Friday, 19 October 2012


♥♥♥♥♥♥♥♥जीवन(एक गतिशील अवस्था)♥♥♥♥♥♥♥♥
जीवन पथ में कभी विरह तो, कभी मिलन के पल आते हैं!
कभी यहाँ चुभते हैं कंटक, कभी सुमन भी खिल जाते हैं!
किन्तु अपने जीवन से तुम, साहस का परित्याग न करना,
साहस का धारण करने से, मुश्किल के पल ढल जाते हैं!

जीवन की नियति में देखो, सुख दुःख दोनों की नीति है!
कभी हारती है किस्मत तो, कभी यहाँ मेहनत जीती है!

कभी यहाँ बुझते हैं दीपक, कभी सितारे जल जाते हैं!
जीवन पथ में कभी विरह तो, कभी मिलन के पल आते हैं...

भूले से भी अपने मन को, नहीं कभी अवचेतन करना!
पीड़ा की घातक किरणों का, तुम न कभी विभेदन करना!
जीवन में अपने हाथों से, किसी का जीवन न बंजर हो,
आशाओं के वाहक बनकर, नहीं निराशा प्रेषण करना!

जीवन के आँगन में देखो, कभी हर्ष की ज्योति जलती!
और कभी अपनों के हाथों, जीवन में पीड़ा भी मिलती!

कभी आज पीड़ामय होता, कभी सुनहरे कल आते हैं!
जीवन पथ में कभी विरह तो, कभी मिलन के पल आते हैं...

जो जीवन को युद्ध समझके, युद्ध कला को विकसित करते!
वही लोग एक दिन दुनिया में, इतिहासों की रचना करते!
"देव" जिन्हें अपने लक्ष्यों की, यहाँ प्राप्ति करनी होती,
वो न देखें तिमिर रात का, न कल की प्रतीक्षा करते!

जीवन के इस पथ में देखो, नहीं पराजय से घबराना!
अपने मन में आशाओं के, मरते दम तक दीप जलाना!

गर्म लहू की आंच से देखो, दुःख के हिम भी गल जाते हैं!
जीवन पथ में कभी विरह तो, कभी मिलन के पल आते हैं!"

"
जीवन पथ-ऐसे कोई व्यक्ति नहीं जो संघर्ष की अवस्था में नहीं हो, हर व्यक्ति आगे बढ़ना चाहता है, किन्तु आगे बढ़ने के लिए स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की भावना और साहस का होना अति आवश्यक है! हाँ ये भी सत्य है कि कुछ लोग सफलता के लिए दूसरों से प्रतिस्पर्धा नहीं बल्कि उन्हें गिराने/छलने का प्रयास करते हैं, किन्तु यदि आप में जीतने का जज्बा है, तो पहाड़ जैसी समस्याएँ/बाधायें भी बाधक नहीं बन सकतीं!"

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-२०.१०.२०१२ 

सर्वाधिकार सुरक्षित!
ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित!



♥♥♥♥♥♥♥♥♥वक़्त के साथ.♥♥♥♥♥♥♥♥♥
वक़्त के साथ जो चलते हैं, वो बढ़ जाते हैं!
आलसी लोग यहाँ कुछ नहीं कर पाते हैं!

जंगे-मैदान में वो खाक भला जीतेंगे,
जंग के नाम से ही लोग जो डर जाते हैं!

ऐसे लोगों में कहाँ जिन्दादिली होती है,
गम के तूफान से जो पल में बिखर जाते हैं!

ऐसे लोगों को भला कैसे भुलाये कोई,
रूह में चांदनी बनके जो उतर जाते हैं!

लोग ऐसे भी "देव" कम नहीं जमाने में,
मुल्क के नाम जो हँसते हुए मर जाते हैं!"

.........(चेतन रामकिशन "देव").........

♥♥♥♥♥♥♥♥उनकी जुदाई.♥♥♥♥♥♥♥♥♥
उनकी जुदाई का बड़ा, गहरा असर हुआ!
मंजिल भी खो गईं सभी, सुनसान घर हुआ!

आँखों से अश्क बहते हैं, सांसों में चुभन है,
बिन उनके जिंदगी का ये मुश्किल सफर हुआ!

आया जो बुरा वक़्त तो हालात ये हुए,
अपनों की तरह अजनबी मेरा शहर हुआ!

अख़बारों में भी छपते हैं दमदार के बयां,
अख़बार भी मजलूमों से अब बेखबर हुआ!

अब "देव" कौन किसके लिए फिक्रमंद है,
गुम अपने में देखो यहाँ, हर इक बशर हुआ! "
..........(चेतन रामकिशन "देव")............

Wednesday, 17 October 2012


♥♥♥♥♥♥♥कविता(एक उत्कृष्ट अभिव्यक्ति)♥♥♥♥♥♥♥♥
कभी कविता चाँद सी प्यारी, तारों जैसी झिलमिल लगती!
कभी कविता मित्र सरीखी, मानव दुःख में शामिल लगती!
कभी कविता प्रेम मिलन तो कभी विरह में गोते खाती, 
कभी कविता शिक्षक जैसी, पढ़ी-लिखी और काबिल लगती!

कविता भी बेहद अच्छी है, जो सुख दुख का बोध कराए!
कभी लौटकर बचपन में वो, बालक की भांति मुस्काए!

कभी कविता खद्दर जैसी, और कभी ये मलमल लगती!
कभी कविता चाँद सी सुन्दर, तारों जैसी झिलमिल लगती...

कभी कविता हरियाली के परिधानों में मन को भाती!
कभी कविता कोयल जैसे मधुर मधुर संगीत सुनाती!
कभी कविता बंजर भूमि और कृषक का दर्द उभारे,
कभी कविता मजदूरों के शोषण की तस्वीर दिखाती!

कविता भी बेहद अपनी है, ये आँखों में स्वप्न जगाए!
और कभी दर्पण की तरह, सच्चाई का चित्र दिखाए!

कभी कविता गर्म लहू तो, गंगाजल सी शीतल लगती!
कभी कविता चाँद सी प्यारी, तारों जैसी झिलमिल लगती...

कविता के रचनाकारों तुम, कविता का सम्मान बढ़ाना!
कविता को न दूषित करना, कविता का न शीश झुकाना!
"देव" कविता अपने मन की, और ह्रदय की अभिव्यक्ति है,
किन्तु अपनी प्रस्तुति से, हिंसा की न आग लगाना!

कविता को भी कुछ लोगों ने, अपने पथ से भटकाया है!
कुछ लोगों ने कविता से भी, जन मानस को भड़काया है!

कभी कविता दुरित विचारक, और कभी ये दलदल लगती! 
कभी कविता चाँद सी प्यारी, तारों जैसी झिलमिल लगती!"

"
कविता-मन की अभिव्यक्ति-चूँकि कलमकार समाज का दर्पण होता है, इसीलिए ऐसे में उसकी जिम्मेदारी और भी ज्यादा हो जाती है कि वो समाज को एक ऐसा द्रश्य दिखाए, जिससे पाठक का अंतर्मन, स्वस्थ भावना के साथ उन शब्दों से जुड़े और उन शब्दों का अनुकरण होने पर समाज में मानवीयता भंग न हो!"

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-१८.१०.२०१२ 

"सर्वाधिकार सुरक्षित"
ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित!

♥♥♥♥♥♥♥काँटों की चुभन.♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
आजकल रिश्ते भी कमजोर बहुत होने लगे!
आज अपने ही मुझे दर्द में डुबोने लगे!

कल तलक जो मेरी राहों में फूल रखते थे,
वही बेदर्दी से अब काँटों को चुभोने लगे!

आज कल मुल्क के नेताओं की हालत देखो,
अपने लालच में अछूतों के घर भी सोने लगे!

बूंद भर को प्यार को तरसेंगे वही लोग यहाँ,
बीज नफरत के जो सारे जहाँ में बोने लगे!

"देव" बाजार में अब कीमतें घटीं देखो,
चंद सिक्कों के लिए लोग ईमां खोने लगे!"

...........(चेतन रामकिशन "देव").............

Tuesday, 16 October 2012


♥♥♥♥♥♥♥♥♥मेरे खत..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तुम भले ही मेरे खत को संभाल कर रखना!
हाँ मगर उसको लिफाफे में डाल कर रखना!

भूल से भी नहीं पढ़ना कभी अलफ़ाज मेरे,
गर पढ़ो तो जरा आंसू संभाल कर रखना!

तेरे होठों पे कभी, नाम न आ जाये मेरा.
अपनी यादेँ मेरे दिल से निकाल कर रखना! 

