Saturday, 17 May 2014

♥♥बेगुनाही की सज़ा..♥♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥बेगुनाही की सज़ा..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
क्या मेरा एहसास गलत था, जो मुझको मुज़रिम ठहराया!
क्या मेरी आँखों का बहता झरना तुमको नजर न आया!
क्यों बस अपनी अपनी कहकर, मुझको ये इलज़ाम दिया है,
एक पल को भी मेरा ये दिल, इस सदमे से उभर न पाया!

क्यों मानवता मरी मरी है, कोई दिल की नहीं सुन रहा!
सब रस्ते में कंकर फेंके, कोई कांटे नहीं चुन रहा!

दवा तलक भी न दी उसने, और दुआ भी कर न पाया!
क्या मेरा एहसास गलत था, जो मुझको मुज़रिम ठहराया.....

लोग यहाँ औरों को कीचड़, खुद को गंगाजल कहते हैं!
बस अपने को कहें सार्थक, औरों को निष्फल कहते हैं!
"देव" जहाँ में जिनकी नीति, होती है बस खुदगर्जी की,
वही लोग सच्चे इन्सां की, निर्मलता को छल कहते हैं!

घाव दिए हैं शब्द बाण से, जो जीवन भर नही भरेंगे!
सबक मिला है आज हमे ये, अब अपनायत नहीं करेंगे!

कितना घातक जहर ये देखो, अमृत से भी मर न पाया!
क्या मेरा एहसास गलत था, जो मुझको मुज़रिम ठहराया!"

....................चेतन रामकिशन "देव".......................
दिनांक-१८.०५.२०१४  

Friday, 16 May 2014

♥♥लड़ाई भूख से..♥♥

♥♥♥♥लड़ाई भूख से..♥♥♥♥
लड़ाई भूख से लड़ने लगे हैं!
परिंदे शाख़ से उड़ने लगे हैं!

नशे का दौर ऐसा आ गया के,
नए पत्ते भी अब सड़ने लगे हैं!

मेरे दुश्मन हैं जाने दोस्त हैं वो,
जो आंसू आँख में जड़ने लगे हैं!

हैं हरकत नौजवानों की घिनोनी,
बड़े भी शर्म से गड़ने लगे हैं!

जो बिगड़ा वक़्त तो टूटे सितारे,
वो राजा पैर तक पड़ने लगे हैं!

वफ़ा का खाद पानी न मिला तो,
ख़ुशी के फूल सब झड़ने लगे हैं!

नज़र में "देव" क्यों हैं सरफिरे वो,
जो सच की बात पे अड़ने लगे हैं!"

.......चेतन रामकिशन "देव"……  
दिनांक-१७.०५.२०१४

Thursday, 15 May 2014

♥♥किसी के दिल पे..♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥किसी के दिल पे..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
किसी के दिल पे क्या बीतेगी, कहने वाले क्या जानेंगे!
बस इलज़ाम लगाने वाले, अपनी गलती क्या मानेंगे!
वो जिनकी आँखों को दिखता, बस नफ़रत का काला धुआं,
आखिर ऐसे लोग किसी की, चाहत को क्या पहचानेंगे!

बिना जुर्म के सजा मिले तो, मन को गहरा दुख होता है!
आँखों से बहती है धारा, उतरा उतरा मुख होता है!

मुझको ज़हर पिलाने वाले, खून को मेरे क्या छानेंगे!
किसी के दिल पे क्या बीतेगी, कहने वाले क्या जानेंगे!

इस दुनिया का हाल यही है, चकित नहीं हूँ इस मंजर से!
लोग यहाँ चाहत को काटें,  कभी कुल्हाड़ी और खंजर से!
"देव" हमारे अपनेपन को, इल्ज़ामों का नाम दिया है,
इसीलिए अब चाहत छोड़ी, हमने इल्ज़ामों के डर से!

बस अपने में गुम होकर के, जो अपना जीवन जीते हैं!
कहाँ भला वो लोग जहाँ में, ज़ख्म किसी का कब सीटें हैं!

चीर के रखदूं मैं दिल भी पर, वो क्या सच को सच मानेंगे!
किसी के दिल पे क्या बीतेगी, कहने वाले क्या जानेंगे!  "

...................चेतन रामकिशन "देव"…......................
दिनांक-१५.०५.२०१४

Sunday, 11 May 2014

♥♥माँ की छुअन..♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥माँ की छुअन..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
छुअन है माँ की कोमल कोमल, अमृत के जैसी ममता है!
हर संतान की खातिर माँ के, मन मेँ एक जैसी समता है!
नहीं जानती है माँ छल को, नहीं फरेबी माँ की बातें,  
माँ के मन में सहनशीलता की, देखो व्यापक क्षमता है!

माँ अपने बच्चों के हित में, अपना सुख भी त्यागा करती!
और बच्चों की नींद की ख़ातिर, रात रात भर जागा करती!

बच्चों को नाखुश देखे तो, खून यहाँ माँ का जमता है!
छुअन है माँ की कोमल कोमल, अमृत के जैसी ममता है!

गंगाजल सा पावन मन है, न क़ोई ईर्ष्या होती है!
माँ के आँचल में हर लम्हा, प्यार, वफ़ा, ममता होती है!
वो जो अपने हित की खातिर, गला घोट देती ममता का,
ऐसी औरत कभी रूह से, नहीं जरा भी माँ होती है! 

माँ केवल सम्बन्ध नहीं है, और माँ केवल नाम नहीं है!
माँ की कीमत नहीं है कोई, और ममता का दाम नहीं है!

बच्चों के घर न आने तक, माँ का तो जीवन थमता है!
छुअन है माँ की कोमल कोमल, अमृत के जैसी ममता है!

माँ सिखलाती कलम चलाना, माँ सिखलाती पैदल चलना!
माँ की हिम्मत में शामिल है, तिमिर में दीपक जैसे जलना!
"देव " जहाँ में रिश्ते नाते, माँ से बढ़कर हो नहीं सकते,
इसीलिए तुम एक पल को भी, माँ से नजरेँ नहीं बदलना!

जीवन का अाधार है माँ से, माँ के बिन दुनिया खाली है! 
माँ बच्चों को खुश्बू देती, माँ तो फ़ूलों की डाली है!

दुआ हजारों दे बच्चोँ को, प्यार नहीं माँ का थकता है ! 
छुअन है माँ की कोमल कोमल, अमृत के जैसी ममता है!"


................चेतन रामकिशन "देव"………………
दिनांक-११.०५.२०१४ 
  
( मेरी ये रचना दोनों माताओं माँ कमला देवी एवं प्रेमलता जी को समर्पित 

Sunday, 4 May 2014

♥माँ का आँचल ...♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥माँ का आँचल ...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
दूध भरा जिसके आँचल में, और जिसका मन गंगाजल है!
जो अपने आशीष भेजकर, संतानों में भरती बल है!
इस दुनिया में ढूंढे से भी, नहीं हमे मिल सकता देखो,
जितना पावन, जितना कोमल, इस दुनिया में माँ का दिल है!

माँ के दिल की करो वंदना, माँ के दिल की करो इबादत!
माँ के दिल में प्यार वफ़ा है, माँ के दिल में नहीं तिज़ारत !

माँ का दामन प्यार भरा है और माँ की ममता निश्छल है!
दूध भरा जिसके आँचल में, और जिसका मन गंगाजल है!

हर संतान उसे प्यारी है, नहीं किसी को कमतर आंके!
सही गलत का भेद कराती, संतानों के दिल में झांके!
कभी बेटियों की चोटी की, माँ अच्छे से करे सजावट,
और कभी बेटों की खातिर, वो गिरते बटनों को टांके!

आशाओं की जोत जलाती, अपनी संतानों के मन में!
निश दिन ईश्वर से कहती है, ठेस लगे न उनके तन में!

माँ की बोली शहद सी मीठी, माँ का मुखड़ा बड़ा धवल है!
दूध भरा जिसके आँचल में, और जिसका मन गंगाजल है!

माँ अपनी संतान का गुस्सा, हँसकर के टाला करती है!
अपना दुख और भूख भूलकर, बच्चों को पाला करती है!
"देव" जहाँ में माँ के दिल सा, बड़ा नहीं कोई दिल होता,
मा संतानों के क़दमों में, अपना सुख डाला करती है!

माँ की कोई जात नहीं है, न शहरी न ही देहाती!
मा का मज़हब बस ममता है, न कोई दीवार उठाती!

माँ की ममता सुर्ख गुलाबी, माँ की ममता श्वेत कमल है!
दूध भरा जिसके आँचल में, और जिसका मन गंगाजल है!"


"
माँ-एक चरित्र जिसका जन्म हुआ है ममता का प्रेषण करने के लिये, माँ के अपनत्व क निर्धारण हिन्दु, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्धिस्ट एवं अन्य के आधार पर नहीं,  अपितु ममता के आधार पर होता है, माँ के प्रखर स्वरूप को नमन "

.....चेतन रामकिशन "देव"…....
दिनांक-०४.०५.२०१४ 


Saturday, 3 May 2014

♥♥♥हमराज़...♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥हमराज़...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तुमको हर बात पता है, तुम हो हमराज़ मेरे!
तुमसे गुजरा हुआ कल था, हो तुम्ही आज मेरे!
तुमसे एक बात तलक, मैंने न छुपाई है,
तुम ही अंजाम मेरा हो, तुम्ही आगाज़ मेरे! 

जानकर भी मेरे हालात, क्यूँ शिकायत है!
तुमको मालूम है जबकि, तु मेरी चाहत है!

तुमसे लफ्जों की चमक, और तुम हो साज़ मेरे!
तुमको हर बात पता है, तुम हो हमराज़ मेरे!

तुमको सपनो का पता, तुमको ख्वाहिश का पता!
तुमको मुझपर जो हुई, हर किसी साज़िश का पता!
और तुमसे क्या छुपाऊँ, हो रूह तुम मेरी,
तुमको जीवन में हुयी दर्द की बारिश का पता!

मुझसे नाराज़ भी रहकर, क्या भला पाओगे!
क्या मेरा घर, मेरी तस्वीर, तुम जलाओगे!

तेरे सजदे में झुक सर, तुम हो सरताज मेरे!
तुमको हर बात पता है, तुम हो हमराज़ मेरे!

मेरा हर एक कदम साथ तेरे चलता है!
तुमसे मिलने को मेरा दिल भी तो मचलता है!
"देव" ये बात अलग है, कोइ मजबूरी हो,
वरना दिल मेरा भी, यादों में तेरी जलता है!

मेरी धरती भी तुम्ही, और तुम ही अम्बर हो! 
मेर आँगन हो तुम्ही और तुम मेरा घर हो!

तुमसे त्यौहार मेरे और तुम रिवाज़ मेरे!
तुमको हर बात पता है, तुम हो हमराज़ मेरे!"

"
प्रेम-के पथ में जब वो क्षण आते हैं जब, एक पक्ष दूसरे पक्ष के हर व्यवहार, हर कार्य, हर अनुभूति से परिचित होते भी संदेह की अवस्था लाता है तो वहां दूसरे पक्ष को पीड़ा मिलती है, हलांकि प्रथम पक्ष के संदेह जताने की पीछे प्रेम ही होता है मगर उसका स्वरूप उसे पीडा के रूप में प्रतिस्थापित कर देता है, और ये दशा प्रेम सबंधों के खंडित होने की अवस्था तक भी पहुँच जाती है, चूँकि प्रेम सम्बन्धित पक्षों के समर्पण क विषय है तो आइये चिन्तन करेँ! "


...........चेतन रामकिशन "देव"….........
दिनांक-०३.०५.२०१४ 


Friday, 2 May 2014

♥♥बारूद..♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥बारूद..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
जिस्म बारूद बना इसको तुम सुलगने दो!
मेरे जज़्बात मेरे दिल में आग लगने दो!

मैं जो तड़पूँ तो मेरे मुंह को बंद कर लेना,
क्यों पड़ौसी को मेरी चीख से तुम जगने दो!

तुम तो कातिल हो तुम्हें दर्द से क्या मतलब है,
दिल को सीने से अलग करके तुम सुबकने दो!

सर्द मौसम में दवाओं का काम कर देंगे,
मेरे अश्कों को जरा तुम यहाँ भभकने दो!

मेरे हाथों में बनी थी जो प्यार की रेखा,
ग़म के तेज़ाब से तुम उसको जरा गलने दो!

बंदिशों में ही रहा जब तलक रह ज़िंदा,
बाद मरने के मेरी रूह को बहकने दो!

"देव" तुमसे न गिला और न शिकवा कोई,
बन्द आँखों से मुझे तय ये सफ़र करने दो!"

...........चेतन रामकिशन "देव"….........
दिनांक-०२.०५.२०१४


Wednesday, 30 April 2014

♥♥मजदूर के आंसू ♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥मजदूर के आंसू  ♥♥♥♥♥♥♥
शीत में देखो गलन, धूप में तपन सहता!
बिन दवाओ के यहाँ घाव की दुखन सहता!
कोई समझे नहीं मज़दूर के हालातों को,
भूख और प्यास का जीते जी वो क़फ़न सहता!

हर सियासी इन्हे छलने का काम करता है!
झूठे आंसू से भरोसा का, नाम करता है!
इनका मालिक भी नहीं देता है मेहनत है धन,
उनका सुख, चैन तलक वो नीलाम करता है!

चूल्हा ठंडा है बहुत भूख की अगन सहता!
शीत में देखो गलन, धूप में तपन सहता...

बिना रोटी के वो ज़िंदा भी भला कैसे रहे!
वो भी इन्सान है आखिर वो जुल्म कितना सहे!
"देव" कोई न सुने उसकी आह और चीखें,
फिर भला किसपे यक़ीं, किससे यहॉँ दर्द कहे!

उसकी आँखों से आंसुओं का समंदर बहता! 
शीत में देखो गलन, धूप में तपन सहता!"

...........चेतन रामकिशन "देव"….........
दिनांक-०१.०५.२०१४

" मई दिवस पर मजदूरों को नमन "

♥♥दोस्त बनकर♥♥

♥♥♥♥♥दोस्त बनकर♥♥♥♥♥
दोस्त बनकर जो पास आते हैं!
दुश्मनी फिर वही निभाते हैं!

सर छुपाने को जिसने बख़्शी जगह,
उसके के घर को वो जलाते हैं!

