Thursday, 19 February 2015

♥♥वृतचित्र ...♥♥


♥♥♥♥वृतचित्र ...♥♥♥♥♥♥
वृतचित्र वो है जीवन का। 
प्रिय मित्र वो है जीवन का। 
मेरा हर क्षण करे सुगन्धित,
लगे इत्र वो है जीवन का। 

उसके बिन जीवन भारी है। 
दुश्वारी है, लाचारी है। 
उसे देखकर मन खुश होता,
छवि बहुत उसकी प्यारी है। 

वो आये मेरे ख्वाबों में,
लगे चित्र वो है जीवन का।  
मेरा हर क्षण करे सुगन्धित,
लगे इत्र वो है जीवन का... 

उसके साथ मेरा दिन उजला,
उससे रात धवल होती है। 
उसे देखकर ज्योति मिलती,
मानो वो कोई मोती है। 
"देव" जहाँ में उससे बढ़कर,
मेरे दिल को कोई नहीं है,
उसके बिन दिल में पीड़ा हो,
आँख मेरी हर पल रोती है। 

धूप में उसका साया सुख दे,
लगे छत्र वो है जीवन का। 
मेरा हर क्षण करे सुगन्धित,
लगे इत्र वो है जीवन का। "

......चेतन रामकिशन "देव".........
दिनांक-१९.०२.२०१५

Wednesday, 18 February 2015

♥♥उमस...♥♥


♥♥♥♥♥उमस...♥♥♥♥♥♥
मैं आँखों से बरस रहा हूँ। 
लेकिन जल को तरस रहा हूँ। 
बाहर से मैं खुश दिखता हूँ,
पर भीतर से झुलस रहा हूँ। 

अंतर्मन पे चोट लगी है,
पर उसका उपचार नहीं है। 
वही उठायें सबपे ऊँगली,
खुद जिनका आधार नहीं है।  
लोगों का दिल ज़ख़्मी करके,
देख रहेंगे हैं खूब तमाशा,
वो क्या जानें मानवता को,
जिनके दिल में प्यार नहीं है। 

दम घुटता, हवा नहीं है,
मन ही मन में, उमस रहा हूँ। 
बाहर से मैं खुश दिखता हूँ,
पर भीतर से झुलस रहा हूँ। 

पीठ में खंजर घोंपा जाये,
चीख किसी की कब सुनते हैं। 
लोग अजब हैं इस दुनिया के,
बस अपना मतलब चुनते हैं। 
"देव" किसी की आह को सुनकर,
अनदेखा करने की कोशिश,
किसी के घर को सौंप तबाही,
नफरत के जाले बुनते हैं। 

प्यार वफ़ा के ढाई अक्षर,
मैं सुनने को तरस रहा हूँ। 
बाहर से मैं खुश दिखता हूँ,
पर भीतर से झुलस रहा हूँ। "

........चेतन रामकिशन "देव"..........
दिनांक-१८.०२.२०१५


Monday, 16 February 2015

♥♥दर्द की परछाईं...♥♥


♥♥♥♥♥दर्द की परछाईं...♥♥♥♥♥♥♥
ख्वाब फिर अंगड़ाई लेकर आ रहे हैं। 
दर्द की परछाईं लेकर आ रहे हैं। 

दर्द की कैसे दवा मुझको मिलेगी,
इस कदर महंगाई लेकर आ रहे हैं। 

भीड़ में भी हर घड़ी तनहा करे,
हर लम्हा तन्हाई लेकर आ रहें हैं। 

मुझको ठोकर मार जो आगे बढे,
मेरी खातिर खाई लेकर आ रहे हैं। 

लूटकर पैसा जो घर में भर रहे,
दान को एक पाई लेकर आ रहे हैं। 

क़त्ल करके उनको न कोई सजा,
पर मेरी रुसवाई लेकर आ रहे हैं। 

"देव" जिसने उम्र भर आंसू दिये,
आज वो शहनाई लेकर आ रहे हैं। "

........चेतन रामकिशन "देव"..........
दिनांक-१६.०२.२०१५

Sunday, 15 February 2015

♥♥छाँव के पेड़...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥छाँव के पेड़...♥♥♥♥♥♥♥♥♥
हम मजहबी खेमों में, जो बंटते चले गये। 
वो पेड़ जो थे छाँव के, कटते चले गये। 

झुलसा रही है धूप गम की, जिंदगी नाखुश,
बादल जो प्यार के थे, वो छंटते चले गये। 

धरती की प्यास कैसे बुझे, कौनसी अकल,
तालाब, जो पोखर, यहाँ पटते चले गये। 

मेरा बयां, मेरी तड़प, ख़ाक वो सुनते,
जुमले जो झूठ के यहाँ, रटते चले गये। 

जिससे हुआ था इश्क़, उसको कद्र ही नहीं,
पागल थे हम उस राह जो, डटते चले गये। 

चिथड़े भी देख उनको तरस, न कोई परवाह,
ज्वालामुखी के जैसे हम, फटते चले गये। 

दिल टूटने के बाद, मुझमे आया फ़र्क़ ये,
हम "देव" अपने आप से, कटते चले गये। " 

............चेतन रामकिशन "देव"..............
दिनांक-१६.०२.२०१५

Saturday, 14 February 2015

♥♥...आह ♥♥


♥♥♥♥♥...आह ♥♥♥♥♥
दिल में दर्द बहुत होता है। 
जब कोई निर्धन रोता है। 
उसकी रात कटे रो रोकर,
भूखा प्यासा दिन होता है। 

क्यों निर्धन के हक़ पे डाला,
रोज यूँ ही डाला जाता है। 
क्यों निर्धन की तारीखों को,
बस कल पे टाला जाता है। 
क्यों निर्धन को ठगने वाले,
गैर वतन को काला धन दें,
जो लूटा करते निर्धन को,
क्यों उनका पाला जाता है। 

निर्धन कृषक अन्न उगाये,
तब ये सारा जग सोता है। 
उसकी रात कटे रो रोकर,
भूखा प्यासा दिन होता है... 

नये शहर की नयी योजना,
रोज यहाँ विकसित होती है। 
पर निर्धन की ओर किसी की,
सोच नहीं दृष्टित होती है। 
"देव" अगर निर्धन को यूँ ही,
रखा हाशिये पे जायेगा। 
तो ये निर्धन भूखा, प्यासा,
ऐसे ही मारा जायेगा। 

मजदूरी भी इतनी कम है,
नहीं गुजारा तक होता है।  
उसकी रात कटे रो रोकर,
भूखा प्यासा दिन होता है। "

.......चेतन रामकिशन "देव"……  
दिनांक-१५.०२.२०१५

♥♥प्रेम ग्रन्थ...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्रेम ग्रन्थ...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
प्रेम ग्रन्थ मैं लिख नहीं सकती, जो तुम उसके पात्र नहीं हो। 
सात जन्म का रिश्ता तुमसे, इसी जन्म के मात्र नहीं हो। 
तुमने मुझको प्रेम सिखाया, प्रेम के सागर के तुम स्वामी,
तुममें क्षमता मन पढ़ने की, तुम प्रथम के छात्र नहीं हो। 

प्रेमग्रंथ का हर एक पन्ना और समूचा सार तुम्ही हो। 
कलम मेरा तुमसे प्रेरित हो, लेखन का आधार तुम्ही हो। 

तुम कर्मठ हो, ज्योतिर्मय हो, तिरस्कार के पात्र नहीं हो। 
तुममें क्षमता मन पढ़ने की, तुम प्रथम के छात्र नहीं हो... 

प्रेम ग्रन्थ की हर पंक्ति में, महक तेरे एहसास की होगी। 
होगी सोंधी खुशबु थल की, और चमक आकाश की होगी। 
"देव" तुम्हारे अपनेपन के, भावों का विस्तार लिखूंगी,
मिलन के छायाचित्र में रंगत, परिणय की उल्लास की होगी। 

 बिना तुम्हारे संपादन के, न ही शोधन हो पायेगा। 
 बिना नाम का ग्रन्थ रहेगा, न उद्बोधन हो पायेगा। 

प्रेम ग्रन्थ के तुम प्रवर्तक, तुम कोई पाठक मात्र नहीं हो। 
प्रेम ग्रन्थ मैं लिख नहीं सकती, जो तुम उसके पात्र नहीं हो। "

......................चेतन रामकिशन "देव"…....................
दिनांक-१४.०२.२०१५

Friday, 13 February 2015

♥♥ये कैसा अमरप्रेम...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥ये कैसा अमरप्रेम...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
प्रेम को ईश्वर की संज्ञा दे, पीड़ा क्यों प्रदान कर रहे। 
एक क्षण में ही तोड़ के नाता, जीवन से प्रस्थान कर रहे। 
कहाँ गयीं वो सब सौगन्धें, जिनका बहुत मान करते थे,
क्यों मेरे जीवित होते भी, तुम मुझको अवसान कर रहे। 

क्या कलयुग में प्रेम भावना, क्षण में जर्जर हो जाती है। 
यदि अमर है प्रेम जोत तो, कैसे नश्वर हो जाती है। 

क्यों फिर सबसे रहो प्रेम के, नारे का आहवान कर रहे।  
प्रेम को ईश्वर की संज्ञा दे, पीड़ा क्यों प्रदान कर रहे... 

प्रेम दिवस पर पुष्प भेंट कर, केवल प्यार नहीं होता है। 
बिना समर्पण प्रेम भाव का, बेड़ा पार नहीं होता है। 
करो वर्ष भर तुम उत्पीड़न और एक दिन दिखलाओ उपवन,
अभिमान इस प्रेम भाव का, सुखमय सार नहीं होता है। 

प्रेम जहाँ होता है वो जन, अत्याचार नही करते हैं। 
नहीं बेचते वो भावों को, वो व्यापार नहीं करते हैं। 

तुम मिथ्या के रौब गांठकर, क्यों मेरा अपमान कर रहे। 
प्रेम को ईश्वर की संज्ञा दे, पीड़ा क्यों प्रदान कर रहे... 

तुम क्या जानो कष्ट हमारा, तुमने मेरा भाव न जाना 
तुम बस खुद के लिये जिये हो, तुमने मेरा घाव न जाना। 
"देव" न लेना नाम प्यार का, प्यार का जब सत्कार नहीं तो,
तुम निर्दयी हो तुमने मेरे, अश्रु का सैलाब न जाना। 

कोमल मन को छलनी करके, अहंकार जो दिखलाते हैं। 
वे क्या जानें सौगंधों को, जो भावों को झुठलाते हैं। 

तुम व्यापारी अपने हित में, बस मेरा नुकसान कर रहे। 
प्रेम को ईश्वर की संज्ञा दे, पीड़ा क्यों प्रदान कर रहे। "


....................चेतन रामकिशन "देव"…................
दिनांक-१४.०२.२०१५ 

Thursday, 12 February 2015

♥♥दस्तक...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥दस्तक...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
दरवाजे पे प्यार की दस्तक, आँगन में खुश्बू लाती है। 
तुम्हे देखकर मन खुश होता, छवि तेरी मुझको भाती है। 
तेरी मीठी बोली सुनकर, अधरों पे घुल जाये शहद सा,
तू हंसती है तो लगता है, सारी दुनिया मुस्काती है। 

सूरत तेरी चंदा जैसी, खिली धुप सा मन तन लगता है। 
तेरे होने से ही थल पे, फूलों का उपवन खिलता है। 

तुम जगतीं मेरे ख्वाबों में, जब ये दुनिया सो जाती है। 
दरवाजे पे प्यार की दस्तक, आँगन में खुश्बू लाती है...

तुम चंदन सी पावन चिंतक, मेरी कविता बन जाती हो। 
यदि शरारत करता हूँ तो, लाज हया से सकुचाती हो। 
"देव" तुम्हारा संग संग चलना, मेरा रस्ता आसां करता,
मुझसे कोई गलती हो तो, भोलेपन से समझाती हो। 

नाम तुम्हारा सुनता हूँ तो, मेरा चेहरा खिल जाता है। 
सखी तुम्हारे रूप में मुझको, स्वर्ग धरा पे मिल जाता है। 

नहीं तनिक भी अच्छा लगता, दूर जो मुझसे तू जाती है।  
दरवाजे पे प्यार की दस्तक, आँगन में खुश्बू लाती है। "


......................चेतन रामकिशन "देव"….................
दिनांक-१२.०२.२०१४

Wednesday, 11 February 2015

♥♥वनवास...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥वनवास...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
नैन मेरे व्याकुल हैं तुम बिन, और मन में वनवास हुआ है। 
गगन से चंदा लुप्त हो गया, तिमिर भरा आकाश हुआ है। 
मेरी वेदना और दशा को, समझ के पग ले आओ वापस,
भूख प्यास सब भूल गया हूँ, विरह में उपवास हुआ है। 

प्रेम सरल है किन्तु तुमने, क्रोध से इसको कठिन बनाया। 
नहीं सुना मेरे पक्षों को, न ही अपना पक्ष सुनाया। 

हठधर्मी हम हुये थे दोनों, अब जाकर आभास हुआ है। 
नैन मेरे व्याकुल हैं तुम बिन, और मन में वनवास हुआ है... 

बिना तुम्हारे शिला के जैसा, न ही जीवन गतिमान है। 
तुम बिन कितनी वीरानी है, क्या ये तुमको अनुमान है। 
परित्याग करते हैं जैसे, वैसे मुझको छोड़ गयी हो,
तुम बिन जाने कैसा जग है, न ही भू, न आसमान है। 

इतना क्रोध नहीं हितकारी, स्वास्थ्य तुम्हारा गिर जायेगा। 
समय गया तो चला ही जाये, नहीं लौटकर फिर आयेगा। 

जरा बता दो क्या मेरे बिन, रहने का अभ्यास हुआ है। 
नैन मेरे व्याकुल हैं तुम बिन, और मन में वनवास हुआ है...