गम के जितना करीब लाओगे तो तड़पोगे,
गम के सूरज को तुम ऊँचा उछाल कर रखना!

अब अलग होके "देव" जीने की मजबूरी है,
तुम मेरे प्यार को, ख्वाबों में ढाल कर रखना!"

............चेतन रामकिशन "देव"...............

सर्वाधिकार सुरक्षित!
ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित!

Monday, 15 October 2012


♥♥♥♥♥♥♥♥देश के नाम ♥♥♥♥♥♥♥♥♥
देश के नाम जो मर जाते हैं, मिट जाते हैं!
लोग ऐसे कहाँ अब, याद किये जाते हैं!

हम तो डरते हैं यहाँ मौत की खनक से ही,
और वो फांसी के फंदे पे भी मुस्काते हैं!

उनकी तस्वीर पे दो फूल भी नहीं साहब,
और हम पत्थरों पे लाख धन लुटाते हैं!

मुल्क में रहते हैं अब सिर्फ तमाशाई ही,
और गुंडे यहाँ इज्ज़त को लूट जाते हैं!

इससे तो अच्छा है वो "देव" पुराना भारत,
लोग बच्चों को जहाँ, होंसला सिखाते हैं!"

........चेतन रामकिशन "देव"...........


♥♥♥♥♥♥♥न ही देखा माँ दुर्गे को..♥♥♥♥♥♥♥♥
न ही देखा माँ दुर्गे को, न देखा माँ सरस्वती को!
न लक्ष्मी को देखा मैंने, न ही देखा शैल छवि को!

अपनी दोनों माताओं में, पर इनके दर्शन होते हैं!
देवी शक्ति के ह्रदय भी, माँ जैसे कोमल होते हैं!

देवी जैसे सुन्दर करतीं, दोनों माता मेरी मति को!
न ही देखा माँ दुर्गे को, न देखा माँ सरस्वती को!"
♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-१६.१०.२०१२ 


"
नवरात्रि के पवित्र दिवसों की बेला पर अपनी दोनों माताओं( माँ कमला देवी और माँ प्रेमलता जी) को 


समर्पित पंक्तियाँ, मैंने माँ दुर्गे अथवा उनके रूप अपनी आँखों से भले नहीं देखे हों, किन्तु मुझे अपनी दोनों 

माताओं में उनकी छवि दिखती है! क्यूंकि माँ(नारी) होती हैं और नारी स्वयं देवी होती हैं"


♥♥♥♥शब्दों का तन..♥♥♥♥♥
आज कलम का मन ज़ख़्मी है 
और शब्दों का तन ज़ख़्मी है!

हिंसा से भूमि घायल है,  
और ये नील गगन ज़ख़्मी है!

हंसी भला कैसे आये,
जब मानवता की लाश पड़ी हो!

नहीं कफ़न तक के पैसे हों,
और निर्धन की रुदन घड़ी हो!

संतानों के होते भी जब,
घर के बूढ़े मांगे भिक्षा,

और लोगों की जान से ज्यादा,
जब दौलत की छवि बड़ी हो!

हरियाली का वध करने से,
आज हमारा वन ज़ख़्मी है!

आज कलम का मन ज़ख़्मी है!
और शब्दों का तन ज़ख़्मी है!"

....चेतन रामकिशन "देव"......

Sunday, 14 October 2012


♥♥♥♥♥♥♥वियोग(वेदना की यात्रा).♥♥♥♥♥♥♥♥♥
प्रीत का धागा टूट गया और मन को मिला वियोग!
छोड़ गए हैं मुझको अपना कहने वाले लोग!
जीवन पथ में भी चुभते हैं, अब पीड़ा के शूल,
हँसते गाते इस जीवन को, लगा दुखों का रोग!

न जाने क्यूँ बन जाते हैं, लोग यहाँ पाषाण!
उनको क्या निकलें तो निकलें भले किसी के प्राण!

सोचा न था भावनाओं का, होगा यूँ प्रयोग!
प्रीत का धागा टूट गया और मन को मिला वियोग...

हुआ है मन के रिश्ते का भी क्षण भर में अवसान!
मेरे दुखों का, मेरे घाव का, नहीं है उनको ध्यान!
मेरे रोते नयनों से भी, नहीं है उनको नेह,
इस पीड़ा से जीवन पथ में, हुआ बड़ा व्यवधान!

मेरी याचना की भी रखी, नहीं उन्होंने लाज!
नहीं पसीजे सुनकर मेरी रुंधी हुयी आवाज!

अपनों ने बस छला है मुझको, किया है बस उपयोग!
प्रीत का धागा टूट गया और मन को मिला वियोग...

ऐसे लोग नहीं अपने जो, नहीं समझते पीर!
ऐसे लोग तो भेद रहे, बस ह्रदय और शरीर!
"देव" नहीं पीड़ा तक में, वो करते हैं स्नेह,
मुखमंडल से स्फुट करते, वो जहरीले तीर!

मेरे नयनों के अश्रु से, भीग गया आकाश!
न ही मन में हर्ष है कोई, न कोई उल्लास!

औरों को दुख देकर कैसे, हर्षित रहते लोग!
प्रीत का धागा टूट गया और मन को मिला वियोग!"

"
वियोग- के कारण किसी का जीवन, पीड़ा और वेदना के अति निकट पहुँच जाता है और उस व्यक्ति के जीवन से हर्ष और उल्लास के रंग लुप्त हो जाते हैं, वो व्यक्ति हंसने की चेष्टा भी करे, तो भी उसके नयन सजल हो जाते हैं, तो आइये किसी को वियोग और वेदना देने से पहले मंथन करें!"

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-१५.१०.२०१२

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Saturday, 13 October 2012



♥♥♥♥♥♥♥धूप की जलन..♥♥♥♥♥♥♥♥
धूप में जलने की आदत तो डालनी होगी!
वक़्त में ढलने की आदत तो डालनी होगी!

झूठ से रूह को सुकून नहीं मिल सकता,
झूठ से डरने की आदत तो डालनी होगी!

हाथ पे हाथ जो रख दोगे, तो क्या पाओगे,
कुछ कर गुजरने की आदत तो डालनी होगी!

दर्द को देख के कमजोर नहीं पड़ जाना,
दर्द को सहने की आदत तो डालनी होगी!

प्यार है "देव" तो इजहार भी जरुरी है,
हाले दिल कहने की आदत तो डालनी होगी!"

("शुभ-दिवस"..चेतन रामकिशन "देव")




♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥हे मानव...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मर्यादा का परदा मन से, तार-तार जब हो जाता है!
और नैतिकता की नीति का, संस्कार जब खो जाता है!
संबंधों के अपनेपन में, बढ़ जाती है जब कड़वाहट,
और मनुज के ह्रदय का जब, शुद्ध आचरण सो जाता है!

ऐसी दुरित दशा में देखो, सामाजिकता भी रोती है!
नहीं पता मानव की बुद्धि, क्यूँ मन से चेतन खोती है!
क्यूँ लालच के हाथों मानव, मानव का ही रक्त बहाता,
जाने क्यूँ उसकी अनुभूति, चिर निद्रा में सो जाती है!

जागरूक होकर के इसका, चिंतन तो करना ही होगा!
हे मानव! तुझे ह्रदय में अपने, प्रेम भाव भरना ही होगा!"

.................चेतन रामकिशन "देव".........................







Friday, 12 October 2012


♥♥♥♥♥♥♥मन की उड़ान.♥♥♥♥♥♥♥♥♥
कुछ करने की मन में जरा उड़ान तो भरो!
सच्चाई से हासिल कोई मुकाम तो करो!

जीने को तो जीते हैं, करोड़ों यहाँ मगर,
जो भीड़ में चमके, जरा वो नाम तो करो!

नफरत से रंज बढ़ता है, बढती है दूरियां,
लोगों के दिल में, प्यार का पैगाम तो भरो!

इस मुल्क को जो दे गए, आजादी का तोहफा,
उनको जरा अदब से तुम, सलाम तो करो!

एक दिन तुम्हारे क़दमों पे, चलेगा ये जहाँ,
पर "देव" कोई यादगार, काम तो करो!"
..........चेतन रामकिशन "देव"...........

Thursday, 11 October 2012


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥वक्त..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
वक्त तो वक्त है, अच्छा भी है, खराब भी है!
जिंदगी स्याह कभी और आफ़ताब भी है!

कोई हँसता है यहाँ, चेहरे पर रौनक लेकर,
किसी की आंख में, आंसू भरा सैलाब भी है!

कोई तो तरसे यहाँ, एक बूंद भर पानी को,
किसी की राह में बहती, यहाँ शराब भी है!

