Sunday, 6 September 2015

♥♥विवशता...♥♥

♥♥♥♥♥विवशता...♥♥♥♥♥
दो पल सुकूं नहीं जीने को।
नहीं प्यास में जल पीने को।
नहीं दवाई बीमारी में,
न कपड़ा लत्ता सीने को।

बुझती आँखों पे न चश्मा,
न सोने को दरी, खाट है।
तरस तरस के मिलती रोटी,
न जीवन में ठाठ बाट है।
झूठी जनसेवा के नाटक,
करने से न थमे गरीबी,
धनिक कुचलते बेरहमी से,
निर्धन के संग मार काट है।

लोग मजाकों में लेते हैं,
पीड़ा का जीवन जीने को।
नहीं दवाई बीमारी में,
न कपड़ा लत्ता सीने को...

बेटी बिन ब्याही घर में है,
देने को कुछ माल नहीं है।
फसलों को कुदरत ने रौंदा,
हंसी ख़ुशी का हाल नहीं है।
"देव " नहीं पैरों में चप्पल,
और पांवों में फटी बिबाई,
नहीं भुजाओं में दम बाकी,
और क़दमों में चाल नहीं है।

काश हो निर्धन की सुनवाई,
विवश न हो अश्रु पीने को।
नहीं दवाई बीमारी में,
न कपड़ा लत्ता सीने को। "

........चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक-०७.०९.१५
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Saturday, 15 August 2015

♥♥वर्षा का जल...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥वर्षा का जल...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
सावन तुम बिन शुष्क शुष्क है, तुम वर्षा का जल बन जाओ। 
बिना तुम्हारे पथ दुर्गम है, साथ चलो तुम बल बन जाओ। 
सखी ये मेरी प्रेम तपस्या, उसी दिवस तो सफल बनेगी,
आज, अभी के साथ साथ तुम, अगर हमारा कल बन जाओ। 

दीर्घकाल तक, जनम जनम तक, साथ तेरा पाना चाहता हूँ। 
इस सृष्टि के हर युग में मैं, साथ तेरे आना चाहता हूँ। 
तुम शब्दों की संवाहक बन, कविता की रचना कर देना,
और मैं बनकर कंठ सुरीला, भाव तेरे गाना चाहता हूँ। 

दिवस, रात तुम साँझ, सवेरे, तुम्ही पहर, तुम पल बन जाओ। 
सावन तुम बिन शुष्क शुष्क है, तुम वर्षा का जल बन जाओ ... 

निशा में तुम हो धवल चन्द्रमा, और दिवस में तुम दिनकर हो। 
तुम धरती की हरियाली में, इन्द्रधनुष का तुम अम्बर हो। 
"देव" तुम्हारे कदम पड़े तो, आँगन में खुशियां आयीं हैं,
तुम फूलों की खुशबु में हो, तुम मीठी हो, तुम मधुकर हो। 

जिसकी छाँव में सपने देखूं, तुम ऐसा आँचल बन जाओ। 
सावन तुम बिन शुष्क शुष्क है, तुम वर्षा का जल बन जाओ। "

........चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक-१५.०८.२०१५ 
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♥कैसी आज़ादी...♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥कैसी आज़ादी...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
बेटी जब महफूज नहीं तो आखिर कैसी आज़ादी है। 
नाम पे मजहब के दंगे हैं, जगह जगह पे बर्बादी है। 
चंद अरबपतियों का होना, नहीं देश के सुख का सूचक,
आँख से परदे हटें तो देखो, भूखी कितनी आबादी है। 

बेटी जब अँधेरे में भी, सही सलामत घर आयेगी। 
उस दिन ही सच्चे अर्थों में, ये आजादी मिल पायेगी। 

सज़ा मिले क्यों बेगुनाह को, दूर पकड़ से उन्मादी है। 
आँख से परदे हटें तो देखो, भूखी कितनी आबादी है....

आज़ादी का मतलब देखो एक सूत्र में बंध जाना है।  
आज़ादी का मतलब घर घर दीपक जल जाना है। 
"देव" वतन में सबको रोटी, कपड़ा, घर भी है आज़ादी,
आज़ादी का मतलब देखो, भ्रष्ट तंत्र का मिट जाना है। 

रोजगार के बिन युवकों की, जीवन धारा अवसादी है। 
बेटी जब महफूज नहीं तो आखिर कैसी आज़ादी है। "

........चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक-१५.०८.२०१५ 
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Tuesday, 11 August 2015

♥♥प्रश्न...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्रश्न...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
नहीं आग्रह, नहीं निवेदन, न प्रस्ताव, नहीं वाचन है।
प्रेम पथिक हूँ, भाव मार्ग पर, सदा तुम्हारा अभिवादन है।
स्मृति और छवि तुम्हारी, रहे मेरे व्याकुल नयनों में,
तुम बिन जीवन सूखा पौधा, और तुम बिन एकाकीपन है।
हाँ अयोग्य-सापेक्ष तुम्हारे, पर तुम जैसे बन नहीं सकता ।
मैं काजल सा, श्वेत वर्ण बन, अम्बर से भी छन नही सकता।
किन्तु फिर भी प्रीत का अंकुर उदय हुआ मेरे मन में।
जरा बताओ प्रश्न हमारा, प्रेम है क्या वर्जित जीवन में....
तुमने मेरा पक्ष सुना न, मनोदशा को जान सके न। 
मैं भी तुम जैसा मानव हूँ, बात कभी तुम मान सके न। 
मेरे पांवों में भी कांटे, चुभकर देखो रक्त निकलता,
एकपक्षीय ऐनक से तुम, मेरा दुख पहचान सके न।
द्वार पे तुमने ताले जड़कर, प्रतिबन्ध किये दर्शन में। 
जरा बताओ प्रश्न हमारा, प्रेम है क्या वर्जित जीवन में...
ज्यादा कुछ भी नहीं कहूँगा, केवल मैं इतना कहता हूँ। 
जरा सोचना उस बिंदु को, जिस स्थल पे मैं रहता हूँ। 
"देव" यदि तुम मेरी विरह के, भावों को अनुभूत करोगे,
तो तुम भी आश्चर्य करोगे, कैसे मैं जीवित रहता हूँ।
तुम बिन जग ऐसा लगता है, जैसे मैं हूँ निर्जन वन में। 
जरा बताओ प्रश्न हमारा, प्रेम है क्या वर्जित जीवन में। "
..................चेतन रामकिशन "देव"…….................
दिनांक-११.०८.२०१५ 
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Monday, 10 August 2015

♥♥बदनसीब...♥♥

♥♥♥♥♥बदनसीब...♥♥♥♥♥♥
कोई जब बदनसीब होता है। 
दर्द कितना करीब होता है। 

बस्तियां ढहतीं वो इशारों में,
जिनमें घर घर गरीब होता है। 

एक अरबों में, एक पाई में,
क्या सभी कुछ नसीब होता है। 

बेटा हो कोख में, तो खुशियां मनें,
बेटी पे दिल अजीब होता है। 

"देव" ये दर्द, कई गुना बढ़ता,
वक़्त जब भी रक़ीब होता है। "


.....चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक-१०.०८.२०१५   
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Saturday, 8 August 2015

♥♥वजह ...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥वजह ...♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मुझसे मिलने की क्या वजह होगी। 
उसके दिल में क्या कुछ जगह होगी। 

क्या मिलेंगे मुझे मिलन के पल,
या बताओ के फिर विरह होगी। 

दर्द की रात कितनी लम्बी है,
क्या कभी इसकी भी सुबह होगी। 

रंजिशें रखता है जो मुझसे बहुत,
कैसे उस शख्स से सुलह होगी। 

वो न समझेंगे तो दुखेगा दिल,
उनसे तक़रार बेवजह होगी। 

कितना उड़ जाये पर नही वो गिरे,
सच की क़दमों में गर सतह होगी। 

"देव" जो होगा, देखा जायेगा,
या मिलन होगा के, कलह होगी। "

........चेतन रामकिशन "देव"…….
दिनांक-०८.०८.२०१५ 
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♥♥पासा...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥पासा...♥♥♥♥♥♥♥♥♥
न ही मरहम है, न दिलासा है। 
ढोंग है, झूठ है, तमाशा है। 

मेरी खिदमत बताओ अब क्यों भला,
कौनसी चाल का ये पासा है। 

प्यार का मेरे क़त्ल कर डाला,
क्या गुनाह तुमको ये जरा सा है। 

भूखे माँ बाप तरसें रोटी को,
जिनके बेटों पे नोट ख़ासा है। 

जो गुनहगार थे वो बच निकले,
बेगुनाहों को तुमने फांसा है। 

आसमां झाँका, नींद आई नहीं,
दर्द आँखों में बेतहाशा है। 

"देव" है नौजवां की बदहाली,
हाथ खाली है, और हताशा है। " 

........चेतन रामकिशन "देव"…….
दिनांक-०८.०८.२०१५ 
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Friday, 7 August 2015

♥♥जिद...♥♥

♥♥♥♥♥♥जिद...♥♥♥♥♥♥♥♥
टूटते ख्वाब जोड़ने की जिद। 
गम की चट्टान तोड़ने की जिद। 

आ रहा है जो, दर्द का तूफां,
उसको वापस ही मोड़ने की ज़िद। 

जिसने इलज़ाम ही दिये मुझको, 
वो शहर तेरा छोड़ने का ज़िद। 

वक़्त ने मेरे पंख काटे जब,
होंसला लेके दौड़ने की जिद। 

"देव" तुम प्यार से तो ले लो जां,
आँख दुश्मन की फोड़ने की जिद। "

........चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक-०७.०८.२०१५  
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Tuesday, 4 August 2015

♥शर शैय्या...♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥शर शैय्या...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
 भीष्म पिता के जैसे मुझको, शर शैय्या पे सुला दिया है। 
रक्त वो मेरा देख के हर्षित, मेरे दुःख को भुला दिया है। 
मैंने जिनके अभियोजन में, हर क्षण ही संवाद किया था,
आज उसी ने निर्ममता से, मुझको फांसी झुला दिया है। 

अंतहीन सी मानवता है, दया किसी में शेष नहीं है। 
पत्थर जैसे हृदय हुये हैं, भावों का अवशेष नहीं है। 
धनिकों के तो जरा घाव पर, यहाँ चिकित्सक बहुत खड़े पर,
किन्तु देखो स्वास्थ्य गृहों में, निर्धन का प्रवेश नहीं है। 

कल तक जिसमें खेला था वो, उस घर को ही जला दिया है। 
भीष्म पिता के जैसे मुझको, शर शैय्या पे सुला दिया है... 

जाने कैसा काल, समय है, जाने क्या जीवन यापन है। 
यहाँ भूख से मरता कोई, और कहीं पैसों का वन है। 
"देव " किसी की आँख में आंसू, फर्क नहीं पर पड़ता कोई,
अंदर से मन में कालापन, और बाहर से उजला तन है। 

मेरे कोमल अंतर्मन को, अम्ल धार से जला दिया है। 
भीष्म पिता के जैसे मुझको, शर शैय्या पे सुला दिया है।"

..................चेतन रामकिशन "देव"………..............
दिनांक-०४.०८.२०१५
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Saturday, 11 July 2015

♥♥प्रेम घटक...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्रेम घटक...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तुम्हें लगा वो मृगतृष्णा थी, मुझे लगा वो प्रेम घटक था। 
मैं अपने मन से रत्नाकर, तुम्हे लगा के मैं पावक था। 
अपने भावों का सत्यापन, निशा दिवस तुमसे करके भी,
तुमने संज्ञा दे दी मुझको, मैं पीड़ा का संवाहक था। 

अविरल जब है प्रेम की धारा, उसे लोग बाधक करते हैं। 
नहीं सुनेगे भाव किसी के, केवल अपनी हठ करते हैं। 

श्राप दिया उसने ही मुझको, मैं तो जिसका आराधक था। 
तुम्हें लगा वो मृगतृष्णा थी, मुझे लगा वो प्रेम घटक था.... 


मैं मानव था, इच्छा भीं थी, पर वो भी जगदीश नहीं थे। 
मेरा मन-तन उन जैसा था, क्या उनके तन शीश नहीं थे। 
मैं भी जन था हाड़ मांस का, रक्त मेरे घावों में भी है,
क्यों कर उनके शब्दकोष में, मेरे हित-आशीष नहीं थे। 

क्या अपराध किया जो मैंने, उनको अपना सब कुछ माना। 
जिसके अश्रु पान किये थे, उसने मेरा दुःख न जाना। 

मुझको काटा निर्ममता से, वृक्ष में जबकि फलदायक था। 
तुम्हें लगा वो मृगतृष्णा थी, मुझे लगा वो प्रेम घटक था.... 

