Tuesday, 21 May 2013

♥♥बेचैनी..♥♥



♥♥♥♥♥बेचैनी..♥♥♥♥♥♥
तुम बिन गहरी बेचैनी है,
सूना सूना घर लगता है!
बिना तुम्हारे मेरे हमदम,
मुझे तिमिर से डर लगता है!
मेरी सखी तू पल भर को भी,
खुद को मुझको दूर न करना,
बिना तुम्हारे इस जीवन पर,
गुमनामी का कर लगता है!

बिना तुम्हारे जीवन पथ का,
नहीं गुजारा होता हमदम!
बिना तुम्हारे इस दुनिया का,
नहीं सहारा होता हमदम!
बस तुझको ही सोच सोच कर,
विरह की बेला कटती हैं,
बिना तुम्हारे चाँद न मेरा,
नहीं सितारा होता हमदम!

बिना तुम्हारे बादल प्यासा,
थका थका अम्बर लगता है!
बिना तुम्हारे इस जीवन पर,
गुमनामी का कर लगता है!"

.....चेतन रामकिशन "देव"......
दिनांक-२१.०५.२०१३

Saturday, 18 May 2013

♥♥बदलते कलमकार...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥बदलते कलमकार...♥♥♥♥♥♥♥♥♥
कलमकार के शब्दों में अब, आम आदमी नहीं रहा है!
या लगता है कलमकार ने, दर्द भूख का नहीं सहा है!
इस दुनिया में देखो वो कब, दर्द किसी का लिख पाएंगे,
जिन लोगों का लाचारी में, कोई आंसू नहीं बहा है!

प्रेम की विरह घातक है पर, मुफलिस की पीड़ा से कम है!
वो क्या सच को लिख पाएगा, जिसकी हिम्मत ही बेदम है!
उनसे आखिर रणभूमि में, लड़ने की उम्मीद क्या रखें,
नाम मौत का सुन लेने से, जिस इन्सां के घर मातम है!

वो क्या जानेंगे सपनों को, जिनका सपना ढहा नहीं है!
कलमकार के शब्दों में अब, आम आदमी नहीं रहा है...

बड़ी बड़ी बातें करने से, पहले दिल को बड़ा बनाओ!
अपने दिल को मानवता के, जज्बातों का पाठ पढ़ाओ!
"देव" जहाँ में दौलत ही बस, नहीं शर्त अच्छा बनने की,
अच्छा इंसां बनना है तो, अच्छाई के दीये जलाओ!

वो क्या जाने ओस, धूप को, जो बिन छत के रहा नहीं है!
कलमकार के शब्दों में अब, आम आदमी नहीं रहा है!"

....................चेतन रामकिशन "देव".....................
दिनांक-१९.०५.२०१३

Wednesday, 15 May 2013

♥♥गमों की धूप...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥गमों की धूप...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
एहसासों की कोमलता को, पल में जब कुचला जाता है!
और गमों की धूप से जलकर, जब उपवन कुम्हला जाता है!
जब रो रो कर नयन के नीचे, काले घेरे पड़ जाते हैं,
जब काँटों के रस्ते पर भी, नंगे पग निकला जाता है!

अपने जब बेगाने बनकर, दुश्मन लोगों से मिल जाते!
तो जीवन में बिन पानी के, नए नवेले गम खिल जाते! 
दुख के कारण जब जीवन का, पल पल सदियों जैसा लगता,
जब जीवन की हंसी ख़ुशी में, ये खारे आंसू घुल जाते!

ऐसे दुख के हालातों में, जीवन पथ दुर्गम होता है!
झोली में भी नहीं सिमटता, इतना सारा गम होता है!
लेकिन फिर भी "देव" जहाँ में, जो गम देखो सह जाते हैं,
उन लोगों के जीवन में ही, कुछ करने का दम होता है!

तभी तजुर्बा मिलता जग में, जब गिरकर संभला जाता है!
एहसासों की कोमलता को, पल में जब कुचला जाता है!"

....................चेतन रामकिशन "देव".....................
दिनांक-१५.०५.२०१३

Monday, 13 May 2013

♥♥प्रेम का ज्योति कलश..♥


♥♥प्रेम का ज्योति कलश..♥♥♥
प्रेम का ज्योति कलश सखी तुम!
नम्र भाव और सरस सखी तुम!
तुम संवेदनशील मनुज हो,
एक मनोहारी दरस सखी तुम!

तुम फूलों की टहनी जैसी,
बड़ी ही नाजुक, बड़ी सरल हो!
तुम्ही हमारे भावों में हो,
तुम्हीं गीत और तुम्ही गज़ल हो!
तुम मेरे मन की दुल्हन हो,
तुम बिन कुछ भी नहीं सुहाता,
तुम्हीं वंदना हो जीवन की,
तुम ही उर्जा, तुम्ही विमल हो!

तुम ही मेरे दिल की धड़कन,
और जीवन का नफ़स सखी तुम!
तुम संवेदनशील मनुज हो,
एक मनोहारी दरस सखी तुम...

तुम मेरे मन की कविता हो,
शब्दकोष की चंचलता हो!
तुम पावन को ममता जैसी,
तुम गंगा सी निर्मलता हो!
"देव" तुम्हारी प्रीत ने मुझको,
हर पल गहरा सुकूं दिया है,
रेगिस्तानी धूप में भी तुम,
एहसासों की शीतलता हो!

तुम ही मेरा आसमान हो,
और हमारा फ़रश सखी तुम!
तुम संवेदनशील मनुज हो,
एक मनोहारी दरस सखी तुम!"

...चेतन रामकिशन "देव"...
दिनांक-१३.०५.२०१३

"सर्वाधिकार सुरक्षित"
"मेरी ये रचना मेरे ब्लॉग http://chetankavi.blogspot.in/ पर पूर्व प्रकाशित" 

Thursday, 9 May 2013

♥♥प्यार की सौंधी खुश्बू..♥♥♥


♥♥प्यार की सौंधी खुश्बू..♥♥♥
प्यार का एक समुन्दर हो तुम! 
चाँद के जैसी सुन्दर हो तुम!
एहसासों की सौंधी खुश्बू, 
और खुशी का अम्बर हो तुम!

प्यार के हर बिंदु का तुमने, 
मुझको व्यापक ज्ञान दिया है!
मुझ मामूली मनुज को तुमने, 
एक अद्भुत सम्मान दिया है!
इस दुनिया में प्यार से बढ़कर, 
कोई पूंजी हो नहीं सकती,
तुमने मुझको कदम कदम पर, 
गहरा बल प्रदान किया है!

मेरा मनवा भीग गया है, 
प्रेम से पूरित जलधर हो तुम!
एहसासों की सौंधी खुश्बू, 
और खुशी का अम्बर हो तुम...

मेरा मन का मोह तुम्हीं हो,
जीवन का आराम तुम्हीं हो!
तुम्ही सुबह का उजियारा हो,
और सुनहरी शाम तुम्ही हो!
"देव" तुम्हारे प्रेम ने मुझको,
प्रखरता से किया सुशोभित,
तुम्ही हंसी मेरे चेहरे की,
और मेरा उपनाम तुम्हीं हो!

तुम्हीं हमारी शुभ-चिन्तक हो,
और हमारी हितकर हो तुम!
एहसासों की सौंधी खुश्बू, 
और खुशी का अम्बर हो तुम!"


..चेतन रामकिशन "देव"...
दिनांक-०९.०५.२०१३
"
सर्वाधिकार सुरक्षित"







Wednesday, 8 May 2013

♥♥सस्ती मौत..♥♥


♥♥♥सस्ती मौत..♥♥♥♥
अंधकार गहराया सा है!
दुख का गहरा साया सा है!
मौत हो गई कितनी सस्ती,

खौफ जहन पर छाया सा है!


शायद हम सब खुश हैं देखो,
कंक्रीट के इस जंगल में!
लोग यहाँ पर अपनेपन को,
कुचल रहे देखो दंगल में!
नया दौर क्या इसीलिए है,
मानवता का अंत करें हम,
हम औरों को पीड़ा देकर,
सदा रहें अपने मंगल में!

मानवता के ऊपर देखो,
अब खतरा मंडराया सा है!
मौत हो गई कितनी सस्ती,
खौफ जहन पर छाया सा है...

अपनी वहशत में हम देखो,
मानवता को कुचल रहे हैं!
हाड़ मांस के दिल न पिघलें,
बेशक पत्थर पिघल रहे हैं!
"देव" आज के दौर से अच्छा,
गुजरा आलम ही बेहतर था,
आज लोग बस अपने सुख में,
लाचारों को मसल रहे हैं!

पढ़े लिखे भी होकर भी हमने,
खुद को पशु बनाया सा है!
मौत हो गई कितनी सस्ती,
खौफ जहन पर छाया सा है!"

..चेतन रामकिशन "देव"...
दिनांक-०९.०५.२०१३









Monday, 6 May 2013

♥♥प्यार की कुमकुम.♥♥



♥♥प्यार की कुमकुम.♥♥♥ 
तुम गर्मी में हिम जैसी हो!
वर्षा की रिमझिम जैसी हो!
तुम रोली हो, तुम चन्दन हो,
और तुम ही कुमकुम जैसी हो!

पावन गंगा के जल जैसी!
तुम अम्बर के बादल जैसी!
तुम हाथों के कंगन जैसी,
तुम पैरों की पायल जैसी!

तुम मलमल की अनुभूति हो,
और तुम्हीं रेशम जैसी हो!
तुम रोली हो, तुम चन्दन हो,
और तुम ही कुमकुम जैसी हो...

तुम कोमल हो, दयावान हो!
तुम वीणा की मधुर तान हो!
"देव" तुम्हीं नीलम रत्नों में,
तुम सपनों का आसमान हो!

नयी नवेली सुबह में तुम,
और निशा पूनम जैसी हो!
तुम रोली हो, तुम चन्दन हो,
और तुम ही कुमकुम जैसी हो!"

..चेतन रामकिशन "देव"...
दिनांक-०६.०५.२०१३

"
सर्वाधिकार सुरक्षित"

Sunday, 5 May 2013

♥हक की आवाज..♥



♥♥♥हक की आवाज..♥♥♥ 
रुधिर शीत जब हो जाता है!
मन का साहस खो जाता है!
नाम मौत का सुनकर देखो, 
जिनका चेहरा रो जाता है!
ऐसे कहाँ लोग दुनिया में,
अपने हक की जंग लड़ेंगे,
लड़ने से पहले ही जिनके,
मन का संबल सो जाता है!

ये कमजोरी रहेगी जब तक,
हम उद्घोष नहीं कर सकते!
सरकारों के दमन के आगे,
किंचित रोष नहीं कर सकते!
कभी यहाँ निर्धन का शोषण,
कभी किसानों की शामत हो,
पर हम गहरी नींद त्यागकर,
खुद का होश नहीं कर सकते!

वो क्या जंग लड़ेगा डरकर,
जो भूमिगत हो जाता है!
लड़ने से पहले ही जिनके,
मन का संबल सो जाता है...

कमजोरों की सुनवाई को,
आलम बेशक कम होता है!
कोई न समझे उनके दुख को,
भले ही कितना गम होता है!
"देव" मगर हथियार से ज्यादा,
हमें जरुरत है साहस की,
क्यूंकि वो ही लड़ सकता है,
जिसके दिल में दम होता है!

वो ही दुश्मन का घर फूंके,
जो लावे सा हो जाता है!
लड़ने से पहले ही जिनके,
मन का संबल सो जाता है!"

..चेतन रामकिशन "देव"...
दिनांक-०६.०५.२०१३




Saturday, 4 May 2013

♥♥मन की दुल्हन...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥मन की दुल्हन...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तुमसे हर एहसास जुड़ा है, तुम अनुभूति हो जीवन की!
भले ही फेरे नहीं हुए पर, तुम दुल्हन हो अंतर्मन की!
तुम्हें देखना अच्छा लगता, तुम्हें सोचना दिल को भाए,
तुम सीपी हो, तुम मोती हो, तुम ज्योति हो मेरे मन की!

तुम दुल्हन के परिधानों में, जब भी सपनों में आती हो!
मेरे तन को, मेरे मन को, तुम खुश्बू से महकाती हो!

तुम स्वागत की अधिकारिणी, तुम माला हो अभिनन्दन की!
तुमसे हर एहसास जुड़ा है, तुम अनुभूति हो जीवन की..