देखो घर का द्वार न बोले, कोई भी दीवार न बोले। 
अपना क़स्बा भी चुप चुप है, तुम बिन ये संसार न बोले। 
"देव" नहीं कुछ मन को भाये, घुटा घुटा सा दम रहता है,
सूख गया तुलसी का पौधा, पेड़ों का सिंगार न बोले। 

प्राण गये क्या तब आओगी, फिर आकर के क्या पाओगी। 
मुझे पता है, मुझे इस तरह, देख के तुम भी मर जाओगी। 

नहीं बची भावों की क्षमता, अंतिम ये प्रयास हुआ है। 
नैन मेरे व्याकुल हैं तुम बिन, और मन में वनवास हुआ है।"


.....................चेतन रामकिशन "देव"….................
दिनांक-११.०२.२०१५ 

Tuesday, 10 February 2015

♥♥जिंदगी...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥जिंदगी...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
कुछ दुआओं के सहारे, चल रही है जिंदगी। 
दर्द के सागर किनारे, चल रही है जिंदगी। 

वो नहीं आयेगा इसका, मेरे दिल को भी पता है,
क्यों उसे फिर भी पुकारे, चल रही है जिंदगी। 

खत हुये हैं राख लेकिन, याद शायद मिट न पायी,
त्यों ही लफ़्ज़ों को उभारे, चल रही है जिंदगी।  

टूटती बैसाखियां दें, दूर सब अपने हुये पर,
साथ क्यों फिर भी हमारे, चल रही है जिंदगी। 

फासलों की खाई चौड़ी, नाम के रिश्ते बचे हैं, 
झूठ के संग में गुजारे, चल रही है जिंदगी। 

आंसुओं का ब्याज देकर, क़र्ज़ गम का चुक रहा है,
बोझ को सर से उतारे, चल रही है जिंदगी। 

देखकर बर्बादियों को मेरी, वो खुश हो रहे हैं,
"देव" लेकर के अंगारे, जल रही है जिंदगी। "

.................चेतन रामकिशन "देव"…..............
दिनांक-११ .१०.२०१४


Monday, 9 February 2015

♥♥पक्षपात...♥♥


♥♥♥♥♥पक्षपात...♥♥♥♥♥♥
पक्षपात, आघात हमे क्यूँ। 
विरह में व्याकुल रात हमे क्यूँ। 
अपनी विजय श्री लिखने को,
आखिर बोलो मात हमे क्यूँ। 

हम भी मानव हैं तुम जैसे,
फिर क्यों खुद को श्रेष्ठ समझना। 
कुदरत ने जब फ़र्क़ किया न,
तो क्यों खुद को ज्येष्ठ समझना। 
जीवन में इस प्रेम के पथ पर,
मैं से जो हम हो जाते हैं। 
उनमें अंतर नहीं रहे फिर,
वे मानव सम हो जाते हैं। 

स्वर्ण पत्र सबको देते हो,
बोलो सूखे पात हमे क्यों। 
अपनी विजय श्री लिखने को,
आखिर बोलो मात हमे क्यूँ...

गठबंधन या नातेदारी,
चाहें फूलों की फुलवारी। 
बिना समर्पण के नहीं होती,
रिश्तों की दुनिया उजियारी। 
"देव" जहाँ में समरसता से,
जो रिश्तों को अपनाते हैं। 
वही लोग एक एक में जुड़कर,
देखो ग्यारह बन जाते हैं। 

सबसे हंसकर बोल रहे पर,
नाम की ऐसे बात हमे क्यूँ। 
अपनी विजय श्री लिखने को,
आखिर बोलो मात हमे क्यूँ। "

......चेतन रामकिशन "देव"…...
दिनांक- ०९.०२.२०१५ 

Sunday, 8 February 2015

♥♥दंड...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥दंड...♥♥♥♥♥♥♥♥♥
विष पीने को बाध्य कर दिया। 
पूरा अपना साध्य कर दिया। 
मुझे दंड से नतमस्तक कर,
वो समझे आराध्य कर दिया। 

मुझे नहीं आता दुख देकर,
अपनापन रेखांकित करना। 
मन की कोमल वसुंधरा पर,
कंटक दुख के टंकित करना। 
उनको है अभ्यास तभी तो,
दुख का वितरण कर देते हैं,
मृत्य तट तक सूख सके न,
इतने अश्रु भर देते हैं। 

नहीं औषधि पारंगत है,
रोग बड़ा आसाध्य कर दिया। 
मुझे दंड से नतमस्तक कर,
वो समझे आराध्य कर दिया...

अश्रु धार बहे नयनों से, 
दुरित प्रकरण घटित हुआ है। 
शब्द मौन हैं, कुछ न बोलें,
मन विचलित और व्यथित हुआ है। 
"देव" जगत की नयी नीतियां,
मुझको समझ नहीं आती हैं,
आज यहाँ सम्बन्ध हर कोई,
नाम मात्र में निहित हुआ है। 

मेरे मन का चीर हरण कर,
घायल मेरा काव्य कर दिया। 
मुझे दंड से नतमस्तक कर,
वो समझे आराध्य कर दिया।"

......चेतन रामकिशन "देव"…..
दिनांक--०८.०२ .१५



Monday, 2 February 2015

♥♥तरक्की...♥♥


♥♥♥♥♥♥तरक्की...♥♥♥♥♥♥♥
वो जो धरती में सोना भर रहा है। 
सफर दुश्वारियों का कर रहा है। 

करोड़ों पेट हर दिन भरने वाला,
उधारी की वजह से मर रहा है। 

परोसा जा रहा नीला नशा और,
कहें भारत तरक्की कर रहा है।

नहीं है नौकरी तो नौजवां भी, 
तड़पती जिंदगी से डर रहा है। 

जिधर देखो गरीबी का अँधेरा,
कहाँ सूरज उजाला कर रहा है। 

सियासत में नहीं मुद्दे भले के,
हर एक नेता ही टुकड़े कर रहा है। 

कहें क्या "देव", है कानून अँधा,
सज़ा बिन जुर्म के ही, कर रहा है। "

......चेतन रामकिशन "देव"…...
दिनांक--०३.०२ .१५

Sunday, 1 February 2015

♥♥सिसकते लफ्ज़...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥सिसकते लफ्ज़...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
सिसकते लफ्ज़ हैं, इनको जरा आराम करने दूँ। 
ख़ुशी झूठी सही पर आज, इनके नाम करने दूँ। 

इन्हें भी हक़ है हंसने का, मैं इनकी खोलकर बेड़ी,
उभरकर खिलखिलाने का, जरा सा काम करने दूँ। 

पसीना इनके माथे पर, छलक आया था मेरे संग,
भरे जो अश्क़ हैं इनमें, उन्हें नीलाम करने दूँ। 

गगन में दूर तक उड़ना, है इनके दिल की ख्वाहिश में,
उजाला धूप से लेकर, मचलती शाम करने दूँ। 

न सोचा "देव" इनका हक़, नहीं जानी कोई हसरत,
इन्हें भी प्यार में खुद को, जरा गुलफाम करने दूँ।  "

................चेतन रामकिशन "देव"….............
दिनांक--२८.०१.१५

♥♥दोषारोपण...♥♥


♥♥♥♥♥दोषारोपण...♥♥♥♥♥♥
दोषारोपण भला किसलिये। 
ये आरोपण भला किसलिये। 
प्रेम किया, अपराध नहीं फिर,
मेरा शोषण भला किसलिये। 

क्यों पीड़ा का अम्ल डालकर,
मेरा मन घायल करते हो। 
क्यों मेरे कोमल भावों के,
साथ में ऐसा छल करते हो। 
मैं भी मानव हूँ तुम जैसा,
शिलाखंड, पाषाण नहीं हूँ,
क्यों मेरे नयनों में निशदिन,
अश्रु का ये जल भरते हो। 

सच्चाई के साथ रहो तुम,
मिथ्या पोषण भला किसलिये। 
प्रेम किया, अपराध नहीं फिर,
मेरा शोषण भला किसलिये... 

जीवन भर की सौगंधे थीं,
तुम क्षण भर में बदल गये हो। 
मुझको एकाकीपन देकर,
दूर बहुत तुम निकल गये हो। 
"देव" कहाँ है वो अपनापन,
बात बात पे जो कहते थे,
आज परायापन दिखलाकर,
मेरे मन को कुचल गये हो। 

तीर चुभाकर मेरे रक्त का,
ये अवशोषण भला किसलिये। 
प्रेम किया, अपराध नहीं फिर,
मेरा शोषण भला किसलिये। "

......चेतन रामकिशन "देव"…..
दिनांक--०१.०२ .१५

Saturday, 31 January 2015

♥♥पत्रक...♥♥


♥♥♥♥♥♥पत्रक...♥♥♥♥♥♥♥
रिश्तों का संसार लिखा था। 
भावों का विस्तार लिखा था। 
जला दिया उसने वो पत्रक,
जिसपर मैंने प्यार लिखा था। 

जिसकी खातिर अपनापन हो,
वही ग़मों से भर देता है। 
शीशे जैसे नाजुक दिल को,
टुकड़े टुकड़े कर देता है। 

लूटा उसने बेरहमी से,
वो जिसको हक़दार लिखा था। 
जला दिया उसने वो पत्रक,
जिसपर मैंने प्यार लिखा था...

मन के उपवन की भूमि पर,
खून की बारिश कर देते हैं। 
अपने मंसूबों की धुन में,
किसी को तन्हा कर देते हैं। 

पतझड़ उसने दिया है मुझको,
वो जिसको सिंगार लिखा था। 
जला दिया उसने वो पत्रक,
जिसपर मैंने प्यार लिखा था...

अपने होते नहीं नाम के,
दुख का बोध किया करते हैं। 
नहीं दंड दें बिना जुर्म के,
न अवरोध किया करते हैं। 

"देव" कर रहा वो अपमानित,
वो जिसको सत्कार लिखा था। 
जला दिया उसने वो पत्रक,
जिसपर मैंने प्यार लिखा था। "

.......चेतन रामकिशन "देव"……।
दिनांक--३१.०१.१५

Thursday, 29 January 2015

♥♥माँ(एक अनुपम छवि )♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥माँ(एक अनुपम छवि )♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥

दुआ माँ की यहाँ, हर एक सफर आसान करती है। 
हवाले हमको माँ खुशियों की, देखो खान करती है। 
वो अपने दूध से सींचे, नये अंकुर से बच्चे को,
हजारो ग़म सहे फिर भी, ख़ुशी का दान करती है। 

छवि माँ की अनुपम है, हसीं किरदार माँ का है। 
समूचे विश्व से ऊपर, धरा पे प्यार माँ का है। 

बड़ा ही मखमली दिल है, नहीं अभिमान करती है। 
दुआ माँ की यहाँ, हर एक सफर आसान करती है...

है ममता की नदी कोई, धरा पे ईश जैसी माँ। 
हंसी देती, ख़ुशी देती, दुआ, आशीष जैसी माँ। 
उजाला दीप की तरह, भरे बच्चों के जीवन में,
बड़ी सुन्दर, मनोहारी, सुमन के शीश जैसी माँ। 

है चंदा की धवल बारिश, मधुर प्रभात जैसी है। 
सुलाये लोरियां गाकर, सुकूं की रात जैसी है। 

बड़ी होकर भी माँ बच्चों का, हर पल मान करती है। 
दुआ माँ की यहाँ, हर एक सफर आसान करती है...

