस्याओं को ललकारा है!

ये जीवन है यहाँ पे निश दिन, समस्याओं के पल आते हैं!
किन्तु मन में साहस हो तो, तिमिर में दीपक जल जाते हैं!

वही शांत रहता है मन से, क्रोध को जिसने भी मारा है!
नया दिवस है, नया उजाला, जल की ये शीतल धारा है....

सही बात है किस्मत का रुख, सदा यहाँ सुखमय नहीं होता!
किन्तु किस्मत से डरकर भी, जीवन का पथ तय नहीं होता!
"देव" हमे करना होगा कुछ, किस्मत कर्म नहीं करती है,
वही विजय पाता है रण में, जिसे हार का भय नहीं होता!

बस किस्मत की राह देखकर, जीवन को बरबाद न करना!
तुम औरों को दुख देकर के, अपना घर आबाद न करना!

वो क्या जंग करे जीवन से, साहस ही जिसने हारा है!
नया दिवस है, नया उजाला, जल की ये शीतल धारा है!"


....................चेतन रामकिशन "देव"........................
दिनांक-१७.०४.२०१३
"
सर्वाधिकार सुरक्षित"
" मेरी ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित"

(पेंटिंग साभार--प्रिय मित्र कुसुम जी!)

Monday, 15 April 2013

♥गम का तहखाना.♥


♥♥गम का तहखाना.♥♥
गम के गहरे तहखाने में!
और आंसू के मयखाने में!
अब खुशियों की नहीं तमन्ना,
डर लगता है मुस्काने में!

हवा है लेकिन घुटन बहुत है!
इन आँखों में चुभन बहुत है!
सुनो जरा हौले से छूना,
मेरे दिल में दुखन बहुत है!

दुख के बादल उमड़ रहे हैं,
गम देने को, नजराने में!

अब खुशियों की नहीं तमन्ना,
डर लगता है मुस्काने में...
अपना कहकर बनें पराये!
लोगों का रुख समझ न आये!
"देव" जिसे मलमल का समझो,
वो इन्सां ही ठेस लगाये!

बिन उसके ये दिल नहीं लगता,
उमर बीत गयी समझाने में!

अब खुशियों की नहीं तमन्ना,
डर लगता है मुस्काने में!"
..चेतन रामकिशन "देव"..
दिनांक-१५.०४.२०१३

Sunday, 14 April 2013

♥♥द्वन्द..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥द्वन्द..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
द्वन्द कभी अपनों से होता, द्वन्द कभी होता है मन से!
द्वन्द कभी होता सपनों से, द्वन्द कभी होता है तन से!

जीवन के हर पथ पर देखो, द्वन्द हमेशा होता रहता!
लाख हँसे बाहर से कोई , पर भीतर से रोता रहता!
कभी कोई अपनों से छलकर, पत्थर जैसा हो जाता है,
और कोई पत्थर होकर भी, मोम की फसलें बोता रहता!

द्वन्द कभी हो निर्धनता से, द्वन्द कभी होता धन से!
द्वन्द कभी होता सपनों से, द्वन्द कभी होता है तन से...

लेकिन द्वन्द भले हो कितना, धीरज नहीं हमें खोना है!
हमे निराशा के अंकुर को, कभी नहीं मन में बोना है!
"देव" कभी तुम द्वन्द के कारण, नहीं भटक जाना राहों से,
हमे द्वन्द से भय खाकर के, नहीं यहाँ हरगिज रोना है!

द्वन्द कभी पीछा ना छोड़े, द्वन्द सदा होता जीवन से!
द्वन्द कभी होता सपनों से, द्वन्द कभी होता है तन से!"

..................चेतन रामकिशन "देव".....................
दिनांक-१५.०४.२०१३

♥♥प्रतीक्षा की घड़ी.♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्रतीक्षा की घड़ी.♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
प्रतीक्षा की कठिन घड़ी ये, काटे से भी कट नहीं पाती!
बिना तुम्हारे रात चांदनी, सखी मुझे अब नहीं सुहाती!
तारे गिनकर बिता रहा हूँ, कठिन रात के कठिन पहर को,
सखी मेरी आँखों को देखो, बिना तुम्हारे नींद न आती!