नया सफर है हम दोनों का, प्रीत परस्पर सिखलानी है!
मन से मन विवाह हो गया, ये गठबंधन रूहानी है!
तुम दुल्हन के रूप में देखो, किसी परी जैसी लगती हो,
सखी तुम्हारी आंखें सुन्दर, और चेहरा भी नूरानी है!

सखी चाँद सी है सुन्दर है तू, तेरा यौवन मनोहारी है!
सखी तुम्हारे ऊपर मेरा, सारा जीवन बलिहारी है!

मुझमें छाया वसी तुम्हारी, तुम सूरत मेरे दर्पण की!
तुमसे हर एहसास जुड़ा है, तुम अनुभूति हो जीवन की..

मैं अपने हाथों से तेरा, सखी मेरी सिंगार करूँगा!
एहसासों में तुम्हें वसाकर, हर पल तुमसे प्यार करूँगा!
"देव" तुम्हारे हाथों पर मैं, प्यार भरी मेहँदी 
रचकर के,




एहसासों के सिंदूरी रंगों से, तेरी मांग भरूँगा!

मेरी दुल्हन अनुपम हो तुम, मेरे तन की जान तुम्हीं हो!
तुम्हीं मेरी कार्य कुशलता, जीवन का सम्मान तुम्हीं हो!

सोने, चाँदी से भी बढ़कर, तुम पूंजी मेरे जीवन की!
तुमसे हर एहसास जुड़ा है, तुम अनुभूति हो जीवन की!"

"
प्रेम-जिससे होता है, वो एहसासों के संसार में, कभी दुल्हन बनकर संगिनी जैसी लगती है तो कभी शिक्षक बनकर, मार्ग दर्शक! कभी मित्र बनकर सहयोगी तो कभी प्राकृतिक नजारों जैसी लगती है! सचमुच जहाँ प्रेम होता है वहां, हर एहसास, सम्बंधित पक्ष के लिए उमड़ता है!"

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-०५.०५.२०१३

"
सर्वाधिकार सुरक्षित"
"मेरी ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित"

♥♥मंजिल की हसरत...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥मंजिल की हसरत...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
कुछ करने की हसरत जब तक, अपने मन में नहीं जगेगी!
तब तक हमको जीवन पथ में, मंजिल कोई नहीं मिलेगी!
बस किस्मत की ओर देखकर, अपनी क्षमता नष्ट न करना,
इस भूमि में बिन मेहनत के, फसल कोई भी नहीं खिलेगी!

जो जीवन में लक्ष्य बनाकर, सही दिशा में बढ़ जाते हैं! 
वही लोग मंजिल की सीढ़ी, इक दिन देखो चढ़ जाते हैं!

बिना जलाये दीप की माला, घने तिमिर में नहीं जलेगी!
कुछ करने की हसरत जब तक, अपने मन में नहीं जगेगी..

जज्बातों पर काबू रखकर, कुछ अरमान जगाने होंगे!
हमको अपनी इन पलकों पर, सपने नए सजाने होंगे!
"देव" जहाँ में बिन शिक्षा के, नहीं रौशनी मिल सकती है,
अपने मन को अधिगम देकर, अक्षर नए सिखाने होंगे!          

सपनों को पूरा करने की, जो अभिलाषा तय करते हैं!
वही लोग अपनी उर्जा से, इन सपनों पर जय करते हैं!

बिना पसीने की बूंदों से, अपनी सूरत नहीं धुलेगी!
कुछ करने की हसरत जब तक, अपने मन में नहीं जगेगी!"

...................चेतन रामकिशन "देव"......................
दिनांक-०५.०५.२०१३

Wednesday, 1 May 2013

♥♥पीड़ा का भूचाल..♥♥

♥♥♥पीड़ा का भूचाल..♥♥♥
मेहनतकश का हाल वही है!
पीड़ा का भूचाल वही है!
उसकी आँखे पथराई हैं,
उसके तन की खाल वही है!

मजदूरों का हाल वही है,
लेकिन साल बदल जाता है!
भूख जलाती है भीतर से,
धूप से चेहरा जल जाता है!
ये कुदरत भी मजदूरों का,
साथ कहाँ देती है देखो,
बारिश में उसका घर टपके,
वही शीत में गल जाता है!

वही यहाँ पीड़ा में रहता,
और यहाँ कंगाल वही है!
उसकी आँखे पथराई हैं,
उसके तन की खाल वही है....

देश के सारे खद्दरधारी,
अपनी मस्ती में रहते हैं!
और मजदूरों की आँखों से,
हर पल ही आंसू बहते हैं!
"देव" यहाँ पर मजदूरों की,
आह नहीं सुनता है कोई,
भले रुदन में, चीख चीख कर,
वो अपनी पीड़ा कहते हैं!

वही यहाँ पर गुमसुम रहता,
और यहाँ बेहाल वही है!
उसकी आँखे पथराई हैं,
उसके तन की खाल वही है!"

..चेतन रामकिशन "देव"..
दिनांक-०१.०५.२०१३

Tuesday, 30 April 2013

♥♥प्रेम ग्रन्थ..♥♥



♥♥♥♥♥प्रेम ग्रन्थ..♥♥♥♥♥♥
प्रेम ग्रन्थ का विषय तुम्ही हो!
तुम कोमल हो, विनय तुम्ही हो!
तुम्ही चाँद की धवल चांदनी,
और सूर्य का उदय तुम्ही हो!

तुम्ही शाम हो, तुम्हीं सवेरा,
तुम्ही दिवस के हर पल में हो!
तुम्ही हमारी पथ प्रदर्शक,
तुम्ही हमारे कौशल में हो!
तुम लेखन में, तुम चिंतन में,
तुम्ही भाव की प्रखरता में,
तुम उर्जा में, तुम शक्ति में,
तुम्ही हमारे संबल में हो!

असीमित है, प्रेम तुम्हारा,
व्यापकता का वलय तुम्ही हो!
तुम्ही चाँद की धवल चांदनी,
और सूर्य का उदय तुम्ही हो..

तुम दर्शन की इच्छाओं में,
श्रवण का संगीत तुम्ही हो!
भले ही भौतिक जीवन है ये,
किन्तु मौलिक प्रीत तुम्ही हों!
"देव" तुम्हीं मेरे जीवन के,
प्रबंधन का अनुकथन हो,
तुम प्रभावी संबोधन में,
और सुरीला गीत तुम्हीं हो!

तुम्ही विजय की गौरव गाथा,
और संघर्षी अभय तुम्हीं हो!
तुम्ही चाँद की धवल चांदनी,
और सूर्य का उदय तुम्ही हो!"

..चेतन रामकिशन "देव"..
दिनांक-३०.०४.२०१३

"सर्वाधिकार सुरक्षित"












Sunday, 28 April 2013

♥♥दिल के टुकड़े .♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥दिल के टुकड़े .♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
किसी के दिल के टुकड़े करके, जिसे कोई अफसोस नहीं है!
जिसको अपने अभिमान पर, तनिक भी कोई रोष नहीं है!
ऐसे लोग कहाँ दुनिया में, दे सकते हैं प्यार मनुज को,
जिनके मन में मानवता का, किंचित भर भी कोष नहीं है!

भले ही खुद को अच्छा समझें, पर ये लोग नहीं हितकारी!
इन लोगों के अपने हित को, जब चाही मानवता मारी!

नहीं सुरक्षा दे सकता वो, जिसको खुद का होश नहीं है!
किसी के दिल के टुकड़े करके, जिसे कोई अफसोस नहीं है..

प्यार को कदमों तले कुचलकर, प्यार भरा लेखन न करना!
इस दुनिया में बुत से ज्यादा, मानवता का पूजन करना!
"देव" जहाँ में एटम बम से, लड़कर कुछ न मिल पायेगा,
अपने हित में अंधे होकर, मानव का शोषण न करना!

जो मजहब से ऊपर उठकर, मानवता साबित करते हैं!
वही लोग देखो दुनिया में, हर मानव का हित करते हैं!

कैसे कह दूँ किस्मत है ये, उन लोगों का दोष नहीं है!
किसी के दिल के टुकड़े करके, जिसे कोई अफसोस नहीं है!"

.........................चेतन रामकिशन "देव".........................
दिनांक-२८.०४.२०१३



Saturday, 27 April 2013

♥♥हमारा मिलन..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥हमारा मिलन..♥♥♥♥♥♥♥♥
एक दूजे से जिस दिन हम मिल जायेंगे!
रंग हजारों दुनिया में खिल जायेंगे!
तिमिर दुखों का, जीवन से ढल जायेगा,
खुशी के दीपक, जीवन में जल जायेंगे!

तुम बन जाना भाव और मैं गीत बनूँ!
तुम गर्मी में बारिश और मैं शीत बनूँ!

हम सपनों की दुनिया नयी सजायेंगे!
एक दूजे से जिस दिन हम मिल जायेंगे...

प्रीत तुम्हारी नाजुक नर्म हथेली है!
प्रीत तुम्हारी हर पल नयी नवेली है!
"देव" तुम्हारे जैसा, जग में कोई नहीं,
सखी तुम्हारी छवि, बड़ी अलबेली है!

तुम पुस्तक, मैं लिपि तुम्हारी बन जाऊं!
मैं शिक्षक बनकर के, तुमको समझाऊं!

प्रीत की सरगम, जग को सदा सुनायेंगे!
एक दूजे से जिस दिन हम मिल जायेंगे!"

...........चेतन रामकिशन "देव"...........
दिनांक-२७.०४.२०१३

Thursday, 25 April 2013

♥♥गम का विलय..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥गम का विलय..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मैं भावों का सागर हूँ, मैं अपना रस्ता तय कर लूँगा!
अपने स्वर में दर्द वसाकर, मैं गीतों में लय कर लूँगा!
मुझे अकेला देख भले ही, मेरे दुश्मन मुस्काते हों,
लेकिन मैं अपने साहस से, अपने हक की जय कर लूँगा!

ये मेरा विश्वास है खुद पर, ये कोई अभिमान नहीं है! 
यूँ ही मैं संघर्ष करूँगा, जब तक तन बेजान नहीं है!

धीरे धीरे खून में अपने, गम का यहाँ विलय कर लूँगा!
मैं भावों का सागर हूँ, मैं अपना रस्ता तय कर लूँगा.....

इस जीवन की राह पे देखो, रोजाना बदलाव हुए हैं!
कभी यहाँ पर आंसू फूटे, कभी यहाँ पर घाव हुए हैं!
"देव" यहाँ पर पत्थर बनकर, अपने दिल को कुचल रहे हैं,
दर्द के झरने उमड़ उमड़ कर, देखो तो सैलाब हुए हैं!

जब अपने ही बदल गए तो, गैरों से क्या गिला करूँगा!
हाँ लेकिन मैं अब लोगों से, सोच समझकर मिला करूँगा!

धीरे धीरे सही राह पर, चलकर यहाँ विजय कर लूँगा!
मैं भावों का सागर हूँ, मैं अपना रस्ता तय कर लूँगा!"

..................चेतन रामकिशन "देव".....................
दिनांक-२६.०४.२०१३




♥♥वक्त का सूरज,..♥♥



♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥वक्त का सूरज,..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
आज भले ही वक्त का सूरज, मुझको केवल झुलसाता है!
आज भले ही चाँद रात का, विरह भाव में तड़पाता है!
आज भले ये तारे मुझको, चिढ़ा रहे हों मेरी हार पर,
आज भले ही काला बादल, घना अँधेरा कर जाता है!

लेकिन मन में आशाओं के, दीप जलाने मैं निकला हूँ!
गम की भारी चट्टानों को, यहाँ हिलाने मैं निकला हूँ!

वही हारता है जीवन से, जो पीड़ा से डर जाता है!
आज भले ही वक़्त का सूरज, मुझको केवल झुलसाता है...

आज भले ही बुरे वक़्त में, अपनों का रुख बदल गया हो!
आज भले ही बुरे वक्त में, पैर हमारा फिसल गया हो!
"देव" मगर वो पछतायेंगे, एक दिन अपनी मनमानी पर,
आज भले उनका अपनापन, मोम की तरह पिघल गया हो!

रोज दर्द के प्याले पीकर, शक्ति का वर्धन करता हूँ!
उठने की कोशिश रहती है, भले ही मैं कितना गिरता हूँ!

आग को सहते सहते एक दिन, लोहा कुंदन बन जाता है!
आज भले ही वक़्त का सूरज, मुझको केवल झुलसाता है!"