बड़ा ही त्याग करती है, हर एक इच्छा को मारेगी। 
मगर संतान का अपनी, सदा जीवन संवारेगी। 
नहीं है "देव" दुनिया में, कोई समकक्ष भी माँ के,
है वो एक माँ जो बच्चों के लिये, जीवन गुजारेगी। 

मधुर है माँ शहद जैसी, वो रेशम सी मुलायम है। 
दिखे मामूली पर दुनिया, उसी के दम पे कायम है। 
  
गलत क़दमों पे वो झिड़के, सही का ज्ञान करती है। 
दुआ माँ की यहाँ, हर एक सफर आसान करती है। "

"
माँ-एक ऐसी अनुपम छवि, जिसके व्यक्तित्व एवं कृतत्वों के समकक्ष कोई दूसरा नहीं ठहरता, माँ है तो दुनिया पे जीवन है, माँ है तो आँगन में लोरियों की गूंज और स्नेह की छुअन है, तो आइये माँ को नमन करें। "

" माँ शब्द एवं रूप का सम्मान करते हुये, मेरी ये रचना मेरी जन्मदायित्री माँ कमला देवी जी एवं मानस माँ प्रेमलता जी को समर्पित। "

" सर्वाधिकार सुरक्षित, मेरी ये रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित। "

चेतन रामकिशन "देव" 
दिनांक-३०.०१.२०१५ 

♥♥कायनात...♥♥


♥♥♥♥♥कायनात...♥♥♥♥♥
चाँद, तारों से बात हो जाती। 
मेरी रंगीन रात हो जाती। 

तू जो मिलती तो मेरे आंचल में,
सारी ये कायनात हो जाती। 

डाल बन जाता मैं तुम्हारे लिये,
और तू मेरी पात हो जाती। 

टूट जातीं मजहब की जंजीरें,
अपनी इंसानी जात हो जाती। 

"देव" फूलों से मुस्कुराते हम,
दर्द की देखो मात हो जाती। "

.......चेतन रामकिशन "देव"…..
दिनांक-- २९ .०१.१५

Tuesday, 27 January 2015

♥♥मज़बूरी...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥मज़बूरी...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
उसे किरदार फिर कोई निभाना पड़ रहा होगा। 
बहुत मज़बूरी में मुझको भुलाना पड़ रहा होगा। 

वो मुफ़लिस बाप की बेटी, कहाँ से लायेगी गाड़ी,
सहमकर आप ही खुद को, जलाना पड़ रहा होगा। 

यहाँ न प्यार की कीमत, नहीं के मेल हो दिल का ,
फ़क़त वो नाम का रिश्ता, जताना पड़ रहा होगा। 

हसीं इस चाँद को गहरी, अमावस कर रही काला,
वो माँ को भूखा ही बच्चा, सुलाना पड़ रहा होगा। 

हुये हैं चीथड़े दिल के, जफ़ा की चोट खाकर के,
जनाजा आप ही खुद को, उठाना पड़ रहा होगा। 

उम्र भर भूख पैसों की, बनाये हैं महल ऊँचे,
जो आई मौत तो खाली ही, जाना पड़ रहा होगा। 

सुनो तुम "देव" मेरी माँ, न पढ़ले दर्द चेहरे का,
मुझे हंसकर तभी हर गम, छुपाना पड़ रहा होगा।" 

................चेतन रामकिशन "देव"…...........
दिनांक--२८.०१.१५


♥♥♥आँचल...♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥आँचल...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
जो मेरे हाथ से आँचल, तेरा फिसला नही होता। 
सफ़र ये जिंदगी का फिर, कभी धुंधला नहीं होता। 

जलाये हैं बहुत दीपक, मशालें भी जलाईं पर,
ये तन्हा याद का रस्ता, कभी उजला नही होता। 

हवायें प्यार से भीगीं, तपन कम कर रहीं होतीं,
तेरी दहलीज से आगे, मैं जो निकला नहीं होता। 

हँसी होती, ख़ुशी होती, झलकता नूर चेहरे पर,
अगर तेज़ाब सीने में, मेरे उबला नहीं होता। 

नदी के छोर पर बैठे, सुनाते प्यार की बातें,
अहम में रुख जो मैंने, अगर बदला नहीं होता। 

सहारा हर घड़ी मिलता, डगर आसान हो जाती,
जो लावा झूठ का दिल में, मेरे पिघला नही होता। 

मैं तुझसे "देव" माफ़ी भी, यहाँ पर मांग लेता पर, 
मेरे हाथों से तेरा दिल, अगर उछला नहीं होता। "

.................चेतन रामकिशन "देव"….............
दिनांक--२७.०१.१५





Monday, 26 January 2015

♥♥चरागों की लौ...♥♥


♥♥♥♥♥♥चरागों की लौ...♥♥♥♥♥♥♥♥
चरागों की लौ का, उजाला है तुमसे। 
मोहब्बत का हर ख्वाब, पाला है तुमसे। 
तुम्हे देखकर ही, खिले चांदनी ये,
नहीं चाँद देखो, निराला है तुमसे। 

हो तुम जो मेरे साथ, तो न अँधेरा,
तुम्हारी मोहब्बत में, कुछ ग़म नहीं है। 
तुम्हारे ही अहसास से, मिलती ताक़त,
हराये जो मुश्किल में, वो दम नहीं हो। 

तुम्हारे ही छूने से, कलियाँ उमड़तीं,
ये सुन्दर से फूलों की, माला है तुमसे 
तुम्हे देखकर ही, खिले चांदनी ये,
नहीं चाँद देखो, निराला है तुमसे.... 

सफर ये तेरे बिन, नहीं है गुजरता।
दुआ मेरी खातिर, नहीं कोई करता। 
तुम्ही "देव" देखो, वसे जिंदगी में,
यहाँ प्यार तुमसा, नहीं कोई करता। 

तुम्हारे ही संग में है, मेरी दीवाली, 
ये होली पे भी रंग, डाला है तुमसे।  
तुम्हे देखकर ही, खिले चांदनी ये,
नहीं चाँद देखो, निराला है तुमसे। "

.......चेतन रामकिशन "देव"…....
दिनांक--२६.०१.१५

Sunday, 25 January 2015

♥गणित...♥


♥♥♥♥♥गणित...♥♥♥♥♥♥
मैं शब्दों का गणित न जानूं। 
केवल खुद का हित न जानूं। 
नहीं बोल सकता जिव्हया से,
मौन प्रेम है लिखित न जानूं। 

लाज भरा स्वभाव है मेरा,
तुमसे कुछ न कह पाता हूँ। 
किन्तु सच है बिना तुम्हारे,
क्षण भर भी न रह पाता हूँ। 

बिना तुम्हारे प्राण को अपने,
किसी मनुज में निहित न मानूं। 
नहीं बोल सकता जिव्हया से,
मौन प्रेम है लिखित न जानूं... 

नहीं मौन, न चुप्पी तोड़ो,
नयनों से सम्प्रेषण होगा। 
अपनेपन के दीप जलेंगे ,
भावुकता का प्रेषण होगा। 

बिना तुम्हारे अस्त हुआ हूँ,
अनुचित और उचित न जानूं। 
नहीं बोल सकता जिव्हया से,
मौन प्रेम है लिखित न जानूं... 

मौन प्रेम की भाषा होगी।
और भेंट की आशा होगी। 
"देव" यहाँ हम मिल जायेंगे,
परिणय की जिज्ञासा होगी। 

सदा कामना अच्छे की हो,
कभी किसी का अहित न जानूं। 
नहीं बोल सकता जिव्हया से,
मौन प्रेम है लिखित न जानूं। "

....चेतन रामकिशन "देव"…..
दिनांक--२५.०१.१५

Saturday, 24 January 2015

♥♥पीले फूल...♥♥


♥♥♥♥पीले फूल...♥♥♥♥
पीले फूल खिले हैं मन में। 
रंग आ गया है यौवन में। 
भाव नये कुछ शब्द मिले हैं,
जगी कविता अंतर्मन में। 

रूप बसंती प्यारा लगता,
धरा सुगन्धित हो जाती है। 
पुलकित होते नयन देखकर,
माला सुरभित हो जाती है। 

थकन मिटी, उल्लास मिला है,
ऊर्जा आयी है जीवन में। 
भाव नये कुछ शब्द मिले हैं,
जगी कविता अंतर्मन में... 

खेतों में नवजीवन आया। 
सरसों ने मन को महकाया। 
चहक रहीं हैं प्यारी चिड़ियाँ,
उनका कलरव मन को भाया। 

कई माह के सूनेपन के,
बाद ख़ुशी आयी आँगन में। 
भाव नये कुछ शब्द मिले हैं,
जगी कविता अंतर्मन में... 

आओ बसंती पर्व मनायें। 
गीत प्रेम के मन से गायें। 
हिंसा, घृणा विस्मृत करके,
"देव" प्रेम का जल बरसायें। 

मेलजोल में ही मधुकर है,
नहीं रखा कुछ भी अनबन में। 
भाव नये कुछ शब्द मिले हैं,
जगी कविता अंतर्मन में। "

....चेतन रामकिशन "देव"…..
दिनांक--२४.०१.१५

Friday, 23 January 2015

♥♥याद...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥याद...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
याद आँगन में दबे, पांव तेरी आती है। 
ख्वाब आँखों में नये, प्यार के सजाती है। 

देखना चाहूँ अगर, खोल के पलक अपनी,
अपने आँचल से मेरी आँख, वो छुपाती है।  

मुझसे हौले से मेरे दिल का हाल पूछे पर,
मैं जो पूछूं तो वो शरमा के, सर झुकाती है। 

सोचकर उसको मेरी धड़कनें हुईं भारी,
उसको छू लूँ तो, बिजली सी कौंध जाती है। 

मेरा हर लफ्ज़ नया, और ताजगी से भरा,
याद उसकी जो मेरे दिल से, गीत गाती है। 

धूप में जब भी तेरी, याद से करूँ बातें,
तेरी आदत, वो शरारत, मुझे बताती है। 

"देव" ये याद तेरी, तुझसे भी लगे प्यारी,
एक पल को भी नहीं दूर, मुझसे जाती है। "

............चेतन रामकिशन "देव"…........
दिनांक--२३ .०१.१५
· 

Thursday, 22 January 2015

♥♥अधूरापन...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥अधूरापन...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
ग़मों की आग में ये दिल, मेरा जलने लगा है। 
अधूरापन तुम्हारे बिन, बहुत खलने लगा है। 

वो जिसको गोटियां रखने का, हुनर बख़्शा था,
वही अब चाल मेरे साथ में, चलने लगा है। 

सहारे मुफ़लिसों के जिसने पायी थी हुकूमत,
गरीबों के हक़ों को, आज वो छलने लगा है। 

अहम इंसान का शीशे की, माफ़िक टूट जाये,
जो आई रात तो, सूरज भी ये ढ़लने लगा है। 

यहाँ सच्चाई से जिस रोज पाला पड़ गया तो,
वो झूठा बादशाह भी, आँख को मलने लगा है। 

बिना तुमसे मिले, पाये, मुझे हो चैन कैसे,
तुम्हारा ख्वाब जबसे आँख में, पलने लगा है। 

सुनो तुम "देव" बनकर मोम, वो जलने लगे तो,
मेरा किरदार भी फिर, बर्फ सा गलने लगा है। "

................चेतन रामकिशन "देव"…............
दिनांक--२२.०१.१५

Wednesday, 21 January 2015

♥♥♥जंग...♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥जंग...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
न भाई की यहाँ पर भाई से, अब जंग हो कोई। 
तमंचा, तोप न तलवार, अपने संग हो कोई। 

यहाँ रंग जाये हर चेहरा, मोहब्बत के गुलालों से,
नहीं सड़कों पे बिखरा, खून का अब रंग हो कोई। 

नहीं हो घाव अब गहरा, शिफ़ा मुफ़लिस को मिल जाये, 
दवा के बिन अपाहिज न किसी का, अंग हो कोई।  

मोहब्बत है खुदा बचपन से, मैं ये सीखता आया,
तपस्या प्यार की पल भर को भी न, भंग हो कोई। 

इमां कायम रहे, बाकि सलीका जिंदगी में हो,
तरक्की, नाम को, इंसां नहीं, बेढंग हो कोई। 

किसी का दिल नहीं टूटे, बदौलत मेरी न आंसू,
उजाला हाथ से मेरे, नही बेरंग हो कोई। 

सुनो तुम "देव" ये दुनिया, बनेगी खूबसूरत तब,
अगर इंसानियत का हर तरफ, सतरंग हो कोई। "

................चेतन रामकिशन "देव"…............
दिनांक--२१.०१.१५


Wednesday, 14 January 2015

♥वज्रपात...♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥वज्रपात...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
वज्रपात भी मौसम अब तो, निर्धन पे करने निकला है। 
गिरता पारा उघड़े तन के, जीवन को हरने निकला है। 
रह सहकर जिनके सर छप्पर, वो भी पहुंचे बदहाली में,
सर्दी में बारिश का पानी, उनका घर भरने निकला है। 

रेन वसेरा हुआ नाम का और अलावों में घोटाला। 
चंहुओर लगता है देखो, निर्धन की किस्मत पे ताला। 

शीतकाल भी दानव बनकर, निर्धन को चरने निकला है। 
वज्रपात भी मौसम अब तो, निर्धन पे करने निकला है। "

....................चेतन रामकिशन "देव"…..................
दिनांक--१४.०१.१५

Monday, 12 January 2015

♥♥♥♥क्यों...♥♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥क्यों...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
गिराना ही अगर था तो, मुझे परवाज़ क्यों दी थी। 
बिछड़ कर दूर होना था, तो फिर आवाज़ क्यों दी थी। 

बिना एहसास के पत्थर का ही, बुत बनके मैं खुश था,
मुझे इन्सां बनाने की तलब, आगाज़ क्यों की थी। 

मेरे लफ़्ज़ों के टुकड़े हो गये हैं, चोट से गम की,
अगर था हश्र ये करना, तो उनको साज़ क्यों दी थी। 

नहीं मरहम, दुआ कोई, दवा न कोई अपनापन,
तसल्ली झूठ की तुमने मेरे, हमसाज़ क्यों की थी। 

कहें क्या "देव " अब तुमसे, शिकायत में भी क्या रखा,
गिला कुदरत से है किस्मत को, इतनी नाज़ क्यों दी थी। "

....................चेतन रामकिशन "देव"….................
दिनांक--१३.०१.१५

♥♥किरदार...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥किरदार...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मेरे डूबे हुए किरदार को, पहचान दे जाओ। 
चुराकर आँख से आंसू, मुझे मुस्कान दे जाओ। 

तुम्हारे बिन महज मिटटी सरीखा है बदन मेरा,
मुझे छूकर मेरे मुर्दा जिस्म में, जान दे जाओ। 

यहाँ सिक्कों में बिकते देखता हूँ, आदमी को मैं,
जो बोलूं, सच को जो मैं सच, वही ईमान दे जाओ। 

नहीं नफरत का दामन थामने की, कोई नौबत हो,
मेरे लफ़्ज़ों को तुम अब, प्यार का उन्वान दे जाओ। 

सुनो अब "देव" तुम बिन है, अधूरी जिंदगी मेरी,
मेरे जीवन में रच वसकर, ख़ुशी की खान दे जाओ। "

..................चेतन रामकिशन "देव"…...........
दिनांक--१२.०१.१५

Wednesday, 7 January 2015

♥♥सात जनम...♥♥


♥♥♥♥♥सात जनम...♥♥♥♥♥♥
बिछड़ न जायें संभल के रहना। 
सदा मेरे आँचल में रहना। 
एक जनम तो नाकाफी है,
सात जनम तक दिल में रहना। 

अभी अभी तो शुरू किया है,
हम दोनों ने सफर प्यार का। 
अभी तो हल भी ढूंढ सके न,
हम अपने दिल बेकरार का। 
धीरे धीरे, बारीकी से, 
प्यार का हर पहलु जानेंगे,
अभी सहन करना सीखेंगे,
सखी दर्द हम इंतजार का। 

कल तुमसे था, आज में तुम हो,
साथ साथ तुम कल में रहना। 
एक जनम तो नाकाफी है,
सात जनम तक दिल में रहना... 