कोई तड़पे, कोई कराहे मगर,
लोग कब किसके काम आते हैं!

जाने वो कैसे रौंदते दिल को,
हम तो सुनकर के काँप जाते हैं!

मेरी तक़दीर की कमी शायद,
हम तो साहिल पे डूब जाते हैं!

जिसने पाला था जिसने पोसा था,
लोग उसका भी खूँ बहाते हैं!

"देव" मुझसे न मिल अकेले में,
लोग चर्चा में बात लाते हैं!" 

....चेतन रामकिशन "देव"….
दिनांक-३०.०४.२०१४

Tuesday, 29 April 2014

♥सवेरे की धूप....♥♥

♥♥♥♥सवेरे की धूप....♥♥♥♥
धूप बन जायें हम सवेरे की!
रोक दें चाल हम अँधेरे की!

घोंसला रखके के कोशिशें कर लूँ,
पंछियों के नए वसेरे की!

मेरी हसरत है कुछ नया करना,
सीमा तोड़ी है बंद घेरे की!

पेड़ की छाँव सा सुकून लगे,
तेरी जुल्फों के उस घनेरे की!

आओ पहले तुम्हें अंगूंठी दूँ,
बात बाकी है सात फेरे की!

इस ज़माने को न बताना कभी,
राज की बात तेरे मेरे की!

"देव" ये जिंदगी की सूरत है,
कभी मंजिल, पड़ाव, डेरे की!"

....चेतन रामकिशन "देव"….
दिनांक-३०.०४.२०१४ 

Sunday, 27 April 2014

♥♥तुम्ही शामिल दुआओं में..♥♥

♥♥♥♥♥♥♥तुम्ही शामिल दुआओं में..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तुम्ही शामिल दुआओं में, तुम्ही रहती निगाहों में!
तुम्ही ने फूल बरसाये, मेरे जीवन की राहों में!
तुम्ही को देखना चाहूं, तुम्ही को सोचता रहता,
तुम्ही ने चैन बख़्शा है, मेरे दुख में, कराहों में!

तुम्ही उम्मीद की किरणों का सूरज लेके आती हो!
तुम्ही फिर चांदनी बनकर, जहाँ में खिलखाती हो!

तुम्हारा हाथ मैं थामूं, तुम्हे भर लूँ मैं बाहों में!
तुम्ही शामिल दुआओं में, तुम्ही रहती निगाहों में!

तुम्ही आकाश में तारों की तरह, जगमगाती हो!
तुम्ही मेरे तरन्नुम में, ग़ज़ल बनकर समाती हो!
तुम्ही को देखकर के "देव" मुझको चैन आता है,
तुम्ही फूलों की क्यारी बनके, मेरा घर सजाती हो 

तुम्ही शब्दों की धड़कन में, कलम के नूर में तुम हो!
तुम्ही चन्दन तिलक, रोली, सखी सिंदूर में तुम हो!

सदा ऐसे ही तुम रखना, मुझे अपनी पनाहों में!
तुम्ही शामिल दुआओं में, तुम्ही रहती निगाहों में!

.....................चेतन रामकिशन "देव"...................
दिनांक-२७ .०४.२०१४ 

Saturday, 26 April 2014

♥♥ठहराव...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥ठहराव...♥♥♥♥♥♥♥♥♥
कलम थमेगा तो ठहराव बहुत होगा!
अश्क़ों का खारा सैलाब बहुत होगा!

फूल नहीं बरसाना मेरे दामन पर,
छिल जायेगा तन ये घाव बहुत होगा!

टाट लपेटो रिसते खूँ को रोको तुम,
गिरा जमीं पर तो फैलाव बहुत होगा!

आज ही अपना कफ़न खरीदा मंदे में,
कल महंगाई बढ़ी तो भाव बहुत होगा!

मैं जिन्दा हूँ लेकिन दाम चवन्नी है,
लेकिन उनका बुत नायाब बहुत होगा! 

ग़म की आग में झुलसी मेरी जवानी पर,
सब कहते हैं, हाँ रुआब बहुत होगा!

"देव" मेरे रुख़सत होने पर मत रोना,
तुझे रोशनी को महताब बहुत होगा!"

........चेतन रामकिशन "देव"............
दिनांक-२६.०४.२०१४ 

Friday, 25 April 2014

♥♥नफ़रत का ताबीज़...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥नफ़रत का ताबीज़...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
कभी दुआयें साथ नहीं हों और कभी मरहम नहीं मिलता!
कौनसा ऐसा लम्हा होता, जिस दिन मुझको ग़म नही मिलता!
नफ़रत का ताबीज़ पहनकर, लोग करें उल्फ़त की बातें,
लेकिन इन झूठी बातों से, प्यार, वफ़ा को दम नहीं मिलता!

प्यार की बातें लगें खोखली, यदि यकीं, विश्वास नहीं हो!
पास भी होकर दूर लगे वो, ग़र दिल में एहसास नहीं हो!

नफ़रत की इस धुंध में देखो, सुकूं भरा मौसम नही मिलता!
कभी दुआयें साथ नहीं हों और कभी मरहम नहीं मिलता...

रेगिस्तानी जीवन में जब प्यार की धारा बह जाती है!
तो दुनिया की सारी नफ़रत, देखो पीछे रह जाती है!
"देव" जहाँ में सच की ताक़त, भले देर से जीते लेकिन,
मगर ईमारत झूठ की देखो, एक दिन नीचे ढ़ह जाती है!

बिना प्यार और अपनेपन के, मानवता हारी रहती है!
खुली हवा में भी दम घुटता, सांस हर एक भारी रहती है!

नफ़रत से झुलसा हर पौधा, पत्ता तक भी नम नही मिलता!
कभी दुआयें साथ नहीं हों और कभी मरहम नहीं मिलता!"

....................चेतन रामकिशन "देव"......................
दिनांक-२५.०४.२०१४

Tuesday, 22 April 2014

♥♥टूटा दिल है...♥♥

♥♥♥♥टूटा दिल है...♥♥♥♥♥
टूटा दिल है कठिन जवानी,
और आँख से बहता पानी!
हंसी ख़ुशी का मौसम लगता,
मानो कोई बात पुरानी!
किससे अपने दुख बांटू मैं,
सारी दुनिया है बेगानी!
अपने भी हैं नाम के अपने,
किसी ने मेरी तड़प न जानी!

लेकिन फिर भी ग़म से डरकर,
मैं जीते जी मर नहीं सकता!
सारी दुनिया की तरह मैं,
दिल को पत्थर कर नही सकता!

इसीलिए अपनी किस्मत से,
न छोड़ी उम्मीद लगानी!
अपने भी हैं नाम के अपने,
किसी ने मेरी तड़प न जानी...

सारे सपने टूट गए पर,
फिर मैंने आस रखी है!
कुछ करने की अपने दिल में,
मैंने हरदम प्यास रखी है!
"देव" तलाशा है ग़म में ही,
मैंने खुशियों की बूंदो को,
इसीलिए मैंने ये पीड़ा,
साँझ सवेरे पास रखी है!

हाँ दुनिया को समझ न पाया,
मेरे दिल की है नादानी!
अपने भी हैं नाम के अपने,
किसी ने मेरी तड़प न जानी! "

.....चेतन रामकिशन "देव"......
दिनांक-२२.०४.२०१४ 

♥♥प्यार के चार कदम...♥♥


♥♥♥♥♥प्यार के चार कदम...♥♥♥♥♥
क्या मेरे साथ यहाँ चार कदम चल दोगे!
क्या मेरी सूरत-ए-ग़म को यहाँ बदल दोगे!
क्या चरागों को जलाओगे तुम मेरी खातिर,
क्या अंधेरों को उजालों में तुम बदल दोगे!

प्यार का नाम महज, तन की प्यास होता नहीं! 
देखकर जुल्मो-सितम ये उदास होता नहीं!
प्यार की राह में कांटे भी हैं अंगारे भी,
प्यार बस फूलों का देखो लिबास होता नहीं!

क्या मेरे उजड़े बागवान को तुम जल दोगे!
क्या मेरे साथ यहाँ चार कदम चल दोगे!

क्या मेरी आँख के आंसू को तुम संभालोगे!
क्या मेरे पैर से कांटो को तुम निकलोगे!
"देव" सह लोगे क्या तुम मुझसे बिछड़ना खुद का,
या मेरे प्यार में बढ़कर के, मुझे पा लोगे!

क्या मुझे चैन सुकूं का, खिला कमल दोगे!
क्या मेरे साथ यहाँ चार कदम चल दोगे!"

...........चेतन रामकिशन "देव"...........
दिनांक-२२.०४.२०१४ 

Monday, 21 April 2014

♥वफ़ा की मिसाल...♥

♥♥♥♥♥वफ़ा की मिसाल...♥♥♥♥♥
तुम वफ़ाओं की एक मिसाल बनो!
चांदनी रात का ज़माल बनो!

मेरे ज़ख्मों का तुम मरहम बनकर,
मैं जो रोऊँ तो तुम रुमाल बनो!

मेरी राहों में जब अँधेरा हो,
जगमगाती हुयी मशाल बनो!

सिलसिला प्यार का ये चलते रहे,
तुम मोहब्बत की एक ढ़ाल बनो!

सात जनमों तलक न फीका पड़े,
प्यार का ऐसा तुम गुलाल बनो!

दुश्मनों को वतन के दूँ मैं सबक,
खून का मेरे तुम उबाल बनो!

"देव" दुख में भी, सुख में साथ रहे,
मेरे क़दमों की ऐसी चाल बनो!"

.......चेतन रामकिशन "देव".......
दिनांक-२१.०४.२०१४

Sunday, 20 April 2014

♥♥♥प्यार का उन्वान...♥♥♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्यार का उन्वान...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
हरफ़ तुम्ही से नूरानी है और ग़ज़ल की शान तुम्ही हो!
मेरे गीतों का, कविता का, हमदम ये उन्वान तुम्ही हो!
गहराई से समां गयीं तुम, मेरी रूह में, मेरे दिल में, 
नाम भले ही मेरा हो पर, मेरी हर पहचान तुम्ही हो!

तुम्हे देखकर हँस लेता हूँ, तुम्हे देखकर लिख लेता हूँ!
तुम्हे सोचकर घने स्याह में, चाँद सरीखा दिख लेता हूँ!

मुश्किल के हालातों में भी, मंजिल हर आसान तुम्ही हो!
हरफ़ तुम्ही से नूरानी है और ग़ज़ल की शान तुम्ही हो....

तुमसे मिलना अच्छा लगता, तुम्हे देखना मन को भाये! 
बिना तुम्हारे दिन सूना है और रात को नींद न आये!
"देव" तुम्हारे प्यार से बढ़कर, नहीं जहाँ में कुछ भी लगता,
इसीलिए तेरी खुशबु से, फूलों की रंगत खिल जाये!

बिना तुम्हारे आँगन सूना, सूना सूना घर होता है!
हाथ तुम्हारा चलूँ पकड़ कर, खो जाने का डर होता है!

मेरे तन की रक्त शिराओं और धड़कन की जान तुम्ही हो!
हरफ़ तुम्ही से नूरानी है और ग़ज़ल की शान तुम्ही हो!"

..................चेतन रामकिशन "देव"...................
दिनांक-२०.०४.२०१४

♥♥खुशियों की लकीरें...♥♥

♥♥♥♥♥♥खुशियों की लकीरें...♥♥♥♥♥♥♥
क्यूँ मेरे हाथ में खुशियों की लकीरें कम हैं!
क्यूँ कड़क धूप में भी, आँख ये मेरी नम हैं!
क्या मैं इंसान नहीं, बुत या कोई पुतला हूँ,
क्यूँ मेरे खून में शामिल, ये हजारों ग़म हैं!

क्या मुझे हँसने का, खुश होने का हक़ कोई नहीं!
क्या मुझे चैन से सोने का भी, हक़ कोई नहीं!
क्यों उदासी पे मेरी लोग सवालात करें,
क्या मुझे खुलके यहाँ रोने का, हक़ कोई नहीं!

तोड़ दे कोई, क्यूँ ज़ज्बात मेरे, बेदम हैं!
क्यूँ मेरे हाथ में खुशियों की लकीरें कम हैं...

क्यों मेरी आह को सुनकर भी निकल जाते हैं!
लोग अपने भी यहाँ, देखो बदल जाते हैं!
"देव", नातों में, मोहब्बत में, हुई है ग़ुरबत,
मोम के रिश्ते हैं पल भर में पिघल जाते हैं!

भीड़ होकर भी हैं तन्हा, की अधूरे हम हैं!
क्यूँ मेरे हाथ में खुशियों की लकीरें कम हैं!"

............चेतन रामकिशन "देव".......

Tuesday, 15 April 2014

♥चैन के दो पल...♥


♥♥♥चैन के दो पल...♥♥♥
चैन से दो पल सोना चाहूँ!
कुछ सपनों में खोना चाहूँ!
कभी किसी अपने की गोदी,
में सर रखकर रोना चाहूँ!
कभी मैं अपने दिल की बंजर,
भूमि पे कुछ बोना चाहूँ!
कभी ओस की बूंदो से मैं,
अपना चेहरा धोना चाहूँ!

कभी सोचता हूँ बच्चा बन,
माँ की लोरी को मैं सुन लूँ!
कभी सोचता हूँ बगिया से,
फूल कोई उल्फत का चुन लूँ!

कभी मैं बारिश के पानी से,
अपनी पलक भिगोना चाहूँ!
कभी ओस की बूंदो से मैं,
अपना चेहरा धोना चाहूँ!

बड़ा दर्द अब घुला रगों में,
और हथेली फटी हुईं हैं!
नसें प्यार की जो दिल में थीं,
वो भी अब तो कटी हुईं हैं!
पैरों में भी पड़े हैं छाले,
पगडण्डी सब बँटी हुईं हैं!
और मेरी हँसती सूरत पे,
अब मायूसी अटी हुईं हैं!

दर्द ही जब लिखा किस्मत में,
तो इससे क्यों नफरत कर लूँ!
आँखों में अंगारे लेकर,
कैसे दिल को पत्थर कर लूँ!

इसीलिए आंसू की बूंदें,
पल भर नहीं सुखोना चाहूँ!
कभी ओस की बूंदो से मैं,
अपना चेहरा धोना चाहूँ!