कोयला खोदने वाला यहाँ काला पड़ता,
कोयला बेचने वाला यहाँ महताब भी है!

"देव" गुमनामी में मर जाता है कोई देखो,
कोई दुनिया में मगर हीरे सा, नायाब भी है!"

"वक्त-का अपना एक नियम है! कभी वक्त अच्छा होता है तो कभी ख़राब! कभी वक्त हमे उत्कृष्टता प्रदान करता है तो वहीँ कभी ये वक्त जमींदोज कर देता है! वक्त के इन्ही क्षणों को शब्द देने भर की कोशिश की है.."

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-१२.१०.२०१२

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ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित!


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
दूर हो मुझसे मगर पास नजर आती हो!
रात में ख्वाब की तरह से मचल जाती हो!
जब भी होता है अँधेरा मेरे जीवन पथ में,
चांदनी बनके चंहुओर तुम खिल जाती हो!"

..........चेतन रामकिशन "देव"...........

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
बंद आँखों से न ख्वाबों का नजारा देखो!
उतरो सागर में नहीं सिर्फ किनारा देखो!

तुमको पानी है जो, जीवन में बुलंदी अपने,
करो मेहनत नहीं किस्मत का सितारा देखो!

जिंदगी है तो यहाँ दुख भी और सुख भी हैं,
बिना दुख के नहीं, जीवन का गुजारा देखो!

मुल्क में छूट भी मिलती है बस अमीरों को,
कोई बनता नहीं, मुफलिस का सहारा देखो!

मिट रहे रिश्ते "देव", चंद रुपयों की खातिर,
बाप को बेटे ने, बेदर्दी से मारा देखो!"

................चेतन रामकिशन "देव".............


Wednesday, 10 October 2012



♥♥♥♥♥♥♥♥♥अपनों का दंश...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
निर्मोही होकर अपनों ने, दर्द दिया है अंतर्मन को!
गम की स्याही से रंग डाला, अपनों ने मेरे जीवन को!

अपनी लय में आने की, यूँ तो कोशिश करता हूँ लेकिन,
गर अपने पर नहीं काटते, तो छू लेता नील गगन को!

रूप रंग की चमक देखकर, लोग यहाँ सुध-बुध खो देते,
नहीं झांकता दिल में कोई, नहीं बाँचता कोई मन को!

गैरों से क्या करें शिकायत, उनका कोई गुनाह नहीं है,
रोंद रहा है जब माली ही, बगिया के हर खिले सुमन को!

"देव" एक दिन आएगा वो, जब वो बेटी को तरसेंगे,
आज कोख में कुचल रहे जो, अजन्मी बेटी के तन को!"

...................चेतन रामकिशन "देव"....................


Tuesday, 9 October 2012


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥मन की सोच..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
सुन्दर रखो मन को अपने, दुरित भावना न अपनाओ!
मानवता के प्रहरी बनकर, अपनायत के दीप जलाओ!

जीवन में संसाधन हेतु, सीमित धन का संचय कर लो,
किंतु इस दौलत को अपनी, तुम कमजोरी नहीं बनाओ!

ये जीवन है चार दिनों का, दुःख में इसे बिताते क्यूँ हो,
संतुष्टि को धारण करके, इस जीवन में खुशी मनाओ!

जीवन की ये आपा धापी, चलती रहती है जीवन भर,
इसीलिए तुम इस जीवन की, परीक्षाओं से न घबराओ!

ये पक्का है इक दिन अपनी, मेहनत देखो रंग लाएगी,
"देव" यही आशा लेकर के, तुम जीवन में बढ़ते जाओ!"

........."शुभ-दिन"......चेतन रामकिशन "देव".........


♥♥♥♥♥♥दर्द का आसमान..♥♥♥♥♥♥♥
दर्द का आसमान, जिंदगी पे छाने लगा!
उसकी यादों का असर, आज फिर सताने लगा!

जो कल तलक मेरा हमदर्द, मेरा अपना था,
आज वो शख्स ही, मुझसे नजर चुराने लगा!

आज कल रिश्तों का कैसा, हश्र हुआ देखो,
भाई अपने ही भाई का, लहू बहाने लगा!

जिसको ताक़त यहाँ मिल जाती है, धन दौलत की,
वही इन्सान गरीबों पे, कहर ढ़ाने लगा!

"देव" अब देखिये हालात कैसे आये हैं,
आईना भी मेरी सूरत को, अब भुलाने लगा!"

............चेतन रामकिशन "देव".................

Monday, 8 October 2012


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥न रुकना तुम.♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
पथ हो चाहे दुर्गम कितना और सीने में गम हो कितना!
न रुकना तुम चलते जाना, तूफानी मौसम हो कितना!

समस्याओं से लड़ने की जब, शक्ति अपने मन भर लोगे!
अपने मन की दुरित भावना पर, जब तुम काबू कर लोगे!
उस दिन निश्चित ही जीवन में, उदय हर्ष का सूरज होगा,
जिस दिन तुम अपने जीवन में, नफरत से तौबा कर लोगे!

न डरना तुम अंधकार से, भले उजाला कम हो कितना!
पथ हो चाहे दुर्गम कितना और सीने में गम हो कितना...

बस किस्मत की राह देखकर, इस जीवन को नष्ट करो न!
तुम मिथ्या के संवाहक बन, इस जीवन को भ्रष्ट करो न!
इस जीवन में अभिमान के, अंकुर अपने मन में बोकर,
असहायों और कमजोरों के, जीवन में तुम कष्ट भरो न!

संतुष्टि से रहना सीखो, भले ही साधन कम हो कितना!
पथ हो चाहे दुर्गम कितना और सीने में गम हो कितना...

जो जीवन में लक्ष्य की खातिर, अपनी पीड़ा सह जाते हैं!
वही लोग एक दिन जीवन में, विजय लक्ष्य पर कर पाते हैं!
"देव" जो जीवित होकर के भी, रहते हैं मुर्दा बनकर के, 
कहाँ भला ऐसे जन देखो, दुनिया में कुछ कर पाते हैं!

खून में अपने गर्मी रखो, मौसम चाहें नम हो कितना!
पथ हो चाहे दुर्गम कितना और सीने में गम हो कितना!"

"
जीवन, जब जब आत्मविश्वास, साहस, दृढ संकल्प, संघर्ष और मेहनत के साथ जिया जाता है, तब तब जीवन में देखे गए लक्ष्य पूर्ण होते चले जाते हैं, जीवन में कमजोर और मृत प्राय रहने, जीवन अपनी उत्कृष्ट योग्यता को कभी प्राप्त नहीं कर पाता, तो आइये जीवित जीवन को, जीवित होकर जीने का प्रयास करें....."

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-०९.१०.२०१२ 

सर्वाधिकार सुरक्षित!
मेरी ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित!














Sunday, 7 October 2012


♥♥♥♥♥♥जगा है जब से प्यार..♥♥♥♥♥♥♥♥
सखी जगा है जब से, मेरे मन में तेरा प्यार!
बड़ा ही सुन्दर लगता तब से, मुझको ये संसार!
मधुमयी है मेरा हर दिन, मधुमयी है रात,
सखी तुम्हारे प्रेम की बहती, हर क्षण मधुर बयार!

सखी जहाँ में प्रेम से पावन, नहीं कोई सम्बन्ध!
सखी प्रेम ही महकाता है, चन्दन भरी सुगंध!

सखी प्रेम ही शीतल करता, हिंसा के अंगार!
सखी जगा है जब से, मेरे मन में तेरा प्यार...

सखी प्रेम सूरज बनकर के, देता है प्रकाश!
सखी प्रेम से सुन्दर लगते, धरती और आकाश!
सखी प्रेम में हमें परस्पर, सुख-दुख का हो बोध,
सखी प्रेम में एक दूजे पर, बढ़ता है विश्वास!

सखी प्रेम है हरियाली की, हरी-भरी सौगात!
सखी प्रेम न देखे दौलत, न देखे औकात!

सखी प्रेम है उपवन जैसी, खिलती हुयी बहार!
सखी जगा है जब से, मेरे मन में तेरा प्यार...

सखी प्रेम देता है हमको, समरसता का ज्ञान!
सखी प्रेम से खिल जाती है, अधरों पर मुस्कान!
सखी तुम्हारे प्रेम से देखो, मिली "देव" को जीत,
सखी तुम्हारे प्रेम से मेरा, मन है आशावान!

सखी प्रेम से दुश्मन भी, बन जाते देखो मित्र!
सखी प्रेम है गंगाजल सा, मीठा और पवित्र!