सखी मेरी तू आ जाया कर, बिना तुम्हारे कुछ न भाये!
नहीं सहन होती ये पीड़ा, जहर विरह का पिया न जाये!

बिना तुम्हारे ख़ामोशी है, कोयल कलरव नहीं सुनाती!
प्रतीक्षा की कठिन घड़ी ये, काटे से भी कट नहीं पाती...

मैं मज़बूरी समझ भी जाऊं, लेकिन दिल किसकी सुनता है!
रात को चाहें या दिन निकले, बस तेरे सपने बुनता है!
"देव" मेरा दिल कहता है के, एक दिन तुम आओगी मिलने,
इसी आस में सखी मेरा दिल, फूल तेरी खातिर चुनता है!

बिना तुम्हारे जान नहीं है, मेरा तन बेजान हुआ है!
सखी मेरी व्याकुल आँखों को, हर पल तेरा ध्यान हुआ है!

सखी तुम्हारे बिन आँखों की, प्यास जरा भी बुझ नहीं पाती!
प्रतीक्षा की कठिन घड़ी ये, काटे से भी कट नहीं पाती!"

...................चेतन रामकिशन "देव"......................
दिनांक-१४.०४.२०१३



Saturday, 13 April 2013

♥♥भीम को नमन..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥भीम को नमन..♥♥♥♥♥♥♥♥♥
जो शोषक वर्ग से, संघर्ष का आहवान करते हैं!
जो अपने कर्म से, मानव हितों का मान करते हैं!
जो हमको दे गए, शिक्षा यहाँ, संघर्ष की बातें,
हम ऐसे भीम का, मन से सदा सम्मान करते हैं!

अभावों में भी रहकर, ज्ञान का दीपक जलाया है!
दबे, कुचले हुए मानव को, सीने से लगाया है!

जो औरों के लिए अपनी खुशी, प्रदान करते हैं!
हम ऐसे भीम का, मन से सदा सम्मान करते हैं..

महापुरुष लोग जाति की, परिधि में नहीं होते!
महापुरुष लोग हिंसा के, कभी अंकुर नहीं बोते!
महापुरुष लोग देखो "देव" हैं, वंदन के अधिकारी,
महापुरुष लोग सच्चाई के रस्ते को, नहीं खोते!

नहीं जाति में आंकों तुम, वो सबके काम आते हैं!
हम अपने शीश को बाबा तेरे, सम्मुख झुकाते हैं!

जो खुद जलकर भी, औरों का सफर आसान करते हैं!
हम ऐसे भीम का, मन से सदा सम्मान करते हैं!"

.................चेतन रामकिशन "देव"................
दिनांक-१४.०४.२०१३( भारत रत्न डॉ.भीम राव अम्बेडकर को उनकी जयंती पर नमन!"











Friday, 12 April 2013

♥♥सितारों की लड़ी..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥सितारों की लड़ी..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
गगन के चाँद सी सुन्दर, सितारों की लड़ी हो तुम!
तुम्ही पायल की छम छम में, अंगूठी में जड़ी हो तुम!

हो मुझसे दूर मीलों पर, हमेशा पास लगती हो!
मेरे ख्वाबों का तुम देखो, जवां एहसास लगती हो!
सुनो ए "देव" मैं तुम बिन, कभी खुश हो नहीं सकता,
तुम्हीं सारे ज़माने में, मुझे बस ख़ास लगती हो!

मेरे दुख में, मेरे गम में, मेरे संग में खड़ी हो तुम!
गगन के चाँद सी सुन्दर, सितारों की लड़ी हो तुम!"

...........चेतन रामकिशन "देव"...........
दिनांक-१२.०४.२०१३

Thursday, 11 April 2013

♥♥मेरा वजूद..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥मेरा वजूद..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मुझको बतलाओ मुझे, कैसे भुलाओगे तुम!
प्यास नजरों की भला, कैसे बुझाओगे तुम!