रिक्त हो गया कोष शब्द का, न कुछ भी कहने का मन है। 
अब तो इतना मान लिया के, दंड भोगना ही जीवन है। 
"देव" प्रेम के पूर्ण भाव से, सींचके पौधे भी क्या पाया,
मेरे पांवों में कांटे और, मेरे हिस्से सूखा वन है। 

सीख लिया है अनुभूति की, गंगा नहीं बहाई जाये। 
जो नहीं सुनता भाव वंदना, उसको नहीं सुनाई जाये। 

वो सक्षम थे, सुन सकते थे, मैं उनके सम्मुख याचक था। 
तुम्हें लगा वो मृगतृष्णा थी, मुझे लगा वो प्रेम घटक था। "

.........चेतन रामकिशन "देव"………
दिनांक-१२.०७.२०१५ 
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Friday, 10 July 2015

♥♥सूखी हथेली...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥सूखी हथेली...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
रही हथेली सूखी सूखी, बारिश में फैलाई भी थी। 
न बख्शा ज़ख्मों को मरहम, चोट उन्हें दिखलाई भी थी। 
आज वो लेकर हुनर प्यार का, मुझसे दूर गया तो क्या है,
एक दिन मुझको रीत प्यार की, उसने ही सिखलाई भी थी। 

लेकिन जब जाना होता है, तो आना ये क्यों होता है। 
कोई बिछड़ कर जाता है तो, दिल आखिर ये क्यों रोता है। 
यदि कुचलना ही होता है, यौवन धारित हरे वृक्ष हो,
तो मानव फिर बीज नेह के, किसी के मन में क्यों बोता है। 

चलो जिंदगी गयी भी तो क्या, क़र्ज़ में यूँ तो पाई भी थी। 
रही हथेली सूखी सूखी, बारिश में फैलाई भी थी.... 

चलो दशा ये अपने मन की, और पीड़ा ये अंतर्मन की। 
न ख़्वाहिश हमको मलमल की, न हसरत मुझको सावन की। 
"देव" लिखा है जो कुदरत ने, शायद ये परिदृश्य वही है.
न इच्छा है पुनर्जन्म की, न चाहत है नवजीवन की। 

भूल गया सब गति शीलता, जो अधिगम से आई भी थी। 
रही हथेली सूखी सूखी, बारिश में फैलाई भी थी। "

.........चेतन रामकिशन "देव"………
दिनांक-११.०७.२०१५ 
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♥दूर जाने की...♥

♥♥♥♥♥दूर जाने की...♥♥♥♥♥♥
दूर जाने की बात करने लगे। 
तुम उदासी की रात करने लगे। 

क्या मिले या नहीं मिले कुछ भी,
बिन लड़े अपनी मात करने लगे। 

जिससे दिल छलनी हो, बहें आंसू,
तुम भी वो वाकयात करने लगे। 

था यकीं जिनपे खुद पे ज्यादा,
वो भी गैरों सा, घात करने लगे। 

हार जाऊं, मैं तेरा मंसूबा,
पीठ पीछे बिसात करने लगे।  

प्यार में छोटा, क्या बड़ा कोई,
आज मजहब, क्यों जात करने लगे। 

"देव" हम दोस्त थे, नहीं दुश्मन,
हमसे क्यों एहतियात करने लगे। "

.........चेतन रामकिशन "देव"………
दिनांक-१०.०७.२०१५  
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Monday, 6 July 2015

♥♥अंगारे...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥अंगारे...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
काटी रात जहर पीकर के, अब दिन में भी अंगारे हैं। 
झूठ की हिस्सेदारी जीती, और सच के प्रहरी हारे हैं। 
अपना मुख अमृत से भरकर, मुझको सौंपे ग़म के प्याले,
मेरे घर को दिया अँधेरा, खुद के घर में उजियारे हैं। 

नहीं पता क्यों लोग जहाँ के, इतने पत्थर हो जाते हैं। 
उनपे कुछ भी नहीं बीतती, घायल मरकर सो जाते हैं। 

बड़ी कष्ट की तिमिर की बेला, घर आँगन में अंधियारे हैं। 
काटी रात जहर पीकर के, अब दिन में भी अंगारे हैं...... 

बस उपहास किया करते हैं, वो अपने झूठे तथ्यों पर। 
तेज बोलकर दिखलाते हैं, वो अपने हितकर कथ्यों पर। 
"देव" किसी की आह सुनें न, बस स्वयंभू हो जाते हैं,
उनको मतलब नहीं किसी से, दृष्टि खुद के मंतव्यों पर। 

दंड दिया है लेकिन कहते, हम तो किस्मत के मारे हैं। 
काटी रात जहर पीकर के, अब दिन में भी अंगारे हैं। "


.........चेतन रामकिशन "देव"………
दिनांक-०७.०७.२०१५ 
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Thursday, 2 July 2015

♥♥♥चाँद ...♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥चाँद ...♥♥♥♥♥♥♥♥♥
चाँद हो तुम मेरी नज़र के लिये।
तुम ही रौनक हो मेरे घर के लिये।

तुम उजाला हो, रौशनी की किरण,
तुम ही सजदा हो, मेरे सर के लिये।

तेरे होने से, मैं रचूँ कविता,
तू जरुरी है के, बहर के लिये।

जिंदगी तेरे बिन अपाहिज सी,
तुम ही ख्वाहिश हो, रहगुजर के लिये।

चंद लम्हों का साथ कम लगता,
मेरी हो जाओ, उम्र भर के लिये।

रात के ख्वाबों का मिलन तुम हो,
तुम ही सूरज हो के, सहर के लिये।

"देव" तुम बिन है रास्ता तन्हा,
साथ हो जाओ तुम, सफ़र के लिये। "

..........चेतन रामकिशन "देव"………
दिनांक-०२.०७.२०१५
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Monday, 29 June 2015

♥♥नारी(स्नेही संवाहक )...♥


♥♥♥नारी(स्नेही संवाहक )...♥♥♥
तुम उत्पत्ति हो जीवन की। 
तुम सुगंध हो चंदन वन की। 
तुम नारी की छवि को धारित,
सदा योग्य तुम अभिनन्दन की। 
चन्द्र किरण की शीतलता तुम,
तुम भानु की ऊर्जा में हो,
तुम पर्याय खिले फूलों का,
तुम ही शोभा हो उपवन की। 

सहनशीलता से पूरित हो,
मृदुभाषिता की वाहक हो। 
तुम संबंधों की गरिमा हो,
तुम स्नेही संवाहक हो। 
तुम नारी हो, दूध की गंगा,
शिशुओं को सिंचित करती हो,
तुम बिन घर में कर्म रिक्तता,
तुम कर्मठ हो, निर्वाहक हो। 

तुम्ही प्राथमिक अध्यापक हो,
तुम लोरी सबके बचपन की। 
तुम पर्याय खिले फूलों का,
तुम ही शोभा हो उपवन की। 

तुम पुत्री हो, कली की भाँती,
तुम पत्नी हो, भावनिहित हो। 
तुम माँ सबसे उच्च रूप में,
तुम ममता से पूर्ण निहित हो। 
तुम बहनों के रूप में आकर,
भाई की सहयोगी बनतीं,
हर दृष्टि में तुम मधुरम हो,
इन नयनों को सदा सुहित हो। 

तुम ही मन की प्रेम नायिका,
तुम ही वर्षा हो सावन की। 
तुम पर्याय खिले फूलों का,
तुम ही शोभा हो उपवन की। 


तुम अनुक्रम हो, परिवार का,
तुम वाहक हो संस्कार का। 
तुम स्पर्श सुखद मलमल का,
तुम प्रेरक हो सदाचार का। 
"देव" जगत में बिन नारी के,
पुरुषों का अस्तित्व न होता, 
तुम वर्णित हो कविताओं में,
तुम सूचक हो अलंकार का। 

तुम कोमल भावों की वाणी,
तुम क्षमता हो, सम्मोहन की। 
तुम पर्याय खिले फूलों का,
तुम ही शोभा हो उपवन की। "


"
नारी-त्याग, समर्पण और विश्वास, प्रेम, सदाचार और सहयोग जैसे शब्दों का, यदि कोई पर्याय है तो वह नारी ही है, नारी है तो जीवन का अनुक्रम है, नारी है तो वसुंधरा की गोद भरी है। "

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-३०.०६.२०१५ 
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 "

Saturday, 27 June 2015

♥♥स्वर्ग...♥♥

♥♥♥♥♥♥स्वर्ग...♥♥♥♥♥♥♥♥
स्वर्ग सा सुन्दर जीवन तुमसे। 
हर्षित भावों का मन तुमसे। 
तुम लेखन के प्राण तत्व में,
और शब्दों का यौवन तुमसे। 
तुम आशाओं के दीपक की,
ज्योति हो, प्रकाशमयी हो,
तुमसे मुख मंडल पे आभा,
फूल सा सुन्दर ये तन तुमसे। 

तुम्ही नायिका अनुभूति की,
काव्यकला के कौशल में हो। 
तुम्हें देखकर बूंदें बरसें,
अमृत जैसे तुम जल में हो। 

वाणी भी है मिश्री जैसी,
चित्त हुआ है पावन तुमसे। 
तुमसे मुख मंडल पे आभा,
फूल सा सुन्दर ये तन तुमसे... 

तुम करुणा के सागर में हो,
बनके देवी इस घर में हो। 
तुमसे ऊर्जा मिलती मन को,
तुम ही उड़ने के पर में हो। 
"देव" तुम्हारी मधुर छटा को,
देख के सावन स्वागत करता,
निहित तुम्ही हो संघर्षों में,
तुम ही मेहनत के कर में हो। 

तुम ही वीणा में झंकृत हो,
और पायल की छन छन तुमसे। 
तुमसे मुख मंडल पे आभा,
फूल सा सुन्दर ये तन तुमसे। "

..........चेतन रामकिशन "देव"………
दिनांक-२७.०६.२०१५ 
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Thursday, 25 June 2015

♥♥शेष अभिव्यक्ति...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥शेष अभिव्यक्ति...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
कुछ लिखने को बचा नहीं है, शेष नहीं कुछ अभिव्यक्ति को। 
जिसने मन को भेद दिया हो, कैसे भूलूँ उस व्यक्ति को। 
हर क्षण वो मेरे जीवन का, सौंप गये दुःख के चरणों में,
धुंआ, धुंआ है, चंहुओर ही, जुटा हुआ हूँ मैं मुक्ति को। 

मेरा मन नीरस नीरस है, मेरा दिल भारी भारी है। 
मेरे शब्दों को पीड़ा है, वक्तव्यों में लाचारी है। 
मेरे आँगन की तुलसी भी, झुलस गयी है बारूदों से,
लगता है मेरे जीवन की, छलनी छलनी ये क्यारी है। 

नहीं समझ आता मैं उनकी, कैसे बदलूं प्रवृत्ति को। 
कुछ लिखने को बचा नहीं है, शेष नहीं कुछ अभिव्यक्ति को... 