सखी प्रेम से मिलता हमको, जीवन में सत्कार!
सखी जगा है जब से, मेरे मन में तेरा प्यार!"


"प्रेम-के भाव जब मन में जगते हैं तो ये संसार, बहुत सुन्दर लगने लगता है! मन से हिंसा और द्वेष के भाव लुप्त हो जाते हैं और मन गंगाजल की तरह शीतल और पवित्र हो जाता है! प्रेम के ये अनमोल भाव, किसी व्यक्ति की दौलत और संपत्ति से प्रभावित होकर नहीं उपजते, बल्कि ये प्रेम के भाव तो स्वयं दुनिया की सबसे बड़ी दौलत और संपत्ति हैं"

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-०८.१०.२०१२

सर्वाधिकार सुरक्षित!
मेरी ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित!


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
आज उन्हीं लोगों ने हमसे, दूरी बहुत बना ली देखो,
जो हमसे कहते थे अपना, सात जनम तक का रिश्ता है!

घर में गर बेटी जन्मे तो, सबके चेहरे मुरझा जाते,
और अगर बेटा जन्मे तो, लगता कोई फरिश्ता है!

चंद रुपयों की खातिर देखो, होता कत्लेआम यहाँ पर,
मानो पानी से ज्यादा तो, खून यहाँ पर सस्ता है!

देश के दौलत वाले बेशक, छु लें अम्बर, आसमान को,
लेकिन "देव" करोड़ों की तो, आज भी हालत खस्ता है!"

.................चेतन रामकिशन "देव".......................

Saturday, 6 October 2012


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥अपनायत के दीप ♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
पत्थर जैसा दिल न करना, तुम मंजिल बोझिल न करना!
तुम औरों को दुख देकर के, अपना सुख हासिल न करना!

नफरत का माहौल बहुत है, लेकिन फिर भी प्यार निभाना!
मानवता को छलनी करके, मजलूमों को नहीं सताना!
कोई अपना दुख भी दे तो, उससे तुम नफरत न करना,
तुम दिल में अपनायत भरकर, अपनायत के दीप जलाना!

मानवता का खून बहाकर, तुम खुद को कातिल न करना!
पत्थर जैसा दिल न करना, तुम मंजिल बोझिल न करना!"

............शुभ-दिन".....चेतन रामकिशन "देव"...............

♥♥♥♥♥♥♥♥दिल की आवाज..♥♥♥♥♥♥♥♥
मेरे दिल की कभी आवाज, जो तुम सुन पाते!
मेरी राहों से कभी खार, अगर चुन पाते!

तुम भी गर देखते नजदीक से, तड़प मेरी,
मेरा दावा है, उस रोज तुम भी रो जाते!

हमको लगता जहाँ, उस रोज बहुत ही प्यारा,
जिस दिन एक दूसरे के, हम जो यहाँ हो जाते!

नींद आती हमें, उस वक़्त बहुत ही मीठी,
उनकी जो गोद में, सर रखके कभी सो जाते!

"देव" हमको भी जमाना ये याद करता गर,
हम भी कुर्बान जो, इंसानियत पे हो जाते!"

.............चेतन रामकिशन "देव".............

Friday, 5 October 2012


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥तंगहाल..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
देश का निर्धन तंगहाल है, दुखी है बेरोजगार!
इनकी आँखों से बहती है, हर क्षण अश्रुधार!
खुले गगन के नीचे सोना, इनकी है मजबूरी,
इनका हित अनदेखा करती, देश की हर सरकार!

भूख प्यास से देखो इनके, जर्जर हुए शरीर!
बड़ी ही धुंधली देखो, इनके जीवन की तस्वीर!

अपनी मांग उठाते हैं तो पड़ती इन पर मार!
देश का निर्धन तंगहाल है, दुखी है बेरोजगार...

पढ़ लिखकर कुछ बन जाएँ, स्वप्न हुए सब चूर!
देश का हर एक निर्धन वासी , हुआ बड़ा मजबूर!
इनके दुख और बेचैनी को, मिलता नहीं करार,
इनके ज़ख्म भी बिना दवा के, बन जाते नासूर!

न भाए फिर इनके मन को, लेखन और किताब!
इनकी आंखे भूले से भी, फिर नहीं देखती ख्वाब!

जीर्ण-शीर्ण हो जाता, इनके जीवन का आधार!
देश का निर्धन तंगहाल है, दुखी है बेरोजगार...

जाने कब इनके जीवन का, बदलेगा ये ढंग!
जाने कब इनके जीवन में, भरेगा कोई रंग!
"देव" न जाने कब तक, इनको मिलेगा यूँ ही दर्द,
न जाने कब खुशी की, इनके मन में बजे तरंग!

दुख में जीवन यापन करते, देश के वंचित लोग!
इस पर भी नेता करते हैं, इनका बस उपयोग!

जाने कब इनके जीवन में, आये सुखद बहार!
देश का निर्धन तंगहाल है, दुखी है बेरोजगार!"

"देश- के निर्धन और बेरोजगार, वास्तव में मर मर के जिंदगी जीने को विवश हैं! देश की सरकारें, इनके हित के लिए भले ही अनेकों योजनायें चल रही हों, किन्तु भ्रष्ट अफसरशाही और नेताओं/ प्रतिनिधियों की लूटमार की नीति, उस पात्र तक लाभ नहीं पहुँचने देती, जो उन योजनाओं/रोजगार का पात्र है! "

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-०६.१०.२०१२

रचना संपादन-सम्मानित सीमा गुप्ता जी!

सर्वाधिकार सुरक्षित!
मेरी ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित!

♥♥♥♥♥♥♥♥प्यारा मुखड़ा.. ♥♥♥♥♥♥♥♥♥
बड़ा ही प्यारा मुखड़ा तेरा, सुन्दर है मुस्कान!
तू ही धड़कन मेरे दिल की, तू ही तन की जान!

नयन तुम्हारे बड़े ही प्यारे, मन को भाते केश!
बड़े ही सुन्दर लगते तुम पर, रंग बिरंगे वेश!
झुमकों के मोती भी, देखो बढ़ा रहे हैं रंग,
और तुम्हारी वाणी में है, न हिंसा, न द्वेष!

तुम सरिता जैसी निर्मल हो, फूलों सी नादान!
बड़ा ही प्यारा मुखड़ा तेरा, सुन्दर है मुस्कान!"

................चेतन रामकिशन"देव"................


Thursday, 4 October 2012


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥पथरीला पथ.♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
जीवन का पथरीला पथ भी, एक दिन समतल हो जायेगा!
घनी अमावस स्याह रात का, रंग धवल भी हो जायेगा!

किन्तु ऐसा तब ही होगा, जब तुम आशावान बनोगे!
जात-धर्म से ऊपर उठकर, जब अच्छे इन्सान बनोगे!
अपने मन से कमजोरी के, भावों को तुम मुक्ति देकर,
शक्ति के संवाहक बनकर, तुम जिस दिन बलवान बनोगे!

जब तुम अच्छा सोचेगे तो, मन भी निर्मल हो जायेगा!
जीवन का पथरीला पथ भी, एक दिन समतल हो जायेगा..

ये सच है के जीवन पथ में, बड़े बड़े दुख के क्षण आते!
दिल भी खून के आंसू रोता, आँखों से आंसू बह जाते!
किन्तु इस जीवन में देखो, बिना दर्द रक्खा क्या है,
दर्द भरे ये क्षण ही देखो, जीवन में शक्ति भर जाते!

आज दर्द को सहन करो तुम, इक दिन अच्छा कल आयेगा!
जीवन का पथरीला पथ भी, इक दिन समतल हो जायेगा!"

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-०५.१०.२०१२ 






Wednesday, 3 October 2012




♥♥♥♥♥♥♥बनावटी चेहरे..♥♥♥♥♥♥♥♥♥
आजकल रूह के रिश्ते की बात क्या करनी,
लोग तो पल में मोहब्बत को, भुला देते हैं!

आजकल देखिये ज़माने का ये हाल हुआ,
घर के मुखिया ही, आज घर को जला देते हैं!

जिन पर रखो यकीन, अर्श पे ले जाने का,
लोग वो देखिये, मिटटी में मिला देते हैं!

जो किये करते हैं, दावे यहाँ अपनेपन के,
लोग वो नींव ईमारत की हिला देते हैं!

"देव" शायद यही दस्तूर है मोहब्बत का,
बेवफा लोग ही, वफ़ा का सिला देते हैं! "

............चेतन रामकिशन "देव"...........