....................चेतन रामकिशन "देव"....................
दिनांक-२५.०४.२०१३


♥♥पत्थर का बुत..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥पत्थर का बुत..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
रो रो कर आँखों में लाली, और मेरा मन विचलित होता!
सच की कीमत नहीं है कोई, झूठ यहाँ पर अद्भुत होता!
जिस इन्सां को आह किसी, नहीं सुनाई देती जग में,
बेशक वो दिखता हो मानव, पर वो पत्थर का बुत होता!

लोग यहाँ पर मिन्नत करके, भले तड़प कर मर भी जायें!
लेकिन पत्थर के बुत जैसे, मानव फिर भी जश्न मनायें!

बिन पानी के इस दुनिया में, कहाँ मरुस्थल सुरभित होता!
रो रो कर आँखों में लाली, और मेरा मन विचलित होता.....

इस दुनिया में मानवता का, लगभग सारा पतन हो गया!
बस अपना ही घर भरने का, हर मानव का जतन हो गया!
"देव" ये आलम देखके मेरा, दिल रोता है फूट फूट कर,
बस अपने ही सुख में शामिल, मानव का हर यतन हो गया!

दर्द किसी का समझ सके न, किसी की पीड़ा जान सके न!
वो इन्सां इंसान नहीं है, जो अपनायत मान सके न!

अभिमान ऐसे मानव का, एक दिन किन्तु है मृत होता!
रो रो कर आँखों में लाली, और मेरा मन विचलित होता!"

....................चेतन रामकिशन "देव"....................
दिनांक-२५.०४.२०१३

Wednesday, 24 April 2013

♥नरमी का एहसास.♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥नरमी का एहसास.♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तुम्हें देखकर मेरे दिल में, नरमी के एहसास जगे हैं!
तुमसा खास नहीं है कोई, यूँ तो मेरे कई सगे हैं!

सखी चांदनी रात के जैसा, सुन्दर है सिंगार तुम्हारा!
बड़े भाग्य से मैंने पाया, इस जीवन में प्यार तुम्हारा!
"देव" तुम्हारे प्रेम की चाहत, मुझको हर पल उर्जा देती,
दूर हो लेकिन फिर भी करता, मैं मन से दीदार तुम्हारा!

सखी तुम्हारे प्रेम से मेरी, आँखों में ये ख्वाब उगे हैं!
तुम्हें देखकर मेरे दिल में, नरमी के एहसास जगे हैं...

तुम नेनों के पटल पे अंकित, छवि तुम्हारे वसी है मन में!
सखी मैं तेरे संग उड़ता हूँ, पंख पसारे नील गगन में!
तुमसे ही रौनक है घर में, तुमसे बागों की हरियाली,
तुमसे ही खुशियों के दीपक, जले सखी मेरे जीवन में!

सखी तुम्हारे प्रेम से देखो, इस जीवन को पंख लगे हैं!
तुम्हें देखकर मेरे दिल में, नरमी के एहसास जगे हैं!"

....................चेतन रामकिशन "देव"......................
दिनांक-२४.०४.२०१३




Tuesday, 23 April 2013

♥♥प्रीत की खुश्बू.♥♥


♥♥प्रीत की खुश्बू.♥♥
जब से प्रीत तेरी पाई है!
तब से जीवन सुखदाई है!
उपवन खुश्बू से भर आया,
और तितली भी मुस्काई है!

प्रेम तुम्हारा बड़ा ही कोमल,
प्रेम तुम्हारा मनोहारी है!
तुम्हे देखकर खिले उजाला,
छवि तुम्हारी उजियारी है!
सखी तुम्हारे प्रेम से देखो,
लगता हर दिन त्योहारों सा,
सखी ईद सी, मीठी है तू,
तू रंगों की पिचकारी है!

सही रास्ता मुझे दिखाकर,
गलत दिशा भी समझाई है!
उपवन खुश्बू से भर आया,
और तितली भी मुस्काई है...

सखी तुम्हारे दर्शन पाकर,
मेरी हर प्रभात सुखद हो!
सखी तुम्हारे प्रेम से देखो,
पूनम सी हर रात सुखद हो!
"देव" तुम्हारी प्रीत ने मुझको,
अपनेपन का दिया समुन्दर,
सखी दुआ है युगों युगों तक,
हम दोनों का साथ सुखद हो!

सखी तुम्हारा रूप देखकर,
धवल चांदनी शरमाई है!
उपवन खुश्बू से भर आया,
और तितली भी मुस्काई है!"

..चेतन रामकिशन "देव"..
दिनांक-२३.०४.२०१३

"
प्रीत-जहाँ, परस्पर प्रीत होती है, वहां जीवन, समस्याओं की कठिनता के बाद भी,
पथरीला नहीं लगता! प्रेम जहाँ होता है, वहां अभावों में जीवन पथ सरल हो जाता है!"

"
सर्वाधिकार सुरक्षित"
' मेरी ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित"

Monday, 22 April 2013

♥♥तुम्हारी समझ...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥तुम्हारी समझ...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तुम्हे समझना है जो समझो, पक्ष हमारा नहीं जरुरी!
हाँ ये सच है बिना तुम्हारे, ये जीवन की डगर अधूरी!

मैंने तुमको मानवता के नाते, अपना मान लिया था!
साथ तुम्हारे खुश रहने का, अवसर मैंने जान लिया था!
तेरे साथ चाहता था क्यूंकि, "देव" तेरा कद था नूरानी,
मैंने तेरे अपनेपन से, इतना तो पहचान लिया था!

नहीं पता के तुमने मुझसे, क्यूँ कर ली मीलों की दूरी!
तुम्हे समझना है जो समझो, पक्ष हमारा नहीं जरुरी....

शायद रिश्तों की दुनिया ही, तुमको बड़ी अनूठी लगती!
इन रिश्तों के आगे तुमको, मानवता भी झूठी लगती!
पर मेरा दिल कहता है के, मानवता सबसे ऊपर है,
लेकिन तुमको मानवता की, डोर हमेशा टूटी लगती!

बुरे वक़्त में कब होती है, किसी के दिल की हसरत पूरी!
तुम्हे समझना है जो समझो, पक्ष हमारा नहीं जरुरी!"

...................चेतन रामकिशन "देव"....................
दिनांक-२२.०४.२०१३

♥♥शब्दों की कराह.♥♥




♥♥शब्दों की कराह.♥♥♥♥
शब्दों का मन कराह रहा है,
कुछ कह पाना भी मुश्किल है!
आज का मानव हुआ है दानव,
नजर मिलाना भी मुश्किल है!
कुदरत की अनुपम कृति को,
नोंच रहें हैं, काम पिपासु,
पीड़ा की व्यापक क्षमता को,
अब बतलाना भी मुश्किल है!

सजा मौत की सही है लेकिन,
ये बहशीपन चलेगा कब तक!
यहाँ आदमी दानव बनकर,
मानवता को छलेगा कब तक!
रोज रोज हर चौराहे पर,
नारी की अस्मत लुटती है,
नहीं पता के इस नारी को,
इज्ज़त का हक, मिलेगा कब तक!

तन पे छाले पड़े हमारे,
अब दिखलाना भी मुश्किल है!
पीड़ा की व्यापक क्षमता को,
अब बतलाना भी मुश्किल है....

दंड नहीं है, श्राप नहीं है,
नारी होना पाप नहीं है!
नारी तो है खिले सुमन सी,
वो दुख का संताप नहीं है!
"देव" यहाँ पर देखो अब तुम,
नर-नारी को एक नजर से,
नारी का अस्तित्व है व्यापक,
वो कोई धुंआ, भाप नहीं है!

रोम रोम में दर्द है गहरा,
बदन हिलाना भी मुश्किल है!
पीड़ा की व्यापक क्षमता को,
अब बतलाना भी मुश्किल है!"

...चेतन रामकिशन "देव"...
दिनांक-२२.०४.२०१३

Sunday, 21 April 2013

♥♥गम की रात..♥♥


♥♥♥♥♥गम की रात..♥♥♥♥♥
दिल का हाल सुनाया जिसको!
अपना यहाँ बताया जिसको,
वही अँधेरा सोंप गया है,
दीपक सदा दिखाया जिसको!

काश हमारी आह समझते!
ये पथरीली राह समझते!
काश समझकर मेरे आंसू,
मेरे मन की चाह समझते!

वही गिराकर चला गया है,
मैंने सदा उठाया जिसको!
वही अँधेरा सोंप गया है,
दीपक यहाँ दिखाया जिसको...

गिला नहीं है उससे कोई,
ये किस्मत की बात है शायद!
इक दिन सूरज भी निकलेगा,
"देव" ये गम की रात है शायद!

मिला वही अनजानों जैसा,
दिल में सदा वसाया जिसको!
वही अँधेरा सोंप गया है,
दीपक यहाँ दिखाया जिसको!"

...चेतन रामकिशन "देव"...
दिनांक-२१.०४.२०१३


Tuesday, 16 April 2013


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥नया उजाला..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
नया दिवस है, नया उजाला, जल की ये शीतल धारा है!
निशा तिमिर की बीत चुकी है, और सूरज का उजियारा है!
वही यहाँ पर समस्याओं से, लड़ के आगे बढ़ा है एक दिन,
जिस मानव ने साहस के संग, समस्याओं को ललकारा है!

ये जीवन है यहाँ पे निश दिन, समस्याओं के पल आते हैं!
किन्तु मन में साहस हो तो, तिमिर में दीपक जल जाते हैं!

वही शांत रहता है मन से, क्रोध को जिसने भी मारा है!
नया दिवस है, नया उजाला, जल की ये शीतल धारा है....

सही बात है किस्मत का रुख, सदा यहाँ सुखमय नहीं होता!
किन्तु किस्मत से डरकर भी, जीवन का पथ तय नहीं होता!
"देव" हमे करना होगा कुछ, किस्मत कर्म नहीं करती है,
वही विजय पाता है रण में, जिसे हार का भय नहीं होता!

बस किस्मत की राह देखकर, जीवन को बरबाद न करना!
तुम औरों को दुख देकर के, अपना घर आबाद न करना!

वो क्या जंग करे जीवन से, साहस ही जिसने हारा है!
नया दिवस है, नया उजाला, जल की ये शीतल धारा है!"


....................चेतन रामकिशन "देव"........................
दिनांक-१७.०४.२०१३
"
सर्वाधिकार सुरक्षित"
" मेरी ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित"

(पेंटिंग साभार--प्रिय मित्र कुसुम जी!)

Monday, 15 April 2013

♥गम का तहखाना.♥


♥♥गम का तहखाना.♥♥
गम के गहरे तहखाने में!
और आंसू के मयखाने में!
अब खुशियों की नहीं तमन्ना,
डर लगता है मुस्काने में!

हवा है लेकिन घुटन बहुत है!
इन आँखों में चुभन बहुत है!
सुनो जरा हौले से छूना,
मेरे दिल में दुखन बहुत है!

दुख के बादल उमड़ रहे हैं,
गम देने को, नजराने में!

अब खुशियों की नहीं तमन्ना,
डर लगता है मुस्काने में...
अपना कहकर बनें पराये!
लोगों का रुख समझ न आये!
"देव" जिसे मलमल का समझो,
वो इन्सां ही ठेस लगाये!

बिन उसके ये दिल नहीं लगता,
उमर बीत गयी समझाने में!

अब खुशियों की नहीं तमन्ना,
डर लगता है मुस्काने में!"
..चेतन रामकिशन "देव"..
दिनांक-१५.०४.२०१३

Sunday, 14 April 2013

♥♥द्वन्द..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥द्वन्द..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
द्वन्द कभी अपनों से होता, द्वन्द कभी होता है मन से!
द्वन्द कभी होता सपनों से, द्वन्द कभी होता है तन से!

जीवन के हर पथ पर देखो, द्वन्द हमेशा होता रहता!
लाख हँसे बाहर से कोई , पर भीतर से रोता रहता!
कभी कोई अपनों से छलकर, पत्थर जैसा हो जाता है,
और कोई पत्थर होकर भी, मोम की फसलें बोता रहता!

द्वन्द कभी हो निर्धनता से, द्वन्द कभी होता धन से!
द्वन्द कभी होता सपनों से, द्वन्द कभी होता है तन से...

लेकिन द्वन्द भले हो कितना, धीरज नहीं हमें खोना है!
हमे निराशा के अंकुर को, कभी नहीं मन में बोना है!
"देव" कभी तुम द्वन्द के कारण, नहीं भटक जाना राहों से,
हमे द्वन्द से भय खाकर के, नहीं यहाँ हरगिज रोना है!