गीत लिखेंगे, छंद लिखेंगे। 
प्रेम का ये सम्बंध लिखेंगे। 
तुम अपना कर्तव्य उकेरो,
हम अपना प्रबंध लिखेंगे। 
तेरे शब्दों की खुशबु से,
मेरा यौवन खिल जायेगा,
साथ रहेंगे हर सुख दुख में,
मिलजुल ये सौगंध लिखेंगे। 

मैं तुमको साहस सौंपूंगा,
और तुम मेरे बल में रहना। 
एक जनम तो नाकाफी है,
सात जनम तक दिल में रहना... 

गृहकार्य में तुम पारंगत,
मैं धन अर्जित करना सीखूं। 
नींव रखो तुम हाथ से अपने,
मैं घर निर्मित करना सीखूं। 
"देव" ये सज्जा दीवारो की,
और आँगन की नाम आपके,
मैं घर के कोने कोने को,
प्यार से पुलकित करना सीखूं। 

तुमको छूकर पावन हो लूँ,
तुम गंगा के जल में रहना। 
एक जनम तो नाकाफी है,
सात जनम तक दिल में रहना। "

........चेतन रामकिशन "देव"…......
दिनांक--०७.०१.१५

Monday, 5 January 2015

♥♥दहलीज...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥दहलीज...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तेरी दहलीज पे आया नहीं था, दूर जाने को। 
हजारो लफ्ज़ जोड़े थे, तुझे दिल की सुनाने को। 

भले तू अपना पूरा दिल, न मेरे नाम कर लेकिन,
जगह दे दो मुझे थोड़ी, जरा ये सर छुपाने को। 

ये माना इस जनम में तुम, हमारी हो नहीं सकतीं,
जनम फिर लेना चाहूंगा, तुम्हारा प्यार पाने को। 

न जीते जी मुझे तुमने, पनाहें प्यार की बख्शीं,
मगर तुम कब्र पे आना मेरी, दीया जलाने को। 

हाँ माना चाँद हो तुम, और मैं रस्ते का एक पत्थर,
नहीं समझा सका दिल को, मगर तुझको भुलाने को।  

नहीं कुछ पास में मेरे, मैं खाली हाथ हूँ बेशक,
तुम्हारे नाम पर करता, दुआ के हर खजाने को। 

चलो तुम "देव" जो सोचो, निभाओ साथ या न तुम,
कसर कोई नहीं बाकी रखी, तुझको मनाने को। "

...............चेतन रामकिशन "देव"…............
दिनांक--०५.०१.१५

♥♥प्रेम की विधा...♥♥

♥♥♥♥प्रेम की विधा...♥♥♥♥
छंद, गीत, दोहा, चोपाई। 
सबमें तेरी छवि समाई। 
बड़ा भाग्य है सखी हमारा,
तेरी प्रीत जो हमने पाई। 

तेरी प्रीत सुख का उजियारा। 
तेरी प्रीत की गंगा की धारा। 
तेरी प्रीत में भाव हैं बल के,
तेरी प्रीत का हर क्षण प्यारा। 

मंत्र प्रेम के जपे जो तुमने,
विधा वही हमने दोहराई। 
बड़ा भाग्य है सखी हमारा,
तेरी प्रीत जो हमने पाई। 

धैर्यवान हो, तुम साधक हो। 
प्रेम धर्म की आराधक हो। 
सुचित पथों की प्रहरी हो तुम,
गलत मार्ग की तुम बाधक हो। 

कंठ दिया मेरे शब्दों को,
मेरी लेखनी नहीं दबाई। 
बड़ा भाग्य है सखी हमारा,
तेरी प्रीत जो हमने पाई


मंत्रमुग्ध करने वाली हो। 
ओस में भीगी हरियाली हो। 
"देव" हमारे जीवन में तुम,
हर्षित अमृत की प्याली हो। 

मेरे नयन पटल, अधरों पर,
प्रीत की तुमने नदी बहाई। 
बड़ा भाग्य है सखी हमारा,
तेरी प्रीत जो हमने पाई। "

.....चेतन रामकिशन "देव"…… 
दिनांक--०५.०१.१५

Sunday, 4 January 2015

♥♥बदलाव...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥बदलाव...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
बदलते दौर का रिश्ता है ये, बदलाव मांगेगा। 
कभी आंसू कभी ये खून का, सैलाब मांगेगा। 
मेरे चलने से ही सूरत पे मेरी, है चमक देखो,
अगर मैं थम गया तो, वक़्त ये ठहराव मांगेगा।

नये इस दौर में,  चाहत, वफ़ा बेमोल लगती है। 
तमाशा देखते हैं सब, जो मेरी आँख दुखती है। 
किसे से दर्द बांटो तो, मिले उपहास का तोहफा,
यहाँ सब तापते हैं, जो मेरे घर आग लगती है। 

दवा मिलती नहीं, मरहम भले हर घाव मांगेगा। 
बदलते दौर का रिश्ता है ये, बदलाव मांगेगा... 

यहाँ पैसों की बातें हों, दिलों को कौन चुनता है। 
यहाँ सब हो गए बहरे, मेरा गम कौन सुनता है। 
कहुँ क्या "देव" कुछ कहने को, वाकी है नहीं अब कुछ,
जिसे अपना कहा फांसी का फंदा, वो ही बुनता है। 

जिसे भी देखो वो खुद के लिए, रुआब मांगेगा। 
बदलते दौर का रिश्ता है ये, बदलाव मांगेगा। "

.............चेतन रामकिशन "देव"…............
दिनांक--०४.०१.१५

Saturday, 3 January 2015

♥♥दर्द की सीमा...♥♥



♥♥♥♥♥♥♥♥♥दर्द की सीमा...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
सहें हम दर्द ये कितना, कोई सीमा तो तय कर दो। 
दुआ देकर मेरा डूबा हुआ, सूरज उदय कर दो। 
मेरी चौखट पे भी दस्तक, ख़ुशी की अब जरुरी है,
बहुत कोशिश में हूँ कुदरत, चलो मेरी विजय कर दो। 

नहीं मैं पूर्ण हूँ मेरा, अधूरापन तुम्ही हर दो। 
मेरी मासूमियत से भूल हो, तो माफ़ तुम कर दो। 
मेरी किस्मत पे पाबन्दी की, बेड़ी तोड़कर के तुम,
मेरी आँखों की सूनी राह पे, अब तुम दमक कर दो। 

मुझे तुम धैर्य देकर के, मेरे मन को अभय कर दो। 
सहें हम दर्द ये कितना, कोई सीमा तो तय कर दो... 

हमारी सांस भारी है, हमारी आँख में जल है। 
मेरा आकाश काला है, मेरी सुखी हुयी थल है। 
मैं इन्सां हूँ बहुत कोशिश भी करके जीत न पाया,
सुनो कुदरत, क्या मेरी उलझनों का अब कोई हल है। 

मेरी सांसो की बिखरी पंक्तियों में अब तो लय कर दो।  
सहें हम दर्द ये कितना, कोई सीमा तो तय कर दो... 

भरोसा है तुम्ही पर, तो ही तुमसे बात करता हूँ। 
उम्मीदें लेके आये कल, इसी में रात करता हूँ। 
ए कुदरत "देव" की सुनना, सुनो हर एक परेशां की,
हवाले मैं तुम्हे दिल के, सभी जज्बात करता हूँ। 

बुरा ये वक़्त अब जाये, जरा अच्छा समय कर दो। 
सहें हम दर्द ये कितना, कोई सीमा तो तय कर दो। "

...............चेतन रामकिशन "देव"…................
दिनांक--०४.०१.१५


Friday, 2 January 2015

♥प्रेम-संवाद...♥

♥♥♥♥प्रेम-संवाद...♥♥♥♥
निकट नहीं अवसाद रहेगा। 
जब अपना संवाद रहेगा। 
जीवन हो व्यतीत हर्ष में,
न कोई परिवाद रहेगा।

तुम मुझको भूषित कर देना। 
तुम क्षमता प्रेषित कर देना,
समस्याओं से घिरुं यदि तो,
मुझको ऊर्जा से भर देना। 
किसी क्षेत्र में तुम आगे हो,
किसी क्षेत्र में मैं प्रथम हूँ,
दोनों का बल युग्मित करके,
तुम उसको दोहरा कर देना।

प्रेम सफल हो जायेगा फिर, 
न कोई अपवाद रहेगा। 
जीवन हो व्यतीत हर्ष में,
न कोई परिवाद रहेगा...

बिन कारण के क्रोध न करना,
तथ्यों के संग बात बताना। 
नहीं वेदना, न मनमानी,
मेरे मन को नहीं दुखाना। 
मैं भी अपने कर्तव्यों का,
पालन तेरे लिये करूँगा,
मुझसे कोई गलती हो तो,
सही बात मुझको समझाना।

कठिन क्षणों का सरल बनाना,
न भ्रमित अनुवाद रहेगा। 
जीवन हो व्यतीत हर्ष में,
न कोई परिवाद रहेगा...

सखी शब्द का परिचय बनना,
मेरे गीतों की लय बनना। 
"देव" हमारा हाथ थामकर ,
संघर्षों की तू जय बनना। 
प्रेम भाव के पावन जल से,
ये कोमल मन धुल जायेगा।
न फिर कोई अड़चन होगी,
बंद मार्ग भी खुल जायेगा।

तुम संग न आवेश कोई भी,
न मन में उन्माद रहेगा। 
जीवन हो व्यतीत हर्ष में,
न कोई परिवाद रहेगा। "
.....चेतन रामकिशन "देव"…...
दिनांक--०२.०१.१५ 

Tuesday, 30 December 2014

♥♥नये साल में...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥नये साल में...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
नये साल में कुछ आशायें, कुछ सपने बुनना चाहता हूँ। 
नये साल में अपने दिल की, बातों को सुनना चाहता हूँ। 
नये साल में हसरत है ये, नफरत मिट्टी में मिल जाये,
इसीलिए मैं मानवता के रस्ते को, चुनना चाहता हूँ। 

नहीं जानता ख्वाब हों पूरे, पर मन में विश्वास रखा है। 
अब से बेहतर कुछ करने का, साहस अपने पास रखा है। 

दुख के क्षण में भी फूलों सा, मैं जग में खिलना चाहता हूँ। 
नये साल में कुछ आशायें, कुछ सपने बुनना चाहता हूँ... 

जो गलती इस साल हुईं हैं, उनका न दोहराव हो मुझसे। 
किसी आदमी के भी दिल में, भूले से न घाव हो मुझसे। 
"देव" जिन्होंने मेरी खातिर, अपना प्यार, दुआ बख्शी है,
उनसे मिलने और जुलने में, न कोई बदलाव हो मुझसे। 

नहीं मैं सूरज हूँ दुनिया का, भले तिमिर न हर सकता हूँ। 
लेकिन फिर भी दीपक बनकर, बहुत उजाला कर सकता हूँ। 

नये साल की नयी राह पर, ऊर्जा संग चलना चाहता हूँ। 
नये साल में कुछ आशायें, कुछ सपने बुनना चाहता हूँ। "

....................चेतन रामकिशन "देव"…................
दिनांक--३०.१२.२०१४

Monday, 29 December 2014

♥♥♥वजह...♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥वजह...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
अब लोगों के दिल में, जगह नही मिलती। 
खुश होने की एक भी, वजह नहीं मिलती। 

लोग घमंडी उड़ें भले ही कितने पर,
गिर जाने पे उनको, सतह नहीं मिलती। 

साँस आखिरी जूझो मंजिल पाने को,
थक जाने से जग में, फतह नही मिलती। 

गलती अपनी हो तो माफ़ी में क्या डर,
जिद्दी बनकर देखो, सुलह नहीं मिलती। 

मुल्क लूटने को तो, सब आमादा हैं,
संसद जैसी उनमे कलह नहीं मिलती।  

वो क्या जानें तड़प, जुदाई के आंसू,
प्यार में जिनको एक पल, विरह नही मिलती। 

"देव" यहाँ कानून, अमीरों का गिरवीं,
मुफ़लिस को बिन पैसे, जिरह नही मिलती। "

...............चेतन रामकिशन "देव"…...........
दिनांक--३०.१२.२०१४

♥♥दुशाला...♥♥


♥♥♥♥♥दुशाला...♥♥♥♥♥♥
खोटा सिक्का चल जाता है। 
सच का सूरज ढ़ल जाता है। 
भ्रष्टाचारी रहें ताप में,
शीत में निर्धन गल जाता है। 

नहीं पता भारत की नीति,
नहीं पता कैसा निगमन है। 
रहे उमर भर मारा मारा,
निर्धन का ऐसा जीवन है। 
उसके अधिकारों को लूटें,
लोग यहाँ कुछ मुट्ठी भर ही,
आँख पे पट्टी कानूनों की,
निर्धन का बस यहाँ मरन है। 

निर्धन का सच भी अनदेखा,
झूठ ठगों का चल जाता है। 
भ्रष्टाचारी रहें ताप में,
शीत में निर्धन गल जाता है...