धवल रात होने का सपना, इन नयनों ने छोड़ दिया है। 
जो दर्पण उनको दिखलाये, उसको हमने तोड़ दिया है। 
"देव" चलो एकाकीपन की, बेला में पारंगत हो लें,
साथ भला वो क्या देंगे, जो मुझको दुख से जोड़ दिया है। 

जड़वत होकर देखा करता, मैं पीड़ा की आवृति को। 
कुछ लिखने को बचा नहीं है, शेष नहीं कुछ अभिव्यक्ति को। "


.....................चेतन रामकिशन "देव"……..................
दिनांक-२५.०६.२०१५ 
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Wednesday, 24 June 2015

♥♥प्यासी रूह...♥♥

♥♥♥♥♥प्यासी रूह...♥♥♥♥♥♥
बिन तुम्हारे बहुत उदासी है। 
आँख गीली है, रूह प्यासी है। 

ऐसा लगता है मुझको तुम बिन क्यों,
जैसे के जिंदगी जरा सी है। 

घर भी सूना है और आँगन भी,
भीड़ अपनों की चाहें खासी है। 

न ही चन्दन में है महक तुम बिन,
फूल माला भी देखो वासी है। 

"देव" धरती तो भीगी बारिश में,
मेरे दिल की जमीन प्यासी है। "

......चेतन रामकिशन "देव"……… 
दिनांक-२५.०६.२०१५ 
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Saturday, 20 June 2015

♥♥बेक़रारी ...♥♥

♥♥♥♥♥♥बेक़रारी ...♥♥♥♥♥♥
आँख में अश्क़, सांस भारी है। 
आज क्यों इतनी बेक़रारी है। 

बूढ़े माँ बाप तरसे रोटी को,
वैसे बेटों की जेब भारी है। 

प्यार उसको जहाँ में कैसे मिले,
जिसने ठोकर दिलों पे मारी है।

एक दिन छोड़कर के जाना है,
ये जमीं, मेरी न तुम्हारी है। 

भाई, भाई का, हो रहा दुश्मन,
तुम पे तलवार, मुझ पे आरी है। 

सारे जग में जो सबसे है बढ़कर,
वो दुआ, मेरी माँ की प्यारी है। 

"देव " तुम आये तो लगा मुझको,
चाँद ने पालकी उतारी है। "

........चेतन रामकिशन "देव"…….
दिनांक-२०.०६.२०१५   
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Sunday, 14 June 2015

♥♥बदहवास...♥♥

♥♥♥♥♥♥बदहवास...♥♥♥♥♥♥♥
भूख बाकी है, प्यास बाकी है। 
जिंदगी बदहवास बाकी है। 

मेरी आंखें भले दीये जैसी,
रौशनी की तलाश बाकी है। 

गूंजी शहनाई, गैर की खातिर,
बिन तेरे वो उदास बाकी है। 

देह मिट्टी की मिट गयी लेकिन,
याद का वो लिबास बाकी है। 

बिक गया घर शराब की लत में,
जाम का वो गिलास बाकी है। 

बेवफा है वो पर न जाने क्यों,
उसके आने की आस बाकी है। 

"देव" नफरत ने किसको क्या बख़्शा,
खून, चीखें हैं लाश बाकी है। "

........चेतन रामकिशन "देव"…….
दिनांक-१५.०६.२०१५
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Friday, 12 June 2015

♥♥दास्ताँ ...♥♥

♥♥♥♥♥♥दास्ताँ ...♥♥♥♥♥♥♥
दास्ताँ दर्द की सुनाने को। 
गीत बाकी हैं गुनगुनाने को। 

मेरी सेहत की फिक्र तुम न करो,
सांस बाकी हैं, आज़माने को। 

प्यार है मुझसे तो चली आओ,
ताक पे रखो, इस ज़माने को। 

रुपयों पैसों की तो नहीं ख्वाहिश,
नाम चाहता हूँ, मैं कमाने को।  

एक दिन में ही कुछ नहीं मिलता,
वक़्त लगता है, सब पे छाने को। 

सबकी खातिर तो फूल भी, रेशम,
एक मेरा दिल है, चोट खाने को। 

"देव" सुनकर के आह आ जाना,
जान वरना खड़ी है, जाने को। "

........चेतन रामकिशन "देव"………
दिनांक-१३.०६.२०१५
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Thursday, 11 June 2015

♥♥मुग्ध बांसुरी ...♥♥

♥♥♥♥मुग्ध बांसुरी ...♥♥♥♥♥
प्रेम की मुग्ध बांसुरी की तरह। 
तुम तो सुन्दर हो एक परी की तरह। 
तुम ही भावों का केंद्र बिंदु हो,
मेरे जीवन में तुम धुरी की तरह। 

तुमसे मिलने का मन बहुत होता,
बिन तुम्हारे मिलन नहीं होता। 
मेरे मुख पे उदासी छा जाये,
जब तेरा आगमन नहीं होता। 

चन्द्रमा तुमको न नकारेगा,
तुम तो लगती हो सुंदरी की तरह। 
तुम ही भावों का केंद्र बिंदु हो,
मेरे जीवन में तुम धुरी की तरह..... 

तुम नदी हो, मधुर मधुर जल है l
बिना तुम्हारे नहीं कोई हल है। 
"देव " बस हर घड़ी तेरा चेहरा,
तुमसे ही मेरे कर्म का बल है। 

तेरे वाचन में है शहद कोई,
तुम तो लगती हो रसभरी की तरह। 
तुम ही भावों का केंद्र बिंदु हो,
मेरे जीवन में तुम धुरी की तरह। "

........चेतन रामकिशन "देव"………
दिनांक-११.०६.२०१५
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Wednesday, 10 June 2015

♥सूखे बाग़...♥

♥♥♥♥♥सूखे बाग़...♥♥♥♥♥
बंद कमरा, मकान खाली है। 
बाग़ सूखे, उदास माली है। 

प्यार किससे करूँ, बता तो सही,
आज हर दिल में तंगहाली है। 

मुझको झाडी में फ़ेंक या अपना,
जान क़दमों में तेरे डाली है। 

उनका काला वो धन सफेदी पर,
मेरी मेहनत का दाम जाली है। 

उनसे मिलके भी क्या सुलह करनी,
जिनकी नीयत तमाम काली है। 

कैसा दस्तूर, फूल के बदले,
उसने तलवार एक निकाली है। 

"देव" एक पल का भी भरोसा नहीं,
तुमने क्यों कल पे बात टाली है। "

........चेतन रामकिशन "देव"………
दिनांक-११.०६.२०१५
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। 

Monday, 8 June 2015

♥♥उपचार…♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥उपचार…♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मेरे भाव को रुग्ण कहा तो, कोई क्यों उपचार दिया न। 
मैं भी मानव था तुम जैसा, क्यों मेरा सत्कार किया न। 
क्या बस खुद पीड़ा व्यापक, और मेरा दुख अर्थहीन है,
तो फिर था मैं नाम का साथी, तुमने मुझको प्यार किया न। 

प्रेम के पथ पर चलने वाले, अलग अलग से कब होते हैं। 
घाव भले हो एक पक्ष को, मगर परस्पर मन रोते हैं। 
अर्थ प्रेम का होता जग में, त्याग के मैं को हम बन जाना,
नयन चार और दो मुखमंडल, पर सपने एकल होते हैं। 

पाषाणों का शिल्प किया पर, क्यों मेरा श्रृंगार किया न। 
मेरे भाव को रुग्ण कहा तो, कोई क्यों उपचार दिया न ... 

मेरे तन की त्वचा को मिटटी, और खुद को मलमल कहते हो। 
जरा बताओ किस दृष्टि से, समरसता में तुम रहते हो। 
"देव" मुखों पर श्वेत रंग को, मलकर चाँद बना न जाये,
मंच पे आकर सच का अभिनय, और पीछे मिथ्या कहते हो। 

दो तन थे, यदि एक प्राण हम, क्यों संग में विषधार पिया न। 
मेरे भाव को रुग्ण कहा तो, कोई क्यों उपचार दिया न। "

....................चेतन रामकिशन "देव"……................
दिनांक-०९.०६.२०१५
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। 

Sunday, 7 June 2015

♥♥रंगहीन...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥रंगहीन...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
 मन का क्षेत्र बहुत घायल है और नयनों में व्यापक जल है। 
झुलस गयीं हैं अधर पंखुड़ी और चित्त में कोलाहल है। 
चिंतित चिंतन की रेखायें, मानवता का अंत देखकर,
भाव यहाँ दोहन की वस्तु, और यहाँ अपनों का छल है। 

प्रेम के बदले यहाँ दंड है, तरह तरह के मानक होते। 
लोग किसी के जीवन में क्यों, पीड़ाओं के अंकुर बोते। 
प्राण निकलते हैं बिंद बिंद कर, और सभी करते अनदेखा।
औरों पर आरोप लगाते, भूल के अपना लेख जोखा। 

मदिरा की प्याली कैसे, कह दूंगा मैं गंगाजल है। 
मन का क्षेत्र बहुत घायल है और नयनों में व्यापक जल है... 

केश रंग से हीन हो गये, ऊर्जा, क्षमता मंद हो गयी। 
एक उजाले की खिड़की थी, वो भी अब तो बंद हो गयी। 
"देव" जहाँ में मुझको मिटटी, और उनको रेशम कहते हैं। 
हमे ज्ञात किन अवस्थाओं में, हम देखो पीड़ा सहते हैं। 

अब लगता है हर एक मंजिल, मेरी दृष्टि से ओझल है। 
मन का क्षेत्र बहुत घायल है और नयनों में व्यापक जल है। " 


....................चेतन रामकिशन "देव"……................
दिनांक-०७.०६.२०१५
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित।

Saturday, 6 June 2015

♥दीवार...♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥दीवार...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
जो चाहत रूह तक पहुंचे, नहीं अब प्यार वो शायद।
खड़ी रिश्तों के आँगन में, कोई दीवार है शायद।

वो माँ है बेटियों की ओर, मुंह कर सोच में डूबी,
पढ़ा उसने सना खूँ से, अभी अखबार है शायद।

हैं अपने मुल्क में भूखे, लटक जाते हैं कड़ियों पर,
मगर गैरों को दौलत दे, अजब सरकार है शायद।

जो लफ़्ज़ों का मसीहा हो, लिखे आवाज़ रूहों की,
कलमकारों में क्या ऐसा, कोई खुद्दार है शायद।

अमन की बात करते हैं, मेरे दिल में छुरा घोंपें,
यही देखा है लोगों का, छुपा किरदार है शायद।

मसल देते हैं पल भर में, किसी का फूल जैसा दिल,
मोहब्बत अब ज़माने में, कोई व्यापार है शायद।

सजा है बेगुनाहों को,  गज़ब कानून की फितरत,
यहाँ कातिल की चोखट पर, सजा दरबार है शायद।

मुझे इलज़ाम देते हैं, मेरी आँखों को भी पानी,
ग़मों की हर घड़ी देखो, ये पैदावार है शायद।

नहीं सुनता हूँ अब दिल की, सुनो मैं "देव" पत्थर का,
थपेड़े दर्द के सहना, मेरा संसार है शायद। "

.....चेतन रामकिशन "देव"…….
दिनांक-०७.०६.२०१५
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Wednesday, 3 June 2015

♥♥उजाले...♥♥

♥♥♥♥♥♥उजाले...♥♥♥♥♥♥♥
अपने आंसू मेरे हवाले करो। 
जिंदगानी में तुम उजाले करो। 

जो मेरे लफ्ज़ तुमको दुख देते,
फूंककर उनके रंग काले करो।  

दर्द तेरा मुझे भी होता है,
अपने पांवों में तुम न छाले करो। 

मेरी खातिर क्यों इस कदर अर्पण,
खुद को रोटी के न यूँ लाले करो। 

तुमको गिरने नहीं मैं दूंगा सुनो,
खुद को इतने भी न संभाले करो। 

प्यार है मुझसे तो कहो खुलकर,
अपने होठों पे यूँ न ताले करो। 

"देव" तेरा वजूद अम्बर सा,
मेरे क़दमों में सर न डाले करो। "

.....चेतन रामकिशन "देव"…….
दिनांक-०३.०६.२०१५ 
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Tuesday, 2 June 2015

♥प्रेम-दर्शन...♥

♥♥♥♥♥♥प्रेम-दर्शन...♥♥♥♥♥♥♥♥
चित्त हर्षित हो, भाव खिल जाये। 
प्रेम की गंध मुझमे घुल जाये। 
तेरे दर्शन निकट से होंगे जब,
चन्द्रमा मानो मुझको मिल जाये। 

प्रेम के पथ पे होगा जब भी मिलन। 
मन से फूटेंगी भावना की किरन। 
शब्द धीमे से लाज खायेंगे,
बोलते पर रहेंगे अपने नयन। 

प्रेम रंगों से चित्रकारी हो,
चित्र परिणय दिशा में ढ़ल जाये।  
तेरे दर्शन निकट से होंगे जब,
चन्द्रमा मानो मुझको मिल जाये। 

तुम कथन प्रेम का जो व्यक्त करो। 
कांपते अधरों को सशक्त करो। 
हर दिवस रात मेरे साथ रहो,
खुद को क्षण भर भी न विलुप्त करो। 

रूप उज्जवल ये देखकर तेरा,
हर दिशा का तिमिर भी धुल जाये। 
तेरे दर्शन निकट से होंगे जब,
चन्द्रमा मानो मुझको मिल जाये। 

तुम ही सौंदर्य हो कविता का। 
तुम ही प्रभाव को सुचिता का। 
"देव" तुमसे हो मन मेरा शीतल,
तुम ही आधार हो सरिता का। 

प्रेम अपना जो होगा ताकतवर,
देखो चट्टान तक भी हिल जाये।  
तेरे दर्शन निकट से होंगे जब,
चन्द्रमा मानो मुझको मिल जाये। "