द्वन्द कभी पीछा ना छोड़े, द्वन्द सदा होता जीवन से!
द्वन्द कभी होता सपनों से, द्वन्द कभी होता है तन से!"

..................चेतन रामकिशन "देव".....................
दिनांक-१५.०४.२०१३

♥♥प्रतीक्षा की घड़ी.♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्रतीक्षा की घड़ी.♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
प्रतीक्षा की कठिन घड़ी ये, काटे से भी कट नहीं पाती!
बिना तुम्हारे रात चांदनी, सखी मुझे अब नहीं सुहाती!
तारे गिनकर बिता रहा हूँ, कठिन रात के कठिन पहर को,
सखी मेरी आँखों को देखो, बिना तुम्हारे नींद न आती!

सखी मेरी तू आ जाया कर, बिना तुम्हारे कुछ न भाये!
नहीं सहन होती ये पीड़ा, जहर विरह का पिया न जाये!

बिना तुम्हारे ख़ामोशी है, कोयल कलरव नहीं सुनाती!
प्रतीक्षा की कठिन घड़ी ये, काटे से भी कट नहीं पाती...

मैं मज़बूरी समझ भी जाऊं, लेकिन दिल किसकी सुनता है!
रात को चाहें या दिन निकले, बस तेरे सपने बुनता है!
"देव" मेरा दिल कहता है के, एक दिन तुम आओगी मिलने,
इसी आस में सखी मेरा दिल, फूल तेरी खातिर चुनता है!

बिना तुम्हारे जान नहीं है, मेरा तन बेजान हुआ है!
सखी मेरी व्याकुल आँखों को, हर पल तेरा ध्यान हुआ है!

सखी तुम्हारे बिन आँखों की, प्यास जरा भी बुझ नहीं पाती!
प्रतीक्षा की कठिन घड़ी ये, काटे से भी कट नहीं पाती!"

...................चेतन रामकिशन "देव"......................
दिनांक-१४.०४.२०१३



Saturday, 13 April 2013

♥♥भीम को नमन..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥भीम को नमन..♥♥♥♥♥♥♥♥♥
जो शोषक वर्ग से, संघर्ष का आहवान करते हैं!
जो अपने कर्म से, मानव हितों का मान करते हैं!
जो हमको दे गए, शिक्षा यहाँ, संघर्ष की बातें,
हम ऐसे भीम का, मन से सदा सम्मान करते हैं!

अभावों में भी रहकर, ज्ञान का दीपक जलाया है!
दबे, कुचले हुए मानव को, सीने से लगाया है!

जो औरों के लिए अपनी खुशी, प्रदान करते हैं!
हम ऐसे भीम का, मन से सदा सम्मान करते हैं..

महापुरुष लोग जाति की, परिधि में नहीं होते!
महापुरुष लोग हिंसा के, कभी अंकुर नहीं बोते!
महापुरुष लोग देखो "देव" हैं, वंदन के अधिकारी,
महापुरुष लोग सच्चाई के रस्ते को, नहीं खोते!

नहीं जाति में आंकों तुम, वो सबके काम आते हैं!
हम अपने शीश को बाबा तेरे, सम्मुख झुकाते हैं!

जो खुद जलकर भी, औरों का सफर आसान करते हैं!
हम ऐसे भीम का, मन से सदा सम्मान करते हैं!"

.................चेतन रामकिशन "देव"................
दिनांक-१४.०४.२०१३( भारत रत्न डॉ.भीम राव अम्बेडकर को उनकी जयंती पर नमन!"











Friday, 12 April 2013

♥♥सितारों की लड़ी..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥सितारों की लड़ी..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
गगन के चाँद सी सुन्दर, सितारों की लड़ी हो तुम!
तुम्ही पायल की छम छम में, अंगूठी में जड़ी हो तुम!

हो मुझसे दूर मीलों पर, हमेशा पास लगती हो!
मेरे ख्वाबों का तुम देखो, जवां एहसास लगती हो!
सुनो ए "देव" मैं तुम बिन, कभी खुश हो नहीं सकता,
तुम्हीं सारे ज़माने में, मुझे बस ख़ास लगती हो!

मेरे दुख में, मेरे गम में, मेरे संग में खड़ी हो तुम!
गगन के चाँद सी सुन्दर, सितारों की लड़ी हो तुम!"

...........चेतन रामकिशन "देव"...........
दिनांक-१२.०४.२०१३

Thursday, 11 April 2013

♥♥मेरा वजूद..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥मेरा वजूद..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मुझको बतलाओ मुझे, कैसे भुलाओगे तुम!
प्यास नजरों की भला, कैसे बुझाओगे तुम!

मेरी उल्फ़त तेरे चेहरे पे, नजर आती है,
मेरी चाहत को यहाँ, कैसे छुपाओगे तुम!

मैं अभी जिंदा हूँ तो, मान भी जाऊंगा मगर,
बाद मरने के मुझे, कैसे मनाओगे तुम!

खून से अपने जो ख़त, मैंने तुम्हे लिखे थे,
हाथ कांपेंगे उन्हें, कैसे जलाओगे तुम!

"देव" ये जिस्म है मिट्टी का, सतालो लेकिन,
रूह से अपनी, नजर कैसे मिलाओगे तुम!"

.............चेतन रामकिशन "देव"..............
दिनांक-११.०४.२०१३

Wednesday, 10 April 2013

♥♥♥व्याकुल मन...♥♥♥




♥♥♥व्याकुल मन...♥♥♥♥♥♥♥♥
कंठ भर गया रोते रोते, साथ साथ ये मन व्याकुल है!
दर्द भरा है इतना दिल में ,रोम रोम भी शोकाकुल है!
है संवेदनहीन जहाँ ये, कोई किसी का दर्द न जाने,
मेरा मनवा तड़प रहा है और मेरी आँखों में जल है!

अब कोई जज्बात न समझे, सब रहते हैं अपनी धुन में!
नहीं पिघलता पत्थर का दिल, भले निवेदन करो रुदन में!

लोग यहाँ मदिरा को देखो, कहते हैं के गंगाजल है!
कंठ भर गया रोते रोते, साथ साथ ये मन व्याकुल है....

ऐसी दौलत का क्या करना, जिसका मन सम्पन्न नहीं हो!
भूख की कीमत उससे जानो, जिसके घर में अन्न नहीं हो!
कभी जरा तुम गौर से देखो, उसकी गहरी तन्हाई को,
बिना हमारे जिस मानव का, एक पल भी प्रसन्न नहीं है!

किसे सुनायें हम हालेदिल, वक़्त किसी के पास नहीं है!
लगता है मेरी किस्मत को, ख़ुशी का लम्हा रास नहीं है!

आसमान भी आग बरसता, और यहाँ पथरीली थल है!
कंठ भर गया रोते रोते ,साथ साथ ये मन व्याकुल है....

जो पत्थर बनकर के खुश हैं, उनको मोम नहीं भाता है!
कभी किसी का दर्द देखकर, उन को तरस नहीं आता है!
"देव" यहाँ पर जिस मानव के, मन में होती है मानवता,
वो मानव ही जनमानस के दर्द का, साथी बन पाता है!

मानवता के नाते जिस दिन, तुम मानव से प्यार करोगे!
वो दिन ऐसा होगा जब तुम, खुशियों का दीदार करोगे!

इस दुनिया में प्रेम की दौलत, मानो रेशम और मलमल है!
कंठ भर गया रोते रोते ,साथ साथ ये मन व्याकुल है! "

"
पीड़ा- ये सच है कि पीड़ा से कोई भी अछूता नहीं, किन्तु पीड़ा के मायने तब कहीं अधिक बढ़ जाते हैं, जब सामने वाला ऐसा व्यक्ति हमे पीड़ा देता है, जिस पर हम बहुत यकीन और नेह रखते हों, तो आइये जरा चिंतन करते हुए, किसी को दर्द कम से कम देने की कोशिश करें.."

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-१०.०४.२०१३













Tuesday, 9 April 2013

♥♥काश समझते मेरे मन.♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥काश समझते मेरे मन.♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
काश समझते मेरे मन को, काश मेरे दिल को पढ़ पाते!
न ही मुझसे दूरी करते, न ही मुझसे नजर चुराते!

बिना मेरा दिल पढ़े भला तुम, कैसे मेरे भाव समझते!
अपनेपन के भावों के बिन, कैसे मेरे घाव समझते!
"देव" अगर तुम इक अक्षर भी, पढ़ लेते मेरी चाहत का,
तो तुम मेरे दर्द समझकर, आँखों का सैलाब समझते!

मुझे गिराकर तुम यूँ हमदम, अगली सीढ़ी न चढ़ जाते!
काश समझते मेरे मन को, काश मेरे दिल को पढ़ पाते!"

..................चेतन रामकिशन "देव"..................
दिनांक-०९.०४.२०१३

Monday, 8 April 2013

♥♥तन्हा रात .♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥तन्हा रात .♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
फिर से तन्हा रात आ गयी, चुपके चुपके रोना होगा!
जबरन अपनी आंख मूंदकर, हमको फिर से सोना होगा!

नहीं पता था प्यार में हमको, दर्द मिलेगा इतना सारा,
गुमसुम गुमसुम होगा ये दिल, चैन भी अपना खोना होगा!

नहीं कोई गिरते इन्सां को, यहाँ सहारा देता यारों,
अपने ही कंधे पर हम को, अपना ये तन ढ़ोना होगा!

तुमसे कोई गिला नहीं है, नहीं शिकायत मुझको कोई,
शायद मेरी किस्मत में ही, ये सब देखो होना होगा!

"देव" न कोई पढ़ ले मेरी, रोनी सूरत के लफ्जों को,
दिन निकले से पहले अपनी, सूरत को फिर धोना होगा!"

.................चेतन रामकिशन "देव"..................
दिनांक-०८.०४.२०१३




Friday, 5 April 2013

♥♥मेरी ख्वाहिश..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥मेरी ख्वाहिश..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
सारी दुनिया जीत के मैंने, नहीं सिकंदर बनना चाहा!
मजलूमों का खून बहाकर, नहीं धुरंधर बनना चाहा!
बस ऐसा बनना चाहा के, जिसे देखकर दुनिया खुश हो,
हसरत रखी सदा झील की, नहीं समुन्दर बनना चाहा!

जिस मानव के जीवनपथ में, अच्छाई की लय होती है!
उस मानव की इक दिन देखो, सारे जग में जय होती है!

न आंधी की मुझे तमन्ना, नहीं बबंडर बनना चाहा!
सारी दुनिया जीत के मैंने, नहीं सिकंदर बनना चाहा...

न दौलत की हसरत दिल में, न महलों के जैसा घर हो!
सदा रहे जीवित मानवता, गलत काम से मुझको डर हो!
"देव" मैं अपनी नजरों को बस, मिला सकूँ खुद की नजरों से,
मेरी इच्छा नहीं कभी भी, मेरे क़दमों में अम्बर हो!

सच की राह पे चलने वाले, भले ही कुछ पीड़ा पाते हैं!
लेकिन इक दिन आता है जब, सच के लम्हें मुस्काते हैं!

न चाहत है तलवारों की, न ही खंजर बनना चाहा! 
सारी दुनिया जीत के मैंने, नहीं सिकंदर बनना चाहा!"

.................चेतन रामकिशन "देव"................
दिनांक-०५.०४.२०१३

Wednesday, 3 April 2013

♥♥फुर्सत.♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥फुर्सत.♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
आज दर्द के गलियारों से, दो पल फुर्सत के लाया हूँ!
खुली हवा में सांसें ली हैं और जी भर के मुस्काया हूँ!

फुर्सत के इन दो लम्हों का, मंजर देखो बड़ा ही प्यारा!
नदियाँ मुझसे मिलने दौड़ीं, हरियाली ने मुझे दुलारा!
"देव" हमेशा इन लम्हों की, याद रहेगी मेरे दिल को,
इन छोटे से दो लम्हों ने, मन से दुख का बोझ उतारा!

आज मिली है इतनी फुर्सत, गिरकर देखो उठ पाया हूँ!
आज दर्द के गलियारों से, दो पल फुर्सत के लाया हूँ!"

...................चेतन रामकिशन "देव"..................
दिनांक-०३.०४.२०१३


Tuesday, 2 April 2013

♥♥मखमल का दिल.♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥मखमल का दिल.♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
पत्थर जैसी इस दुनिया में, मखमल का दिल ढूंढ रहा हूँ!
जिसकी ठंडक दिल को भाए, ऐसा आँचल ढूंढ रहा हूँ!