काश के निर्धन के घर दीपक,
काश उजाला उसके घर हो। 
फटे हैं कपड़े, शीत में कांपे,
काश दुशाला उसके सर हो। 
व्यवस्थाओं के कान हैं बहरे,
निर्धन की आहें नहीं सुनती,
कब तक धरती बने बिछौना,
कब तक उसकी छत अम्बर हो। 

"देव" तड़प में कटता है दिन,
रोकर उसका कल आता है। 
भ्रष्टाचारी रहें ताप में,
शीत में निर्धन गल जाता है। "

.....चेतन रामकिशन "देव"….
दिनांक--२९.१२.२०१४

Sunday, 28 December 2014

♥चंद्र खिलौना...♥



♥♥♥♥चंद्र खिलौना...♥♥♥♥♥
मन में हो जब चंद्र खिलौना। 
माँ की गोदी के बिन रोना। 
दुग्ध पान को माँ से लिपटे,
वो बचपन का समय सलौना। 

केवल हठ हो कुछ नहीं सुनना। 
अपनी इच्छा से सब चुनना। 
टुकर टुकर देखे आँखों से,
बिन गिनते के तारे गिनना। 

माँ की लोरी सुनकर सीखा,
उसने गहरी नींद में सोना। 
दुग्ध पान को माँ से लिपटे,
वो बचपन का समय सलौना....

चंचल चितवन और नादानी। 
भाव नहीं होते अभिमानी।  
"देव" नहीं बचपन को आती,
सोच लोभ की, न कोई हानि। 

अपने पांव के अँगठे को,
लार में अपनी बहुत डुबोना। 
दुग्ध पान को माँ से लिपटे,
वो बचपन का समय सलौना। "

.....चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक--२८.१२.२०१४

Friday, 26 December 2014

♥फूल की देह...♥


♥♥♥♥फूल की देह...♥♥♥♥♥♥
पूर्णिमा हो के चांदनी तुम हो। 
इन चिरागों की रोशनी तुम हो। 
तुम को छुकर के मैं महकने लगूं,
फूल की देह सी बनी तुम हो। 

आँख प्यारी हैं और सूरत भी। 
तुम सवेरे सी खूबसूरत भी। 
रूह को तेरी प्यास है हरदम,
मेरी ख्वाहिश हो और जरुरत भी। 

प्यार की सम्पदा तेरे दिल में,
सोने चांदी से भी धनी तुम हो। 

पूर्णिमा हो के चांदनी तुम हो...

तेरे होने से ही खिले आँगन। 
तुमको पाकर के झूमता है मन। 
"देव" ख़त तेरे प्यार के मोती,
तेरे चित्रों को चूमता है मन। 

मुश्किलों ने कभी जो घेरा तो,
ढ़ाल बन साथ में तनी तुम हो। 
पूर्णिमा हो के चांदनी तुम हो। 
इन चिरागों की रोशनी तुम हो। "

........चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक--२६.१२.२०१४

Wednesday, 24 December 2014

♥♥♥प्रेम पत्र...♥♥♥



♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्रेम पत्र...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
प्रेम पत्र जब मिला तुम्हारा, चेहरा खिलकर कमल हो गया। 
पढ़ा तरन्नुम में जब मैंने, लफ्ज़ लफ्ज़ एक ग़ज़ल हो गया। 
आँख मूंदकर जब खोली तो, पत्र में थी तस्वीर तुम्हारी,
तुम्हे देखकर दिल बोला ये, मेरा जीवन सफल हो गया। 

पत्र तुम्हारा फूलों जैसा, मुझे सुगंधित कर देता है। 
मेरी आँखों में चाहत के, लाखों सपने भर देता है। 

तेरे लफ़्ज़ों के छूने से, मुरझाया मन नवल हो गया। 
प्रेम पत्र जब मिला तुम्हारा, चेहरा खिलकर कमल हो गया.... 

प्रेम पत्र जब चूमा मैंने, लगा के मेरे पास में तुम हो। 
तुम लफ़्ज़ों के अपनेपन में, और मेरे विश्वास में तुम हो। 
पत्र में तुमने प्रेम विजय के, भावों का जो अक्स उभेरा ,
पढ़कर ऐसा लगा हमारे, जीवन के उल्लास में तुम हो।  

पत्र की स्याही में जो तुमने, प्रेम भाव का रस घोला है। 
पत्र नही वो मानो तुम हो, जिसने खुद सब कुछ बोला है। 

प्रेम पत्र से प्रेम की किरणें, पाकर के मन धवल हो गया। 
प्रेम पत्र जब मिला तुम्हारा, चेहरा खिलकर कमल हो गया... 

मन कहता है रोज तुम्हारा, प्रेम पत्र जब मिल जायेगा। 
आज की तरह मेरा चेहरा, खिले कमल सा खिल जायेगा। 
"देव" तुम्हारे लफ्ज़ हमारे, जीवन को रौशन कर देंगे,
हम दोनों की ताक़त होगी, ग़म का पर्वत हिल जायेगा। 

पत्र थामकर श्वेत कबूतर, जब मेरे आँगन में होगा। 
पत्र रूप में प्यार तुम्हारा, जीवन के हर कण में होगा। 

प्यार वफ़ा के फूल खिले तो, छोटा आँगन महल हो गया। 
प्रेम पत्र जब मिला तुम्हारा, चेहरा खिलकर कमल हो गया। "

........................चेतन रामकिशन "देव"……..............
दिनांक--२४.१२.२०१४

Tuesday, 23 December 2014

♥♥♥योद्धा...♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥योद्धा...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मिटकर नहीं सफर तय होता, डटकर सफर किया जाता है। 
मुश्किल तो आयेंगी बिल्कुल, जीवन अगर जिया जाता है। 
बिना लड़े ही रणभूमि में, जीत नहीं मिल सकती कतिपय,
यदि जीतना चाहते हो तो, खुद को सबल किया जाता है।  

जो जीवन की रणभूमि में, दुख से हंसकर टकराते हैं। 
वही लोग इतिहास की रचना, इस दुनिया में कर पाते हैं। 

योद्धा वो है जो मरकर भी, जग में याद किया जाता है।  
मिटकर नहीं सफर तय होता, डटकर सफर किया जाता है। 

दुनिया में कुछ करने वाले, नहीं हारकर चुप होते हैं। 
वो जीवन के कदम कदम पर, ऊर्जा के अंकुर बोते हैं। 
"देव" जहाँ में सबको कुदरत, नहीं रेशमी कम्बल देती,
योद्धा वो हैं जो भीतर का, ताप जगाकर दृढ होते हैं। 

जो बंजर को खोद खोद कर, कृषि भूमि कर जाते हैं। 
वही लोग तो इतिहासों में, नाम का अंकन कर पाते हैं। 

वीर वही वो जिसके द्वारा, मन को अभय किया जाता है। 
मिटकर नहीं सफर तय होता, डटकर सफर किया जाता है। "

.....................चेतन रामकिशन "देव"……..............
दिनांक--२४.१२.२०१४

♥♥♥टूट गया मन..♥♥♥



♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥टूट गया मन..♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
दिन निकला था पीड़ाओं में, गम में मेरी रात ढ़ली  है। 
फूल दुखों की आंच में झुलसे, सूनी सूनी हर एक कली है। 
कुछ सपने हाथों में लेकर, जब भी पूरा करना चाहा,
किस्मत के संग अपनों का छल, लम्हा लम्हा मात मिली है। 

किसको दिल का हाल बताऊँ, कौन यहाँ पर दुख सुनता है। 
कौन किसे के ख्वाब यहाँ पर, अपने हाथों से बुनता है। 

मैंने चाही धूप खुशी की, पर गम की बरसात मिली है। 
दिन निकला था पीड़ाओं में, गम में मेरी रात ढ़ली  है... 

हार गया मन, रूठ गया मन, टुकड़े होकर टूट गया मन। 
लोग बढ़ गये हमे गिराके, सबसे पीछे छूट गया मन। 
"देव" जहाँ में नहीं किसी ने, मन को मेरे, मन से जोड़ा,
तन्हा होकर, गिरा अर्श से, फर्श पे गिरकर फूट गया मन। 

मन के टुकड़े देख देख कर, आँखों से आंसू बहते हैं। 
लोगों के दिल हैं छोटे पर, बड़ी बड़ी बातें कहते हैं। 

उम्र है छोटी मगर ग़मों की, बड़ी बड़ी सौगात मिली है। 
दिन निकला था पीड़ाओं में, गम में मेरी रात ढ़ली  है। "

...................चेतन रामकिशन "देव"……............
दिनांक--२३.१२.२०१४

Monday, 22 December 2014

♥♥यादों का दीपक...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥यादों का दीपक...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तेरी यादों के दीपक से, गम का कोहरा दूर किया है। 
जो कुछ तुमने बख्शा हमको, हमने वो मंजूर किया है। 
तेरी चिट्ठी, तेरे खत को, पढ़कर मैंने रात गुजारी,
तेरे लफ़्ज़ों की ख़ुश्बू में, खुद के दिल को चूर किया है। 

भले मिले न लेकिन फिर, मेरे संग संग तुम रहती हो। 
मेरी कविता और ग़ज़ल में, भावुकता बनकर बहती हो। 

बिना तुम्हारे जीवन जीना, मैंने नामंजूर किया है। 
तेरी यादों के दीपक से, गम का कोहरा दूर किया है...

अहसासों में मिल लेता हूँ, अहसासों में खो जाता हूँ। 
समझ के तकिया गोद तुम्हारी, मैं चुपके से सो जाता हूँ। 
जब आती है याद तुम्हारी, ख्वाबों के रस्ते से चलकर,
फिर तू मेरी हो जाती है और मैं तेरा हो जाता हूँ। 

बिना तुम्हारी सूरत वाला, शीशा चकनाचूर किया है। 
तेरी यादों के दीपक से, गम का कोहरा दूर किया है...

तेरा प्यार है ऊष्मा जैसा, शीत की मुझको फ़िक्र नहीं है। 
मैं नहीं सुनता उन बातों को, जिनमे तेरा जिक्र नहीं है। 
"देव" जहाँ में प्यार की नदियां, जब आपस में मिल जाती हैं,
तो पत्तों, तो फूलों पर, प्यार की बूंदे खिल जाती हैं। 

सखी तुम्हारी दुआ ने मुझको, दुनिया में मशहूर किया है। 
तेरी यादों के दीपक से, गम का कोहरा दूर किया है।

..................चेतन रामकिशन "देव"……..........
दिनांक--२२.१२.२०१४

Saturday, 20 December 2014

♥♥जनम जनम का प्यार...♥♥


♥♥♥♥♥जनम जनम का प्यार...♥♥♥♥♥
हर पल मैं दीदार तुम्हारा चाहता हूँ। 
जनम जनम का प्यार तुम्हारा चाहता हूँ। 

अलंकार से जैसे कविता दमक रही,
वैसे ही सिंगार तुम्हारा चाहता हूँ। 

जब मंजिल पा लूँ तो अपनी तोहफे में,
मैं बाँहों का हार तुम्हारा चाहता हूँ। 

मुझको इज़्ज़त बख्शे मौला हाँ लेकिन,
पहले मैं सत्कार तुम्हारा चाहता हूँ। 

प्यार तुम्हारा सागर मेरे शब्द नदी,
पर फिर भी आभार तुम्हारा चाहता हूँ। 

अपना खून, पसीना, मेहनत सब देकर,
सपना हर साकार तुम्हारा चाहता हूँ। 

पीड़ा, आंसू, दुख न तुमको तोड़ सके,
ताकतवर आधार तुम्हारा चाहता हूँ। 

तेरा दिलासा रोते चेहरे चुप कर दे,
मैं ऐसा किरदार तुम्हारा चाहता हूँ। 

"देव " यकीं है हर पल तुमसे वफ़ा करूँ,
और खुद को हक़दार तुम्हारा चाहता हूँ। "

.........चेतन रामकिशन "देव"……...
दिनांक--२०.१२.२०१४

Friday, 19 December 2014

♥♥पाकीज़ा एहसास...♥♥



♥♥♥♥♥♥पाकीज़ा एहसास...♥♥♥♥♥♥
पाकीज़ा एहसास तुम्हारी चाहत के। 
लम्हे लगते ख़ास तुम्हारी चाहत के। 

दिन में दूरी रोजी की, पर शाम ढले,
हम आते हैं, पास तुम्हारी चाहत के। 

बिना तुम्हारे दुनिया फीकी लगती है,
मीठे हैं एहसास, तुम्हारी चाहत के। 

धन, दौलत, मयखाना, चांदी न सोना,
बढ़कर हैं उल्लास तुम्हारी चाहत के। 

गोद में तेरी सर रखकर के सोया तो,
मलमल थे एहसास तुम्हारी चाहत के। 

तुम राधा के रूप में, हम मोहन बनकर,
संग संग करते रास, तुम्हारी चाहत के। 

"देव " हो दिन या रात मगर न करते हैं,
लम्हे ये अवकाश तुम्हारी चाहत के। "

.........चेतन रामकिशन "देव"……...
दिनांक--१९.१२.२०१४

Wednesday, 17 December 2014

♥♥तेजाबी बारिश...♥♥


♥♥♥♥तेजाबी बारिश...♥♥♥♥
जड़वत, जिंदा लाश बनाकर। 
मुझको जीते जी दफनाकर। 
अपनेपन का दावा करते,
मेरे घर में आग लगाकर। 

मानवता के कोमल तन पर,
तेजाबी बारिश करते हैं। 
अपनेपन की आड़ में देखो,
नफरत के सौदे करते हैं। 
इनको मतलब नहीं दर्द से,
जान किसी की बेशक जाये,
अपना अहम उन्हें प्यारा है,
भले तड़प कर हम मरते हैं। 

चले गये हैं, शिफ़ा किये बिन,
मेरे सारे घाव दुखाकर। 
अपनेपन का दावा करते,
मेरे घर में आग लगाकर ...