.....चेतन रामकिशन "देव"…….
दिनांक-०२.०६.२०१५ 
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Wednesday, 27 May 2015

♥♥बेड़ी...♥♥

♥♥♥♥♥♥बेड़ी...♥♥♥♥♥♥♥♥♥
जागती रात, अश्क़ बहते रहे। 
दर्द अपना खुदी से कहते रहे। 

उसके आने की आस में देखो,
चांदनी हम झुलस के सहते रहे। 

रेत के जैसे ख्वाब ही थे मेरे,
ठेस लगते ही देखो ढ़हते रहे। 

आदमी होने का हुनर न जिसे,
हम खुदा उसको रोज कहते रहे। 

ये तड़प और कितनी बेचैनी,
करवटें हम बदलके रहते रहे। 

खून निकला नहीं कटी बेड़ी,
अपनी एड़ी के घाव सहते रहे। 

 "देव" दिल के चीर दिखाना पड़ा,
वो मेरे सच को, झूठ कहते रहे। "

......चेतन रामकिशन "देव"…….
दिनांक-२७.०५.२०१५ 
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Tuesday, 26 May 2015

♥रंजिश...♥

♥♥♥♥♥♥♥रंजिश...♥♥♥♥♥♥♥♥
कितनी रंजिश जता रहा है वो। 
मुझको पत्थर बता रहा है वो। 

जो मेरे दर्द से जुड़ा था कभी,
आज मुझको सता रहा है वो। 

जिसने बोला था सुबह आऊंगा,
शाम से लापता रहा है वो। 

उसने लिखा था प्रेम का जो खत,
आज तक बेपता रहा है वो। 

"देव" लिखता जो प्रेम के मुक्तक,
मुझको नफरत बता रहा है वो। "

......चेतन रामकिशन "देव"…….
दिनांक-२६.०५.२०१५ 
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। " 

Sunday, 24 May 2015

♥♥जुर्म...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥जुर्म...♥♥♥♥♥♥♥♥♥
प्यार है जुर्म तो, जला दो हमें। 
ख़ाक में आओ तुम, मिला दो हमें। 

मुझसे रिश्ता नहीं, तो क्या गम है,
एक लम्हे में तुम, भुला दो हमें। 

अब दवाओं का, न असर कोई,
कोई कड़वा ज़हर, पिला दो हमें। 

हमने तो जिंदगी तुम्हे सौंपी,
तुम जो चाहो, वही सिला दो हमें। 

तेरी राहों को, मैं नहीं रोकूँ,
मौत की नींद तुम, सुला दो हमें। 

लडख़ड़ायें जो न कदम मेरे,
बिन सहारे के तुम, चला दो हमें। 

ये जहाँ मेरे बिन, रुकेगा नहीं,
उम्र भर चाहें, फासला दो हमें। "

......चेतन रामकिशन "देव"…….
दिनांक-२४.०५.२०१५  
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। "


Tuesday, 19 May 2015

♥♥ममता...♥♥

♥♥♥♥♥ममता...♥♥♥♥♥♥♥
मुझपे ममता का रंग डाला है। 
मेरी आँखों में जो उजाला है। 

बस दुआ देके दर्द खींच लिया,
माँ तेरा प्यार भी निराला है। 

तेरी हिम्मत की दाद देता हूँ,
कितनी मुश्किल से हमको पाला है। 

तुमने तालीम दी हक़ीक़त की,
हमके गिरते हुये संभाला है। 

माँ तेरी हर छुअन है फूलों सी,
तुमने काँटा हर एक निकाला है। 

मेरी ख्वाहिश जो कर सको पूरी,
मेरी आदत में खुद को ढ़ाला है। 

"देव" माँ को सुकून है मुझसे,
मुझको भी माँ का नाम आला है। "

......चेतन रामकिशन "देव"…….
दिनांक- २०.०५.२०१५
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। " 


Saturday, 16 May 2015

♥♥इंतजार...♥♥

♥♥♥♥♥♥इंतजार...♥♥♥♥♥♥♥
मुझको ये इंतजार भाता नही। 
बिन तुम्हारे क़रार आता नही। 

तेरी सूरत है बस निगाहों में,
हर किसी पे तो प्यार आता नहीं। 

मेरे सपनों की आरज़ू तुम हो,
बिन तेरे ख्वाब मैं सजाता नहीं। 

बिन तेरे लय है, न ही लफ्ज़ कोई,
कंठ भी कोई गीत गाता नहीं। 

तुझको आने में न पड़े मुश्किल,
सोचकर दीप मैं बुझाता नहीं। 

बिन तेरे पतझड़ों के साये हैं,
प्यार का मेघ कोई छाता नहीं। 

"देव" तुम बिन बहुत अँधेरा है,
चाँद आँखों में जगमगाता नहीं। "

......चेतन रामकिशन "देव"…….
दिनांक- १६.०५.२०१५
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Friday, 15 May 2015

♥♥हालात...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥हालात...♥♥♥♥♥♥♥♥♥
न फिसल जाऊं, इसका डर है मुझे।
अपने हालात की खबर है मुझे।

मेरी आँखों में वो समाई है,
प्यार की आज भी, कदर है मुझे।

जलजले ने भले उजाड़ दिया,
आज भी प्यारा मेरा, घर है मुझे।

मुझको अमृत दिखाके न छेड़ो,
हाँ जहर पीने का, हुनर है मुझे।

रात भर चाँद से मुलाकातें,
धूप भी दिन में बेअसर है मुझे।

तूने रस्ते में मुझको छोड़ा मगर,
आज भी तेरी ही, फिकर है मुझे।

"देव "  हर रोज तेरी राह तकूं,
तुम न आओगे ये, खबर है मुझे। "

......चेतन रामकिशन "देव"…….
दिनांक- १५ .०५.२०१५
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। "

Wednesday, 13 May 2015

♥♥कहो कुछ अब...♥♥

♥♥♥♥♥कहो कुछ अब...♥♥♥♥♥♥
रात खामोश है, कहो कुछ अब। 
ऐसे चुप चुप नहीं, रहो तुम अब। 

मैं नदी बनके, तुममें खो जाऊं,
बनके सागर जरा, बहो तुम अब। 

प्यार में हक़ है, अपनेपन का तुम्हे,
अजनबी मुझको न, कहो तुम अब। 

अपने आग़ोश में समा लो मुझे,
दूरियां कोई न, सहो तुम अब। 

लोग पढ़कर जो हमको याद करें,
दास्तां प्यार की, कहो तुम अब। 

अपनी आँखों से तुमको छूना है,
कोई परदे में न, रहो तुम अब। 

"देव" तुमको सुना दूँ हाले-दिल,
अपने जज़्बात तो, कहो तुम अब। "

......चेतन रामकिशन "देव"…….
दिनांक- १३ .०५.२०१५
" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। " 

Tuesday, 12 May 2015

♥♥मेरी सूरत में...♥♥


♥♥♥♥मेरी सूरत में...♥♥♥♥
मेरी सूरत में तुम समाई हो। 
सांस बनकर करीब आई हो। 

तुमको देखूं तो रंग खिल जायें,
बनके रिमझिम फुहार छाई हो। 

तेरे छूने से चैन मिल जाये,
तुम मेरे दर्द की दवाई हो। 

मेरे ग़ज़लों का नूर है तुमसे,
और तुम ही मेरी रुबाई हो। 

तुम हमेशा को पास आ जाओ,
दूर जाने की न बुराई हो। 

हर जनम में तुम्हारा साथ मिले,
बस खुदा की यही खुदाई हो। 

"देव" मेरी हो तुम मेरी रहना,
न कभी कहना के पराई हो। "'

.......चेतन रामकिशन "देव"…….
दिनांक- १२.०५.२०१५

" सर्वाधिकार C/R सुरक्षित। "

Sunday, 10 May 2015

♥♥♥माँ...♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥माँ...♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तेरे क़दमों में सर झुका लूं माँ। 
जन्नतें मैं ज़मीं पे, पा लूं माँ। 

मैंने देखा नहीं कभी रब को,
मंदिरों में तुझे सजा लूं माँ। 

तेरा किरदार  है बहुत उम्दा,
तुझको पलकों पे, मैं छुपा लूं माँ। 

मुझको मखमल की जब जरुरत हो,
तेरे आँचल में सर छुपा लूं माँ। 

मेरी उस लम्हा भूख मिट्टी है,
तेरे हाथों से अन्न खा लूं माँ। 

तुझको काँटा नहीं चुभे कोई,
तेरी राहों में फूल डालूं माँ। 

हर जनम तेरी कोख से जन्मूँ,
"देव " बस ये दुआ निभा लूं माँ। "

 .......चेतन रामकिशन "देव"…….
दिनांक- १०.०५.२०१५

Wednesday, 6 May 2015

♥आदमी हूँ...♥

♥♥♥♥♥♥आदमी हूँ...♥♥♥♥♥♥♥
आदमी हूँ नहीं खुदा करिये। 
मुझको खुद से नहीं जुदा करिये। 

जो बदलकर मुझे करो उल्फत,
प्यार में ऐसी न अदा करिये। 

जिनको न कद्र हो मोहब्बत की,
उनपे दिल अपना न फ़िदा करिये। 

जिनके बिन जिंदगी अधूरी रहे,
भूल से उनको न विदा करिये। 

हो जरुरत जिन्हे सहारे की ,
बोझ बन उन पे न लदा करिये। 

लोग बख्शें जो लानतें हर पल,
नाम की ऐसी न सदा करिये। 

"देव" जो  बेचते यहाँ सच को,
झूठ की उनकी, न निदा करिये। "

.........चेतन रामकिशन "देव"…….
दिनांक- ०६.०५.२०१५

Tuesday, 5 May 2015

♥ बेजुबान... ♥

♥ ♥ ♥ ♥ बेजुबान... ♥ ♥ ♥ ♥
झूठ पे इत्मीनान करना पड़ा। 
खुद को ही बेजुबान करना पड़ा। 

जलजले ने उजाड़े घर जब से,
आसमां को मकान करना पड़ा। 

मेरे कातिल वो, पर मेरी चाहत,
उनके हक़ में बयान करना पड़ा। 

हारके जिंदगी से मरना नहीं,
गिरते गिरते उठान करना पड़ा। 

वक़्त न ली जो आज फिर करवट,
उनको मेरा बखान करना पड़ा। 

बेइमां कहके वो मुझे खुश थे,
आप छलनी, ईमान करना पड़ा। 

"देव" जिंदा पे तो हुई न कदर, 
खुद को मरकर, महान करना पड़ा। "

.........चेतन रामकिशन "देव"…….
दिनांक- ०६.०५.२०१५

Tuesday, 21 April 2015

♥बिना तुम्हारे...♥

♥♥♥♥♥बिना तुम्हारे...♥♥♥♥♥♥♥♥
मिलन से जब वंचित होता हूँ। 
जाने क्यों कुंठित होता हूँ। 
कुछ भी भाता नही हृदय को,
क्षण क्षण मैं विचलित होता हूँ। 
इसीलिए प्रयास करो तुम, 
निश दिन मुझसे मिला भेंट का,
सखी तुम्हारे दर्शन से मैं,
फूलों सा पुलकित होता हूँ। 

तुमसे है सम्बन्ध प्रेम का, 
तुम बिन सब कुछ रिक्त लगे है। 
तुम बिन चाँद नहीं खिल पाता,
तुम बिन सूरज नहीं जगे है। 

बिना तुम्हारे दिशाहीन मैं,
पग पग पे भ्रमित होता हूँ। 
सखी तुम्हारे दर्शन से मैं,
फूलों सा पुलकित होता हूँ .... 

जब तुम आओ मैं मुस्काउंं,
मैं चोखट पे दीप जलाऊं। 
तुमसे ऐसा गठबंधन है,
बिन तुम्हारे न रह पाऊं। 
"देव" समूचे विश्व पटल पर,
न पर्याय तुम्हारा कोई,
इसीलिए ही तुमसे विरह,
नहीं जरा भी मैं सह पाऊं। 

तुमसे मिलकर जीवन पथ में,
मधु सा मैं मिश्रित होता हूँ। 
सखी तुम्हारे दर्शन से मैं,
फूलों सा पुलकित होता हूँ। "

....चेतन रामकिशन "देव"… 
दिनांक-२१.०४.२०१५ (CR सुरक्षित )

Saturday, 18 April 2015

♥♥♥पत्र तुम्हारे...♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥पत्र तुम्हारे...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
यदा कदा मैं पत्र तुम्हारे, जिस दिन भी खोला करता हूँ। 
तुम तो निकट नही होती हो, शब्दों से बोला करता हूँ। 
साथ जनम तक संग साथ की, जब पढता सौगंध तुम्हारी,
यही सोचकर के तुम आओ, द्वार पुन : खोला करता हूँ। 

जाने कितनी बार हजारों, यूँ ही तेरा पथ देखा है। 
आँख लगी तो मैंने तेरा, स्वर्ण सजीला रथ देखा है। 

तुम्हे देखकर स्वप्नों में भी, हर्षित हो, डौला करता हूँ। 
यही सोचकर के तुम आओ, द्वार पुन : खोला करता हूँ ... 