आसमान में मार धुँयें की, और रसायन पानी में है,
मैं गंगा के पानी में ही, अब गंगा जल ढूंढ रहा हूँ!

बिन पानी के जिन खेतों की, फसलें देखो झुलस रही हैं,
आज उन्ही खेतों की खातिर, गीला बादल ढूंढ रहा हूँ!

कौन कौन है ऐसा जिसने, इस जनता को नहीं छला हो,
आज सियासी भारत का मैं, इक ऐसा दल ढूंढ रहा हूँ!

"देव" नहीं सुनता है कोई, इस दुनिया में दर्द किसी का,
इसीलिए तो अपने दुख का, अब खुद ही हल ढूंढ रहा हूँ!"

...................चेतन रामकिशन "देव"..................
दिनांक-०३.०४.२०१३



♥♥कंठ की प्यास.♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥कंठ की प्यास.♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
प्यास कंठ की बुझ न पाई, बिन छाया के जला पथ में! 
लोग ठोकरें मार रहे हैं, पत्थर बनकर ढला हूँ पथ में!

जब जी चाहा मुझे रुलाया, करुण निवेदन भी ठुकराया, 
बिना तुम्हारे आंखें रोयीं, बिना तुम्हारे दिल मुरझाया!
फिर भी तुमसे गिला नहीं है, "देव" नहीं रंजिश है कोई,
किस्मत में जो लिखा होगा, वो सब मेरे हिस्से आया!

जिसको मैंने अपना माना, उसी के हाथों छला हूँ पथ में!
प्यास कंठ की बुझ न पाई, बिन छाया के जला पथ में!"

.................चेतन रामकिशन "देव"...................
दिनांक-०२.०४.२०१३

Monday, 1 April 2013

♥♥ताजमहल पर..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥ताजमहल पर..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
ताजमहल पर लिखा सबने, लेकिन मैं तुम पर लिखूंगा!
मैं मुफ़लिस का दर्द देखकर, अपनी आंखे तर लिखूंगा!

जब भी दर्द मिला है मुझको, मेरी माँ ने मुझे संभाला,
इसीलिए मैं माँ के दिल को, ममता का इक घर लिखूंगा!

जुर्म बढ़ गया इतना सारा, बेटी घर से निकल न पाए,
उस बेटी के नाजुक दिल का, सहमा सहमा डर लिखूंगा!

जिस दुनिया को देखा न हो, उस दुनिया में ले जाते हैं,
मैं अपने प्यारे ख्वाबों को, किसी परी के पर लिखूंगा!

झूठ बोलकर "देव" किसी से, अपनायत की चाह नहीं है,
सच्ची चाहत के सजदे में, बेशक अपना सर लिखूंगा!"

....................चेतन रामकिशन "देव"......................
दिनांक-०१.०४.२०१३ 

Saturday, 30 March 2013

♥तुम्हारा सम्बन्ध..♥


♥तुम्हारा सम्बन्ध..♥
ह्रदय के स्पंदन में हो!
तुम पूजा में, वंदन में हो!
तुमसे ही जीवन में उर्जा,
तुम जीवन के हर क्षण में हो!

मीत तुम्हीं हो, जीत तुम्हीं हो!
मेरे मन की प्रीत तुम्हीं हो!
हर मौसम की रंगत तुमसे,
तुम ही बारिश, शीत तुम्हीं हो!

हरियाली के हरे रंग में,
तुम फसलों में, तुम वन में हो!
तुमसे ही जीवन में उर्जा,
तुम जीवन के हर क्षण में हो...

तुम गीतों का भाव पक्ष हो,
तुम शब्दों का अलंकार हो!
तुम यमुना का शीतल पानी,
तुम गंगा की मधुर धार हो!

तुम्ही हमारी स्मरण शक्ति,
तुम्ही "देव" के यौवन में हो!
तुमसे ही जीवन में उर्जा,
तुम जीवन के हर क्षण में हो!"

....चेतन रामकिशन "देव"....
दिनांक-३१.०३.२०१३

Friday, 29 March 2013

♥♥गीतों के बोल.♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥गीतों के बोल.♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तेरी याद में मेरे हमदम, कुछ गीतों के बोल लिखूंगा!
मैं अपने लफ्जों से अपने, जीवन का भूगोल लिखूंगा!

मेरे यारों शै उल्फत की, नहीं बाजारों में बिकती है,
इसीलिए मैं इस उल्फत को, हर पल ही बेमोल लिखूंगा!

तेरे नूर की उजली किरणें, धवल चांदनी के जैसी हैं,
मैं तेरे प्यारे मुखड़े को, चाँद की तरह गोल लिखूंगा!

इस दुनिया में बिन मेहनत के, मंजिल पास नहीं आती है,
बिन हिम्मत के अपने कश्ती, हर पल डांवाडोल लिखूंगा!

"देव" यहाँ पर जिन लोगों को, भाता है बस खून खराबा,
मैं ऐसे लोगों के तन पर, जंगलीपन का खोल लिखूंगा!"

..................चेतन रामकिशन "देव"..................
दिनांक-२९.०३.२०१३


Thursday, 28 March 2013

♥♥बादल के आंसू..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥बादल के आंसू..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
विरह भाव से पीड़ित होकर, बादल के भी आंसू बरसे!
बादल के प्यासे नैना भी, सखी तेरे दर्शन को तरसे!

जिधर भी देखो उसी दिशा में, आंसू की नदियाँ बहती हैं!
सखी न जाने कब आएगी, मन ही मन अपने कहती हैं!
बादल का रंग तन्हाई में, "देव" तरसकर हुआ है काला,
कुछ कहने को शब्द नहीं हैं, ये नदियाँ चुप चुप रहती हैं!

इंतजार में सखी तुम्हारे, बीत गए हैं कितने अरसे!
विरह भाव से पीड़ित होकर, बादल के भी आंसू बरसे!"

......................चेतन रामकिशन "देव"..................
दिनांक-२८.०३.२०१३

Wednesday, 27 March 2013

♥♥ख्वाहिशों की होली♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥ख्वाहिशों की होली♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
किसी का दिल यहाँ होली के, जैसे जल रहा होगा!
कोई अपनी अमीरी में, उफन कर चल रहा होगा!
कोई भूखा है अरसे से, मगर ईमान रखता है,
कोई पर अपने मकसद में, जहाँ को छल रहा होगा!

जो मुफलिस भी पनप जाये, यहाँ ऐसा नहीं होता!
कोई खरबों में जीता है, कहीं पैसा नहीं होता!
यहाँ पर "देव" मजलूमों की, अर्जी कौन सुनता है,
यहाँ पीड़ित जो चाहता है, कभी वैसा नहीं होता!

अदालत में भी मुफ़लिस का, मुकदमा टल रहा होगा!
किसी का दिल यहाँ होली के, जैसे जल रहा होगा!"

..................चेतन रामकिशन "देव".................
दिनांक-२७.०३.२०१३

Tuesday, 26 March 2013

♥♥मोहब्बत के रंग..♥♥


♥♥♥♥♥♥मोहब्बत के रंग..♥♥♥♥♥♥♥♥
रंग से रंग मोहब्बत का, मिलाया जाये!
आओ नफरत को यहाँ, जड़ से मिटाया जाये!

न ही हिन्दू, नहीं मुस्लिम, न इसाई कोई,
आओ खुद को जरा इंसान, बनाया जाये!

प्यार को दिल में, छुपाने से बढ़ी बेचैनी,
प्यार है जिससे चलो, उसका जताया जाये!

आज होली पे भले लकड़ियों में आग न हो,
अपने दिल में छुपी, नफरत को जलाया जाये!

उम्र भर जो मेरे चेहरे पे, "देव" दिखता रहे,
प्यार का रंग वही, सबको लगाया जाये!"

.........चेतन रामकिशन "देव"..............
दिनांक-२६.०३.२०१३

Monday, 25 March 2013

♥♥मेरी होली..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥मेरी होली..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
चाँद से ली है धवल चांदनी, सूरज से लाली लाया हूँ!
मैं होली पर तुझे भिगोने, बादल से पानी लाया हूँ!

सखी तेरी सुन्दर आँखों में, गहरा काजल भर दूंगा मैं!
सखी तेरे प्यारे चेहरे पर, रंग प्यार का मल दूंगा मैं!
सखी तुम्हारे माथे पर मैं, तिलक लगाऊंगा रोली का,
और तुम्हे तुलसी की भांति, "देव" मानकर जल दूंगा मैं!

बाहर से भी खिला खिला हूँ, भीतर से भी मुस्काया हूँ!
चाँद से ली है धवल चांदनी, सूरज से लाली लाया हूँ!"

...................चेतन रामकिशन "देव"...................
दिनांक-२५.०३.२०१३

Sunday, 24 March 2013

♥♥♥होश..♥♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥होश..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
होश में रहना जरुरी है, हिफाजत के लिए!
मार देंगे वो हमें वरना, सियासत के लिए!

ये है हिन्दू,ये मुसलमा,ये इसाई है यहाँ,
बाँट हमने तो लिया ,खुद को इबादत के लिए!

फोड़ दो आँखे जो देखे हवस के अंदाज़ में ,
वरना पछताओगे तुम, अपनी शराफत के ले लिए!

फिक्र है किसको यहाँ पर मुल्क के जज्बात की,
लोग बनते हैं यहाँ नेता, तिजारत के लिए!

"देव" तुम जबसे मेरे दिल, की डगर पे आये हो,
जिंदगी लगती है कम ,मुझको मोहब्बत के लिए!"

...............चेतन रामकिशन "देव".................
दिनांक-२५.०३.२०१३


Saturday, 23 March 2013

♥♥अँधा कानून..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥अँधा कानून..♥♥♥♥♥♥♥♥♥
कातिल तो क़त्ल करके, रिहा होने लगा है!
मजलूम तो हर रोज, तबाह होने लगा है!

कानून ने पट्टी, यहाँ आँखों पे बांध ली,
अब झूठ यहाँ, सच का गवाह होने लगा है!

सांसों को अपनी बेच के, ले आया दवाई,
लफ्जों के दिल में दर्द, अथाह होने लगा है!

बचपन भी रहा दर्द में, और दुख में जवानी,
अब देखो मेरा, गम से निकाह होने लगा है!

ए "देव" मेरे मुल्क का, कैसा निजाम है,
मैं सच को सच लिखूं तो, गुनाह होने लगा है!"

................चेतन रामकिशन "देव"...............
( २३.०३.२०१३)

Friday, 22 March 2013

♥♥ हालात..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥ हालात..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
अपने हालात पे रोकर भी, क्या मैं पाउँगा!
सूखे पत्तों की तरह, पेड़ से गिर जाऊंगा!

याद आयेंगे तुम्हें, लम्हें मेरी चाहत के,
तेरी महफ़िल में गज़ल, जब मैं गुनगुनाऊंगा!

मुझको अंदाजा है, के जीत अभी मुश्किल है,
फिर भी तकदीर को, मैं अपनी आजमाऊंगा!

अपने माँ बाप से, जलने का हुनर सीखा है,
मैं अंधेरों से कभी, खौफ नहीं खाऊंगा!

चाँद पे घर हो तमन्ना, मैं "देव" रखता नहीं,
हाँ मगर सबकी निगाहों में, घर बनाऊंगा!"

............चेतन रामकिशन "देव".............
( २२.०३.२०१३)


♥♥खून की होली.♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥खून की होली.♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
खून की होली खेल रहा है, आज ये भारत देश!
भीग गया है खून से दामन, भीग रहा गणवेश!
फिजा में देखो गूंज रहा है, हत्याओं का शोर,
आज मनुज से लुप्त हो रहे, मानव के अवशेष!

प्रेम भाव के रंगों से अब, रंगत लुप्त हुयी है!
गुंजियों से भी अपनेपन की, खुशबु सुप्त हुयी है!

रहना सहना बदल गया, बदल गया परिवेश!
रक्त की होली खेल रहा है, आज ये भारत देश...

निर्ममता से आज हो रहा, नारी का अपमान!
भूख प्यास से निकल रही है, निर्धन जन की जान!
मंचों से कहते हैं नेता, भारत उदय हुआ है,
किन्तु आज भी फुटपाथों पे, सोता हिंदुस्तान!

नेताओं के घर उड़ता है, देखो रंग गुलाल!
इधर देश का निर्धन तबका, बेबस और कंगाल!