बलि यहाँ पर अरमानों की,
होली जलती जज्बातों की। 
उन्हें चाह मेरी चीखों की,
नहीं तलब दिल की बातों की। 
"देव" उन्हें अपना माना पर,
सिवा ग़मों के क्या पाया है,
जिनके सीने में पत्थर हो,
वो क्या कद्र करें नातों की। 

बदल गये हैं मेरे ख्वाब वो,
ताशों के जैसे बिखराकर। 
अपनेपन का दावा करते,
मेरे घर में आग लगाकर। "

......चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक--१७.१२.२०१४



Tuesday, 16 December 2014

♥बिलखती ममता...♥


♥♥♥बिलखती ममता...♥♥♥
बेसुध है, बदहाल हो गयी। 
मानो माँ कंगाल हो गयी,
दहशतगर्दों की  हठधर्मी,
खून से धरती लाल हो गयी। 

निर्मम अत्याचार हुआ है। 
जमकर नरसंहार हुआ है। 
माँ की ममता बिलख रही है,
बच्चों पर प्रहार हुआ है। 
चारों तरफ़ गूँज रही है,
दहशतगर्दों की हठधर्मी,
मौला भी खामोश देखता,
मानो वो लाचार हुआ है। 

बारूदों की लपट में झुलसी,
काली उनकी खाल हो गयी। 
दहशतगर्दों की  हठधर्मी,
खून से धरती लाल हो गयी... 

दहशतगर्द भला क्या जानें,
माँ की ममता क्या होती है। 
वो जिससे जन्मे धरती पर,
वो भी तो एक माँ होती है। 
लेकिन वो क्या जानें माँ को,
जो मानव का खूं पीते हैं,
"देव" भला ये नरपिशाच कब,
मानवता के संग जीते हैं। 

फटी किताबें, उधड़े बस्ते,
मौन सभी की चाल हो गयी। 
दहशतगर्दों की  हठधर्मी,
खून से धरती लाल हो गयी। "

.......चेतन रामकिशन "देव"…….
दिनांक--१७.१२.२०१४

Saturday, 13 December 2014

♥♥हमारे नाम का पौधा ...♥♥


♥♥♥♥♥♥हमारे नाम का पौधा ...♥♥♥♥♥♥♥♥
हमारे नाम का पौधा लगाना अपने आँगन में। 
हमारी याद में दीपक जलाना अपने आँगन में। 

जो कोई ख़्वाब मेरी डूबती आँखों ने देखा था,
उसे हाथों से तुम अपने सजाना, अपने आँगन में। 

हवाओं में तुम्हारी खुश्बू को महसूस कर लूंगा,
महकते फूल जैसे मुस्कुराना, अपने आँगन में। 

मैं भी इंसान था, गलती हजारो मैंने भी कीं थीं,
अकेले खुद को न मुजरिम बनाना, अपने आँगन में। 

मेरे खत और तस्वीरें, तेरी हमदर्द बन जायें,
उन्हें तुम चूमना, दिल से लगाना अपने आँगन में। 

यहाँ आना, चले जाना, हक़ीक़त है ये सच्चाई,
नहीं इस बात को झूठा बताना, अपने आँगन में। 

ये दुनिया बेमुरब्बत है, तुम्हे न "देव" जीने दे,
तभी तुम नाम को मेरे छुपाना, अपने आँगन में। " 

.................चेतन रामकिशन "देव"……...........
दिनांक--१४.१२.२०१४

Friday, 12 December 2014

♥♥♥डाका...♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥डाका...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मुफ़लिस के हक़ पे अब पड़ता डाका है। 
चूल्हा ठंडा, उसके घर में फाका है।  

अपनी छत उधड़ी, पर क़र्ज़ परायों को,
कहो तरक्की का ये कैसा खाका है। 

दफ्तर में बेख़ौफ़ लुटेरे लूट रहे,
मानो अफसर हर मुफ़लिस का आका है। 

सूखे बच्चे रोग कुपोषण का फैला,
पुष्टाहार भले घर घर में आँका है। 

काला धन आखिर कैसे परदेश गया,
मुल्क में यूँ तो कदम कदम पर नाका है। 

अरबों, खरबों हड़प के भी आज़ाद फिरें,
कानूनों से बाल से इनका बांका है। 

"देव " नज़र ये रस्ता तकते लाल हुईं,
पर किसने मुफ़लिस के घर में झाँका है।  "

...........चेतन रामकिशन "देव"……......
दिनांक--१३.१२.२०१४



Thursday, 11 December 2014

♥♥लफ़्ज़ों की स्याही...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥लफ़्ज़ों की स्याही...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
तेरा खत जब भी देखा है, तेरा एहसास पाया है। 
तेरा चेहरा, तेरे लफ़्ज़ों की स्याही में समाया है। 

भले मैं बेवफा था या वफ़ा तुम कर नहीं पायीं,
तेरे सजदे में मेरा सर, जो तेरा दिल दुखाया है। 

भले रिश्ता नहीं बाकी जो तुमसे बात भी कर लूँ,
मगर तेरे तरन्नुम ने, मेरी ग़ज़लों को गाया है।  

बिछड़ना था अगर किस्मत, तो क्यों मिलने के पल बख्शे,
खुदा तेरी खुदाई ने भी, क्या आलम दिखाया है। 

मोहब्बत मेरी नज़रों में, नहीं हसरत नुमाईश की,
तभी टूटे हुये दिल को, यहाँ मैंने छुपाया है। 

तड़प, या दर्द या आंसू, या खुशियों के कोई तोहफे,
मुझे तुमने दिया जो भी, वो माथे से लगाया है। 

सफर तन्हा है लेकिन "देव", फिर भी काट लेता हूँ,
हुनर तुमने ही तो गिरकर के, उठने का सिखाया है। "


.................चेतन रामकिशन "देव"……...........
दिनांक--१२.१२.२०१४

Tuesday, 9 December 2014

♥♥♥सफर...♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥सफर...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
सफर धीमा सही, लेकिन चलो शुरुआत करते हैं। 
नज़र खुद पे टिकाकर, आज खुद से बात करते हैं। 

नहीं आया कोई मरहम लगाने ज़ख्म पे तो क्या,
खुले घावों पे आओ, ओस की बरसात करते हैं। 

मेरे अपनों ने ही मुझको ज़हर की सुईयां घोंपी,
नहीं दुश्मन कभी छुपकर के, मुझ पे घात करते हैं। 

चलो सबको दुआ बख्शो, नहीं रखो गिले शिकवे,
नहीं इंसानियत की, नफरतों से मात करते हैं। 

उजाला बेचने वालों कभी देखो भी उस तरफ़ा,
अँधेरे में गुजारा जो यहाँ, हर रात करते हैं। 

मेरा दामन, तेरे एहसास के, रंगों से रंग जाये,
तभी हम तेरी यादों से, हमेशा बात करते हैं। 

सुनो अब "देव" तुम होना, किसे के बाद में लेकिन,
चलो पहले खुदी से प्यार के, हालात करते हैं। "

..............चेतन रामकिशन "देव"…….......
दिनांक--१०.१२.२०१४

♥♥रिक्तता...♥♥


♥♥♥♥♥रिक्तता...♥♥♥♥♥♥♥
रिक्तता बिन तेरे बहुत होती। 
आँख भी बिन तेरे नहीं सोती। 
रात की लम्बी सी सुरंगों में,
भोर भी पास में नहीं होती। 

तेरे आने की राह नजरों में। 
तेरे दर्शन की चाह नज़रों में। 
तेरी धुंधली सी भी झलक न दिखे,
तो उमड़ती है दाह नजरों में। 

चाहकर भी ये अब जटिल पीड़ा,
देखो अवकाश में नहीं होती। 
रात की लम्बी सी सुरंगों में,
भोर भी पास में नहीं होती …

प्राण के बिन मेरा ये तन रहता। 
मौन हूँ अब मैं कुछ नहीं कहता। 
" देव " पाषाण तुमने समझा तो,
बनके जलधार मैं नहीं बहता। 

ढ़लना चाहूँ मैं तेरी प्रतिमा में,
और कोई आस अब नहीं होती। 
रात की लम्बी सी सुरंगों में,
भोर भी पास में नहीं होती। "

......चेतन रामकिशन "देव"….
दिनांक--०९.१२.२०१४

Monday, 8 December 2014

♥♥♥प्रदीप्ति...♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥प्रदीप्ति...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
घना कोहरा, बड़ा गहरा, नहीं कुछ भी दिखाई दे। 
धधकते सूर्य के ऊपर भी, जब पहरा दिखाई दे। 
तुम्हें उम्मीद के दीयों से, उसको फिर जगाना है,
कोई ज्योति अगर तुमको, कभी बुझती दिखाई दे। 

अँधेरा देखकर, डरकर, सफर तय नहीं हो सकता। 
जिसे हो जीतना उसको कोई भय हो नहीं सकता! 
किसी का साथ मिल जाये तो बेहतर है सफर लेकिन,
कोई जो साथ छोड़े तो प्रलय भी हो नहीं सकता। 

भुजाओं में जो रखते बल, अकेले होके भी भारी। 
वही मौका गंवाता है, वो जिसकी सोच है हारी। 

सुनो संगीत तुम दिल का, जो दुनिया चुप दिखाई दे। 
घना कोहरा, बड़ा गहरा, नहीं कुछ भी दिखाई दे। "

..............चेतन रामकिशन "देव"…….......... 
दिनांक--०९.१२.२०१४

♥♥♥कविता...♥♥♥


♥♥♥♥♥♥कविता...♥♥♥♥♥♥
सखी को सौंपे प्यार कविता। 
दुश्मन को अंगार कविता। 
निर्धन के अधिकार की वाणी,
सच्ची और खुद्दार कविता। 

कविता मन में और चेतन में। 
कविता फूलों के आँगन में। 
कविता तो है भाव मखमली,
कभी जवानी और बचपन में। 

दूर दराजे फौजी को है,
माँ ममता का तार कविता ।
निर्धन के अधिकार की वाणी,
सच्ची और खुद्दार कविता....

कविता ज्योति, कविता मोती। 
कविता  मन में खुशियां बोती। 
"देव" कविता है उजियारा,
धवल चाँद सी उज्जवल होती। 

एक दूजे को प्यार बाँचती,
चंदा में दीदार कविता। 
निर्धन के अधिकार की वाणी,
सच्ची और खुद्दार कविता। "


........चेतन रामकिशन "देव"…….....
दिनांक--08.12.2014



Sunday, 7 December 2014

♥♥♥इक्कीसवीं सदी...♥♥♥



♥♥♥♥♥♥♥♥♥इक्कीसवीं सदी...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
इस इक्कीसवीं सदी का मानव बदल गया है। 
कहने को वो चाँद से आगे निकल गया है। 
हौड़ मची है दमके, नाम, अहम उसका, 
इसीलिए इन्सां का खूं भी, निगल गया है। 

छाती चौड़ी, शब्द बड़े हैं, लेकिन छोटा दिल रखता है। 
आज आदमी अपने दिल में, नफरत की महफ़िल रखता है। 
किसी के हक़ पे डाका डाले, किसी के घर की लूटे अस्मत,
पढ़ा लिखा होकर भी मानव, अब खुद को जाहिल रखता है। 

हर दिल में तेज़ाब यहाँ पर उबल गया है। 
इस इक्कीसवीं सदी का मानव बदल गया है...

नीली स्याही लाल हो गयी, अब रंगत बदहाल हो गयी। 
बस पैसों की खातिर सबकी, बदली बदली चाल हो गयी। 
कोई किसी के दुःख में आकर, नहीं बांटता जरा दिलासा,
कोष में लाख-करोड़ों लेकिन, मानवता कंगाल हो गयी। 

पल भर में अरमान यहाँ कोई कुचल गया है। 
इस इक्कीसवीं सदी का मानव बदल गया है... 