"देव" किसी ने साथ दिया न,
खुद ही टूटे दिल को जोड़ा!
झूठी खुशियों के लेपन से,
ग़म का रंग बदलना छोड़ा!
स्थिर होकर जीना सीखा,
झूठ की खातिर ढ़लना छोड़ा!
और किसी के इंतजार में,
मैंने अब तो जलना छोड़ा!

बना लिया है दवा दर्द को,
तन्हाई को साथी कर लूँ!
उम्मीदों की धूप सजाकर,
अपने घर को रौशन कर लूँ!

एहसासों की गहराई में,
खुद को बहुत डुबोना चाहूँ!
कभी ओस की बूंदो से मैं,
अपना चेहरा धोना चाहूँ!"

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-१५.०४.२०१४ 

" सर्वाधिकार सुरक्षित, मेरी ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित "

Monday, 14 April 2014

♥आँखों की नदी...♥

♥♥♥♥♥♥♥आँखों की नदी...♥♥♥♥♥♥♥♥♥
ढूंढकर भी मुझे जब तू नहीं मिल पाती है!
मेरी आँखों की नदी फिर से मचल जाती है!

तुझको इल्ज़ामों से फुर्सत ही नहीं मैं क्या करूँ,
जिंदगी पेश-ए-सफाई में निकल जाती है!

जैसा बोओगे वही वैसा काटना होगा,
ख़ार बोने से कहाँ गुल की फसल आती है!

जिंदगी में कोई जब देता सहारा हक़ से,
लड़खड़ाती हुयी दुनिया भी संभल जाती है!

तेरे बदलाव से हैरानगी नहीं मुझको,
मोम की कांच तो पल भर में पिघल जाती है!

मलके मरहम भी नहीं, चैन मयस्सर हमको,
दर्द की आंच से ये, रूह भी जल जाती है!

"देव" चेहरे से नहीं गम के निशां मिटने दिए,
वरना सूरत तो यहाँ पल में बदल जाती है!

...........चेतन रामकिशन "देव".............
दिनांक-१५.०४.२०१४ 

♥♥♥आरोपित प्रेम..♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥आरोपित प्रेम..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
क्या आरोप लगा देने से, प्रेम कला में सिद्धि होती!
क्या आरोप लगा देना ही, भावों की उपलब्धि होती!
क्यों आरोप लगाकर अपने, प्रेम को साबित करते हैं हम,
मगर जान लो आरोपों से, नहीं प्रेम में वृद्धि होती! 

सच्चाई को कहना सीखो, सच गलती को दूर करेगा!
पर केवल आरोपण करना, रोने को मजबूर करेगा!

घर आँगन में आरोपों से, नहीं कोई प्रसिद्धि होती!
क्या आरोप लगा देने से, प्रेम कला में सिद्धि होती...

आरोपों का अर्थ कठिन है, कहने में आसान रहा हो!
आरोपित व्यक्ति क्या बोले, वो जिससे अनजान रहा हो!
"देव" प्रेम के पथ में देखो, आरोपों से पीड़ा मिलती,
मानो अब तक प्यार वफ़ा के, रिश्तों में एहसान रहा हो!

एक दूजे में रखो आस्था और मन में विश्वास रखो तुम!
सच्चाई और अपनेपन का, बस दिल में एहसास रखो तुम!

आरोपों की बरसातों से, नहीं कोई समृद्धि होती!
क्या आरोप लगा देने से, प्रेम कला में सिद्धि होती!"

..................चेतन रामकिशन "देव".................
दिनांक-१४.०४.२०१४

Sunday, 13 April 2014

♥♥काँटों का हार…♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥काँटों का हार…♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मन में फिर धुंधला धुंधला सा, ख्वाबों का एक जाल बुना है! 
सबको दी है गुलों की माला, खुद काँटों का हार चुना है!
वैसे तो दावे करते थे, लोग हजारों अपनायत के,
साथ किसी ने नहीं दिया पर, दिल ने मेरा हाल सुना है!

इसीलिए अपनी पीड़ा को, अपने दिल से कह लेता हूँ!
सांस बहुत भारी हैं लेकिन, फिर भी जिंदा रह लेता हूँ!

असर भला कैसा होगा जब, दर्द दवा से कई गुना है!
मन में फिर धुंधला धुंधला सा, ख्वाबों का एक जाल बुना है... 

अरमानों का गला काटकर, उनको बेदम कर लेता हूँ!
नमक लगाकर मैं ज़ख्मों पर, पीड़ा को कम कर लेता हूँ!
"देव" मेरे दिल की ये बंजर, भूमि जब भी पानी मांगे,
मैं आँखों से धार बहाकर, खुद उसको नम कर लेता हूँ!

अम्बर के तारे गिन गिन कर, वक़्त रात का काट रहा हूँ!
अपने दामन से पीड़ा के, फूटे अंकुर छांट रहा हूँ!

लफ़्जों का दिल भर आया है, जब दिल का एहसास सुना है!
मन में फिर धुंधला धुंधला सा, ख्वाबों का एक जाल बुना है! "

........................चेतन रामकिशन "देव"…..................
दिनांक-१३.०४.२०१४

Saturday, 12 April 2014

♥मासूम मोहब्बत …♥

♥♥♥♥मासूम मोहब्बत …♥♥♥♥
गुनगुनाते हुए लम्हों की कसम!
खिलखिलाते हुए ग़ुलों की कसम!
प्यार तुमसे है, कह रहा हूँ मैं,
जगमगाते हुए दीयों की कसम!

तेरी नाराज़गी के डर से ही,
अपने जज़्बात में छुपाता हूँ!
देख लेता हूँ तुमको छुप छुप कर,
दिल ही दिल में, मैं मुस्कुराता हूँ!
सोचता हूँ तुम्हे अकेले में,
और ख्यालों में तुमको पाता हूँ!
तुम क्या जानो के बेबसी कितनी,
सांसें तक भी मैं भूल जाता हूँ!

तुम ही पढ़ लो वफ़ा निगाहों में,
गीत, ग़ज़लों की, कहकहो की कसम!
प्यार तुमसे है, कह रहा हूँ मैं,
जगमगाते हुए दीयों की कसम...

अपनी पलकों को जब, झुकाती हो!
बड़ी प्यारी सी नजर, आती हो!
देखकर तुमको जिंदगी मिलती,
एक उम्मीद सी जगाती हो!
"देव" तुमसे ही मुझमें प्यार जगे,
सारी दुनिया में तुम ही भाती हो,
मेरे एहसास के उजालों में,
तुम ही दीया हो और बाती हो!

काश बिन बोले तुम समझ जाओ,
प्यार की उन सभी हदों की कसम!
प्यार तुमसे है , कह रहा हूँ मैं,
जगमगाते हुए दीयों की कसम!"

....चेतन रामकिशन "देव"…....
दिनांक- १२.०४.२०१४

Thursday, 10 April 2014

♥♥जीवन पथ पर साथ रहो तुम…♥♥

♥♥♥♥♥♥♥जीवन पथ पर साथ रहो तुम…♥♥♥♥♥♥♥
जीवन पथ पर साथ रहो तुम, मुझे अकेले डर लगता है!
बिना तुम्हारे मुझको अपना सूना सूना घर लगता है!
तुमको जबसे पाया मैंने, आदत मुझको हुयी तुम्हारी!
इसीलिए तुमको खोने का, गुम होना का डर लगता है!

इश्क़ है तुमसे और मोहब्बत, और हमारा प्यार तुम्ही हो!
मेरे जीवन की कुटिया में, खुशियों का संसार तुम्ही हो!

तेरी ज़ुल्फ़ों की बूंदों से, भीगा ये अम्बर लगता है! 
जीवन पथ पर साथ रहो तुम, मुझे अकेले डर लगता है!

नहीं दूर जाना पल भर भी, एक पल मुझको साल लगे है!
बिना तुम्हारे दिल न सोये, सारी सारी रात जगे है!
"देव" तुम्हारा रूप देखकर, हंसी चांदनी खिल जाती है,
और मेरे जीवन को हमदम, धूप प्यार की मिल जाती है!

पेड़ों के छाया की नीचे, चुपके चुपके बात करेंगे!
तेरे प्यार में ही दिन होगा, तेरे प्यार में रात करेंगे! 

बिना तुम्हारे थमी उड़ानें, टूटा टूटा पर लगता है!
जीवन पथ पर साथ रहो तुम, मुझे अकेले डर लगता है!"

..................चेतन रामकिशन "देव"…...................
दिनांक- ११.०४.२०१४

♥तेरा एहसास…♥

♥♥♥तेरा एहसास…♥♥♥
तेरे एहसास का सहारा है!
दर्द भी टूटकर के हारा है!

तेरे पैरों के उन निशानों से,
देखो पावन ये घर हमारा है!

मोतियों की तरह चमकने लगा,
जब से लफ्ज़ों में ग़म उतारा है!

तेरे जाने के बाद तन्हाई,
हर तरफ तेरा ही नज़ारा है!

तोड़कर सरहदें चली आयें,
तेरी यादों का जब पुकारा है!

हाँ मैं खुश हूँ तेरी दुआओं से,
बिन दवाओं के ही गुज़ारा है!

"देव" तुमको भुला नहीं सकता,
दिल से धोखा नहीं ग़वारा है!"

.....चेतन रामकिशन "देव"…..
दिनांक- १०.०४.२०१४

Tuesday, 1 April 2014

♥दर्द की दुकान…♥♥

♥♥♥♥दर्द की दुकान…♥♥♥♥♥
मुझमें थोड़ी सी जान रहने दो!
दर्द की ये दुकान रहने दो!

गा सकूँ जो मैं अपनी ग़ज़लों को,
ग़म का साजोसामान रहने दो!

फिर न करना जफ़ा किसी के संग,
दिल में इतना ईमान रहने दो!

सोने चांदी की ख्वाहिशें न मुझे,
मेरा कच्चा मकान रहने दो!

घाव लफ्ज़ों का न भरे जल्दी,
अपने वश में जबान रहने दो!

चांदनी से बदन को धो लो मगर,
दिल पे ग़म के निशान रहने दो!

"देव" मिलने पे न चुराना नजर,
आज बेशक गुमान रहने दो!"

.....चेतन रामकिशन "देव"…..
दिनांक- ०१.०४.२०१४

Monday, 31 March 2014

♥बेबसी का तूफान…♥

♥♥♥बेबसी का तूफान…♥♥♥♥
दिल में तूफान बेबसी का है!
दर्द कितना ये मुफ़लिसी का है!

दिल पे पत्थर मैं रखके जीता हूँ,
वरना आलम तो ख़ुदकुशी का है!

सांस भारी हैं और बेचैनी,
इम्तहां आज फिर किसी का है!

सारी दुनिया में बह रही खुशियां,
मेरा मौसम तो नाख़ुशी का है!

लोग इल्ज़ाम यूँ लगाते हैं,
जैसे ईनाम ये ख़ुशी का है!

मेरा दिल तोड़कर के वो बोले,
ये खिलौना महज हँसी का है!

"देव" जो रूह से निभाएगा,
प्यार में मुझपे, हक़ उसी का है!"

........चेतन रामकिशन "देव"…......
दिनांक- ०१.०४.२०१४

Sunday, 30 March 2014

♥♥अश्कों की नदियां…♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥अश्कों की नदियां…♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
अश्कों की नदियां हैं लेकिन, होठ मेरे फिर भी सूखे हैं!
नमी नहीं है भावनाओं में, सब रिश्ते नाते रूखे हैं!
आज प्यार की परिभाषा का, पूरा ढांचा बदल गया है,
रूह की चाहत नहीं रही है, लोग बदन के बस भूखे हैं!

नहीं पता कैसी दुनिया है, अपनायत की चाह नहीं है!
नफरत के कांटे हैं पथ पर, समरसता की राह नहीं है!

भारत उदय हुआ है लेकिन, देश के निर्धन क्यूँ भूखे हैं!
अश्कों की नदियां हैं लेकिन, होठ मेरे फिर भी सूखे हैं!

बोझ समझकर माँ बाबा को, आज उन्हें दुत्कारा जाता!
आज महज दौलत की खातिर, खूँ का रिश्ता भी मिट जाता!
बस अपनी खुशियों की खातिर, भूल गए हम अपनेपन को,
सब चाहते हैं हंसी ठहाके, नहीं किसी के दुःख से नाता!

ये इक्कीसवीं सदी है जिसमें, रिश्ते नाते नाम के होते!
नातेदारी होती उनसे, जो बस अपने काम के होते!

घायल मर जाते सड़कों पर, दया के सब सागर सूखे हैं!
अश्कों की नदियां हैं लेकिन, होठ मेरे फिर भी सूखे हैं!

ऐसा आलम देख कविमन और कलम मुरझा जाते हैं!
भाव दर्द के इनके मन में और कलम में घुल जाते हैं!
"देव" गांव की वो पगडण्डी, मुझे शहर से प्यारी लगती,
जहाँ पेड़ की छाया नीचे, हम कुदरत से मिल जाते हैं!

मगर शहर के के इस धुयें ने, मानवता को मंद कर दिया!
प्यार की सुन्दर किरणों वाले, हर रस्ते को बंद कर दिया!


रोता है ये मेरा मन भी,  भाव स्याही के सूखे हैं!
अश्कों की नदियां हैं लेकिन, होठ मेरे फिर भी सूखे हैं!"

................चेतन रामकिशन "देव"…...............
दिनांक- ३०.०३.२०१४ 

Saturday, 29 March 2014

♥यादों का एहसास…♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥यादों का एहसास…♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
सांसें भले उधारी की हों, खुद को जिन्दा रख लेते हैं!
जब भी प्यास लगे अधरों को, खुद के आंसू चख लेते हैं!
नहीं पता कब तुझे देखने की, हसरत हो जाये दिल को,
इसीलिए तस्वीर तुम्हारी, हम कमरे में रख लेते हैं!  

बड़ा ही गहरा दर्द प्यार का, दवा असर न कर पाती है!
इंसां बेशक मर जाते हैं, याद न लेकिन मर पाती है!

इसीलिए तेरी यादों का, दिल पे पत्थर रख लेते हैं!
सांसें भले उधारी की हों, खुद को जिन्दा रख लेते हैं!

तुमसे दिल का रिश्ता है हम, इसीलिए न गिला करेंगे!
घाव मुझे तुम देती जाओ, सबको हंसकर सिला करेंगे!
"देव" अगर तुम मुझे देखकर, खिड़की के परदे ढ़क लोगी,
तो हम तेरी तस्वीरों से, एहसासों में मिला करेंगे!