सच्चाई का गला रेतता, मिथ्या का आदेश!
रक्त की होली खेल रहा है, आज ये भारत देश...

रंग लगाने तक न सिमटे, होली का त्यौहार!
नहीं लुटे नारी की इज्ज़त, न हो अत्याचार!
"देव" न रखे कोई मानव, अपने मन में बैर, 
एक दूजे पे नहीं करें हम, पीड़ा की बौछार!

तभी आत्मा तक पहुंचेगा, होली का संगीत!
और जहाँ में हो जाएगी, मानवता की जीत!

चलो करें हम प्रेषित सबको, प्रेम का ये सन्देश!
रक्त की होली खेल रहा है, आज ये भारत देश!"
"
देश का कोई कोना, कोई स्थल, कोई स्थान, हिंसा, द्वेष से अछूता नहीं! लोग कभी मजहब के नाम पर खून बहाते हैं तो कभी दौलत के लिए..कभी कोई नारी की इज्ज़त को छिन्न-भिन्न कर देता है तो कभी नेताओं की उपेक्षा से, देश का निर्धन तबका भूखे पेट मर जाता है, चिंतन करना होगा, वरना " खून की होली" पर विराम नहीं लग सकता!"

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-२२.०३.२०१३ 

"
सर्वाधिकार सुरक्षित.."
मेरी ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित!"

Thursday, 21 March 2013

♥♥चांदनी का सफर..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥चांदनी का सफर..♥♥♥♥♥♥♥
चाँद बनकर के जरा, साथ मेरे जलते रहो!
है सफ़र लम्बा जरा, साथ मेरे चलते रहो!

जिंदगी दर्द में भी, तुमको रास आएगी,
वक़्त के साथ मेरे यार, जरा ढ़लते रहो!

मेरा दावा है के सच्चाई छुप नहीं सकती,
झूठ के साथ भले, सारा जहाँ छलते रहो!

भूल से भी न कभी मौका, सही खो देना,
ऐसा न हो के सदा, हाथ यहाँ मलते रहो!

"देव" मखमल की तरह, जिंदगी हो जाएगी,
ख्वाब बनकर के निगाहों में, जरा पलते रहो!"

..............चेतन रामकिशन "देव"................
( २१.०३.२०१३)

♥♥जिंदा लाश..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥जिंदा लाश..♥♥♥♥♥♥♥♥♥
दर्द के डर से कभी, जिंदा लाश मत होना! 
देखकर गम को कभी, तुम उदास मत होना!

लोग तुमसे जो, यहाँ दूरी बना लें यारों,
झूठ का तुम कभी, ऐसा लिबास मत होना!

जिंदगी एक ही रिश्ते पे, खत्म होती नहीं,
कोई जाए भी मगर, तुम निराश मत होना!

चंद सिक्कों के लिए बेच दो, ईमान तलक,
अपनी इच्छाओं के, इतने भी दास मत होना!

"देव" जीवन में कभी हार, कभी जीत मिले,
हार जाओ भी मगर, तुम हताश मत होना!"

............चेतन रामकिशन "देव"...........
( २०.०३.२०१३)

Tuesday, 19 March 2013

♥♥मन की सरगम..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥मन की सरगम..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मेरे मन की सरगम हो तुम, अंतर्मन का गान!
सखी तुम्हारे प्रेम से रहते, मेरे तन में प्राण!
तुम ज्योति जलते दीपक की, तुम सूरज की धूप,
तुम्ही चाँदनी की शीतलता, भोर का तुम आहवान!

सदा ही मेरे साथ चलीं तुम, थाम के मेरा हाथ!
हर पीड़ा में, हर उलझन में, दिया है तुमने साथ!

सखी तुम्हारे प्रेम से हो गई, हर मुश्किल आसान!
मेरे मन की सरगम हो तुम, अंतर्मन का गान....

तुम निर्देशन, तुम अवलोकन, तुम करती सहयोग!
सखी तुम्हारे प्रेम से देखो, मिटा दुखों का रोग!
तुम सावन की मधुरम वर्षा, तुम उपवन का फूल,
तुम्ही तेज हो मुखमंडल का, तुम्ही हर्ष का योग!

सखी तुम्हारे प्रेम से होता, उर्जा का संचार!
सखी तुम्हारे प्रेम से सुन्दर, लगता है संसार!

तुम गौरव हो जीवन पथ का, तुम मेरा सम्मान!
मेरे मन की सरगम हो तुम, अंतर्मन का गान..

बड़ा ही गहरा होता है ये, प्रेम का अदभुत रंग!
अंतिम क्षण तक साथ रहूँगा, सखी तुम्हारे संग!
सखी तुम्हारे प्रेम का जबसे, किया "देव" ने बोध,
तबसे हमको पीड़ा दुःख ने, नहीं किया है तंग!

बड़े ही प्यारे, बड़े ही सुन्दर, सखी तेरे उदगार!
सखी बड़ा ही सुखमय लगता, तेरे प्रेम का सार!

तुम्ही नयनों का दर्शन हो, तुम्ही हमारा ध्यान!
मेरे मन की सरगम हो तुम, अंतर्मन का गान!"
"
प्रेम-एक ऐसा सम्बन्ध, एक ऐसी अनुभूति, जिसका प्रकाश, जीवन के भौतिक तिमिर को ही नहीं अपितु मानसिक तिमिर को भी, उज्जवल करता है! प्रेम, जहाँ होता है वहां, अपनत्व की संभावनायें, अत्यंत प्रबल होती हैं! तो आइये प्रेम करें.."

"
चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-१९.०३.२०१३ 

"
मेरी ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व-प्रकाशित.."

Sunday, 17 March 2013

♥♥प्रेम का समर्थन..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्रेम का समर्थन..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
समर्थन प्रेम का चाहूं, नहीं हिंसा की ख्वाहिश है!
नहीं हसरत है दौलत की, नहीं धन की सिफारिश है!
सभी के दिल में उल्फ़त का, सुनहरा नूर जग जाए,
यही कुदरत से विनती है, यही मेरी गुजारिश है!

ये नफरत का जहर, पोषण किसी का कर नहीं सकता!
किसी मानव के घावों को, कभी ये भर नहीं सकता!

कभी गैरों से रंजिश हो, कभी अपनों की साजिश है!
समर्थन प्रेम का चाहूं, नहीं हिंसा की ख्वाहिश है....

किसी को लूटकर, बेशक के राजा बन तो जाओगे!
मगर अपनी निगाहों से, नजर कैसे मिलाओगे!
अदालत तुमको दुनिया की, भले ही माफ़ कर दे पर,
मगर तुम अपने जुर्मों को, यहाँ कैसे भुलाओगे!

यहाँ वो लोग ही मरकर के, हर पल याद आते हैं!
जो अपने लोभ में देखो, नहीं जग को सताते हैं!

जहाँ है "देव" मानवता, वहां खुशियों की बारिश है!
समर्थन प्रेम का चाहूं, नहीं हिंसा की ख्वाहिश है!"

.................चेतन रामकिशन "देव"...............
( १८.०३.२०१३)

♥♥गहरा समुन्दर..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥गहरा समुन्दर..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
समुन्दर हो भले गहरा, किनारा मिल ही जाता है!
मेरी माँ की दुआओं से, सहारा मिल ही जाता है!

कभी दिल की निगाहों से, जरा देखो तो अम्बर में,
यहाँ तकदीर का अपनी, सितारा मिल ही जाता है!

भले है भीड़ गैरों की, भले रंजिश हजारों हैं,
मगर फिर भी कोई, फूलों सा प्यारा मिल ही जाता है!

कभी हारो नहीं हिम्मत, न खुद को लड़खड़ाने दो,
यहाँ मेहनत से खुशियों का, नजारा मिल ही जाता है!

हमेशा दर्द को अपने, बड़ा तुम "देव" न समझो,
सभी की आंख में आंसू, ये खारा मिल ही जाता है!"

...................चेतन रामकिशन "देव".................
( १७.०३.२०१३)


Saturday, 16 March 2013

♥♥अनुभूति की जल धारा..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥अनुभूति की जल धारा..♥♥♥♥♥♥♥♥♥
अनुभूति की जल धारा में, जब मन को स्नान कराया!
पत्थर ने भी कोमल होकर, देखो मुझको गले लगाया!
अनुभूति से पहले जिनको, मीलों दूर समझता था मैं,
जबसे से जागी है अनुभूति, हर स्थल पर उनको पाया!

बिन अनुभूति के जीवन में, नहीं भावना दया की आए!
लोग सड़क पर घायल तड़पें, कोई न उनको दवा दिलाए!

जिसके मन में अनुभूति हो, उसने सबको गले लगाया!
अनुभूति की जल धारा में, जब मन को स्नान कराया...

जब से मैंने अपने मन में, अनुभूति का बोध किया है!
तब से मैंने नीरसता के, हर पथ को अवरोध किया है!
"देव" मुझे इस अनुभूति ने, शिक्षा ध्यान लगाने की दी,
इसी ध्यान के बल पर मैंने, इस जीवन का शोध किया है!

जिसके मन में अनुभूति के, व्यापक भाव नहीं होते हैं!
किसी ओर के दुख से उसके, मन में घाव नहीं होते हैं!

इस अनुभूति ने ही देखो, नदी का कल कल गान सुनाया! 
अनुभूति की जल धारा में, जब मन को स्नान कराया!"

..................चेतन रामकिशन "देव"..................
( १७.०३.२०१३)



Friday, 15 March 2013

♥♥पीड़ा का अंकुरण..♥♥


♥♥♥पीड़ा का अंकुरण..♥♥♥
हुआ अंकुरण फिर पीड़ा का,
दवा, खाद, इसको जल दे दूँ!

हर्ष की दीमक इसे न मारे,
इसे जरा इतना बल दे दूँ!

हर्ष क्षणिक होता है किन्तु,
पीड़ा लम्बा साथ निभाए!

पीड़ा मन को शक्ति देकर,
अंधकार में दीप जलाए!

बिन पीड़ा के "देव" ये मानव,
नहीं समझ पाता है दुख को,

पीड़ा ग्राही व्यक्ति का मन,
कुछ करने की ललक जगाए!

सूखा इसको सुखा सके ने,
अश्रु धारा अविरल दे दूँ!

हुआ अंकुरण फिर पीड़ा का,
दवा, खाद, इसको जल दे दूँ!"

...चेतन रामकिशन "देव"...
     (१५.०३.२०१३)






Wednesday, 13 March 2013

♥♥मारक क्षमता..♥♥




♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥मारक क्षमता..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
ह्रदयविदारक घटनाओं की, मारक क्षमता में वृद्धि है!
नहीं पता के इस दुनिया की, कैसी अब ये उपलब्धि है!
कमजोरों का रक्त चूसकर, लोग यहाँ पर घर भरते हैं,
लूटपाट कर महल बनाना, आखिर कैसी सम्रद्धि है!

धन दौलत की चकाचौंध में, मानवता विस्मृत कर बैठे!
आज के मानव अपने हित में, संबंधों को मृत कर बैठे!

मन ही साफ नहीं होगा तो, हवनकुंड में कब शुद्धि है!
ह्रदयविदारक घटनाओं की, मारक क्षमता में वृद्धि है...

मानवता की हत्या करके, सुखमय होना सही नहीं है!
नैतिकता और अपनेपन का, क्षय होना भी सही नहीं है!
"देव" ये सच है पीड़ादायक, दशा सभी के जीवन में हैं,
किन्तु फिर भी हिंसा की ये, जय होना भी सही नहीं है!

द्वेष भावना भड़काने को, धर्म का ये प्रचार नहीं हो!
मानव होकर मानवता पे, अब ये अत्याचार नहीं हो!

सुन्दर सोच नहीं हो सकती, जब तक ये विकृत बुद्धि है!
ह्रदयविदारक घटनाओं की, मारक क्षमता में वृद्धि है!"

..................चेतन रामकिशन "देव"..................
दिनांक-१४.०३.२०१३


♥♥फिरती नजरें..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥फिरती नजरें..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
जैसे आँखों से अश्कों की, बूंदें झर झर गिर जाती हैं!
उसी तरह से अब अपनों की, नजरें देखों फिर जाती हैं!

जब भी तुम मिलते हो मुझको, एक उजाला सा होता है,
बिना तुम्हारे इस जीवन में, गम की रातें घिर जाती हैं!

कानूनों के दुश्मन हैं जो, उनका चेहरा खिला खिला है,
और यहाँ इल्जाम की चोटें, मजलूमों के सिर आती हैं!