नहीं पता है आगे का, क्या आलम होगा।  
"देव" न जाने जुर्म, कभी ये कम होगा। 
घर घर में पिस्तौल की खेती होगी तब,
हर बच्चे के हाथ में, शायद बम होगा।  

आज आदमी सच्चाई से फिसल गया है। 
इस इक्कीसवीं सदी का मानव बदल गया है। "

...............चेतन रामकिशन "देव"……............
दिनांक--08.12.2014

Wednesday, 3 December 2014

♥♥♥घायल... ♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥घायल... ♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
दिल पे पत्थर मार मार के, मुझको घायल कर देते हैं। 
ये अपने हैं या फिर दुश्मन, दुख से आँचल भर देते हैं। 
जो अक्सर दावा करते हैं, मैं उनको हूँ खून से बढ़कर,
वही लोग क्यों मेरी रूह से, इस तरह छल कर देते हैं। 

प्रेम नाम की माला जपकर जो दुनिया को दिखलाते हैं। 
वही लोग क्यों निर्ममता से, प्रेम की हत्या कर जाते हैं। 
फूलों जैसे स्वप्न दिखाकर, शहद सी बातें करने वाले,
एक पल भर में ही प्यार वफ़ा के, संबंधों को झुठलाते हैं। 

एक क्षण में ही शांत नदी में, वो कोलाहल कर देते हैं। 
दिल पे पत्थर मार मार के, मुझको घायल कर देते हैं। 

मेरी आह का, मेरी चीख का, उनको असर नहीं होता है। 
क्या मालूम हमारे तन में, उनसा रुधिर नहीं होता है। 
"देव " हमारी हथेलियों में, क्या कोई ऐसी शेष है रेखा,
जिसके पथ पर पीड़ा, दुश्मन, दुख और ज़हर नहीं होता है।  

वो मिथ्या से सुरा तलक को भी, गंगाजल कर देते हैं। 
दिल पे पत्थर मार मार के, मुझको घायल कर देते हैं। "

....................चेतन रामकिशन "देव"……............. 
दिनांक--०४.१२.२०१४ 

Monday, 1 December 2014

♥♥फूल ...♥♥


♥♥♥♥♥♥♥फूल...♥♥♥♥♥♥♥♥
फूल काँटों में जब खिले होंगे। 
देखकर कितने दिल जले होंगे। 

बाद अरसे के मिलने पे हो पता,
हमसे कितने उन्हें गिले होंगे। 

वो तो मुफ़लिस है और दवा महंगी,
घाव हाथों से ही सिले होंगे।  

प्यार में दिन का हर पहर उनका,
रात को ख्वाब में मिले होंगे। 

वो यकीं चाहकर भी कर न सके,
जिनके अरमान बस छले होंगे। 

उनको मालूम क्या मोहब्बत है,
जिस्म से खून जो मले होंगे। 

"देव " अपने हैं सिर्फ वो देखो,
दर्द में साथ जो चले होंगे। "

.....चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक-०२.१२.२०१४ 

♥♥रस्म प्यार की......♥♥

♥♥♥♥रस्म प्यार की......♥♥♥♥
जान बूझकर खता कर रहे।
रस्म प्यार की अता कर रहे। 
जो कहते थे मैं दिल में हूँ,
वही हमारा पता कर रहे।

प्यार नाम का भी क्या करना,
जो सूरत भी याद रहे न। 
इतना अनदेखा भी क्यों हो,
जो कोई संवाद रहे न। 
यदि निहित तुम हो नहीं सकते,
नहीं सुहाती प्यार की भाषा,
तो क्यों ऐसा ढोंग दिखावा,
जिसमे दिल आबाद रहे न।

जो चाहते थे नाम हमारा,
वही हमें लापता कर रहे। 
जो कहते थे मैं दिल में हूँ,
वही हमारा पता कर रहे...

क्यों रिश्तों में रस्म निभानी,
क्यों चाहत की नींव गिरानी। 
क्यों देकर के झूठी खिदमत,
किसी के दिल को ठेस लगानी। 
"देव " प्यार के संग में ऐसा,
बोलो ये खिलवाड़ भला क्यों,
साथ नहीं जब दे सकते तो,
क्यों झूठी उम्मीद बंधानी।

वो क्या देंगे यहाँ सहारा,
अनुभूति जो धता कर रहे। 
जो कहते थे मैं दिल में हूँ,
वही हमारा पता कर रहे। "
........चेतन रामकिशन "देव"…….
दिनांक-३०.११.२०१४






♥♥मुफ़लिस...♥♥

♥♥♥♥♥मुफ़लिस...♥♥♥♥♥♥
खून, पसीना बह जाता है। 
मुफ़लिस बेबस रह जाता है। 
बीमारी में घर बिक जाये,
घर का चूल्हा ढह जाता है। 

इन सरकारी दवा घरों में,
दवा नाम भर को मिलती है। 
मुफ़लिस को तो कदम कदम पर,
ये सारी दुनिया छलती है। 
मजदूरी को जाने वाले कितने,
देखो मर जाते हैं,
लावारिस में दर्ज हो गिनती,
कफ़न तलक भी कब मिलती है। 

चौथा खम्बा भी खुलकर के,
कब इनका हक़ कह पाता है। 
बीमारी में घर बिक जाये,
घर का चूल्हा ढह जाता है …

सरकारों की अब मुफ़लिस के,
दर्द पे ज्यादा नज़र जरुरी। 
बिन छत के जो जले धूप में,
उसकी खातिर शज़र जरुरी। 
"देव" देश के मुफ़लिस की हो,
बात जात मजहब से हटकर,
प्यास उसे भी लगती देखो,
उसको भी तो लहर जरुरी। 

बिना सबूतों के वो बेबस,
कड़ी सजा भी सह जाता है। 
बीमारी में घर बिक जाये,
घर का चूल्हा ढह जाता है। "


........चेतन रामकिशन "देव"…….
दिनांक-३०.११.२०१४






Friday, 28 November 2014

♥♥माँ की एक छुअन...♥♥



♥♥♥♥♥♥♥♥माँ की एक छुअन...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
संतानों की देख के पीड़ा, माँ का दिल रोने लगता है। 
कष्ट में संतान हो तो माँ का, चैन सुकूं खोने लगता है। 
माँ तो माँ है संतानों की, सूरत में दुनिया को देखे,
नींद तभी आती है माँ को, जब बच्चा सोने लगता है। 

माँ की ममता इतनी व्यापक, लाखों सागर भर जाते हैं। 
माँ को खुशियां मिलती हैं जब, बच्चे अच्छा कर जाते हैं। 

माँ की एक छुअन भर से ही, दर्द दूर होने लगता है।  
संतानों की देख के पीड़ा, माँ का दिल रोने लगता है। 

माँ कविता जैसी कोमल है, माँ गीतों जैसी प्यारी है। 
माँ लेखन की खुशबू में है, माँ उपवन है, फुलवारी है। 
माँ गौरी हो, या काली हो, फ़र्क़ नहीं पड़ता है इससे,
माँ की ममता धवल चांदनी, माँ की ममता मनोहारी है। 

माँ अपनी संतान के आंसू, बिना झिझक के पीना चाहे। 
माँ बच्चों की खुशियों में ही, अपना जीवन जीना चाहे। 

माँ खुश होती है जब बच्चा, ख्वाबों का बोने लगता है। 
संतानों की देख के पीड़ा, माँ का दिल रोने लगता है। 

माँ मिथ्या के अनुसरण का, ज्ञान नहीं बच्चों को देती। 
माँ ईर्ष्या का, द्वेष का किंचित, दान नहीं बच्चों को देती। 
"देव " जहाँ में माँ से सुन्दर, कोई छवि नहीं हो सकती,
माँ भूले दुख का विष का, पान नहीं बच्चों को देती। 

माँ की आँखों में बच्चों की, सूरत हर पल ही रहती है। 
माँ को हो सम्मान सदा ही, सारी कुदरत ये कहती है। 

माँ की ऐसी ममता से तो, ज़हर-मधु होने लगता है। 
संतानों की देख के पीड़ा, माँ का दिल रोने लगता है। "


"
माँ- शब्दकोष के सभी शब्द जो प्रसंशा के लिए, सम्मान के लिए, अपनत्व के प्रयुक्त होते हों, वे समूचे शब्द माँ की ममता में निहित होते हैं, माँ के ऐसे व्यापक स्वरूप को नमन। "

" मेरी ये रचना मेरी दोनों माताओं कमला देवी जी एवं प्रेमलता जी को सादर समर्पित। "

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक- २९.११.२०१४ 

" "




Wednesday, 26 November 2014

♥♥♥मोम...♥♥♥♥



♥♥♥♥♥♥♥♥मोम...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
जब पत्थर को मोम बनाया जाता है। 
नफ़रत का हर राग भुलाया जाता है। 

हर ख़्वाहिश पूरी न होती दुनिया में,
कभी कभी खुद को समझाया जाता है। 

ऊंच नीच, दौलत की बातें दूर रहें,
दिल से दिल का मेल कराया जाता है। 

अपनी कमियां भी आँखों में आ जायें,
जब दर्पण खुद को दिखलाया जाता है। 

खुशियां आतीं घर की चोखट पे खुलकर,
जब बिटिया को भी मुस्काया जाता है। 

एक दिन देखो नज़र जहां की पड़ जाये,
प्यार को बेशक लाख छुपाया जाता है। 

"देव" उन्हें भी कद्र दोस्ती की होगी,
आज भले दुश्मन बतलाया जाता है। "

........चेतन रामकिशन "देव"…….
दिनांक-२६.११.२०१४

Tuesday, 25 November 2014

♥♥मेरा मुझमें क्या...♥♥

♥♥♥♥मेरा मुझमें क्या...♥♥♥♥
तुमसे मिलने जुलने का मन। 
साथ तुम्हारे चलने का मन। 
तेरे उजाले की खातिर अब, 
दीपक बनकर जलने का मन। 

जब से तुमसे प्रेम हुआ है,
मेरा मुझमें शेष नहीं कुछ। 
तुमने कोमलता सिखलाई,
अब मन में आवेश नहीं कुछ। 

जो तेरे माकूल हो वैसे,
तेरी ख़ातिर ढ़लने का मन। 
तेरे उजाले की खातिर अब, 
दीपक बनकर जलने का मन। 

जब से तुम भावों में आये,
कविताओं के फूल खिले हैं। 
शब्द भी रहते "देव" कलम में,
एहसासों को रंग मिले हैं। 

तेरे अधरों की नरमी को,
हिम से जल में घुलने का मन। 
तेरे उजाले की खातिर अब, 
दीपक बनकर जलने का मन। "

......चेतन रामकिशन "देव"……...
दिनांक-२६.११.२०१४ 

♥♥♥फासले...♥♥♥


♥♥♥♥♥फासले...♥♥♥♥♥♥
फासले पास में नहीं रखना। 
दर्द, एहसास में नहीं रखना। 

मैं पुकारूँ जो और तुम न मिलो,
खुद को वनवास में नहीं रखना।  

चाँद हो तुम, मगर कभी खुद को,
दूर आकाश में नहीं रखना। 

जो मेरा दिल कहे वो दे दो तुम,
बात कोई काश में नहीं रखना। 

लिखो, चिपकाओ और मुझे भेजो,
ख़त को अवकाश में नहीं रखना। 

पत्तियां, फूल जो तरसते रहें,
सूखा मधुमास में नही रखना। 

"देव " देरी हो पर नहीं दूरी,
खुद को प्रवास में नहीं रखना। "

......चेतन रामकिशन "देव"……...
दिनांक-२५.११.२०१४

Sunday, 23 November 2014

♥♥♥हे! कुदरत...♥♥♥


♥♥♥♥♥हे! कुदरत...♥♥♥♥♥
माँ की गोद में रखा सर हो। 
भरा ख़ुशी से सबका घर हो। 
हिंसा, नफरत, शूल रहें न,
भूखा कोई, न बेघर हो। 

हे! कुदरत तुमसे विनती है,
दिल लोगों का साफ़ करो तुम। 
न्याय की खातिर भटक रहा जो,
उसके संग इन्साफ करो तुम। 
ये क्या तुम आँखों को मूंदे,
लाचारों पर जुल्म देखतीं।
जो लोगों के हक़ को लूटें,
कभी न उनको माफ़ करो तुम। 

बिन रोटी के मरे न मुफ़लिस,
और न जल में घुल जहर हो। 
हिंसा, नफरत, शूल रहें न,
भूखा कोई, न बेघर हो...

सही कार्य का अवलोकन कर,
उसको आगे करते रहना। 
हे! कुदरत तुम शक्तिशाली,
पापी जन का बोझ न सहना। 
"देव" की तरह लोग अनेकों,
विनती तुमसे ये करते हैं,
नहीं तनिक भी निर्दोषों के,
घर को बिजली बनकर ढहना। 

इस जग को तुम ऐसा कर दो,
घर घर में बहता मधुकर हो। 
हिंसा, नफरत, शूल रहें न,
भूखा कोई, न बेघर हो। "

........चेतन रामकिशन "देव"…….
दिनांक-२४ .११.२०१४


Saturday, 22 November 2014

♥♥मिथ्या सौगंध...♥♥


♥♥♥मिथ्या सौगंध...♥♥♥
फूलों में भी गंध नहीं है। 
अब सच्ची सौगंध नहीं है। 
क्षण भर में सब अलग हो रहे,
रूहानी सम्बन्ध नहीं है। 

चटक रहे दिल शीशे जैसे,
भावुकता का मान नहीं है। 
दर्द किसी को कितना होगा,
मानो उनको ज्ञान नहीं है। 
परदे पर नाटक का मंचन,
करके पात्र बदल जाते हैं,
कसमें, वादे, प्यार, वफ़ा का,
अब कोई स्थान नहीं है। 

खेल रहें हैं लोग दिलों से,
कोई प्रतिबन्ध नहीं है। 
क्षण भर में सब अलग हो रहे,
रूहानी सम्बन्ध नहीं है...