अपने दिल को समझा लेंगे, न तुमसे फरियाद करेंगे!
तुझे खबर न होगी तुझको, हम चुपके से याद करेंगे!

तेरी याद के एहसासों को, गीत, ग़ज़ल में लिख लेते हैं!
सांसें भले उधारी की हों, खुद को जिन्दा रख लेते हैं!"

................चेतन रामकिशन "देव"…...............
दिनांक- २९.०३.२०१४  

Thursday, 27 March 2014

♥माँ के लफ्ज़…♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥माँ के लफ्ज़…♥♥♥♥♥♥♥♥♥
माँ के लफ्ज़ों से दुआओं की फसल खिल जाये!
माँ के एहसास से खुशियों का कमल खिल जाये!
दूध से अपने भुजाओं में, बल भरा मेरी,
माँ के आँचल में मुझे, सारी खुशी मिल जाये!

माँ की आवाज़ ने जब भी मुझे पुकारा है!
मुझे उस वक़्त मिला, प्यार बहुत सारा है!

माँ के छूने से, चुभा काँटा भी निकल जाये!
माँ के लफ्जों से दुआओं की फसल खिल जाये!

माँ की आँखों में सितारों की चमक रहती है!
माँ की बोली में सुरों जैसी खनक रहती है!
बंद आँखों से भी कर लेती नजारा है माँ,
माँ को संतान की पीड़ा की भनक रहती है!

माँ का दिल प्यारा है, सूरत भी बड़ी भोली है!
माँ की ममता से दीवाली है, मेरी होली है!

माँ के होने से, अंधेरों में दीया जल जाये!
माँ के लफ्जों से दुआओं की फसल खिल जाये!

माँ की आँखों में नहीं आंसू, हमें भरने हैं!
माँ के दिल के भी नहीं टुकड़े हमें करने हैं!
"देव" धरती पे है भगवान की छाया माँ में,
हमको दुख दर्द यहाँ, माँ के सभी हरने हैं!

माँ के सपनों को सजाने के लिए जुट जाओ!
माँ के जीवन के लिए, हँसके यहाँ मिट जाओ!

माँ का किरदार नहीं कोई भी बदल पाये!
माँ के लफ्जों से दुआओं की फसल खिल जाये!"


(अपनी दोनों माताओं कमला देवी जी एवं प्रेमलता जी को सादर समर्पित)

....चेतन रामकिशन "देव"….
दिनांक- २७.०३.२०१४ 

Tuesday, 25 March 2014

♥♥♥दिल की चुप्पी…♥♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥दिल की चुप्पी…♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
गतिशीलता मंद हो गयी, सीने में दिल चुप रहता है!
मुट्ठी भर होकर भी देखो, पर्वत जैसा दुख सहता है!
इस दुनिया में न हर कोई, सुनता देखो दर्द किसी का,
इसीलिए तो सोच समझकर, ये अपनी पीड़ा कहता है!

कभी ग़ज़ल को, कभी गीत को, भावुकता से भर देता है!
कभी किसी की खातिर देखो, दुआ हजारों कर देता है!

नहीं कराहता कभी जोर से, आँखों से चुप चुप बहता है!
गतिशीलता मंद हो गयी, सीने में दिल चुप रहता है....

कभी किसी अपने के हाथों, बेदर्दी से छल जाता है!
कभी किसी की खातिर देखो, दीपक जैसे जल जाता है!
"देव" कभी इंसान के दुख में, संग साथ में रोता है ये,
और कभी खुशियों में देखो, फूलों जैसा खिल जाता है!

कपट सिखाते हम ही इसको, जनम से ये पावन होता है!
बड़ा दयालु होता है ये, इसका सुन्दर मन होता है!

अपनी इच्छा मार के देखो, दंड हमारा ये सहता है!
गतिशीलता मंद हो गयी, सीने में दिल चुप रहता है!"

.................चेतन रामकिशन "देव"..................
दिनांक- २५.०३.२०१४ 

♥♥इल्ज़ाम…♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥इल्ज़ाम…♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
क्या इल्ज़ाम लगा देने से, रंग प्यार का खिल जाता है!
क्या इल्ज़ाम लगा देने से, घाव मनों का सिल जाता है!
इन झूठे इल्ज़ामों से तो, सम्बन्धों में दूरी बढ़ती,
प्यार, वफ़ा का रिश्ता नाता, बस मिट्टी में मिल जाता है!

जो बस खुद को पाक़ समझकर, औरों पर कालिख मलते हैं!
कहाँ भला उनके जीवन में, दीये हक़ीक़त के जलते हैं!

ये क्या जानें इल्ज़ामों से, ये प्यारा दिल छिल जाता है!
क्या इल्ज़ाम लगा देने से, रंग प्यार का खिल जाता है!

कितने भी इल्ज़ाम लगाओ लेकिन सच कब मर पाया है!
इल्ज़ामों का झूठा चेहरा, एक दिन क़दमों में आया है!
"देव" जहाँ में इल्ज़ामों से, रिश्ते नाते खंडित होते,
इल्ज़ामों की आंच में तपकर, खिलता घर भी मुरझाया है!

इन झूठे इल्ज़ामों के बिन, जब भी प्यार किया जाता है!
वही प्यार देखो दुनिया में, दिल से यहाँ किया जाता है!

इल्ज़ामों की चोट से देखो, घर, आंगन सब हिल जाता है!
क्या इल्ज़ाम लगा देने से, रंग प्यार का खिल जाता है!"

..................चेतन रामकिशन "देव"...................... 
दिनांक- २४.०३.२०१४ 

Saturday, 22 March 2014

♥♥प्रतीक्षा…♥♥

♥♥♥♥प्रतीक्षा…♥♥♥♥
मेरे हाथ पे हाथ रखोगी!
प्यार वफ़ा की बात कहोगी!
कभी दुआ में, कभी याद में,
हमदम मेरे साथ रहोगी!

कभी देख तेरी तस्वीरें,
हौले हौले बात करूँगा!
कभी रहूँगा तनहा दिन भर,
कभी तड़प में रात करूँगा!
कभी तुम्हारी आहट पाकर,
खिड़की के परदे खिसका दूँ,
कभी तुम्हारे क़दमों नीचे,
फूलों की सौगात करूँगा!

मेरे मन के पृष्ठ पटल पर,
गंगाजल सी तुम्ही बहोगी!
कभी दुआ में, कभी याद में,
हमदम मेरे साथ रहोगी...

कभी जुदाई की बातों में,
मेरे व्याकुल ज़ज्बातों में!
याद करूँगा हर पल तुमको,
सुख दुख के सब हालातों में!
तुम्हे देखने की हसरत में,
हर पल मैं प्रतीक्षा करता,
"देव" कभी मिलने आ जाना,
तुम सावन की बरसातों में!

यकीं है मुझको एक दिन तुम भी,
प्यार के ढाई लफ्ज़ कहोगी !
कभी दुआ में, कभी याद में,
हमदम मेरे साथ रहोगी!"

....चेतन रामकिशन "देव"....
दिनांक- २२.०३.२०१४

Thursday, 20 March 2014

♥मेरे जीवन में…♥

♥♥♥♥मेरे जीवन में…♥♥♥♥
बनकर चाँद मेरे आंगन में!
चली आओ मेरे जीवन में!
तुझसे हर एहसास पनपता,
वसी है तू ही अंतर्मन में!

तू दुनिया से न्यारी लगती!
तू फूलों की क्यारी लगती!
बिना तेरे मेरा जग सूना,
तू कोमल और प्यारी लगती...

गंगाजल सी पावन है तू,
खुशबु तेरी घुली पवन में!
तुझसे हर एहसास पनपता,
वसी है तू ही अंतर्मन में!

नैतिकता की सीमा तुझसे!
कविताओं की उपमा तुझसे!
नहीं विरत होने दे पथ से,
शब्दकोष की गरिमा तुझसे...

छुअन तुम्हारी बड़ी ही प्यारी,
नम्र भावना है चिंतन में!
तुझसे हर एहसास पनपता,
वसी है तू ही अंतर्मन में!

भाषा की मीठी बोली में!
तू कुदरत की रंगोली में!

"देव" तुझी से दीवाली है,
तू शामिल मेरी होली में!

खुशबु तेरी, रोटी में है,
स्वाद तुझी से है भोजन में!"

.....चेतन रामकिशन "देव"…….
दिनांक- २०.०३.२०१४

Monday, 17 March 2014

♥♥प्यार के फूल…♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्यार के फूल…♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
जब दुनिया की भीड़ से हटकर, कोई अच्छा लगने लगता!
किसी की खातिर जब मन देखो, रात रात भर जगने लगता!

ऐसे बेचैनी के लम्हों को ही, प्यार कहा जाता है!
एक अनजाने से भी देखो, दिल का रिश्ता बन जाता है! 

दर्द किसी का जब दुनिया में, खुद से ज्यादा लगने लगता!
जब दुनिया की भीड़ से हटकर, कोई अच्छा लगने लगता...

जिस की खातिर मर जाने को, मिट जाने को दिल करता है!
उस इंसां के दिल से पूछो, प्यार उसे कितना करता है!

जब कोई ख्वाबों में आकर, चैन सुकूं सब ठगने लगता!
जब दुनिया की भीड़ से हटकर, कोई अच्छा लगने लगता...

वो जिसकी सूरत में रब का, वास हमें दिखने लगता है!
जिसकी खातिर कलम हमारा, प्रेम गीत लिखने लगता है!

वो जिसकी खुशबु में हमको, चन्दन शामिल लगने लगता!
जब दुनिया की भीड़ से हटकर, कोई अच्छा लगने लगता...

"देव" जहाँ से जिस इंसां से, भाव प्रेम के मिल जाते हैं!
उसको पाकर के जीवन में, फूल ख़ुशी के खिल जाते हैं!

जिसकी खातिर सावन में भी, बादल यहाँ सुलगने लगता!
जब दुनिया की भीड़ से हटकर, कोई अच्छा लगने लगता! "

....................चेतन रामकिशन "देव"…………………..
दिनांक- १७.०३.२०१४

Monday, 10 March 2014

♥झोपड़-पट्टी…♥♥

♥♥♥♥♥♥झोपड़-पट्टी…♥♥♥♥♥♥♥
झोपड़-पट्टी में उजियारा करने को ! 
निर्धन का आँचल खुशियों से भरने को! 
कोई सियासी मुझको नजर नहीं आया,
जो निर्धन के साथ हो, भूखा मरने को!

लम्बे चौड़े भाषण कहना जानें हैं!
यहाँ सियासी झूठी बातें तानें हैं!
इनकी आँख का आंसू महज दिखावा है,
नहीं कभी निर्धन को अपना मानें हैं!

जुटे यहाँ पर ये घोटाले करने को!
झोपड़-पट्टी में उजियारा करने को ! 

कभी यहाँ मज़हब की बातें करते हैं!
भाई को भाई का दुश्मन करते हैं!
"देव" इन्हे अपनी सत्ता से मतलब है,
इसीलिए ये झूठे वादे करते हैं!

लाखों अरबों अपनी झोली भरने को! 
झोपड़-पट्टी में उजियारा करने को ! "

........चेतन रामकिशन "देव"….......
दिनांक-१०.०३.२०१४

Saturday, 8 March 2014

♥आलेखन का रंग…♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥आलेखन का रंग…♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
आलेखन का रंग तुम्हारे, जीवन में भरना चाहता हूँ!
वक्र तुम्हारी नाराज़ी का, मैं सीधा करना चाहता हूँ!
अपनी सारी खुशियां तेरे, जीवन को मैं अर्पण करके,
हमदम तेरे जीवन से मैं, सारा दुख हरना चाहता हूँ!

नहीं पता तुम क्यूँ रूठी हो, नहीं पता क्यूँ मुँह मोड़ा है!
नहीं पता क्यूँ तुमने मेरे, प्यार भरे दिल को तोड़ा है!

दोष नहीं है फिर भी तुमसे, क्षमा भाव करना चाहता हूँ!
आलेखन का रंग तुम्हारे, जीवन में भरना चाहता हूँ!

पीड़ा मन को बहुत सताती, हँसने में भी दुख होता है!
बिना तुम्हारे नहीं जानता, किस रंग का ये सुख होता है!
"देव" तुम्हारे बिना हमारी, आँखों में सूनापन दिखता,
खून जरा भी नहीं बदन में, उतरा उतरा मुख होता है!

कलम में शक्ति, मन में भक्ति, जीवन में उत्साह नहीं है!
बिना तुम्हारे तन्हा तन्हा, जीवन का निर्वाह नहीं है!

बिना तुम्हारे तन्हा जीता, और यूँ ही मरना चाहता हूँ!
आलेखन का रंग तुम्हारे, जीवन में भरना चाहता हूँ!"

.................चेतन रामकिशन "देव"…...............
दिनांक-०८.०३.२०१४

Wednesday, 5 March 2014

♥भावों की चमक...♥

♥♥♥♥भावों की चमक...♥♥♥♥
जिनके भाव सरल होते हैं!
जिनके भाव सबल होते हैं!
उनका वंदन होता जग में,
जिनके भाव विमल होते हैं!

जो अपने हित की इच्छा में,
मानवता को नहीं मारते!

सदा आत्मा जीते उनकी,
लोग नहीं वो कभी हारते!

जन जन में सम्मान हो उनका,
जिनके भाव अछल होते हैं!
उनका वंदन होता जग में,
जिनके भाव विमल होते हैं...

कठिन परिश्रम जो करते हैं!
खून पसीना एक करते हैं!
जिनके मन में कर्मठता हो,
जीत वही अर्जित करते हैं!

साथ समय के चलते हैं जो,
उनके सब दुख हल होते हैं!
उनका वंदन होता जग में,
जिनके भाव विमल होते हैं...

जो सोने चांदी से पहले,
अपने मन को चमकाते हैं!
जो हिंसा के भाव मिटाकर,
प्रेम के मोती बरसाते हैं!
पाखंडों की सत्ता आगे,
जिनका शीश नहीं झुकता है,
"देव" जगत में ऐसे जन ही,
ध्वज प्रेम की लहराते हैं!

भले न तन हो उजला उनका,
किन्तु भाव कमल होते हैं!
उनका वंदन होता जग में,
जिनके भाव विमल होते हैं!"