जब भी एकाकीपन होता, पूर्ण मनन पे तुम छाती हो। 
अपने नैना बंद करूँ तो, नज़र मुझे बस तुम आती हो। 
तेरी कविता का वो गायन, कान में अब भी मधु घोलता,
मुझे देखकर के परिसर में, मंद मंद तुम मुस्काती हो। 

अपने मन की परत परत पर, छवि तुम्हारी ही पाई है। 
याद मुझे आता है तेरा, संग संग होना सुखदायी है। 

तुमसे ज्यों का त्यों कह दूँ मैं, नहीं तनिक तौला करता हूँ। 
यही सोचकर के तुम आओ, द्वार पुन : खोला करता हूँ ...

पढ़ते पढ़ते पत्र की अंतिम, पंक्ति तक नैना जाते हैं।  
रिक्त अभी तक द्वार देखकर, फूल भी सारे मुरझाते हैं।  
"देव" निगाह जाती है मेरी, टंगी तुम्हारी तस्वीरों पर,
तब होता एहसास मुझे के, जाने वाले कब आते हैं। 

तब मैं फिर से नम आँखों से, पत्र तुम्हारा रख देता हूँ। 
यही सोचकर तेरे हाथ का, भोजन है मैं चख लेता हूँ। 

कार्यालय में जाने को मैं, इस्त्री फिर चोला करता हूँ।  
यही सोचकर के तुम आओ, द्वार पुन : खोला करता हूँ। "

...................चेतन रामकिशन "देव"………………..
दिनांक-१८.०४.२०१५ (CR सुरक्षित )

Wednesday, 15 April 2015

♥♥हरफ़...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥हरफ़...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
है मुझसे इस कदर नफ़रत, कभी ये बोल तो देते। 
छुपाया राज क्यों दिल में, कभी तुम खोल तो देते। 

बड़ा ही बेरहम होकर, मेरी सांसों को रोका था,
घुटन मैं हूँ जरा तुम कब्र का, मुंह खोल तो देते। 

वो जिनसे था तुम्हें मतलब, अशरफ़ी उनको दे डालीं,
किसी मुफ़लिस की मेहनत का, कभी तुम मोल तो देते।

तुम्हारा रूप चन्दन था, तेरी खुशबु भी प्यारी थी,
महक तुम प्यार की, सांसों में मेरी घोल तो देते।

नहीं कहना मुझे कुछ "देव", मैं खामोश हूँ बेहतर,
जुबां मिल जाती मुझको भी, हरफ़ तुम बोल तो देते। "

………........चेतन रामकिशन "देव"….................
दिनांक-१६.०४.२०१५ (CR सुरक्षित )  

Tuesday, 14 April 2015

♥♥जागता चाँद...

♥♥♥♥♥♥♥♥जागता चाँद...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
जागता चाँद ये, मेरी तरह से आधा है। 
क्यों नहीं आया वो, जिससे मिलन का वादा है। 

मुझे तड़पाने को न आये, या फिर वक़्त नहीं,
मैं क्या जानूं के भला, उनका क्या इरादा है। 

मेरा ये हक़ है मिलन का, या फिर मेरे यारों,
मेरी उम्मीद ही उस आदमी से, ज्यादा है। 

मेरी किस्मत मुझे महबूब मिला, फूलों सा,
मेरा किरदार तो दुनिया में, बड़ा सादा है। 

एक लम्हे की जुदाई से, टूट जाता हूँ,
मेरा दिल तो बड़ा कमजोर, इश्क़ज़ादा है। 

मुझसे कहती हैं वो, आ जायेंगी वो मेरी हैं,
क़र्ज़ की तरह भला, इतना क्यों तकादा है। 

"देव" एहसास की, हर लौ पे तेरा नाम लिखा,
बिन मिले लगता ये, जीवन ही बेइरादा है। "

.............चेतन रामकिशन "देव"…............
दिनांक-१४.०४.२०१५  (CR सुरक्षित ) 

Sunday, 12 April 2015

♥♥निकटता...♥♥

♥♥♥♥♥निकटता...♥♥♥♥♥♥
तुम्हें जानने का मन होता,
निकट मानने का मन होता। 
तेरे पग में शूल चुभें न,
धूल छानने का मन होता। 
तुमसे हर पल बातचीत हो,
कुछ कहना, कुछ सुनना चाहूं,
सात जनम तक मिलन करेंगे,
यही ठानने का मन होता। 

प्रेम का सावन जब भी बरसे,
तुमको मैं बाँहों में भर लूँ। 
अपने जीवन के हर क्षण में,
बस तुमको ही शामिल कर लूँ। 

रात मिलन की कभी ढ़ले न,
गति थामने का मन होता। 
सात जनम तक मिलन करेंगे,
यही ठानने का मन होता ...

काव्य हमारा करो अलंकृत,
उसको अनुभूति से भर दो। 
मेरा आँगन तुम बिन सूना,
आकर इसको तुम घर कर दो। 
"देव" जगत में तुम मनभावन,
और तुम्ही प्यारी लगती हो,
मेरे सपने पंख पसारें,
तुम उनको निश्चय से भर दो। 

तुम संग हो तो सदा प्रेम का,
राग तानने का मन होता। 
सात जनम तक मिलन करेंगे,
यही ठानने का मन होता। "

.......चेतन रामकिशन "देव"….....
दिनांक-१२.०४.२०१५ (CR सुरक्षित )

Friday, 10 April 2015

♥♥फांसी का फंदा...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥फांसी का फंदा...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
कुदरत का अभिशाप हुआ है, कृषक होना पाप हुआ है।
झूल रहा फांसी पर कृषक, चंहुओर संताप हुआ है।  
कुदरत के इस रौद्र रूप का, कोप बना है ग्राम देवता,
मन दुखता है, कृषक के घर, करुणा भरा विलाप हुआ है। 

सरकारों की क्षति-पूर्ति, उसको ज्यादा से ज्यादा हो। 
न मिथ्या का अनुकरण हो, न कोई कोरा वादा हो। 
सरकारें जब दर्द सुनेंगी, तो कृषक को सुख आयेगा। 
भूखा-प्यासा कृषक फिर से, सब्जी रोटी चख पायेगा। 

भस्म हुये हैं सारे सपने, दुख का इतना ताप हुआ है। 
मन दुखता है, कृषक के घर, करुणा भरा विलाप हुआ है ...

बेटी की शादी का सपना, बेमौसम बारिश ने लूटा। 
क्रूर बनी ओलावृष्टि से, कोमल फसलों का तन टूटा। 
"देव" वो देखो कृषक के घर, चीख हैं या फिर है सन्नाटा,
फसल महीनों पाली लेकिन, एक दो दिन में नाता टूटा। 

आशाओं के जल का संचय, क्षण भर में ही भाप हुआ है। 
मन दुखता है, कृषक के घर, करुणा भरा विलाप हुआ है। "

" कुदरत की मार सह रहे किसानों को सांत्वना, दुआ और स्नेह सहित सादर समर्पित रचना, 
(CR सुरक्षित )

.....................चेतन रामकिशन "देव"….....................
दिनांक-११.०४.२०१५

Tuesday, 7 April 2015

♥♥दस्तूर....♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥दस्तूर....♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
पास भी होकर पास नहीं वो, दूर भी होकर दूर नही है। 
पर वो मुझसे मिल न पाये, इतना भी मजबूर नहीं है। 

अपने आंसू बहा बहा कर, जीवन की खेती को सींचा,
कोई किसी को पानी देगा, अब ऐसा दस्तूर नहीं है। 

बिना जुर्म के सज़ा मुझे दी, आज है क्यूंकि वक़्त तुम्हारा,
समय मगर खुद को दोहराये, वो दिन कोसों दूर नही है। 

तुमको अपना ग़म प्यारा है, मुझको अपने दुख से मतलब,
कौन है ऐसा जिसके दिल में, पीड़ा का नासूर नहीं है। 

उम्मीदों का महल बनाकर, साथ ग़मों के रहना सोना,
तन्हाई से बढ़कर अब तो, मुझको कोई हूर नहीं है।

आज मिली जो दौलत अपने, बीते दिन को भूल गया वो,
किन होठों से कह दूँ बोलों, देखो वो मगरूर नहीं है। 

"देव" घुला है दर्द ज़हर का, गला है नीला, आँख में लाली,
लोग भला कैसे न समझें, वो दारु में चूर नहीं है। "

.....................चेतन रामकिशन "देव"….....................
दिनांक-०८.०४.२०१५

Sunday, 5 April 2015

♥♥ डर...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥ डर...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
निकट रहो तुम, दूर न जाओ, रात में तुम बिन डर लगता है। 
तुम बिन आँगन तन्हा तन्हा, सूना सूना घर लगता है।  
बिना तुम्हारे नींद न आये, बेचैनी के भाव पनपते,
बिना तुम्हारी गोद को पाये, व्याकुल मेरा सर लगता है। 

तुमसे मन का गहरा नाता, दूर नहीं तुम जाया कीजे। 
अनजाने में भी विरह का, कहर न मुझपे ढ़ाया कीजे। 

तुम बिन नयन मेरे गीले हों, अश्रु का सागर लगता है। 
निकट रहो तुम, दूर न जाओ, रात में तुम बिन डर लगता है... 

तुम रहती हो साथ अगर तो, सारा आलम खुश रहता है। 
न विरह के भाव पनपते, अपना गम भी चुप रहता है। 
"देव" तुम्हारी बातें होतीं, चित्त को हर्षित करने वाली,
और पाकर के तेरी निकटता, भावों का साग़र बहता है। 

प्रेम का तुमसे उद्बोधन है, वाणी नहीं दबाया कीजे। 
मैं जब बोलूं, मिलन करेंगे, तो एक दम आ जाया कीजे ।

तुम बिन देखो हवा का झोंका, मानो के नश्तर लगता है। 
निकट रहो तुम, दूर न जाओ, रात में तुम बिन डर लगता है। "

.......................चेतन रामकिशन "देव"…........................
दिनांक-०५.०४.२०१५

Friday, 3 April 2015

♥प्रेम-सार...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्रेम-सार...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तुम्हें भुला दूँ आखिर कैसे, तुमसे मन का तार जुड़ा है। 
तुम्हें देखकर दुनिया देखूं, तुमसे ही संसार जुड़ा है। 
रोज तुम्हारे एहसासों को, मैं चुपके से छू लेता हूँ,
तुम लगती हो सबसे प्यारी, क्यूंकि तुमसे प्यार जुड़ा है। 

उजली धूप सुबह की तुमसे, ख्वाब रात के तुम लाती हो। 
तारे भी पुलकित होते हैं, सखी अगर तुम मुस्काती हो। 

मेरे घर की तुम संरचना, तुमसे ही आधार जुड़ा है। 
तुम्हें भुला दूँ आखिर कैसे, तुमसे मन का तार जुड़ा है...

तुम आलोचक हो शब्दों की, मगर विमोचन तुमसे ही है। 
गंगाजल सी पावन हो तुम, मन का शोधन तुमसे ही है। 
"देव" तुम्हारा साथ मिला तो, गति बढ़ी मेरे चलने की,
कुशल समीक्षक, सही गलत का, अवलोकन भी तुमसे ही है। 

तुम जीवन को सम्पादित कर, पीड़ा को विस्मृत करती हो। 
तुम ऊर्जा के सबल भाव से, नया पाठ उद्धृत करती हो। 

तुम बिन मेरा जीवन रीता, तुमसे मेरा सार जुड़ा है।  
तुम्हें भुला दूँ आखिर कैसे, तुमसे मन का तार जुड़ा है। "

...................चेतन रामकिशन "देव"…..................
दिनांक-०३.०४.२०१५

Thursday, 2 April 2015

♥♥♥धूम्रदण्डिका...♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥धूम्रदण्डिका...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
धूम्रदण्डिका के धुयें में, निहित तुम्हारी आकृति है। 
मदिरा के प्यालों से फूटे, अब तेरी ही आवृति है। 
एक दिन था जब नशा सोचकर, मुझको घबराहट होती थी,
पर इतना बदलाव हुआ अब, नशा ही मेरी प्रवृति है। 

हाँ सच है के नशा है घातक, मुझे रोग से भर देता है। 
लेकिन ये भी सच है तेरी, याद को कमतर कर देता है। 
मैंने तो अच्छाई के संग, बहुत आगमन माँगा तुमसे,
किन्तु हर क्षण अनदेखा भी, अमृत को विष कर देता है। 

क्षुब्ध हूँ लेकिन ये धुआं ही, मेरी सारी प्रकृति है। 
धूम्रदण्डिका के धुयें में, निहित तुम्हारी आकृति है... 