नाम की नातेदारी रखना,
अब लोगों का नया नियम है। 
तोड़ के दिल वो सोच रहे हैं,
मानो कोई सही करम है। 
"देव" न जाने क्यों लोगों के,
हाथ जरा भी नहीं कांपते,
अब अपनायत नहीं रही है,
न ही मन में बचा रहम है। 

मारके दिल लावारिस छोड़ें,
कफ़न का भी प्रबंध नहीं है। 
 क्षण भर में सब अलग हो रहे,
रूहानी सम्बन्ध नहीं है। "

........चेतन रामकिशन "देव"…….
दिनांक-२३.११.२०१४ 

Wednesday, 19 November 2014

♥♥साथ ग़र तेरा...♥♥

♥♥♥♥♥साथ ग़र तेरा...♥♥♥♥♥
साथ ग़र तेरा मिल गया होता। 
प्यार का दीप जल गया होता। 

हौंसला तेरे प्यार का पाकर,
ग़म का पर्वत भी हिल गया होता। 

तू जो हाथों से अपने देती शिफ़ा,
मेरा हर घाव सिल गया होता। 

बीज उल्फ़त के रोंप देतीं अगर,
फूल चाहत का खिल गया होता। 

प्यार का मुझको ऐसा देते शहद,
मेरे दिल में जो घुल गया होता।    

रौशनी लेके तेरी रंगत की,
ये अँधेरा भी ढल गया होता। 

प्यार तक़दीर में नहीं शायद,
"देव" होता तो मिल गया होता। "

........चेतन रामकिशन "देव"…….
दिनांक-१९.१०.२०१४

Monday, 17 November 2014

♥♥तेरी नज़दीकी...♥♥♥


♥♥♥♥♥तेरी नज़दीकी...♥♥♥♥♥♥
रात आकाश को छुपाने लगी। 
मुझको भी तेरी याद आने लगी। 

तेरी सूरत को और दमक देने,
चांदनी फिर जमीं पे आने लगी। 

तू जो आई जो मेरी देहरी पर,
दीप की लौ भी खिलखिलाने लगी। 

तेरी नज़दीकी का असर पाकर,
जिंदगी सारे ग़म भुलाने लगी। 

हर तरफ पर फूल खिल गए जबसे,
प्यार की दुनिया तू वसाने लगी। 

हर घड़ी तेरा ही तसुव्वर है,
रूह में जब से तू समाने लगी। 

"देव" सर मेरा गोद में रखकर,
प्यार से मुझको तू सुलाने लगी। "

........चेतन रामकिशन "देव"………
दिनांक-१७.१०.२०१४ 

Saturday, 15 November 2014

♥♥♥♥क्षणभंगुर...♥♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥क्षणभंगुर...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
क्षणभंगुर है जोड़ दिलों का, पल में खंडित हो जाता है। 
सही मनुज भी निर्ममता से, जग में दंडित हो जाता है। 
वो जिसको एहसास नहीं हो, यहाँ प्रेम की भावुकता का,
वही यहाँ झूठे तथ्यों से, प्रेम का पंडित हो जाता है। 

प्रेम का अंकन मुखपृष्ठों पर, अंकित करना प्रेम नहीं है। 
बस अपने को श्रेष्ठ समझकर, सुरभित करना प्रेम नहीं है। 
प्रेम तो है एक भाव समर्पण, नहीं कोई ऊँचा न नीचा,
ऊपरी मन से, प्रेम पुष्प को, पुलकित करना प्रेम नहीं है। 

प्रेम नहीं वो जिसमें धन का, वंदन मंडित हो जाता है। 
क्षणभंगुर है जोड़ दिलों का, पल में खंडित हो जाता है... 

प्रेम विषय के संदर्भों में, सबकी अपनी परिभाषा है। 
वो उतना ही प्रेम में डूबे, जिसकी जितना जिज्ञासा है। 
"देव" यहाँ पर प्रेम को कोई, महज तनों का मिलन बताये,
और किसी की विश्लेषण में, प्रेम आत्मा की भाषा है। 

वो क्या जाने प्रेम को जिसका, मूल्य घमंडित हो जाता है। 
क्षणभंगुर है जोड़ दिलों का, पल में खंडित हो जाता है।  "

...................चेतन रामकिशन "देव"…..................
दिनांक-१६.१०.२०१४ 

Thursday, 13 November 2014

♥♥बाल श्रम की मज़बूरी...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥बाल श्रम की मज़बूरी...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
घरवालों के लालन पालन को, एक बच्चा श्रम करता है। 
बहन की शादी, दवा पिता की, घर के तम को कम करता है।
उसकी इच्छा भले नहीं हो, बालकपन में श्रम करने की,
पर चूल्हे की आग की खातिर, वो मेहनत का दम भरता है। 

सरकारें कहती हैं देखो, बाल श्रम पे रोक सही है। 
बच्चों का शोषण होता है, न खाता है, नहीं बही है। 
मैं भी इस सरकारी मत से सहमत हूँ पर ये कहता हूँ,
बिन पैसों के उस बच्चे के, घर में भूखी लहर रही है। 

क्या सरकारी जिम्मेदारी, बाल श्रम रुकवाने भर है। 
उस श्रमिक को मदद क्यों नहीं, जिसका भूखा प्यासा घर है। 

बाल श्रम रुकवाया जाये, पर पीड़ित का दुख हरकर के। 
बिना मदद के मर जायेंगे, रोगी बूढ़े उसके घर के। 

इसीलिए तो बाल श्रम की, वजह को पहले छांटा जाये। 
और फिर उनको प्यार वफ़ा के, खिले सुमन को बांटा जाये।   

बाल श्रम पे अंकुश का ये, सफल तभी प्रयास रहेगा। 
जब निर्धन को अन्न, दवा और खुशियों का एहसास रहेगा! "

......................चेतन रामकिशन "देव"…...................... 
दिनांक-१३.१०.२०१४

Monday, 10 November 2014

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मेरी तस्वीर में तेरा ही अक्स दिखता है।
एक लम्हे की जुदाई से भी दिल दुखता है।
बिन तुम्हे देखे मेरा दिल भी अधूरा मैं भी,
देख के तुझको कलम गीत नये लिखता है।

♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥

...........चेतन रामकिशन "देव"…..........
दिनांक-१०.१०.२०१४

Sunday, 9 November 2014

♥♥♥तुम्हारा ख्वाब...♥♥♥


♥♥♥♥तुम्हारा ख्वाब...♥♥♥♥♥♥
रात भर ख्वाब मैं सजाता रहा। 
तेरा चेहरा ही याद आता रहा। 

जब हवाओं ने मेरा हाथ छुआ,
तेरा एहसास मुस्कुराता रहा। 

तुमने अल्फ़ाज़ प्यार के जो कहे,
हौले हौले वो गुनगुनाता रहा। 

चांदनी तुमने जबसे बरसाई,
स्याह में भी मैं जगमगाता रहा। 

तेरी सूरत की जब छुपी थी झलक,
बिखरी ज़ुल्फ़ों को मैँ हटाता रहा।

हुयी सुबह न देख ले कोई,
तेरी तस्वीर को छुपाता रहा। 

"देव" ये ख्वाब अब हक़ीक़त हो,
ये दुआ लेके सर झुकाता रहा। 

......चेतन रामकिशन "देव"…..
दिनांक-१०.१०.२०१४





Friday, 7 November 2014

♥वेदना का जहर(मौन)..♥

♥♥♥♥♥♥♥♥वेदना का जहर(मौन)..♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मौन रहूँ तो कैसे मन में, शब्द कौंधने को आते हैं। 
हर्ष नहीं है पास हमारे, हम दुख की सरगम गाते हैं। 
पढ़ी किताबें जितनी अब तक, उनमे ये ही लिखा हुआ है,
दुख, पीड़ा के बाद में देखो, खुशियों वाले दिन आते हैं!

इसीलिए मैं यही सोचकर, अपने आंसू पी लेता हूँ। 
तन्हा तन्हा बहुत अकेला, होकर देखो जी लेता हूँ। 

बुरे समय में देखो अपने भी, राहों से बच जाते हैं। 
मौन रहूँ तो कैसे मन में, शब्द कौंधने को आते हैं... 

जिनको है अपमान की आदत, वो मेरा क्या मान करेंगे। 
नहीं मदद वो कर सकते हैं और न वो एहसान करेंगे। 
"देव" वो मुझको आरोपित कर, छप लें बेशक अख़बारों में,
लेकिन अपनी रूह के दुख का, वो कैसे अनुमान करेंगे। 

छोड़ दिया सब कहना सुनना, किसी से अब फरियाद नहीं है। 
उनसे अब क्या आस लगाऊँ, जिनको मेरी याद नहीं है। 

जहर वेदना का पीकर के, नींद में हम भी सो जाते हैं। 
मौन रहूँ तो कैसे मन में, शब्द कौंधने को आते हैं। "

.................चेतन रामकिशन "देव"……………..
दिनांक-०८.११.२०१४

Thursday, 6 November 2014

♥♥दिल के जज़्बात...♥


♥♥♥♥♥दिल के जज़्बात...♥♥♥♥♥
दिल के जज़्बात फिर जले क्यों हैं। 
हम सही होके भी छले क्यों हैं। 

वो तो कहते थे, प्यार मुझसे हुआ,
अजनबी बनके वो मिले क्यों हैं। 

मैं हूँ पत्थर सड़क का, चाँद हो तुम,
ख्वाब मिलने के फिर पले क्यों हैं। 

आदमी तुम हो, आदमी वो भी,
तीर, तलवार ये चले क्यों हैं। 

जिनसे जज्बात हैं उन्हें सौंपो,
होठ चुप होके, अब सिले क्यों हैं। 

पर्चियां तक तो हैं, किताबों में,
मेरे ख़त पांव के, तले क्यों हैं। 

"देव " रिश्तों का क़त्ल करके भी,
 सबकी नज़रों में वो भले क्यों हैं। "

.......चेतन रामकिशन "देव"………
दिनांक-०७ .११.२०१४ 

Tuesday, 4 November 2014

♥♥♥फैसला...♥♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥♥फैसला...♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
एक तरफ़ा ही मुझे फैसला वो देके गया।
दर्द का मुझको यहाँ सिलसिला वो देके गया।

मैंने माँगा था सुकूं, उससे हथेली भर ही,
पर मुझे आंसुओं का जलजला वो देके गया।

मैं झुलसता ही रहा आग में ग़मों की यूँ,
न जरा भर भी मुझे होंसला वो देके गया।

पंख खोलूं तो बनें घाव मेरे दामन पर,
मुझको काँटों से भरा घोंसला वो देके गया।

"देव " हर रोज मुझे मारने की कैसी जुगत,
मौत का ऐसा मुझे, काफिला वो देके गया। "

............चेतन रामकिशन "देव"…...........
दिनांक-०५.११.२०१४ 

Sunday, 2 November 2014

♥ ♥चाँद पे घर....♥


♥♥♥♥♥चाँद पे घर....♥♥♥♥
गिरके संभलेंगे हमने ठाना है।
हमको मंजिल की ओर जाना है।

हार जाने से होंसला न डिगे,
चाँद पे हमको घर बनाना है।

बंदिगी, जिंदगी ये है जब तक,
जीत और हार को तो आना है।

अपने आपे से पहले सच बोलो,
रूह से अपनी क्या छुपाना है।

बाद मरके भी याद आयें जो,
नाम इतना हमें कमाना है।

क्या हुआ आज जो मिले कांटे,
कल में फूलों को खिलखिलाना है।

"देव" रोशन जहाँ ये हो जाये,
प्यार का दीप फिर जलाना है। "

......चेतन रामकिशन "देव"….
दिनांक- ०३.११.२०१४

Wednesday, 22 October 2014

♥♥दिवाली...♥♥

♥♥♥♥♥दिवाली...♥♥♥♥♥♥♥♥
दीप घर घर जलें दिवाली पर। 
लोग दिल से मिलें दिवाली पर। 

सूरतें सबकी चाँद जैसी खिलें,
चांदनी हम मलें दिवाली पर। 

हमसफ़र हो नहीं किसी का जुदा,
साथ, संग संग चलें दिवाली पर। 

एक दिन का ही बस उजाला नहीं,
ऐसे ज़ज़्बे पलें दिवाली पर। 

मुफ़लिसों को भी मिल सके जो दवा,
घाव फिर न छिलें दिवाली पर। 

नहीं औरत को जानवर कुचले,
अश्क़ न फिर मिलें दिवाली पर। 

"देव " चाहत के साथ हो न दगा,
नहीं अरमां छलें दिवाली पर। "

...........चेतन रामकिशन "देव"……...   
दिनांक- २२.१०.२०१

Monday, 20 October 2014

♥♥♥कैसी दीवाली....♥♥♥


♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥कैसी दीवाली....♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥
मन में पीड़ा, रुधिर शीत है, निर्धन के घर कंगाली है। 
एक तरफ खरबों के मालिक, एक तरफ ये घर खाली है। 
लोग रौंदकर किसी के दिल को, यहाँ जलाते आतिशबाज़ी,
अंधियारे से घिरे करोड़ों, आखिर कैसी दीवाली है।

लोग बहुत ही निर्ममता से, क़त्ल प्यार का कर देते हैं। 
कभी किसी मासूम का जीवन, चीख-आह से भर देते हैं। 
इतना करके भी जब उनको, चैन, ख़ुशी, उल्लास नहीं हो,
तब वो देखो रूह तलक का, सौदा पल में कर देते हैं। 

दीवारों की मिट्टी उखड़ी, आँगन में भी बदहाली है।  
अंधियारे से घिरे करोड़ों, आखिर कैसी दीवाली है...

फटी हथेली, टूटी रेखा, आँखों में भी सूनापन है। 
कल भी खंडहर बने हुए थे, आज भी पतझड़ सा जीवन है। 
"देव" वो उनकी लाश तलक को भी चंदन से फूंका जाये,
उसे मयस्सर कफ़न तक नहीं, क्यूंकि वो निर्धन का तन है। 

चाँद सरीखा रूप है जिनका, भीतर से नियत काली है। 
अंधियारे से घिरे करोड़ों, आखिर कैसी दीवाली है। "

.....................चेतन रामकिशन "देव"…….............
दिनांक- २१.१०.२०१