Tuesday, 2 October 2012


♥♥♥♥♥♥यादें(अतीत का दर्पण)♥♥♥♥♥♥♥
याद एक रोज बहुत, तुमको मेरी आएगी!
बीते लम्हों की झलक, तुमको भी रुलाएगी!
तुमको याद आयेंगे, जब मेरी आंख के आंसू,
तो तुम्हारी भी आंख, अश्क से भर जाएगी!

भूल से भी तुम्हें बदनाम, मगर करता नहीं!
आपकी तरह झूठ को, सलाम करता नहीं!

झूठ की दुनिया, कब तलक यूँ जगमगाएगी!
याद एक रोज बहुत, तुमको मेरी आएगी....

रूह का रिश्ता भी, पल भर में मिटाया तुमने!
अपने ही हाथ से घर अपना, जलाया तुमने!
तुम तो कहते थे के, रिश्ता है सात जन्मों का,
और कुछ लम्हों में, हर रिश्ता भुलाया तुमने!

भरी दुनिया में मुझे, तनहा तुमने छोड़ दिया!
बड़ी बेदर्दी से दिल, तुमने मेरा तोड़ दिया!

मेरे दिल की ये आह, तुमको भी तड़पाएगी!
याद एक रोज बहुत, तुमको मेरी आएगी....

प्यार में मैं नहीं, हम बनके जिया जाता है!
आंसू एक दूजे का हंसकर के पिया जाता है!
"देव" हैं प्यार में, कुर्बानियां बहुत सारी,
उनका इल्जाम तक, सर अपने लिया जाता है!

प्यार के बिन तो ये संसार बस पराया है!
कहाँ नफरत से भला. कुछ यहाँ मिल पाया है!

प्यार के बिन तो ये, दुनिया भी सिमट जाएगी!
याद एक रोज बहुत, तुमको मेरी आएगी!"

" यादें-किसी के चले जाने के बाद भी, उसकी मौजूदगी को हमारे दिल में जिन्दा रखती हैं! कोई व्यक्ति भले ही हमारे प्रेम, हमारे अपनत्व का अंत करके चला जाये, किन्तु यादें उसे भी एक रोज जाकर बीते लम्हों की झलक दिखाती हैं! "

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-०३.०१०.२०१२

सर्वाधिकार सुरक्षित!

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥चलें निखरने.♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
चलो रात की बाहों में हम, सपनो को आगोश में भरने!
कुछ जाने, अपने लोगों से, प्यार भरी दो बातें करने!
उनके बाजु पर सर रखकर, सुननें कोई गीत-कहानी,
धवल चांदनी में चंदा की, आओ चलें हम लोग निखरने!"

....."शुभ-रात्रि".............चेतन रामकिशन "देव"...........

Sunday, 30 September 2012


♥♥♥♥♥प्रीत(एक अमूल्य अनुभूति)♥♥♥♥♥♥♥♥
मन की कोमल अनुभूति में, जग गयी देखो प्रीत!
एक अनजाने शख्स को मैंने, बना लिया मनमीत!

फूलों की टहनी से लिखा, दिल पर उसका नाम!
छवि बहुत प्यारी है उसकी, जैसे हो गुलफ़ाम!
जब से मेरे मन जागी है, उसके प्रेम की सोच,
तब से देखो खिली खिली है, मेरी सुबहो-शाम!

उसकी बोली लगती जैसे, वीणा का संगीत!
मन की कोमल अनुभूति में, जग गयी देखो प्रीत!

उसके सपनों से रौशन है, मेरी तो हर रात!
मेरे सीने पर सर रखकर, करती है वो बात!
महक रहा उसकी खुशबु से, ये अपना घर आंगन,
उससे बतियाते बतियाते, हो जाती प्रभात!

उसकी सूरत दिखती पहले, लिखुब ग़ज़ल या गीत!
मन की कोमल अनुभूति में, जग गयी देखो प्रीत!

जिस दिन मेरा प्रेम निवेदन करेगी वो स्वीकार!
उस दिन देखो हो जायेगा, जीवन में श्रृंगार!
लेकिन कोई शर्त नहीं, वो बदले में दे प्रेम.
कभी प्रेम में हाँ होती है, और कभी इनकार!

"देव" प्रेम एहसास है जिसमे, नहीं हार, न जीत!
मन की कोमल अनुभूति में, जग गयी देखो प्रीत!"

" प्रीत-की अनुभूति जब भी कोमल मन में जगती है, तो जीवन सचमुच खिला खिला हो जाता! भले की कोई अनजाना व्यक्ति आकर ह्रदय में प्रेम की दस्तक दे, लेकिन वो फिर भी अपना लगता है! प्रेम की अनुभूति के ये शब्द बहुत कर्णप्रिय होते हैं, इन शब्दों में एक सरगम होती है! तो आइये इस सरगम में खो जायें!"

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-०१.१०.२०१२

"रचना अपनी अनदेखी प्रेम की अनुभूति समर्पित!"


सर्वाधिकार सुरक्षित!



♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥मन का रिश्ता.♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
प्रेम से पूर्ण रखो ह्रदय को, द्वेष से मुक्त रखो तुम मन को!
मन से मन का रिश्ता जोड़ो, न देखो तुम केवल तन को!

धन, दौलत, सोने, चांदी से, न आंको अच्छाई किसी की,
धन-दौलत को धवल मानकर, नहीं स्याह समझो निर्धन को!

तुम मदिरा और नशे में बहकर, न मुंह मोड़ो कर्तव्यों से,
तुम बनकर के नशे के आदी, नहीं नाश करना यौवन को!

तुम जीवन के पदचिन्हों में, इतना आकर्षण तो भर दो,
लोग जो तुमसे प्रेरित होकर, करें सफल अपने जीवन को!

"देव" निराशा से तुम अपने, जीवन की हिम्मत न हारो,
एक दिन अपनी मेहनत से तुम, कर लोगो के स्पर्श गगन को!"

..."शुभ-दिन".............चेतन रामकिशन "देव".....................

Friday, 28 September 2012


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥मानवता का दीप..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
अपने मन से मानवता का, दीप कभी न बुझने देना!
तुम शोषण के आगे अपना, शीश कभी न झुकने देना!

अपने शब्दों में मर्यादा और नैतिकता का पालन कर,
अपने शब्दों से श्रोता का, ह्रदय कभी न दुखने देना!

युद्द में देखो विजय-पराजय, किसी के हिस्से तो आनी है,
बिना लड़े ही अपने मन का, जोश कभी न चुकने देना!

मिथ्या के धुंधले मेघा में, सच का सूरज छुपेगा कब तक,
इसीलिए अपने हाथों से, सत्य कभी न बिकने देना!

जिसको पढ़कर देश में दंगा, हिंसा, द्वेष के अंकुर फूटें,
"देव" तुम अपने कलम को ऐसा, काव्य कभी न लिखने देना!"


रचनाकार-चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-२९.०९.२०१२





♥♥♥♥♥♥♥♥बदलाव की चकाचोंध..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
वो क्या जानें मेरे प्यार को, मेरी चाह को, मेरी आह को,
जिन लोगों ने मेरे दिल का शीशा चकनाचूर कर दिया!

उन लोगों को बस मतलब है, केवल रूपये और पैसे से,
जिसने देख गरीबी मेरी, खुद को मुझसे दूर कर लिया!

जो अक्सर दावे करता था, मुझ पर जान लुटाने के भी,
आज उसी इंसान ने मुझको, मरने पर मजबूर कर दिया!

आज भला वो किन हाथों से, मेरे ज़ख्म की शिफ़ा करेंगे,
गुजरे वक़्त में जिन लोगों ने, ज़ख्म मेरा नासूर कर दिया!

"देव" देखिए लोग आज के, आँखों पर पट्टी बांधे हैं,
गुंडों को भी नेता कहकर, इन सबने मशहूर कर दिया!"

................चेतन रामकिशन "देव"........................

Thursday, 27 September 2012


♥♥♥♥♥♥♥♥♥जीवन की चौखट.♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
जीवन की चौखट पर देखो, नया दिवस फिर से आया!
बाग़ में कोयल गीत सुनाये, और सूरज भी मुस्काया!

मन में आशा की बूंदे भर, जीवन को ताजा करना है!
न निंदा, उपहास किसी का, हमको जीवन में करना है!
हमको जीवन में रहना है, सच्चा और सरल बनकर के,
सच्चाई के संग जीना है, सच्चाई के संग मरना है!

ओस की बूंदों से धरती में, नव अंकुर भी उग आया!
जीवन की चौखट पर देखो, नया दिवस फिर से आया!"
................चेतन रामकिशन "देव"........................