दोष नहीं है तुम पर लेकिन, एकाकीपन सौंपा तुमने। 
अनदेखी से मेरे मन में, बीज शूल का रोंपा तुमने। 
"देव" मुझे भी आदर्शों पर, चलना मनमोहक लगता था,
किन्तु मेरे कोमल मन पर, तीर जहर का घोंपा तुमने। 

दंड के क्षण मैं भूल सकूँ न, बड़ी तीव्र ये स्मृति है। 
धूम्रदण्डिका के धुयें में, निहित तुम्हारी आकृति है। "


नोट-मेरी ये रचना किसी को नशे के लिये आमंत्रित नहीं करती है, रचनाकार का भाव मन व्यापक होता है और वह समाज के जिस पहलु को छूता है, उस पर शब्द जोड़ता है। 

..................चेतन रामकिशन "देव"…................
दिनांक-०३.०४.२०१५

Tuesday, 31 March 2015

♥बंदनवार...♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥बंदनवार...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
बंदनवार सजाया मैंने, घी का दीप जलाया मैंने।
नहीं लौटकर पर तुम आये, कितना तुम्हें बुलाया मैंने। 
तुमको अपनी व्याकुलता के, कितने पत्र लिखे प्रतिदिन,
तुम बिन ये नीरस जीवन है, हर क्षण ये बतलाया मैंने। 

किन्तु तुमने मेरे मन की, आशाओं को तोड़ दिया क्यों। 
एकाकी जीवन के पथ पर, मुझको जीवित छोड़ दिया क्यों।  
तुमसे बस थोड़ी अनुभूति, थोड़ा सा अपनत्व ही चाहा,
किन्तु तुमने इसके बदले, दुख से नाता जोड़ दिया क्यों। 

तुम नहीं समझे मेरी वेदना, कितना तो समझाया मैंने। 
तुम बिन ये नीरस जीवन है, हर क्षण ये बतलाया मैंने ... 

रिक्त है तुम बिन जीवन का वृत, त्रिज्या दुख की बड़ी हुयी है। 
शब्दों से विस्तार करूँ क्या, तुम बिन मुश्किल खड़ी हुयी है। 
"देव" तुम्हारी प्रतीक्षा में, दिवस रात पथरायीं ऑंखें,
लगता है कि भाग्य में तुम बिन, घनी वेदना जड़ी हुयी है ... 

अब तुम समझो या न समझो, रिक्त हृदय दिखलाया मैंने। 
तुम बिन ये नीरस जीवन है, हर क्षण ये बतलाया मैंने। "

.....................चेतन रामकिशन "देव"….................
दिनांक-३१.०३.२०१५ 

Wednesday, 25 March 2015

♥♥धूप....♥♥



♥♥♥♥♥♥धूप....♥♥♥♥♥♥♥♥
मेरे चित्र सजा दो फिर से। 
खोयी रौनक ला दो फिर से।  
अँधेरे को काबू में कर,
धूप नयी फैला दो फिर से। 

तुमसे ही उम्मीद है बाकि,
इसीलिए तुमसे कहता हूँ। 
तुम बिन चित्त नहीं हर्षाता,
मुरझाया सा मैं रहता हूँ। 

कंठ तुम्हारे बिन चुप चुप है,
प्रेम की सरगम ला दो फिर से। 
अँधेरे को काबू में कर,
धूप नयी फैला दो फिर से.... 

रेखाचित्र तुम्हे सौंपा है,
अपना इसको तुम रंग देना। 
खुशियों में तो साथ सभी दें,
दुख में भी अपना संग देना। 

"देव" प्रेम के ढ़ाई अक्षर,
कानों में बतला दो फिर से। 
अँधेरे को काबू में कर,
धूप नयी फैला दो फिर से। "

......चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक-२६.०३.२०१५


Monday, 23 March 2015

♥♥शब्दाक्षर...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥शब्दाक्षर...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
सृजक हूँ, सृजन चाहता हूँ, भावों का जीवन चाहता हूँ। 
मेरे मन को भी पढ़ ले जो, ऐसा कोई मन चाहता हूँ। 
अक्षर से अक्षर का नाता, जोड़ सकूँ बस ये ख्वाहिश है,
न सोने के मुकुट की इच्छा, न चांदी का तन चाहता हूँ। 

नहीं पता क्यों प्यार है मुझको, अपने शब्दों से, अक्षर से। 
नहीं पता क्यों प्यार है मुझको, भावों के बहते सागर से। 
नहीं पता मैं क्यों शब्दों को, अपना हर एक राज बताता,
नहीं पता क्यों प्यार है मुझको, शब्दों के नीले अम्बर से। 

शब्दों को जो ममता दे वो, एक ऐसा आँगन चाहता हूँ। 
न सोने के मुकुट की इच्छा, न चांदी का तन चाहता हूँ....

प्रेम कठिन है, पीड़ा पायी, दवा नही कुछ दुआ चाहिये। 
खुलकर के जो सांस ले सकूँ, ऐसी मुझको हवा चाहिये।  
"देव" मेरे दहके मन को जो, अपने आँचल की छाया दे,
जीवन के इस पथ पर मुझको, बस इतनी सी वफ़ा चाहिये।  

व्याकुल मन को शांत कर सके, एक लुम्बिनी वन चाहता हूँ। 
न सोने के मुकुट की इच्छा, न चांदी का तन चाहता हूँ। "

......................चेतन रामकिशन "देव"........................
दिनांक-२४.०३.२०१५

Wednesday, 18 March 2015

♥♥♥सिंदूरी...♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥सिंदूरी...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
काव्य कोष में बड़ी रिक्तता, तुम आ जाओ तो पूरी हो। 
तुम्हें देखकर नयना हर्षित, मांग हमारी सिंदूरी हो। 
भाषा शैली भव्य तुम्हारी, रात दिवस तुमसे बतिआऊं,
बहुत सुगन्धित प्रेम तुम्हारा, जैसे कोई कस्तूरी हो। 

है मेरे में बहुत बचपना, मुझसे क्रोधित हुआ करो न। 
मेरा मन स्पर्श को तरसे, तुम आकर के छूआ करो न। 

साथ रहो तुम मेरे हर क्षण, नहीं तनिक सी भी दूरी हो। 
काव्य कोष में बड़ी रिक्तता, तुम आ जाओ तो पूरी हो ....

स्वप्नों का हम गठन करेंगे, साथ साथ प्रयास करेंगे। 
दुःख आएगा तो झेलेंगे, हंसने का अभ्यास करेंगे। 
"देव" परस्पर मन की उलझन, सुलझांयेंगे हम मिल जुल कर,
एक दूजे के जीवन पथ पर, आपस में विश्वास करेंगे। 

दीपक जैसे राह दिखाना, यदि तिमिर में घिर जाऊं मैं। 
मेरा प्रेम नहीं स्वयंभू,  जो कसमों से फिर जाऊं मैं। 

टूट गयी हूँ बिना तुम्हारे, नहीं कभी फिर से दूरी हो। 
काव्य कोष में बड़ी रिक्तता, तुम आ जाओ तो पूरी हो। "

.................चेतन रामकिशन "देव"......................
दिनांक-१८.०३.२०१५

Sunday, 15 March 2015

♥♥विध्वंस...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥विध्वंस...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मृत्यु चारों ओर मचलती, अब जीवन का अंश नहीं है। 
कौन सा ऐसा क्षण है जिसमें, मानो के विध्वंस नही है। 
संबंधों की हत्या करना, यहाँ प्रचलन हुआ रोज का,
शेष नही वो रक्त कोशिका, जिसमे दुख का दंश नहीं है। 

मानवता दण्डित होती है, यहाँ भाव मारे जाते हैं। 
जो सबको अपनापन देते, लोग वही हारे जाते हैं। 
अनुरोध या करुण निवेदन, नहीं मान कोई करता है,
सक्षम होकर भी कोई जन, नहीं किसी का दुख हरता है। 

बाहर से उजले हैं किन्तु, मन से कोई हंस नही है। 
मृत्यु चारों ओर मचलती, अब जीवन का अंश नहीं है.... 

बुद्धि शायद मंद है मेरी, नहीं आंकलन कर पाता हूँ। 
निर्दोषों को दंड दे सकूँ, नहीं प्रचलन कर पाता हूँ। 
"देव" सिमट जाता हूँ स्वयं मैं, अपने अश्रु पी लेता हूँ,
मैं चाहकर भी पाषाणों सा, चाल चलन नही कर पाता हूँ। 

भाषा मैंने प्रेम की बोली, हिंसा का अपभ्रंश नहीं है। 
मृत्यु चारों ओर मचलती, अब जीवन का अंश नहीं है। "

................चेतन रामकिशन "देव"....................
दिनांक-१६.०३.२०१५

Saturday, 14 March 2015

♥♥अंगारों की बारिश...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥अंगारों की बारिश...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
अंगारों की बारिश देखी, अश्क़ों का सागर देखा है। 
बिना जुर्म के सजा सही है, अपना जलता घर देखा है। 
यहाँ झूठ की चले गवाही, सच की कीमत है कौड़ी में,
कातिल के क़दमों के नीचे, कानूनों का सर देखा है। 

इंसानों की बोली लगती, रिश्तों का सौदा होता है। 
यहाँ लोग मर जायें रोकर, नहीं किसी को दुख होता है। 
रौंद की सारी मानवता को, लोग करें तेजाब की बारिश,
उजड़ेगा संसार किसी का, नहीं सोच ये डर होता है। 

यहाँ भावना की अनदेखी, और साँसों पे कर देखा है। 
अंगारों की बारिश देखी, अश्क़ों का सागर देखा है....

दो रोटी से रहे मयस्सर, मुफ़लिस भूखा मर जाता है। 
जिसको समझो सुख की सरिता, वही दर्द से भर जाता है। 
"देव" यहाँ सुनने को मिलता, प्यार खुदा का नाम जहाँ में,
तो आखिर क्यों नाम प्यार का, टुकड़े टुकड़े हो जाता है। 

न सोखा एक शख़्स ने आकर, आँखों ने बहकर देखा है।  
अंगारों की बारिश देखी, अश्क़ों का सागर देखा है। "
   
................चेतन रामकिशन "देव"....................
दिनांक-१५.०३.२०१५


♥♥प्रत्यावेदन ..♥♥



♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्रत्यावेदन ..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
यदि हमारा प्रत्यावेदन प्रेम का, जो स्वीकार हो गया। 
तो समझूंगा एहसासों का, जीवन में सत्कार हो गया। 
और यदि फिर से ठुकराया, तुमने मेरा प्रेम निवेदन,
तो निश्चित ही मेरा जीवन, कंटक, झाड़ी, ख़ार हो गया। 

दिल तेरे क़दमों में रखा, इससे ज्यादा कर न पाऊं। 
प्यार बहुत गहरा है तुमसे, कमी तुम्हारी भर न पाऊं। 

बहेंगे आंसू, काले बादल, सूरत का सिंगार हो गया। 
यदि हमारा प्रत्यावेदन प्रेम का, जो स्वीकार हो गया... 