....चेतन रामकिशन "देव"…...
दिनांक-०५.०३.२०१४

♥♥प्यार के आख़र...♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्यार के आख़र...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मुझको अपने दिल में रखना, और रूह से प्यार निभाना!
मेरे साथ में रहना हर पल, मैं रूठूं तो मुझे मनाना!
नहीं शिकायत करना मुझसे, अगर काम कोई बिगड़े तो,
मुझको अपने पास बिठाकर, सही काम की लय सिखलाना!

प्रेम के पथ पर नया नया हूँ, एहसासों को सिंचित करना!
न लाऊं उपहार अगर जो, क्रोध नहीं तुम किंचित करना!
अपना एक एक अक्षर देकर, ग़ज़ल तुम्हारी खातिर लिखूं,
और मेरे बिखरे आख़र को, सरस भाव से संचित करना!

काव्य कला में निपुण नहीं हूँ, सही गलत तुम ही बतलाना!
मुझको अपने दिल में रखना, और रूह से प्यार निभाना!

कभी तिमिर जो घेरे मुझको, दीपक बनकर राह दिखाना!
अगर अधिकता काम की हो तो, मेरा थोड़ा हाथ बंटाना!
कभी थकावट हो मुझको तो, गोद में अपनी मुझे सुलाना,
माँ की लोरी की तरह से, प्यार भरे कुछ गीत सुनाना!

बुरी नजर का खतरा हो तो, काजल का एक तिलक लगाना!
मुझको अपने दिल में रखना, और रूह से प्यार निभाना!

नजर से अपनी दूर न करना, घने पेड़ सी छाया करना!
इस दुनिया की नज़र से हमदम, अपना प्यार बचाया करना!
"देव" कभी मुश्किल लम्हों में, अगर अकेला पड़ जाऊं तो,
तो तुम मेरे हाथ में हमदम, अपना हाथ थमाया करना!

तुम शामिल हो मेरी रूह में, रूह में अपनी मुझे समाना!
मुझको अपने दिल में रखना, और रूह से प्यार निभाना!"

"
प्रेम-का एक एक क्षण अनमोल होता है, प्रेम अनुबंध पत्रों जैसे लिखित प्रमाणों का मोहताज नहीं होता, हाँ वो विश्वास और समर्पण का आधार मांगता है, प्रेम चाहें एक क्षण का ही क्यूँ न हो, अगर वो समर्पण और विश्वास के साथ किया जाता है अथवा दिया जाता है, तब वो क्षणिक प्रेम भी प्रेम ग्रंथ पर अमर हो जाता है, तो आइये प्रेम को धारण करें! "

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-०५.०३.२०१४

"
सर्वाधिकार सुरक्षित "
" मेरी ये रचना, मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित "

Monday, 3 March 2014

♥दिल में है सैलाब...♥♥♥

♥♥♥♥दिल में है सैलाब...♥♥♥♥♥♥
दिल में है सैलाब, नयन में पानी है! 
दिन बोझिल था, मेरी रात पुरानी है!

झूठ को चोला ओढ़ के कितने दिन जीना,
एक दिन सच के हाथों मुंह की खानी है! 

माँ बाबा को यहाँ भटकता छोड़ गया,
जिसको सारी दुनिया कहती दानी है!

वो क्या जीते मुश्किल के हालातों से,
हार किसी ने बिना लड़े जो मानी है!

यहाँ होंसलों से दीये जल जाते हैं,
मंजर चाहें कितना भी तूफानी है!

वो मुझको ज्यादा है, खूं के रिश्तों से,
जिसने मेरे दिल की हालत जानी है!

प्यार था जिसको, उसने दुख पहचान लिया,
सारी दुनिया जिस गम से बैगानी है!

पत्थर में भी फूल खिलाकर रहता है,
जिसने कुछ बेहतर करने की ठानी है!

"देव" मेरे दिल में, आकर क्या पाओगे,
घाव हैं गहरे और बाकी वीरानी है!"

........चेतन रामकिशन "देव"…......
दिनांक-०३.०३.२०१४

Sunday, 2 March 2014

♥♥रग रग में बारूद ♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥रग रग में बारूद ♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
बना दिया मुझको विस्फोटक, रग रग में बारूद भरी है!
कुछ अपनों ने पल भर में ही, मेरी जिंदगी तबाह करी है!
बड़े जोर से मानवता की, मगर दलीलें देते हैं वो,
पेश यहाँ ऐसे आते हैं, जैसे उनकी सोच खरी है!

किसी की दुनिया बदतर करके, लोग यहाँ पर जी लेते हैं!
मानव होकर भी मानव का, खून यहाँ पर पी लेते हैं!

मानवता इन लोगों ने ही, क़दमों नीचे यहाँ धरी है!
बना दिया मुझको विस्फोटक, रग रग में बारूद भरी है!

ऐसे लोगों को बस अपने, सुख से ही मतलब रहता है!
जान किसी की निकले बेशक, उनका चेहरा खुश रहता है!
"देव" नहीं मालूम जहां में, अपनायत है किसके दिल में,
इसीलिए बस आज का मानव, पत्थर जैसे बुत रहता है!

ऐसे लोगों का दुनिया में, कुदरत ही इन्साफ करेगी!
मुझे यकीं है इस कुदरत पर, वो न इनको माफ़ करेगी!

खून यहाँ मेरा पीकर भी, इनकी नियत नहीं भरी है!
बना दिया मुझको विस्फोटक, रग रग में बारूद भरी है!"

......................चेतन रामकिशन "देव"…..................
दिनांक-०२.०३.२०१४

Saturday, 1 March 2014

♥♥ठहरी सांसें, बहरी कुदरत ♥♥

♥♥ठहरी सांसें, बहरी कुदरत ♥♥
दिल पे चोट बड़ी गहरी है!
सांस मेरी हर एक ठहरी है!
मेरी तो फरियाद सुने न,
कुदरत भी गूंगी, बहरी है!

जिस सपने को पोषित करता,
वही टूटकर रह जाता है!
साथ में जिसके रहना चाहूँ,
वही छूटकर रह जाता है!

नहीं पता कब खुशियाँ होंगी,
अभी तलक दुख की देहरी है! 
मेरी तो फरियाद सुने न,
कुदरत भी गूंगी, बहरी है!

जिन्दा हूँ तो सह लेता हूँ,
बेबस होकर रह लेता हूँ!
कभी यहाँ रोता हूँ दिल से,
कभी रूह से बह लेता हूँ!

नहीं गांव सी ठंडी छाया,
दिल की हालत अब शहरी है!
मेरी तो फरियाद सुने न,
कुदरत भी गूंगी, बहरी है!

बड़े बुजुर्गों का कहना है,
गम में भी हंसकर रहना है!
"देव"  भले कुदरत आंसू दे,
पर फिर भी हमको सहना है!

इसीलिए चुपचाप खड़ा हूँ,
न कल कल, न ही लहरी है!
मेरी तो फरियाद सुने न,
कुदरत भी गूंगी, बहरी है!"

.....चेतन रामकिशन "देव"….
दिनांक-०२.०३.२०१४

♥♥♥अंगारे...♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥अंगारे...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
कदम कदम पर अंगारे हैं, अब चलने से डर लगता है!
राख हो गया मैं जल जल कर, अब जलने से डर लगता है! 
नहीं पता कब कोई रहज़न, लूट ले मेरी कोमलता को,
इसीलिए फूलों के जैसे, अब खिलने से डर लगता है!

किससे अपना दर्द कहें हम, अपनों ने हमको छोड़ा है!
और पराये लोगों ने भी, हमसे हर नाता तोड़ा है!

इसीलिए दुनिया वालों से, अब मिलने से डर लगता है!
कदम कदम पर अंगारे हैं, अब चलने से डर लगता है!

लोग बड़े ही सौदागर हैं, प्यार का भी सौदा करते हैं!
बेरहमी से औरों का दिल, क़दमों से रोंदा करते हैं!
"देव" हमेशा जिनको मैंने, हर पल ही चाहत बख्शी थी,
वही लोग ग़म के ख़ंजर से, कबर मेरी खोदा करते हैं!

जिसको अपना समझा मैंने, मुझको वही दगा देता है!
जिसका जैसा मन होता है, वो इल्ज़ाम लगा देता है!

पत्थर का बनना चाहता हूँ, अब छिलने से डर लगता है!
कदम कदम पर अंगारे हैं, अब चलने से डर लगता है!"

................चेतन रामकिशन "देव"….......................
दिनांक-०१.०३.२०१४

Friday, 28 February 2014

♥अनदेखा...♥

♥♥♥♥अनदेखा...♥♥♥♥♥
अनदेखा करती रहती हो!
तुम विरहा का दुख देती हो!
भले दूर तुम जाओ लेकिन,
मेरे दिल में तुम रहती हो!

तुम्हें जोड़कर मैं शब्दों से,
अपनी कविता लिख लेता हूँ!
खुशियाँ दो या मुझको ग़म दो,
मैं चुपके से रख लेता हूँ!
नहीं समझतीं जब भावों को,
तो जीता हूँ तन्हाई में,
देख तेरी तस्वीर को हमदम,
अपने आंसू चख लेता हूँ!

एहसासों की धारा बनकर,
रग रग में तुम ही बहती हो!
भले दूर तुम जाओ लेकिन,
मेरे दिल में तुम रहती हो...

लेकिन इतना तड़पाना भी,
प्यार के पथ में सही नहीं है!
हमदम तेरी अनदेखी से,
जान बदन में रही नहीं है!
"देव" मगर एक दिन समझोगे,
तुम पीड़ा की ख़ामोशी को,
अभी तलक जो पीड़ा मैंने,
इन शब्दों से कही नहीं है!

भले ही बाहर से मुंह मोड़ो,
भीतर से तनहा रहती हो!
भले दूर तुम जाओ लेकिन,
मेरे दिल में तुम रहती हो!"

....चेतन रामकिशन "देव"….
दिनांक-२८.०२.२०१४

♥♥ग़म की चाहत...♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥ग़म की चाहत...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
कुछ ग़म रक्खा कल की खातिर, आज के गम को साथ लिया है!
मैंने भी एहसास मारकर कानूनों को, हाथ लिया है! 
नहीं किसी के जाने का डर, नहीं राह तकता आने की,
तन्हाई में बतियाने को, दर्पण अपने साथ लिया है!

मेरा ग़म फिर भी बेहतर है, लोगों जैसा छल नहीं करता!
छोड़ के मुझको एक पल को भी, ये जाने का बल नहीं करता!

मैंने गम को बहलाने को, दुख भी अपने साथ लिया है!
कुछ ग़म रक्खा कल की खातिर, आज के गम को साथ लिया है!

अपने ग़म के साथ ही मैंने, साँझ सवेरे रोटी खाई!
प्यास में ग़म से आंसू मांगे, चोट पे गम की दवा लगाई! 
"देव" मुझे बस अपने गम से, एक गिला बस ये रहता है,
अरसा बीता जिससे बिछड़े, इसने उसकी याद दिलाई!

लेकिन इसकी अच्छाई के आगे, ये गलती कमतर है!
मैं इसके दिल में रहता हूँ, इसके दिल में मेरा घर है!

नहीं ज़माने जैसा बदले, रूह से इसने साथ दिया है!
कुछ ग़म रक्खा कल की खातिर, आज के गम को साथ लिया है!"

.............................चेतन रामकिशन "देव"…..........................
दिनांक-२८.०२.२०१४

Thursday, 27 February 2014

♥जीत की लय...♥

♥♥♥जीत की लय...♥♥♥
अपनी मंजिल तय करनी है!
हमें जीत की लय करनी है!
झूठ भले कितना भी घेरे,
हमें सत्य की जय करनी है!

रात ग़मों की गहराये तो,
चाँद से हम उजियारा लेंगे!

प्यास सताएगी जब हमको,
तो आँखों से धारा लेंगे!

धीरे धीरे, हौले हौले,
कर लेंगे मजबूत जड़ों को,

अगर रौशनी मंद पड़ेगी,
तो अम्बर से तारा लेंगे!

सोच हमें अपने तन मन की,
मेहनत में तन्मय करनी है!
झूठ भले कितना भी घेरे,
हमें सत्य की जय करनी है...

पथ बेशक पथरीला है पर,
काँटों से न घबराना है!

भले फिसल के गिर जायें पर,
फिर से हमको उठ जाना है!

"देव" भले ही इस जीवन का,
हमको कोई पता नहीं है,

लेकिन हमको जीते जी न,
इस जीवन में थक जाना है! 

मुश्किल के लम्हातों में भी,
हंसकर हमे विजय करनी है!
झूठ भले कितना भी घेरे,
हमें सत्य की जय करनी है!"

......चेतन रामकिशन "देव"…...
दिनांक-२७.०२.२०१४

Wednesday, 26 February 2014

♥ग़मों की फसल...♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥ग़मों की फसल...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
फसल ग़मों की हरी भरी है, दुख में नया इज़ाफ़ा होगा!
गम की फलियां देखके लगता, मुझको बहुत मुनाफा होगा!
मेरी फसल की देख तरक्की, बुरा वक़्त शाबाशी देगा,
और वक़्त के हाथों में भी, गम से भरा लिफाफा होगा! 

फसल ग़मों की देखके जिनको, अपना जीवन बोझिल लगता!
उनको लोगों को इस जीवन में, देखो कुछ भी मिल नहीं सकता!
बिना कठिनता पाये जग, नहीं सफलता मिल सकती है, 
बिन मेहनत के इस दुनिया में, जीत का गुलशन खिल नही सकता!

वक़्त भले कितने भी गम दे, भले फसल हो गम की भारी!
टूट न जाना तुम पीड़ा से, चाहें कितनी हो दुश्वारी!
"देव" जहाँ में उन लोगों ने ही, देखो इतिहास बनाया,
जिनमें हिम्मत और सच्चाई, जिनमें रहती है खुद्दारी!

बदले किस्मत देखके हिम्मत, खुशियों भरा लिफाफा होगा!
फसल ग़मों की हरी भरी है, दुख में नया इज़ाफ़ा होगा!"

..................चेतन रामकिशन "देव"….................
दिनांक-२६.०२.२०१४

♥♥प्रेम तपस्या...♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्रेम तपस्या...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
प्रेम तपस्या बहुत कठिन है, प्रेम का पथ आसान नहीं है!
विषय रहित वो प्रेम है जिसमें, मानवता का मान नहीं है!
नहीं प्रेम की सीमाओं में, केवल युगलों की चंचलता,
प्रेम तो वो विश्वास है जिसके, बिन जग में भगवान नहीं है!