मेरी उल्फ़त तेरे चेहरे पे, नजर आती है,
मेरी चाहत को यहाँ, कैसे छुपाओगे तुम!

मैं अभी जिंदा हूँ तो, मान भी जाऊंगा मगर,
बाद मरने के मुझे, कैसे मनाओगे तुम!

खून से अपने जो ख़त, मैंने तुम्हे लिखे थे,
हाथ कांपेंगे उन्हें, कैसे जलाओगे तुम!

"देव" ये जिस्म है मिट्टी का, सतालो लेकिन,
रूह से अपनी, नजर कैसे मिलाओगे तुम!"

.............चेतन रामकिशन "देव"..............
दिनांक-११.०४.२०१३

Wednesday, 10 April 2013

♥♥♥व्याकुल मन...♥♥♥




♥♥♥व्याकुल मन...♥♥♥♥♥♥♥♥
कंठ भर गया रोते रोते, साथ साथ ये मन व्याकुल है!
दर्द भरा है इतना दिल में ,रोम रोम भी शोकाकुल है!
है संवेदनहीन जहाँ ये, कोई किसी का दर्द न जाने,
मेरा मनवा तड़प रहा है और मेरी आँखों में जल है!

अब कोई जज्बात न समझे, सब रहते हैं अपनी धुन में!
नहीं पिघलता पत्थर का दिल, भले निवेदन करो रुदन में!

लोग यहाँ मदिरा को देखो, कहते हैं के गंगाजल है!
कंठ भर गया रोते रोते, साथ साथ ये मन व्याकुल है....

ऐसी दौलत का क्या करना, जिसका मन सम्पन्न नहीं हो!
भूख की कीमत उससे जानो, जिसके घर में अन्न नहीं हो!
कभी जरा तुम गौर से देखो, उसकी गहरी तन्हाई को,
बिना हमारे जिस मानव का, एक पल भी प्रसन्न नहीं है!

किसे सुनायें हम हालेदिल, वक़्त किसी के पास नहीं है!
लगता है मेरी किस्मत को, ख़ुशी का लम्हा रास नहीं है!

आसमान भी आग बरसता, और यहाँ पथरीली थल है!
कंठ भर गया रोते रोते ,साथ साथ ये मन व्याकुल है....

जो पत्थर बनकर के खुश हैं, उनको मोम नहीं भाता है!
कभी किसी का दर्द देखकर, उन को तरस नहीं आता है!
"देव" यहाँ पर जिस मानव के, मन में होती है मानवता,
वो मानव ही जनमानस के दर्द का, साथी बन पाता है!

मानवता के नाते जिस दिन, तुम मानव से प्यार करोगे!
वो दिन ऐसा होगा जब तुम, खुशियों का दीदार करोगे!

इस दुनिया में प्रेम की दौलत, मानो रेशम और मलमल है!
कंठ भर गया रोते रोते ,साथ साथ ये मन व्याकुल है! "

"
पीड़ा- ये सच है कि पीड़ा से कोई भी अछूता नहीं, किन्तु पीड़ा के मायने तब कहीं अधिक बढ़ जाते हैं, जब सामने वाला ऐसा व्यक्ति हमे पीड़ा देता है, जिस पर हम बहुत यकीन और नेह रखते हों, तो आइये जरा चिंतन करते हुए, किसी को दर्द कम से कम देने की कोशिश करें.."

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-१०.०४.२०१३













Tuesday, 9 April 2013

♥♥काश समझते मेरे मन.♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥काश समझते मेरे मन.♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
काश समझते मेरे मन को, काश मेरे दिल को पढ़ पाते!
न ही मुझसे दूरी करते, न ही मुझसे नजर चुराते!

बिना मेरा दिल पढ़े भला तुम, कैसे मेरे भाव समझते!
अपनेपन के भावों के बिन, कैसे मेरे घाव समझते!
"देव" अगर तुम इक अक्षर भी, पढ़ लेते मेरी चाहत का,
तो तुम मेरे दर्द समझकर, आँखों का सैलाब समझते!