फिर से सोचो, मेरी पीड़ा, जरा समझ लो ये कहता हूँ। 
तुमको सबको कुछ बता दिया है, बिन तेरे कैसे रहता हूँ। 
"देव" हमारा उजड़ा चेहरा, देखके सब पत्थर बरसाते,
मैं छोटे से दिल का मालिक, दुनिया भर के गम सहता हूँ। 

सब कुछ कह डाला लफ़्ज़ों ने, चलो हमें चुप हो जाने दो। 
नींद नहीं आयेगी लेकिन, झूठमूठ का सो जाने दो।

लगता है भावों का याचन,  रद्दी सा, बेकार हो गया। 
यदि हमारा प्रत्यावेदन प्रेम का, जो स्वीकार हो गया। "

...................चेतन रामकिशन "देव"..................
दिनांक-१४.०३.२०१५

Friday, 13 March 2015

♥♥♥धुंध...♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥धुंध...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
नया सवेरा आया लेकिन, धुंध नही हटती है मन की। 
उम्मीदें रखता हूँ फिर भी, क्यों टूटी है लय जीवन की। 
जिसको अपना समझा वो ही, मारके पत्थर घायल करता,
नहीं पता कब अंतिम होगी, पीड़ा मेरे अंतर्मन की। 

मुख पे झूठी हंसी दिखाकर, मैंने अश्रुपान किया है।
लोग यहाँ उपहास उड़ाते, मैंने पर सम्मान किया है। 
कोशिश की सबके घावों पर, मरहम सुख का लगा सकूँ मैं,
पर लोगों ने इसके बदले, मेरा तो अपमान किया है। 

पांव फट गये धूप में तपकर, नहीं चमक बाकी है तन की। 
नया सवेरा आया लेकिन, धुंध नही हटती है मन की ...

चलो लोग जैसा भी कर लें, उनकी नीति, उनका मन है। 
मेरे दिल में नहीं है नफरत, न हिंसा का स्पंदन है। 
"देव" हमे कुदरत ने भेजा, अंतिम साँस तलक जीने को,
इसीलिए हर ग़म सहकर के, काट लिया अपना जीवन है। 

रात की रानी नहीं महकती, सूख गयी तुलसी आँगन की। 
नया सवेरा आया लेकिन, धुंध नही हटती है मन की। "

.....................चेतन रामकिशन "देव"........................
दिनांक-१४.०३.२०१५


♥♥♥तुम बिन...♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥तुम बिन...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तुम बिन क्यों धरती सूनी है, तुम बिन क्यों अम्बर खाली है। 
तुम बिन क्यों आंसू बहते हैं, तुम बिन कैसी बेहाली है। 
तुमसे शायद मेरा नाता, है खुद के जीवन से बढ़कर,
तभी नहीं तुम बिन होली है, नहीं हमारी दीवाली है। 

अब समझा मैं प्यार में कोई, यहाँ निहित जब हो जाता है। 
तो उसके जीवन का पल पल, एहसासों में खो जाता है। 
यदि मिलन के क्षण आयें तो, वो खिल जाता है फूलों सा,
मगर विरह के एहसासों में, एक दम से मुरझा जाता है। 

तभी मैं सोचूं क्यों बिन तेरे, सूख गयी हर एक डाली है, 
तुम बिन क्यों धरती सूनी है, तुम बिन क्यों अम्बर खाली है ...

नहीं पता तुम कब आओगे, हर दिन जीवन कम होता है। 
बिना तुम्हारे हंसना भूला, इतना ज्यादा ग़म होता है। 
"देव" न जाने तुम क्यों आखिर, नहीं समझते मेरी बेबसी,
मेरी पीड़ा देखके जबकि, आसमान भी नम होता है। 

बिना तुम्हारे धवल चांदनी, मेरी खातिर तो काली है। 
तुम बिन क्यों धरती सूनी है, तुम बिन क्यों अम्बर खाली है। "

......................चेतन रामकिशन "देव"........................
दिनांक-१३.०३.२०१५

Thursday, 12 March 2015

♥♥इतिहास...♥♥



♥♥♥♥♥इतिहास...♥♥♥♥♥♥♥
प्रेम का हर इतिहास तुम्ही से। 
कायम है एहसास तुम्ही से। 
तुम वर्णित हो प्रेम कथा में,
बरसाने का रास तुम्ही से। 
तुम्हे देखकर हंस लेता हूँ,
मेरा हर उल्लास तुम्ही से। 
तुम मुझको प्रेरित करती हो,
है मेरा प्रयास तुम्ही से। 

तुम वीणा की मधुर तान में,
तुम गायन के सात स्वर में। 
खुशियां आँगन में रहती हैं,
तुमसे ही रौनक है घर में। 

तुमसे हरी भरी पृथ्वी है,
और नीला आकाश तुम्ही से। 
तुम मुझको प्रेरित करती हो,
है मेरा प्रयास तुम्ही से ...

तुम रंगोली के रंगों में,
तुमसे आलेखन बनता है। 
बिना तुम्हारे मैं अपूर्ण हूँ,
तुमसे ही जीवन बनता है। 
केश तुम्हारे इतने प्यारे,
मुझे बचाते कड़ी धूप से,
तुम घर की आधार कड़ी हो,
तुमसे ही आँगन बनता है। 

तुमसे ही कविता रचती है,
भावों का अभ्यास तुम्ही से। 
तुम मुझको प्रेरित करती हो,
है मेरा प्रयास तुम्ही से ...

तुम आकर्षक, मनोहारी हो,
और आत्मा से प्यारी हो। 
एक दूजे के एहसासों में,
जीवन की साझेदारी हो। 
"देव" तुम्हारे प्रेम को पाकर,
पतझड़ में सावन बरसा है,
तुम बगिया की हरियाली में,
तुम फूलों की फुलवारी हो। 

तुम्ही साल में, तुम जीवन भर,
दिवस, निशा, हर मास तुम्ही से। 
तुम मुझको प्रेरित करती हो,
है मेरा प्रयास तुम्ही से। "

.....चेतन रामकिशन "देव".......
दिनांक-१२.०३.२०१५

Wednesday, 11 March 2015

♥♥फसल...♥♥


♥♥♥♥♥♥फसल...♥♥♥♥♥♥♥
फसल ग़मों की बड़ी हो गयी,
करें काटने की तैयारी। 
विष पीकर के रात कटी थी,
अब आयी है दिन की बारी। 
अपने हर एहसास को मैंने,
मिट्टी में अब मिला दिया है,
क्यूंकि दुनिया में नहीं होती,
दिल से दिल की नातेदारी। 

एहसासों की कद्र नहीं है,
सभी वसीयत चाहते सुख की। 
कोई नहीं पढ़ना चाहता है,
पीड़ा यहाँ किसी के मुख की। 

कोई नहीं हमदर्द है तो फिर,
दर्द की किससे साझेदारी। 
फसल ग़मों की बड़ी हो गयी,
करें काटने की तैयारी ... 

अनुकरण के भाव नहीं हैं,
सब उपदेशक बनना चाहें। 
खुद का जीवन नहीं संभलता,
पर निर्देशक बनना चाहें। 
"देव" यहाँ पर मिन्नत कोई,
नहीं सुना करता है देखो,
लेकिन पुस्तक के पन्नों पर,
प्रेम के प्रेषक बनना चाहें।

दिवस रात बढ़ती रहती है, 
जीवन में ग़म बीमारी।  
फसल ग़मों की बड़ी हो गयी,
करें काटने की तैयारी। "

.......चेतन रामकिशन "देव"........
दिनांक-१२.०३.२०१५

♥♥नीला आसमान...♥


♥♥♥नीला आसमान...♥♥♥
तुम से है एहसास सजीला। 
ग़ुल सरसों का तुमसे पीला। 
तुम आयीं तो दमक उठा मन,
जीवन मेरा रंग रंगीला। 
सखी प्रेम की वर्षा कर दो,
हो जाये पतझड़ भी गीला। 
हम दोनों का प्यार देखकर,
आसमान भी होता नीला। 

सखी दूर जब तुम जाती हो,
तो रोने का मन होता है। 
बिना तुम्हारे नहीं रात को,
भी सोने का मन होता है। 
हाथ थामकर तेरा जग में,
अपनी सुबहो शाम करूँ मैं,
तेरे प्यार के इन्द्रधनुष में,
बस खोने का मन होता है। 

तुमसे ही खुश होता आँगन,
तुमसे कुनबा और कबीला। 
हम दोनों का प्यार देखकर,
आसमान भी होता नीला ...

सखी परस्पर एहसासों में,
जब हम दोनों मिल जाते हैं। 
मन से ग़म का पतझड़ मिटता,
फूल ख़ुशी के खिल जाते हैं। 
"देव" तुम्हारा कुछ लम्हों का,
साथ मुझे देता है ऊर्जा,
तुमसे मिलकर खुशहाली के,
द्वार अनेकों खुल जाते हैं। 

तेरी प्रेम की ऊर्जा पाकर,
गिर जाता है ग़म का टीला। 
हम दोनों का प्यार देखकर,
आसमान भी होता नीला। "

........चेतन रामकिशन "देव".........
दिनांक-११.०३.२०१५

Tuesday, 10 March 2015

♥♥♥गुलदस्ते...♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥गुलदस्ते...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
सोचा था कुछ फूल खिलेंगे, यही सोच गुलदस्ते लाया।
अरसा बीता किसी डाल पर, फूल कोई लेकिन न आया।
यूँ तो मैंने हर दम उसको, अपने अश्कों से सींचा था,
रही कौनसी कमी आज तक, नहीं किसी ने भी समझाया।

नागफनी जैसी रातें हों और कंटीला दिन होता है।
ऑंखें रोकर लाल हो गयीं हैं, और हमारा मन रोता है।
मंचों पर जाकर पढ़ते वो, प्रेम भाव की बड़ी कविता,
पर सीने में झांकके देखो, उनका छोटा दिल होता है।

किस्मत को मंजूर न शायद, हसीं बहारों का वो साया।
सोचा था कुछ फूल खिलेंगे, यही सोच गुलदस्ते लाया...

चलो मुझे पतझड़ प्यारा है, और बिना गुल की डाली भी।
जो दे दो मंजूर  है मुझको, तड़प, वेदना, तंगहाली भी।
"देव" यदि तुम खुश होते हो, मेरे घर को फूंक फूंककर,
तो आ जाओ, नहीं रोकता, चलो मना लो दिवाली भी।

मेरी तो आदत है यारों, दुश्मन को भी गले लगाया।
सोचा था कुछ फूल खिलेंगे, यही सोच गुलदस्ते लाया। "

 ...................चेतन रामकिशन "देव"..................
दिनांक-१०.०३.२०१५







 

Monday, 9 March 2015

♥♥मेरे मन की...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥मेरे मन की...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मेरे मन की भी सुनते तुम, बस अपना निर्णय देते हो। 
मेरा जीवन शांत नदी सा, लेकिन तुम प्रलय देते हो। 
तुम अपनी खातिर खुशियों का, ताना बाना बुनना चाहो,
लेकिन मेरी हंसी ख़ुशी में, तुम क्यों आखिर क्षय देते हो। 

इस एकतरफा सोच को देखो, नहीं प्रीत बोला जाता है। 
प्रीत के रिश्ते को दुनिया में, न धन से तौला जाता है। 

मुझे गिराकर क्यों तुम आखिर, सोच को अपनी जय देते हो। 
मेरे मन की भी सुनते तुम, बस अपना निर्णय देते हो...

तुमसे अपनी प्रीत के बदले, बस थोड़ा सा प्यार ही चाहा। 
नाम मुझे तुम दे दो अपना, इतना सा ही अधिकार ही चाहा। 
"देव" तुम्हे मैंने जीवन में, मान दिया है खुद से ज्यादा,
मैंने तुमसे उसके बदले, मुट्ठी भर सत्कार ही चाहा। 

काश मेरी चीखों को सुनकर, निकट हमारे तुम आ जाते। 
सच कहती हूँ मेरे मन पे, चाहत के बादल छा जाते। 

मैं चाहती हूँ मिलन प्यार का, तुम विरह का भय देते हो। 
मेरे मन की भी सुनते तुम, बस अपना निर्णय देते हो। "


....................चेतन रामकिशन "देव".....................
दिनांक-०९.०३.२०१५



Sunday, 8 March 2015

♥♥तेरे केश की बूंदें...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥तेरे केश की बूंदें...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
यदि मिलन तुमसे हो जाता, भाव विरह का कम हो जाता। 
गिरती बूंदें तेरे केश से, सूखा पथ भी नम हो जाता।
मुझमें भी आ जाती ऊर्जा, स्वप्न मेरी आँखों में सजते,
दीप हर्ष के जलने लगते, दूर ये सारा तम हो जाता। 

रात को तेरा रस्ता देखा, हर दिन तुम्हें पुकारा मैंने। 
खुद को पत्थर माना किन्तु, तुमको चाँद सितारा मैंने। 
चित्र तुम्हारा सम्मुख रखकर, किया हमेशा प्रेम निवेदन,
अनजाने में भूल हुयी पर, खेद यहाँ स्वीकारा मैंने... 