♥♥♥♥♥♥♥आज भगत के जन्मदिवस पर.♥♥♥♥♥♥♥♥♥
आज भगत के जन्मदिवस पर, इतना प्रण तो करना होगा!
शोषण से लड़ने की खातिर, जोश रगों में भरना होगा!

हम लोगों के मुर्दापन से, नहीं भगत सिंह खुश हो सकते!
न ही हम उनके सपनों के, भारत का अंकुर बो सकते!
चित्र पे फूल चढ़ाने भर से, नहीं पूर्ण होती है भक्ति,
भय का खून रगों में भरके, नही भगत पैदा हो सकते!

देश की खातिर जीवन-यापन, देश की खातिर मरना होगा!
आज भगत के जन्मदिवस पर, इतना प्रण तो करना होगा!"

......................चेतन रामकिशन "देव"...............................

♥♥♥♥♥♥♥♥♥उनके शहर की हवा ..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
उनके शहर की हवा भी मेरे, दिल को ज़ख़्मी कर जाती है!
मुझको उनकी याद दिलाकर, आंख में आंसू भर जाती है!

कई दफा इस हवा ने खुलकर, अपना दर्द बताना चाहा!
अपनी मज़बूरी का किस्सा, मुझको बहुत बताना चाहा!

सोच के पर उनकी बदनामी, कुछ कहने से डर जाती है!
उनके शहर की हवा भी मेरे, दिल को ज़ख़्मी कर जाती है!"

....................चेतन रामकिशन "देव".............................



♥♥♥♥♥♥♥♥♥उनके शहर की हवा ..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
उनके शहर की हवा भी मेरे, दिल को ज़ख़्मी कर जाती है!
मुझको उनकी याद दिलाकर, आंख में आंसू भर जाती है!

कई दफा इस हवा ने खुलकर, अपना दर्द बताना चाहा!
अपनी मज़बूरी का किस्सा, मुझको बहुत बताना चाहा!

सोच के पर उनकी बदनामी, कुछ कहने से डर जाती है!
उनके शहर की हवा भी मेरे, दिल को ज़ख़्मी कर जाती है!"

....................चेतन रामकिशन "देव".............................


Wednesday, 26 September 2012



♥♥♥♥♥♥♥रहो अग्रसर जीवन पथ में.♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
रहो अग्रसर जीवन पथ में, मुश्किल से घबराना त्यागो!
मात्र नयन ही मत खोलो तुम, मन की निद्रा से भी जागो!

अभिमान से दूर रहो तुम, हिंसा का प्रयोग न करना!
धन-दौलत आनी जानी है, उसका कभी वियोग न करना!
काम करो कुछ ऐसा जिससे, जग में चमके नाम तुम्हारा,
अपने पद और अधिकार का, भूले से दुरूपयोग न करना!

मात-पिता की सेवा के बिन, तुम मंदिर-मस्जिद न भागो!
रहो अग्रसर जीवन पथ में, मुश्किल से घबराना त्यागो!"

........."शुभ-दिन"........चेतन रामकिशन "देव"............

Tuesday, 25 September 2012


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥जो मेरा अपना था .♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
कल तक जो मेरा अपना था और मेरा हमसाया भी था!
मेरे दर्द में रोया था वो, और सुख में मुस्काया भी था!
जिसके कंधे पर सर रखकर, मैंने अक्सर अश्क बहाए,
जिसने मुझको बच्चा बनकर, छेड़ा और सताया भी था!

आज वही इनसान मेरे संग, गैरों सा बरताव कर रहा!
कल तक ख्वाब सजाने वाले, चूर हमारे ख्वाब कर रहा!

आज वही आंसू देता है, जिसने कभी हंसाया भी था!
कल तक जो मेरा अपना था और मेरा हमसाया भी था...

जो मुझसे अक्सर कहता था, अपना रिश्ता रूह तलक है!
तेरी सूरत में ए हमदम, दिखती रब की एक झलक है!
बिना तुम्हारे मेरा जीवन, है जीते जी मरने जैसा,
तेरे ही आगोश में हमदम, मेरी धरती और फलक है!

आज वही इन्सान देखिए, मेरे नाम से नफरत करता!
मेरी आँखों की घाटी में, वो आंसू की नदियाँ भरता!

वही ज़ख्म को दुखा रहा है, जिसने मरहम लगाया भी था!
कल तक जो मेरा अपना था और मेरा हमसाया भी था...

बदल गया वो उसका मन है, मुझको उससे नहीं शिकायत!
बेशक वो अब गम देता है, लेकिन याद है उसकी चाहत!
"देव" मोहब्बत में तो ऐसे, पल अक्सर आते रहते हैं,
कोई दिल को ज़ख़्मी करता, कोई दिल की करे हिफाजत!

मेरी नजरों में उसका कद, आज भी पहले ही जैसा है!
कल तक भी अपने जैसा था, आज भी अपने ही जैसा है!

वही लौटकर न आया क्यूँ, मैंने उसे बुलाया भी था!
कल तक जो मेरा अपना था और मेरा हमसाया भी था!"

" जीवन के पथ में अनेकों ऐसे जन भी मिलते हैं, जो बहुत अपना बताने के बाद भी, किसी को तनहा कर जाते हैं! जो परस्पर प्रेम के सम्बन्ध को, नष्ट/ जीर्ण/ प्रभावित कर जाते हैं, किन्तु उनकी याद फिर भी आती है, ये सोचकर की, उसने दुःख दिया तो क्या, कभी सुख भी उसी ने दिया था! हालाँकि ये वेदना के पल बहुत जानलेवा होते हैं, तो प्रयास किया जाये कि किसी को अपने कारन ये वेदना न मिले!"

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-२६.०९.२०१२ 





♥प्रेम आराधना♥
प्रेम आराधना,
प्रेम सदभावना!
प्रेम सुमन है,
प्रेम साधना!

प्रेम को वासना से नहीं जोड़िए
प्रेम के पथ को तुम न कभी छोड़िए!

प्रेम ह्रदय की,
मधुर भावना!
प्रेम आराधना,
प्रेम सदभावना!

प्रेम रिमझिम सितारों का आकाश है!
प्रेम दिव्य छटा, प्रेम विश्वास है!

प्रेम सबके हितों की,
सरल भावना!
प्रेम आराधना,
प्रेम सदभावना!"

"शुभ-दिन"
चेतन रामकिशन "देव"


Saturday, 22 September 2012


♥♥♥♥♥♥नारी(एक दिव्य छवि..)♥♥♥♥♥♥
न ही नारी चरणपादुका, न कंटक, न शूल!
नारी है खिलते उपवन का, एक सुगन्धित फूल!
नारी वंदन की अधिकारी और पूजन के योग्य,
नारी के अपमान की देखो, कभी न करना भूल!

नारी दुःख-सुख की साथी है, नारी दे उत्साह!
नारी जीवन में करती है, खुशियों का प्रवाह!

नारी देती साथ भले ही, समय हो प्रतिकूल!
न ही नारी चरणपादुका, न कंटक, न शूल......

नारी का मन अभिमान से, रहता मीलों दूर!
नारी अपने प्रेम से करती, हम सबके दुख दूर!
हर रिश्ते के दायित्वों को, नारी करती पूर्ण,
धन-दौलत के मद में नारी, कभी न होती चूर!

नारी कोमल सरिता जैसी, एक निर्मल जलधार!
कानों में अमृत सा घोलें, नारी के उद्गार!

नारी धवला किरणों जैसी, न मिटटी, न धूल!
न ही नारी चरणपादुका, न कंटक, न शूल......

नारी भी जीवित प्राणी है, नहीं है वो पाषाण!
हमे हृदय से करना होगा, नारी का सम्मान!
"देव" बिना नारी के देखो, जग है रंग-विहीन,
घर, दम्पत्ति और जीवन की, नारी है मुस्कान!

नारी के इस दिव्य रूप को, शत-शत है प्रणाम!
हरियाली सी मनमोहक है, नारी जिसका नाम!

नारी की छाया से होते, दुख के क्षण अनुकूल!
न ही नारी चरणपादुका, न कंटक, न शूल!"

"नारी-जिसके बिना संसार की कल्पना ही नहीं की जा सकती! जो जन्म-दायित्री है तो वहीँ जीवन पथ में पग पग पर कभी पत्नी, कभी बहिन, कभी बेटी बनकर, हमे अपनत्व देती है! नारी की छवि वन्दनीय है, नारी नहीं चाहती कि उसकी देवी बनाकर आराधना की जाये, नारी तो केवल समानता का सम्मान चाहती है! आइये दिव्य स्वरूप नारी का सम्मान करें.................."