हाँ सच है के झूठ की रंगत, बहुत लुभाती हैं आँखों को,
लेकिन एक दिन आता है जब, झूठ की परतें चिर जाती हैं!

"देव" कभी नाकामी से तुम, हाथ पे हाथ नहीं रख लेना,
मेहनत की ताकत से देखो, यहाँ बहारें फिर आती हैं!"

..................चेतन रामकिशन "देव"................
दिनांक-१३.०३.२०१३

Tuesday, 12 March 2013

♥♥प्यार का पंछी..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्यार का पंछी..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
पंछी बनकर उड़ आना तुम, आकर मुझको गीत सुनाना!
और तुम बनकर हवा का झोंका, हमदम मेरा घर महकाना!
एक दूजे का हाथ पकड़कर, धवल चांदनी में घूमेंगे,
कुछ तुम मेरे दिल की सुनना, कुछ तुम अपना हाल बताना!

खुले आसमां के नीचे जब, अपने दिल की बातें होंगी!
होगा आलम बड़ा सुहाना, प्यार भरी बरसातें होंगी!

इस बारिश में भीग के हमदम, जुल्फों से मोती बिखराना!
पंछी बनकर उड़ आना तुम, आकर मुझको गीत सुनाना!"

..........................चेतन रामकिशन "देव".......................
दिनांक-१२.०३.२०१३

♥♥नाम के रिश्ते..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥नाम के रिश्ते..♥♥♥♥♥♥♥♥♥
नाम के रिश्ते तो एक पल में चटक जाते हैं!
लोग दौलत के लिए, राह भटक जाते हैं!

मुझको भाता है बहुत देखना उस वक्त उन्हें,
वो मेरे सामने जब जुल्फें, झटक जाते हैं!

देखो नेताओं को सब कुछ ही हजम होता है,
बिना पानी के ये ताबूत सटक जाते हैं!

वैसे सब कहते हैं, बेटी को रूप दुर्गा का,
फिर भी बेटी को ही सड़कों पे, पटक जाते हैं!

अपने रिश्तों की यहाँ, "देव" जरा कद्र करो,
नहीं मिलते हैं वो, देखो जो छिटक जाते हैं!"

............चेतन रामकिशन "देव".............
दिनांक-१२.०३.२०१३

Monday, 11 March 2013

♥♥सौहार्द का संसार..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥सौहार्द का संसार..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
ईद और लोहड़ी हों सब के, और दीवाली भी सबकी हो!
एक दूजे से प्रेम करें सब, और खुशहाली भी सबकी हो!

ध्वस्त हों मजहब की दीवारें, मानवता सबकी प्यारी हो!
नफरत के कांटे हट जायें, महकी महकी फुलवारी हो!
एक ऐसा संसार बने बस, जिसमें मानव ही मानव हों,
रहे सदा नारी की गरिमा, न कोई मारा-मारी हो!

रंग बिरंगे मौसम सब के, नभ की लाली भी सबकी हो!
ईद और लोहड़ी हों सब के, और दीवाली भी सबकी हो...

हिंसा के हथियार नहीं हो, सोच हो सबकी फूलों जैसी!
बस पींगे हो मेलजोल की, सावन के झूलों के जैसी!
"देव" रहें सब समरसता में, हमदर्दी सबको सबसे हो,
द्वेष रहे न मन में कोई, सोच न हो शूलों के जैसी!

भूख से कोई जन न तड़पे, भोजन की थाली सबकी हो!
ईद और लोहड़ी हों सब के, और दीवाली भी सबकी हो!"

..................चेतन रामकिशन "देव"....................
दिनांक-१२.०३.२०१३

Sunday, 10 March 2013

♥♥सच का शिलालेख...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥सच का शिलालेख...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
कभी किसी के मन का दर्पण, तुम देखो खंडित न करना!
अपने साधन के हित में तुम, मिथ्या को मंडित न करना!
काम करो तुम ऐसा जिससे, मानवता को ठेस न पहुंचे,
तुम मानव से दानव बनकर, मानवता दंडित न करना!

भले झूठ की चाल हो गहरी, किन्तु उसकी मात हुई है!
सच की किरणें करें उजाला, फिर सुन्दर प्रभात हुई है!

ज्ञान से निर्धारण करना तुम, जात से तुम पंडित न करना!
कभी किसी के मन का दर्पण, तुम देखो खंडित न करना...

मन में सपने रखते हो तो, उन्हें सार्थक करना सीखो!
फूलों की इच्छायें हैं तो, काँटों पर भी चलना सीखो!
बस अम्बर की ओर देखकर, "देव" नहीं ऊंचाई मिलती,
यदि गगन को चाहते हो तो, उड़ने का बल भरना सीखो!

सच की बातें सच होती हैं, उनको थोथी नहीं समझना!
सदाचार की पुस्तक को तुम, केवल पोथी नहीं समझना!

सच से उभरे शिलालेख को, तुम देखो खंडित न करना!
तुम मानव से दानव बनकर, मानवता दंडित न करना!"

..................चेतन रामकिशन "देव"....................
दिनांक-११.०३.२०१३



♥♥प्यार का गंगाजल..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्यार का गंगाजल..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
बेशक पूरा जीवन न दो, मगर मुझे तुम्हें कुछ पल दे दो!
जिससे हिम्मत बढ़े हमारी, तुम चाहत का वो बल दे दो!
देखो साथी बिना तुम्हारे, धूल गमों की चिपट रही है,
मैं भी पावन हो जाऊंगा, प्यार का तुम गंगाजल दे दो!

हाँ सच है के बिना तुम्हारे, यूँ तो मैं जिन्दा रहता हूँ!
पर ये भी तो झूठ नहीं के, भीतर से बेदम रहता हूँ!

आज भले ही ठुकरा दो पर, मुलाकात को तुम कल दे दो!
बेशक पूरा जीवन न दो, मगर मुझे तुम्हें कुछ पल दे दो....

तुम बिन साथी तन्हाई के, बादल मुझ पर मंडराते हैं!
तुम बिन मेरी आँखों से यूँ, पल पल आंसू झर जाते हैं!
बिना तुम्हारे आंच तड़प की, मेरे मन को झुलसाती है,
तुम बिन हम तो अँधेरे में, बच्चों जैसे डर जाते हैं!

रस्ता तुम बिन नहीं सूझता, कदमों को ठोकर मिलती है!
"देव" मैं कोशिश करता हूँ पर, तुम बिन ये किस्मत छलती है!

घनी मुश्किलों में उलझा हूँ, तुम मुझको इनका हल दे दो!
बेशक पूरा जीवन न दो, मगर मुझे तुम्हें कुछ पल दे दो!"

......................चेतन रामकिशन "देव".....................
दिनांक-१०.०३.२०१३

Saturday, 9 March 2013

♥नुकीला दंत♥


♥♥♥♥नुकीला दंत♥♥♥♥
मानवता का अंत हो रहा,
पापी भी अब संत हो रहा,
जात-पात और धर्मवाद का,
बड़ा नुकीला दंत हो रहा!

जगह जगह बैठे उपदेशक,
लोगों को उपदेश सुनाते!
लोगों से धन ऐंठ ऐंठ कर,
अपने घर को महल बनाते!
बड़े जोर से कहते हैं ये,
ईश्वर की मूरत न कोई,
यही लोग फिर न जाने क्यूँ, 
अपनी मूरत को पुजवाते!

भोले लोगों के घर पतझड़,
इनके यहाँ बसंत हो रहा!
जात-पात और धर्मवाद का,
बड़ा नुकीला दंत हो रहा...

खुद को ईश्वर भक्त बताकर,
ईश्वर को विक्रय करते हैं!
यही लोग लोगों के मन में,
नए नए संशय करते हैं!
यही लोग अपने वचनों से,
"देव" सदा चर्चा में रहते,
ढोंग-दिखावा करके हरदम,
सब की किस्मत तय करते हैं!

नहीं कहा जाता शब्दों में,
रोष यहाँ अत्यंत हो रहा!
जात-पात और धर्मवाद का,
बड़ा नुकीला दंत हो रहा!"

..चेतन रामकिशन "देव"..
दिनांक-१०.०३.२०१३

♥♥इंसानियत की राह..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥इंसानियत की राह..♥♥♥♥♥♥♥♥
कभी इंसानियत की राह से, तुम दूर न होना!
भले दौलत हो कितनी भी, कभी मगरूर न होना!

किसी के बिन जमाने में, जो तुम जिंदा न रह पाओ,
मोहब्बत में कभी इतने बड़े, मजबूर न होना!

तरस जायें जो घर के लोग, एक रोटी के टुकड़े को,
कभी दारू की बोतल में, यूँ ऐसे चूर न होना!

तुम्हारा दिल परेशां हो, तुम्हारी रूह दे लानत,
इमां को बेचकर जग में, कभी मशहूर न होना!

हुनर को "देव" कर लो तुम, उजालों की तरह रौशन,
किसी अपनी ही गलती से, कभी बेनूर न होना!"

...............चेतन रामकिशन "देव"..............
दिनांक-०९.०३.२०१३

Friday, 8 March 2013

♥♥जीवन की गतियां..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥जीवन की गतियां..♥♥♥♥♥♥♥♥♥
हो मंजर दर्द का या फिर, खुशी की जिंदगानी हो!
हंसी की धूप खिल जाए, या फिर आँखों में पानी हो!
यही जीवन की गतियां हैं, इन्हीं के साथ तुम चलना,
कभी बारिश, कभी पतझड़, कभी ये रुत सुहानी हो!

कभी तन्हाई मिलती है, कभी मिलने के पल आते!
कभी आती बहारें हैं, कभी खिलने के पल आते!

सदा तुम बोलना सच ही, भले दुनिया बैगानी हो!
हो मंजर दर्द का या फिर, खुशी की जिंदगानी हो...

सवेरा हो, अँधेरा हो, कभी दिन रात होते हैं!
कभी अनदेखे, अनजाने, नए जज्बात होते हैं!
वही मंजिल को पाते हैं, जो अपने शौक को भूलें,
जिन्हें कुछ करना होता है, कहाँ वो लोग सोते हैं!

ये ऐसे लोग जो अवसर, पकड़ना भूल जाते हैं!
सदा ये कोसते खुद हो, सदा आंसू बहाते हैं!

नहीं वो हार से डरते, वो जिनको जीत पानी हो!
हो मंजर दर्द का या फिर, खुशी की जिंदगानी हो!"

.............चेतन रामकिशन "देव"..............
दिनांक-०९.०३.२०१३

♥दर्द का शोर..♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥दर्द का शोर..♥♥♥♥♥♥♥♥♥
शोर है दर्द का, ख़ामोशी अख्तियार करें!
आओ कुछ देर के, तन्हाई से अब प्यार करें!

वो नहीं आए तो, दिल अपना क्यूँ छोटा करना,
आओ आकाश में अब चाँद का, दीदार करें!

जिंदगी का तो नहीं होता, भरोसा कोई,
कैसे फिर बैठ के हम, कल का इंतजार करें!

खून का प्यासा यहाँ आदमी, अब होने लगा,
ऐसे हालात में अब किस पे, ऐतबार करें!

जिसके चेहरे से मुझे "देव", खुशी मिलती हो,
कैसे हम उसके बिना, गम का सफर पार करें!"

............चेतन रामकिशन "देव"................
दिनांक-०८.०३.२०१३ 

Thursday, 7 March 2013

♥नारी का अलंकरण..♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥नारी का अलंकरण..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
नारी के सम्मान का चिंतन, अपने मन में भरना होगा!
भ्रूण में पुत्री का स्वागत कर, उसका संकट हरना होगा!
केवल बातें करने भर से, नारी सम्मानित नहीं होती,
हमको नारी के जीवन का, सदा अलंकरण करना होगा!

नारी भी है पुरुषों जैसी, उसका जीवन व्यर्थ नहीं है!
हम पुरुषों के इस जीवन का, बिन नारी के अर्थ नही है!

नारी को पीड़ित करने की, सोच से हमको डरना होगा!
नारी के सम्मान का चिंतन, अपने मन में भरना होगा...

नारी मन की अभिलाषा का, दमन नहीं करना है हमको!
लोभ स्वार्थ में पड़ नारी का, दहन नहीं करना है हमको!
हमको नारी की पीड़ा की, अनुभूति करनी ही होगी,
नारी मन की पीड़ाओं को, गहन नहीं करना है हमको!

नारी प्रेम की संवाहक है, नारी का मन बड़ा दयालु!
उसका ह्रदय बहुत बड़ा है, नारी होती है कृपालु! 