मुझे गिराकर तुम यूँ हमदम, अगली सीढ़ी न चढ़ जाते!
काश समझते मेरे मन को, काश मेरे दिल को पढ़ पाते!"

..................चेतन रामकिशन "देव"..................
दिनांक-०९.०४.२०१३

Monday, 8 April 2013

♥♥तन्हा रात .♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥तन्हा रात .♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
फिर से तन्हा रात आ गयी, चुपके चुपके रोना होगा!
जबरन अपनी आंख मूंदकर, हमको फिर से सोना होगा!

नहीं पता था प्यार में हमको, दर्द मिलेगा इतना सारा,
गुमसुम गुमसुम होगा ये दिल, चैन भी अपना खोना होगा!

नहीं कोई गिरते इन्सां को, यहाँ सहारा देता यारों,
अपने ही कंधे पर हम को, अपना ये तन ढ़ोना होगा!

तुमसे कोई गिला नहीं है, नहीं शिकायत मुझको कोई,
शायद मेरी किस्मत में ही, ये सब देखो होना होगा!

"देव" न कोई पढ़ ले मेरी, रोनी सूरत के लफ्जों को,
दिन निकले से पहले अपनी, सूरत को फिर धोना होगा!"

.................चेतन रामकिशन "देव"..................
दिनांक-०८.०४.२०१३




Friday, 5 April 2013

♥♥मेरी ख्वाहिश..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥मेरी ख्वाहिश..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
सारी दुनिया जीत के मैंने, नहीं सिकंदर बनना चाहा!
मजलूमों का खून बहाकर, नहीं धुरंधर बनना चाहा!
बस ऐसा बनना चाहा के, जिसे देखकर दुनिया खुश हो,
हसरत रखी सदा झील की, नहीं समुन्दर बनना चाहा!

जिस मानव के जीवनपथ में, अच्छाई की लय होती है!
उस मानव की इक दिन देखो, सारे जग में जय होती है!

न आंधी की मुझे तमन्ना, नहीं बबंडर बनना चाहा!
सारी दुनिया जीत के मैंने, नहीं सिकंदर बनना चाहा...

न दौलत की हसरत दिल में, न महलों के जैसा घर हो!
सदा रहे जीवित मानवता, गलत काम से मुझको डर हो!
"देव" मैं अपनी नजरों को बस, मिला सकूँ खुद की नजरों से,
मेरी इच्छा नहीं कभी भी, मेरे क़दमों में अम्बर हो!

सच की राह पे चलने वाले, भले ही कुछ पीड़ा पाते हैं!
लेकिन इक दिन आता है जब, सच के लम्हें मुस्काते हैं!

न चाहत है तलवारों की, न ही खंजर बनना चाहा! 
सारी दुनिया जीत के मैंने, नहीं सिकंदर बनना चाहा!"

.................चेतन रामकिशन "देव"................
दिनांक-०५.०४.२०१३

Wednesday, 3 April 2013

♥♥फुर्सत.♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥फुर्सत.♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
आज दर्द के गलियारों से, दो पल फुर्सत के लाया हूँ!
खुली हवा में सांसें ली हैं और जी भर के मुस्काया हूँ!

फुर्सत के इन दो लम्हों का, मंजर देखो बड़ा ही प्यारा!
नदियाँ मुझसे मिलने दौड़ीं, हरियाली ने मुझे दुलारा!
"देव" हमेशा इन लम्हों की, याद रहेगी मेरे दिल को,
इन छोटे से दो लम्हों ने, मन से दुख का बोझ उतारा!

आज मिली है इतनी फुर्सत, गिरकर देखो उठ पाया हूँ!
आज दर्द के गलियारों से, दो पल फुर्सत के लाया हूँ!"

...................चेतन रामकिशन "देव"..................
दिनांक-०३.०४.२०१३


Tuesday, 2 April 2013

♥♥मखमल का दिल.♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥मखमल का दिल.♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
पत्थर जैसी इस दुनिया में, मखमल का दिल ढूंढ रहा हूँ!
जिसकी ठंडक दिल को भाए, ऐसा आँचल ढूंढ रहा हूँ!