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-२३.०९.२०१२



♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥कलम की शक्ति....♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
कलम की शक्ति, शब्द संयोजन और भावना कम न करना!
अपने लेखन और चिंतन से, तुम मिथ्या का तम न करना!

सुन्दर और सच्चे शब्दों से, मानवता के दीप जलाना!
जात, धर्म और पूर्वाग्रह से, ऊपर उठकर कलम चलाना!

तुम शब्दों को दूषित करके, मानवता को नम न करना!
कलम की शक्ति, शब्द संयोजन और भावना कम न करना!"

.......................चेतन रामकिशन "देव"..............................

Friday, 21 September 2012




♥♥♥♥♥♥लक्ष्य..♥♥♥♥♥♥♥
अपनी आंखे रखो लक्ष्य पर, 
लक्ष्य को धूमिल होने न दो!
आशा और साहस को अपने, 
जीवन से तुम खोने न दो!

हार गए तो क्या घबराना,
क्यूँ आँखों से नीर बहाना!
नजर लक्ष्य से हटने न दो,
फिर से अपने कदम बढ़ाना!

अपने मन की आशाओं को,
हार के डर से सोने न दो!
अपनी आंखे रखो लक्ष्य पर,
लक्ष्य को धूमिल होने न दो!

नहीं गिराकर कभी किसी को,
तुम अपना स्थान बनाओ!
स्वच्छ भावना मन में लेकर,
तुम मेहनत के दीप जलाओ!

अपने कारण "देव" किसी की,
आँखों को तुम रोने न दो!
अपनी आंखे रखो लक्ष्य पर,
लक्ष्य को धूमिल होने न दो!"

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-२२.०९.२०१२

रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित!


Wednesday, 19 September 2012




♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥हर्ष का वितरण....♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
हर्ष का वितरण करना होगा, सच का विचरण करना होगा!
प्रेम को उन्नत करने हेतु,  हमे समर्पण करना होगा!

नैतिकता के संवाहक बन,  मर्यादा का पालन करके,
अपने जीवन में लक्ष्यों को, चयनित और निर्धारण करके!
हम सबको जीवन के पथ में, शुद्ध आचरण करना होगा.....

नहीं पराजय से भय खाकर,  हमको भूमिगत होना है!
हमे सदा अपने जीवन में, साहस का अंकुर बोना है!
मन में भरके विजय की आशा, पुन: अवतरण करना होगा!"
........"शुभ-दिन"........चेतन रामकिशन "देव".............


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥आँखों की बरसात..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
रिमझिम रिमझिम बारिश जैसी, आँखों से बरसात हुई !
गम के साये में दिन निकला, और गम में ही रात हुई!

कल तो जो मेरी चाहत की, अम्बर से तुलना करता था,
आज उसी के हाथों देखो, मेरे प्यार की मात हुई!

जिधर भी देखो आज उधर ही, नफरत का धुआं उड़ता है,
इंसानों की कौम भी देखो, खुंखारों की जात हुई!

जो मिलने का वादा करके, वक़्त से पहले आ जाता था,
आज न जाने किस वजह से, उसको बड़ी अनात हुई!

"देव" जो मेरी तस्वीरों को, सिरहाने रखकर सोता था,
आज उसी इंसान से मानो, गैरों जैसी बात हुई!"

"अनात-देरी"

...............चेतन रामकिशन "देव"..................

Tuesday, 18 September 2012


♥♥♥♥♥♥शोषण से संघर्ष(एक आह्वान)♥♥♥♥♥♥♥♥♥
अपने मन की शक्ति को तुम, मन से बाहर लाना सीखो!
अपने अधिकारों की खातिर, तुम आवाज उठाना सीखो!
जीवन में शोषण के आगे, तुम नतमस्तक न हो जाना,
शोषण करने वालों की तुम, ईंट से ईंट बजाना सीखो!

कमजोरी के भाव जगाकर, जीवन यापन क्यूँ करते हो!
मौत तो एक दिन आनी ही है, तो मरने से क्यूँ डरते हो!

वीरों जैसे बनकर के तुम, मौत को गले लगाना सीखो!
अपने मन की शक्ति को, तुम मन से बाहर लाना सीखो...

सच को सच कहने की आदत और झूठ को झूठ कहो तुम!
शोषण से संघर्ष करो, यूँ आँख मूंदकर नहीं सहो तुम!
हार-जीत दोनों मिलती हैं, रणभूमि का यही नियम है,
नहीं हारकर हिम्मत छोड़ो, मुर्दा बनकर नहीं रहो तुम!

रणभूमि में हार क्यूँ पाई, इसका चिंतन करना होगा!
और दुबारा उन कमियों को, युद्ध से बाहर करना होगा!

इक दिन जीत मिलेगी हमको, ये खुद को समझाना सीखो!
अपने मन की शक्ति को तुम, मन से बाहर लाना सीखो...

जीवन में जो भय खाते हैं, वो इतिहास नहीं रच पाते!
वो जीते हैं मुर्दों जैसे और मुर्दा बनकर मर जाते!
"देव" न केवल तन से हमको, मन से भी जिंदा रहना है,
मन से मृतक होने वाले, कोई साहस न कर पाते!

इसी तरह चुपचाप रहे तो, शोषण-मुक्ति नही मिलेगी!
अंधकार ही रहेगा पथ में, कोई दीपिका नहीं जलेगी!

अपने मन को तुम निद्रा से, अब तो जरा जगाना सीखो!
अपने मन की शक्ति को, तुम मन से बाहर लाना सीखो!"

"शोषण- से भय खाकर, अपने आप को जीते जी मुर्दा बनाकर, अपने को कमजोर मानकर, जीवन में कोई युद्ध नहीं जीता जा सकता! जीवन में यदि शोषण से संग्राम करना है, तो अपने आप को तन से नहीं, मन से भी जिन्दा रखना होगा! तो आइये चिंतन करें......................."

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-१९.०९.२०१२

सर्वाधिकार सुरक्षित..
रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित!

♥♥♥♥♥♥♥♥मन की चहल-पहल...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मन की चहल-पहल खोई है, खुशियों की दुनिया रोई है!
न जाने क्यूँ मेरी किस्मत, लम्बे अरसे से सोई है!

जो मेरे जीवन को अक्सर, अमृत से सिंचित करते थे,
आज उन्ही अपनों ने देखो, नफरत की क्यारी बोई है!

आज तो अपने ही अपनों का, गले काटने पर आतुर हैं,
आज दिलों से ने जाने क्यूँ, अपनायत की शै खोई है!

ऐसा करने वाले बिल्कुल, रोयेंगे और पछतायेंगे,
जिन लोगों ने मजलूमों के, खून से ये धरती धोई है!

"देव" देखिए एक दिन वो भी, मेरी चाहत को तरसेंगे,
आज वो जिनकी वजह से मेरी, रूहानी चाहत रोई है!"

.............,........चेतन रामकिशन "देव"...................."

♥♥♥♥♥♥♥♥मन की चहल-पहल...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मन की चहल-पहल खोई है, खुशियों की दुनिया रोई है!
न जाने क्यूँ मेरी किस्मत, लम्बे अरसे से सोई है!

जो मेरे जीवन को अक्सर, अमृत से सिंचित करते थे,
आज उन्ही अपनों ने देखो, नफरत की क्यारी बोई है!

आज तो अपने ही, अपनों का, गले काटने पर आतुर हैं,
आज दिलों से ने जाने क्यूँ, अपनायत की शै खोई है!

ऐसा करने वाले बिल्कुल, रोयेंगे और पछतायेंगे,
जिन लोगों ने मजलूमों के, खून से ये धरती धोई है!

"देव" देखिए एक दिन वो भी, मेरी चाहत को तरसेंगे,
आज वो जिनकी वजह से मेरी, रूहानी चाहत रोई है!"

.....,........चेतन रामकिशन "देव"...................."

Monday, 17 September 2012


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥दिल की चुभन...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
दिल में एक चुभन रहती है, मन में एक अगन रहती है!
आँखों में आंसू की लड़ियाँ, जीवन में उलझन रहती है!

ये सच है कुछ दिन पहले तक, नयन में अश्रुधार नहीं थी!
न ही दिल टुकड़े टुकड़े था, और गमों की मार नहीं थी!
मैं भी हँसता था जी भर के, मैं भी गाता मुस्काता था,
पानी चाही जीत हमेशा और चिंतन में हार नहीं थी!

लेकिन ये बदलाव देखिए, तब से जीवन में आया है!
जब से मेरे अपनों ने ही, मेरे दिल को ठुकराया है!
जो खुद को कहते थे अक्सर, मेरे दुख का सच्चा साथी,
आज उन्ही के दुख से देखो, नीर नयन में भर आया है!