जीने को तो जी लेता हूँ, पर तुम बिन उत्साह नहीं है। 
जगत समूचा पास है किन्तु, मुझे किसी की चाह नहीं है। 
"देव" जुड़ा है मन तुमसे तो, तभी तेरी प्रतीक्षा करता,
वरना दुनिया आनी जानी, मुझे किसी की राह नहीं है... 

तुम जो देतीं साथ अगर तो, मैं भी बल विक्रम हो जाता। 
दीप हर्ष के जलने लगते, दूर ये सारा तम हो जाता। "

....................चेतन रामकिशन "देव".....................
दिनांक-०८.०३.२०१५

Saturday, 7 March 2015

♥♥एक नारी...♥♥



♥♥♥♥♥♥♥♥♥एक नारी...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
एक नारी वेदना के विष को, निश दिन पी रही है। 
एक नारी जिंदगी को, दंड जैसे जी रही है। 
हाँ सही अपवाद हैं कुछ, पर यही अधिकांशत है,
एक नारी अपने मन के टुकड़े, खुद ही सी रही है। 

उसके मन में है समर्पण, जिसकी सीमा तय नहीं है। 
क्यों मगर स्त्री की फिर भी, इस जगत में जय नहीं है। 
कौन ऐसा रास्ता है, वो जहाँ पर हो सुरक्षित,
कौन सी ऐसी जगह है, उसको जिस पर भय नहीं है। 

अपने अश्रु भोर, संध्या, रात, दिन वो पी रही है। 
एक नारी वेदना के विष को, निश दिन पी रही है... 

वो नहीं चाहती समूचे, विश्व पर हो राज उसका। 
वो तो चाहती है ख़ुशी से, पूर्ण हो कल-आज उसका। 
उसके मन की वेदना को, कोई बस पढ़ले यहाँ पर। 
तो ही स्त्री खुश रहेगी, अपनी दुनिया और जहाँ पर। 

अपने घर की पूर्णता को, रिक्त होकर जी रही है। 
एक नारी वेदना के विष को, निश दिन पी रही है...

उसका आँचल रक्त में, डूबे नहीं प्रयास दे दो। 
वो भी चाहती है दमकना, उसको तुम उल्लास दे दो। 
"देव" नारी भी पराक्रम और पूरित योग्यता से,
वो तुम्हे दे चांदनी और तुम उसे प्रकाश दे दो। 

मल दो मरहम घाव पे वो, जिसको नारी सी रही है। 
एक नारी वेदना के विष को, निश दिन पी रही है। "


" अपने त्याग, समर्पण एवं स्नेह से, आँगन में जीवन भरने वाली, महिला शक्ति नमन के योग्य है, एक ऐसा जगत बन सके जहाँ नारी और पुरुष, दो ध्रुव नहीं बल्कि एक पृथ्वी, एक आसमान, एक ब्रहमांड बन जाएँ, निहित हो जायें, मान-सम्मान और स्वाभिमान, इसी कामना में। "

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-०८.०३.२०१५ 

" सर्वाधिकार सुरक्षित, मेरी ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित है। "

♥♥मन की भाषा...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥मन की भाषा...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
पढ़े-लिखे तो बहुत थे तुम पर, मन की भाषा जान सके न। 
मेरे सीने में भी दिल था, तुम उसको पहचान सके न। 
सागर जैसे आंसू देकर, मुझसे नाता तोड़ गये हो,
नाम का था शायद अपनापन, दिल से अपना मान सके न।

बस तुमसे है यही पूछना, क्यों जीवन में तुम आये थे। 
इसी तरह ग़र तड़पाना था, क्यों फिर संग संग मुस्काये थे। 

बड़ी बड़ी कसमें खाते थे, पर तुमको उनको ठान सके न। 
पढ़े-लिखे तो बहुत थे तुम पर, मन की भाषा जान सके न... 

आज कलंकित बतलाते हो, कल लेकिन पावन कहते थे। 
आज मुझे मृत्यु का दर्जा, कल लेकिन जीवन कहते थे। 
"देव" जहाँ में रंग बदलना, कोई सीखे आखिर तुमसे,
आज मुझे पतझड़ बतलाया, कल जबकि सावन कहते थे। 

आज मेरी पीड़ा पे खुश हो, कल कैसे आंसू बहते थे। 
तोड़ रहे हो तुम उस दिल को, जिस दिल में बस तुम रहते थे। 

मूकबधिर मुझको कहते हो, आह मगर तुम जान सके न। 
पढ़े-लिखे तो बहुत थे तुम पर, मन की भाषा जान सके न। "

......................चेतन रामकिशन "देव"......................
दिनांक-०७.०३.२०१५

Friday, 6 March 2015

♥♥प्रेम का गंगा जल ...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्रेम का गंगा जल ...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
पावन हो जायेगा जीवन, प्रेम का तुम गंगा जल दे दो। 
जीवन में भी प्रगति होगी, समस्याओं का तुम हल दे दो। 
कल तुमसे था, आज तुम्ही से, साँझ सवेरा सब कुछ तुमसे,
जीवन उज्जवल हो जायेगा, शेष काल तुम कल दे दो। 

तुम नयनों की ज्योति जैसी, मन में आशा भर देती हो। 
तुम मेरे छोटे सपनों को, उड़ने हेतु पर देती हो। 

निहित तुम्हीं में प्रेम आस्था, मुझको मुंहमांगा फल दे दो। 
पावन हो जायेगा जीवन, प्रेम का तुम गंगा जल दे दो...

साथ तुम्हारे पहली होली, फागुन की उपलब्धि जैसी। 
तुमसे ही जीवन में बरकत, जीवन की समृद्धि जैसी। 
"देव" तुम्ही से चमक रहा मन, धवल चाँद की किरणों जैसा,
तुम जीवन में निश्छल मूरत, तुम जीवन की शुद्धि जैसी।

तुम्हें देखना चाहें आँखें, इंतजार करती रहती है।
तुम क्या जानो बिना तुम्हारे, कितना ये बहती रहती हैं। 

पाना चाहूँ तेरी निकटता, मुझको अपना आँचल दे दो। 
पावन हो जायेगा जीवन, प्रेम का तुम गंगा जल दे दो। "

...................चेतन रामकिशन "देव".....................
दिनांक-०६.०३.२०१५

Wednesday, 4 March 2015

♥♥रंग रुधिर का...♥♥

♥♥♥♥रंग रुधिर का...♥♥♥♥
रंग रुधिर का बहुत बहा है।
अब अपनापन कहाँ रहा है।
बंटे बंटे त्यौहार सभी के,
मानवता ने दमन सहा है।
देश के दुश्मन निर्दोषों के,
रक्त से होली खेल रहें हैं,
है निर्धन की स्याह कोठरी,
चूल्हा, छप्पर सभी ढ़हा है।

रहें वर्ष भर पीड़ा देते,
किन्तु एक दिन रंग लगायें।
मन से मन तो मिला नहीं पर,
लेकिन सीने से लग जायें।
हाँ अच्छा है दूरी मिटना,
पर न बस खानापूरी हो।
होली का त्यौहार बाद में,
पहले न दिल में दूरी हो।

पीड़ित की तो आह निकलती,
शोषक को, आनंद अहा! है।
है निर्धन की स्याह कोठरी,
चूल्हा, छप्पर सभी ढ़हा है....

नहीं नाम को रंग लगाओ,
नहीं किसी को गले लगाओ।
नहीं मोहब्बत है जो दिल में,
साथ झूठ को, नहीं निभाओ।
"देव" किसी की लाश के ऊपर,
ताजमहल बनवाने से तो,
बेहतर है भूखे प्यासे को,
तीन वक़्त का अन्न खिलाओ।

हो सबको त्यौहार मुबारक,
हमने रब से यही कहा है। 
है निर्धन की स्याह कोठरी,
चूल्हा, छप्पर सभी ढ़हा है। "

....चेतन रामकिशन "देव".....
दिनांक-०५.०३.२०१५


Tuesday, 3 March 2015

♥♥पुनर्गठन...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥पुनर्गठन...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
अपने खंडित मन का फिर से, पुनर्गठन करना चाहता हूँ। 
मैं पीड़ा के विस्थापन को, घोर जतन करना चाहता हूँ। 
नया नवेला दुःख न कोई, मेरे जीवन को मुरझाये,
इसीलिए मैं अपने भीतर, आज अगन भरना चाहता हूँ। 

हाँ मैंने जाना जीवन में, लोग अधिकतर छल करते हैं। 
नहीं सूखता कभी सरोवर, नयन में इतना जल भरते हैं। 
करुण निवेदन की अनदेखी, और केवल हठधर्मी होना,
मेरी कोई कठिनाई का, नहीं जरा भी हल करते हैं। 

तभी मैं खुद ही कठिनाई का, बहिर्गमन करना चाहता हूँ। 
अपने खंडित मन का फिर से, पुनर्गठन करना चाहता हूँ... 

हूँ अपराधी नहीं मुझे पर, दंड बहुत सहना पड़ता हूँ। 
एकाकीपन की धरती पर, बिन इच्छा रहना पड़ता है। 
"देव" हूँ मानव मैं भी तुमसा, क्यों मुझको पाषाण समझते,
सोच सोच कर यही सभी कुछ, आँखों को बहना पड़ता है। 

इस पीड़ा की जिजिभिषा का, प्रबंधन करना चाहता हूँ। 
अपने खंडित मन का फिर से, पुनर्गठन करना चाहता हूँ। "

.....................चेतन रामकिशन "देव".....................
दिनांक-०३.०३.२०१५

Monday, 2 March 2015

♥♥♥अंगारे...♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥अंगारे...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
आग लगाकर खुश होते हैं, जहर पिलाकर खुश होते हैं। 
लोग यहाँ पत्थर दिल वाले, खून बहाकर खुश होते हैं। 

क्या दुनिया है समझ न पाया, इसीलिए मैं मौन हुआ हूँ। 
कल तक जिनका हमसाया था, आज मैं उनको कौन हुआ हूँ। 
गुमसुम होकर, आँख मूंदकर, दर्द हर एक मैं सह लेता हूँ। 
मेरे संग, मेरी तन्हाई,  उससे दिल की कह लेता हूँ। 

जो देता है यहाँ सहारा, उसे गिराकर खुश होते हैं। 
लोग यहाँ पत्थर दिल वाले, खून बहाकर खुश होते हैं.... 

बिना जुर्म के सज़ा मिली तो, विस्फोटक तो बनना ही था। 
आस छोड़कर सबकी खुद का, संकटमोचक बनना ही था। 
"देव" किसी मासूम पे जग में, जब कौड़े हंटर चलते हैं। 
तब ही उसके कोमल दिल में, अंगारे हर दिन जलते हैं।

नन्हीं मुन्ही हरियाली को, ख़ार बनाकर खुश होते हैं। 
लोग यहाँ पत्थर दिल वाले, खून बहाकर खुश होते हैं। "

...................चेतन रामकिशन "देव"...................
दिनांक-०३.०३.२०१५





♥♥♥कैसी होली..♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥कैसी होली..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
विरह में डूबी रात कठिन है, तिमिर बहुत गहरा छाया है। 
दिन भी बीता सुबक सुबक कर, चैन नहीं पल को आया है। 
आँखों में लाली छाई है और चेहरे पे बड़ी उदासी,
बिना तुम्हारे रंग हैं फीके, होली पे दिल भर आया है। 

तुमने दिल की सुनी नहीं क्यों, क्यों मुझसे नाता तोड़ा है। 
नहीं ख़ुदकुशी मुझे गवारा, पर जीवन भी कब छोड़ा है। 

तुम बिन हंसी, ख़ुशी सब भूला, कदम कदम पे ग़म पाया है। 
विरह में डूबी रात कठिन है, तिमिर बहुत गहरा छाया है.... 

रंगों का त्यौहार निकट है, होली पे वापस आ जाना। 
तरस गया हूँ मैं खिलने को, मुझे प्यार का रंग लगाना। 
"देव" तुम्हारे बिन अरसे से, नींद नहीं आई आँखों को,
गोद में मेरा सर रखकर के, मुझको मीठी नींद सुलाना। 

तुम आओगी तो होली पर, रंग हजारों खिल जायेंगे। 
चाँद चांदनी बरसायेगा, जब हम दोनों मिल जायेंगे। 

दुनिया में हैं लोग करोड़ों, नहीं मगर तुमसे पाया है। 
विरह में डूबी रात कठिन है, तिमिर बहुत गहरा छाया है। "

....................चेतन रामकिशन "देव"........................
दिनांक-०२.०३.२०१५