आसमान में मार धुँयें की, और रसायन पानी में है,
मैं गंगा के पानी में ही, अब गंगा जल ढूंढ रहा हूँ!

बिन पानी के जिन खेतों की, फसलें देखो झुलस रही हैं,
आज उन्ही खेतों की खातिर, गीला बादल ढूंढ रहा हूँ!

कौन कौन है ऐसा जिसने, इस जनता को नहीं छला हो,
आज सियासी भारत का मैं, इक ऐसा दल ढूंढ रहा हूँ!

"देव" नहीं सुनता है कोई, इस दुनिया में दर्द किसी का,
इसीलिए तो अपने दुख का, अब खुद ही हल ढूंढ रहा हूँ!"

...................चेतन रामकिशन "देव"..................
दिनांक-०३.०४.२०१३



♥♥कंठ की प्यास.♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥कंठ की प्यास.♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
प्यास कंठ की बुझ न पाई, बिन छाया के जला पथ में! 
लोग ठोकरें मार रहे हैं, पत्थर बनकर ढला हूँ पथ में!

जब जी चाहा मुझे रुलाया, करुण निवेदन भी ठुकराया, 
बिना तुम्हारे आंखें रोयीं, बिना तुम्हारे दिल मुरझाया!
फिर भी तुमसे गिला नहीं है, "देव" नहीं रंजिश है कोई,
किस्मत में जो लिखा होगा, वो सब मेरे हिस्से आया!

जिसको मैंने अपना माना, उसी के हाथों छला हूँ पथ में!
प्यास कंठ की बुझ न पाई, बिन छाया के जला पथ में!"

.................चेतन रामकिशन "देव"...................
दिनांक-०२.०४.२०१३

Monday, 1 April 2013

♥♥ताजमहल पर..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥ताजमहल पर..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
ताजमहल पर लिखा सबने, लेकिन मैं तुम पर लिखूंगा!
मैं मुफ़लिस का दर्द देखकर, अपनी आंखे तर लिखूंगा!

जब भी दर्द मिला है मुझको, मेरी माँ ने मुझे संभाला,
इसीलिए मैं माँ के दिल को, ममता का इक घर लिखूंगा!

जुर्म बढ़ गया इतना सारा, बेटी घर से निकल न पाए,
उस बेटी के नाजुक दिल का, सहमा सहमा डर लिखूंगा!

जिस दुनिया को देखा न हो, उस दुनिया में ले जाते हैं,
मैं अपने प्यारे ख्वाबों को, किसी परी के पर लिखूंगा!

झूठ बोलकर "देव" किसी से, अपनायत की चाह नहीं है,
सच्ची चाहत के सजदे में, बेशक अपना सर लिखूंगा!"

....................चेतन रामकिशन "देव"......................
दिनांक-०१.०४.२०१३ 

Saturday, 30 March 2013

♥तुम्हारा सम्बन्ध..♥


♥तुम्हारा सम्बन्ध..♥
ह्रदय के स्पंदन में हो!
तुम पूजा में, वंदन में हो!
तुमसे ही जीवन में उर्जा,
तुम जीवन के हर क्षण में हो!

मीत तुम्हीं हो, जीत तुम्हीं हो!
मेरे मन की प्रीत तुम्हीं हो!
हर मौसम की रंगत तुमसे,
तुम ही बारिश, शीत तुम्हीं हो!

हरियाली के हरे रंग में,
तुम फसलों में, तुम वन में हो!
तुमसे ही जीवन में उर्जा,
तुम जीवन के हर क्षण में हो...

तुम गीतों का भाव पक्ष हो,
तुम शब्दों का अलंकार हो!
तुम यमुना का शीतल पानी,
तुम गंगा की मधुर धार हो!

तुम्ही हमारी स्मरण शक्ति,
तुम्ही "देव" के यौवन में हो!
तुमसे ही जीवन में उर्जा,
तुम जीवन के हर क्षण में हो!"

....चेतन रामकिशन "देव"....
दिनांक-३१.०३.२०१३