यही सोचकर इस जीवन की, ये बस्ती निर्जन रहती है!
दिल में एक चुभन रहती है, मन में एक अगन रहती है!"


.....................चेतन रामकिशन "देव"......................

Saturday, 15 September 2012

♥प्रेम की जल-तरंग.♥


♥♥♥♥♥♥♥प्रेम की जल-तरंग.♥♥♥♥♥♥♥♥♥
चलो सखी हम दूर जहाँ पर, करे न कोई तंग!
एक दूजे के साथ रहें हम, सात जनम तक संग!
सपनों की छोटी सी दुनिया, आओ करैं तैयार,
आसमान के इन्द्रधनुष से, भर दें उसमें रंग!

धन-दौलत से भी बढ़कर है, सखी जहाँ में प्रीत!
इसी प्रीत की छाँव में हमको, रहना है मनमीत!

प्रेम की अनुभूति पाकर के, मन में उठी तरंग!
चलो सखी हम दूर जहाँ पर, करे न कोई तंग....

सपनों की ये दुनिया देखो, होगी जब तैयार!
आसमान से भी बरसेगी, प्रेम की मधुर फुहार!
भ्रमर का गुंजन होगा और कोयल का संगीत,
हरियाली के हाथों होगा, जीवन का श्रंगार!

सखी तुम्हारे साथ लिखेंगे, हम भी प्रेम के गीत!
सखी तुम्हारे साथ मिलेगी, जीवन पथ में जीत!

सखी तुम्हारे प्रेम ने बदला, इस जीवन का ढंग!
चलो सखी हम दूर जहाँ पर, करे न कोई तंग....

चन्द्रकिरण जैसे उज्जवल है, सखी प्रेम का नाम!
इसी प्रेम के पथ पर चलकर, मिलता है आराम!
प्रेम जहाँ होता है उस घर, होते नहीं विवाद,
प्रेम नहीं बाजार की वस्तु, नहीं है इसका दाम!

प्रेम तो मन की चंचलता है, प्रेम सुगन्धित फूल!
"देव" प्रेम चुनता है देखो, जीवन पथ से शूल!

प्रेम की शक्ति से मिलती है, मन को एक उमंग!
चलो सखी हम दूर जहाँ पर, करे न कोई तंग!"


"प्रेम-का अर्थ बड़ा व्यापक है! विभिन स्वरूप हैं प्रेम के,
जिस सम्बन्ध में वो स्वरूप, निहित होता है, वो अपनत्व देता है! मार्गदर्शन करता है,
दुःख दर्द बांटता है और जीवन पथ को सरल और सदभाव पूर्ण बनाता है! तो आइये प्रेम का सम्मान करें !"

सर्वाधिकार सुरक्षित!
ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित!

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-१६.०९.२०१२ 


♥♥♥♥महंगाई.♥♥♥♥♥
आसमान छूती महंगाई!
बेकारी ने ली अंगडाई!
आम आदमी की आँखों में,
आंसू की बदली घिर आई!

देश की सत्ता अंधी होकर,
जनता का शोषण करती है!
घोटाले और लूटपाट कर, 
बस अपना पोषण करती है!

राज धर्म का पालन करना,
भूल गए हैं सत्ताधारी!
भूल गए निर्धन की पीड़ा,
भूल गए उनकी लाचारी!

आम आदमी के घर देखो,
दर्द भरी मायूसी छाई!
आसमान छूती महंगाई!
बेकारी ने ली अंगडाई!"

.........चेतन
रामकिशन "देव".......

Friday, 14 September 2012

♥जीते जी..♥


♥♥♥♥जीते जी..♥♥♥♥
जीते जी मरने की बातें!
मुश्किल से डरने की बातें!
न जाने क्यूँ इस जीवन को,
तहस नहस करने की बातें!

क्या रखा है इन बातों में, इन बातों से क्या मिलना है!
जब अंकुर को सींचोगे तुम, तभी तो आगे गुल खिलना है!
ये जीवन है और जीवन का सुख-दुख से है गहरा नाता,
पर हमको जिंदादिल रहकर, जीवन में आगे चलना है!

क्यूँ आंसू से भिगो रहे दिन,
क्यूँ गीली रखते हो रातें!
जीते जी मरने की बातें!
मुश्किल से डरने की बातें!"

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-१५.०९.२०१२

Thursday, 13 September 2012

♥♥♥♥♥♥हिंदी एक महीप...♥♥♥♥♥♥♥♥
भाषायें तो बहुत हैं किन्तु, हिंदी एक महीप!
आओ जलायें सारे जग में, हम हिंदी का दीप!

गलत नहीं इस जीवन में, बहुभाषा का ज्ञान!
किन्तु अपने हाथ से न हो, हिंदी का अपमान
हिंदी के आंचल में सिमटी, भारत की संस्कृति,
देश के माथे की बिंदी का, आओ करें सम्मान!

जिससे मोती स्फुट होता, हिंदी है वो सीप!

भाषायें तो बहुत हैं किन्तु, हिंदी एक महीप!

बड़ी मधुरता स्फुट करता, हिंदी का प्रयोग!
हिंदी को न मानो मित्रों, पिछड़ेपन का रोग!
अन्य बोलियों से ये हिंदी, न रखती है बैर,
हिंदी भी प्रकट करती है, प्रेम तत्व का योग!

शब्दकोष को उज्जवल करती, हिंदी बन प्रदीप!
भाषायें तो बहुत हैं किन्तु, हिंदी एक महीप!"

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-१४ सितम्बर २०१२,हिंदी दिवस!

♥♥♥♥♥♥♥♥♥तुम्हारी जरुरत♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
सूनी घर की चाहरदिवारी, सूना घर का आंगन!
सूख गया तुलसी का पौधा, टूट गया है दर्पण!
कमरे की सब तस्वीरें भी, चुप चुप सी रहती हैं,
रंग पड़ गए फीके उनके, सिमट गया है योवन !

मैं अपना क्या हाल बताऊ, जान जरा सी नहीं बदन में!
दिन कटता है पल पल तन्हा, रात कट रही करुण रुदन में!

खिड़की के परदे खिसका कर, हाथ को चेहरे तले लगाकर,
अपनी दोनों अंखियो से मैं, अश्कों की धारा बरसा कर!

पल-पल, लम्हा, मिनट-मिनट, तेरा  इंतजार करता हूँ!
पैमाने से नप ना पाय, तुम्हें इतना प्यार करता हूँ………

बिन तेरे ये सुबह अधूरी, तुम बिन है ये शाम अधूरी!
कौनसी ऐसी बात पे तुमने, कर डाली मीलों सी दूरी!
तुम कहती थी जीते जी मैं, साथ नहीं छोडूंगी पल को,
कौन सी ऐसी बात हुयी जो, जाना इतना बना जरुरी!

मैं अपना क्या हाल बताऊ, जान जरा सी नहीं बदन में!
गर्दन रखकर सिरहाने पे, ताकता रहता दूर गगन में!

चेहरे पर जुल्फें बिखराकर, दूर दूर तक नयन घुमाकर!
पैर में छाले पड़ जाने पर, चरण पादुका हाथ उठाकर!

पल-पल, लम्हा, मिनट-मिनट, तेरा  इंतजार करता हूँ!
पैमानों से नप ना पाय, तुम्हें इतना प्यार करता हूँ………



"इंतजार की एक सीमा होती है, जब इंतजार हद से ज्यादा बढ़ जाता है और द्वितीय पक्ष, प्रथम पक्ष की भावनाओं को नहीं समझते हुए दूर रहता है, तब निश्चित रूप से वेदना होती है!

यही वेदना उकेरने का प्रयास-----चेतन रामकिशन (देव ) "

Wednesday, 12 September 2012

♥♥आशा की मुस्कान♥♥
आशा की मुस्कान सजाकर,
अपने मन से तिमिर मिटाकर,
तोड़के बंधन जात धर्म के,
एक दूजे को गले लगाकर!

इक मानव जब इस नीति पर, अपना जीवन यापन करता!
मानवता के पाठ का वो जब, दुनिया में अध्यापन करता!

तब तब देखो मानवता का,
स्तर फिर से बढ़ जाता है!
संबंधों के आभूषण पर,
रंग नेह का चढ़ जाता है!

हिंसा की दीवार गिराकर,
लालच का हर दीप बुझाकर,
आओ चलो जीते हैं जीवन,
मानवता के फूल खिलाकर!"


चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-१२.०९.२०१२