प्रेम, विरह की घड़ियों में भी, नहीं टूटकर खंडित होता!
प्रेम है घोतक सच्चाई का, नहीं झूठ से मंडित होता!

प्रेम की सीमा इतनी व्यापक, कि उसका अनुमान नहीं है!
प्रेम तपस्या बहुत कठिन है, प्रेम का पथ आसान नहीं है!

ढाई अक्षर लिख देना ही, नाम प्रेम का कब होता है!
प्रेम समर्पण भाव है जिसमें, खुद का कुछ भी कब होता है!
"देव" भले भगवान को हमने, न देखा अपनी आँखों से,
किन्तु जिससे प्रेम पनपता, प्रेम में वो ही रब होता है!

प्रेम जहां जिस परिसर में हो, वहाँ रात में दिन होता है!
प्रेम से महके वायुमंडल, और सुन्दर ये मन होता है!

निकट की अनुभूति दूरी में, रिक्ति का स्थान नहीं है!
प्रेम तपस्या बहुत कठिन है, प्रेम का पथ आसान नहीं है!"

......................चेतन रामकिशन "देव"…...................
दिनांक-२६.०२.२०१४

Tuesday, 25 February 2014

♥♥ठंडा चूल्हा..♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥ठंडा चूल्हा..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
आँखों में मायूसी दिखती और चेहरे पे वीरानी है!
निर्धन का चूल्हा ठंडा है, घर में न दाना पानी है!
भूख प्यास से उसके तन का, जर्जर ढांचा साफ़ झलकता,
मगर रहीसों की दुनिया ने, कब उसकी पीड़ा जानी है!

निर्धन की बेटी का रिश्ता, बिन पैसों के हो नहीं पाता!
बिना दवाओं के ये निर्धन, बेबस होकर के मर जाता!

इतने पर भी देश के नेताओं की, जहरीली वाणी है!
आँखों में मायूसी दिखती और चेहरे पे वीरानी है...

सत्ता के मद में कुछ नेता, निर्धन की सीमा तय करते!
निर्धन के अधिकार लूटकर, अपने हित की वो जय करते!
वक़्त चुनावो का हो तो ये, निर्धन को हमदर्द बताते,
बाद चुनावों के ये नेता, अपना जीवन सुखमय करते!

"देव" यहाँ नेताओं ने ही, निर्धन को बर्बाद किया है!
जब आया माहौल चुनावी, तब निर्धन को याद किया है!

लटक रहा है वो फांसी पर, आह तलक भी न जानी है!
आँखों में मायूसी दिखती और चेहरे पे वीरानी है!"

................चेतन रामकिशन "देव"…............
दिनांक-२५.०२.२०१४

Sunday, 23 February 2014

♥मन के तार...♥♥

♥♥♥♥मन के तार...♥♥♥♥♥♥♥
मन के तार मिले रहने दो!
तुम एहसास खिले रहने दो!

मैं आँखों से ही पढ़ लूंगा,
अपने होठ सिले रहने दो!

पूरे हों या रहें अधूरे,
सपने मगर पले रहने दो!

अँधेरा न छू पायेगा,
प्यार के दीप जले रहने दो!

मुझे रौशनी देना हर पल,
लम्बी रात भले रहने दो!

तेरी खुशबु मुझको प्यारी,
बेशक फूल खिले रहने दो!

चिलमन से देखूंगा तुमको,
खिड़की जरा खुले रहने दो!

सूरत को मांजो न चाहें,
दिल के भाव धुले रहने दो!

"देव" मिलेंगे हम जल्दी ही,
तुम उम्मीद खिले रहने दो!"

...चेतन रामकिशन "देव"…......
दिनांक-२३.०२.२०१४

Saturday, 22 February 2014

♥प्यार अभी तक...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्यार अभी तक...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
जान हजारों चली गयीं पर, प्यार अभी तक मरा नहीं है !
क्यूंकि जग में प्यार से बढ़कर, कोई रिश्ता खरा नहीं है!
प्यार नहीं केवल युगलों तक, बहुत बड़ी है सीमा इसकी,
वो मानव पाषाण है जिसमें, प्यार जरा भी भरा नहीं है!

नफरत के अंकुर बोने से, प्यार नहीं पैदा होता है!
किसी के घर अल्लाह में रोता, राम किसी के घर रोता है!

बिना प्रेम के अम्बर सूना, और ये हर्षित धरा नहीं है!
जान हजारों चली गयीं पर, प्यार अभी तक मरा नहीं है !

हर रिश्ते में, हर नाते में, प्यार से ही रौनक आती है!
जिनके दिल में प्यार पनपता, उनकी दुनिया मुस्काती है!
"देव" छोड़कर नफरत सारी, प्यार को अपने दिल में भर लो,
बिना प्यार की छाया पाये, आंच ग़मों की झुलसाती है!

प्यार की ये नातेदारी तो, जात धर्म से ऊपर होती!
न ईर्ष्या, न द्वेष पनपता, दुरित कर्म से ऊपर होती!

प्यार है अमृत के प्याला सा, ये जहरीली सुरा नहीं है!
जान हजारों चली गयीं पर, प्यार अभी तक मरा नहीं है !"

..................चेतन रामकिशन "देव"…................
दिनांक-२२.०२.२०१४

Thursday, 20 February 2014

♥प्राण तुम्हीं में...

♥♥♥प्राण तुम्हीं में...♥♥♥
प्राण तुम्हीं में निहित किये हैं!
मन्त्र प्रेम के जपित किये हैं!
शब्दकोष से शब्द चुने पर,
भाव तुम्हीं से उदित किये हैं!

तुम लेखन में गतिमान हो!
सही गलत का अनुमान हो!
काव्य प्रेम का सिखलाती हो,
तुम शिक्षक हो तुम्ही ज्ञान हो!

प्रेम की हर पंक्ति के मैंने,
चिन्ह तुम्ही से विदित किये हैं!
शब्दकोष से शब्द चुने पर,
भाव तुम्हीं से उदित किये हैं!

अपनेपन की तुम प्रेषक हो!
गलत दिशा का संकेतक हो!
मुझे शुद्धता सिखलाती हो,
तुम कमियों की विश्लेषक हो!

तुमसे पाकर प्रेम की शिक्षा,
द्वेष भाव सब विरत किये हैं!
शब्दकोष से शब्द चुने पर,
भाव तुम्हीं से उदित किये हैं!

तुम संकट में बल देती हो!
प्रेम का गंगाजल देती हो!
"देव" तुम्हारा प्रेम न सूखे,
दिवस, रात, हर पल देती हो!

प्रेम भाव के ये क्षण मैंने,
रोम रोम में मुदित किये हैं!
शब्दकोष से शब्द चुने पर,
भाव तुम्हीं से उदित किये हैं!"

....चेतन रामकिशन "देव"….
दिनांक-२०.०२.२०१४

Wednesday, 19 February 2014

♥♥लहरों में घर..♥♥

♥♥♥लहरों में घर..♥♥♥
आग नहीं पानी से डर है!
बीच लहर में मेरा घर है!

ठोकर जिसको मार रहे हो,
क़दमों में वो मेरा सर है!

मिट्टी को सोना कर देता,
वक़्त बड़ा ये सौदागर है!

सात जनम का रिश्ता कर दे,
रंग भले ही चुटकी भर है!

क़र्ज़ नहीं जो चुका सकेंगे,
माँ की ममता ये कर है!

क़त्ल करो या प्यार मुझे दो,
तेरी चौखट, तेरा दर है!

रखा किताबों में जो तूने,
वो मेरे पंखों का पर है!

जान सभी में एक बराबर,
चाहे नारी, या वो नर है!

"देव" मुझे न भुला सकोगे,
मैं हूँ मिट्टी , तू हलधर है!"

....चेतन रामकिशन "देव"….
दिनांक-१९.०२.२०१४

Tuesday, 18 February 2014

♥♥♥मुफ़लिस की दाह..♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥मुफ़लिस की दाह..♥♥♥♥♥♥♥♥♥
टूटे पत्ते, नमी ओस की, और पेड़ की आह न देखी !
अपने सुख में लोग हैं अंधे, झूठ-मूठ की राह न देखी!
मुफ़लिस के घर के तिनकों में, आग भले ही लग जाये पर,
लोग शराबों में डूबे हैं, किसी ने उसकी दाह न देखी!

आखिर ये कैसा अपनापन, आखिर ये कैसा नाता है!
जान किसी की जाती है पर, अपना चेहरा मुस्काता है!

लावारिस की मौत मर गए, किसी ने उनकी राह न देखी!
टूटे पत्ते, नमी ओस की, और पेड़ की आह न देखी!

लोग आज के बड़े मतलबी, औरों पर इल्ज़ाम रखेंगे!
जब तक उनका मतलब होगा, वो लोगों से काम रखेंगे!
आज ज़माने की करतूतें "देव", देखकर दिल रोता है,
लोग किसी लुटती इज्जत का, फूटी कौड़ी दाम रखेंगे!

आज की इस दुनियादारी में, मानवता घायल होती है!
दर्द है इतना सारा मन में, आँख मेरी पल पल रोती है!

नेता, अफसर हुए मतलबी, मुफ़लिस की परवाह न देखी!
टूटे पत्ते, नमी ओस की, और पेड़ की आह न देखी !" 

...................चेतन रामकिशन "देव"……………
दिनांक-१९.०२.२०१४ 

♥♥मन में जब...♥♥

♥♥♥♥♥मन में जब...♥♥♥♥♥
मन में जब विश्वास नहीं हो!
कोई रिश्ता खास नहीं हो!

दर्द लगे तब तक मामूली,
जब तक खुद आभास नहीं हो!

दरिया भी मैला लगता है,
जो अधरों को प्यास नहीं हो!

इंतजार की कहाँ जरुरत,
अगर किसी की आस नहीं हो!

पूजा और इबादत फीकी,
सच का जब तक वास नहीं हो!

आसमान वो क्या नापेंगे,
जिनको उड़ना रास नहीं हो!

मंजिल हमसे दूर रहेगी,
जब तक हिम्मत पास नहीं हो!

कौन भले कौसे किस्मत को,
गर लफ्जों में काश नहीं हो!

"देव" वहीँ तक अपनापन है,
जब तक के उपहास नहीं हो!"

....चेतन रामकिशन "देव"….
दिनांक-१८.०२.२०१४

Monday, 17 February 2014

♥♥कुछ खोने को ♥♥♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥कुछ खोने को ♥♥♥♥♥♥♥♥♥
कुछ खोने को शेष नहीं है, कुछ पाने को रहा नहीं है!
बाकि ऐसा दर्द न कोई, जिसको मैंने सहा नहीं है!
गालों तक ढलके हैं आंसू, दिल रोया है फूट फूट के,
आज तलक मेरी आँखों से, इतना पानी बहा नहीं है!

मगर वक़्त की चाल के आगे, मैं बेबस क्या कर सकता हूँ!
एक दिन जीत मिलेगी मुझको, यही भरोसा कर सकता हूँ!

चुप होकर के गम सहता हूँ, किस्मत से कुछ कहा नहीं है! 
कुछ खोने को शेष नहीं है, कुछ पाने को रहा नहीं है!

आस नहीं तोड़ी है मैंने, लेकिन कौशल झुलस रहा है!
इस जीवन की पगडंडी पर, दुख का बादल बरस रहा है!
"देव" न जाने कब किस्मत से, खुशियों की सौगात मिलेगी,
एक अरसे से मेरा ये दिल, जिन खुशियों को तरस रहा है!

उम्मीदों के तिनके चुनकर, टूटा फूटा घर जोड़ा है!
नहीं पता के मेरी खातिर, वक़्त ने आखिर क्या छोड़ा है!

एक सपना भी नहीं है ऐसा, जो जीवन में ढ़हा नहीं है!
कुछ खोने को शेष नहीं है, कुछ पाने को रहा नहीं है!"

..........चेतन रामकिशन "देव"….........
दिनांक-१७.०२.२०१४

Friday, 14 February 2014

♥♥मेहनत का जज्बा...♥♥

♥♥♥♥मेहनत का जज्बा...♥♥♥♥♥♥
जब से मेहनत का जज्बा पहचाना है!
मिट्टी को भी सोना करना जाना है!

वो दुश्मन होकर भी प्यारा लगता है,
जिसको मैंने दिल से अपना माना है!

तुम दुनिया की भीड़ में गुम न हो जाना,
मेरे दिल में हमदम, तेरा ठिकाना है!

अब मंजिल आँखों से दूर नहीं होती,
मैंने जबसे यकीं जीत का माना है!

तारों को नजदीक से छूकर देखेंगे,
अम्बर को क़दमों के नीचे लाना है!

प्यास लगेगी तो अश्कों को पी लेंगे,
और भूख में अपने गम को खाना है!

लूट मार कर न ख्वाहिश है दौलत की,
केवल जग में अपना नाम कमाना है!

आज है दुख तो कल सुख भी मिल जायेगा,
यही सोचकर सूरत को मुस्काना है!

"देव" घमंडी लोगों को ये समझा दो,
एक दिन सबको मिट्टी में मिल जाना है!"

..........चेतन रामकिशन "देव"….........
दिनांक-१४.०२.२०१४

Wednesday, 12 February 2014

♥♥जिंदगी का सबक...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥जिंदगी का सबक...♥♥♥♥♥♥♥♥
जिंदगी जीने का तुम, मुझको सबक दे जाओ!
मेरी आँखों में सितारों की, चमक दे जाओ!

पर नहीं हैं मेरे पर, उड़ने की ख्वाहिश तो है,
होंसला भरके उड़ानों की, ललक दे जाओ!

लोग पढ़कर जो मोहब्बत पे एतबार करें,
अपने लफ्ज़ों में वो शिद्दत, वो कसक दे जाओ!

नहीं नफरत के हों अल्फ़ाज, जुबां पर मेरी,
मेरे लहजे में मोहब्बत की, चहक दे जाओ!

सादगी में भी मेरा रूप ये खिल जाता है,
तुम जो छूकर मुझे, चांदी की दमक दे जाओ!

भूलकर भी न कभी तोडूं तुम्हारे दिल को,
खून में मेरी वफाओं की, नमक दे जाओ!