हमको नारी के अश्रु के, संग संग देखो झरना होगा!
नारी के सम्मान का चिंतन, अपने मन में भरना होगा...

एक दिन की अपनायत देकर, नहीं वर्ष भर उसे रुलाना!
न उसको आरोपित करना, न ही उसका ह्रदय दुखाना!
बिन नारी के इस दुनिया में, जनम पुरुष को मिल न पाए,
इसीलिए तुम भूले से भी, नारी का मन नहीं सताना!

बिना नारी के प्रकृति भी, नहीं संतुलित हो सकती है!
बिन नारी के मनुज श्रंखला, नहीं अंकुरित हो सकती है!

"देव" हमे नारी जीवन को, सदा सुसज्जित करना होगा!
नारी के सम्मान का चिंतन, अपने मन में भरना होगा!"

"
नारी-प्रकृति की ऐसी कृति, जिसके बिन ये जग सम्पूर्ण नहीं, जो अनेकों दायित्वों का निर्वहन, पुरुष समाज के लिए, बड़े ही अपनत्व के साथ करती है, किन्तु इसके पश्चात भी, इस कोमल ह्रदयी नारी को, इसी पुरुष वर्ग के हाथों दंड मिलता है, आरोप मिलते हैं, तो आइये चिंतन करें और नारी के जीवन को, सम्मान से अलंकृत करें..."

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-०८.०३.२०१३ 

"सर्वाधिकार सुरक्षित"
"मेरी ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित."

Monday, 4 March 2013

♥परिस्थति..♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥परिस्थति..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तुम विपरीत परिस्थतियों में, अपना साहस सुप्त न करना!
बस प्रभाव जमाने भर को, मिथ्या को प्रयुक्त न करना!
इस दुनिया में हर व्यक्ति ही, मार्ग सफलता का चाहता है,
किन्तु अपनी तृष्णा में तुम, नैतिकता को लुप्त न करना! 

समरसता से रहना सीखो, मधुर सुरीला गान बनो तुम!
जिसे देखकर मन पुलकित हो, इक ऐसे इंसान बनो तुम!

कभी सफलता की इच्छा में, अपना मन अभियुक्त न करना!
तुम विपरीत परिस्थतियों में, अपना साहस सुप्त न करना...

न तन से सम्बन्ध रखो तुम, मन से मन का नाता जोड़ो!
नहीं समझता जो मानवता, उस व्यक्ति से मिलना छोड़ो!
इस जीवन का अर्थ सार्थक, उसी दशा में संभव होगा,
तुम औरों को सीख से पहले, अपने जीवन का रुख मोड़ो!

कभी किसी को पीड़ा देकर, तुम सुख के अवसर न पाना!
बड़ी खुशी पायेगा मनवा, किसी के दुख में साथ निभाना!

इस आधुनिक परिवेश में, मर्यादा उन्मुक्त न करना!
तुम विपरीत परिस्थतियों में, अपना साहस सुप्त न करना...

अपने पढ़े-लिखे मन से तुम, काम कोई छोटा न मानो!
बिन मेहनत के कुछ नहीं मिलता, इस युक्ति की कीमत जानो!
"देव" निराशा में रहने से, बस जीवन कुंठित होता है,
तुम मन में आशायें भर कर, अपनी मंजिल को पहचानो!

एक दिन में ही कुछ नहीं मिलता, इसीलिए संतोष करो तुम!
नहीं डिगो तुम लक्ष्य से अपने, न ही मन में रोष करो तुम!

भूले से भी इस युक्ति को, तुम मन से आमुक्त न करना!
तुम विपरीत परिस्थतियों में, अपना साहस सुप्त न करना!"

"
जीवन-कभी दुख, कभी पीड़ा, कभी विरह तो कभी दंड, किन्तु जीवन की इन दशाओं में, साहस, मेहनत और आत्मविश्वास की युक्ति से जीवन को गतिशीलता मिलती है, तो आइये जीवन को गतिशील बनायें.."

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-०५.०३.२०१३

"सर्वाधिकार सुरक्षित"
मेरी ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित"

Sunday, 3 March 2013

♥♥मेरी तस्वीर.♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥मेरी तस्वीर.♥♥♥♥♥♥♥♥
तस्वीर मेरी दिल में, वसाकर तो देखिये!
तुम प्यार का एक दीप, जलाकर तो देखिये!

जलती हुए आँखों को भी, मिल जाएगी ठंडक,
तुम गीत के यहाँ, प्यार के गाकर तो देखिये!

हिन्दू नहीं, मुस्लिम, तुम्हें इन्सान मिलेगा,
नफरत की ये दीवार, गिराकर तो देखिये!

दिल भी करार पायेगा और रूह भी सुकूं,
रोटी किसी भूखे को, खिलाकर तो देखिये!

न "देव" घुटन दिल में, कोई अपने रहेगी,
तुम सच को यहाँ, सच ही बताकर तो देखिये!"
...........चेतन रामकिशन "देव"............
दिनांक-०३.०३.२०१३

Friday, 1 March 2013

♥रूह के आंसू..♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥रूह के आंसू..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
आँखों में नमी, दिल में दुखन होने लगी है!
गम इतना है के, रूह मेरी रोने लगी है!

मरते हुए इन्सां को, बचाता नहीं कोई, 
इंसानियत भी लगता है, के सोने लगी है!

बारूद से धरती की कोख, भरने लगे सब,
मिट्टी भी अपनी गंध को, अब खोने लगी है!

आँखों में अँधेरा है, हाथ कांपने लगे,
लगता है उम्र मेरी, खत्म होने लगी है!

एक कौम को गद्दार यहाँ, "देव" क्यूँ कहो,
हर कौम ही अब खून से, मुंह धोने लगी है!"

............चेतन रामकिशन "देव".............
दिनांक-०१.०३.२०१३



Thursday, 28 February 2013

♥♥तौर-तरीका.♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥तौर-तरीका.♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मैं अपने हाथों से अपने, ख्वाब नहीं तोड़ा करता हूँ!
भले दर्द है पर खुशियों की, आस नहीं छोड़ा करता हूँ!
इस दुनिया में तनहा रहना, बेहतर है झूठी चाहत से,
इसीलिए झूठे लोगों से, साथ नहीं जोड़ा करता हूँ!

यही हमारा तौर-तरीका, इसी तरह मैं जी पाता हूँ!
सीने में गम रखकर भी मैं, साँझ सवेरे मुस्काता हूँ!

जो न समझे मानवता को, उससे मुंह मोड़ा करता हूँ!
मैं अपने हाथों से अपने, ख्वाब नहीं तोड़ा करता हूँ....

जिनको अपने सुख की इच्छा, जिनको अपनी खुशियाँ प्यारी!
उनसे तो दूरी अच्छी है, नहीं चाहिए उनकी यारी!
इस दुनिया की भीड़ में देखो, "देव" उसी का नाम हुआ है,
जिसने अपने लक्ष्य की खातिर, गलत काम की इच्छा मारी!

मैं विरह में रहता हूँ पर, मिलन की आशा नहीं त्यागता!
साथ हमेशा चलूँ वक्त के, आगे-पीछे नहीं भागता!

कभी किसी प्यासे के घर का, घड़ा नहीं फोड़ा करता हूँ!
मैं अपने हाथों से अपने, ख्वाब नहीं तोड़ा करता हूँ!"

.................चेतन रामकिशन "देव"...................
दिनांक-२८.०२.२०१३


Wednesday, 27 February 2013

♥ए प्यारे आजाद..♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥ए प्यारे आजाद..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
आँखों में फिर आंसू आए, पढ़ कर तेरी को कुर्बानी को!
ए प्यारे आजाद है तुम पे, नाज हर एक हिंदुस्तानी को!

आजादी की खातिर तुमने, अंग्रेजों को सबक सिखाया!
दमन हजारों भी सहकर के, अपना मस्तक नहीं झुकाया!
"देव" नहीं जन्मा है कोई, फिर आजाद के जैसा इन्सां,
जिसने अपनी मौत को चुनकर, भारत माँ का मान बढाया!

एक पल को भी सहा न तुमने, अंग्रेजों की बेमानी को!
आँखों में फिर आंसू आए, पढ़ कर तेरी को कुर्बानी को!"

.................चेतन रामकिशन "देव"...................
दिनांक-२७.०२.२०१३

(सजल नयनों के साथ, चंद्रशेखर आजाद को नमन, अनवरत...)

Tuesday, 26 February 2013

♥♥माँ(प्यार का सागर)♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥माँ(प्यार का सागर)♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
इस दुनिया के संबंधो में, माँ से बढ़कर कोई नहीं है!
माँ अपने बच्चों से पहले, एक पल को भी सोई नहीं है!
माँ के दिल जैसा दुनिया में, नहीं दयालु है कोई दिल,
माँ बच्चों का दर्द देखकर, अपनी धुन में खोई नहीं है!

बिन माँ के बच्चों से पूछो, माँ की कीमत क्या होती है!
इस धरती पर, इस दुनिया में, ईश्वर जैसी माँ होती है!

वो बच्चों के दुख को समझे, अपने दुख में रोई नहीं है!
इस दुनिया के संबंधो में, माँ से बढ़कर कोई नहीं है...

माँ की लोरी सा दुनिया में, कोई मीठा गान नहीं है!
बड़ी सरल है माँ की ममता, बिंदु भर अभिमान नहीं है!
"देव" कभी तुम भूले से भी, माँ के आंसू नहीं बहाना,
जिसको माँ का अदब नहीं हो, वो कोई इन्सान नहीं है!

माँ बच्चों की खातिर जलती, जैसे अंधियारे में ज्योति!
माँ की ममता उपवन जैसी, माँ की ममता सच्चा मोती!

माँ ने देखो अपने मन में, फसल लोभ की बोई नहीं है!
इस दुनिया के संबंधो में, माँ से बढ़कर कोई नहीं है...

माँ को सब बच्चे प्यारे हैं, माँ के मन में द्वेष नहीं है!
माँ के मन न भेद-भाव हैं, उसके मन आवेश नहीं है!
माँ शक्ति है, माँ भक्ति है, माँ पूजा के फूलों जैसी,
मेरे मन में माँ से बढ़कर, कोई इच्छा शेष नहीं है!

माँ के बिन है दुनिया सूनी, माँ जीवन की संवाहक है!
माँ बच्चों की सहयोगी है, माँ बच्चों की निर्वाहक है!

माँ ने बच्चों के आंसू से, अपनी सूरत धोई नहीं है!
इस दुनिया के संबंधो में, माँ से बढ़कर कोई नहीं है!"

"
माँ-एक ऐसा शब्द जो मात्र दो अक्षरों का युग्म है, किन्तु उसका अर्थ महाकाव्यों में भी समाहित नहीं हो सकता! इतना प्रेम, की वो सागर की तरह अमापनीय हो! जगत के संबंधों में, सर्वोत्तम माँ, तो आइये माँ को नमन करें..!"

................चेतन रामकिशन "देव"...................
दिनांक-२७.०२.२०१३

(ये रचना मेरी माँ कमला देवी एवं माँ प्रेमलता जी को समर्पित)


Sunday, 24 February 2013

♥शब्द(मेरी आवाज)♥


♥♥♥♥♥शब्द(मेरी आवाज)♥♥♥♥♥♥♥
ये शब्द मेरे दर्द की, आवाज बन गए!
ये शब्द मोहब्बत का, नया साज बन गए!
इन शब्दों की दौलत से, मुझे प्यार बहुत है,
ये शब्द ही कल में थी, यही आज बन गए!

देते हैं खुशी तो ये, कभी आंख को पानी!
बिन इनके अधूरी है ये, जीवन की कहानी!

ये शब्द मेरी जिंदगी का, नाज़ का बन गए!
ये शब्द मेरे दर्द की, आवाज बन गए...

ये शब्द हैं गीतों में, सजे हैं ये गज़ल में!
ये शब्द निराशा में, कभी होते हैं बल में!
इन शब्दों से वाचन है "देव", इनसे ही लेखन,
ये शब्द ही सच में तो, यही होते हैं छल में!

शब्दों ने यहाँ प्यार का, एहसास लिखा है!
शब्दों ने ही देखो यहाँ, इतिहास लिखा है!

ये शब्द चांदनी का, नया ताज बन गए!
ये शब्द मेरे दर्द की, आवाज बन गए!"

........चेतन रामकिशन "देव".........
दिनांक-२४.०२.२०१३