"देव" हर रोज रहे, सर पे वो साया बनकर,
प्यार का मुझको यहाँ, ऐसा फलक दे जाओ!"

............चेतन रामकिशन "देव"…..........
दिनांक-१२.०२.२०१४

Tuesday, 11 February 2014

♥♥♥…तेरी एक तस्वीर ♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥…तेरी एक तस्वीर ♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
फूलों के मकरंद से हमदम, तेरी एक तस्वीर बनाऊँ!
हरियाली के हरे रंग से, चूड़ी कंगन तेरे सजाऊँ!
आसमान से चंदा लाकर, जड़ दूँ मैं तेरी बिंदिया में,
और तेरी प्यारी आँखों में, हमदम अपनी झलक दिखाऊँ!

धूप से थोड़ी किरणें लेकर, गाल तुम्हारे लाल करूँगा!
और फूलों के गजरे से मैं, सुन्दर तेरे बाल करूँगा!

मनोहारी तस्वीर बनेगी, जिसको हर पल गले लगाऊँ !
फूलों के मकरंद से हमदम, तेरी एक तस्वीर बनाऊँ...

धीरे धीरे कुछ दिन में, तस्वीर तुम्हारी पूरी होगी!
हर लम्हा तुम पास रहोगी, पल भर की न दूरी होगी!
"देव" मेरा मन जब भी चाहे, छू लूँ मैं तस्वीर तुम्हारी,
न दुनिया का डर होगा न मिलने में मज़बूरी होगी!

धवल श्वेत मोती की माला, गले में तेरे पहना दूंगा!
तेरी आँख से नीर चुराकर, खुशी का तुझको गहना दूंगा!

बात तेरी तस्वीर से करके, तेरे ख्वाबों में खो जाऊँ!
फूलों के मकरंद से हमदम, तेरी एक तस्वीर बनाऊँ!"

.................चेतन रामकिशन "देव"…...............
दिनांक-११.०२.२०१४

Saturday, 8 February 2014

♥♥दिल की निदा…♥♥

♥♥♥♥♥♥दिल की निदा…♥♥♥♥♥♥♥♥
पूजता हूँ मैं पत्थरों को, खुदा मिल जाये!
कोई इंसां मुझे दुनिया से जुदा मिल जाये!

इसी उम्मीद में खोली हैं खिड़कियां मैंने,
जिंदा रहने को मुझे थोड़ी हवा मिल जाये!

प्यार ने बख्शा है मुझको यहाँ पे दर्द बहुत,
दर्द को सोख ले, कोई ऐसी दवा मिल जाये!

तेरी तस्वीर से मैं बात किया करता हूँ,
क्या खबर मुझको, जिंदगी की अदा मिल जाये!

चुप रहा करता हूँ बस इतना सोचता हूँ मैं,
मेरी लफ्ज़ों की वो खोई सी, सदा मिल जाये!

वो मेरी रूह से वाकिफ़ ही, हो गया होगा,
जिसको चुप रहके मेरे दिल की निदा मिल जाये!

"देव" हारा हुआ मुझको समझना उस दिन तुम,
जिंदगी को मेरी जिस रोज, विदा मिल जाये!"

...............चेतन रामकिशन "देव"….........
दिनांक-०८.०२.२०१४

Friday, 7 February 2014

♥♥…तो दिल भर आया ♥♥

♥♥♥♥♥♥…तो दिल भर आया ♥♥♥♥♥♥♥♥
कुछ अधूरे जो रहे ख्वाब, तो दिल भर आया!
दर्द से दिल में हुए घाव, तो दिल भर आया!

उम्र भर मुझको चुभन, काँटो की जो देता रहा,
वो मेरी कब्र में लेकिन, गुलाब भर आया!

ब्याज की तरह इजाफा है, मेरे अश्कों में,
मैंने सोचा था ग़मों का, हिसाब कर आया!

मैंने मांगीं थी यहाँ, जिससे दवा की बूंदें,
जाम में वो मेरी खातिर, शराब भर आया!

रात दिन लानतें देता था जिस सियासी को,
चंद रुपयों को उसी का, चुनाव कर आया!

बाद अरसे के दिखाकर, मुझे सूरत अपनी,
मेरे जीवन में वो गम का, बहाव कर आया!

"देव" हाथों से बनाकर के, बुत खुद ही का मैं,
दर्द की राख से उसमें, रुआब भर आया! "

..........चेतन रामकिशन "देव"….........
दिनांक-०७.०२.२०१४

Thursday, 6 February 2014

♥♥जंग भले ही जीती मैंने...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥जंग भले ही जीती मैंने...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
जंग भले ही जीती मैंने, किसी के दिल को जीत न पाया!
वजह से मेरी लोग रो रहे, लेकिन मुझको तरस न आया!
मैं इंसां की खाल में हूँ पर, शायद मैं इंसान नही हूँ,
इसीलिए तो मुझसे मिलकर, एक चेहरा भी न मुस्काया! 

खुद को जब शीशे में देखा, नजर मिलाना भी मुश्किल था!
मौन अवस्था में पहुंचा दिल, जिसको समझाना मुश्किल था!

वक़्त का पहिया देखो यारो, ख़ुशी का कोई पल न लाया!
जंग भले ही जीती मैंने, किसी के दिल को जीत न पाया...

मजलूमों के खून से रंगकर, हाथ बड़ा ही इतराता था!
मैं लोगों की फूंक झोपड़ी, हौले हौले मुस्काता था!
चीख सुनी न कभी किसी की, आह तलक अनदेखा करके,
कदम के नीचे रौंद के सबको, अपना लोहा मनवाता था!

भले बना मैं यहाँ शहंशाह, लेकिन दिल को सुकूं न आया!
जंग भले ही जीती मैंने, किसी के दिल को जीत न पाया...

इसीलिए मैं पछतावे की, आग में हर लम्हा जलता हूँ!
वक़्त मुझे जैसा भी रखता, वक़्त के रंग में मैं ढलता हूँ!
"देव" नहीं तुम जुल्म ढहाकर, कभी विजेता बन सकते हो,
खाली हाथ यहाँ आया था, खाली हाथ वहाँ चलता हूँ!

सोच के मैं नाखुश होता हूँ, क्यूँ पहले मैं समझ न पाया!
जंग भले ही जीती मैंने, किसी के दिल को जीत न पाया!"

..................चेतन रामकिशन "देव"…..................
दिनांक-०६.०२.२०१४

Wednesday, 5 February 2014

♥♥अश्क़ों की बूंदों पे तेरा...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥अश्क़ों की बूंदों पे तेरा...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
अश्क़ों की बूंदों पे तेरा, नाम लिखा है रोते रोते!
जान भी अब तो नहीं बची है, गँवा दिया सब खोते खोते!
असर तुम्हारा है इस दिल पर और लफ्ज़ों में तुम्ही वसी हो,
दिन में नाम पुकारा तेरा, ख्वाब तुम्हारे सोते सोते!

तुम बिन दिल में बेचैनी है, हँसने का भी मन नहीं होता!
नब्ज थमी है बिना तुम्हारे, जीवित जैसे तन नहीं होता!

फसल खुशी की उगे न दिल में, उम्र बीत गयी बोते बोते!
अश्क़ों की बूंदों पे तेरा, नाम लिखा है रोते रोते....

चेहरा उतरा, आँखे सूजी, बाल भी मेरे बिखर रहे हैं!
ख़त्म हो गई बचत खुशी की, दर्द के सिक्के निखर रहे हैं!
बिना तुम्हारे नूर नहीं है, भाव पक्ष भी जड़वत सा है,
सजे थे कल तक जिस शीशे में, आज उसी को अखर रहे हैं!

नहीं सँवरता बिना तुम्हारे, तन भी अब रूठा रहता है!
मेरी अंगूठी का नग देखो, बिना तेरा टूटा रहता है!

दर्द से झुलसा मुख न निखरे, हुए हैं घंटो धोते धोते!
अश्क़ों की बूंदों पे तेरा, नाम लिखा है रोते रोते....

कभी जरा सा वक़्त मिले तो, मेरी दुनिया में भी आना!
गोद में रखना मेरे सर को, चुपके चुपके मुझे सुलाना!
"देव" भले ही तेरे कद से, मेरी हैसियत बौनी है पर,
जब तुम मेरे पास में आओ, तो मेरे रंग में रंग जाना!

चंद लम्हों का साथ तुम्हारा, जीवन में खुशियां भर देगा!
हाथ तुम्हारा मुझको छूकर, मिट्टी को सोना कर देगा!

प्यार बनेगा अमर हमारा, धीरे धीरे होते होते!
अश्क़ों की बूंदों पे तेरा, नाम लिखा है रोते रोते!"

..................चेतन रामकिशन "देव"…..................
दिनांक-०५.०२.२०१४

Tuesday, 4 February 2014

♥♥जब जी चाहा...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥जब जी चाहा...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
जब जी चाहा दिल तोड़ा है, जब जी चाहा मन कुचला है!
कभी सजाया गुलदस्ते में, कभी हमारा तन कुचला है!
खुद का दामन पाक बताकर, कहते हैं नापाक मुझे वो,
कभी उजाड़ा फुलवारी को, कभी ख़ुशी का वन कुचला है!

नहीं पता इतनी बेदर्दी, कैसे दिल में भर लेते हैं!
लोग यहाँ अपने हाथों से, क़त्ल किसी का कर लेते हैं!
झूठे आंसू खूब बहाकर, दिखलायें झूठा अपनापन,
लोग यहाँ अपने मतलब में, प्यार का सौदा कर लेते हैं!

कोई सुने न चीख किसी की, कानों में शीशा पिघला है!
जब जी चाहा दिल तोड़ा है, जब जी चाहा मन कुचला है!

लोग यहाँ पत्थर बनकर के, दिल का शीशा चटकाते हैं!
अपनी राहें सही करेंगे, पर लोगों की भटकाते हैं!
"देव" न जाने क्यूँ दुनिया की, नजर में है बेजान मेरा दिल,
दुनिया वाले मेरे दिल को, ठोस सड़क पर छिटकाते हैं!

नहीं संभाला मुझे किसी ने, पैर मेरा जब भी फिसला है!
जब जी चाहा दिल तोड़ा है, जब जी चाहा मन कुचला है!"

..................चेतन रामकिशन "देव"…..................
दिनांक-०४.०२.२०१४

Monday, 3 February 2014

♥♥ये मन तो...♥♥

♥♥♥♥ये मन तो...♥♥♥♥
आँच में तपकर काजल जैसा!
कभी सौम्य गंगाजल जैसा!
कभी वो सोचे पृथ्वी तल को,
कभी खड़ा विंध्याचल जैसा!

ये मन तो ऐसा ही होता,
पल में मिट्टी, पल में सोना!
मन चाहता है कभी हँसी तो,
कभी कहे मन खुलकर रोना!

कभी पिता के साये में मन,
कभी है माँ के आँचल जैसा!
कभी वो सोचे पृथ्वी तल को,
कभी खड़ा विंध्याचल जैसा!

जीत है मन से, हार है मन से!
नफरत मन से, प्यार है मन से!
मन से हिम्मत, मन से साहस,
दृढ़ता का आधार है मन से!

कभी सख्त है वो पत्थर सा,
कभी लचीला, ढ़ुलमुल जैसा!
कभी वो सोचे पृथ्वी तल को,
कभी खड़ा विंध्याचल जैसा!

मन चंचल है, मन धावक है, 
लेकिन इसे नियंत्रित करना!
"देव" कभी तुम मन की खातिर,
द्वेष, लोभ न मिश्रित करना!

सजा दिलाकर उड़ भी जाये,
कभी ये सूखे बादल जैसा!
कभी वो सोचे पृथ्वी तल को,
कभी खड़ा विंध्याचल जैसा!"

....चेतन रामकिशन "देव"….
दिनांक-०३.०२.२०१४

Friday, 31 January 2014

♥♥हौले-हौले...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥हौले-हौले...♥♥♥♥♥♥♥♥
रात सुनसान है हौले से जरा बात करें!
चोरी चोरी चलो चुपके से मुलाकात करें!

प्यार से रंग दें जमीं और ये अम्बर हमदम,
प्यार के रंग से रोशन, ये कायनात करें!

अपनी चाहत न जले, आग में जुदाई की,
साथ मिलकर के जुदाई की चलो मात करें!

अपने दिल की ये जमीं, प्यार बिना सूखे नहीं,
रात दिन प्यार की मीठी, चलो बरसात करें!

आँख से आँख मिलें और रहें लब चुप चुप,
होके खामोश भी आपस में सवालात करें!

चाहतें देख के सीखे ये जमाना उल्फत,
प्यार से पैदा चलो अपने वो हालात करें!

"देव" ये प्यार हमें देगा, रूह की खुशियां,
आज काँटों पे भले, प्यार की शुरुआत करें!"

...........चेतन रामकिशन "देव"….........
दिनांक-३१.०१.२०१४

Tuesday, 28 January 2014

♥♥तुम पिता हो मेरे..♥♥

♥♥♥♥♥♥♥तुम पिता हो मेरे..♥♥♥♥♥♥♥♥
तुम पिता हो मेरे, रब जैसी शान धरती पर!
आपके नाम से पहचान मेरी धरती पर!
खून से अपने पसीने से मुझे सींचा है,
तुमसे हर राह है आसान मेरी धरती पर!

कभी गलती पे पिता, तुमने हमें डाँटा है!
प्यार हर हाल में पर, तुमने यहाँ बाँटा है!
तुमने हर पल ही मेरे पथ में फूल बरसाये,
चुन लिया राह से मेरी, जो अगर काँटा है!

तुमसे होठों पे है, मुस्कान मेरी धरती पर!
तुम पिता हो मेरे, रब जैसी शान धरती पर!

माँ तो माँ है के पिता भी, नहीं कम होता है!
देखके बच्चों का दुख, उसको भी गम होता है!
"देव" बच्चों को कोई, न तड़प मिले उसके,
बस यही सोच यही, उसका करम होता है!

तुमसे खुशियों की पिता खान, यहाँ धरती पर!
तुम पिता हो मेरे, रब जैसी शान धरती पर!"

...........चेतन रामकिशन "देव".............
दिनांक-२८.०१.२०१४ 

"
मेरे स्वर्गीय पिता स्व. रामकिशन जी को समर्पित शब्द भाव, धरती पर रब जैसा होता है पिता, पिता को नमन "

♥♥प्यार की निशानी..♥♥

♥♥♥♥♥♥♥प्यार की निशानी..♥♥♥♥♥♥♥♥
मेरी बेचैन निगाहों को तुम सताती हो !
सामने आऊँ तो पलकों को तुम झुकाती हो!

जब नहीं मिलता मैं तुमसे तो बेक़रारी में,
मेरी तस्वीर को सीने से तुम लगाती हो!

प्यार है मुझसे तुम्हें, कहने मैं ये डर कैसा, 
नाम सुनकर के मेरा, तुम क्यूँ चौंक जाती हो!

बात मैं तेरी सहेली से, कभी करता जो,
बड़ी मायूसी में गुस्से से, मुँह बनाती हो!

कहना चाहती हो मगर लफ्ज़ नहीं फूटें तो,
अपनी ख़ामोशी से हर बात कहे जाती हो!

मुझको देने के लिए प्यार की निशानी में,
एक रुमाल पे तुम फूल को सजाती हो!

"देव" तुम दिन में मेरे घर में उजाला लाओ,
रात में चांदनी बनकर के, उतर जाती हो!"

...........चेतन रामकिशन "देव"….......
दिनांक-२८.०१.२०१४

Monday, 27 January 2014

♥♥♥तंज...♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥तंज...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तोड़के दिल मेरा अब लोग हँसा करते हैं!
मेरे अपने ही मुझे तंज कसा करते हैं!

उनकी आँखों में चुभें झोपड़ी गरीबों में,
लोग दौलत का यहाँ इतना नशा करते हैं!

आज उस मुल्क की दीवार पे खूँ के छींटे,
जहाँ पत्थर में भी भगवान वसा करते हैं!

बेटा जन्मा तो लोग जश्न मनाने निकले,
और बेटी के गले फंदा कसा करते हैं!

वक़्त जब आये बुरा, तो नहीं चलती खुद की,
जाल में बाज के जैसे भी फँसा करते हैं!

उसको मिट्टी की शरारत का तजुर्बा होता,
पांव जिसके यहाँ दलदल में धँसा करते हैं!

"देव" मुझको न गिला तुमसे कोई शिक़वा है,
लोग पहले यहाँ अपनों को डसा करते हैं! "

...........चेतन रामकिशन "देव"….......
दिनांक-२७.०१.२०१४

Sunday, 26 January 2014

♥♥दो घड़ी को ही...♥♥

♥♥♥♥♥♥दो घड़ी को ही...♥♥♥♥♥♥♥♥
दो घड़ी को ही सही, वक़्त निकाला होता!  
मेरे गिरते हुए क़दमों को संभाला होता!

तेरे एहसास से ही, मुझको ख़ुशी मिल जाती,
मेरे जज़्बात को गर, तुमने जो पाला होता!

उम्र भर तेरे हुस्न की, मैं कदर करता पर,
कोयले जैसा तेरा दिल, नहीं काला होता!

नाम बेटों से भी ऊँचा वो जहाँ में करती,
तुमने बेटी को अगर शौक से पाला होता!

जिनको एहसास नहीं वो क्या समझते दुख को, 
उनके क़दमों में अगर दिल को भी डाला होता!

कमी औरों से भी ज्यादा तुम्हे लगती खुद की,
अपने दिल को जो कभी तुमने खंगाला होता!

"देव" तुम जानते क्या होती तड़प चाहत की,
तेरे दिल में भी अगर दर्द का छाला होता!"

...........चेतन रामकिशन "देव"….........
दिनांक-२6.०१.२०१४

Friday, 24 January 2014

♥♥बीते हुए लम्हे..♥♥

♥♥♥♥♥♥♥बीते हुए लम्हे♥♥♥♥♥♥♥♥
जब भी बीते हुए लम्हों पे नजर जाती है!
ख्वाब की दुनिया पुरानी सी नजर आती है!

बड़ी मेहनत से उजालों को पनाह दी मैंने,
और हवा पल में चरागों की लौ बुझाती है!

कौन समझेगा यहाँ नाते, वफ़ा, अपनापन,
अब तो दौलत की धुंध रिश्तों पे छा जाती है!

दिन तो कट जाता है रोटी की जुगत में लेकिन,
हाँ मगर रात ये पीड़ा की ग़ज़ल गाती है!

तोड़कर दिल मेरा न उनको कोई दुख पहुंचे,
मेरे होठों से मगर आह निकल जाती है!

कैसे जीते हैं वो मुफ़लिस जरा पूछो उनसे,
जिनके आंगन में दीया और नहीं बाती है!

"देव" मैं अपनी उम्र, जिनकी याद में जीता,
क्या खबर उनको मेरी याद, कभी आती है!"

..........चेतन रामकिशन "देव"…........
दिनांक-२४.०१.२०१४

Tuesday, 21 January 2014

♥♥♥ज़ख्मों की दवा...♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥ज़ख्मों की दवा...♥♥♥♥♥♥♥♥
हम तो तेज़ाब से ज़ख्मों की दवा करते हैं!
तू नही तो तेरी यादों से वफ़ा करते हैं!

रात दिन तूने हमें दर्द, बद्दुआ बख्शी,
हम तेरी वास्ते लेकिन के, दुआ करते हैं!

अपनी तन्हाई में हम तेरे ख्यालों को बुला,
तेरी तस्वीर को हौले से छुआ करते हैं!

जिंदा इंसान की न हमको कदर है लेकिन,
पूजके हम भले पत्थर को खुदा करते हैं! 

किसी इंसान के ज़ज्बात को कुचलकर के,
जिस्म को लोग यहाँ जां से जुदा करते हैं!

न मिली दर्द की फसलों की हमें लागत भी,
लोग हर हाल में अपना ही नफ़ा करते हैं!

"देव" ये लोग शराबों पे रकम फूंके पर,
किसी भूखे को मगर घर से दफ़ा करते हैं!"

...........चेतन रामकिशन "देव"…........
दिनांक-२१.०१.२०१४

Sunday, 19 January 2014

♥♥माँ का आँचल ...♥♥

♥♥♥♥♥माँ का आँचल ...♥♥♥♥♥
अपने हाथों से मेरे केश संवारे माँ ने!
मेरे बिगड़े हुए सब काम सुधारे माँ ने!
माँ के हाथों की छुअन में तो एक जादू है,
मेरे दामन में जड़े देखो सितारे माँ ने!  

माँ के आँचल में मेरी, रात, सहर होती है!
माँ को हर लम्हा मेरी कितनी फिकर होती है!

मेरी खुशियों को किये दुख में गुजारे माँ ने!
अपने हाथों से मेरे केश संवारे माँ ने.....

माँ मुझे प्यार बहुत, मुझको दुआ देती है!
माँ घुटन में भी मुझे देखो हवा देती है!
मेरे दुख दर्द में ममता का सहारा देकर,
मेरे हर मर्ज़ में माँ मुझको दवा देती है!

दर्द के साये मेरे सर से उतारे माँ ने!
अपने हाथों से मेरे केश संवारे माँ ने....

सारी दुनिया में नहीं, माँ सा है किरदार कोई!
नहीं देता है यहाँ, माँ की तरह की प्यार कोई!
"देव" दुनिया में अपनी माँ का दिल दुखाये जो,
उससे बढ़कर नहीं होता है, गुनहगार कोई!

जीतने को मुझे हर दांव हैं हारे माँ ने! 
अपने हाथों से मेरे केश संवारे माँ ने!"

......चेतन रामकिशन "देव"…....
दिनांक-१९.०१.२०१४

(अपनी माँ कमला देवी एवं माँ प्रेमलता जी को समर्पित)

Friday, 17 January 2014

♥♥बरसात का शोर...♥♥

♥♥♥♥♥बरसात का शोर...♥♥♥♥♥♥♥
प्यार तेरा मुझे बूंदो में नजर आता है!
मुझे बरसात का ये शोर बहुत भाता है!

जब भी पलकों में अपनी बूंद छुपाई मैंने,
तेरी जुल्फ़ों का बदन देखो भीग जाता है!

तेरे एहसास में डूबी हुयी बारिश पाकर,
मेरा हर दिन यहाँ अच्छे से गुजर जाता है!

जब झरोखे से गिरी बूंद तुझे छूती हैं,
तेरे चेहरे का कमल और निखर जाता है!

मैं हथेली पे तेरी जब भी रखूं बूंदों को,
गौर से देख मेरा नाम उभर आता है!

भीगी जुल्फ़ों में मेरे घर में जो देखूं तुमको,
चाँद आंगन में मेरे घर के उतर आता है!

"देव" चेहरे पे मेरे ताजगी बिखर जाये,
जब भी बरसात का लफ्ज़ों में जिकर आता है! "

.............चेतन रामकिशन "देव"…...........
दिनांक-१७.०१.२०१४

Thursday, 16 January 2014

♥♥♥दोस्ती...♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥दोस्ती...♥♥♥♥♥♥♥♥♥
दोस्ती प्यार के रंगों की एक निशानी है! 
नही एहसान नहीं कोई बदगुमानी है!

कोई सौदा नहीं होता है दोस्ताने में,
दोस्ती में कोई धोखा न बेईमानी है!

दोस्त सच्चे बड़ी मुश्किल से मिला करते हैं,
दोस्ती दुनिया में कुदरत की मेहरबानी है!

उसको मिल जाये यहाँ धरती पे खुदा देखो, 
दोस्त की जिसने भी दुनिया में कद्र जानी है!

जान कुर्बान तलक दोस्तों पे कर दे जो,
दोस्ती में वही जज्बा है, वो रवानी है!

फूल सरसों के खिलें दोस्तों के चेहरे पर,
दोस्ती पाक है, अम्बर सी आसमानी है!

"देव" किस्मत ने मुझे नेक दोस्त बख्शे हैं,
दोस्ती में ही मुझे जिंदगी बितानी है!"

............चेतन रामकिशन "देव"….........
दिनांक-१७.०१.२०१४

Wednesday, 15 January 2014

♥♥♥दीदार का हक़ ♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥दीदार का हक़ ♥♥♥♥♥♥♥
दर्द मासूम है धीरे से इसे, सहला दो!
मेरे कुछ गीत सुनाकर के इसे बहला दो!

दर्द के चेहरे पे देखो है जमी धूल बहुत,
अपने एहसास की बूंदों से इसे नहला दो!

नफरतों के लिए न कोई खुले दरवाजा,
प्यार तुम चारों तरफ, इतना यहाँ फैला दो!

होने को तो यहाँ देखो हैं बहुत ही अपने,
अपने दीदार का हक़ मुझको मगर पहला दो!

जब जरुरत हो तुम्हें प्यार की हवाओं की,
अपनी दिल को मेरी बस्ती में जरा टहला दो!

ये तेरे ख्वाब मुझे रात भर हँसायेंगे,
अपना आँचल मेरी आँखों पे अगर फैला दो!

"देव" आ जायेगा पल भर में सामने तेरे,
तुम हवाओं से भी मिलने की खबर कहला दो! "

...........चेतन रामकिशन "देव"…...........
दिनांक-१५.०१.२०१४

Tuesday, 14 January 2014

♥♥...बड़ी चुप चुप ♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥...बड़ी चुप चुप ♥♥♥♥♥♥♥♥♥
दिन भी खामोश था, अब रात बड़ी चुप चुप है!
आईने से भी मुलाकात बड़ी चुप चुप है!

मेरे कानों में जो घुंघरू की तरह बजती थी,
आज वो देखिये बरसात बड़ी चुप चुप है!

आदमी माने नहीं लाख भी समझाने पर,
तब से इंसानियत की जात बड़ी चुप चुप है!

जीत जाता तो मेरा जश्न मनाती दुनिया,
हो गया तनहा मैं ये, मात बड़ी चुप चुप है!

बिन दहेजों के थमी रहती यहाँ पर डोली,
घर में मुफ़लिस के, ये बारात बड़ी चुप चुप है!

नहीं मालूम हमें लेने कब चली आये,
मौत के देखो ये, सौगात बड़ी चुप चुप है!

"देव" आँखों में मेरी देख के समझ जाना,
प्यार की राह में हर बात बड़ी चुप चुप है!"

...........चेतन रामकिशन "देव"…........
दिनांक-१४.०१.२०१४

Monday, 13 January 2014

♥♥दर्द की राह...♥♥

♥♥♥♥♥दर्द की राह...♥♥♥♥♥
दर्द की राह पे जब भी सहे छाले मैंने!
अपने आंसू बड़ी हिम्मत से संभाले मैंने!

नहीं लिख सकता ग़ज़ल, गीत न कहानी मैं,
सिर्फ स्याही से किये शब्द ये काले मैंने! 

उसने ही मेरी चाहतों को बेअसर बोला,
रूह तक जिसको यहाँ की थी हवाले मैंने,

सामने देखो नयी कोंपलें निकल आयीं,
तेरे एहसास जो ये ओस में डाले मैंने!
  
भर गया खुशबु से आंगन का हर कोई कोना,
फूल जो सूखे, किताबों से निकाले मैंने!

मेरी तन्हाई में ये मुझसे बात कर लेंगे,
इसीलिए रहने दिये घर में ये जाले मैंने!

"देव" दुश्मन ने कमी कोई भी नहीं की पर,
अपनी हिम्मत से यहाँ खतरे ये टाले मैंने!"

......चेतन रामकिशन "देव"…....
दिनांक-१३.०१.२०१४

Sunday, 12 January 2014

♥♥तुम पराये हो...♥♥

♥♥♥♥♥तुम पराये हो...♥♥♥♥♥
हाँ सही है के तुम पराये हो!
पर मेरे दिल में तुम समाये हो!

अब तो उस ख़त को मुझको दे भी दो,
जिसको अरसे से तुम छुपाये हो!

है वहम मेरा या हक़ीक़त है,
क्या मुझे दिल में तुम वसाये हो!

दूर करके मैं तुम्हें जी न सकूँ,
मेरे इतने करीब आये हो!

देखकर चाँद तुमको लगता ये,
जैसे अम्बर में मुंह छुपाये हो!

घर का दरवाजा बंद करके तुम,
मेरी ग़ज़लों को गुनगुनाये हो!

"देव" अनपढ़ मैं कुछ नहीं जानूं,
प्यार तुम ही मुझे सिखाये हो! "

......चेतन रामकिशन "देव"…....
दिनांक-१२.०१.२०१४